जो इन्सानों पर गुज़रती है ज़िन्दगी के इन्तिख़ाबों में / पढ़ पाने की कोशिश जो नहीं लिक्खा चँद किताबों में / दर्ज़ हुआ करें अल्फ़ाज़ इन पन्नों पर खौफ़नाक सही / इन शातिर फ़रेब के रवायतों का  बोलबाला सही / आओ, चले चलो जहाँ तक रोशनी मालूम होती है ! चलो, चले चलो जहाँ तक..

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03 May 2009

एक एक्कनम एक, दो दूनी चार, तीन तियाँ नौ.. ..

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ई लेयो, दुनिया चैन से रहने भी न दे.. और पूछे ’ बेचैन क्यों रहते हो ? "
हम पहले ही ब्लागर से मोहोबत करके सनम.. रोते भी रहे.. हँसते भी रहे गुनगुनाय रहे थे, कि आजु एकु मोहतरमा हमसे पूछि बैठीं, " क्षमा करें डाक्साब, आप काहे के डाक्टर हैं ? "

अब जानवरों के डाक्टर होते तो अपने प्रिय ब्लागर भाईयों के लिये क्यों लिखते ? हम भी किसी चुनावी जनसभा में भाड़े की जुटी भीड़ में शामिल मिमिया रहे पब्लिक से मुख़ातिब होते, या अपनी पढ़ाई-लिखाई का भरपूर दुरुपयोग करते हुये कहीं चैनल-नवीसी कर रहे होते ! और कुछ नहीं तो.. ’ नखलऊ लायब्रेरी  में लोकसाहित्य की अनुपब्धता ’ पर एक्ठो शोध का जुगाड़ करके मेहता अँकल के गाइडेन्स में एक दूसरे किसिम की डाक्टरी का जुगाड़ बना लेते ! और..  अब तक हिन्दी जी के बीमार दिल में कई प्राकृत , अपभ्रँश इत्यादि के शब्दों का प्रत्यारोपण भी कर चुके होते ?   पर,  हाय री फूटी किस्मत.. इतनी घिसाई के बाद एक अदद ’ पब्लिक प्रापर्टी डाक्टर ’ बनना ही नसीब में रहा, सो होय गये !

इत्तेफ़ाक़ से.. चढ़ती उमिर में एक बुरी सँगत होय गयी । पँडिताइन के शासनकाल के बहुत पहले की बात है,  लेकिन वुई भी एक ठँई ज़नानिये रहीं.. यानि कि वह कोमल भावनायें  अउर मैं फूटी कौड़ी  भी नहीं !
फिर भी रँग था, कि जम ही गया ! तब यह ’ खूब जमेगा रँग ’ वाला विज्ञापन नहीं चला था.. सो हम साहित्य-वर्चा  करके ही मदहोश हो लिया करते थे ! ग़र मदहोश हो बैठे, तो कुछ लिखने-ऊखने का गुनाह भी त होबे करेगा, एक किताब मयखाना नाम से पढ़ा तो था .. पर, मयखाना होता कहाँ है, यही न जानता था  ! थोड़ा बहुत सुलेखा रोशनाई खरच करके हल्के हो लेते थे । मत याद दिलाओ, वह सब !

दिन भर की मगज़मारी के बाद ज़ीमेल खोला, . 384 अनपढ़े मेल ( ये अपुण का इनबाक्स है, भिडु ! अक्खा यूनिवर्स अपुण का भेज़ाफ़्राई करनाइच माँगता ) साहस ज़वाब दे इससे पहले ही देवनागरी फ़ान्ट वाले सभी मेल खोलकर अपने कच्चे-पक्के ढंग से बाँच मारे, कुछ का उत्तर भी दे दिया । आगे एक मेल और देखा , बड़े नाज़ुक अँदाज से पूछा गया है, " आप काहे के डाक्टर हैं ? "

उनके शब्दों की सौजन्यता, मानों कह रहीं हों, "  ग़ुस्ताख़ी माफ़ ! चेहरे पर झुकी ज़ुल्फ़ें हटा दूँ तो...... "
मैडम जी, बहुत देर हो चुकी है, अब वोह चेहरा.. वोह ज़ुल्फ़ें.. सब बीते लम्हों में कैद हैं !
अब क्या ज़वाब दूँ, मैं तुम्हारे सवाल का ?

एक दफ़ा यही सवाल , यही सवाल ’ चिट्ठाकार ’ से भी फेंका गया था । मैंने किसी तरह इसको गली में सेफ़ ड्राइव करके, अपने को आउट होने से बचाया ! जी हाँ, मैडम जी.. हमरा दिमाग हर बेतुकेपन पर  आउट होने वाला लाइलाज़ ट्यूमर पाले है ! हालाँकि, समीर भाई आश्वासन दे गये हैं, कि वह कनाडा जाते ही जल्द ब जल्द मुझे इलाज़ के लिये बुलावेंगे ! अब देखो, उनके आश्वासन का क्या होता है ? सुना है, वह राजनीति में भी कभी सक्रिय रहे हैं । यह और बात है, कि तब  उनके घाघ साथियों ने आपके टँकी चढ़ते ही सीढ़ी गायब कर दी ! उतरने के प्रयास में लेखन की डाल पर अटक कर रह गये ।

पर्याप्त मनोरँजन हो चुका हो, तो फिर अपने पुराने पहाड़े पर आया जाय , या टाला जाय । अब तो मैं भी वरिष्ठ में घुस सकता हूँ । सो, चुप मार लिया जाय ? अब क्या ज़वाब दूँ, मैं तुम्हारे सवाल का ?

या फिर, मेहरबान कद्रदानों की तरफ़ टिप्पणी बक्से की चौकोर टोपी घुमा कर, क्रमशः लिख, इसे कभी न पूरा करने को यहाँ से सरक लिया जाय ?  वैसे भी आजकल मेरा ’वृहद-पोस्ट लेखन कलँकोद्धार व्रत ’  चल रहा है !  अपना सेहरा स्वयं ही पढ़ना तो शोभा न देगा, सो सकल प्रोटोकाल,  शिष्टाचार तज एक पोस्ट में मामला आज लगे हाथ यहीं सलटा दिया जाय ?

उत्सुकता एकदम ज़ेनुईन है, बहुतेरे डाक्टर घूम रहे हैं । ज़रूरी नहीं कि शोध करके ही Ph.D. शोधा हो, मानद भी तो बाँटी जा रही है । कई रंगबाज तो अपने को ऎसे ही डाक्टर लगाते हैं और लगभग ज़बरन आपसे मनवाते भी हैं । कच्छे से लेकर लंगोटावस्था तक आपने उनको गर्ल्स कालेज़ के इर्द गिर्द ही पाया होगा , फिर अचानक ही उनके नेमप्लेट पर एक अदद डाक्टर साहब नाम बन के टँगे दिखने लग पड़ते हैं,  डा.  हुक्का, ए. ट. पो. री. ( हि. ब्ला.)  ,  क्या करियेगा ? ये अपुण का इंडिया है, भिडु ! आपका मेरे ' कुछ ' होने पर संदेह नाज़ायज़ नहीं है । होना भी नहीं चाहिये,  माहौल ही ऎसा है !

एक एक्कनम एक
reply-to  dramar21071@yahoo.com
to Chithakar@googlegroups.com
date 6 Feb 2008 01:02
subject  Re: [Chitthakar] Re: याहू पर माईक्रोसॉफ्ट की बोली
mailed-by gmail.com

प्रिय बंधु,
ब्लागीर अभिवादन
विदित हो कि मैं डाक्टर अमर कुमार एततद्वारा घोषित करता हूँ कि मैं
पेशे से कायचिकित्सक बोले तो फ़िज़िशीयन हूँ
,अतः मेरी भाषा या लेखन की
त्रुटियों पर कत्तई ध्यान न दिया जाय । ईश्वर प्रदत्त आयू में से 55 बसंत को
पतझड़ में बदलने के पश्चात अनायास ही हिंदी माता के सेवा के बहाने से
कुछेक टुटपुँजिया ब्लागिंग कर रहा हूँ । वैसे युवावस्था की हरियाली में ही
हिंदी, अंग्रेज़ी,बाँगला साहित्य के खर पतवार चरने की लत लग गयी थी ,
और अब तो लतिहरों में पंजीकरण भी हो गया है ।
गुस्ताख़ी माफ़ हो तो अर्ज़ करूँ... इन उत्सुक्ताओं को देख मुझे दर-उत्सुक्ता
हो रही है कि आपकी उत्सुक्ता के पीछे कौन सी उत्सुक्ता है ? मेरी हाज़त
का खुलासा हो जाय, वरना कायम चूर्ण जैसी किसी उत्पाद के शरणागत
होना पड़ेगा । आगे जैसी आपकी मर्ज़ी..
सादर - अमर

ज़ाहिर है कि उपरोक्त रिप्रोडक्शन से व्यक्तिगत प्राइवेसी का हनन हो रहा है ,तो विवाद भी उठेंगे । उचित अनुचित पर सिर धुने जायेंगे । पर सनद तो सनद ही रहेगा ... यह इंटरनेट भी झक्कास चीज है भिडु , जो लिख दिया सो लिख दिया, दीमक के चाटने का लोचाईच नहीं इधर को !  बड़े बड़े को फँसायला है, बाप.. सोच के लिखने का इधुर को !
दो में लगा भागा
तो सज्जन और ….?, ( सज्जन का स्त्रीलिंग ? मेरे को नईं मालूम, नाहर साहब से पूछो ! )    
अमिं जी०एस०वी०एम० मेडिकल कालेज, कानपुर से चिकित्सा स्नातक इत्यादि इत्यादि हूँ, और सम्प्रति राहू सरीखा हिंदी ब्लागिंग से बरसने वाला अमृत चखने आप देव व देवियों की पंगत में चुपके से  आय  के ठँस गया हूँ । महादशा का अँदेशा तज दें, और इससे ज्यादा और कुछ भी तो नहीं
चोर निकल के भागा
अब यहाँ से फूट रहा हूँ,  आप इस राहू के शान्ति का आयोजन करें । नमस्कार !
us-thy outline
पर, सुराग क्या मिला भला ?
सुराग़ पुख़्ता या ख़स्ता जो भी मिला हो, पँडिताइन जाँच समिति ने 24 वर्षों बाद आज रिपोर्ट दी है.
कि मैं कड़वी दवाई-दारू वाला घिसा हुआ असली टाइटलर  हूँ ।
ओह,  लगता है सारथी जी  से स्लिप आफ़ माँइड , स्लिप होकर यहाँ  भी हिन्दी की निगरानी करने  आ पहुँचा है ! हाँ तो , मैं  अँग्रेज़ी  दवाई  वाला असली डाक्टर हूँ ! अँग्रेज़ी में दवाई लिखता हूँ, फिर  मुई  इसी  अँग्रेज़ी से गद्दारी  कर  के हिन्दी में बिलाग लिखता हूँ !
अलबत्ता कोई दलबदलू नेता नहीं हूँ !
अपने डाक्टर होने का हवाला देने में,  व्यक्तिगत मेल बिना इज़ाज़त सार्वजनिक कर दिये, तो क्षमा किया जाय । वैसे भी मैं आप सब की दया का पात्र हूँ । बड़ी बदतर हालत है मेरी,   न घर का - न घाट का ! मेरे मरीज़ भी सहज कहाँ विश्वास करते हैं कि मैं नुस्ख़े के अलावा कुछ और भी लिखने की अक्लियत रख सकता  हूँ !   जय हिन्द !

अनूप भाई पूछिन हैं,  कि पिछली पोस्ट कित्ते बजे लिखी गयी है !  वहू वतावेंगे गुरु, जरा  टैम तो मिले ? ब्लागजगत का फ़ुरसत तो आप हथियाये बैठे हो । ’ अथ तीन बजे रहस्यकम ’ जो केवल कुश जानते हैं, आप सब पब्लिक को कब लीक किया जाय ?  डेढ़ – दो  सौ  ग्राम  फ़ुरसत  कभी  इधर  भी  वाया  उन्नाव ट्राँस्फ़र करो न ? वहू बतावेंगे !  दुबारा से, जय हिन्द !

 

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23 April 2008

बचना, ओऽ ..ऽ ख़बीसों....लो मैं आ गयाःऽ

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लोजी लो, मैं तो राँची से लौट भी आया, अब कहोगे कि  अपनी मनगढ़ंत पूरी करो । सो, पूरी तो करना ही पड़ेगा वरना सबलोग क्या कहेंगे ? यही ना कि दो दो ब्लाग का बयाना लिये पड़ा है, वहाँ ' काकचरितम'  अधूरी छोड़, एक मनगढ़ंत पोस्ट को भी अधर में टाँग कर यहाँ टहल रहा है । कल की पैदाइश और ख़लीफ़ागिरी चालू ! बाँयीं आँख भी सुबह से फड़क रही है, इधर शीर्षक में भी ख़बीस घुस आया है, अल्लाह जाने क्या होगा आगे ? कोई भी जीवित या मृत बंधु ख़फ़ा न हों । ख़बीस महोदय क्योंकर आये , यह वही जानें क्योंकि.... मैं  त्त्तो  देबुदा के किल्ले सै जुझ्झ रहा थ्था, ई ब्लगिया अधीक्रित्त्त कर्र रहा थ्था, ब्लगिया अधिकृ नईं हुयी त्तो मैंकिया करूँ । सो ख़बीस का ख़ुलासा मेरे बैग में ही पड़ा रहने दें, वह सब बाद में... ' फ़िलहाल तो यह पोस्ट पूरा करना भी पहाड़ लग रहा है ।

ऎज़ आलवेज़ हैपेन्स ... ,दिस पूअर मैन पोज़ेज़ एंड पंडिताइन डिस्पोज़ेज़, करलो जो करना है और इनका हौसला बढ़ाने वाले भी हैं । पंडिताइन उवाच " रेलयात्रा का मोर्चा फ़तह कर लेने से ही क्या होता है ? उस मनगढ़ंत के घुरहू को  पहले जस्टिफाई तो करलो .. वरना लोग क्या सोचेंगे ? " मन हुआ बोलूँ, लोगों की छोड़ो ! तुमको कब से फिकर होने लगी ? लेकिन अँखिया पहले से ही फड़क रही है, हटाओ जाने दो । आज खटखटाय लेयो कुंजी , ओ डाक्दर राज्जा..

                                                     बचना ओ ख़बीसों, लो मैं आगया बाई अमर 

अब घुरहू का साक्षात्कार  लगता है, मुझसे तो  इस जन्म में शायद पूरा नहीं हो पायेगा । यह अकारण ही नहीं ? इसकी एक ज़ेनुइन वज़ह है, श्री घुरहू महाराज मौके पर से फुर्र हो चुके हैं । सावधानी हटी, दुर्घटना घटी जैसा केस है ।

मात्र चार दिनों में ही मेरे इस मानस चरित्र को कतिपय हरफ़न मौलाओं व ज़ब्बरों ने नेपथ्य में धकेल दिया । मुझे अटपटा तो लग रहा है, लेकिन ? यह लेकिन कोई ऎवेंई प्रश्नचिन्ह नहीं, बल्कि ध्रुवसत्य सरीखा  है । ऎसा तो होता ही आया है, और यह शायद कभी हमारी बचीखुची मान्यतायें भी हथिया ले , तो ताज़्ज़ुब न होगा । सारे ढोल तमाशे के बाद, ऎन मौके पर कई सयाणे घुरहू   जैसे आम चरित्र को परे हटा , स्वयं सामने हो सारा फ़ोकस समेट लेते हैं । फोकसवा का सब लाइट लई लियो रे.... लाइमलाइटवा के बनिया .... साक्षात्कार टी०आर०पी० के हिसाब से ख़रीदे और बेचे जाते हैं। बेचारा घुरहू ! वह चिरकाल से इनकी परछाईं में लोप होने को अभिशप्त रहा  है । का करियेगा ? चलिये, यही सही ....

नायक बदल गया तो क्या ? यह बेजोड़ ज़ब्बर , अनायास मेरी पोस्ट का दावेदार बन कर प्रकट हो गया.. चिपक ही तो गये हैं  यह शाह हनुमानुद्दीन , मेरी सोच में !  इसमें दम है,  न कि यह कोई लंतरानी है, सो मैने लपक कर इनको गले लगा लिया। एक चरित्र गढ़ने की मशक्कत से छुट्टी मिली और मेरे मनगढ़ंत पोस्ट को वाक़ई एक वास्तविक चरित्र नसीब हो गया। वैसे भी मुझे चरित्रों का टोटा बहुत कम ही पड़ा है, ज़्यादातर खाँटी ही मिले हैं ।

नाम- शाह हनुमानुद्दीन, बाप- कमरुद्दीन, मुकाम- प्लाट नं 78, चक- न्यू कालोनी, बरियातू रोड, शहर- राँची

अब भला इं० मुकुल श्रीवास्तव अपनी ज़ोरू के भाई से पंगा थोड़े ही लेंगे ? सारी ख़ुदाई से तौला जाता रहा हूँ। जानता तो था कि कोई उनका विशिष्ट सेवक है, जिसे वह लख़नऊ से साथ ले गये थे ।किंतु इतने विलक्षण होंगे, यह न जानता था । इनसे मिल कर लगा कि नाटकीय उत्पत्ति याकि जन्मकथा अकेले कबीर की ही कहानी नहीं है।

अतिरंजित भाषा मेरी सही, किंतु तफ़सीलात बकौल मुकुल ही हैं... Ӂ*

Ӂ* चारबाग़ स्टेशन के सम्मुख स्थित श्री हनुमान मंदिर का निर्माणकार्य जारी था । सन 1981 की कोई सुबह, इसी मंदिर परिसर के पिछवाड़े, एक कुली को नवजात बालक मिला । मज़मा जुट गया, लोग उचक उचक कर देखते, अपनी अपनी हाइपोथिसीस पेश करते, जन्म देने वाली कोख की कल्पना कर-करके गुदगुदाते मन को संभाल,  अपनी लार सुड़कते हुये , ज़ाहिराना तौर पर हज़ारहाँ लानतें भेजते, और वहाँ से सरक लेते ।  रिक्शे से उतर, कमरुद्दीन ने भीड़ में अपनी मुंडी घुसेड़ी, गंध आयी कि माज़रा जरा इत्मिनान का है, सो झट एक बीड़ी दाग कर , धुँआ गुटकते मज़में के केन्द्र में अपनी जगह बनाने में सफल रहे । गौर से बच्चे को देखा, ' रोंयेंदार लाल लाल, आदमी का बच्चा, दोनों हाथ व घुटने समेट कर कुनमुनाता हुआ, '  उनको इस तरह बच्चे में तल्लीन देख अगले ने पूरा का पूरा बच्चा ही उनकी गोद में नज़र कर दिया । ज़नाब बच्चे की सोंधी सोंधी ख़ुशबू, अपनी साँसों में भरते हुये मदहोशी के  आलम में मस्त हुये जारहे थे कि एकाएक सारी भीड़ ख़ाकी वर्दी को आते देख छिटक खड़ी हुई।

' क्या होरहा है बे, मियाँ ?  भीड़ क्यों लगा रखी है और यह सुबह सुबह बच्चा लिये कहाँ डोल रहा है, तेरा है ? ' सवालों की ताबड़तोड़ आमद से मियाँजी खड़बड़ा गये । हाँ-नहीं, ऊँ-आँ करने लगे, कि पिंडलियों पर दो तीन पड़ गयी और मियाँजी होश में आ, माज़रा समझाने की कोशिश में गोंगिंयाते हुये रुँआसे होकर कुछ बताने जा रहे थे कि गरदन पकड़ कर धकेल दिये गये । ज्जास्सालेः, इस गठरी को थाने में दर्ज़ करा कर जमा करवाके आ ।  ख़ाकी नं० 1 हँस रहा था।

बहुत ही बुरा दिन बीता, क़मरूद्दीन का ! दूसरे के रिक्शे से बच्चे को लपेटे सपेटे थाने पहुँचे, पच्चीस सवालों का सामना किया, दसेक गालियाँ खायीं और गरदनिया देकर भगाये गये । अबे स्टेशन का मामला है, फिर यहाँ क्यों मराने आगया ? जा, जीआरपी वालों की पकड़ ! यहाँ दुबारा इस चूज़े के साथ दिखा तो... ! और.. मुंशी अपनी बायीं मुट्ठी में, दायें हाथ से डंडे को  आगेपीछे करते हुये, दाँत पीसता हुआ, अगली बार होने वाले अंज़ाम का ट्रेलर पेश करने लगा। दूसरे जन हो हो कर हँस रहे थे, मानों आवारा कुत्ते के पिछवाड़े पटाख़े की लड़ी बाँधी जानी हो ।

अब आज इतना ही.....शेष कल 

  

 

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14 March 2008

जात न पूछ साधो की

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भईय्या, यह इंसानी फ़ितरत कहाँ से ले आये                                                                            " यह इंसान कहलाने वाले चोंचले उन तक ही रहने दे, यार ! "

अभी तो मेरी पोस्ट शुरु भी नहीं हुई और यह अनपढ़ बंदर कमेंटियाने लगे । शायद ज़ाहिल हैं इसीलिये इस ज़ाहिली पोस्ट पर बेवज़ह उछलने लगे। अरे भाई, पढ़े-लिखों की शालीनता इसी में रह्ती है कि चुप रहो और तेल देखो, तेल की धार देखो, बोलोगे तो लिखे पढ़े होने का भेद खुल जायेगा ।

बंद करो, यह बेतुकी बंदर पुराण, अपने मतलब पर आओ । वही तो ! फिर बता कर ही जाइये कि यह ब्लागर बिरादरी अपनी भारतीय वर्ण-व्यवस्था में किस वर्ग में रखा जायेगा ? हमको तो जन्म से यही बताया गया है कि जो जीव ऊपर से डिस्पैच किया जाता है, बाकायदा अपने बैच नम्बर और एक्सपाइरी डेट के साथ अपना चालान साथ लेकर चलता है,बोले तो कर्मों का फल! इस हद तक कि तोते को विप्र वर्ण नसीब है तो कव्वे को शूद्रवर्ण । नारायण .. .. नारायण !

क्षमा करें, असावधानीवश यह निट्ठल्ली पोस्ट गलत रास्ते से ठेल दिया गया है । चलने दीजिये। आज सुबह सुबह एक प्रतिष्ठित समाचारपत्र में छपी एक छोटी सी ख़बर ने मुझे भरभरा दिया ।

अनियंत्रित बस ने सोते हुये दलित युवक को रौंदा

 घट्नास्थल पर ही दर्दनाक मौत  

बिल्कुल सही है, बस दुर्घटना में एक युवक की घटनास्थल पर मृत्यु होगी तो दर्द तो हमें भी होगा, और हुआ भी । किंतु इस दर्द में एक तीक्ष्ण वितृष्णा समाहित थी, इस हद तक कि मेरी पंडिताइन बोल पड़ीं, ' सुबह सुबह गाली क्यों फूट रही है मुँह से ? ' सत्यवचन प्रिये, इस शुभ प्रभात में गालियों का अनायास प्रस्फुटन क्योंकर हो रहा है, यह ज्ञानी पुरुष ही बता सकेगा !   मेरी तो रिपोर्टर महोदय से पूछने की इच्छा हो रही थी , यह क्या समाचार दिया है, भाई ? क्यों दलित को इतना महत्व दे रहे हो, उसे इंसान के रूप में ही कालकलवित होने दोगे तो समाचार संकलक के चश्मे से यह नहीं लउकेगा कि एकठो आदमिये मरा है कउनो चींट-मकोड़ा नहीं , कटिंग डस्टबिन के लायक नहीं, कवरेज़ एरिया का सर्कुलेशन ऎफ़ेक्टेड हो सकता है !  तो शिरिमान जी यह किस ख़बीसनवीसी स्कूल के पाठ्यक्रम में ख़बरनवीसी सीखी है, आपने ? कल को यह छापोगे कि टेम्पो पलटा तीन सरदार मरे, दो आदमी गंभीर रूप से घायल एवं दलित टेम्पोचालक मामूली हताहत । मौके पर एक संदिग्ध पत्थर की मौज़ूदगी का अनुमान। अरे भाई, मुँह क्यों खुलवाते हो, भूले भटके कबीर उबीर तो पढ़बे किये होगे, अपने स्कूल में    

जाति न पूछौ साधु की, जो पूछौ तो ज्ञान।
मोल करो तलवार का, परा रहन दो म्यान।।

जाति न पोछौ साधु कि

दलित को सवर्णों ने ज़रूर पैदा किया है, लेकिन आप तो इसको सींच सींच कर लहालोट हुये जा रहे हो । अब ऎसी हालत है कि भाई लोग काव्यकुंज में भी यदि होता किन्नर नरेश तुल्य कविता रच रहे हैं मुझे दलित मानो । सो बेचारा दलित अब बहुतों की रोज़ी रोटी चला रहा है, और आप चभड़ चभड़ जुगाली कर रहे हो।  भैंस  मनोवैज्ञानिक कृपया जुगाली करते भैंस की मनोदशा पर प्रकाश डालें और इनके ज्ञानचक्षु खोलें ।  यह लोकतंत्र तीसरा खंभा, किसी फ़िस्सड्डी ग्रामपंचायत के सूखा बंबा सरीखा खड़खड़ाय रहा है, भाई ! 

हम तो मानते हैं, ज़ुर्म का इक़बाल भी करते हैं कि बहुत जुलुम ढाया है, हमारे पुरुखों ने इनकेऊपर।   मैं स्वयं प्रत्यक्षदर्शी हूँ, मेरे बड़े बाबा (बाबा के बड़े भाई) जो किसी ज़माने में इंकलाबी भी थे, गाँव  आकर इनमें अनुशासन बनाये रखने के हिमायती हो जाया करते थे । मुसहर, कोयरी, चमार चाहे 70 वर्ष का वृद्ध ही क्यों न हो, हम बच्चों के पाँयलागी करना नहीं भूलता था । आखिर हम बड़का लोग जो थे । अगर चूक गया तो बड़े बाबा से बच नहीं सकता था । पकड़ कर हाज़िर किया जाता, बाबा सीधे उसकी बेटी से नाता जोड़ कर उसे एक दो बेंत जड़ देते, यदि प्रतिरोध या अवज्ञा जैसी कोई बू आ रही होती, तो जेठ की तपती धूप में मुश्कें ( ढाई फीट लम्बी गाँठदार रस्सी ) कसवा कर लुढ़का देते । उस गेंद रूपी मानवकाया से गोहार गूँजा करती,' दोहाई मालिक, दोहाई हज़ूर कनको न देखलियइ बाबू सबके , न त बाप किरिया अइसन ऊदूली कब्बो न  भेल कि आहाँ के शान में बट्टा लगायेब । दोहाई दोहाई बाबू, इस्कूल में पास हो जायेब, छोड़ा दू हमरा, घर भर असिरबाद देत रउआ के । होली में खँस्सी खियाऎब, दोहाई दोहाई देवता जवार के ।' जैसे जैसे उसका आर्तनाद ऊँचा होता जाता, मेरे बड़े बाबा का संबन्ध उसकी बेटी से प्रगाढ़ होता जाता । क्या लीला थी, क्या दिन थे ! शायद उसी समय मेरे मन में एंटी तत्व का अंकुर पड़ा होगा फिर भी स्कूल पास होना ज़्यादा ज़रूरी था सो इस लालसा से बाबा के पास सहमते हाँफते जा खड़े होते कि छोड़ दें, लेकिन उसके पहले छुलछुल छुलछुल अपनी ही पेशाब छूट जाती । वह सन 56-57 का जमाना था । लाल टोपी यानि प्रजा सोशलिस्ट पार्टी उठान पर थी । यह मुद्दा वह लोग भुनाते इससे पहले ही आरक्षण इत्यादि का प्रहसन आरंभ हो गया, चुनाव भी था, प्रहसन इसलिये कि इसका पटाक्षेप होता तो दिख नहीं रहा कांग्रेस देगी देश को दलित प्रधानमंत्री ! और तीसरा खंभा खड़े खड़े नित्य नयी शब्दावली गढ़ रहा है , अपने अपने टी आर पी के आधार पर, आख़िर यह दलित पत्रकार की खोज क्या बला है ? किसी भी योजना या जनोत्थान कार्यक्रम की एक नीतिगत डेडलाइन होती होगी, पुरुषार्थी पाँच दशकों तक प्रश्रय के मोहताज़ नहीं रहा करते,वह भी तब जबकि पूरा अमला आपको बबुआ सरीखा हर सर्द-गर्म में सहेज़े लपेटे रहता है, तो यह चल्ल दल्लित्त्तदल्लित दल्लीत दल्लित दल्ल दल्लित्त दलित..दालित्त्त  की कबड्डी का अंत करो, यारों ! जगहँसाई होय रही है, लोग समझने लगे हैं , चुनाव के बाद पूछते हैं कि क्या दलित भी जीता है ? यह धुरंधर भाटभटेकर तो एकदम मौलिक निकले दलित बन कर 33 वर्ष तक अफ़सरी का सुख (?) भोग तो लिये ही, बिहार में। मेरा दिमाग तो इस दलित जुगाली में ही उलझ गया, अब ख़बर ली जाये ख़बरनवीस की ..

तो मेरे ख़बरिया मित्र, ऎसे खड़बड़िया ख़बर की व्याख्या हो जाये तो हम तुच्छ ब्लागीरों के    अ-छपास क्षोभ को थोड़ी शान्ति मिले । टाँग खिंचायी नहीं,सरकार ! द मैटर इज़ सीरियस । जरा स्पष्ट कई दिया जाय कि बस एक यंत्रचालित परिवहन उपक्रम है, फिर भला उसमें दलित भेद करने का प्रगामी साफ़्टवेयर भी नहीं है तो वह एक चैन से सोये युवक को दलित जान कर कैसे अनियंत्रित हो गयी ? यदि वह यंत्रजनित त्रुटिवश अनियंत्रित थी तो युवक दलित हो, ब्राह्मण हो, ढोर ढंगर हो यानि जो भी सामने हो सबको बाइस पसेरी के भाव से ही तौल देती । फिर युवक के आगे दलित चस्पा करने का मंतव्य ? यदि उसमें अहिंसा परमोःधर्म का ब्रेक आयल नहीं था तो वह आप को भी बख़्सने वाली नहीं ,सामने कइसहू सयानो होय,एक ठोकर लागिहे तौ लागिहे । ठीक ? ज़वाब सार्वज़निक न करना चाहो तो मेरे मेल आई०डी० पर भेज दो।

यह रौंदा कौन सी क्रिया है, ज़नाब ? शिवाजी की सेना ने मुग़लों को रौंदा,ऎसा इतिहास में पढ़ा था । अधुनातन रौंदा-रौंदी WWF में भी दृष्टिगोचर होती है, यानि की एक सोद्देश्य सक्रिय क्रूरता ! रौंदा बोले तो युवक ( दलित सही ) अपनी प्राण रक्षा के लिये संघर्षरत था और बस उसे रौंदने में व्यस्त थी । शायद आप सुन न पाये हों किंतु सुनने वालों ने बताया कि युवक रौंदते बस को लक्ष्य कर बोल भी रहा था, तू क्या रौंदे मोय..एक दिन ऎसा आयेगा..गच्च ख़ल्लास !  दुर्घटना के इतने सक्रिय हिंसात्मकता का चित्रण शायद आप अंग्रेज़िन चाची के क्रश्ड(crushed) से सेंतमेंत में माँग कर सके । हेडलाइन से पाठक दहले तभी तो आगे की बात पढ़ेगा । सो, न्यूज़ वैल्यू बढ़ाने के लिये इतने क्रूर न बनो, भाई । चैन से अख़बार पढ़ लेने दो, या यह भी बंद कर दूँ ? किसी दुर्घटना को ग्लैमराइज़ करके क्या सुख मिला, भाई ? रहम करो,रहम करो।

अपने रिपोर्ट की सस्पेंस वैल्यू के प्रति भी तुम सचेत हो क्योंकि अंतिम पंक्ति में उपसंहार स्वरूप दर्ज कर रहे हो कि ' उल्लेखनीय है कि बस ड्राइवर परागप्रसाद स्वयं भी पिछड़ी जाति से संबन्ध रखता है ' बड़ी खंभा उखाड़ जानकारी परोसी है, तुमने ! पब्लिक गदगदागद गदगद !!

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दर्दनाक मौत, खुशनुमा मौत, शर्मनाक मौत में तुमको बेमौत नहीं मार रहा हूँ, इसलिये तुम्हारा और तुम्हारे भोंपू दैनिक का नाम नहीं दे रहा हूँ । रंज़ न करना कि इंटरनेट पर नाम नहीं आया

 

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यह अपना हिन्दी ब्लागजगत, जहाँ थोड़ा बहुत आपसी विवाद चलता ही है, बुद्धिजीवियों का वैचारिक मतभेद !

शुक्र है कि, सैद्धान्तिक सहमति अविष्कृत हो जाते हैं, और यह ज़्यादा नहीं टिकता, छोड़िये यह सब, आगे बढ़ते रहिये !

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