जो इन्सानों पर गुज़रती है ज़िन्दगी के इन्तिख़ाबों में / पढ़ पाने की कोशिश जो नहीं लिक्खा चँद किताबों में / दर्ज़ हुआ करें अल्फ़ाज़ इन पन्नों पर खौफ़नाक सही / इन शातिर फ़रेब के रवायतों का  बोलबाला सही / आओ, चले चलो जहाँ तक रोशनी मालूम होती है ! चलो, चले चलो जहाँ तक..

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09 September 2009

नो.. नो.. नो.. दर्पण दर्शन क्यों ?

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आज सुबह सोकर उठा..वह तो देर सबेर सभी उठते ही हैं, ख़ास बात क्या है ? लेकिन आज मेरा मन कुछ भारी था, अनमना सा बाहर पड़ी कुर्सी पर बैठा शरीफ़े में आते हुये फूलों की कलियाँ गिन रहा था । वह बगल में खड़ी हो जैसे आर्डर ले रही हों, “ ब्लैक टी या नींबू पानी ? ” कुछ ज़वाब दूँ कि उससे पहले ही वह पत्नी-अवतार में दरस दे दिहिन, “ जो बोलना है, जल्दी बोलो.. अभी बहुत काम है । अभी नहाया भी नहीं हैं, तुम मैक्सी में घूमते देख चिल्लाने लगोगे !

सुघड़ पत्नियाँ पति का ज़वाब सुनने का इंतेज़ार नहीं किया करतीं, सो एक फ़रमान जारी करते हुये पलट गयीं, “ चाय बना देती हूँ !” मुझे तुमसे कुछ भी न चाहिये.. मुझे मेरे हाल पर छोड़ दो.. वाले अँदाज़ में मैं घिघियाया, “ बना दे यार, जो बनाना है, बना दे !” लो जी, यह तो लेने के देने पड़ गये, यहाँ तो उल्टे मेरी ही चाय बनने लगी । उनका  पलटवार, “ कल रात देर तक खटर पटर करते रहे,किसी की अच्छी पोस्ट पढ़ कर डिप्रेशन मे तो नहीं चले गये, या तो फिर किसी से पँगा हुआ होगा ?” मैंने शाँति-प्रस्ताव का सफेद झँडा फहरा दिया, “ काहे का पँगा.. नैतिकता के तक़ाज़े को  पँगा क्यों कहती हो..जबकि तुम तो जानती हो कि.. “ पति की बात पूरी होने के मँसूबों पर पानी फेरने का उनका पत्नीधर्म उबाल खा गया, “ मै सब जानती हूँ, मुझको न बताओ । चैन कहाँ रे..,” पर आख़िर हुआ क्या ? अभी आती हूँ तब ठीक से सुनूँगी, रुको जरा चाय तो ले आऊँ ।”  पेंचपँगादि कथाप्रेम  की स्त्रीसुलभ कोमलता उन पर छा गयी । annoyed with charchaचुनाँचे, मुझे टुकड़े टुकड़े कल का वह सब बताना पड़ा, जो मैं नहीं चाहता था । लेकिन सामने बईठ के मेरी नारको सब उगलवा लिहिन, अउर फौरन रिपोर्ट लगा दिहिन,“ ई फ़ुरसतिया तुमको.. बल्कि तुम सब को कौन सी लकड़ी सुँघाये हैं, भाई ? जब देखो तब छुट्टा बछड़े की तरह भिड़ते रहते हो ? “ लेयो, ई सामने ही एक्ठो अउर बियास जी बईठी हैं ? शाह जी एक फैसला और ठोंकती भयीं कि अब दर्पण जी से कोई बैर मत लेना । मानों सामने वाली लुगाई दर्पण से बैर होने की कल्पना से  ही सिहर गयीं हो ! अब इनको क्या कहें, भाई  यह भी एक तरह का बायस्डियत ही तो ठहरा ?

दर्पण साह "दर्शन" ने आपकी पोस्ट "सफर में ख़ो गई मंज़िल,उसे तलाश करो" पर एक नई टिप्पणी छोड़ी है:

Still i would say....
again in English (@अविनाश वाचस्पति ..हमें अंग्रेजी नहीं आती है)

Biased blog and biased posting should not be appreciated anyways even if it is for any specific blog(शब्दों का सफ़र ब्लाग की चर्चा वाली पोस्ट पर कोई biased कहता है तो मुझे अच्छा ही लगेगा), infact that's what the biasedness is...

दर्पण साह "दर्शन" द्वारा चिट्ठा चर्चा के लिए September 08, 2009 11:50 PM को पोस्ट किया गया

डा. अमर कुमार ने आपकी पोस्ट "सफर में ख़ो गई मंज़िल,उसे तलाश करो" पर एक नई टिप्पणी छोड़ी है:

@ 'Darshan'

I am not a spokeperson of anyone.
But, don't you think that its we only, who can protect the Sanctity of our common platform ?
No reservations whatsover, so Let it be like that way only, nothing more or less.
It is intrigueing to see someone appearing at the last bench, just to put a comment full of annoyance.

I honour your affection for being Biased.
BIAS has two meanings.. albeit both are cousines
1. Prejudiced : as your comment reflects.
2. Inclined : as charcha convener's Choice presents.

Who are we to challenge his inclination or choice ?
Someone uses Cow excreta for treating multiple ailments, alright !
Other one likes to get examined, investigated and treated by some other way of his choice & belief, Its pretty okay !

Furthermore, why the hell mention of Ajit ji's Safar has made you sick ?
He is a admired Blogger, loved one by his atleast 500 regular readers. Any sanity in the world would agree that such dignity can never be acheived on a biased basis.

Ofcourse, after your narrow angle obsevation, We realized it and feel delighted over ourselve being biased for Him .

डा. अमर कुमार द्वारा चिट्ठा चर्चा के लिए September 09, 2009 1:00 AM को पोस्ट किया गया

दर्पण साह "दर्शन" ने आपकी पोस्ट "सफर में ख़ो गई मंज़िल,उसे तलाश करो" पर एक नई टिप्पणी छोड़ी है:

Aapki baat ka uttar dene se pehle ye batana avayashak samajhta hoon ki, shabdon ka safar mera bhi priya(if not, then one of the favourite) blog hai,aur is post pe tippani karne se pehle maine wahan pe tippini ki thi.
aapki baat se poorntya sehmat hoon ki aadmi ke apne vichar ho sakte hain kisi bhi blog, post ya koi bhi vastu hetu.
main ye bhi manta hoon ki us specific blog(shabdon ka safar) ke liye wo comment katai uchit nahi tha.Aur na hi maine us specific post ke liye wo comment kiya tha, ye to aap bhi samajh gaye honge. Wo Blog bura tha ye anya blog(jinki charcha ki gayi thi) bure the, ya unki post buri thi ya wo bura likhte hain....
ye mainie katai nahi kaha.Aur na hi mera arth tha, biased ka arth prakshit blogs se na liya jaiye, biased ka arth aprakashit bolgs ki backlink se liya jaiye
is mamle main mujhe chittha charcha blog biased lagta hai aur ye main tab tak kehte rahoonga jab tak mujhe iske ulat koi praman nahi mil jaata. And again i want to justify my words with ur quotation
Who are we to challenge his inclination or choice ?. Sir aap bahut padhe likhe hai aur har ek baat ke do pehlu dekte hain...
main kisi vivad ko janm nahi dena chahta, aur main koi vivad nahi chahta, piche 9 mahino se blogging main hoon kabhi kisi baat ko tool bhi nahi diya. Aur na hi kisi ek vyakti ke uppar koi akeshep kiya hainbas main chahta hoon vivaad na ho atmmanthan ho ki kya ye blog biased nahi hai. Agar aap thoda sa sochne ke baat dil se keh dein ki hum (ya ye blog) biased nahi hain Main maan loonga.
No Personal Grudeges.

It is intrigueing to see someone appearing at the last bench, just to put a comment full of annoyance.

Meri baat nahi hai par generally "History tells Great Brains came from last banches"
Sir ek baat aur kisi ke vichar acche ye tuchcha nahi hote bus hote hain.
Main aapko apni baat nahi manwaaonga, balki ho sakta hai ki main galat houon.
chittha charcha ek general blog hai, jismein kum se kum kuch naye aur undiscovered blog ke bhi charche hone chahiye, moreover kuch blog aise hain jinke har post ka (note: har post ka) back link diya jaat hai. kya koi blogger itna consistence ho sakta hai? Tell me logically (no emotions please).
Kehna bahut kuch chahta hoon, examples bhi bahut de sakta hoon par mera maksad na koi controversy khada karna hai na hi kisi ko dosharopan, bus chahta hun ki sacchai ko log sweekar karein.
yahan blog jagat main(aisa US UK ke english blogs main bhi dekha hai aur india main bhi) ek link, back link, comment, followers ki hod hai....
theek hai honi chahiye .But these should be secondary things. And you know what should be the primary concerned. Sir mujhe meri baaton ka koi uttar nahi chahiye , Bus aap itna keh dijiye ki chittha charha as in whole biased nahi hai main maan loonga.

Who are we to challenge his inclination or choice ?

Sir this blog, as far as i know, is for general reader, not for a group of pelple. (i can't see any moderatorfor specific group)
अँतर के ऊदल का कूदल-करतब शुरु हो,
इससे पहले ही अपना आल्हा इसी आलाप पर रोक देता हूँ..

Sir maine to kisi bhi individual ke uppar aur uski ability ke uppar koi shque nahi kiya, to fir meri annoyance se aapka kya matlab hai? maine to ye baat tab bhi kahi jab aaj mera backlink aapki post main hai, aur pehle bhi 3-4 links meri post ke chittha charcha ne diye hain. maine to chota sa comment kiya tha taki aap log aatm manthan kar sakein agar aap kehte hain ki aap biased nahi hain ya biased hona accha hai to main maan leta hoon.

No reservations whatsover, so Let it be like that way only, nothing more or less.

jaldi main office likh raha hoon isliye baaton ki 'continiuty' ke liye kshama karein.

खुशदीप सहगल ने कहा… ग़ैरों पे करम, अपनों पे सितम
ए जाने वफ़ा, ये ज़ु्ल्म न कर...
(अनूपजी, कभी हौसला बढ़ाने के लिए नौसिखियों पर भी नज़रें-इनायत कर दिया कीजिए...

दर्पण साह "दर्शन" द्वारा चिट्ठा चर्चा के लिए September 09, 2009 10:09 AM को पोस्ट किया गया

Shiv Kumar Mishra ने आपकी पोस्ट "सफर में ख़ो गई मंज़िल,उसे तलाश करो" पर एक नई टिप्पणी छोड़ी है:
Blog, chitthacharcha is biased.

Because I am from the far most corner of the last bench, I carry the greatest brain ever. And this greatest brain on the planet earth wants me to announce that the blog chitthacharcha is biased. Greatness of a brain is not proved till it announces someone somewhere biased.

So, from now onwards, do remember that if I hold someone as biased, its unquestionable since I not only have the greatest brain, I am also from the far most corner of the last bench.

Unhappy blogging.

Shiv Kumar Mishra द्वारा चिट्ठा चर्चा के लिए September 09, 2009 10:54 AM को पोस्ट किया गया

cmpershad ने आपकी पोस्ट "सफर में ख़ो गई मंज़िल,उसे तलाश करो" पर एक नई टिप्पणी छोड़ी है:

"History tells Great Brains came from last banches"

Three Cheers for Saha jI from the back bench. He has now donned the mantle of GREAT BRAIN.... so no more argument please:)

cmpershad द्वारा चिट्ठा चर्चा के लिए September 09, 2009 11:06 AM को पोस्ट किया गया

मन एकदम्मैं किचकिचा गया, ससुरी अँग्रेज़ी का एक शब्द इतना बवाल मचाये है ?  इसका तो है, अर्थ और ही और ! लाओ तो जरा मुई की बाल की खाल खींची जाये….

बायस्ड बोले तो पूर्वाग्रह और अनुग्रह दोनों ही
पूर्वाग्रह बोले तो भाँति भाँति के बिरादरी वाले हैं
मसलन : शिवकुमार मिश्र या चलिये मैं ही सही, बड़े लड़ाका हैं ।  हर कथन में लड़ाकात्मकता खोजा जायेगा ।
इसके उलट यदि परसाई जी की कोई किताब दिख गयी, तो खरीदी ही जायेगी । परसाई जी हैं तो अच्छा ही होगा ! जबकि दोनों में से कोई भी ज़रूरी नहीं कि, सदैव अपेक्षित ही मिले । अब आप अपने पूर्वग्रसित होने का दँश बाद में भले सहलाते रहिये ।
अब अनुग्रह जी को नहीं छेड़ूँगा, यह तो इतनी जगह पर इतने किसिम के भेष बदले हुये परिलक्षित होते हैं कि, जब तक आप सँभले सँभले और लो जी, अनुग्रह हो गया । आपकी टकटकी को ताड़ कर उन्होंने एक मुस्की मार दी, अनुग्रह होय गवा रब्बा रब्बा.. गुनगुनाते हुये आप बायस्ड हो गये कि हो न हो, पक्का है कि, आपका गेट-अप गुटर गूँ खान को मात दे रहा है । मायने कि उनका अनुग्रह आप तक कैच होते होते पूर्वाग्रह बन गया कि नहीं ?  मामला सफा क्लीन बोल्ड !

असहमत रहना तो जैसे नारी का ईश्वर प्रदत्त अधिकार है, यदि सहमत हों भी जायें तो, “ भाई तुम जानो “ का डिस्क्लेमर तो पक्का ही लगा मिलेगा । सो, मेरा केस यह कह कर ख़ारिज़ हुआ कि, “ बस तुम हर जगह बीच में कूदने की आदत छोड़ दो ।” जब से समीर भाई ने कचोट में, यह बोल क्या  दिया कि, “ भाई  थोड़ी  बनावट लाओ ” इनका हौसला बुलँद है । गलत का हौसला तोड़ना मेरा मैन्यूफ़ैक्चरिंग डिफ़ेक्ट है, कानजेनिटल एनामली ! का  करें ?  हिन्दी ब्लागिंग से जब पहला पहला प्यार हुआ था, तब ज्ञानदत्त जी ने नवभारत टाइम्स के एक कवरेज  गाजियाबाद में रिश्वत को मिली सरकारी मान्यता  पर अपना आलेख दिया था, वाह, अजय शंकर पाण्डे ! तब न जानता था कि, सँक्षिप्त टिप्पणी देना या एकदम्मैं टिप्पणी देना ब्लागरीय शिष्टता है, सो मैनें ताव में एक लम्बी टिप्पणी दे डाली । यह इसलिये बता रहा हूँ  कि गलतफ़हमी  न  रहे कि, मैं शुरु  से ऎसा न था । यह ऎब तो कफ़न दफ़न तक रहेगा,  जी

कुछ तो है.....जो कि ! said...
माफ़ करियेगा बीच मे कूद रहा हू.
का करियेगा बीच मे कूदना तो हम लोगन का नेशनल शगल है.
ई अजय जी की दूरदर्शिता समझिये या बेबसी कि उनको यह तथ्य अकाट्य लगा कि ई सब रोक पायेगे तो इसको घुमा के मान्यता दे दिये. वाहवाही बटोरने की क्या बात है ? लालू जी भी तो इस अन्डरहैन्ड खेल का मर्म समझ के घुमा के पब्लिक के जेब से पइसा निकाल रहे है अउर मैनेजमेन्ट गुरु का तमगा जीत रहे है. पब्लिक के जे्ब से धन तो निकल ही रहा है,  बस खजाना गैरसरकारी से सरकारी हो गया

.हम लोग भी दे-दिवा के काम निकलवाने के थ्रिल के आदी पहले ही से थे अब रसीद मिल जाता है,इतना ही अन्तर है . गलत करिये ,दे कर छूट जाइये,यही चातुर्य या कहिये कि दुनियादारी कहलाता है.  गाजियाबाद का खेला तो हमारी मानसिकता को परोक्ष मान्यता देता है, और सुविधा कितना है, अब दस सीट पर अलग अलग चढावा का टेन्शन नही, फ़ारम भरिये १५ % के हिसाब से भर कर काउन्टर पर जमा कर दीजिये . रसीद ले लीजिये . खतम बात ! दत्त जी क्षमा करेगे, ब्लागगीरी की दुनिया मे आपकी हलचल खीच ही लाती है ,

एक आपबीती बयान करना चाहुगा, जब पहले पहले शयनयान चला था, बडी अफ़रातफ़री थी नियम कायदा स्पष्ट नही था ( वैसे अभी भी कहा है,अपनी अपनी व्याख्याये है ) तो शिमला से एक अधिवेशन से एम०बी०बी०एस० लौट रहा था , अम्बाला से इस शयनयान मे शयन करता हुआ सफ़र कर रहा था बीबी बच्चे आरक्षण दर्प से यात्रा सुख ले रहे थे, कभी नीचे कभी ऊपर .लखनऊ तक का टिकट था जाना रायबरेली ! बुकिग की गलती, ठीक है भाई.. लखनऊ मे टिकट बढवा लेगे परेशान मत करो का रोब मारते हुये लखनऊ तक आ गये, लखनऊ मे महकमा का काला कोट लोग चा-पानी मे इतना बिजी था कि एक लताड  सुनना पडा अपनी सीट पर जाइये न क्यो पीछे पीछे नाच रहे है

.चलो भाई ठीके तो कह रहे है ड्युटी डिब्बवा के भीतर है न, घर तक दौडाइयेगा ? बगल से कोनो बोला .चले आये ,मन नही माना बाहर जा कर चार ठो जनरल टिकट ले आये, प्रूफ़ है लखनऊवे से बैठे है, मेहरारु को अपनी समझदारी का कायल कर दिया. रायबरेली बीस किलोमीटर रह गया तो काले कोट महोदय अवतरित हुये. टिखट.. कहते हुये हाथ बढाये , टिकट देखते ही भडक गये, इ स्लीपर है अउर रिजर्भ क्लास है.. जनरल पर चल रहे है, सर..ये देखिये अम्बाला से बैठे है, लखनऊ से टिकट नही बढा तो ये ले लिया. नाही बढा मतलब, इसमे बढाने का प्रोभिजन नही है जानते नही है का ? जानते तो शायद वह भी नही थे,

असमन्जस उनके चेहरे से बोल रहा था. अपने को सम्भाल कर बोले लिखे पढे होकर गलत काम करते है, टिकटवा जेब के हवाले करते हुए आगे बढ गये. मेरी बीबी का बन्गाली खून एकदम सर्द हो गया ,मेरी बाह थाम कर फुसफुसाइ- ऎ कैसे उतरेगे ? देखा जायेगा -मै आश्वस्त दिखना चाहते हुये बोला. करिया कोट महोदय टट्टी के पास कुछ लोगो से पता नही क्या फरिया रहे थे . अचानक हमारी तरफ़ टिकट लहरा कर आवाज़ दिये- मिस्टर इधर आइये...मेरे निश्चिन्त दिखने से  असहज हो रहे थे. पास गया ,सिर झुकाये झुकाये बोले लाइये पचास रूपये !  काहे के ? बबूला हो गये- एक तो गलत काम करते है, फिर काहे के ? बुलाऊ आर पी एफ़ ?

बीबी अब तक शायद कल्पना मे मुझे ज़ेल मे देख रही थी, यथार्थ होता जान लपक कर आयी. हमको ये-वो करने लगी. मै शान्ति से बोला सर चलिये गलत ही सही लेकिन इसका अर्थद्न्ड भी तो होगा, वही बता दीजिये. एक दम फुस्स हो गये आजिजी से हमको और अगल बगल की पब्लिक को देखा, जैसे मेरे सनकी होने की गवाहो को तौल रहे हो. धमकाया- राय बरेली आने वाला है पैसा भरेगे ? स्वर मे कुछ कुछ होश मे आने के आग्रह का ममत्व भी था. नही साहब हम तो पैसा ही देगे, रसीद काटिये रेलवे को पैसा जायेगा. सिर खुजलाते हुये और शायद मेरे अविवेक पर खीजते हुये टिकट वापस जेबायमान करते हुये बोले- ठीक है स्टेशन पर टिकट ले लीजियेगा. उम्मीद रही होगी वहा़ कोइ घाघ सीनियर इनको डील कर लेगा.. आगे क्या हुआ वह यहा पर अप्रासन्गिक है. तो मै देने के लिये अड गया और गाजियाबाद के अजय जी सरकार के लिये लेने पर अड गये ..तो इस पर चर्चा क्यो ?  यह सनक ही सही लेकिन आज इसकी जरूरत है...चलता है...चलने दीजिये की सुरती बहुत ठोकी जा चुकी, कडवाने लगे तो थूकना ही तो चाहिये न सर !

तो नो.. नो.. नो.. कर ही लिया न, तुमने ?
उनका गर्व भाव एकदम से टूट जाता है, जब मैं बेशर्मी से हँस कर कहता हूँ ,
" वह तो आज सारी दुनिया कर रही होगी, आज 9 सितम्बर 09 है ना, मेरी ज़ान ! "
मेरा बेशर्मी से हँसना जारी है, ब्लागर जो हूँ ? भले अपने को हिन्दी का सेवक कहता फिरूँ, इससे क्या  !

इससे आगे

05 July 2009

हाँ, बात डाक्टर्स डे की हो रही है

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यह है जुलाई का महीना, और  इस महीने की पहली तारीख़ हम डाक्टरों के लिये एक ख़ास मायने  रखती है । इन  पँक्तियों के लेखक को  विश्वास है कि, आप में से  अधिकाँश  कुछ कुछ  ठीक पकड़ रहे हैं । यदि ऎसा है तो, आप इन्टेलिज़ेन्ट कहे जा सकते हैं । हाँ, बात डाक्टर्स डे की हो रही है ।

यदि इस सेवा को जनता मानवतासेवा के रूप में देखना प्रारँभ करती है, तो  इस  दिवस  पर  डाक्टरों द्वारा निःशुल्क जनसेवा का विचार सराहनीय ही नहीं बल्कि अपेक्षित है । मेरे गृहनगर रायबरेली  में यह  प्रतीक्षित  दिवस  त्रयदिवसीय  स्वास्थ्य  मेले  के  उपराँत  आज  की  सुविधाजनक  तिथि  पर  ( यानि 4 जुलाई को ) मनाया  जा रहा है । हाँ, बात डाक्टर्स डे की हो रही है ।

’ इण्डिया दैट इज़  भारत ’ में इसे डाक्टर स्व० बिधानचन्द्र राय जन्मदिवस पर एक जुलाई को मनाया जाता है । सँयोगवश यह तिथि उनकी निर्वाण-दिवस भी है । सो,  इस  दिन  डाक्टर्स डे  मनाया जाता है । मनाया क्या जाता है, हम  स्वयँ  ही  मना मुनू  लेते हैं । हर वर्ष स्थानीय स्तर पर आई० एम० ए० की शाखा एक वरिष्ठ चिकित्सक को खड़ा कर सम्मानित भी कर देता है । भाषण देने वाले माइक पकड़ लेते हैं, और बाकीजन अपने मित्रों द्वारा उनकी स्वयँ की प्रशस्ति सुनते हुये भोज खाने में व्यस्त हो जाते हैं,  फिर गुडनाइट वगैरह भी होता है । हाँ, बात डाक्टर्स डे की हो रही है ।

तत्पश्चात सब अपने अपने घर चले जाते हैं । कुछ लोग गुडनाइट से पहले ही वुडनाइट हो जाते हैं, इतने  जड़ और मदहोश  कि  उनको अपने घर  भिजवाना  पड़ता  है । एक दो दिन  तक सम्मानित होने वाले की ईर्ष्यात्मक प्रसँशा की जाती है, उनकी  अनुसँशा  करने  वाले  की भर्त्सना की जाती है, फिर  अगले  वर्ष  तक  के  लिये  सब  ठीक ठाक हो जाता है । हाँ, बात डाक्टर्स डे की हो रही है ।

सबके  सब  डाक्टर  एक  दूसरे  से  बेख़बर  अपने  अपने  काम  में  लग  जाते  हैं, एकता  की  यह अनोखी मिसाल अन्यन्त्र कहीं देखने  में  कम  ही आती है । हाँ, बात डाक्टर्स डे की हो रही है ।

उल्लेखनीय है कि,अपने उत्सव मनाने में हम कितने स्वालम्बी हैं, इस तथ्य की अनदेखी कर मोहल्ला सभासद, अपने भारतविख़्यात शायर ’ बेहिसाब कस्बाई जी,’ और उभार  लेती  हुई  इन्डियन  आइडल प्रतियोगी वगैरह अपना सम्मान वा अभिनँदन समारोह मनाने के लिये नाहक ही प्रचार पाते रहे है ।

सामान्य जन द्वारा ऎसी डाक्टरी घटनाओं ( पढ़ें, महत्वपूर्ण अवसरों ) के  प्रति  उदासीनता  निश्चय  ही निन्दनीय है । अवश्य ही हम शर्म करो दिवस या हाहाकार दिवस जैसा कोई आयोजन नहीं कर पाते, पर इस उदासीनता की निन्दा की जानी चाहिये । हम  मानवतासेवी  तो  अभी  तक  ठीक  से  निन्दा  भी  नहीं  कर  पाते । हाँ, बात डाक्टर्स डे की हो रही है ।

हर व्यावसायिक सेवा में किन्हीं प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष कारणों से एक ख़ास वर्ग असँतुष्ट रहा करता है, यह लघु प्रतिशत यहाँ भी उपस्थित है । वैसे मैंने तो लगा रखा है "प्रवेश पूर्व कृपया यह सुनिश्चित कर लें  कि, आप रोगी  हैं  या  जनता का हक  मारने वाले समाजसेवी, लोभी पत्रकार या दँभी अफ़सर ? " पर मीडिया द्वारा केवल इन्हीं को इस तरह प्रचारित किया जाता है, जैसे मानव सेवा के नाम पर चल रहे इस पेशे में चहुँ ओर दानव ही व्याप्त हों ! सच तो यह है कि, जीवन अमूल्य है का मानवीय मूल्य केवल यहीं जीवित है ।

बहुतेरे सुधी पाठक न जानते होंगे कि, यह दिन अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर डाक्टर्स डे के रूप में नहीं जाना जाता है । यह भारतीय डाक्टरों के लिये चुना गया एक अखिल भारतीय दिवस है । ई० सन 1933 में डा० चा अलमान्ड की विधवा यूडोरा ब्राउन अलमान्ड को ख्याल आया कि 30 मार्च 1842 को ही उनके स्वर्गीय पति ने जनरल एनेस्थेसिया के रूप में ईथर का प्रयोग करके विश्व की पहली शल्य चिकित्सा की थी ।

सर्वप्रथम यह 30 मार्च 1933 को उनके पैतृक निवास बैरो काउँटी, अमेरिका में स्थानीय स्तर पर मनाया गया । 30 मार्च 1958 को अमेरिकी काँग्रेस ने इसे राष्ट्रीय दिवस के रूप में स्थापित करने का प्रस्ताव पास किया :

Whereas society owes a debt of gratitude to physicians for their contributions in enlarging the reservoir of scientific knowledge, increasing the number of scientific tools, and expanding the ability of professionals to use the knowledge and tools effectively in the never ending fight against disease and death.
जी हाँ, बात डाक्टर्स डे की हो रही है ।

ई०  सन 1 जुलाई 1962  को  डा०  बिधानचन्द्र राय  के  देहावसान  और  चीन से  मोहभँग के  बाद, अमेरिका  की  तर्ज़ पर  प्रधानमँत्री  ज़वाहरलाल नेहरू  ने 1963 जुलाई से इसे डाक्टर्स डे के रूप में मनाये जाने की घोषणा की थी । सँभवतः यह तत्कालीन महामनाओं को उनके व्यक्तित्व के अनुरूप सम्मान न दे पाने के असँतोष को शमन करने की उनकी नीति रही हो । यह मेरे व्यक्तिगत गवेषणा का विषय है कि,पँ० ज़वाहरलाल नेहरू किस सोच के अन्तर्गत व्यक्ति विशेष के जन्मतिथियों को राष्ट्रीय पर्व घोषित कर दिया करते थे । जी हाँ, आप ठीक पढ़ रहे हैं, बात डाक्टर्स डे की हो रही है ।

अमेरिकी सीनेट और राष्ट्रपति जार्ज़ बुश ने 1990 में  डाक्टर्स डे  को  कानूनी  ज़ामा  पहनाया  और इसे  अनिवार्य  राष्ट्रीय दिवस  की  मान्यता दे दी ।

Whereas society owes a debt of gratitude to physicians for the sympathy and compassion of physicians in administering the sick and alleviating human suffering. Now, therefore, be it resolved by the Senate and House of Representatives of the United States of America in Congress as follows:
1. March 30 is designated as National Doctors Day.
2. The President is authorised and requested to issue a proclamation calling on the people of the United States of America to celebrate the day with appropriate programmes, ceremonies and activities.
The enactment of this law enables the citizens of the United States to publicly show their appreciation to the role of physicians in caring for the sick, advancing medical knowledge and promoting health.

जी हाँ, बात डाक्टर्स डे की हो रही है ।

docday2बस यहीं पर मेरा असँतोष मुखर होता है, क्योंकि डाक्टरों में कोई राजनैतिक भविष्य हो, या ना हो पर, डाक्टर्स डे को लेकर जनसमाज में निरँतर बसी उदासीनता मन में एक क्षोभ या अलगाव पैदा करती है । चलो फिर भी, कम से कम यह कहने को तो है कि, इवन अ डॉक हैज़ हिज ओन डे ! 
जी हाँ, अब तक बात डाक्टर्स डे की ही हो रही थी ।

DrBC Roy -composed by Amar

tn_docचलते चलते :

जरा इन डाक्टर साहबान से भी मिलना न भूलियेगा.. सीरियसली भई, एक बार मिल तो लें, पछताना न पड़ेगा !

 

 

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12 May 2009

अक्षरश:

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कई दिनों से ब्लागर पर सक्रिय नहीं हूं। इधर-उधर एक इक्का-दुक्का टिप्पणी ठोकी व " धन्यवाद  देने की आवश्यकता नहीं है " की औपचारिकता निभाते हुए नन्हा मन का टेम्पलेट तैयार कर दिया ।  अब क्या  करें ?   नये-नये इन्सटाल किये विन्डो – 7  के नयनाभिराम विशिष्टतायें व नयी सहूलियते संगाल रहा हूं । इधर दो दिनों से पूरी तैय्यारी से आ बैठता, कि 1857 के ग़दर की सालगिरह ( 10 और 11 मई )  पर पोस्ट लिखूँ  । पर ऎसा है न कि,  अभी हम अपने  शैशव को भरपूर जी तो लें..  फिर क्राँति व्राँति की बातें बाद में देखी  जायेगी । सो कोई भी पोस्ट लिखना ही टाल गया, क्या पता यह भी ’ बिस्मिल ’ की तरह उपेक्षित हो जायें, और कोई इन्हें भी " पीछा करो Follow Me का सँदेश डाल जाय, सो नहीं लिखा ।

1857-amar

आज की चिटठा चर्या देखी । अनूप जी की चर्चा अधिक सामयिक होती है । ग़ुँज़ाइश होने के बावज़ूद भी आज की चर्चा पर मैंने कोई टिप्पणी न दी, क्योंकि आज मेरे पास कोई अनूकूल लिंक ही न था । मुझमें साहित्यिक समझ हो न हो, ब्लागरीय समझ बिल्कुल नहीं है । लगातार एक के बाद एक फ़्लाप पोस्ट देने के बाद लगता है कि ज्ञान स्कूल आफ ब्लागर्स में प्रवेश लेना ही पड़ेगा । यदि ताउ फैकल्टी  के दिग्गज़ या प्रोफेसर  फुरसतिया  पढ़ाय देंय, तो बेड़ा पार समझो ! तब  शायद उपकुलपति  समीर लाल जी का दिया एक सार्टिफिकेट  इहां साइडबार में  चिपकाने को मिल सकेगा । यदि उसके बाद,  बात बन जाये तो कुलपति के रिक्त पद पर मैं स्वयं ही काबिज़ हो लूंगा । मेरे फतवे ब्लागर पर वेद वाक्य माने जायेंगे । तब मेरी लिखाई के अजदकायमान होने पर भी  लोगबाग अश अश कर उठेंगे । अप्रासंगिक स्वगत कथन में से तब हट जाया करेगा । अंग्रेजियत के नियमों के प्रति आदर भाव व हिन्दी वाले के आग्रह मात्र पर तू-तू   मैं-मै  होने की  व चर्चा पर लिंक देने के सुझाव पर कोई विचार कर सकेगा ।

mother-thr potrait poem चुनाँचें, माता पर एक पोस्ट लिखने का मन बना कर बैठा हूं । तो.. कम्प्यूटर जी पर अपनी निगाहें लाक किये हुए, मेरा मनन चल रहा है, कि मातृ, माता, मां, अम्मा जैसे किसी विषय पर एक पोस्ट लिखना है, जो मेरे मातृप्रेम की सनद रहेगा । पर,  कैसे लिखूंगा ? हम्म, क्या लिखा जाय... मेरा यह कलम सप्रयास  तो कविता की गहराई तक उतरने से रहा,   ठठेरी,  चितेरी, लुटेरी  जैसे काफिये भिड़ाये जाने  तक ही  बात नहीं है  । क्योंकि  मुझे तो भाई, यह ग्राह्य न हुआ कि समाज के एक नकारात्मक खल तत्व,  लुटेरे  से माता जी को नवाजने  की  नौबत तक कोई रचना दी जाय,  समीर जी क्षमा करें । फिर ?  फिर, एक लेख तैयार करें " मातृ दिवस पर समकालीन भारत के युवावर्ग का उफनता ज्वार ", शायद  यह ठीक रहेगा ? नहीं, यह ठीक न होगा, कोई अकेली डा0 वाचक्नवी  मेरी  पाठक थोड़े ही हैं ? फिर...बचपने के दिनों में घूम फिर कर माँ को ही गोहरा लिया  जाय ? लेकिन मेरा बचपन तो अभी गया ही नहीं है । फिर., एक मारात्मक प्रभाव वाली एक तिकड़मी इमेज लगा कर और माँ तुझे नमन का कैप्शन लगा कर ही इतिश्री कर ली जाय ? लेकिन यह स्वयं मुझे ही गवारा नहीं, तो भला आप क्यों बर्दाश्त करें ? की बोर्ड पर मेरी उंगली घिसाई जाया हो जाय, वह अलग !   इसी असमँजस में डूब  और उतरा रहा हूँ,   कि ?

 

amma-bachcha सहसा  आना... एक आवाज का, " ऎई तुम कुछ कर रहे हो क्याऽऽ ? "
मैं चुप रहा । भला  इन्हें क्या जवाब दें, यह तो पहले से ही पंडिताइन हैं ।
चुप रहने में भलाई हो या न हो, इस समय मुंह में बाबा श्री 120, कुमारी रजनी के संग कल्लोल  कर रहे हैं,   और   इनके एकाकार होते  जाने  का रस जैसे मन में घुलता सा  जा रहा है । यह  तुम क्या जानो..
इतने में दुबारा, “  ऐईऽऽ , ऎई तुम कुछ कर रहे हो क्याऽऽ ? " 
इस बार का संबोधन पंचम स्वर में आरोह के साथ सम पर स्थिर है !
इन्हें क्या जवाब दें ? प्लास्टर बंधे हाथ को देख कर भी कोई पूछे कि फ्रैक्चर हो गया क्या ? आप क्या कहेंगे....शौकिया बाँध रखा है, या घर में बासन मांजने से छुट्टी पाने का यही बेहतर जरिया बचा है, या ऐसा ही कुछ न ?    ऎंवेंईं जिज्ञासाओं के ऎंवेंईं समाधान.. का करियेगा ई अपुन का इन्डिया है !
सुनो तो.. तुमसे एक बात कहनी थी ! लो जी, बिना पूछे तो दस बातें सुना डालती है, आज अनुमति मांगने का कारण ? मन मेरा आशँकित हो गया । यदि हाँ बोलू, तो पंडितइनिया मारेगी, ना बोलूं तो भी पंडितइनिया ही मारेगी । बीच का रास्ता यदि कुछ है, तो क्या है ?
सो, कुछ न बोल अपनी गरदन एक विशेष कोण पर आगे पीछे कर अपनी मजबूर सहमति दे दी ।

वह बोलीं, " न हो तो, अम्मा को आगरा न छोड़ आओ ? " सदके जावाँ व्याकरणाचार्य, न पश्यन्ति प्रश्नम तदोपि न जानामि कथोपकथन ! यह प्रश्न है, या व्यक्तव्य है, याकि अपरोक्ष सुझाव है ? अहो, तो यह है, फ़्यूचर इनडिफ़ेनिट इन्ट्रोगेटिव सेन्टेन्स !    बहुत छकाये रहे हमका  पी सी रेन साहब के गिरामर ने । मैं  सचेत  होता हूँ, किन्तु  बाबा-रजनी  युगल को  मुख  से बहिस्खलन  करवाना ही पड़ेगा । उनके असमय बहिर्गमन से थोड़ी कोफ़्त होती है,  मुखारविन्द खाली करके उन्मुख होता हूँ, " क्यों भला ? "
इस बार निराधार चिन्ता की एक ज़ायज़ आतुरता थी
" ऎसे ही.. उनका, तुम्हारा, हम सबका कुछ बदलाव हो जाता । "
" छोड़ आओ बोले तो,आगरा छोड़ आओ, जँगल में छोड़ आओ, यानि कि कहीं भी, बस इन्हें छोड़ आओ
  रूँआसी हो उठीं, " बेकार बातें मत करो । मैंनें जँगल कब कहा, आगरा में चुन्नु भैय्या रहते हैं, उनके पास तीन चार महीने रह आतीं ।"
मैं असँयतली भी सँयत बना रहा, " यानि कि, मैं माता श्री को नगरी नगरी द्वारे द्वारे बाँटता फिरूँ ? "
" बात मत बढ़ाओ, नगरी नगरी द्वारे द्वारे बाँटने की क्या बात है ? वहाँ आगरा में तुम्महारा भाई रहता है । "
   इस बार खाँटी झनझनौआ अँदाज रहा, मैं भाँप गया, अब ऎसी तैसी होने वाली है ।
सो वन स्टेप बैकवार्ड होता भया । " अरे यार, मैंनें मना कब किया है, वह सहर्ष आकर ले जाये न ! "
" उनको तो फ़ुरसत ही नहीं है, एक फोन तक तो करते नहीं, कि अम्मा कैसी हैं ! "
उछल पड़ा  मैं, " बस यही तो बात है, माँ तो आग्रह से या हक़ जता कर, लड़ झगड़ कर हासिल की जाती है, और उन्हें समय नहीं है ! " एक असहज चुप्पी... मात्र सत्रह सेकेन्ड काटना असह्य हो गया,
मैंने निर्णय दिया, " अमर कुमार अम्मा को कहीं छोड़ने नहीं जा रहे ! "
वह कातर हो उठीं, " मैं तो तुम्हारे लिये कह रही हूँ । अभी मार्च में तो उनकी लैट्रीन तक तुमको साफ़ करनी पड़ी,  तुमको यह सब करते मुझसे नहीं देखा जाता । "
मैं अब बोर हो रहा हूँ, " क्यों,  क्यों नहीं देखा जाता ?
कभी उन्होंनें भी तो खाना पीना छोड़ कर मुझे साफ किया होगा, तब आपने क्यों नहीं देखा ? " 
अब शायद अश्रुप्रपात होने वाला है, क्योंकि इसके पहले का उनका रौद्र गर्जन आरँभ हो चुका है,
" ज्यादा बनो मत ! आख़िर कब तक यूँ रात रात भर जागते रहोगे,  कुछ अपनी भी सोचो ?   एक नर्स ही रख लो । " आह, यह तो स्वयँ ही मुझे कोमल स्थल पर ले आयीं, " अच्छा जी.. मैं अपनी सोचूँ ? तुमने अपनी सोचा था जब जाड़ों की रात में उठ कर बाबू और मुनमुन को दूध गर्म करके देती थीं ।
उनका गीला बिस्तर बदलती थीं ! तब क्यों न कहा कि एक दाई रख दो । "  Amma-11.5.09 तीर निशाने पर पड़ा, क्योंकि अब किंचित इतराहट थी, " वह तो मेरा कर्तव्य था । " 
अब लगे हाथ एक और पातालभेदी बाण चला तो दे, अमर बाबू !
" तो यह भी तो मेरा कर्तव्य है । इन्होंने भी तो माघ पूस में मेरे लिये यही सब तो किया होगा ! तब तो बिजली भी न थी,  कि फट्ट रोशनी हो गयी, और बुरादे की चिमनी खास तौर पर गर्म  रखना  पड़ता था वह  अलग । " सुबह छः बजे उठ कर कोयलें की धुँआती अँगीठी भरना तो  सोच भी न सकतीं हैं ।

न तुम मानो ना हम.. ई लेयो, चलो कुट्टी हो गयी ! अपनी तो दो तीन दिनाँ की छुट्टी हो गयी । लेकिन ना, वह ज़नानी ही क्या, जो अपने मियाँ को चैन के चार दिन नसीब होने दे ? इस समय रात्रि के ग्यारह बज कर छियानबे मिनट हुये हैं,  यानि  कि घड़ी में  तीन का  समकोण बनने  में अभी  दो घँटे  से  कुछ ज्यादा ही मिनट शेष है । यह बिस्तरा-कक्ष से प्रकटती हैं, झाँकने की नौबत ही नहीं, अम्मा की तस्वीर दूर से ही चमक रही  है । " यह क्या…  मदर्स डे पर अब लिख रहे हो, बुद्धू कहीं के ? समीर लाला ठीक ही कहते हैं, रहे तुम वही के वही ..
अमाँ यार, यह सब लटका मैं नहीं जानता । सबै भूमि गोपाल की.. हमरे लिये तो सभी दिन हेन तेन लालटेन डे है । वह कौतुक से हँस पड़ती हैं, "  वाह,  लालटेन डे ! " मुझे आगे बढ़ने का हौसला मिलता है, " और क्या ? जरा तुम ही बताओ, आज बरसात हुयी है, मौसम बड़ा अच्छा हो रहा है । कम्प्यूटर स्क्रीन से छन कर आती रोशनी में तुम भी अच्छी लग रही हो.. अब कहो तो, अमर कुमार बईठ के फ़रवरी वाले वैलेन्टाइन बाबा की राह जोहें ? इसपर इनकी सारी विद्वता धरी रह गयी, कुछ कन्फ़्यूज़ हो गयीं, " हाँ, बात तो तुम सही कह रहे हो.. " और..   और..   और क्या ?   और हममें फिर से मिल्ली हो गयी ।

सब ठीक ठाक हो गया, हम सुख से रहने लगे ।
अम्मा भी जी रही हैं, बस जिये जा रहीं हैं,   कुछ  अनमनी सी !

 

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31 December 2008

तू क्या कर रहा है, बे ?

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अमर-नवम्बर२००८ आतंक आतंक आतंक.. आह, आतंक ! यह ससुरा आतंक शब्द ही इतने गहरे पैठ गया है, कि इसको सुनने मात्र से आतंक उभर आता है । न जाने क्यों, मैं इसके पीछे लट्ठ ( अपना लट्ठ है, भाई ) लेकर पिला पड़ा हूँ ! पर, वज़ह क्या व्यक्तिगत है ? नहीं जी.. भला आहत स्वाभिमान लेकर कौन चैन की नींद सो सकता है ? सच ही सोच रहे हैं आप कि, लगता है स्वाभिमान की ठेकेदारी अमर कुमार को ही मिली है ? सत्य वचन महराज़.. जो चला गया उसे भूल जाओ  ! पर, मेरी मोटी समझ कहती है कि, अक्षुण्ण भारत की इकाई के रूप में अपना स्वाभिमान जगाये रखने से ही देश की अक्षुण्णता बनी रह सकती है । राजनीतिक हितों के लिये हम प्रान्त, धर्म, सम्प्रदाय और जाति तक के स्वाभिमान के नाम पर..".जो हमसे.... चूर चूर हो जायेगा " सरीखे नारे लगाते लगाते दुनिया से खर्च हो जाते हैं, पर देश ? छोड़िये भी, मैं यहाँ कोई युद्ध की पैरवी नहीं करने जारहा ! सभ्य दिखने के लिये इसकी भर्तस्ना की जानी चाहिये.. पर जहाँ समझौतों के तर्क का अंत होता है, वहीं गाली गलौज (hotanim_e0at blogger ) और फिर हाथ-पैर  वाली भाषा की ज़रूरत आन पड़ती है ! समझौते ? राजा हरि सिंह जंक्शन से वाया ताशकंद-शिमला चलते हुये मुशर्रफ़ हाल्ट तक.. समझौतों की ऎसी तैसी का गवाह कौन नहीं हैं ? पर गौर करें कि, क्या सब शांत है ? नहीं जी, हम तो पड़ोसी से ‘सबूत दो..सबूत लो’ सिरीज़ खेल रहे हैं !

             Fighter3airdef8          क्रिकेट से लेकर मैदान-ए-ज़ंग तक के सफ़र की तरह, यह तय है, कि.. यह सिरीज़ भी हमारे हाथ ही लगेगी । पर, वहाँ ड्रेसिंग रूम में किसी अलग तरह की नेट प्रक्टिस चल रही है ! पड़ोसी अपने बाशिन्दों को थपकी देकर शांत कर रहा है, टी.वी. पर अपने ज़ाँबाज़ ? हवाई लड़ाकूओं की तस्वीरें दिखा कर ' खून गर्म रखने के बहाने ' समझा रहा है ! पिछले पखवाड़े से मेरा पड़ोसी आज-टीवी (Aaj TV & ARY) समेत अन्य चैनलों पर यही परोस रहा है ! यह सब दिखलाने के लिये मैं शर्मिन्दा हूँ, पर बगल के घर से सालन की आती महक से आँख भले मूँद लें.. नाक तो बन्द नहीं  किया जा सकता है, न ? वह हैं कि, नहीं सुधरेंगे.. हम ?

                  Fighter12Fighter13

चलिये.. छोड़िये, यह उनका अंदरूनी मामला है, पर यह दिखाना कि भारतीय विमान को निशाना बना लेना पाकीयों के लिये बाँयें हाथ का खेल है ! यह तो भाई, मेरे गले का डिप्थीरिया है! नीचे के दाँयें और बाँयें चित्रों को ध्यान से देखें, वाह रे, प्रोप-अ-गैन्डा !

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पृष्ठभूमि में बजती कई पंचलाइनों में सबसे प्रमुख है " झपटना पलटना..पलट कर झपटना, लहू गर्म रखने का.. है इक बहाना "  क्या समझे.. नहीं समझे ? तो, समझ लीजिये कि, वो निहायत अमनपसंद लोग हैं, जिनको ये नाशुक्रे क़ाफ़िर चैन से जीने नहीं देते, सो यह नाटक लहू को गर्म रखने के लिये किये जा रहे हैं ! बकरे दर बकरे कुर्बान किये जाते हैं, पर लज़्ज़त ही नहीं मिलती!मुंबई में 200 हलाल किये गये हैं, अब देखिये इस मौज़ूदा सबूत-सिरीज़ के बाद अगली कुर्बानी का करबला कहाँ का तय होता है ?

अपुन का ध्यान इस समय स्व० रामप्रसाद 'बिस्मिल' पर लगा हुआ है, सो मैं इन दरिन्दों को उनकी ही एक लाइन से चेताना चाहूँगा .. " वक्त आने दे बता देंगे तुझे ऐ आसमां, हम अभी से क्या बतायें क्या हमारे दिल में है । बिस्मिल’

उनके अपने जन क्या कहते हैं. During the last three days or so, the situation between Pakistan and India has nothing but worsened. The critic - cynical nonetheless - in me reminds me that Pakistan, with her Zardaris, Gillanis and other cronies has actually played their part well. Too well for comfort, but a well-played innings so far. Consider this: India gets her major city Mumbai taken hostage by a handful of terrorists. Why were they there? Terror in the name of what? We are not told clearly. Then India, as the three day saga is unfolding, goes ahead and blames the Pakistani government. Note, there is a difference between blaming someone ‘from’ Pakistan and blaming the Pakistani establishment in itself. India, it seemed, blamed both. Eventually, India names Jamat-ud-Dawa as the main culprit organization that trained and brainwashed the Mumbai attackers. The UN - based on proof - declares the JuD a terrorist outfit. The JuD is closed down by Pakistan, not because India said so, but because UN says so. Pakistan plays the UN card well, reminding the world that Pakistan listens to world elders (Kashmir being the first point in this case). Pakistan asks for the same proof that India has given to UN. None is presented. Now, what is all of this? Pakistan has played the calm, mature ‘uncle’ part well. As in most families, this uncle can be seen as the coward, the one without the ‘heart’ to fight for its right, only later to realize that the uncle was being the most far-sighted. Of course, this uncle can be called the ‘mamoo’ if it turns out that the resolve and calmness was based on cowardice instead of cold logic. Nonetheless, India knows well enough that the nuclear bombs are not for display only, and much more potently, Muslims would love nothing more than a state-declared Jihad. The centuries old “We hold death more dear than you hold dear your life” line holds true today as far as any Muslim is concerned. Jihad is struggle, and in the case of war, it becomes an armed struggle. Armed Jihad is valid, as far as pristine Islam is concerned, in self-defense and has to be on a state level. Pakistan has very clearly, very calmly placed herself in a defensive role. And try as some may to portray it differently, Pakistan is still a state. A Muslim state that the world can see has been pushed into a corner by India. If war does break out, regardless of the result, the world will bear witness to the above perspective being the truth
और इनको भरोसाइच नहीं हैं

kaami on December 6th, 2008 @ 4:14 am

Who is paying for this extravaganza! This country is already under the heavy burden of returning thieves, rampaging terrorists, fleeing money, communal, sectarian and ethnic strife. We have sent packing a competent, honest and straight talking president and invited back mediocres to replace him. We are now reliant on IMF, govt has no control over its citizens, they can do what they want, inside or outside the country. Talent is fleeing, just another day I was introduced to a guy who paid one million rupees for a Canadian Work Permit. Again who is paying for this and why? Only a fool would attempt to attack this country, In 2002 India showed an aggressive posture and was reigned in by Mush, they dare not do it again, unlike us they have too much at stake, things like economy, progress and tourism etc. The whole world is at a loss, as to how to deal with Pakistan. Even Pakistani’s dont know where they are going and where they see this Nation in the next five years.

kaami on December 6th, 2008 @ 4:21 am

The only threat that I see is Mr. Osama Bin Laden taking over via his proxies, which are now super charged and very active. If that happens then we will be attacked by the whole world because nobody wants to see nuclear weapons in the hands of a monkey.

kaami on December 6th, 2008 @ 5:25 am

By monkey I mean Osama

ڈفر (duffer) on December 6th, 2008 @ 11:38 pm

ha ha ha ha …   exercises and pak army what they gonna get with these exercises? how to kill own ppl? how to be a response like a dam s**t when somebody roars on you? یہ صرف نعرے لگا سکتے ہیں کسی قوم کی فوج کہلانے کی انکی اوقات نہیں ____________________ http://www.dufferistan.com

पोस्ट कुछ लम्बी हो गयी न ? आज आपको झेलवा दिया ? आख़िर मेरी दुम भी इन पाकियों से कम ज़ब्बर थोड़े ही है ?

पर बेचारे ज़रदारी की तो सोचिये...क्या हालत है ? उनसे आतंकवादी माँग रहे हो.. और वह इतनी हैसियत भी नहीं रखते कि ऊँचे बोल सकें ! कभी ज़नरल कयानी हड़का देते हैं, आई.एस.आई चीफ़ से डाँट खाये बिना गुसल नहीं होती है, नवाज़ शरीफ़ इनको देख सारी शराफ़त भूल जाते हैं..अमेरिका का तो एक चपरासी भी डाँट दे तो निहाल हो जाते हैं, और तो और, अपुन के इन्डिया का एक फ़र्ज़ी आदमी भी फोन पर इनको लतिया देता है !

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05 December 2008

ऎ वतन के सज़ीले नौज़वानों...

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इन सजीले नौज़वान बहादुरों  ( ? ) को देखिये..
देख कर चौंक गये, कि अपनी ज़ाँबाज़ मीडिया ने इनको कवर तक न किया..
क्या हमारा ज़ाँबाज़ मीडिया चुप बैठा है.? नहीं नहीं, वह बेचारे चुप नहीं,
बल्कि दहशत फैलाने और कुर्सी दौड़ समीक्षा में डूबे हैं,इसलिये वह कर भी नहीं सकते !harami-I

क्या भारत सचमुच सँपेरों का देश है ? साँप के गुजर जाने पर लकीर पीटने की शालीन परंपरा से जीवंत एक सभ्यता..
कभी कभार साँप नेवले की गुत्थमगुत्था भी देखने को मिल जाती है, पर लकीर पीटने और साँप किधर से आया था,
और दँश कितना गहरा है.. इससे फ़ुरसत मिले तो अगल बगल भी देखें !
आस्तीन के साँपों का कहना ही क्या , उनकी खामोश सुरसुराहट से बेखबर  हम अनज़ाने इनकी रखवाली कर रहे हैं !sooar-I

कुछेक भ्रुकुटियाँ संकुचित हो रही होंगी.. आज डाक्टर को क्या हो गया है ?
सचमुछ मुझे कुछ हो गया है, उपचार तो दूर डायग्नोसिस कैसे हो पायेगी, यही पता नहीं.. kutta-T

क्योंकि यह तस्वीरें, झेलम तट पर कल से शुरु किये गये पाकिस्तान के सैन्य अभ्यासों के हैं...
इधर हम मैडम राइस को कस्टर्ड परोसने में मगन हैं... क्यूँ भई ?
क्योंकि हम अमेरिका का पेटेन्टेड बर्गर-पिज़्ज़ा तो कम से कम खाते ही हैं,                                                                      उनकी ही कृपा से आज हर भारतवासी के तन पर वस्त्र है..
सो, अपना तन मन धन ओबामा को समर्पित करने वालों मित्रों,
क्या हम इतने नैनसुख हैं, कि उसके चमड़ी के रंग को देख देख कर ही निहाल हुये जा रहे हैं ?
भारत के साथ न्यूक्लियर डील का यह विरोधी, आज आपका हीरो है !
कश्मीर को सदैव अंतर्राष्ट्रीय मसला मानने वाले ओबामा के एक स्माइल पर यहाँ का प्रबुद्ध वर्ग लहालोट हुआ जाता है !
कयास लगाते रहने और अंटी टटोलते रहने वाले गुरुजनों के नैन उस समय मुँद जाते हैं,
जब हम भूलते हैं कि अफ़गानिस्तान में लड़ रहे अमेरिकी सिपाहियों ( ? ) का रसद - पानी डिपो कराची में ही है,
किसी युद्ध की स्थिति में राइस उसकी सलामती के लिये परेशान हैं, शांति सद्भाव यात्रा तो अमेरिकी दिखावा है ।

हममें से कईयों से अच्छे तो आदिपुरुष स्वामी जी हैं, जो बेलाग बयान करने का साहस रखते हैं, कि..

" .... उधर आग में झुलसता ताज होटल दिखाया जा रहा है जिसे पाकिस्तानी आतंकवादियों ने जलाया है - लेकिन पाकिस्तान को दी जाने बाली बिलियन्स और बिलियन्स डालर्स की अमरीकी सहायता में कोई कमी नहीं आती ! क्यों ? तर्क ये दिया जाता है की अगर ये पैसा ना दिया गया तो बेरोज़गारी और बढ सकती है जिससे आतंकवाद के लिये और कच्चा माल मुहैया हो जाएगा ! जबकी स्वयं अमरीकी मीडिया वाले इस पर कई बार बिलख चुके हैं कि जो पैसा आतंकवाद को काबू करने के लिये दिया जाता है वही पैसा आतंकवाद को बढाने में खर्च होता है!  दुनिया भर के बीजों के पेटेंटधारी अमरीका द्वारा अफ़गानिस्तान के काश्तकारों को अमरीका प्रायोजित रेडियो पर संदेश दिये जाते हैं कि अफ़ीम की खेती उनके फ़ायदे का सौदा है...." 

अपना घर बरबाद कर, लोगों की क्षीण स्मृति पर संतोष करने वाले,
27 नवम्बर के आँसू सूखने से पहले ही धड़ाधड़ टिप्पणी की चाह से आप्लावित आलेख..
और स्वतः ही अमन-चैन कायम होने के आशावादियों को खैबर दर्रे पर चल रही सरगर्मी न दिख रही हो,
किन्तु चीन से 1962 में मुग़ालते में मार खाने वाले भारत के दर्द को मैंने देखा है..
हालाँकि उस समय मेरी आयु मात्र दस वर्ष थी, किन्तु मैं ऎसे हादसे और भी बहुत कुछ न भूल पाने के लिये अभिशप्त हूँ !

अच्छा चलो, खाली पीली बोम मारना बाद में जारी रखेंगे.....  पहले चित्र परिचय तो हो जायेharami-T sooar - T                        kutta -I

 image001क्या यह भड़काऊ पोस्ट है ?   नहीं, मेरा मानना है कि यह ' द रीयल इन्डियन स्टोरी ' है !                               पर, यदि आप भड़क उठते हैं, तो यह भारत माता का सौभाग्य होगा..
वरना गरियाने के लिये.. ताऊ के 'अ' हटा कर कउनो-च्यूतिआनंदन हैं, न ?
वरना अपुन के पास ' होईहैं वहि, जो राम रचि राखा ' का संबल है, न ?
वरना ' हानि लाभ जीवन मरण .. ' के उत्तरदायी अपुन के विधाता हैं, न ?
वरना यथा यथा हि धर्मस्य का परित्राण करने वाले गेरुआधारी ठाकरे हैं, ना ?
वरना राम और रोटी को एक सूत्र में बाँधने वाले अडवानी हैं, ना ?
वरना अपनी सोनिया के मनमोहन हैं, न ?

 

इस पोस्ट में यदि कुछ अनेपक्षित हो, तो भड़किये नहीं.. अलबत्ता तड़कने की होती है.. !

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23 November 2008

लो जी, मैं सुधर गया..

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सुपर स्वामी की " मैं कहता हूँ डा. साहब कि सुधर जाओ,"  जैसी चेतावनी, भाई विवेक सिंह  जी द्वारा पोस्ट की लम्बाई चौड़ाई पर सार्थक मीमांसा और चिट्ठाचर्चा पर   थोड़ी मस्ती थोड़ा ढिशूम से प्रेरित हो शाम से आत्म-अवलोकन चल रहा है, कि ब्लागिंग नामक चिड़िया को किस पेड़ की डाल पर आसरा दूँ.. "पेट में बात ज़ुबाँ पर ताला " या फिर.." नहीं कोई माल, पर बज रहे गाल "

आज तो पंडिताइन भी मदद को न आयीं,' खु़द ही गड्ढा खोदा.. ख़ुद ही भुगतो !' यह हैं मेरी सच्ची सहधर्मिणीquestion_hanging_man 

और अंत में मिला एक तुच्छ ज्ञान, कि....  रखो एक लम्हा मौनexclaimation_hanging_man

सो, मन में चल रहा है, कि.. 

अगर आप चाहते एक लम्हा मौन Moon_Movie

अगर आप चाहते एक लम्हा मौन
तो बन्द करिये तेल का व्यापार
छोड़िये यह तेज रफ़्तार इन्टरनेट
और बन्द करिये चन्द्र-अभियान

तोड़िये यह स्टाक मार्केट
बुझाइये तमाम रंगीन बत्तियाँ
डिलीट कर दें सारे इन्स्टेंट मैसेज़
उतारिये पटरियों से लाइट रेल ट्रांज़िट

अगर आपको चाहिये एक लम्हा मौन
तो सुर्ख़ियों से सिंगुर को नीचे उतारिये
वापस कीजिये ज़मीनों पर खोयी फसल
और भूलिये व्हाइटहाउस में प्लेब्याय

अगर आप चाहते एक लम्हा मौन
मौन रहिये हर निःशब्द हाहाकार पर
खास तौर पर फ़िफ़्टीन अगस्त के दिन
यदि अपराधबोध सताने ही लगे

अगर आपको चाहिये एक लम्हा मौन
तो आप उस लम्हें को जी रहे हैं
क्योंकि यही है वह लम्हा
इस कविता के शुरु होने के पहले

© डा. अमर कुमार

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18 October 2008

PD की एक ताज़ा पोस्ट पर …

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आज शनिवार है, मेरे साप्ताहिक अवकाश का दिन ! मेरी छुट्टियाँ मुझे कोई उलाहना नहीं देतीं, क्योंकि मैं चालाक हो गया हूँ । छुट्टियों के दस्तक देने से पहले ही उनकी सारी माँग पूरी कर देता हूँ । ख़ुदा का इनायत किया हुआ, यह दिन मैं पूरी तौर पर अपने नाम बुक किये रहता हूँ । आह्हः जीवन में यदि कोई सुख नसीब होता है, तो बस इसी एक दिन ! आनन्दम आनन्द

नींद से जाग कर, बिस्तर में पड़े पड़े बाहर की दुनिया से छन कर आती हुई आवाज़ों की टोह लेते हुये, ठंडी होती हुई चाय को देखते हुये, पंडिताइन का चिल्लाना इस कान से उस कान को निकालने का सुख ! आह्हः अनिर्वचनीय होता है, यह सब कुछ ! जाड़ों की सुबह रज़ाई में दुबके हों तो क्या कहना, इसमें यदा कदा व्यवधान डालती हुई छोटी ( अपनी काकर स्पेनियल पेट बिच ) को भी समेट कर उसके गुलगुले एहसास को सहलाते हुये, व उसको भी छुट्टियों के पल का दोहन करने की साज़िश में हिस्सा देने का सुख, भला अपने इन्द्र महाराज तो सोच ही नहीं सकते । वह बेचारे तो अपना डोलता हुआ सिंहासन संभालने को युगों युगों से जैसे अभिशप्त हैं । आज भी कुछ ऎसे ही क्षण जी रहा था कि,यह तपस्या भंग करने को मेरी बची खुची मेनका का स्थूल अवशेष  फिर अवतरित हुआ और इसमें व्यवधान तो नहीं कहूँगा, बल्कि भूचाल कहना अधिक उचित लग रहा है… सो भूचाल आता है, कमरे की घड़ियों को सीधा करके, मेरी बेशर्मियों पर लानतें भेजने का सिलसिला शुरु होता है, तब जाकर मेरा भूमि अवरोहण हो पाता है । पीछे से चिल्लाती बीबी,आगे आगे सिर खुजलाते हम,आनन्दम आनन्दम !

तत्काल ही इन्टरनेट से राम जुहार करने की मौज़ और ज़बरन धकेल तक नहाने भेजे जाने तक बेशर्मी का दूसरा चरण आरंभ होता है । आह्हः, ढीठ व बेशर्म बने रह कर निकम्मे व फ़ालतू करार दिये जाने का सुख भला किस पुण्यात्मा को नसीब होता होगा ? इन्टरनेट जिसको आपलोग अंतर्जाल भी कहते हैं, हाँ सबसे पहले इस अंतरनेट पर प्रशांत की पोस्ट के दर्शन हुये, पढ़ा

वहाँ पुछरू को पाकर मेरे भीतर का मरा हुआ टुन्नु भी जैसे किलकने लगा, जिदियाने लगा, हम भी.. हम भी.. डाक्टर अमर हम भी ! मैं टुन्नु बन कर आपको लिखना पढ़ना सिखाता रहा, सो आप तो डाक्टर बन गये हैं, अब हमको भी डालिये न अपने इस अंतर्जाल पर ! मैंने उसको टरकाया,” रुक पहले  इस पोस्ट पर टिप्पणी तो कर लेने दे, तू तो जानता है कि अगर मैं पोस्ट पढूँगा तो टिप्पणी ज़रूर दूँगा, सो ठहर जरा !” पीछे से पंडिताइन झाँकने लगीं, एक स्त्रियोचित स्वभाववश ही..

पर आज प्रयोजन कुछ और ही था, मेरी कल की पोस्ट पर कितनी टिप्पणी आयी, यह जानने को उत्सुक रही होंगी । मुझसे कहीं अधिक उनको कमेन्ट्स की चिन्ता रहती है । मुझको भी बुरा नहीं लगता, यह तो स्वाभाविक है । एक नारी को 14 वर्ष की आयु से ही जो कमेन्ट मिलने का सिलसिला  शुरु होता है, वह अपने रखरखाव के हिसाब से 40-45 की आयु तक जारी रहता है । यह इतना स्वाभाविक है, कि कभी कभी कमेन्ट न मिलने पर या कमेन्ट में गिरावट आने पर अवसाद ग्रसित भी हो जाया करती हैं । मैं बुरा नहीं मानता ‘ अपनी अपनी बीबी पर सबको गुरूर है ‘, कमेन्ट तो भाई चाहिये ही, एक आवश्यक टानिक.. शब्दों में न सही तो नज़रों से ही सही ! वह भी नहीं, तो ’मैं कैसी लग रही हूँ’ का सवाल दाग कर ही कबूलवा लेती हैं । इसका ज़वाब देने में बेईमानी करने का भी मैं बुरा नहीं मानता, और शायद स्वयं औरत भी इसको स्वीकार करती होगी !

ओफ़्फ़ोह, फिर बहक रहा हूँ क्या ? कोई वांदा नहीं, ब्लागिंग ही तो है, अपुन कौन सा यहाँ हिस्ट्री बनाने बइठा है ? फिर भी..

सो, उनकी ताका-झाँकी में,  मैं टिप्पणी पढ़ता हुआ नहीं, बल्कि टिप्पणी करता हुआ रंगे हाथ पकड़ा  गया । एक नाज़ायज़ से असंतोष से बोलीं, “ यह तुम टिप्पणी कर रहे हो कि कोई कविता लिख रहे हो ? अरे जैसे सब दो लाइन में निपटाते हैं, तुम भी निपट लो, तुम्हारे ताम-झाम में अगर यह सब इतना ज़रूरी है तो ? बताना भाई, पोस्टिया आपके औकात से लंबी तो नहीं हो रही है ?  वरना आगे केवल 6 कैरेक्टर से क्रमशः लिख कर सरक लूँ….  आपको भी अभी बहुत सारों को निपटाना होगा !

खैर.. मैनें कहा, भली मानस यह तुमको कविता दिख रही है ? गद्य  का फ़ारमेटिंग ही तो किया है, लगता है कि  लखनऊ विश्वविद्यालय ने कोदों लेकर एम.ए. हिन्दी तो नहीं दे दिया ? विवेकी मापदंड से वह एक भदेश किन्तु आत्मीय सा लगने वाला संबोधन की दुहाई देती हैं, यह कविता के तौर पर घुसेड़ा जा सकता है । अब तुम यहाँ किस किसकी तक़लीफ़ देखते फिरोगे ?

नहीं जानता कि वर्तमान ब्लागर संहिता के आचार्य इसको किस रूप में लेंगे , किसी को दी हुई टिप्पणी अपनी पोस्ट पर प्रकाशित की जा सकती है, या नहीं ?  कृपया आगे आकर निराकरण करें ..

आह पुछरू

Amar1

आहः पुछरू, निमिष मात्र में
तुमने मुझे कहाँ से कहाँ पहुँचा दिया,
सीतामढ़ी के आगे का स्टेशन रीगा,
उसके बगल ही में सुगर फ़ैक्टरी,
आहः पुछरू,जीते रहो

ठीक उसके पीछे एक गाँव उफ़रौलिया,
जिसकी पगडंडियों पर ऊँगली पकड़ कर चलते हुये,
अपने बाबा से मिलती संस्कार शिक्षा...
सबकुछ अब जैसे बिखरा हुआ है, वहाँ
आहः पुछरू,जीते रहो

आधा गाँव तो कलकत्ता कमाने जा पहुँचा 
बाकी को पटना मुज़फ़्फ़रपुर राँची ने निगल लिया 
बचे फ़ुटकर जन जो  छिटपुट शहरों में हैं,
एक नाम उफ़रौलिया को जीते हुये ...
आहः पुछरू,जीते रहो

कसमसाते हुये, लाल टोपी को कोसते हुये
उफ़रौलिया की गलियों में विचर रहें हैं
उम्र की इस ठहरी दहलीज़ पर
उस माटी में लोटते हुये
आहः पुछरू,जीते रहो

पर मैं भी कितना स्वार्थी हूँ कि
यह सब याद करते करते जाने कहाँ खो गया
और तुम्हारे पोस्ट की गदहिया पर
कोई प्रतिक्रिया भी नहीं दी ..
आहः पुछरू,जीते रहो !

Amar2

इससे आगे
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यह अपना हिन्दी ब्लागजगत, जहाँ थोड़ा बहुत आपसी विवाद चलता ही है, बुद्धिजीवियों का वैचारिक मतभेद !

शुक्र है कि, सैद्धान्तिक सहमति अविष्कृत हो जाते हैं, और यह ज़्यादा नहीं टिकता, छोड़िये यह सब, आगे बढ़ते रहिये !

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