जो इन्सानों पर गुज़रती है ज़िन्दगी के इन्तिख़ाबों में / पढ़ पाने की कोशिश जो नहीं लिक्खा चँद किताबों में / दर्ज़ हुआ करें अल्फ़ाज़ इन पन्नों पर खौफ़नाक सही / इन शातिर फ़रेब के रवायतों का  बोलबाला सही / आओ, चले चलो जहाँ तक रोशनी मालूम होती है ! चलो, चले चलो जहाँ तक..

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09 February 2008

ग़ुस्ताख़ी माफ़ ....Ph.D. मेरे नसीब में कहाँ

Technorati icon
अब पूछ ही लिया है तो फिर , चेहरे पर झुकी ज़ुल्फ़ें हटा दूँ तो......ग़ुस्ताख़ी माफ़
बेचारा डा० अमर ब्लागर डा० अमर
दरअसल चिट्ठाकार समूह से एक मेल प्राप्त हुआ, जिसमें कुछ भी ग़ैर वाज़िब नहीं कहा जा सकता, ही ऎसा कुछ ख़ास है कि यहाँ रखा जायमैंने अपनी समझदानी के मुताबिक उसका यथोचित उत्तर भी दे दिया किंतु लग रहा है कि आपके सम्मुख भी अपनी दो बातें इसी बहाने रख ही दूँकल रात ही अपने गाँव नरकटियागंज, बिहार से अपनी चाची का श्राद्धकर्म निपटा कर लौटा हूँदिन भर की मगज़मारी के बाद ज़ीमेल खोला, 6384 अनपढ़े मेल ( ये अपुण का इनबाक्स है, भिडु ! अक्खा यूनिवर्स अपुण का भेज़ाफ़्राई करनाइच माँगता ) साहस ज़वाब दे इससे पहले ही देवनागरी फ़ान्ट वाले सभी मेल खोलकर अपने कच्चे-पक्के ढंग से बाँच मारे, कुछ का उत्तर भी दे दियाएक विचार आया और प्रोटोकाल, शिष्टाचार तज एक पोस्ट की भरपाई मे जुट गया

एक एक्कनम एक
reply-to
dramar21071@yahoo.com
to
Chithakar@googlegroups.com
date
6 Feb 2008 01:02
subject
Re: [Chitthakar] Re: याहू पर माईक्रोसॉफ्ट की बोली
mailed-by
gmail.com

प्रिय बंधु,
ब्लागीर अभिवादन
विदित हो कि मैं डाक्टर अमर कुमार एततद्वारा घोषित करता हूँ कि मैं
पेशे से कायचिकित्सक बोले तो फ़िज़िशीयन हूँ ,अतः मेरी भाषा या लेखन की
त्रुटियों पर कत्तई ध्यान दिया जायईश्वर प्रदत्त आयू में से 55 बसंत को
पतझड़ में बदलने के पश्चात अनायास ही हिंदी माता के सेवा के बहाने से
कुछेक टुटपुँजिया ब्लागिंग कर रहा हूँवैसे युवावस्था की हरियाली में ही
हिंदी, अंग्रेज़ी,बाँगला साहित्य के खर पतवार चरने की लत लग गयी थी ,
और अब तो लतिहरों में पंजीकरण भी हो गया है
गुस्ताख़ी माफ़ हो तो अर्ज़ करूँ... इन उत्सुक्ताओं को देख मुझे दर-उत्सुक्ता
हो रही है कि आपकी उत्सुक्ता के पीछे कौन सी उत्सुक्ता है ? मेरी हाज़त
का खुलासा हो जाय, वरना कायम चूर्ण जैसी किसी उत्पाद के शरणागत
होना पड़ेगाआगे जैसी आपकी मर्ज़ी..
सादर - अमर

On 05/02/2008, Amit Gupta wrote:
On 2/5/08, Dr Amar Kumar wrote:
श्रीमन गणमान्य मूर्धन्यों,
बीच बहस में हम बच्चों का बोलना ठीक नहीं,
किंतु माइक्रोसाफ़्ट के इरादे नेक नहीं लगते
अपनी हर सेवा के बदले एक एक दमड़ी वसूलने
में चमड़ी तक खरोंच लेता हैउसकी कारपोरेट
सोच के हैरतअंगेज़ कारनामे एक अलग विषय है
खैर छोडिये, हमें क्या


डॉ साहब, एक उत्सुक्ता हैआप पेशे से डॉक्टर हैं कि PhD वाले डॉक्टर हैं? यदि पेशे से डॉक्टर हैं तो किस तरह के हैं? मतलब दांतों के हैं या हड्डियों के हैं या जनरल फिजीशियन हैं? :)

--
Courage is not the towering oak that sees storms come and go;
it is the fragile blossom that opens in the snow. -- Alice Mackenzie Swaim
http://me.amitgupta.in/

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उत्सुकता एकदम ज़ेनुईन है, बहुतेरे डाक्टर घूम रहे हैंज़रूरी नहीं कि शोध करके ही Ph.D. शोधा हो, मानद भी तो बाँटी जा रही हैकई रंगबाज तो अपने को ऎसे ही डाक्टर लगाते हैं और लगभग ज़बरन आपसे मनवाते भी हैंकच्छे से लेकर लंगोटावस्था तक आपने उनको गर्ल्स कालेज़ के इर्द गिर्द ही पाया होगा , फिर अचानक ही उनके नेमप्लेट पर एक अदद डाक्टर टँगे दिखने लग पड़ते हैंक्या करियेगा ? ये अपुण का इंडिया है, भिडु ! आपका मेरे ' कुछ ' होने पर संदेह नाज़ायज़ नहीं हैहोना भी नहीं चाहिये, माहौल ही ऎसा है !
एक दूनी दो
यह है, श्रीज्ञानदत्त जी से हुआ पत्राचार एक अदद मेरी टिप्पणी
और ज्ञ के लिये बरहा में j~j का प्रयोग करें.
On 9/26/07, Gyan Pandey <> wrote:
डा. अमर कुमार जी,
मुझे लगा था कि हमने शायद कुछ अण्ट शण्ट लिख दिया था कि आप फिर दिखे नही!
मैं पुन: कहूंगा कि इतना बढ़िया लिखते हैं तो अपने ब्लॉग को जीवंत करें.
और थोड़ी बहुत गुट बाजी - यहां तो मार-काट चल रही है नॉन इश्यूज पर!
पर अपने अन्दाज में चलने के लिये ब्लॉग का प्रयोग करना चाहिये - और कोई कम्पल्शन नहीं होना चाहिये - यह मेरा मानना है. बाकी गुटबाजी ठेंगे पर.
आपका मेल मिलना बहुत अच्छा लगा. बंगला भाषा के बारे में आपको लिखा था क्योंकि आपने अपनी पत्नी के बंगाली होने का जिक्र किया था. बंगला की समझ की हसरत बहुत है!
अच्छा, नमस्कार. श्रीमती अमर कुमार जी को भी नमस्कार.
On 9/26/07, Dr Amar Kumar <> wrote:
आदरणीय दत्त जी ,
सादर अभिवादन.
अभी आपका मेल देखा , अच्छा लगा कि आप बहुत बारीकी से देखते हैं. सहज ही चीजों को खारिज़ नही कर देते. दरअसल अतिशयोक्ति होगी कि एक सुखद संयोग से भटक कर मेरा पन्ना पर पहुंचा
और बहुत सारे लिंक में मानसिक हलचल को टटोलने की कोशिश की तो पता चला यह तो अभिव्यक्ति की अनोखी दुनिया है. इससे पहले ब्लाग के विषय में मेरी कुछ अलग ही धारणा थी. उस पर फिर कभी !
इन्टरनेट पर लगभग - घंटे रोज़ बीतते हैं अपने व्यवसायिक ग्यान को सामयिक बनाये रखने को .थोड़ी इच्छा हुई कि जो कुछ हम देख कर तटस्थ रह जाते हैं यहां शेयर किया जाय. समस्या देवनागरी लिपि की आपके पेज़ पर ही दिये कड़ी से हल हो गयी,बराहा आई०एम०ई की मदद से.
एकलव्य की भांति लग गया ,गुरु जी. अभी भी ' ग्य' और अन्य वर्तनियों में त्रुटि होती है.
रही आपके बांग्ला सीखने की बात, तो आपका स्वागत है किंतु यहां स्पष्ट करना चाहुंगा कि मैं उत्तर बिहार के कायस्थ परिवार से हूं, १९६४ में पिता जी के तबादले के साथ अन्य असबाबों की भांति मैं भी रायबरेली पहुंचा और यहीं टिक गया.
मूल भाषा में साहित्य पढ़्ने की ललक ने मुझे बांग्ला, उर्दू, पंजाबी इत्यादि मेरे इन्टरमीडियट तक पहुंचते पहुंचते १९६९ तक सिखला दिया. मैं खुराफ़ाती सही लेकिन इसकेलिये शरत, इब्ने सफ़ी और अन्य लेखक ही जिम्मेदार हैं, क्यों वह अच्छा लिखते थे इसमें मेरा दोष नहीं है.
घरवालों के लिये तो भटका हुआ लड़का था, पिताजी ने इंजीनियर के रूप में अवतरित होने की इच्छाज़ाहिर की तो मैं मेडिकल में चला गया, बाबा से कायस्थकुल की गाथायें सुनते सुनते इतना प्रभावित हुआ कि अपना सरनेम ही उड़ा दिया. मार भी खायी किंतु आज भी संतोष है कि मैं लकीर पर नहीं चला. यह कबीरपंथी सोच कहां से पैठ गयी, स्वयं ही नही जानता. बंगभाषी प्रवासी कन्या से विवाह करना भी जैसे एक क्रांति की तरह मेरे समाज में ली गयी. लिया करें, हू केयर्स ? जैसे मेरा मोटो है .
तो पंडित जी आपका मेल मेरे लिये एक लाइटहाउस है और मैं प्रयास करूंगा कि अपनी उलट्बांसियो के साथ दिखता रहूं, बेशक कान मरोड़ने का पहला अधिकार आपने ही झटक लिया है. यह शिरोधार्य रहेगा, आचार्य !
थोड़ी बहुत गुट्बाजी ,मुझको किंचित यहां भी परिलक्षित हो रही है यानि ब्लागशेयरिंग में . खेद है कि यह दीमक मुद्रित हिंदी साहित्य को तो खा ही रही है, अब यहां भी पैर पसार रही है. आशा है मेरी यह आशंका निर्मूल हो .
इति शुभ
आपका अमर

On 17/09/2007, Gyan Pandey wrote:
धन्यवाद डा. अमर कुमार जी, आपकी टिप्पणी पढ़ कर आपके प्रोफाइल और ब्लॉग पर गया. पर देखा कि आप रेगुलर लिख नहीं रहे हैं. इतना बढ़िया लिखते हैं तो कम से कम हफ्ते में एक पोस्ट का नियम तो बना ही लें!
चलिये आप रायबरेली में हैं - इलाहाबाद के पास है; सो हम पड़ोसी हुये. और बंगला भाषा का विराट साहित्य देख कर बंगला सीखने का मन दशकों से है. शायद आपके स्नेह से वह सम्भव हो सके!
पुन: धन्यवाद.
---------- Forwarded message ----------
From: ??? ?? ??.....?? ?? !
Date: Sep 17, 2007 5:10 AM
Subject: [ज्ञानदत्त पाण्डेय की मानसिक हलचल]
New comment on वाह, अजय शंकर पाण्डे!.
To: gyandutt@gmail.com
कुछ तो है.....जो कि ! has left a new comment on your post " वाह, अजय शंकर पाण्डे! ":

माफ़ करियेगा बीच मे कूद रहा हू.
का करियेगा बीच मे कूदना तो हम लोगन का नेशनल शगल है.
अजय जी की दूरदर्शिता समझिये या बेबसी कि उनको यह तथ्य अकाट्य लगा कि सब रोक पायेगे तो इसको घुमा के
मान्यता दे दिये. वाहवाही बटोरने की क्या बात है ? लालू जी भी तो इस अन्डरहैन्ड खेल का मर्म समझ के घुमा के पब्लिक के जेब से पइसा निकाल रहे है अउर मैनेजमेन्ट गुरु का तमगा जीत रहे है. पब्लिक के जे्ब से धन तो निकल ही रहा है, बस खजाना गैरसरकारी से सरकारी हो गया. हम लोग भी दे-दिवा के काम निकलवाने के थ्रिल के आदी पहले ही से थे अब रसीद मिल जाता है,इतना ही अन्तर है .
गलत करिये ,दे कर छूट जाइये,यही चातुर्य या कहिये कि दुनियादारी कहलाता है.
गाजियाबाद का खेला तो हमारी मानसिकता को परोक्ष मान्यता देता है, और सुविधा कितना है, अब दस सीट पर अलग अलग चढावा का टेन्शन नही, फ़ारम भरिये १५ % के हिसाब से भर कर काउन्टर पर जमा कर दीजिये . रसीद ले लीजिये . खतम बात !
दत्त जी क्षमा करेगे, ब्लागगीरी की दुनिया मे आपकी हलचल खीच ही लाती है ,
एक आपबीती बयान करना चाहुगा, जब पहले पहले शयनयान चला था, बडी अफ़रातफ़री थी नियम कायदा स्पष्ट नही था ( वैसे अभी भी कहा है,अपनी अपनी व्याख्याये है ) तो शिमला से एक अधिवेशन से एम०बी०बी०एस० लौट रहा था , अम्बाला से इस शयनयान मे शयन करता हुआ सफ़र कर रहा था बीबी बच्चे आरक्षण दर्प से यात्रा सुख ले रहे थे, कभी नीचे कभी ऊपर .लखनऊ तक का टिकट था जाना रायबरेली ! बुकिग की गलती, ठीक है भाई , लखनऊ मे टिकट बढवा लेगे परेशान मत करो का रोब मारते हुये लखनऊ तक गये, लखनऊ मे बाहर तक लपक कर एक करिया कोट वाले से टिकट अगले स्टापेज़ तक एक्सटेंड करने की पेशकश की । महकमा का काला कोट लोग चा-पानी मे इतना बिजी था कि एक लताड सुनना पडा अपनी सीट पर जाइये क्यो पीछे पीछे नाच रहे है. चलो भाई ठीके तो कह रहे है ड्युटी डिब्बवा के भीतर है , घर तक दौडाइयेगा ? बगल से कोनो बोला .
चले आये ,मन नही माना बाहर जा कर चार ठो जनरल टिकट ले आये, प्रूफ़ है लखनऊवे से बैठे है, मेहरारु को अपनी समझदारी का कायल कर दिया.
रायबरेली बीस किलोमीटर रह गया तो काले कोट महोदय अवतरित हुये. टिखट.. कहते हुये हाथ बढाये , टिकट देखते ही भडक गये, स्लीपर है अउर रिजर्भ क्लास है,जनरल पर चल रहे है ?             
सर..ये  देखिये अम्बाला से बैठे है, लखनऊ से टिकट नही बढा तो ये ले लिया. नाही बढा मतलब, इसमे बढाने का प्रोभिजन नही है जानते नही है का ?
जानते तो शायद वह भी नही थे, असमन्जस उनके चेहरे से बोल रहा था. अपने को सम्भाल कर बोले लिखे पढे होकर गलत काम करते है, टिकटवा जेब के हवाले करते हुए आगे बढ गये. मेरी बीबी का बन्गाली खून एकदम सर्द हो गया ,मेरी बाह थाम कर फुसफुसाइ- कैसे उतरेगे ? देखा जायेगा -मै आश्वस्त दिखना चाहते हुये बोला.
करिया कोट महोदय टट्टी के पास कुछ लोगो से पता नही क्या फरिया रहे थे . अचानक हमारी तरफ़ टिकट लहरा कर आवाज़ दिये- मिस्टर इधर आइये...मेरे निश्चिन्त दिखने से असहज हो रहे थे. पास गया ,सिर झुकाये झुकाये बोले लाइये पचास रूपये ! काहे के ? बबूला हो गये- एक तो गलत काम करते है, फिर काहे के ? बुलाऊ आर पी एफ़ ?
बीबी अब तक शायद कल्पना मे मुझे ज़ेल मे देख रही थी, यथार्थ होता जान लपक कर आयी. हमको ये-वो करने लगी. मै शान्ति से बोला सर चलिये गलत ही सही लेकिन इसका अर्थद्न्ड भी तो होगा, वही बता दीजिये. एक दम फुस्स हो गये आजिजी से हमको और अगल बगल की पब्लिक को देखा, जैसे मेरे सनकी होने की गवाहो को तौल रहे हो. धमकाया- राय बरेली आने वाला है पैसा भरेगे ? स्वर मे कुछ कुछ होश मे आने के आग्रह का ममत्व भी था. नही साहब हम तो पैसा ही देगे, रसीद काटिये रेलवे को पैसा जायेगा.
सिर खुजलाते हुये और शायद मेरे अविवेक पर खीजते हुये टिकट वापस जेबायमान करते हुये बोले- ठीक है स्टेशन पर टिकट ले लीजियेगा. उम्मीद रही होगी वहा़ कोइ घाघ सीनियर हमको डील कर लेगा.. आगे क्या हुआ वह यहा पर अप्रासन्गिक है.
तो मै देने के लिये अड गया और गाजियाबाद के अजय जी सरकार के लिये लेने पर अड गये ..तो इस पर चर्चा क्यो ?
यह सनक ही सही लेकिन आज इसकी जरूरत है...चलता है...चलने दीजिये की सुरती बहुत ठोकी जा चुकी, कडवाने लगे तो थूकना ही तो चाहिये सर !
प्रसन्गवश रेलवे का जिक्र गया वरना हर विभाग के, हर क्षेत्र के अनगिनत उदाहरण है..फिर कभी

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Posted by कुछ तो है.....जो कि ! to ज्ञानदत्त पाण्डेय की मानसिक हलचल at September 17, 2007 5:10 AM

--
With Best Regards,
Gyan Dutt Pandey
Allahabad (U.P.)
India - 211004

ज़ाहिर है कि उपरोक्त रिप्रोडक्शन से व्यक्तिगत प्राइवेसी का हनन हो रहा है , तो विवाद भी उठेंगेउचित अनुचित पर सिर धुने जायेंगेपर सनद तो सनद ही रहेगा ... यह इंटरनेट भी झक्कास चीज है भिडु , जो लिख दिया सो लिख दिया, दीमक के चाटने का लोचा नहीं इध्धर को !

दो में लगा भागा

तो देव और देवियों, ( सज्जन का स्त्रीलिंग ? मेरे को नईं मालूम ! ) अमिं जी०एस०वी०एम० मेडिकल कालेज, कानपुर से स्नातक इत्यादि इत्यादि हूँ, और सम्प्रति राहू सरीखा हिंदी ब्लागिंग का अमृत चखने आपकी पंगत में चुपके से ठँसा पड़ा हूँ इससे ज्यादा ओर कुछ भी तो नहीं

चोर निकल के भागा

अब यहाँ से फूट रहा हूँ, आप राहू शान्ति को पुरोहित ढूँढेंनमस्कार !

और सुराग क्या मिला भला ?

1 . मैं दवाई-दारू वाला असली डाक्टर ही हूँ।                                                                      2 . रही बात माइक्रोसाफ़्ट की, तो उसका खेला अज़ीब है दद्दू , बिलियन और मिलियन  के सौदे रुपये अट्ठन्नी की तरह करने वालों के बीच हम त्रिशंकुओं का क्या काम ?                            काम  तो विन्डोज़ पर कर रहे हैं ,और सेवा गूगल की ले रहे हैं , यानि गुरु-गोविंद की जोड़ी !     तो फिर काके लागूँ पाँय, बंधुवर आपै दियो बताय ।                                                                3 . वइसे बिलगेटवा जब अपने मैसेन्ज़र का याहू मैसेन्ज़र से मिलाय दिहिस, तबै हम अटकल लगावा कि यू सार ईस्ट इंडिया कम्पनी बन के घुसि आवा, याहू मा । अउर अब देखि लेयो ।       4. 2005 में बिल गेट्स बंगलौर मे भाषण ठोक गये,' India is graveyard of our innovations ' हमारा मीडिया मुँह बाये जंभुआने लगा, पीछे काकटेल पार्टी में शोर मच रहा था, और गेट साहब का प्रवचन खिंचता ही जा रहा था । वैसे हमारे मीडियाकर्मियों ने बोतलहरामी न करके अपनी ईमानदारी का परिचय दिया , और हम भी शर्मा कर ज़ेनुईन विंडोज़ खरीद ही लाये ।                     यह बात अलग है कि कई बार  तो एक्टिवेशन के लिये गिड़गिड़ाने तक की नौबत आ गयी, खैर यह कोई ख़ास मुद्दा नहीं, इस ज़माने में शरीफों को ही अपने शरीफ होने का हवाला देना पड़ता है !

अपने डाक्टर होने का हवाला देने में, हमने कुछेक व्यक्तिगत मेल बिना इज़ाज़त सार्वजनिक कर दिये, तो क्षमा किया जाय । मैं तो आलरेडी न घर का - न घाट का हूँ । मेरे मरीज़ ही सहज कहाँ विश्वास करते हैं कि मैं नुस्ख़े के अलावा कुछ और भी लिखने की अक्लियत रखता हूँ !            


इससे आगे

25 January 2008

ऎ मेरे दिल कहीं और चल...

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अमर का संग्रह -अएक अनाम किसिम की निस्पृहता सी मन में घर करती जा रही है, इन दिनों...   सोचा चलो कागज़-कलम से छुट्टी मिली , दिन भर की नुस्खाघसीटी के बाद कीबोर्ड ( कुंजीपटल  ) पर थोड़ी हाथों की वर्ज़िश हो जायेगी, साथ ही दिमाग को कुछ ताज़गी !

आप जिस मंच को भी अपनाते हैं, भला उसके मिज़ाज़ से अपने को अछूते कैसे रख पायेंगे ? ' एक रेख काज़ल को लागिहे, तो लागिहे ', फ़िर मैं तो सयाना भी नहीं ,निपट अनाड़ी हूँ । अभी लिंक लगाना तक तो आया नहीं, फिर कहीं टिपिकल भारतीय अंदाज़ का परिचय देते हुए टिप्प से टपक पडू़ँ और बतंगड़ न्यौत लूँ , तो मेरे अभिमानी मन का रहा सहा चैन भी जाता रहेगा ।

हिंदी ब्लागरी उभर ही रही है, इसकी मूँछ की रेख भी आने में देर है ( जबकि तमिल ,मलयालम एवं अन्य दक्षिण भारतीय भाषाओं में वह परिपक्व भले न हो किंतु प्रौढ़ अवश्य हो रहा है )। इसके लालन पालन में मेरी हिस्सेदारी कितनी और कैसी हो, यही तय नहीं कर पा रहा हूँ और देख रहा हूँ कि सभी अपनी अपनी तरह से इस अनउगी मूँछ को तराशने की प्रतिस्पर्धा में लगे हैं । अपनी अपनी परिभाषायें, अपना अपना राग ! मूँछों पर घी भी चुपड़ा जाने लगा है । स्वस्थ क्या है, मित्रों ?

हिंदी को आगे बढ़ाने की कवायद में ब्लागधर्म को नित्यकर्म में शामिल कर , उसी भाँति निपटाना याकि कुछ स्तरीय लेखन , विविधायें , सामयिक सोच, मुद्रित साहित्य की समीक्षात्मक विवेचना या इन सबसे इतर और कुछ ? समानान्तर रूप से ब्लाग विधा के तकनीकी पक्ष को प्रासंगिक बनाये रखना भी वरिष्ठ ब्लागीरों का दायित्व बनता है । इन सबके बिना हम आधे अधूरे प्रगति के दंभ से भी वंचित रह जायेंगे।

अधिकांश हिंदी पेज़ ऎसे लगते हैं कि किसी आत्ममुग्ध व्यक्तित्व ने उन्हें महज़ अपने को  विज्ञापित करने के लिये रचे हैं । कुछेक उपभोक्तावाद के निहित स्वार्थ के शिकार हो स्पैमिंग के कलंक से विभूषित हो रहे हैं । ऎसे में .... ग़म की दुनिया से दिल भर गया ' गुनगाने से बेहतर होगा कि फिलहाल हल्के फ़ुल्के  टाइमपास का सहारा ले उपसंहार का निर्वाह किया जाय । अमर का संग्रह-ब (2)अमर का संग्रह-स अमर का संग्रह -ई                  अमर का संग्रह-ब    अमर का संग्रह- फ़  अमर का संग्रह-द                              

आप क्या कहते हैं ? 
इससे आगे

17 January 2008

लगी लखटकिया पर मेरी टकटकी

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बस यहाँ फोटू देखो, और देखना कम, समझना ज़्यादा
बहुत लुभा रही हैं, आने वाले कल की तस्वीरें, कंजर कब तक बने रहोगे ?

ऊँची सोच रखोगे, तभी तो महान देश के नागरिक बनने की औकात बनेगी । फ़्राँस की क्राँति का प्रसिद्ध ज़ुमला कोई अकेले उन्हीं का पेटेन्ट थोड़े ही न है ? अरे वाह, रोटी के लिये शोर मचाने से क्राँति कहीं आयी है,भला ? केक देखो , केक सोचो और ख़्याली सही लेकिन केक ही खाओ । रोटी की चिन्ता छोड़ रे मूरख, क्राँति की भ्राँति मे मत पड़ा रह । तेरा कितना अपग्रेडेशन हो रहा है, मनन कर ओ प्राणी । तू दो कौड़ी का आदमी, अपनी दो ट्कियाँ दी नौकरी में कब तक जीता रहेगा ?

यह लखट्किया देख और अपना सुनहरा भविष्य देख । बल्कि देख कम, समझ ज़्यादा !

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आलू प्याज़ भूल रे प्राणी, लखट्किया की सोच । बड़ी सोच का बड़ा ज़ादू की झलक भर दिखला कर श्वार्ट्ज़ ( David J. Schwartz ) साहब बिलियनपति हो गये, तू तो अभी लाखों में ही झूल रहा है !

चिट्ठाजगत संकलक का आधिकारिक चिट्ठा: चजइ - चिट्ठाजगत सर्वोत्तम पोस्ट इनाम हेतु घुसेड़ित, हें हें..हें

जाते थे जापान, पहुँच गये चीन समझ लेना ____________________________________

मूल रूप से लखटकिया .... शीर्षक अपने दूसरे वेबलाग कुछ तो है...जो कि के लिये चुना था किंतु संग्रहित चित्र एवं भाषा में अनायास उतर आया व्यंगात्मक तंज़ जैसे वहाँ फिट नहीं बैठ रहा था, अस्तु यहाँ ठेल कर संतोष करना पड़ा । वस्तुतः देश के उद्धमी अपनी प्राथमिकता तय करने में लकदक से सम्मोहित हो भटक से रहें हैं , तो मेरा भटक जाना भी क्षम्य माना जाये । इस प्रकार के उपक्रम यदि मुझे मानसिक दिवालियापन लगते हैं, तो मुझे असमान्य मानसिकता वाले ठेलू मे शुमार किये जाना सहज स्वीकार्य है । पीठ पीछे खड़ी मेरी बीबी भी मुझे ठेल रही है कि क्लिनिक से काल आ रही है, और तुम यहाँ बैठे हो । अतः जल्दी से स्पष्ट कर दूँ कि आप निर्धारित करें कि सस्ती कार , सस्ता पेट्रोल, सस्ता सरसों का तेल, सस्ता गेहूँ, और सस्ता सस्ता सब कुछ जो एक आम इंसान की ज़रूरत में शुमार है, ऎसी प्राथमिकतायें स्वागत योग्य हैं या इस प्रकार के प्रहसन ? लो फिर अचानक एक गाना याद आ ही गया, ' अंधेरे में जो बैठे हैं, नज़र उन पे भी कुछ डालो..., अरे ओ रोशनी वालों '

रही बात चजइ की तो, वह तो किस रौ में डाल दिया, बता नहीं सकता क्योंकि हिंदी वेबलागिंग में मैं तो अभी लौंडा हूँ । इस दावेदारी को गंभीरता से कतई न लिया जाये । बदहालीबयानी भला कोई पुरस्कार योग्य विषय हो सकता है, यह चिट्ठाजगत तय करे, मेरा सिरदर्द तो आपके सामने है !

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09 January 2008

लोलल्लाँगूलपातेन मारुतः ममराऽतीन निपातय

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' कुछ तो है..जो कि ' के पालनहार में बजरंगबली का संदर्भ अनायास ही नहीं है, असमंजस की असुविधा में, मैं उनको स्मरण कर , अपने सोचे हुये पर कूद पड़ता हूँ । वह भला करता ही रहा है, आगे भी करता रहेगा । क्यों, यह बाद में !

इनसे मेरा परिचय भी अज़ीबोगरीब तरीके से कुछ बाद में हुआ । हमारे घर के पूजास्थल पर माँ दुर्गा की छवि मुझे निरंतर बाँधे रहती थी । तबके निपट छुटपन से ही उनकी मेगाइमेज़ बहुत प्रभावित करती रही है, ' छॆल पर बइठी अउरत, आराम से पैर पर पैर रखे, चार-चार हाथ, छेल का मूँ तो खुला है, इनको खाता नईं है, खा जायेगा, फिर हमको भी खायेगा, कियॊँ नही खायगा जैसे अने्कानेक सवालों का ज़वाब बस यही होता था, जय कर लो - हाथ जोड़ के जय कर लो, और जय्य '।
लेकिन
बड़ों की नज़रों में शैतानी की परिभाषा तो नित बदला ही करती थी । उनमें यदि कुछ उनके हिसाब से शैतानी में शुमार हो जाता , और वह हमसे अगर हो गयी हो, तो एक पक्का अल्टीमेटम तैयार रहता था , " आने दो छोटका को, पड़ेगा एक महावीरी थप्पड़ तो सब भूल जाओगे । " यद्यपि अब तक थप्पड़ से मेरा परिचय हो चुका था किंतु यह महावीरी थप्पड़ क्या होता है ? दिमाग लगाने लायक दिमाग ही नहीं था, सो रोहू-झींगा जैसा ही कोई अंतर होता होगा ।
और एक दिन छोटका ( बोलेतो- छोटे चाचा ) के हत्थे मैं चढ़ ही गया, महावीरी थप्पड़ से मुलाहिज़ा हुआ, आँखों के आगे अंधेरा छा गया, दिन में अमावस की रात में छिटके तारे टिमटिमाने लगे । मैं मदद के लिये ,बुक्का फाड़कर अपना वार्निंग एलार्म बज़ाता ,इससे पहले ही नीचे से पेशाब की धार बह निकली और मैं बेहोश हो गया । तब तक आठ दस बार थप्पड़ खाने का अनुभव हो चुका था, लेकिन भइय्या, ये कइसा थप्पड़ ? रे बपई, रे बपई !
कई दिनों बाद दादी ने खुलासा किया कि इस कोटि के जानदार प्रहार को ही महावीरी थप्पड़ कहते हैं,
बाप रे ! उन दिनों उत्तर बिहार के प्रायः हर गाँव में एक महाबीरस्थान होता था, दूर से ही अपनी ' धज्ज़ा ' से लोकेट किया जाता था । धज्ज़ा याने ध्वजा, हरे बाँस की फुनगी पर झीना सा तिकोना लाल कपड़ा । एक दिन महाबीरस्थान जाना हुआ, बाबा के साथ । तो देखा महाबीर जी को , लिपे पुते एक टाँग पर खड़े, मुँह में आटे की लोई सरीखा कुछ ठुँसा हुआ, और शायद उसी वज़ह से उनकी आँखें बाहर को उबली पड़ रही थीं, एवं वह दीवार से चिपक से गये थे । इतना सब होने के बावज़ूद भी उनके एक हाथ में भारी भरकम मुगदर और दूसरा हाथ तश्तरी में खाँचेदार पहाड़-घर वगैरह से लैस । तो यह हैं महाबीर जी ? मन में एक संतोष सा हुआ, उनकी दुर्दशा देख कर । ताक झाँक कर देखा, थप्पड़ के लिये कोई स्पेयर हाथ होगा, वह तो था ही नहीं ! फिर एक हमदर्दी सी जग आयी और मैं उनका कुछ-कुछ मुरीद हो गया ।
फिर उनसे परिचय और प्रगाढ़ होता गया । हर अष्ट्याम में वह अनिवार्य रूप से मौज़ूद रहते और हमलोग उनके चक्कर लगाते लगाते ' हरे राम, हरे कृष्ण, हरे राम..हरे हरे ' गाया करते । उत्तरी बिहार में अखंड रामायण या जागरण की तर्ज़ पर अठजाम ( बोले तो-अष्टयाम ) का प्रचलन है,एक हरा बाँस घर के सामने या आयोजन स्थल पर गाड़ दिया जाता हैं, मँड़ई छा दी जाती है, बाँस के सहारे, उसके चारों ओर देवी देवताओं की तस्वीरें प्रतिमा लोग अपने अपने घरों से लाकर सजा देते हैं , फिर ढोल मज़ीरे झाँझ बजाते हुए ग्रामवासी 24 घंटे तक अनवरत परिक्रमा करते हुये , हरे राम , हरे हरे का उद्घोष् लयपूर्वक लगाया करते हैं । लाज़िमी है, ऎसे आयोजन में हनुमान का होना ।
सन 1965 के बाद के काल में देश के स्वाभिमानी प्रधानमंत्री ने अभूतपूर्व अन्नसंकट से आवाहन किया कि संपूर्ण देश एक दिन उपवास रखे, अतः हर सोमवार को हमारे यहाँ भी उपवास रखा जाने लगा । मैं कुछ ज्यादा ही सयाना था, सोमवार के बदले मंगलवार को व्रत करके देश के प्रति अपना कर्तव्य निभाने लगा, वह सिलसिला आज तक चल रहा है । पावरफ़ुल हैं, इन्हीं को अगोर लेयो, भाई !
बेचारे श्री रामचंद्र भी उन्हीं के सहारे पार लगे थे । जैसे पुकार उठे, ' सुनु कपि तोहि समान उपकारी, नहिं कोउ सुर नर मुनि तनुधारी । ' और देखिये उनकी बुद्धि भी चकरा गयी , ' प्रति उपकार करौं का तोरा, सन्मुख होइ न सकत मन मोरा ' । बेचारे अब तक उनका ऋण ढो रहे हैं, ' सुनु सुत तोहिं उरिन मैं नाहीं '।
जब से देख रहा हूँ कि इस युग में केवल बाबू, बकैत और अर्दली की ही चलती है, तब से मेरी निष्ठा और भी बढ़ती ही जा रही है ।
' होत न आज्ञा बिनु पैसारे ', अब बताईये ' साहब सों सब होत है, बंदे से किछु नाहिं ' । और साहब तक बात पहुँचानी हो तो इस सप्तचिरंजीवी बंदे से तो मिलना ही पड़ेगा । चिरंजीवी हैं, तो यहीं कहीं होंगे, साहब तो रघुबरपुर में बैठे हैं । आपकी अरज़ी तो फारवर्ड इनसे ही होगी, तभी तो ' और देवता चित न धरई, हनुमत सेइ सर्व सुख करई '

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उपर दर्शायी गयी विग्रह की छवि यहाँ श्री भवानी पेपर मिल्स में स्थापित श्री अभयदाता जी का है, कसौटी पत्थर की बनी यह मूर्ति शायद उत्तर भारत में अनोखी है, और बहुत ही जागृत । यहाँ पूजा की परपंरा विशुद्ध रूप से दक्षिण भारतीय कर्नाटक शैली की है, उपमा, छोले का भी भोग यहाँ लगाया जाता है।



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06 January 2008

जाने कहाँ हैं , अपने लालू ?

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क्या आपको अपने लौहपथ मंत्रीजी की याद तो नहीं आरही है ?
बड़े
हौसले से एक टी०वी० शो वालों ने न्यौत तो लिया, किंतु होशियार लालू अपनी स्टार वैल्यू का मर्म टटोलने में कामयाब रहे ।
साफ़-फट्टाका बोल दिये,"हम्को अगर जोकरई के लीए बोलाएं हँय तो अब हम जोकरई नहिं करूँगा, हमको सन्करजी दरसन देकर बोलेंहँय मुर्गी अँडा सब छोड़ो, मान्स-मच्छी मीडीया से परहेज़ करो । चक्करबर्ती समराट का माफिक भागऽ हय तोम्हारा ।"
तो
अपने साणे लालू बिलागींन्ग मे ऊन्मूख हुए और सीधै माईक्रोसाफ़्ट से बोले हमरे लिये यकठो कम्पूटर हीन्दिये मे बनाईये सो आजकल ऊहे ऊहाँ बनवा रहे हँय । बानगी देखियेगाऽ..ऽऽ, तो इहाँ देखीये लिजिए



ईसको
मजाक बूझते हँय, फारेन तक में हम कुल्हड़ बेकवा दिया हूँ तो आपलोग का भी टुट्पुंजिया इस्टेटस अपग्रेड करूँगा, बेचारा हीन्दिवाला सब कउन कउन टाईपींग टूल से काम चला रहा हय ।जब से हमरे संग्यान में आया हय।
हमारा ग्रासरूट लेबिल का मन बहुतै दूखी हय ।




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02 January 2008

तो आज यही सही - दो

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amar ki murgee Murgi aur Anda-amar

हमारे कैफ़ भाई व्यापार करने उतरे ,

सबको पछाड़ बाज़ार पर कब्ज़ा करने की ग़रज़ से अंडों के बिजिनेस में एक अनोखा प्रयोग किया । वह दो रुपये के भाव से अंडे ख़रीदते और पौने दो रुपये के भाव बेचते । व्यापार चल निकला, सभी उनके मुरीद ! देखते ही देखते वह एक साल में ही वह लखपति हो गये !

भला कैसे ? और उन्होंने बिजिनेस लाईन से तोबा भी कर ली , यह क्यों ?

प्रयास करें, ज़वाब एकदम साफ़ है ।

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यह अपना हिन्दी ब्लागजगत, जहाँ थोड़ा बहुत आपसी विवाद चलता ही है, बुद्धिजीवियों का वैचारिक मतभेद !

शुक्र है कि, सैद्धान्तिक सहमति अविष्कृत हो जाते हैं, और यह ज़्यादा नहीं टिकता, छोड़िये यह सब, आगे बढ़ते रहिये !

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