जो इन्सानों पर गुज़रती है ज़िन्दगी के इन्तिख़ाबों में / पढ़ पाने की कोशिश जो नहीं लिक्खा चँद किताबों में / दर्ज़ हुआ करें अल्फ़ाज़ इन पन्नों पर खौफ़नाक सही / इन शातिर फ़रेब के रवायतों का  बोलबाला सही / आओ, चले चलो जहाँ तक रोशनी मालूम होती है ! चलो, चले चलो जहाँ तक..

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22 July 2009

पता नहीं क्यों ?

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लगता है, आजकल मैं निष्क्रीय हूँ... पूरी तौर पर तो नहीं, कम ब कम ब्लागर पर निष्क्रीय तो हूँ ही.. पता नहीं क्यों ? इस पता नहीं क्यों का ज़वाब तलब करियेगा, तो टके भाव वह भी यही होगा कि, " पता नहीं क्यों ? " यह पता नहीं क्यों हमेशा एक नामालूम सी कशिश भी लिये रहता है, लगता है कि कहीं कोई जड़ता मुझे जकड़ रही है, जकड़ती जा रही है.. पर आप हैं कि, अपने पर हज़ार लानतें भेजते हुये भी, खामोशी से इस निष्क्रियता को समर्पित रहते हैं, पता नहीं क्यों ? मुआ पता नहीं क्यों न हुआ कि इब्तिदा ए इश्क हो गया । है न अनुराग ?

Letter-
अबे पहले तय कर ले, ब्लाग लिखने आया है कि साहित्य रचने ? " यह कोई और नहीं, अपने निट्ठल्ले सनम जी हैं, अँतर से ललकार रहे हैं । कनपुरिया प्रवास के बाद साढ़े तीन दशक से साथ लगे हैं । जब तब मुझे ललकार कर चुप बैठ जाते हैं, गोया पँगे करवाना और उसमें मौज़ लेना ही इनका शगल हो । इनको डपट देता हूँ, ऒऎ खोत्या वेखदा नीं कि असीं लिख रैयाँ, बस्स ।

माफ़ करना मित्रों, यह इसी टाइप की भाषा समझते हैं, आप तो जानते ही हैं कि, फ़ैशन की तरह ही ब्लागिंग और ब्लागर की तरह फ़ैशन कितनी तेजी से बढ़ रहे हैं ? नित नये प्रयोग !

सो ब्लागिंग के इस दौर में साहित्य की गारँटी ना बाबा ना ! मौज़ूदा दौर तो जैसे गुज़रे ज़माने का बेल बाटम है.. कल यह रहे ना रहे.. पर हम तो रहेंगे, और.. जब रहेंगे तो कुछ ओढ़ेंगे बिछायेंगे भी ! आने वाला कल साहित्य का कोई धोबी जिसकी भी तकिया चादर गिन ले, उसकी मर्ज़ी ! जैसे यहाँ लाबीइँग में वक्त जाया कर रहे हैं, समय आने पर वहाँ सार्थक कर लेंगे ।

अभी से लाइन में लगने की भगदड़ काहे ? चोट-फाट लग जाये तो इससे भी जाते रहोगे । लाइन में लगने की क्या जल्दी थी.. जवाब मिलेगा, " पता नहीं क्यों ? इधर कोई ग्राहक नहीं आ रहा था, तो सोचा खाली बैठने से अच्छा कि अपना ही बँटखरा तौलवा लें, कहीं बाँट में ही तो बट्टा नहीं ?.. ससुर उहाँ भी लाइन लगी थी, घुसे नहीं पाये इत्ती भीड़ रही, पता नहीं क्यों ? “

निट्ठल्ला उवाच : कोई यह न कह दे, " पता नहीं क्यों, ई उलूकावतार इत्ती रतिया में का अलाय बलाय बकवाद टिपटिपाय गये ? याकि ससुर छायावाद की मवाद ठेल गये .. सीधे सुर्रा मूड़े के उप्पर से निकर गवा ! "

तो भईया ई डिस्क्लेमर-वाद है, अर्थ और ही और ! चित्त गिरो या पट्ट.. बाई आर्डर दुईनों एलाउड !

निट्ठल्ला उवाच : इसका भेद हम बताता हूँ, यह कँट्रोल पैनल के पुराने पोस्ट खँगाल रहा था.. इतने दिमागदार नहीं हैं, सो एक घँटे बाद से ही इनका सिर भारी होने लगा और एक घँटा पच्चीस मिनट बाद समझदानी के आउटर पर इँज़नवाँ फ़ेल ! " फिर भेजा इनको कि जायके आज की चिट्ठाचर्चा पढ़ा, सो गये बिचरऊ । बढ़िया है.. विवेक बाबू, बढ़िया है.. बोलि के लौट आये । टिप्पणी न दी, ज़रूरी भी न रहा होगा । कल बछड़ों के दाँत गिनना है, यही सब बतियाते भये खाना खाइन । "

आम खाओगे ? " पँडिताइन जी पूछिन.. " नहीं ! " मुला मुँह से बोले नहीं, मूड़ हिलाय दिहिन, बड़बड़ लगाय रहे आम खाऊँगा तो गुठलियाँ भी देखनी पड़ेंगी । पेड़ कौन गिनेगा, पर गुठली ?

मेरा प्रतिवाद : " चुप्पबे, खुद मेरा ही मन न था... आम जो है.. वह एक मीठा फल होता है ! "

अब ? कुछ ही पन्ने बच रहे थे.. सो, नँदीग्राम डायरी लेकर बैठा और दो सफ़े बाद ही कुछ लाइनें ऎसी मिली कि, अपने आपसे घृणा के प्रयोग करने लग पड़ा । आपको भी बताऊँ ?

लेकिन पहले श्री पुष्पराज जी से क्षमा माँग लूँ । क्योंकि मैं उनकी लिखी कुछ ही लाइनें शब्दालोप के साथ उद्धरित कर रहा हूँ .. " हमें नई बात समझ में आयी कि, जो (............) कहलाने के प्रचार से घृणा नहीं करते थे, वे ही (........ ) होने के प्रचार से आपसे घृणा कर रहे हैं । घृणा की यह चेतना जब ख़त्म हो जायेगी कौन किसके क्या होने से दुःखी होगा ? हम उनके कृत्तज्ञ हैं, जो हमारी चूकों पर नज़र रखते हैं और तत्काल घृणा करना भी जानते हैं । आपकी घृणा ने ही हमें शनैः शनैः इंसानियत की तमीज़ सिखायी है ! "

निट्ठल्ला : आप ई सब काहे लिख रहे हैं, जी ?

भईय्या, भाई जी, मेरे दद्दू.. अपनी सुविधानुसार, आप ही रिक्त स्थानों में ब्लागर और साहित्यकार भर कर देखो न । जो निष्कर्ष निकासो, तनि हमहूँ का बताओ । इतने दिमागदार नहीं हैं, सो इत्ती टिपटिपाई में ही मूड़ भारी हुई रहा है । तो अपुन चलें ? घृणा के साथ मेरे प्रयोग अभी कुछ बाकी रह गये है, फ़िलवक्त तो आप हमें निष्क्रीय ही समझो ।
" पावस देखि ’रहीम’ मन कोयल साधे मौन ।
जित दादुर वक्ता भये इनको पूछत कौन ॥ "

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29 April 2009

कभी कभी मेरे दिल में..

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….  यह ख़्याल आता है कि, ब्लागिंग में मुआ ब्लागर आख़िर करता क्या है ...  क्या केवल यही तो नहीं,   कि   " रमैया तोर दुल्हिन लूटै बजार " ?
शायद ऎसा नहीं ही होगा.. काहे कि सदियन पाछै कबीरौ पलटि के ठोकिं गये रहें,

" हम तुम तुम हम और न कोई । तुमहि पुरुष हम ही तोर जोई ॥ "
ब्लागर के जोई का कोई सगा सम्बन्धी क्यों न हो ? सो, ब्लागस्पाट की मेहरारू और पाठकों की भौजाई बने बिना ब्लागिंग  करना दिनों दिन जैसे दुष्कर होता जा रहा है..  sambhal ke- nitthalle( छिमा करो, माता ! )

जौन मज़बूरी में भौजाई बने हो.. तौनै मा ननद जी की गारी भी सुनो । वर्ड-वेरीफ़िकेशन  का नेग माफ़ करवा लेने से ही  काम   न चलेगा ..  बस जरा, आती हुई टिप्पणियों पर निगाह रखो ।

क्या पता, कोई गरियाने की आड़ में कहीं सच ही न उगल रहा हो ?  गरियाओ.. नेता को... अभिनेता को .. सराहो सतयुग को.. त्रेता को.. अर्थात,  कुल ज़मा अर्क-ए-ब्लागिंग यह है,

कि " हे तात तुस्सीं सत्यम ब्रूयात प्रियं ब्रूयान्न .. चँगी चँगी मिठियाँ गल्लाँ कीत्ता कर ! " मेरी भाषा ही गड़बड़ है क्या, दिल ने धिक्कारा, " ई का लिख रहा है, बे ? "  दिमाग ने ऊपरी मँज़िल से अलग दहाड़ लगायी, " जितना कहना था कह दिया, अब इससे आगे एक भी लैन नहिं लिखने का ! " ठीक है, श्री व्यवहारिकता जी.. इतने ही पर छोड़ देते हैं.. सत्यम ब्रूयात प्रियं ब्रूयान्न ! अर्थात हे पशु, पुच्छविहीना .. तुम सच ही बोलो , और प्रिय ही बोलो !  अब इससे आगे एक लफ़्ज़ भी निकालने की कौनो ज़रूरत नाहीं है !

तो,    फिर यहीं छोड़ते हैं.. आगे की लाइनें आज रहने देता हूँ, कि
सत्यम ब्रूयात प्रियं ब्रूयान्न ब्रूयात्सत्यमप्रियम
सत्य बोलो प्रिय बोलो । अप्रिय सत्य ( काने को काना ) मत बोलो ।
प्रियं च नानृतं ब्रूयादेव धर्म सनातनः ॥
पर, ऎसा ठकुरसुहाती प्रिय भी न बोलो, जिससे धर्म की हानि हो !kabhi kabhi

अधूरी जानकारी और अधूरे उद्धरण बड़ा सुख देते हैं !   नो हाय हाय.. एन्ड आफ कोर्स नो चिक चिक !
तब्भीऽऽ…  ऊपर वाला डाँट रहा था, कि दूसरी लैन मत पकड़ना,    अवश्य ही यह कोई स्पैम है !

लो,  स्थूलकाया मधु्रवाणी आपकी भौज़ी यानि पंडिताइन प्रकट हो कर, बरजती हैं,  “ तुम भीऽऽ.. ना,     क्या सुबह सुबह इस मुई को लेकर बैठ गये ? “ मैं विहँस पड़ा, ’ कुछ नहीं.. भाई,  जरा मैं भी दो लाइना मार दूँ,    यहाँ तो नित नये अनुभव हो रहे हैं ! "       फिर तो उधर से सीधा एक लिट्टाई हमला,  “ तो .. तुम अनुभव की कँघी पर लपकते रहो.. जब तक यह हाथ आयेगी, तुम खुद ही गँज़े हो चुके होगे ? " मुझे तो आज तक सैन्डिल भी नसीब न हुई, और यह मुझे ज़ूते का भय दिखा रहीं हैं ! भला  आपही     बताइये..         शब्दबाणों से कभी कोई गँज़ा हुआ है,   क्या ?     मैं तो आलरेडी पहले से ही सेमीगँज़ा हूँ !   शायद इसीलिये, कभी कभी मेरे दिल में...

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09 December 2008

चैट्क्क.. डोन्ट वरी फ़ॅऽर इट, अंकल !

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यह विषय पड़ा तो बहुत दिनों से था... पर वही सनातन रोना, कुछ असलियत का और कुछ फ़ैशन में, बोले तो.. समय का टोटा, वह तो आपके पास भी होगा ! ब्लागिंग और लिखने का विषय ?  अरे, राम भजो... . जिस दिशा में  भी नज़र डालो, विषय  ललकार  रहे हैं ! ब्लागर वही, जो बात  पकड़ बतंगड़ बनाये ! टैग जो मन आये, वही घुसेड़ दो... संस्मरण, संवेदना, हलचल, विविध, व्यंग्य या कुछ भी ? अपुन के समीर भाई जी ने कहीं लिखेला है, " ब्लागिंग की  लत लग भर जाये, फिर तो सोते में, जागते हुये , रास्ते में, श्मशान में, लड़की में, कड़की में.. जित देखो ब्लाग सब्जेक्ट , जैसे मीरा के कान्हा ! उन्होंने तो अपना पक्का इंतज़ाम कर ही लिया है..लोकल ट्रेन के डिब्बों में भी अपना माल ताड़ लेते हैं, और मसाला लाइब्रेरी में मिल जाता है, सेफ़ हैं.. लकी हैं ! पर,  मुझे तो पहले का सोचा हुआ हर एक नुक्ता..  जैसे अब कुरेद रहा हो !

हुआ यह कि चिट्ठाचर्चा  के जिसका जितना आँचल था, उतनी ही सौग़ात मिली  पर मेरी एक टिप्पणी दर्ज़ होगी,
".....  लट्ठ ताऊ का पेटेन्ट है, राज भाटिया छुट्टियों पर निकले हैं, और यहाँ..
बिटिया को उड़ान भरने की लेट हो रही है,
जब तक हमारे सारथी जी, फ़्लाइट का कोई अतिशुद्ध हिन्दी विकल्प नहीं निकालते ,
तब तक आप अपनी बेटियों को उड़ने से कैसे रोक सकते हैं ?
सो, अभी चलता हूँ ! ....."
इसमें यह जिक्र करना आवश्यक न समझा कि मेरी बेटी की एक सहेली भी आयी थी, शिवानी लोढा ! कभी महाराष्ट्र से बाहर न निकली थी, सो वह आई थी यू.पी. का ज़लाल देखने ! जो भी देखा हो, पर  उसका रोज सुबह घूम घूम कर पेड़ पर लटके शरीफ़े, पकते अमरूद और बचे खुचे करौंदों को देख देख रोमांचित होना, मुझे आह्लादित करता था.. " आईला, दीज़ ग्वाआज़.. ओह ईषी, इट इज़ अ लाइफ़टाइम एक्सपेरियेन्स ! सच्ची अंकल, मैंने इत्ती बड़ी ज़िन्दगी में फ़र्स्ट टाइम देखा है.." इत्ती बड़ी पर उसका खास जोर रहता ! तो अपने स्टेट गेस्ट.. शास्त्री जी नाराज़ न हों, भूलसुधार किये लेता हूँ... तो, अपने राजकीय मेहमान को सकुशल विदा करना भी एक उत्तरदायित्व था ! मेरी बेटी ईषिता तो बाय बाय कर गयीं, फ़्लाइट समय पर थी । शिवानी चूँकि बाद में, लालू तत्काल पर आयी थी, सो उसे ट्रेन से ही जाना था, और.. उसे सी आफ़ करने तक लादे-लादे लखनऊ में विचरते रहना और  नान-स्टाप बकर बकर सुनते रहना था ! शाम को पुष्पक है, स्टेशन सात बजे पहुँचना है... तब तक ?

तब तक..' ये खाओगी, अच्छा यह ट्राई करके देखो, जरा शुक्ला के दहीबड़े भी चख कर देखो । ' यही सब चलता रहा । बेचारी पंडिताइन कुढ़ कुढ़ कर मरी जा रहीं थीं.. छिपा कर आँख तरेरा, "मैं कभी इन चीजों के लिये कहती हूँ, तो तुम उन्नीस का पहाड़ा बताने लगते हो, और इसपर बिछे जा रहे हो ? " हाय रब्बा, तूने अपनी रचना में इतना सारा कुड़कुड़त्व क्यों भर रखा है ? बच्ची है, कुछ घंटो के लिये अपनी मेहमान है, शर्म करो ! " अच्छा तो मुझे शेखर के यहाँ छोड़ दो, ट्रेन के बाद आ जाना.."  उनकी ओर से शह दी गयी और मैंने मात स्वीकार कर ली !

लगता है, विषयांतर हो रहा है.. कीबोर्ड हाथ आ जाये तो कंट्रोल ही नहीं होता ! स्वामी-संयम अभी मुझसे दूर है ! कुलज़मा किस्सा यह कि शाम को स्टेशन पहुँचा, जब तक कार पार्किंग में अपना जगह बना पाती, तब तक मिस लोढा दो बैग लेकर नीचे कूद चुकीं थीं, एक बड़ा सूटकेस डिक्की में था ! " इट्स मिनिमम,  अंकल ! आफ़्टर आल यू विल हैव टू कैरी अटलीस्ट फ़ोर सेट्स फ़र सेवेन डेज़, ना ? " यह बेवज़ह सफ़ाई मैं तब तक एक दर्ज़न बार सुन चुका था। खैर.कार से उतरा तो देखा शिवानी बगल में ही खड़ी है, डिकी के पास, सूटकेस निकालने को तत्पर.शिवानी लोढा-ईषिता अमर-बिनावजह निट्ठल्ला उसके बैग कहीं आसपास नहीं दिख रहे थे । " बैग्ज़ ? " मेरी प्रश्नवाचक मुद्रा भाँप, वह तपाक से बोली, "ओह, यू मीन बैग्ज़ ? दे आर एट प्लेटफ़ार्म एन्ट्री गेट !" मैं मन ही मन दहल गया, ' अरे लड़की, यह यूपी है.. बैग तो अब ना मिलता ।' इन लड़कियों की छठी इन्द्रिय बड़ी तेज होती है, भई ! बिना कुछ पूछे ही खट से ज़वाब भी आ गया.. तेज तेज कदमों से सूटकेस घसीटती हुई, उसने दोनों कंधे उछाले, "  चैट्क्क.. डोन्ट वरी फ़ॅऽर इट, अंकल !" तालू से जीभ चटकाते हुये वह बोली, " डोन्ट वरी, नो वन विल टच इट.. दे मस्ट बी सेफ़ देयर । " वह किंचित ढीठायी से हँसती है.. " यू नो, पीपुल आर सो स्केयर्ड, दे वोन्ट इवेन टच द बैग्ज़ !" उसके इस तरह के मुँहजोरपन पर मैं मन मसोस रहा था, पर उसने अपना बकबक जारी रखा, " यू नो, अंकल.. इन दिस एट्मास्फेयर.. नो सेंसिबल परसन डेयर टच एनीवंस लगेज़.. एट नरीमन वी लीव आअर पर्स एंड लव टू वाच द फ़नी  पैनिकी फ़ेसेज़ !

इस लड़की पर क्रोध तो बहुत आ रहा था, लगातार अंग्रेज़ी गिटरपिटर, ऊपर से ऎसी गैरज़िम्मेदार ग़ुस्ताख़ी.. पर ? पर.. वही स्टेट गेस्ट का मसला और यूपी की इमेज़ ! जाओ रे लड़की, बहुत होगया..पंडिताइन भी प्रतीक्षा में होंगी! पोस्ट लम्बी होते जाने के आसार बन रहे हैं, वह अलग से ?  क्या करें, यह लड़की अब ज़ल्दी  जाती  भी तो नहीं !

पुष्पक एक्सप्रेस यार्ड से आकर प्लेटफ़ार्म पर लग चुकी थी, कोच B-2, बीटू.. बीटूबीटू... बीटू हाँ यह रहा बीटू ! बर्थ इसी में है, चाल्ह छे्त्ती टुर लै गड्डी विच्च ! वह ज़ल्दी से अपना बड़ा सा बटुआ खोला, दाँतों से ओंठ भींच कर अपना हाथ उसके अंदर डाल जादूगर कुंडू के गिल्लि-गिली बुब्ब्लाबू स्टाइल में हिलाती है..   खरगोश तो नहीं, हाँ एक अज़ीब सा डिब्बा निकाल कर उसमे जड़े आईने में चेहरा दायें बाँयें घुमा कर ज़ायज़ा लेती है, और तपाक से एक गोल डिब्बी निकाल काम्पेक्ट अपने चेहरे पर फेरने लगती है.. अचानक वह काम्पेक्ट की डिब्बी कब लिपस्टिक में तब्दील हो जाती है, पता ही नहीं चलता और वह तमाम तरह के मुँह बना हौले हौले लिपस्टिक अपने गंतव्य पर इधर उधर दौड़ा रही है । ई लेडीस लोग का यह तामझाम मुझे हमेशा से ही बड़ा रहस्यमय लगता रहा है.. सो आज भी खड़ा खड़ा उसे हैरत से  देखता रहा.. खाना खाकर सोने के लिये इसकी क्या ज़रूरत ?  उसके किसी अदृश्य एंटेना ने सहसा मेरी यह वेव-लेंग्थ पकड़ ली हो जैसे, ऎसे उसने चौंक कर देखा । " ओह सारी, जस्ट अ लाइट टच-अप !" अपनी खिसियाहट छिपाने का प्रयास करते हुये, वह बोली ! फिर बेसाख़्ता हँसने लग पड़ी, " जस्ट अ मेक-ओवर टू टैली माई फ़ेस विद माई आई.डी.कार्ड फोटो.. इन केस द ट्रेन ब्लास्ट्स एंड यू आर काल्ड टू आईडेन्टीफ़ाई मी !" मैंने अपने दाँत पीसे, लगता है आज पिट कर ही जायेगी यह परकाला ?

ख़ैर, एक एक करके दोनों गयीं ! लौटते समय बड़ा सूना लग रहा था. और मैं डा. बशीर की कहीं पढ़ी हुई नज़्म याद करने का प्रयत्न कर रहा था.. ' गुल नहीं, गुलज़ार हैं.. बेटियाँ ख़ुदा का उपहार हैं.. बेटियाँ तो ख़ुशबू का झोंका हैं.. ये खेलती-कूदती, मचलती-महकती ख़ुशबू की बयार हैं.. ' जैसा ही कुछ ! " कहाँ ध्यान है, तुम्हारा.. नींद आरही है, क्या ? " लो, पंडितइनिया ने चौंका दिया । इनका यही है, एक झपकी मार लेंगी.. फिर पुकार पड़ेंगी,जागते रहो..

_________________________________9 दिसम्बर, मंगलवार ____________________________

यह विभाजन रेखा क्यों ? क्योंकि यह घटना 17 नवम्बर की है.. पोस्ट लिखी गई 25 नवम्बर, मंगलवार को.. सोचा कि, फ़ाइनली कोई इमेज़-ऊमेज़ लगाकर शनिवार को पोस्ट करेंगे ! इसीलिये कहा है, " काल करे सो आज कर " क्योंकि 26/27 नवम्बर की रात में जो हुआ, उसके आगे यह पोस्ट अप्रासंगिक हो गया था ! आपही बताइये. कहाँ वह मौत का तांडव, और कहाँ असुरक्षित माहौल को  भी एन्ज़्वाय करती इस मुंबईया लड़की का ये अफ़साना !

विचारों की कड़की का बयार लगता है, पछुआ हो गई है..  कल छुट्टी है, आज कुछ पोस्ट करना है.. कल तो पंचम जी को हलाल कर दिया आज कुछ लिखने को ज़ंग लग गया है । सो इसी को झाड़-पोंछ कर पब्लिश किये देता हूँओह, मुंबई-अमरकेवल कुछ सेकेन्ड और लूँगा : यह ऊपर वाला इमेज़ लेकर एडिट करते समय यह फ़र्क़ कर पाना कठिन हो रहा था, कि यह चारबाग, लखनऊ का प्लेटफ़ार्म है या सी.एस.टी. का ? यह तो आपके शहर का भी हो सकता था ?  पर, ईश्वर न करे (क्योंकि, सरकार तो बेबस है) कि ऎसा हो.. मैं मन को भरोसा देने को ' राम की शक्ति-पूजा ' की लाइनें दिमाग में बरबस लाने का प्रयास करता रहा.. ठीक से याद न आयीं ! मुझे ही क्या, पूरे देश को ही भूल गया होगा...

ईश जानें, देश का लज्जा विषय
तत्व है कोई कि केवल आवरण
उस हलाहल-सी कुटिल द्रोहाग्नि का;
जो कि जलती आ रही चिरकाल से
स्वार्थ-लोलुप सभ्यता के अग्रणी
नायकों के पेट में जठराग्नि-सी !

नहीं.. नहीं, यह तो शायद दिनकर के कुरुक्षेत्र में है.. अब इतनी रात में किताब कहाँ मिले ?                       आप ही देख लीजियेगा ! निराला की लाइनें तो शायद यह हैं :

है अमानिशा, उगलता गगन घन-अंधकार;
खो रहा है दिशा का ज्ञान, स्तब्ध है पवन चार;

या यह ............................................................................ ? 

शत-शुद्धि-बोध-सूक्ष्मतिसूक्ष्म मन का विवेक,
जिनमें है क्षात्र-धर्म का घृत पूर्णाभिषेक,
जो हुये प्रजापतियों से संयम से रक्षित,
वे शर हो गये आज रण में श्रीहत, खण्डित !

मात्र 15 दिनों में एक पोस्ट का पूरा संदर्भ ही बदल गया.. , सिंहासन का सेमीफ़ाइनल चल रहा है, लोग झूम रहे हैं, बम फ़ुटा रहे हैं.. नाच रहे हैं, और हम कह रहे हैं कि विषय का टोटा है..यह भी भला कोई बात हुई,वाह !

► इससे आगे ►

24 November 2008

घी के लड्डू, टेढ़े ही सही ...

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आज की चिट्ठाचर्चा में मसिजीवी ने एक माकूल सवाल उठाया, जाने कहाँ गये वो ब्लाग..जो, " तुम तो छा गये गुरु !" जैसी टिप्पणियों से लदे रहते थे ! कुछेक तो मेरे पसंदीदा हुआ करते थे, जिन्हें मैं पढ़ तो लेता था, किन्तु  किसी हिन्दी टूल की जानकारी न होने से अचंभित बस पढ़ता ही था, टिप्पणी कैसे की जाती है..न जानता था । रिसियाये गुरु ने बहुत बाद में मेरा अधकचरा प्रयास देख बरहा का लिंक दिया, वही अब तक काम आ रही है । उन दिनों जितेन्द्र चौधरी की एक पोस्ट मुझे बहुत पसंद आयी थी, जो मैंने कहीं नोट कर लिया ! विन्डोज़ 98 गये,  XP आये, कई संस्करण के बाद अब विस्टा पर काम कर रहा हूँ, पर उन पढ़े हुये पोस्ट की यादें नहीं भूलीं । यह साबित करता है,कि हमारा आपका लिखा इन्टरनेट पर सदैव जीवित रहेगा ! मसिजीवी ने वह ब्लागर.. वह ब्लाग्स.. वह पोस्ट का ख़ज़ाना याद दिलाया, धन्यवाद मित्र ! किसी माकूल टिप्पणी के लिये कच्चे माल की तलाश में भटका.. सो भटक कर ही रह गया । लीजिये पढ़िये जितेन्द्र चौधरी की एक पोस्ट, जिसका लिंक मैंने नोट कर रखा था । पुनःप्रकाशित करने की अनुमति की तक़ल्लुफ़ पूरी न कर पाने की मुआफ़ी बाद में

   Sunset    यह छवि  श्री संजय व्यास जी के ब्लाग ' हृदयगाथा ' से उठायी गयी है 

यह रहा मूल आलेख, किन्तु शीर्षक मेरा दिया हुआ है, क्योंकि मेरे ख़्याल से NRI होना भी घी के टेढ़े लड्डू हैं, संभलते नहीं

राजेश प्रियदर्शी का यह लेख मुझे बहुत पसन्द आयाः यह लेख वैसे तो यूरोप मे रह रहे अप्रवासी भारतीयो के लिये लिखा गया है, लेकिन सभी पर लागू होता है.

सपने
अच्छी नौकरी, पाउंड को रूपए में बदलें तो डेढ़ लाख रूपए के क़रीब तनख़्वाह. लंदन शहर की ख़ूबसूरती,यूरोप घूमनेके मज़े.                                                                                                                              धूल नहीं, मच्छर नहीं, सभ्य-सुसंस्कृत लोग. चौकस पुलिस, आसान ट्रैफ़िक, हफ़्ते में दो दिन पक्की छुट्टी, आठ घंटे काम, बेहतर माहौल.
चार साल रहने के बाद ब्रिटेन में रहने का पक्का इंतज़ाम, अपनी गाड़ी, अपना घर और एनआरआई स्टेटस.
देश में इज़्ज़त बढ़ेगी,भाई-बंधुओं को भी धीरे-धीरे लाया जा सकता है,अगर कभी लौटे बेहतर नौकरी मिलना तय पानी, बिजली, फ़ोन का बिल भरने के लिए लाइन में लगने की ज़रूरत नहीं, भ्रष्टाचार और संकीर्ण दिमाग़ वाले लोगों से मुक्ति.

संताप
आज तक किसी अँगरेज़ ने दोस्त नहीं माना, किसी ने घर नहीं बुलाया, हैलो, हाउ आर यू, सी यू के आगे बात न कोई करता है, न सुनता है. मुसीबत पड़ने पर पड़ोसी भी काम नहीं आता.
हर साल भारत जाना मुश्किल है,प्लेन का किराया कितना ज़्यादा है, माँ बीमार है.फ़ोन का बिल भी बहुत आता है लोग चमड़ी का रंग देखकर बर्ताव करते हैं, शरणार्थी समझते हैं, बीमार पड़ने पर डॉक्टर बीस दिन बाद का अप्वाइंटमेंट देता है और मरने पर फ्यूनरल दो हफ्ते बाद होता है.
रोज़ बर्तन धोना पड़ता है, हर संडे को वैक्युम क्लीनर चलाना पड़ता है, नौकर और ड्राइवर तो भूल ही जाओ.
मँहगाई कितनी है, कुछ बचता ही नहीं है, कोई चीज़ ख़राब हो जाए तो मरम्मत भी नहीं होती, सीधे फेंकना पड़ता है, प्लंबर पत्रकार से ज़्यादा कमाता है. आधी कमाई टैक्स में जाती है.
बच्चों के बिगड़ने का भारी ख़तरा, ड्रग्स, पोर्नोगार्फ़ी. बच्चे अपनी भाषा नहीं बोलते, ख़ुद को अँगरेज़ समझते हैं. चार अक्षर वाली गाली देते हैं जो 'एफ़' से शुरू होकर 'के' पर ख़त्म होती है.
ऐसा क्या है जो भारत में नहीं मिलता, गोलगप्पे और रसगुल्ले खाए बरसों बीत गए. धनिया पत्ता और हरी मिर्ची के लिए भटकना पड़ता है.
त्यौहार आते हैं और चले जाते हैं, पता तक नहीं चलता, पूजा कराने के लिए पंडित नहीं मिलता. गोबर, केले और आम के पत्ते के बिना भी कहीं पूजा होती, फ्लैट में हवन करो तो फायर अलार्म बज जाए.

सवाल

क्या कभी भारत लौट पाएँगे, क्या बच्चे वहाँ एडजस्ट करेंगे,हमें कहीं बहुत सुख सुविधा की आदत तो नहीं पड़ गई?मैं तो चला जाऊँगा, घर के बाक़ी लोगों को कैसे मनाऊँगा, बसा-बसाया घर उजाड़ना कहीं ग़लत फैसला तो नहीं? जीवन सुरक्षित नहीं, भ्रष्टाचार बहुत है, दंगे भड़कते रहते हैं, आदत छूट गई है, कैसे झेलेंगे यह सब ?             लोग पहले बहुत मदद करते थे, दिल्ली, मुंबई का जीवन अब कुछ कम व्यस्त तो नहीं, लोग पहले जैसे कहाँ रहे? दिक्क़तें यहाँ भी हैं, वहाँ भी, चलो जहाँ हैं वहीं ठीक हैं, फिर कभी सोचेंगे

Posted by Jitendra Chaudhary at Thursday, September 23, 2004 

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05 November 2008

बिग बी अपने कबीले के हैं…. क्या सच्ची में ?

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डिसक्लेमर: बड़े मूड से एक पोस्ट लिखने का मन बनाकर आया था, चंद घंटे पहले ही आज की चिट्ठाचर्चा पर एक लम्बा कमेन्ट ठोक कर आया था । सहसा मन उचट गया,सो मन हुआ कि थोड़ी मस्ती की जाय, पर बिना पुख़्ता किये कुछ भी पोस्ट करने में झिझक होती है, पता नहीं कौन लण्ठ भड़क जाय, या पोस्ट का ही संदर्भ सहित व्याख्या करनी पड़ जाये.. सो अपनी आज की टिप्पणी ही उठा कर यहाँ नकल-चिप्पी तकनीक से जड़ डाला । जो पढ़े उसका भला, और जो न पढ़े उसका कभी न सोचो भला !

श्री अनूप शुक्ल ' फ़ुरसतिया ' अनूप भाई की आज की चिट्ठाचर्चा सदा की तरह अपने आप में मस्त चर्चा रही !

फ़ुरसतिया चर्चा ही इतनी टिप्पणोपरि हुआ करती हैं,haippI birthday to kush
मुद्दई लाख टिप्पणी करे तो क्या होता है
वह तो वही पढ़ायेंगे, जो मंज़ूर ए फ़ुरसतिया होता है,
यह्न न सुधरेंगे, अस्तु.. 

भाई कुश, पीछे छोड़ आये सकुशल दिनों के लिये बधाइयाँ लें
आगे के जीवन के लिये मेरी शुभकामनायें लें लें
मेरी हार्दिक हैवी ड्यूटी गुड्डविशेज़ हैं कि
यह आपके कुँवारेपन का अंतिम जन्मदिन हो,
मित्रों आप सब जनसमर्थन दें, कि.. 
अगले वर्ष उनकी मोमबत्ती जलाने वाली उनके संग हो..

chittha-charcha-logo पर चिट्ठा के नामकरण पर इतना क्यों हंगामा बरपा है,
डाक्टर कविता जी के कल की चर्चा पर इस निट्ठल्ले की मूरख-टिप्पणी पढ़ लें
यकीन करें, वह मेरी खांटी-डाइसी नहीं बल्कि सूडो-डाइसी आब्ज़र्वेशन्स हैं

सतीशजी पंचम स्वर में बिलबिला रहे हैं, क्यों भाई ?
थोड़ा पिटना भी ज़रूरी है, ज़िन्दगी के लुत्फ़ के लिये..
ताऊ पर तो भरोसा करियो मति, यह तो ऎन मौके पर झपकी ले लेवें हैं
सतीश-पंचम जी ने आपने एक बार मुझे टीप मारी कि क्या वाहियात टेम्पलेट है,
ठीक मौके पर हैंग हो जाती है, मैने सुधार लिया ..
PD बोले तिरछे मत रहो.. सीधे हो जा रे, सीधे हो जा रे
तो सीधा हो लिया, विवेक बोले..यह कोई भाषा है,
सो भाषा को कुछ शुद्ध करने की सोच रहा हूँ
अब अच्छी हिन्दी दिखेगी आपको मेरे ब्लाग पर..
बस कविता जी द्वारा उसके रूपांतरण करने की सहमति की प्रतीक्षा है
तो पंचम जी, यहाँ लण्ठ और लठैत ब्लागर भी हैं,
जयकारा लगा लगा कर हमलोगों ने ही उनको बिगाड़ा है...                                                             परसाई सा ज़िगर रखना बड़ा दुरूह है, मित्र !

बिग-बी को अपने कबीले का मानने में मुझे किंचित एतराज़ हैलेना भी आवश्यक नहीं मानता हूँ । यह मानने के उनके अपने कारण होंगे, किन्तु मैं भी अकारण परहेज़ नहीं किया करता । वह अपने स्टार इमेज़ की आभा को ब्लाग से अलग नहीं कर सकते, इसीलिये..
वह अब तक हिन्दी में बोले, हिन्दी ही गाये, और हिन्दी में नाचे व नचाया
सो, हिन्दी में लिख कर वह कोई उपकार नहीं कर रहे
अभी भी वह अंग्रेज़ी की बैसाखी हटाने का साहस नहीं संज़ो पाये हैं
उनकी भाषा-प्रतिभा का मैं भक्त हूँ,
हममें से अधिकांश को शर्मिन्दा करने की हद तक परिमार्जित भाषा है, उनकी

किन्तु वह केवल केवल हिन्दी में ही लिखने की ठान कर,
महज़ दो दर्जन गैरहिन्दी वालों को हिन्दी पढ़ना सीखने पर मज़बूर कर सकें
तो उनका हिन्दी गाया-बजाया सार्थक हो जाये
ब्लागिंग में उनका कलेज़ा इतना मज़बूत है,
दुखते पेट पर लैपटाप रख कर ब्लाग लिखने का एक नया रिकार्ड बनाया है, उन्होंने
अस्पताल से पोस्ट ठेलने का ज्ञानदत्त जी का रिकार्ड तो उन्होंने तोड़ ही दिया

कहीं मेरे भेजे में थोथा चना तो नहीं बज रहा ?
गुरुवर माफ़ करना, वह क्या है कि..
मेरे दिमाग की डाइसी मुर्गी.. निम्न स्तरीय छोटे अंडे ही दिया करती है..
पर कुड़कुड़ाती बहुत है, शायद अपनी आदत से लाचार है, 

चुपचाप हिन्दी चुगते रहने से परहेज़ है, इसको..
लगता है, इसको अब आत्मविकास की छुरी से ज़िबह करना ही पड़ेगा… हे हे हे.. 

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03 November 2008

हे भगवान, तो यह सब तूने किया !

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अपनी धरती पर ख़बरों का टोटा पड़ रहा, दिक्खै । पूरी दुनिया दुई दिन बाद सदर ए रियासत अमेरिका के इलेक्शन नतीज़ों को लेकर दुबली हुई जा रही है । शायद ठीकै हों सब के सब, अब ‘कोउ नृप होंहिं.. ‘ वाला ज़माना तो रहा नहीं, सब जागरूक हो गये हैं । ठीक से जग नहीं पाये हैं, उनींदे तौर पर सही..  लेकिन गरियाने वरियाने से आचमन-कुल्ला करने की शुरुआत हुई गयी है, चुभ चंकेत है, यह ! ( पढ़ें शुभ संकेत.. फटीचर टाइप के एडीटर द्वारा इतना सताया गया हूँ, कि अब अपने हाथों ही अपना लिखा एडिट करना, अपने पैर पर कुल्हाड़ी मारने जैसा दर्द देता है.. अउर ई तो कुंजीपटल की चूक है, सो आज आप ही भुगत लो ) ठीक ट्रैक पर जा रहा हूँ, न ? पढ़ो या न पढ़ो, पर है ठीक !

जब अक्खा दुनिया का इंडिपेंडेन्ट देश लोग, सदर ए अमरीका को अपना नृप माने बैठा है, तो आप ही क्यों अलग रहो ? आप भी सच्चे देशभक्त की तरह नृपों के नृप की चिन्ता में दुबले होते रहो ! हम्मैं तो अभी अस्पताल जाना है, मेरा एक जोर-ना-लिस्ट मित्र तीन दिन से कोमा में पड़ा है, देखदाख आयें, नहीं तो पता नहीं ऊप्पर पहुँच के क्या जड़ दे  मित्र है,सो मेरे ख़िलाफ़ कुछ उल्टा सीधा करने का उसको नैतिक अधिकार प्राप्त था । देख ही आयें !

भईय्या, वैसे तो हम्मैं इस वक़्त पूरी जर्नालिस्ट बिरादरी ही आतंकवाद-इनकेफ़ेलाइटिस के कोमा में पड़ी मिल रही है,उनकी पीठ में सेंसेक्स-सोर हुई गवा ऊई अलग से ! फोनवा घनघनाय रहा है.. बड़ा डिस्टर्बेन्स है, भाई ! ई ससुरा न होय, तो हमहूँ रोजै एकठईं साग-भाजी.. उच्च विचार पोस्ट ठेले रही । ई सार का कल्है कटवा देबै.. फोन का ! अरे बाप रे, लगता है कुछ गलत तो नहीं लिख गया ? अजित वडनेकर भाई .. आप दो कोस पर बानी बदल जाने पर इतना परेसान रहा करते हो.. हम यहाँ हर दो पैरा पर भाषा बदल जाने से परेशान हैं । “ ऎई ट्रैक पर लो.. जो भी लिख रहे हो, ठीक से लिखो,” बट नेचुरल, इट इज़ माई एनिमी नम्बर वन… पंडिताइन, दूजा न कोई ! खैर,फोन उठाया, ख़बर थी ब्यूरो चीफ़, स्पष्ट-हुँकार.. मेरे तथाकथित मित्र तोड़ूलाल जी, कोमा से वापस आ गये हैं।

यह तो जैसे चौपाटी के काला-खट्टा जैसी ख़बर थी, अस्पताल तो अब देर से पहुँचो या फ़ौरन.. क्या फ़र्क पड़ता है ? होश में आ गया है,इसके मानी यह कि, अब उदास खड़ी घुटी-टंकार भाभी की पीठ तो सहलाने को न मिलेगी!

लेकिन अपनी घुटीटंकारदेवी वार्ड के दरवाज़े पर ही मिल गयीं, शायद ब्रेकिंग न्यूज़ देने का अवसर हाथ से न जाने देना चाहती होंगी । “भाई साहब ( हत्तेरे की जय हो ! ), भगवान ने उन्हें लौटा दिया,” लपक कर ऎसे बताया, जैसे कोई हादसा गुजरते गुजरते फिर लौट आया हो ! यह आपके पुण्य कर्मों का फल है.. मैंने पिठवा तो छू ही लिया । मन ही मन दाँत पीसे, “साला, वहाँ से भी लौटा दिया गया होगा.. जुगाड़ लगा कर दुनिया से रिहा होना चाहता था, मरदूद !” तो शायद यह आतंक-इनसेफ़ेलाइटिस न रहा हो.. ज़रूर यह शेयर-सट्टा शाक में चित्त हुआ होगा, चीलर ! ख़बरनवीस है, तो उसके चीलर होने में वैसे भी कोई संदेह नहीं ! जहाँ चपट जायेगा.. वहीं तब तक चिपटा कुलबुलाता रहेगा , जब तक अगला लंगोटा ही उतार कर फेंक न दे ! अगर लंगोट न उतरवा ली तो समझो पत्रकारिता  असफल हो गयी ! तभी राजनीति करने वाले, ऎसा कोई वस्त्र ही नहीं पहनते कि उतरने का गम रहे ..

अंदर प्रविष्ट हुआ,बेड के पास दो तीन जन खड़े थे। लगा कि तोड़ूलाल जी धीमे स्वर में कोई व्यक्तव्य दे रहें हैं । पास जाने पर, मेरा संदेह विश्वास में बदल गया ! श्री तोड़ूलाल देवलोक का यात्रा वृतांत बयान कर रहे पाये गये ! मेडिकल की भाषा में इसको डेलेरियम कहते हैं, आम बात है ! लेकिन उनका डेलेरियम प्रलाप तो जैसे ‘पंगु गिरि लाँघे‘ जैसा ज्ञान बाँट रहा था ! लगता है, यह पोस्ट फ़ुरसतिया खेमे में जा रही है.. सो, एक नन्हा सा ब्रेक ले लें ?

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.. हाँ तो, तोड़ूलालजी आप मेरे पाठकों को बतायें कि वहाँ क्या क्या देखा आपने और क्या ख़ास ख़बर तोड़ कर लाये आप देवलोक से..

ईश्वर के सृष्टिसंरचना विभाग में संरचना सहयोगियों की नयी भर्ती हुई है
मैंने देखा कि भगवन प्रशिक्षु सहयोगियों को संरचना रहस्य सोदाहरण समझा रहे हैं
" आप लोग ध्यान दें कि जो भी बनाया जाय, उसमें संतुलन बनाये रखना आवश्यक है "
जैसे ? कई कंठों से एक साथ निकला
जैसे कि यह पोस्ट पूरी पढ़ने वाले धैर्यवान पुरुष
और उचटती दृष्टि डाल कर सरक लेने वाले मूर्ख

निमिष मात्र में परिहास की मुद्रा तज, प्रभु सहज होते भये
जैसे कि हर सौ हिरन पर एक शेर बनाया मैंने
वन बनाया तो दावाग्नि भी दे दी
बात पूरी भी न हुई थी कि किसी अधीर ने
किंचित हलचल मचा कर सबका ध्यान खींचना चाहा
जी श्रीमन , पर यह सभी तो सार्वभौमिक हैं

अच्छा तो यह दे्खिये कि मैंने एक देश अमेरिका बनाया
धन सम्पदा वैभव से समृद्ध देश
किंतु संतुलन के लिये असुरक्षा तनाव व बिगड़ी हुई संतानें दीं
यह रहा अफ़्रीका, प्रकृति के बिखरे सौन्दर्य में बेफ़िक्र बिंदास समाज
किंतु उनको चिड़चिड़े मौसम व हिंस्त्र पशुओं से पाट दिया
यह रहा चीन, चींटियों को मात करने की कर्मठता और दूरंदेशी की मिसाल
किंतु आबादी के बोझ व निरंकुश शासक से त्रस्त रखा इनको
इस प्रकार के संतुलन से हम अपने सत्ता के महत्व को बनाये रहते हैं
बीच में टप्प से एक ज्ञानबघारू जीव टपक पड़ा
पर श्रीमन, यह कौन सा देश है

नक्शे को निरख भगवन मगन होते भये
आह्हः इसकी बात करते हो.. यह तो है देवभूमि भारत
समझो कि मेरा ड्रीम प्रोजेक्ट
बुद्धिमान संतोषी परोपकारी वीर किंतु सहिष्णु मनुष्यों से अँटा भूखंड
खूबसूरत पर्वतों , झरनों व स्वर्णिम परंपराओं का देश
अनेकता  में एकता यह एक लघु स्वर्ग

इतने में एक टिप्पणी आयी


किंतु प्रभु, यह तो पक्षपात है
आखिर इनको उलझा कर संतुलित रखने की व्यवस्था क्यों नहीं दी आपने
भगवन विहँस पड़े, इस नादान प्रश्न पर..
ध्यान से देख.. इसके दायें बाँयें के पड़ोसी देश, फिर कोई शंका कर, रे मूढ़ !

मैं वहीं ठिठक गया, हे भगवन, तो… यह सब तूने किया है

नमस्कार, कृपया नोट करें, तीन बजने में अभी दो घंटे बाकी है

पोस्ट सौजन्य – रजनी की सुवास एवं बाबा का ज़र्दत्व

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16 October 2008

आज एक माइक्रो चमरई हो जाय

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का हरज़ है.. भाई, आज थोड़ा सा माइक्रो हो लिया जाय, तो ? माइक्रो और वह भी थोड़ा सा.. क्या केने क्या केने !

तो, मेरे बाबा जी रजनी के संग कल रात कहीं गायब हो गये, शरद मेला की भीड़भाड़ में फिसल के निकल गये होंगे । आज सुबह 9 के दरमियान पान के दुकान तक जाकर, पनवरिया को दूर से इशारा किया, कि मुझ तक इन दोनों को पहुँचा जाओ । वहाँ एक पंडितजी और उनके मित्र बेचारे पान वाले के दम किये हुये थे, जरा 132 तेज रखना और  किवाम डाला ?  तो ठीक, अब यह भी डाल दो.. और सुनो जरा वह भी,  इत्यादि इत्यादि..

ई सब निरख अउर तदोपरांत ऊ सब देखत हमरे दिमाग में कुछ कुछ होता है वाला कुछ नहीं, बल्कि सबकुछ हो गया वाला कुछ कुछ हो गया । यदि आप भी दिल वाले हो तो, एसी कार के बंद शीशों के उसपार देखो.. तो पता चलता है कि कुछ कुछ नहीं, बल्कि बहुत कुछ होता है, इस भरी दुनिया में.. भला यह बात डाक्टर अनुराग और मुझ नाचीज़ के सिवा, दूसरा और कौन असंवेदनशील हृदय समझ सकता है ? अलबत्ता नेता-ऊता की बात अलग है, वह तो संवेदना के सताये हुये हुये वर्ग को बिलांग करते ही हैं । जनता के सीने का मामूली दर्द भी वह इन्टेंसिव केयर की निष्ठा से जीते हैं, छोड़िये उनको…. वह ससुरे हमारे माइक्रो के योग्य नहीं .. …

अब ओमपरकास पनवारी ने क्या डाला, क्या नहीं… वह बाद की बात है । अभी तो पंडित जी बातों बातों में मेरे मानसिक बवंडर में किवाम की पूरी शीशिये उलट के चल दिहिन, अउर एकठो माइक्रो पोस्ट प्रसव करने की प्रेरणा पकड़ा गये, अलग से ! ज़माने के हिसाब से तो ठीकै बात है, जनता के ज़ेब में पइसा नहीं, तो कैरीपैक, इज़ीपैक व सैशे वगैरह पकड़ा दो… कुछ तो उसके ज़ेब से निकसेगा ! ब्लागर के पास टैम नहीं, पाठक के पास दिमाग नहीं, वह तो मँहगाई की मार से पहले से ही फ़ुक्कस हुई पड़ी है… सो एक माइक्रोपोस्ट थमा देयो । ताक-झाँक की तक़ल्लुफ़ में भी कुछ तो बाँच ही लेगा ! सो, बचत ही बचत.. अपने दिमाग की, पाठक के नेटसमय की, और ज़्यादा लिख जाने पर बाँयें दाँये बगलें झाँकने की नौबत आने की.. डबलमज़ा नहीं बल्कि मल्टिपल मज़ा है, जी । आज ही माइक्रो अपनाइये, पोस्ट शेड्यूल करके चैन की नींद सोइये…  मैंने तो अपना लिया.. हाहः हाः हाः हः ह !

अमाँ, यह शॊशा तो बड़ा टेढ़ा है, हाईस्कूल से माइक्रो महाशय ने ऎसा पकड़ रखा है.. कि अब तलक माइक्रोस्कोप से जूझ रहा हूँ । छुटकारा पाने को अहंम ब्लागिंग शरणम आगच्छष्याम, तदं विधनास्य षड़यंत्रकारी यहाँ भी माइक्रो पोस्ट, माइक्रोब्लागर का भेष धर के किच्चपिच मचायतिष्यामि । मैं ठहरा फुलस्केपिया ब्लागर, कहाँ फँस गया ? लेकिन यह आधुनिकता ओढ़ने का मोह बड़ा अँधा बना देता है, सो आज ‘ चरैवति चरैवति ‘ भावना से एक्ठो माइक्रो ठेलने की इच्छा होती सी प्रतीत हो रही है । तो, हो जाने दो… धारा 144 पता नहीं कब नसीब हो ?

भईया, परिशान मत होवा.. जब माइक्रो बोला है तो माइक्रो ही लिखबे,  यह लाला का कौल है ! जब पेन से मसिस्राव हो ही रहा है, तो माइक्रो पोस्ट की एक मिडी प्रस्तावना तो लिखी ही जा सकती है ! कवि आँसू बहाता है, लेखक स्याही बहाते है, बड़कऊ लोग थोड़ा बहुत पसीना बहा लेते हैं, महीने डेढ़  महीने के लिये, छोटकऊ जन बाद के 58-59 महीने खून के आँसू बहाते रहते हैं, और, गंगा भी निर्विकार बहती रहती है ! बहते रहने में ही जीवन है.. देखो जनता अपना जाने क्या क्या बहा कर जनसंख़्या को कहाँ से कहाँ बहाये लिये जा रही है, कि बेचारे प्राइमरी के मास्टर बटोरते बटोरते हलाकान हुई रहे हैं । अब वह बेचारे किसको रोयें..

ग़ालिब फ़रमा भये हैं, “रोने से अउर इश्क में बेबाक हुई गैए”, कितना दारू बहा कर बेचरऊ यह इल्म हासिल किये होंगे, इल्म बोले.. तो ज्ञान ! कहीं ज्ञानजी भड़क न जायें, सो इसे इल्म ही पढ़ें  और इल्म ही समझें । ज्ञान को दारू के संग संदर्भित करने का हमको साहस नेहीं न हो रहा है, हमारे श्री गुरुवर जी का नाम धँसा पड़ा है, इस इलिमवा में ! और कहीं ताऊ के घरारी से वह प्लेबियन लट्ठ  उधार लईकै ( उल्लेखनीय है, कि ज्ञानजी का लट्ठ अभिजात्य वर्ग के मालखाने में जमा है ) तो, वह प्लेबियन लट्ठ लईकै माइक्रो के इन्वर्सली प्रोपोशनल इक्वीवैलेन्ट फोर्स से हमार  म्यू स्कवायर सिग्मा कर दें , तो टिप्पणी सिरमौर श्रीसमीरलाल अपना माइक और मंच प्रेम तज के तो आने से रहे ! ख़ुदा करे, वह अभी तो न ही आयें, वरना ‘ अतिसुंदर एवं उत्साहप्रद.. लगे रहिये.. जमायें रहें… आपका आभार ’ वगैरह वगैरह जैसा कुछ कह कर आगे बढ़ लेंगे ! आने दो उनको नवम्बर में, इंडिया आये तो ठीक, वरना यदि दैट्स भारत में मिल गये तो ऊप्पर निच्चै सबै देखि लेहा जाई !

ऎ भाई लोगों, मैं बहक तो नहीं रहा ? यदि ऎसा है, तो सुझाव व शिकायतें डिब्बा नीचे उपलब्ध है, उसका प्रयोग करें । ब्लागिंग ग़र नशा है, तो मेरे बहकने पर किसी की नज़रें टेढ़ी क्यों ? अउर अगर टेढ़ी होय तो सबजनै आँख मूँदिकै पढ़ लियो, टेढ़न का हम डेराइत नहिं न ! तौन आजु तो पेशल टाइगर भदौरिया का अद्धा चढ़ावा है, ऊपर से  हमरे मेल बकसिया में एकु दुई तीन नहीं, चार चार भड़ासी न्यौता पहिले से पड़ा भवा है, ऊई अलग । अब हमका हृदयपरिवर्तन करे का मज़बूर न किहौ ! टेढ़ी मत करो बंधु, बस हुई गवा… आजु एक ठईं हमार माइक्रो जाय देयो ! दुबारा हम न लिखबे, अउर लिख दिहा तो तुम पलट के आवै वाले नहीं… सो आजु तौ पढ़ि लियो भाय

बात रोने पर जा टिकी थी, तो भला बताइये… अगर रोयेंगे नहीं तो लोकतंत्र झेलने को बेबाक कैसे होंगे ?  ग़ालिब ख़ासे क़ाफ़िर किसिम की सोच रखते होंगे, तभी तो उनको कभी से भी, कुछ भी ख़तरे में पड़ा कभी दिखा ही नहीं ? सही बात है यार, तभी बेचारे ग़ालिब मरते दम तक ‘ख़ाक मुसलमाँ’ होने की आस लिये जीने को अभिशप्त रहे । माँग के लाये हुये चार दिनों में दो तो इसी इंतेज़ार में कट गये कि कौम का ग़म उन्हें अब सताये कि तब सताये ! तबके इमाम भी उसूलों पर नहीं, बल्कि अपने सरकारी वज़ीफ़े पर ही कुर्बान होने में खर्च हो गये । उनके ढाँपे हुये ग़म के मलबे अब कुरेदे जा रहे हैं । हम इस बेसिरे नाइत्तेफ़ाक़ी के मलबे का नतीज़ा भी झेल ही रहे हैं …

ऎई सीधे चलते चलो.. बात तो रोने की हो रही थी, सो, मिर्ज़ा जी की बात से मुख़ातिब हुआ जाये । हाँ तो, बच्चा रोयेगा नहीं तो बेबाक कैसे होगा, दूध कैसे मिलेगा, मईय्या की छाती में दुद्धू कैसे उतरेगा ? दूध देने के लिये अच्छी खुराक भी तो चाहिये, सो वह अभी अपने खाने-पीने के इंतज़ाम में लगी हुयी है, तो बेजा क्या है ? इधर हमारे भी फेफड़े मज़बूत हो रहें हैं ! हाँ तो, बात… रोने पर ही टिकी थी न ? ठीक है, फिर… रोने को तो हमारे  आपके  जैसे बीच के आदमी छोटकऊ लोगन का रोना यदा कदा देख भी लेते हैं, बल्कि कभी कभी साथ में रो भी लेते हैं, निहित स्वार्थ हो तो पछाडें भी खा लेते हैं । फिर छठा पे कमीशन मिलते ही हँस भी देते हैं, रिलीज़ होने के पहले ही ज़श्न भी मन जाता है, रोने दो इन सालों को.. कर्महीन हैं.. कामचोर हैं सब के सब ! चुपाय मारिकै अपना लेमनजूस चूसो ! अब इनका क्या है ? आज रो रहे हैं, कल दिहाड़ी पर किसी के भी ज़िन्दाबाद ज़िन्दाबाद रैली में शामिल हो जायेंगे, ससुरे ! लेकिन कल तो कुछ और ही देखा, बंधु एवं बाँधवियों...सो लिखबे की इच्छा है

एक जर्जर वृद्धा सोनिया गाँधी के आने वाले निर्धारित रास्ते पर लेटी हुई है, दहाड़ें मार रही है, छाती कूट रही है,  बटन टूटे अधखुली  ब्लाउज़ से बाहर झूलती हुई चुसकी छातियों से बेख़बर, बदहवास सी सड़क पर लोट लगा रही है, कुछ ज़वान पुलिसिये उसकी छातियों में दिलचस्पी न लेकर भीड़ लगायी पब्लिक में कोई दिलचस्प आइटम टटोल रहे हैं । वृद्धा का प्रलाप जारी है, “ आज हम इनका जाय न देब… हमका फैकटरी दियावें… हमार डेढ़ बिगहा ऊसर जात मुला ई बुढ़ापा तौ हरिया जात … हम कौनो माया-ऊया का नहिं जानित… इनके कहे पर वोटु ढीला है ( डाला है ) तौन इनहिन से आजु पूछिकै जाब … … एकु लउंडवा सूरत में कमात है… आपन मेहरियो राखे है… हम ईहाँ कउनो तेना ( तरह ) पेट जियाइत है… छोटकवा लुधियाना में मज़ूरी करत रहा… तौन ऊहौ लउट आवा कि अब हिंयईन नउकरी चाकरी मज़ूरी पाई जाबै…  नास होय ई चमरीनिया का… щПηψЙЫ⺶⺗⺗⺄♀♀⺈मरि जाय तौन डलमऊ निहाय आई… ऊँगली का इशारा अपने लड़के पर,और फेना छोड़ते मुखारबिन्द से फूल झड़ रहे हैं… कुल तीनै दिन की मज़ूरी में चार टनऊका ( सौ रूपये ) गिरा लिहिस… हमका फैकटरी दियावैं.. जाय न देब हम आजु इनका… “ भीड़  में लड़का हाथ बाँधें दो-तीन उभरते आइटमों से घिरा खड़ा था । मज़ू्री से बार बार अपने को संदर्भित किये जाने पर असहज होते होते अचानक फट पड़ा… हम कहित हय चुपाय रहौ… तब तै मज़ू्री… मज़ू्री लगाये पड़ी हो ! माता-पुत्र संवाद सुनने को मैं नहीं रुका । जिले में धारा 144 लगी है, शहर में तो सन्नाटा है, पर ?

पर, यहाँ ऎसा कुछ नहीं है, क्यों ? जानते हैं, श्री अनाम जी से..जरा मौज़ लिया जाय !“काहे भाई 144 लगी है, और आप बेखौफ़ घूम रहे हो ?”उसने पलट कर एक मिनट को मुझे गौर से तौला,फिर अपनी मुंडी को एक लघु अभिवादन झटका दिया, बगल को गरदन घुमा कर अपने मुँह में दबाये आशिकी ( गुटका ) की सिट्ठी को पक्क से थूका, एक सहज ज़वाब.. “ चउआलिस नहिं तौ कुतिया की ..ँटें, हिंया हम पंचन के घरै मा आगु लगाय दिहिस,  अउर हम बइठ के ई चमारिन केर चउवालिस का पकड़ि कै चाटी ? “ अब इस पतिप्रश्न का उत्तर तो तुम देकर भी नहीं दे सकते, सो यहाँ से खिसक लेयो अमर कुमार ! पंडिताइन मेरे बाँयें कोख में अपनी तर्ज़नी का तमंचा गड़ाये पड़ीं हैं

पर, वह नौबत नहीं आयी, गाड़ी बैक करने का जुगाड़ तलाश रहा था कि… शोर मचा,”बदल दिहिन… बदल दिहिन, अब सताँव ( दूसरे मार्ग ) से पास होइहैं । डीएम मना किहिस है कि जिम्मेवारी न लेब !” न्यूज़रिपोर्टर लड़की बदहवास सी दौड़ रही है.. यह सताँव किधर है, गायज़ ? लोग उसे घेर कर अपने अपने तरीके से रास्ता बता रहे हैं, समझो कि आधा घंटा से ज़ेदा लगि जायेगा मैडम… एक रंगबाज उसके सीने को ‘देख लो आज इसको जी भर के’ वाले अंदाज़ में घूरता हुआ समझा रहा है,” आपकी भारी बाडी है न ? सो हिचकोला गज़ब का लेगी !“ कहता हुआ वह सांकेतिक रूप से उनके वैन की ओर हाथ बढ़ा देता है, पर नज़रें बचा के उपस्थित जनसमुदाय को अपना मंतव्य भी आँख दबा  कर  और अपने होंठ  काट कर समझा देता है । पब्लिक उसके श्लेष पर मुदित हुई जाती है !

कविवर बिहारी की इस औलाद पर अपने माइक्रो µ पोस्ट की नेपथ्य कथा को समेट ही रहा था, कि उस रिपोर्टर लड़की पर नज़र गयी, बल्कि स्वयं पंडिताइन ने ही दिखायी… वह लौकीनुमा माइक लिये बूढ़ा को ही चेंटे पड़ी थी ! गरदन बार बार पीछे मुड़ कर बताती जा रही थी कि ‘हम अपने दर्शकों को बता दें कि…’ मैं झल्ला रहा था, क्योंकि यह मेरे च्वाय्स का मामला नहीं था ।  कवरेज़ देखने की यह पंडिताइन की चाह थी, सो मानना ही पड़ा।

 अरे, साफ़ साफ़ बोलना सीख ले लड़की..खुल के बोल कि ‘अपने ड्राइंगरूम व लाबी में बैठे तमाशबीनों को हम यह बता दें कि…एटसेट्रा एटसेट्रा..’ उधर बुढ़ियारानी, अब बेचारी बुढ़िया से चरित्र अभिनेत्री बुढ़िया में तब्दील हो चुकी थी.. दो रिटेक सहर्ष दे चुकी थी । वह मुड़ी,” हम अपने…? “ कैमरामैन महोदय को भीड़ में शामिल किसी फोटोजेनिक चेहरे पर उलझे देख, उसका चिल्लाना लाज़िमी था, भला कौन सा न्यूज़चैनल कवरेज़ में खूबसूरती को शामिल करने की इज़ाज़त देता है, यदि यह रैम्प पर न चल रहा हो तो बात भई अलग है ? वह मुल्क की प्रगतिशीलता का प्रायोजित कवरेज़ होता है । सो, वह चिल्लायी, “हे गाय, अपना कैमरा इधर को पैन करके जरा ठीक से ज़ूम करो”..फिर अपने अगल बगल से दबाती हुयी सी पब्लिक को बड़े संयत स्वर में संबोधित किया, “प्लीज़ थोड़ा स्पेस दीजिये न गायज़ !” अब मैं मगन होता भया, क्या बात है, यार.. विहिप बेचारा अपने गोमाता प्रेम को लेकर नाहक बदनाम है, और कान्वेन्ट से अवतरित हुयी यह लड़की गाँव गाँव बतर्ज़ ‘हे खग मृग हे मधुकर श्रेनी’ में ..गायज़.. गायज़ गोहराती हुई गोधन को हेरती घूम रही है । इसको कहते हैं ’ जिन खोजा तिन पाँईया’  वाह रज्जा, वाह वाह ! यह वाहवाहियाने की बात तो है न, गायज़ ? अरे ब्लागियों, यह मैं आपसे पूछ रहा हूँ

मेरा माइक्रो पोस्ट ? हाँ अभी वह भी तो रहा जा रहा है.. हे राम, कहीं  इस मज़में में फुसला तो नहीं लिया गया, मेरा टिनी-मिनी ? जाने मेरा माइक्रो किधर गया जी… अभी अभी इधर था किधर गया जी । वह दूर से मुस्कुरा रहा है, इन्नोवेटिव दिखने का मौका खिसक जाय तो गुस्सा तो आयेगा न, जी । “ चल इधर आ… पेश हो यहाँ “

अथ आरंभ निजस्य माइक्रो पोस्ट

ऊपर की बकवास तो इसकी नेपथ्य कथा थी, जड़ मज़बूत होगी, तभी समझोगे न,भाई ? इसके जन्म लेने का घर दुआर, महतारी बाप से परिचय करवाना ज़ायज़ लगा, सो कर दिया, लेकिन पोस्टवा माइक्रो ही है !

⿸तोमैं गाड़ी में बैठा इंतज़ार करता रहा, वह ओमप्रकास को उलझाये रहे, फिर आराम से पान का

बीड़ा अपने अपने श्रीमुख के कल्लों में स्थापित कर, एक आवश्यक कार्य से फ़ारिग हो लेने जैसा संतुष्ट दिखने लगे । वापस होने की प्रक्रिया में मेरी कार का रास्ता काट गये सो अलग ! आपस में जो भी बतिया रहे थे, वह इतने धीमें स्वर में था कि लोग सहसा पलट कर देखने लगते, यह सदा ( आवाज़ ) कहाँ से आई ? उनमें एक तथाकथित उपाधीयाऎ जी भी रहे होंगे अवश्य, क्योंकि वही परस्पर संबोधन में प्रयुक्त हो रहे थे ।

“ तो, अइसा है न.. उपाधीयाऎजी कि ई कोनो राजनीति नहिं है, ज़मीन दिया कोच फ़ैक्टरी को.. पइसा लिया बकैदा रेलवे वालों से … दाख़िल-ख़ारिज़ भी सुपुर्द कै दिये उनको । अब मुकर रहि हो.. कि  ई ज़मिनिया वापस देयो । अब भाई उपाधीयाऎजी हमरे हिसाब से तौ यहिमाँ न कोनो सिद्धांत है.. अउर सुनि लेयो ई कोनो राजनीति भी नहिं है, ई तो भाई, टोटल चमरई है..हन्डेड वन परसेन्ट चमरई, पाल्टी कै औकात गिरा दिहिन !“

हमारे ओमपरकास जी ने आवाज़ दिया, “ भईया ?” बाबाश्री व रजनी हवाले किया, हम इनके बिना  कुछ  भी  नहीं  लिख पाते.. सो यह पोस्ट लिख कर अपलोड कर रहे हैं, ताकि सनद रहे व वक़्त-ए-ज़रूरत काम आये

सामने देखा तो दोनों एक मारुति 800 में धँसे, खिड़की से मुँह निकाल पुच्च पुच्च करके गंदी सी भंगिमा बना कर ओमपरकास पर चिल्ला रहे हैं, “अबे कलुये, कितना चूना लगायेगा बे ? अपनी दुकान चलानी है, तो पहले ठीक से चूना लगाना तो सीख ले, स्साले मा..ढर.ओद ! गाँड़ तक कल्लाय रही है, इन ससुरों के मारे

आक्कथू, मारुति सरकी.. मैं भी सरक रहा हूँ पर यह तो बताना भूल ही गया कि उनकी कार के बोनट के बगल लगे डंडे पर एक हाथी महाराज नीले रंग के कपड़े पर टँगे हुये निर्विकार भाव से मूड़ झुकाये हुये थे !

मैं अपना सिर झुकाये बाबा 120 व रजनीगंधा का मिश्रण बना रहा था, यही खाँटी बचा है. मेरा अंतिम सत्य !

जौन मनई, सीधे स्क्राल करके ऊपर से नीचे उतर आये हों.. पोस्ट की लम्बाई गहराई नापने को, वह आगे को सरक लें । यदि आप नेता के कौल पर भरोसा कर लेते हो, तो इस बेचारे लाला के कौल पर क्यों नहीं ?  अपने इर्द गिर्द चल रहे प्रहसन पर, मात्र  8927 शब्दों में समेटी कथा माइक्रो ही कहलायेगी न भाई ?

 

 

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04 October 2008

तू चल... मैं जन्मजन्मांतर का पाप काट कर आता हूँ,

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‘स्कन्दमाता श्रीमती शिवेसर्वार्थसाधिके  आज प्रातः से ही अनमनी सी थीं । कई बार शिवशंकर भोलेनाथ भूतभावन ने प्रश्नवाचक दृष्टि डाली, नज़रें बचा गयीं ! गणेश तो सुबह से ही सजने बजने में भागदौड़ मचाये हैं । कल अम्मा के साथ मृत्यलोक की तीन दिन की पिकनिक पर जाना है, कार्तिकेय को तो कोई चिन्ता ही नहीं है । रिद्धि- सिद्धि गणपति से उदासीन हो गयीं हैं, अब इनके सूँड़ कौन लगे.. अभी अभी विदायी लेकर आये हैं, चिल्ला चिल्ला कर प्राणियों ने कहा अगले बरस तू जल्दी आ, फिर भी ये है कि.. ऊँह कौन समझाये ?  विनायक माज़रा भाँप ही तो गये, सफाई पेश की "अरे भागवानों, तब मैं जम्बूद्वीपे  भारतखंडे कहाँ गया था ?  वह तो दुष्ट ठाकरे का आमची महाराष्ट्र था, पगलियों ! पिताश्री के सेना के सेनानी हैं, सो संकोचवश चला जाता हूँ । पिताश्री के सखा निर्वासित अयोध्यानरेश राम की गुहार पर अम्मा ने साथ चलने को कहा, तभी तो जाता हूँ वरना मिलावटी मोदक का मुझे कोई लोभ नहीं ।   भला बताओ 25-30 हाथ की प्रतिमाओं के सम्मुख स्वयं कितना अपमान लगता होगा ?

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उधर दुष्टदमिनी अपने शस्त्र वगैरह बेमन से चमका रहीं थीं !  व्यस्त सी दिखने को , वह भूतभावन ब्रह्मवेदस्वरूपं  के सामने इधर से उधर को डोल रहीं थीं । गिरिजापति से दृष्टि-विनिमय होते ही, अनायास ठुनक पड़ीं, " मन नहीं कर रहा जाने का, फिर भी जाऊँ क्या  तुम क्या कहते हो ?" महादेव ठठा कर हँस पड़े, " क्यों अनमनी हो रही हो, त्रिपुरसुंदरी ? जाओ अपने क्षेत्र का एक बार तो दौड़ा कर ही आओ, इतना तो मान रखो ।" अरे बाप रे, करुणामयी तो एकदम से बिफ़र पड़ीं, " ऎ महाराज, यह आशुतोषवृत्ति अपने ही तक सीमित रखो । देखो, देवों के बीच ही तुम्हारी चतुराई शोभा देती होगी, जो तुमसे घड़ी घड़ी समर्थन माँगा करते हैं ! मैं अर्धांगिनी तुम्हारी, क्या पूछ सकती हूँ कि संहार के अधिष्ठाता तुम हो, और तुम ही नहीं जानते कि वहाँ संहार ही नहीं नरसंहार चल रहा है, और  मैं वहाँ अपने को पुजवाने जाऊँ ? "  भँग की तरंग में शिवदूती अरूपा ने जैसे कंकड़ फेंक दिया हो, किंचित तिलमिलाये फिर सहसा ही संभल कर ईश्वरोचित गरिमा से बोले, " जा भक्तों का मन रख ले, थोड़ा पूजपाज लेंगे तो तेरा क्या ?  उन आर्तजनों में किंचित साहस   व सांत्वना  की लौ जलाती आना ।"  घृणा से नारायणी एकदम काली पड़ गयीं, बोलीं "  स्वामी मेरे पास  आपके जैसा हलाहल रोक लेने वाला नीलकंठ नहीं है, सो जो देखती हूँ वह पीना ही पड़ता है । मुझे स्वयं ही आग्नेयास्त्रों की सुरक्षा में प्रवास करना पड़ता है । माटी बाँस का एक महिषासुर मेरे चरणों में डाल कर, सहस्त्रों महिष अपने मनोकामना फलप्राप्ति निमित्त हाथ जोड़ कर वंदना करने  लगते हैं । माँ माँ.. चहुँओर     माँ माँ .. का ऎसा कोहराम मचाते हैं, कि अपनी सदार्तर्चित्ता की छवि बचाना कठिन हो जाता है ।

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" क्या करें, यह आदिशक्ति  नामी आदिमाता ?  जब सभी कपूत हो जायें, तो कोई माँ उनका क्या भला कर लेगी  ? यह मूढ़ तो बस '  कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि ' गा गा कर दुर्गा-सप्तशती का ऎसा पाठ सुनाते हैं, कि खिन्नता व्यापने लगती है ।"  दुर्गतिशमनी का भुनभुनाना जारी था, कल षष्टी है ! त्रयंबकम की तरंग तो तिरोहित हो चुकी थी, सो मौज़ लेने लगे, स्वांग करते हुये उवाचे, " रूपं देहि, जयं देहि, यशो देहि, द्विषो जहि " ... थमक गये ।

" क्या इतने मात्र से, तुम यह सब प्रदान कर देती हो..  विजय भी कहीं भीख में मिलती है ?  देहि देहि की रट  लगवाये जाओ, भला न होगा कभी .. स्वयमेव मृगेन्द्रा  !  विजयश्री तो पराक्रमी का वरण करेगी या आसन पर पलथा लगाये ' रूपं देहि, जयं देहि, यशो देहि द्विषो जहि' का ? सहसा क्रुद्ध हो गये, " कब तक इस भिक्षुक मनोवृत्ति का वरण कर अपने जम्बूद्वीपे भारतखंडे  को अकर्मण्य बनाये रहोगी ?  पाताललोक वासी मलेच्छपति से भी माँगने पहुँच गये, ये लोग ।"  भोलेनाथ थरथर काँपने लगे... हाय बप्पा,  ई औघड़नाथ आजु तांडवै देखाय दिहें का ?   मेरी सरक गयी ! smile_angry

मैं  स्वयं ही जैसे भँग की तरंग में आ गया । इतने वर्षों से पाठ वगैरह करता आया, वह सब लग रहा कि उड़न छू .... ? आस्था में तर्क को स्थान न मिलता हो, किन्तु इस तर्क में तो आस्था ही आस्था है ।lightbulb मनमोदक खाते रहना छोड़ कर बुद्धिबल व बाहुबल पर भरोसा क्यों न रहा ? 

जकारो जन्मविच्छेदः पकार पापनाशकः

जन्मपापहरो यस्मात जप इत्यभिधीयते

यह तो हुई जप की महत्ता ! चंड-मुंड मारे गये, शुंभ-निशुंभ भी खेत रहे, रक्तबीज का अंत हुआ और महिषासुर का वध हुआ । 700 श्लोकों में समेटी गयी इस कथा का सार वही अनादि सत्य है, कि बुराई का अंत व अच्छाई की विजय ... यही ना, सहमत ? तो फिर मित्र जरा यह तो बताओ कि इनको हज़ार बार, लाख बार एक जगह बैठ कर जपते रहने से समाज का, और आपके स्वयं का क्या भला होगा ?  यस्स, इनमें निहित बीजमंत्रों की उपादेयता से इन्कार नहीं किया जा सकता, बशर्ते  हम यह बघारना छोड़ दें कि असली वाले मंत्र तो ज़र्मनी चले गये व एक भारतीय राज भाटिया की देखरेख में हैं, इसीलिये इन बचखुच लाइना में अब दम न रहा । जन्म लेना क्या इतना बड़ा पाप है, कि हम इससे उबरने की कोशिश में पूरा जीवन ही होम कर दें ।  उस पर भी यह विलासिता कि नारीस्वरूप को पूज्या बनाने में इतनी रसिकता का आश्रय लिया गया है, कि आश्चर्य होता है कि ऋषिगण ने नारीदेह सौष्ठव  को कितना नज़र गड़ा कर, बारीकी से देखा होगा । मैं कहीं बहक रहा हूँ क्या ? बता देना भाई, समेट लूँगा !  अच्छा, चलो जल्दी से निपटा ही दिया जाय...  वैसे ही फ़र्ज़ी तौर पर, या कि सोदाहरण ? सोच लो, इसमें संस्कृत है ।

पत्नी मनोरमां देहि मनोवृत्तानुसारिणीम । तारिणीं दुर्गसंसारसागर्स्य कुलोद्भवाम । जपत तो एहिका हो, अउर करत का हौ ? आपै देखि लेयो हम न बोलब !smile_zipit    ततो वव्रे नृपः राज्यमिति मंत्रस्य जपे स्वराज-लाभः । गाँधी एहिका पढ़बे नहिं भे, लाठी-डंडा खा लिहिन, जेलु गये सेंत में ! एहिकै जपि लेत, छुट्टी हुई जात अंग्रेज़न की !smile_wink    बलिप्रदाने पूजायामग्निकार्यै महोत्सवे । सर्वं ममैतच्चरित मुच्चार्यं श्राव्यमेव ॥ अब आप ही बताओ भाय, कि सर्वोपकारकरणाय सदार्द्रचित्ता बकरा-भैंसा से काहे बैर ठाने हैं ?blacksheep     वह तो शायद पशुत्व की बलि माँग रहीं, अउर ई मनई काटि रहे बकरा ! बकरे का पशुत्व भी इतना निरीह कि गाँधी जी प्रायश्चित में एहिका दूध पियत पियत मर गये !Devil                                   कामदा कामिनी कामा कांता कामांगदायनी । अब एहिका देखि लेयो, साफ़ै साफ़ बतावत हैं कि देवी का अंश नवयौवनाओं में ही है, तबहिन हम सोचित रहा कि कुमारीतंत्र तो है,smile_embaressed  किंतु वृद्धातंत्र कब्बौ नहिं सुना भवा है ! सही है, भाय सही है... चढ़ी- चढ़ै का सबहिन पूजत है । तबै ई नकलची ललमुँहें भी तो मरियम गढ़ि लिहिन रहा । हमरे ईहाँ तो हद खतम कर दिहिन, भाय । एहिका देखो..                                                  नव तरूणशरीरा मुक्तकेशी सुहारा । शवहृदि पृथुतुंगस्तन्ययुग्मा मनोज्ञा ॥ अरूणकमल्संस्था रक्तपद्मासनस्था । शिशुरविसमवस्त्रा सिद्ध कामेश्वरी सा ॥ एहिका मतलब माता बहिनन का सोचि कै नाहिं बतावा चाहित है, यहि से मन नाहिं भरा तो.. स्तनौ रक्षेत महादेवी मनःशोक विनाशिनी । नाभौ च कामिनी रक्षेत गुह्यं गुह्येश्वरी तथा ॥ रोमकूपेषु कौमारी त्वचं वागीश्वरी तथा । शुक्रं भगवती रक्षेत जानुनी विंध्यवासिनी ॥ गिनवा गिनवा कर अंग प्रत्यंग की रक्षा का भार देवी के मत्थे दे दिया, यहाँ तक कि शुक्र भी ! आख़िर तो हम उन्हीं की वंशज ठहरे, ना ?  अब डोलते रहिये, इधर-उधर... क्योंकि इधर पहले ही बहुत कुछ सुपुर्द किया जा चुका है ! शूलिनी वज्रिणी घोरा गदिनी चक्रिणी तथा । शंखिनी चापिनी वाणा भुशुंडी परिघायुधा ॥ शूलेन पाहि नो देवि पाहि खड्गेन चांबिके । घंटास्वनेन नः पाहि चापज्यानिखनेन च ॥ मतलब साफ़ है, कि एक भी आयुध अपने लिये नहीं रखा.. तौन अब देखि लेयो कि देश देश घूम रहें हैं, हथियार के जुगाड़ में ! तब हमरे मनई इंद्र-वरूण इत्यादि से सहायता माँगा करते थे, अब अमेरिका रूस चीन से ! फ़र्क़ इतना ही है, बस !

तो अब चला जाय, कि अबहिन कछु  और खला जाय ?

या देवी सर्वभूतेषु लज्जारूपेणसंस्थिता

नमःतस्यै नमःतस्यै  नमःतस्यै  नमो नमः

 

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27 September 2008

रानी रूठेगी… अपना सुहाग लेगी

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बात तो भाई, एकदम्मै सही है. !  हाँ तो, शुरु किया जाय ? एक महीने का अंतराल होने को है.. और महीने में एक पोस्ट देने का वायदा भी है । मौका और मोहाल दोनों ही माक़ूल हैं  सो, इस नामाक़ूल की कलम चले ? पहले यह तो पूछो, कि गायब ही क्यों था ? गायब होंय भूत प्रेत बैताल के दुश्मन, हम तो वइसे ही अपना नया शौक में उलझ गये थे । देखि लेयो ईहाँ, एच०टी०ऎम०एल० की एचटीमेंएल कर रहे थे, इस सइटिया का कोड सँवार बिगाड़ि रहे थे, अउर अब ख़ाज़ खुज़ाने आयें हैं, कोई ऎतराज़ ? मेरे काबिलतरीन दोस्त श्रीयुत दिनेश राय द्विवेदी जी, पहले ही फ़रमा भये हैं कि सबहिं फुलन्तरू हँईयन लौट के अईहें, भागि नाय सकत कोऊ, ईहाँ तै ? वइसे ऎसी दलीलन को ओवर-रूल करै को वन हण्ड्रेड वन रीज़न्स हैं, अपने पास ! काहे कि अइसे छुट्टा- बेलगाम सुहाग से तो रँड़ापा ही भला ! बात में असल ये है, कि हम आहत हुई गये थे, अउर हैं !

आहत होना तो ख़ैर ब्लागर-कुलरीति ही है । लेकिन पगलवा गुट बोला कि ई कउनो ख़ास रीज़न नहीं, कुछ सालिड बताओ । काहे कि इत्तै वाद-विवाद हुई गये, लोग गरियाइन.. मारिन.. चप्पल ज़ूता घसीटिन… बल्कि हियाँ तो पतलून-जम्फर तक उतरवा के घुमावा गवा है, लेकिन अपमानित नहीं किया कब्बौ कि हम आहत हो जायें। हम बिरझ गये, ठीक है भईय्या, तौन अब आप जाके देश का नेतृत्व संभाल लेयो, ब्लागिंग का तो अनुभव ही पर्याप्त है तुम्हरे लिये ! मज़ाक नहीं भाय, अच्छा लेयो ई नाड़ा पकरो… “ देश का नेता कैसा हो.. हिन्दी ब्लागर जैसा हो ! ज़िन्दाबाद ज़िन्दाबाद… चिरकुट अँधरा ज़िन्दाबाद ! अँधेरा तुम्हारे अंदर है.. बाहर तो उज़ाला है ! लेयो, अउर लेहो ? हम्मैं कउनो फ़िकिर नाहीं, ’  राजा नहीं फ़कीर ’  नारा वर्कशाप में काम किहा है ! यह तुलना ऎंवेंईं वाली नहीं बल्कि सच्ची की है, नेता ब्लागर और गैंडा के तुलनात्मक अध्ययन पर ज्ञानदत्त पांडेय जी ’ मानसिक हलचल फेम वाले ’ एक चार्ट भेजने वाले हैं, देखते रहिये [  यह   happy_feetस्पेस ] … गैंडा तो लीद करने को बैक गीयर में चलता है, सो उसको अलग किये दे रहे हैं,  अभी तो ब्लागिंग में अपार अन्यान्य  संभावनायें अन्वेषित होने को हैं  । गैंडत्व अभी दूर की कौड़ी है, मित्र श्री !

सो, हम सीनाठोंक आहत रहे अउर हैं। टंकी रिपेयरिंग अभी पूरी नहीं हुई है, वरना डिक्लेयर कर जाते । फिर यह भी सच है कि, 100 टुटपुँजिया पोस्ट के बूते टंकीरोहण करना समझदारी भी नहीं, वह भी ऎसे हालात में जबकि आप अपने नेटवर्किंग पर भी भरोसा नहीं कर सकते, यहाँ  कई तो आया राम - गया राम भी होंगे, कहाँ नहीं हैं ? तो, हम एक बार फिर दोहरा रहे हैं,कि .अँ,  कि ..ऊँ,  कि हम आहत थे  और आहत हैं ! आहत था…बोले तो…

मेरे एक सहकच्छामित्र ( एक नया शब्द, नोट करें अब लंगोटिया यार नहीं चलेगा । लंगोट पुराना और बासी माल है, हर गाँव पुरवे में रूपा की ही ठेलमठाल है। और यार, अरे यार तो यवन संबोधन है, मेरे यार ! भारत में यदि रहना होगा, सहकच्छामित्र कहना होगा )

Binavajah Sept'08

तो यह सहकच्छामित्र श्रीमान एक दिवस हमरे कनें टहल लिये,  ’मुन्ने ’ यानि कि मोहम्मद अज़हर खाँ मंथर चाल से प्रगट हुये, साहित्यानुरागी हैं ! सो, कभी कदार साहित्य चरने की गरज़ से भटक आते हैं । मित्र को आलोचक का दर्ज़ा देकर रखो, तो बड़प्पन कहलाता है । बट ही इज़ अ नाइस ज़ेन्टलमैन, अ बिट डिफ़ेरेन्ट फ़्राम शिवकुमार ! हज़ कर आये हैं, सो हाज़ी हैं.. पर ज़ेहादी नहीं हैं । चा – पानी की पूछ-ताछ दिल से हुयी  और वह जुगा़ड़ पक्का देख आश्वस्त हो  लिये, फिर बोले, ” और सुनाओ,, कुछ नया लिखा –ऊखा, या वही इन्टरनेट पर लिख रहे हो ? कुछ लिख रहे थे, ना ? और वह“ भउजी दर्शन को प्यासी अँखियाँ इधर उधर दौड़ा कर मेरे कंम्प्यूटर चेयर पर क़ाबिज़ हो लिये । सफ़ारी मिनिमाइज़्ड मोड में थे, एक चटका माउस का और चिट्ठाजगत का पन्ना स्क्रीन में से दीदे फाड़ फाड़ खाँ साहब को घूरने लगा । अज़हर मियाँ कौतूहल से आगे को झुक ज़ायज़ा लेने लगे, फिर अपने स्वभाव के विरूद्ध बिफ़र पड़े, “  अमाँ डाक्टर, यह क्या भँड़ैती है, तुम यही सब कर रहे हो ? तुम्हें और कोई चूतियापा नहीं मिला दुनिया में, फ़ालतू का टाइम-वेस्ट ? वह तो बेटा आज रंगे हाथ पकड़ लिया, तुम अपने लिटरेचर को क्या दे रहे हो, यह तो सोचो ? “ वह मेरे इतने अज़ीज़ हैं, इसलिये तारीफ़ न भी करते पर ऎसी असहमति भी क्या ? लिहाज़ा हिन्दी ब्लागिंग की ख़ातिर कुछ तो आहत होना ही पड़ा ! ईद के बाद मेरी क्लास फिर ली जायेगी, यह मुझे पता है । आहत हूँ… बोले तो.. .

लगभग इसी दौरान एक GhostBusterPhoto जी रूपी पुच्छल तारे का उदय हुआ । उनकी बेदुम बेसिर-पैर की जिन लोगों ने पढ़ी हो, वह मेरा विषय नहीं है, आप स्वयं ही बहुत कुछ जानते हैं । यदि ठीक से मौज़ लिये की मौज़ाँ ही मौज़ाँ लिये होंगे तो  ’ ये अंदर की बात है ’  का मर्म समझाने की आवश्यकता ही नहीं ! किन्तु मेरा केस  कुछ डिफ़ेरेन्ट है… वर्ज़नाओं को तोड़ना और गलत का विरोध  करना मेरा स्वभावगत दोष है, बस यूँ समझें कि जन्मजात मैन्यूफ़ैक्चरिंग डिफ़ेक्ट ! अब जो करना हो, करलो ! लेकिन गौर किया जाय कि मुझे तो इनका फोटो लगा कर संबोधित करना पड़ रहा है । धन्य हैं, जय हो.. इत्यादि इत्यादि इनके लिये, क्योंकि इन ज्ञानी GhostBusterPhoto जी के हलचल पैदा करके अपने को अमर कर लेने की सनक ने कुछ अधिक ही आहत किया, अब्भी अब्भी तो बताया था कि गैंडत्व अभी दूर की कौड़ी है ! क्योंकि यह तो मेरे पिछवाड़े की गली ही के निकले । धन्यवाद श्रीमती पुष्पा पांडेय, जिन्होंने अपने पद एवं तंत्र का उपयोग कर इनके नाम-पते को कालर पकड़  सामने ला खड़ा किया । कौन हैं, यह… जान कर हैरत होगी.. विचित्र किन्तु सत्य ? सच बड़ा ज़ालिम हुआ करता है, इस दुनिया में किसिम किसिम के लोग हैं । प्रणाम GhostBusterPhoto जी, एक दिन अचानक धमकूँगा, चाय पीने, दोहरा व्यक्तित्व या ’ स्प्लिट पर्सनालिटी ’  बड़ी कुत्ती चीज है, एक लाइलाज़ मनोरोग ! मुझे तरस आ रहा है, इन GhostBusterPhoto पर ! हलचल जो न करवा दे… इस वर्चुअल दुनिया में !  एक वर्चुअल चरित्र गढ़ने की फ़ैंटेसी बड़ी रोमांचक हो सकती है, इन GhostBusterPhoto जी के लिये .. पर इसके दुष्परिणाम बड़े भयावह हुआ करते हैं । सुना है, अवध के कोई नवाब ज़नाना कपड़े पहन के रंगरेलियाँ मनाया करते थे, नतीज़ा यह हुआ कि वतन गया फ़िरंगियों के पास ! आपको इतिहास से एलर्ज़ी है, क्योंकि यह आपको डराता है ! मुझे ऎसा कोई डर नहीं है ।

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मुझे तो एक मुहिम मिला था, वह पूरा हुआ समझो । इस बेगैरती में शायद न भी पड़ता किन्तु मुझे एक वक़्त की रोटी देने वाली पंडिताइन गश खा खा कर बेहाल थीं । इसको सामने लाओ.. देखें तो कि यह 75 किलो का औसत भारतीय कौन है ? कुछ पता तो चले कि यह नर हैं कि मादा… हिज़ड़ा कहीं का ! जरा देखो तो कैसे लिखा है… और अपनी लम्बाई बताने में हीन भावना से ग्रसित हो झूठ लिख गया है, सात पुश्तों का ज़नख़ा ! ओह्हः, इन स्त्रियों का क्वथनांक, ज़्वलनांक इतना कम क्यों हुआ करता है, रे विधाता ? पर एक बात ज़रूर है, तू चीज बड़ी है, मस्त मस्त !

अपने डाक्टर अनुराग जी चिट्ठाचर्चा पर टिप्पणी लिखते पाये गये, कि अब पोस्ट चढ़ाने से पहले सोचना पड़ता है । बस यही बात तुमको औरों से अलग करती है, अनुराग । तुम चमड़ी के उस पार देखने लगते हो ! जहाँ ठेलो-गुहार चल रही हो, तो ठेलने के उस पार मत देखो । लोग शौचते हैं, और तुम सोचते हो ! भला ब्लागिंग के लिये भी कोई सोचता है ? मेरे लिये यह नयी जानकारी है ।

देखो मुझे, बिना सोचे लिख रहा हूँ कि नहीं ? इसमें भी धुरंधरों को ज़लेबी इमरती दिख जाती है, तो मेरा अहोभाग्य ! भाषा पर कोई रोक टोक न लगा कर, खुद को.. खुद ही.. अपने अंदर की खुदखुद को परोसता हूँ, वह भी खुद्दारी के साथ खुद बन के ! इतना ही तो ?

भाई कुश सांप्रदायिक भाई गिरी से परीसान हैं, किंवा उन्होंने मेरी टिप्पणी पर ध्यान न दिया.. भाई यह फ़साद वहीं ख़त्म होगा, जहाँ से शुरु किया गया था । अब यदि मुसलमानों में पाकिस्तान ही ढूँढ़ा जाता रहा, तो उनको भारतीय बनने देने की राह का रोड़ा कौन है ?

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एक पोस्ट चढ़ाने का घणा ताव तो मुझे उसी दिन से था, जब अपने ताऊ की कविता पढ़ी । मैं भी लिक्खूँगा कविता… पर भाया मेरे, पूरे तीन दिन बरबाद हो गये, कविता निकल के ना दी ! कमरे में अँधेरा करके महसूस करने की कोशिश की, महसूस हुआ मच्छरों का दंश ! आकाश को निहारा किया.. मिला कऊव्वे की बीट ! तलईय्या किनारे बैठा.. दिखा तैरता सिवार ! सुंदरियों को निहारा.. तो सुना ’ नमस्ते अंकल ’ ! आम आदमी के दर्द को टटोला… और कविता हवा हो गयी ! 27 सितम्बर की डेडलाइन सिर पर, स्वपनिल जी से कविता उधार माँगने गया । बेचारे गदगद हो गये… हैरत से पूछा, नेट पर दिक्खेगा ? तो लीजिये यह ताज़ा माल.. कल रात ही इसका प्रसव हुआ है, और वह सस्वर प्रसवपीड़ा से सड़क पर ही चीत्कारने लगे । दईय्या रे, मैं भाग खड़ा हुआ, ज़ूते पड़ जाते !

एक टूटी फूटी कविता हाथ लगी, इसी से काम चलाइये..

ब्लागरों के इस ज़मात में
रोज सुबह उगता कोहराम है
वह रोज आधीरात
फ़ाँसी के तख़्ते से वापस आता है
सुबह फिर चढ़ जाता है

यह उपक्रम तब से जारी है
जब से कुछ ब्लागर बैलों ने
संवेदनाओं और वास्तविकता का जुआ अपने कंधे पर रखा है
शायद जीतना चाहते हैं
ईमानदार लेखन का ख़िताब

टिप्पणीकारों से पूछा भाई
इसका कसूर क्या है
रोज फाँसी के तख़्ते पर
क्यों लाया जाता है ?
ज़वाब में वो भुन्न से बुदबुदाये

यह अपनी कलम से
उनकी हत्या क्यों करता है
जो झूठ व नफ़रत के खिलाफ़
बोलने वालों का मुँह सीना चाहते है
यह तो बुद्धिजीवी कहलाता है
फिर भी क्यों न समझता
लिखो और लिखने दो का रिश्ता


अरे, कितनी देर से क्या लिखे डाल रहे हो ? यह पंडिताइन हैं कि विक्रम की बैताल ? ( इनको सहकच्छाधर्मिणी कहें, तो चलेगा ? )बस फ़िनिशिंग मार दूँ । समझती नहीं है, मासिक स्राव पर भी रोक है, क्या ?  कुल निष्कर्ष ई बा मरदे जी कि हम्मैं अपने सुहाग की कोनौ चिन्ता नाहीं, जेहिका होखे ऊ करै । हिंयाँ त भतरा के लइनिया लागल हौ, मोहब्बत चाही.. त तुहौ मोहब्बतै देबा नू ? वरना हम तो भाई हमहिं हैं, अउर हमने कसम खा रखी है कि… हम न सुधरेंगे । आप टिप्पणी न करने लिये स्वतंत्र हैं, कोई वांदा नहीं ! टिप्पणी-ऊप्पणी राय विचार कर दीजियेगा कि इसका बी.आर.पी. केतना बढ़ाना है ! बोलिये,  जय हिन्द और सरकिये अगले पन्ने पर !

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18 August 2008

मुझे इतना ज़लील भी न करो.. बेटों

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अरे यह शीर्षक कैसे चला गया ? यह तो मैंने सहेज़ कर किसी और पोस्ट के लिये रख छोड़ा था । चलिये.. भगवान की मर्ज़ी या मेरे अवचेतन का चोर ! बचपन से घुट्टी पिलायी गयी है.. जो होता है, अच्छे के लिये ही होता है । सो, इसी को चलने देते हैं !

लोगों के मेल आ रहे हैं, सक्रिय नहीं हूँ । तो, भाई क्या करें ? मुलुक की सक्रियता तो दूसरे पाले में बैठी ठेंगा दिखा रही है । तो हम उसके अपने पाले में आने का इंतज़ार ही तो कर सकते हैं ? सो विकास के प्लेटफ़ार्म पर टहलते हुये देख कर भी, यदि मैं आपको निष्क्रिय लगता हूँ, तो लगा करे ! अरे कुछ नहीं तो, इस वेबपेज़ को ही निरख लीजिये, भाई..कितने ईंट रोड़े बटोरे हैं !

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सोचा कि पन्दरहा अगस्त पर कुछ लिखूँ, अच्छा अवसर है.. देश के लिये, भारत माता की लुटती अस्मिता पर चिन्ता जताने वालों में अपना भी नाम दर्ज़ करा लूँ, लेकिन… ? यही तो मेरी तक़लीफ़ है कि सोचता ही सोचता हूँ, करता कुछ भी नहीं । चाय पी कर चायवाले को पैसे देने में जितना भी समय लगता है, उसका सदुपयोग सोचने में ही करता हूँ ! यह कोई कम है, क्या ? सोच लेता हूँ.. वह भी आलू, टमाटर, बैंगन, करेले के भाव पर नहीं, बल्कि देस-मुलुक के हालत पर.. यही क्या कम है ? वरना यहाँ तो 88 फ़ीसदी पब्लिक तो सोचने लायक भी न रही । अपने को ज़िन्दा रखने की, होः तूऽऽ तू.. चल्हः कबड्डी कबड्डी कबडी कबडी कबडि कबडि बडि बडि बड्डिः बड्डिहः हः हः …में हाँफ कर जैसे तैसे साँझ ढले अपने पाले में लौट गुईंया संग लेट लेते हैं । सो, सोचने का चारज़ आजकल हमईं लोगन के पास है, उनके बिहाफ़ पर सोच लेते हैं, चिन्तित हो लेते हैं । और क्या चाहिये ?

पंडिताइन थोड़ी चिन्तित भाव से पूछती हैं, “ ऎई, कुछ लिखोगे नहीं.. देखना सबलोग पंद्रह अगस्त पर कितना लेख-ऊख लिखेंगे, और तुम रोज़ खटर पटर करते रहते हो.. यह नहीं कि कुछ लिख ही डालो । अब नाटकीय हुये बगैर, मेरी गुज़र नहीं.. सो, जो आज्ञा, चोखेरवाली-सखी ! फिर भी मैं अपना झोला-पिटारी टटोलता हूँ, कि शायद कुछ आफ़-बीट हाथ ही लग जाये ? देखते हैं !

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वह चीख उठी, “ पवित्र-पावन पर्व पर.. मुर्दाबाद ? हे भगवान, इस आदमी को हो क्या गया है ? “ क्या बवाल है, भाई.. मेहरिया से दोस्ती, समझो जी का ज़ंज़ाल ! ऎ भाई, बोलना मत बीच में, पूरा नहीं हुआ है, दूसर के लुगाई से दोस्ती, समझो आँधी भूचाल ! सोचा, थोड़ा खीझने की होती है, “बोला था न कि, हमरे बिलागींग को न भड़काओ.. अरे मनगढ़ंत फोटू थोड़े ही है, यह ? न ही ‘पाकिस्तान से आयी है’ का डिस्क्लेमर लगाया है । यह तो ख़ालिस अपने देश की छाती चीर कर चलती हुयी भारत की जीवनरेखा जी.टी. रोड पर ली गयी है ।  अरे यार.. वही जी.टी.रोड जो शेरशाह सूरी बनवा कर, हमारी गौरमिन्ट के लिये सिरदर्द छोड़ गया, जो इसके रखरखाव में ही काँख रही है । यह हमारे मुलुक की अर्थव्यवस्था का अनर्थ करने का अंतर्राष्ट्रीय षड़यंत्र करार दिया जाता, अंग्रेज़ इस रास्ते से सोना ढो कर ले गये, वो अलग ! उस ज़माने में सी.आई.ए. या आई.एस.आई. न होने का अफ़सोस भला किस पार्टी को न होगा । ई बिलागींग बड़ी बेलाग चीज़ होती है, यारों.. बेलाग = बेलागिंग = बेलगाम ~~.आगिंग !

सो हम बेलगाम हुई गये थे । तोऽ.. फोटो खींचा गया, मुनमुन  ( मेरी बेटी ) के कोडक हाटशाट से । ना, ना.. हाटशाट की वजह से यह हाट नहीं है, न ही कोडरमा के पास के गाँव के मंदिर की दीवार पर उकेरे जाने से, और ई मुर्दाबाद – ज़िन्दाबाद तो भाई गाँधी-ज़िन्ना की विरासत है, सो हमलोग इसको आगे नहीं बढ़ायेंगे, तो क्या हमारी आईपाड  पीढ़ी इसको संभालेगी ? उसने तो एक आसान रास्ता खोज निकाला है, जो अच्छा न लगे.. असहमत हो.. ज़्यादती हो गयी…  पेरेन्ट आउटडेटेड हैं…  बस, शिटशिटा के विरोध कर दो..ओहः शिट यार ! इतिश्री, और  सुनाओ ! सुनायें क्या, कद्दू ? आज तो जैसे इस कीबोर्ड से शिट ही निकल रहा है !

तो, मित्रों.. मैंने जानबूझ कर इस भित्तिलेख के मज़मून को धुँधला कर दिया है, क्योंकि यह हमारी व्यवस्था के शिट को दिखाय रहा है, सामाजिक न्याय माँग रहा है, माल पेलते नेतृत्व से ज़वाब तलब कर रहा है..काहे भाई, ई तो पन्द्राह अगस्त का 61वाँ है !

ई तो राधिका परसाद मास्साब रटा गये थे कि 14 के बाद 15 ही आता है । अब देखिये, कि 14 को एक देश आज़ाद हुआ, पता नहीं, अंगेज़ से कि हिन्दुस्तान से ? लेकिन ऊहाँ राजगद्दी हुई गयी, सो बाकी बचा भी स्वतंत्र घोषित किया गया.. औ’ विश्व में देखा गया एक अद्भुत व्यायाम.. नायक बोला – प्रसन्नचित्त… जनता झूमी – अहा हा हा हा , प्रसन्नचित्त…  अहा हा हा हा ! तिस पर भी आप सब 15 अगस्त पर ईहाँ अच्छा ख़ासा रो गा गये ! जाओ.. देखो जाके, अगड़म-बगड़म पुराण में लिक्खा भया है.. मौत औ’ मार्केटिंग से कोई सयाना भी नहीं बच सकता, तो हम ही काहे को इससे बचने का कलंक लें ? तब के गद्दीनशी़नी की मार्केटिंग  आज तलक चल रही है, सत्ता  एक ऎसा ही अनोखा ब्रांड है, यारों ! 15 अगस्त.. अहा हा हा हा, स्वतंत्र हो..अहा हा हा हा

दोस्त लोग इस मुबारक मौके पर बिसूर रहे हैं, यह उनकी सोच और किस्मत । मैं तो अपने ‘ अहा हा हा हा ‘ के साथ रात के अँधेरे में, चुपके से सुतंत्र भारत माई के पास पहुँचा कि जन्मदिन की बधाई दे आऊँ । हे राम, यह क्या ? वहाँ सचिवालय पर तो जगमग रोशनी और यहाँ टिमटिमाते ढिबरी का अतिमंद प्रकाश ! माई पड़ी कराह रही थीं.. चौंका..”माई क्या हो गया ? “ माई ने मुँह ढके ढके उत्तर दिया, “ पता नहीं, बेटा.. बहुत दर्द  हो रहा है । “ अरे कहाँ दर्द हो रहा है, यह तो बताओ ? माई तो उल्टे तैश खा गयीं, खीझ कर बोलीं “ कहाँ कहाँ बताऊँ ? सिर से पैर.. कश्मीर से कन्याकुमारी तक की रग रग दुख रही है । “ फिर अचानक उनके अंदर की माँ चैतन्य हो गयीं, संभल कर उठने का प्रयास करते हुये प्रतिप्रश्न किया “ और बता.. लड्डू वड्डू खाये कि नहीं ? अरे पगले मेरी सुध काहे ले रहा है ? जब से बहाल हुयी हूँ, सब मेरा डिमोशन दर डिमोशन ही तो करते आ रहे हैं । चलो, अपने ही बच्चे तो हैं.. मेरा क्या ? मेरी तो बहाली के 61 पूरे हो गये.. बीमार भी चल रही हूँ…  मुझ बीमार को अब और इतना ज़लील भी न करो, बस  62 में मेरी बची खुची इज़्ज़त के साथ मुझे रिटायर करवा दो ,और अब नूतन माई लाने की जुगत करो,मेरे बेटों ! उनको मुझ लाचार को एक्सटेंसन में मत घसीटने देना । जाओ.. मेरी तरफ़ से  सबको बोलना जय हिन्द !

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ladywinks कहीं कुछ गलत तो नहीं लिख गया ? ढेर सारे स्वर उठे हैं कि मैं तंज़ में लिखता हूँ । क्या ऎसा है ? तो, होने दीजिये कौन मैं रोज़ रोज़ लिख ही पाता हूँ ? आज यथार्थ और व्यंग दोनों इस कदर घुलमिल गये हैं कि उनको अलग करके लिख पाने की विद्वता मुझमें तो नहीं है । ज़बरन आप सब के बीच में घुस जाने से ही क्या होता है ? आप सहनशील देश के नागरिक हैं, सो मुझे भी सह लीजिये । रख़्शंदा को इस तंज़ से तंज़ीदगी है.. तो रख़्शंदा, तुम्हें मालूम हो कि मैं तंज़ानिया के पासपोर्ट पर इस मुलुक में रह रहा हूँ । अब मेरा पासपोर्ट तो बदलने से रहा, भले ही किसी दिन एक्सपायर हो जाये.. वह अलग बात है, देखेंगे ! 

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यह अपना हिन्दी ब्लागजगत, जहाँ थोड़ा बहुत आपसी विवाद चलता ही है, बुद्धिजीवियों का वैचारिक मतभेद !

शुक्र है कि, सैद्धान्तिक सहमति अविष्कृत हो जाते हैं, और यह ज़्यादा नहीं टिकता, छोड़िये यह सब, आगे बढ़ते रहिये !

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