जो इन्सानों पर गुज़रती है ज़िन्दगी के इन्तिख़ाबों में / पढ़ पाने की कोशिश जो नहीं लिक्खा चँद किताबों में / दर्ज़ हुआ करें अल्फ़ाज़ इन पन्नों पर खौफ़नाक सही / इन शातिर फ़रेब के रवायतों का  बोलबाला सही / आओ, चले चलो जहाँ तक रोशनी मालूम होती है ! चलो, चले चलो जहाँ तक..

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28 September 2009

क़न्फ़्यूज़ियाई पोस्ट - हमका न देहौ, तऽ थरिया उल्टाइन देब

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मसल है...
खाय न देब तऽ थरिया उल्टाइन देब

अर्थात, हे पाठकों
यदि मुझे अपनी मर्ज़ी अनुसार पसँद नहीं मिलेगी,
तो मैं परसी हुई पूरी थाली उल्टा तो सकता ही हूँ !

खेद तो यह है कि, यह सब देखते देखते हो गया, जब  मैं  ब्लागवाणी  खोल  कर टिप्पणी के लिये पोस्ट चुन रहा था ।
रात्रि के 11.37 पर पेज़ रिफ़्रेश करने को F5 दबाया और आईला ’ रुकावट के लिये खेद है ’ जैसा ब्लागवाणी का पन्ना चमकने लगा । अफ़सोस दिल गड्ढे में जा गिरा । कीबोर्डवा से फौरन F5 नोंच कर फेंक दिया, ससुरी यही है, झगड़े की जड़ !  Freedom at Midnight पढ़ने में मन लगाना चाहा, देसी रियासत रज़वाड़ों की खुदगर्ज़ी के किस्से पढ़ कर अपनी कौम पर गर्व हो आया, लगा कि हम उनसे किसी मायने में अलग नहीं हैं । आख़िर अपने ब्लाग का मालिकाना हक़ है, हमरे पास..  जुगाड़ से चार ठो चारण भी जुटा लिये हैं । अयहय, अब कोई यह तो कहेगा कि ’ अलि कली सों बिन्ध्यौं, अब आगे कौन हवाल ! “ अउर हवाल यह कि अपने हाथन कली नोंच कर फेंक दिया । पाठकों के पसँद नापसँद को लेकर ऎसी सजगता, और कहाँ ? आख़िर कीबोर्ड के वाज़िद अली शाह हैं हम !

blogvani 
सिरफिरा था भगत सिंह जो कल अपने जन्म दिन पर अपने वतन में याद तक न किया गया । वयम पोस्ट लिखित्वा ब्लाग वाः साहित्यवाः के फेर में चिन्तामग्न साहित्यलॉग कर्मी दुष्यँत  कुमार की बरसी पर किसीको याद भी न आये | या तो स्मृति समारोह में जाने को पहनने को कमीज़ उठायी होगी, और लेयो थमक गये, “  हँय मेरी कमीज़ उसकी कमीज़ से मैली क्यों ? मेरे अद्वितीय पोस्ट की पसँद उसके सड़े पोस्ट से निचली क्यों ? “ लिहाज़ा  धप्प से बईठ गये, उनके शून्य विचार में बस यही आया होगा कि, " चलो आज एक धत्त तेरी की – हत्त तेरी की पोस्ट लिखी जाय, यह नूतन विधा है, मैथिली बाज़ार बड़े शवाब पर है ,थोड़ी भगदड़ सही !  ऎसे कुविचार ब्लागलेखन के अनिवार्य तत्व हैं, यह सब अनाप शनाप सोच नींद को अपने पैर जमाने से रोक रही थीं । एम.पी.थ्री प्लेयर का हेडफोन कान से लगा लिया,  धीरे से आजा री निंदिया अँखिंयों में निंदिया आजा री आजा !

अयईयो ये किया गडबड जे.. श्रीधर सुनिधि की जोड़ी हेडफोन में घुस कर चिढ़ाने लगीं । इनको कैसे पता चला कि, ब्लागवाणी ने रुसवाई चुन ली है ? चाहें तो आप ही लपक लें, वाह क्या स्क्रिप्ट बन पड़ी है, " ब्लाग आज कल ! "

चोर बाजारी दो नैनों की,
पहले थी आदत जो हट गयी,
प्यार की जो तेरी मेरी,
उम्र आई थी वो कट गयी,
दुनिया की तो फ़िक्र कहाँ थी,
तेरी भी अब चिंता मिट गयी...

तू भी तू है मैं भी मैं हूँ
दुनिया सारी देख उलट गयी,
तू न जाने मैं न जानूं,
कैसे सारी बात पलट गयी,
घटनी ही थी ये भी घटना,
घटते घटते ये भी घट गयी...

चोर बाजारी...
तारीफ तेरी करना, तुझे खोने से डरना ,
हाँ भूल गया अब तुझपे दिन में चार दफा मरना...
प्यार खुमारी उतारी सारी,
बातों की बदली भी छट गयी,
हम से मैं पे आये ऐसे,
मुझको तो मैं ही मैं जच गयी...
एक हुए थे दो से दोनों,
दोनों की अब राहें पट गयी...

अब कोई फ़िक्र नहीं, गम का भी जिक्र नहीं,
हाँ होता हूँ मैं जिस रस्ते पे आये ख़ुशी वहीँ...
आज़ाद हूँ मैं तुझसे, अज़स्द है तू मुझसे,
हाँ जो जी चाहे जैसे चाहे करले आज यहीं...
लाज शर्म की छोटी मोटी,
जो थी डोरी वो भी कट गयी
,
चौक चौबारे, गली मौहल्ले,
खोल के मैं सारे घूंघट गयी...
तू न बदली मैं न बदला ,
दिल्ली सारी देख बदल गयी...
एक घूँट में दुनिया सारी,
की भी सारी समझ निकल गयी,
रंग बिरंगा पानी पीके,
सीधी साधी कुडी बिगड़ गयी...
देख के मुझको हँसता गाता,
जल गयी ये दुनिया जल गयी....

वईसे विजयादशमी शुभकामनाओं की तो होती ही है, इसे चाहे जिस रूप में ग्रहण करें, मर्ज़ी आपकी

vvvvvv

ताज़ा अपडेट

ब्लागवाणी का यह निर्णय किन्हीं निहित तत्वों के मँसूबों को फलीभूत कर रहा है,
बल्कि होना तो यह चाहिये था कि, इनकी अवहेलना कर इस पर तुषारापात किया जाये,
ऎसा तभी सँभव है, यदि यह टीम अपने फैसले पर पुनर्विचार कर कुछ कड़े तेवर के साथ प्रकट हो ।

बल्कि होना तो यह चाहिये कि अभी कुछ दिनों तक त्राहि त्राहि मचने दें,
जिसके लेखन में दम हो वह अपनी पोस्ट अपने कलम और सम्पर्क के बूते औरों को पढ़वा ले ।

एक मज़ेदार तथ्य यह कि, मैं मूरख से ज्ञानी जी की पोस्ट पर ब्लागवाणी के जरिये ही पहुँचा,
उत्सुकता केवल इतनी थी कि, कल सर्वाधिक पसँद प्राप्त पोस्ट में आख़िर क्या है
!

मज़बूरी में, चलिये यही गाते हैं

तारीफ तेरी करना, तुझे खोने से डरना ,
हाँ भूल गया अब तुझपे दिन में चार दफा मरना...
प्यार खुमारी उतारी सारी,
बातों की बदली भी छट गयी,
 

इससे आगे

16 August 2009

ज़ाकिर भाई.. ओ ज़ाकिर भाई !

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ज़ाकिर भाई, आपकी पोस्ट देर से देख पाया । सटीक प्रश्न उठाया है, आपने । और मैं आपकी बेबाक दृष्टि का कायल भी हूँ ।  पहले तो मैं स्पष्ट कर दूँ कि, मैं आस्थावान सनातनी हिन्दू हूँ । बहुत सारे वितँडता और प्रत्यक्ष , अप्रत्यक्ष अनुभवों के बाद मैंने पूजा करना छोड़ दिया है । इस पर एक पोस्ट लिखने की इच्छा भी है, पर समय और विषयवस्तु में सँतुलन नहीं बन पा रहा है ।

1 आपकी पोस्ट में गायत्री मँत्र का जो अर्थ दिया है, वह वास्तव में इसका अनर्थ है ।
प्रचोदयात वैदिक सँस्कृत की धातु है, जिसका तात्पर्य " हमें अग्रसर करें.. हमें उत्प्रेरित करें " से समझा जा सकता है ।
बहुत सारे पौराणिक मँत्रों में " भविष्यति न सँशयः " लगा रहता है । यह भी एक प्रकार की साँत्वना या स्व-आश्वस्ति है 

 2 किसी भी पूजा या इबादत की पहली शर्त है, अपने को समर्पित कर दो.. जो भी उपास्य है उसमें लीन हो जाओ ।
यह आपको सेमी-हिप्नोसिस या सम्मोहन की स्थिति में ले जाती है तत्पश्चात निरँतर एक ही मँत्र का जाप अपने आपमें आटो सज़ेशन है । ऎसा होगा .. ऎसा होगा.. ऎसा ही हो ऎसा ही हो.. आख़िर क्या है ? इन मँत्रों का एक निश्चित सँख्या में दोहराये जाना आपके एकाग्रता और लगन और धैय की परीक्षा है । ऎसी प्रक्रियाओं को एक निश्चित समय पर ही किये जाने का तात्पर्य दिनचर्या को अनुशासित करने से अधिक कुछ और नहीं !
इन प्रक्रियाओं को नियम सँयम और निषेध से बाँधना भी यही दर्शाता है ।

3 प्रारँभिक वैदिक मँत्र पूर्णतया प्राकृतिक तत्वों में निहित अतुल शक्तियों को समर्पित हैं । ऋग्वेद इसका उदाहरण है । मानवीय विस्मय से उपजा आज भी अपने अर्थ में उतना ही सार्थक है, जितना  पहली  बार  उच्चरित  होने  पर  रहा होगा । इस्लाम में भी اَلم  अलिफ़ लाम मीम को कोई समझा नहीं पाता ।

4 मनुष्य जब भी हारा है, प्रकृति से ही हारा है । चाहे वह रोग आपदा महामारी बाढ़ सूखा भूकम्प चक्रवात ही क्यों न हो ? प्रकृति अपने नियमों की अवहेलना सहन नहीं करती । आदिम सभ्यता ने  प्रकृति के ऎसे प्रकोप को शैतानी शक्तियों में मूर्त कर लिया । यही कारण है कि, हर धर्म में एक नकारात्मक तत्व शैतान राक्षस और भी न जाने क्या क्या हैं । हर्ष विषाद विस्मय जैसी मूल मानवीय भावनाओं में आत्म रक्षात्मक डर सदैव भारी पड़ा है । एक नवजात शिशु को थप्पड़ दिखाइये, यह प्रत्यक्ष हो जायेगा ।

5  मँत्रों की शक्ति पर  किसी को निर्भर बना देना, डर की भावना का दोहन है, साथ ही मनुष्य की महत्वाकाँक्षाओं का पोषण भी ! इनको पालन करनें में एक आम आदमी अपने असमर्थ पाता है, तो ज़ाहिर है बिचौलिये पनपेंगे और डरा डरा कर पैसा वसूलेंगे । यही हो भी रहा है । तक़लीफ़ यह है कि, ऎसे तत्व सत्ता के ड्योढ़ी के चौकीदार बहुत पहले ही बन गये थे । चाहे वह सम्राट अशोक के अश्वमेध यज्ञ के घोड़े हों, या अडवानी के रथ में जलने वाला डीज़ल !  ख़ून तो आम आदमी का ही जाया होता आया है ।

6 एक बात जो रही जा रही थी, वह यह कि वैदिक मँत्रों के उच्चारण में आरोह अवरोह और शब्दों का बिलँबित लोप का उपयोग, ध्वनिविज्ञान के नियमों द्वारा आपकी मनोस्थिति को प्रभावित करती है, सकारात्मक प्रेरणा देती है, यह सर्वमान्य सत्य है । इसमें कोई सँशय नहीं !

7 अँतिम बिन्दु पर मैं यह कहूँगा कि, जिस तरह मुल्लाओं का इस्लाम अल्लाह के इस्लाम पर भारी पड़ने लगा । उसी तरह कर्मकाँडी सँस्कारों ने निःष्कलुष सनातनी हिन्दू मान्यताओं को दूषित कर दिया है । हम प्रतीकों के प्रति उन्मादी हो गये हैं, और मूल्यों के प्रति उदासीन ! आस्था में तर्क का स्थान नहीं है, यह डिस्क्लेमर भी तभी लागू हो पाया । शुक्र है, कि मनुष्य के विवेक को उन्होंने नहीं लपेटा, वह तो हम इस्तेमाल कर ही सकते हैं । आइये इन बहसों को छोड़ कर हम वही करें, जो सहअस्तित्व का विवेक कहता है  । इसका मज़हब याकि किसी ख़ास धर्म से क्या लेना देना ?

चूँकि आपका टिप्पणी बक्सा ज़ियोटूलबार कि वज़ह से दगा दे रहा है, यह स्वतःस्फ़ूर्त असँदर्भित त्वरित टिप्पणी यहीं दे दे रहा हूँ । यदि चाहेंगे तो सँदर्भ भी प्रस्तुत किये जा सकते हैं । अन्यथा न लें , अल्लाह हाफ़िज़ ! 

इससे आगे

22 July 2009

पता नहीं क्यों ?

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लगता है, आजकल मैं निष्क्रीय हूँ... पूरी तौर पर तो नहीं, कम ब कम ब्लागर पर निष्क्रीय तो हूँ ही.. पता नहीं क्यों ? इस पता नहीं क्यों का ज़वाब तलब करियेगा, तो टके भाव वह भी यही होगा कि, " पता नहीं क्यों ? " यह पता नहीं क्यों हमेशा एक नामालूम सी कशिश भी लिये रहता है, लगता है कि कहीं कोई जड़ता मुझे जकड़ रही है, जकड़ती जा रही है.. पर आप हैं कि, अपने पर हज़ार लानतें भेजते हुये भी, खामोशी से इस निष्क्रियता को समर्पित रहते हैं, पता नहीं क्यों ? मुआ पता नहीं क्यों न हुआ कि इब्तिदा ए इश्क हो गया । है न अनुराग ?

Letter-
अबे पहले तय कर ले, ब्लाग लिखने आया है कि साहित्य रचने ? " यह कोई और नहीं, अपने निट्ठल्ले सनम जी हैं, अँतर से ललकार रहे हैं । कनपुरिया प्रवास के बाद साढ़े तीन दशक से साथ लगे हैं । जब तब मुझे ललकार कर चुप बैठ जाते हैं, गोया पँगे करवाना और उसमें मौज़ लेना ही इनका शगल हो । इनको डपट देता हूँ, ऒऎ खोत्या वेखदा नीं कि असीं लिख रैयाँ, बस्स ।

माफ़ करना मित्रों, यह इसी टाइप की भाषा समझते हैं, आप तो जानते ही हैं कि, फ़ैशन की तरह ही ब्लागिंग और ब्लागर की तरह फ़ैशन कितनी तेजी से बढ़ रहे हैं ? नित नये प्रयोग !

सो ब्लागिंग के इस दौर में साहित्य की गारँटी ना बाबा ना ! मौज़ूदा दौर तो जैसे गुज़रे ज़माने का बेल बाटम है.. कल यह रहे ना रहे.. पर हम तो रहेंगे, और.. जब रहेंगे तो कुछ ओढ़ेंगे बिछायेंगे भी ! आने वाला कल साहित्य का कोई धोबी जिसकी भी तकिया चादर गिन ले, उसकी मर्ज़ी ! जैसे यहाँ लाबीइँग में वक्त जाया कर रहे हैं, समय आने पर वहाँ सार्थक कर लेंगे ।

अभी से लाइन में लगने की भगदड़ काहे ? चोट-फाट लग जाये तो इससे भी जाते रहोगे । लाइन में लगने की क्या जल्दी थी.. जवाब मिलेगा, " पता नहीं क्यों ? इधर कोई ग्राहक नहीं आ रहा था, तो सोचा खाली बैठने से अच्छा कि अपना ही बँटखरा तौलवा लें, कहीं बाँट में ही तो बट्टा नहीं ?.. ससुर उहाँ भी लाइन लगी थी, घुसे नहीं पाये इत्ती भीड़ रही, पता नहीं क्यों ? “

निट्ठल्ला उवाच : कोई यह न कह दे, " पता नहीं क्यों, ई उलूकावतार इत्ती रतिया में का अलाय बलाय बकवाद टिपटिपाय गये ? याकि ससुर छायावाद की मवाद ठेल गये .. सीधे सुर्रा मूड़े के उप्पर से निकर गवा ! "

तो भईया ई डिस्क्लेमर-वाद है, अर्थ और ही और ! चित्त गिरो या पट्ट.. बाई आर्डर दुईनों एलाउड !

निट्ठल्ला उवाच : इसका भेद हम बताता हूँ, यह कँट्रोल पैनल के पुराने पोस्ट खँगाल रहा था.. इतने दिमागदार नहीं हैं, सो एक घँटे बाद से ही इनका सिर भारी होने लगा और एक घँटा पच्चीस मिनट बाद समझदानी के आउटर पर इँज़नवाँ फ़ेल ! " फिर भेजा इनको कि जायके आज की चिट्ठाचर्चा पढ़ा, सो गये बिचरऊ । बढ़िया है.. विवेक बाबू, बढ़िया है.. बोलि के लौट आये । टिप्पणी न दी, ज़रूरी भी न रहा होगा । कल बछड़ों के दाँत गिनना है, यही सब बतियाते भये खाना खाइन । "

आम खाओगे ? " पँडिताइन जी पूछिन.. " नहीं ! " मुला मुँह से बोले नहीं, मूड़ हिलाय दिहिन, बड़बड़ लगाय रहे आम खाऊँगा तो गुठलियाँ भी देखनी पड़ेंगी । पेड़ कौन गिनेगा, पर गुठली ?

मेरा प्रतिवाद : " चुप्पबे, खुद मेरा ही मन न था... आम जो है.. वह एक मीठा फल होता है ! "

अब ? कुछ ही पन्ने बच रहे थे.. सो, नँदीग्राम डायरी लेकर बैठा और दो सफ़े बाद ही कुछ लाइनें ऎसी मिली कि, अपने आपसे घृणा के प्रयोग करने लग पड़ा । आपको भी बताऊँ ?

लेकिन पहले श्री पुष्पराज जी से क्षमा माँग लूँ । क्योंकि मैं उनकी लिखी कुछ ही लाइनें शब्दालोप के साथ उद्धरित कर रहा हूँ .. " हमें नई बात समझ में आयी कि, जो (............) कहलाने के प्रचार से घृणा नहीं करते थे, वे ही (........ ) होने के प्रचार से आपसे घृणा कर रहे हैं । घृणा की यह चेतना जब ख़त्म हो जायेगी कौन किसके क्या होने से दुःखी होगा ? हम उनके कृत्तज्ञ हैं, जो हमारी चूकों पर नज़र रखते हैं और तत्काल घृणा करना भी जानते हैं । आपकी घृणा ने ही हमें शनैः शनैः इंसानियत की तमीज़ सिखायी है ! "

निट्ठल्ला : आप ई सब काहे लिख रहे हैं, जी ?

भईय्या, भाई जी, मेरे दद्दू.. अपनी सुविधानुसार, आप ही रिक्त स्थानों में ब्लागर और साहित्यकार भर कर देखो न । जो निष्कर्ष निकासो, तनि हमहूँ का बताओ । इतने दिमागदार नहीं हैं, सो इत्ती टिपटिपाई में ही मूड़ भारी हुई रहा है । तो अपुन चलें ? घृणा के साथ मेरे प्रयोग अभी कुछ बाकी रह गये है, फ़िलवक्त तो आप हमें निष्क्रीय ही समझो ।
" पावस देखि ’रहीम’ मन कोयल साधे मौन ।
जित दादुर वक्ता भये इनको पूछत कौन ॥ "

इससे आगे

27 May 2009

नँगे सच में नहायी बहना

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देख भाया, मेरी गलती नहीं हैं । आजकल हाल है कि, ’ जाते थे जापान .. पहुँच गये चीन समझ लेना ’ तो पढ़ा ही होगा । अपनी प्रतिष्ठा के प्रतिकूल एक मिन्नी सी,  सौम्य.. लजायी हुई पोस्ट देकर अपने जीवित होने की गवाही देनी पड़ी । बताइये भला.. मेरी एक चिरसँचित इच्छा पूरी हुई,  दादा विनायक सेन रिहा हुये,  और  मैं  ब्लागर होकर  भी  अपनी खुशी की चीख-पुकार खुल कर न मचा सका । बिजली की आवाज़ाही, अफ़सरों का विदाई और स्वागत समारोह एटसेट्रा करीने से एक पोस्ट भी न लिखने दे रहा है !कुश जी,  अब तुम न कह देना, कि पहले ही कौन सा करीने से लिखा करते थे । मुझे यूँ छेड़ा ना करो, मैं ठहरा  रिटायर्ड नम्बर !

भूमिका इस करके बन रही है कि, आज बड़ी जोर की ठेलास लगी है.. और बुढ़ाई हुई बिजली नयी माशूका की तरियों कब दगा दे जाये कि अपुन कोई रिक्स लेने का नहीं ! लिहाज़ा, आज अपनी एक पुरानी वाली को ही ठेल-ठाल कर सँतोष किये लेते हैं,का करें ?

अप्रैल 2008, एक नया राष्ट्रीय मुद्दा उठा रहा, कि युवराज राहुल विदेशी साबुन से नहाते हैं : और समय का फेर देखो कि पट्ठा खुदै धूल फ़ाँक के सबैका धूल चटाय दिहिस । हमरी हिरोईन तिलक तलवार तराज़ू के तिपहिये पर दिल्ली कूच करते करते रह गयीं !

पहले तो यह बतायें कि इस पोस्ट का उचित शीर्षक क्या होना चाहिये था , नंगे सच की माया या  माया का नंगा सच ? जो भी हो, आपके दिये शीर्षक में एकठो नंगा अवश्य होना चाहिये, वरना आपको भी मज़ा नहीं आयेगा ! वैसे राजनीति पर कुछ कहने से मैं बचता हूँ । एक बार संविद वाले चौधरी के बहकावे में, मै ' अंग्रेज़ी हटाओ ' में कूद पड़ा था, अज़ब थ्रिल था, काले से साइनबोर्ड पोतने का ! लेकिन इस बात पर, मेरे बाबा ने अपने  इस चहेते पोते को धुन दिया था, पूरे समय उनके मुँह से इतना ही निकलता था, "भले खानदान के लड़के का बेट्चो ( किसी विशेष संबोधन का संक्षिप्त उच्चारण, जो तब मुझे मालूम भी न था ) पालिटिक्स  से  क्या मतलब ? " यह दूसरी बार पिटने का सौभाग्य था, पहली बार तो अपने नाम के पीछे लगे श्रीवास्तव जी  से पिंड छुड़ाने पर ( वह कहानी, फिर कभी ) तोड़ा गया था । खैर....

आज़ तो सुबह से माथा सनसना रहा है, लगा कि बिना एक पोस्ट  ठेले काम नहीं चलेगा, सो ज़ल्दी से फ़ारिग हो कर ( अपने काम से ) यहाँ पहुँच गया.. पोस्ट लिखने । पीछा करते हुये पंडिताइन  भी  आ  धमकीं, हाथ में छाछ का एक बड़ा गिलास ( मेरी दोपहर की खोराकी का लँच ! ) ,तनिक व्यंग से मुस्कुराईं, " फिर यहाँऽ ऽ , जहाँ कोई आता जाता नहीं ? " इनका मतबल शायद पाठक सँख्या  से  ही  रहा होगा । बेइज़्ज़त कर लो भाई, अब क्या ज़वाब दूँ मैं तुम्हारे सवाल का ? अब थोड़ी थोड़ी ब्लागर बेशर्मी मुझमें भी आती जारही है, पाठकों का अकाल है, तो हुआ करे ! ज़ब भगवान ने ब्लागर पैदा किया है, तो पाठक भी वही देगा , तुमसे मतलब ?  आज़ तो लिख ही लेने दो कि..

सुश्री मायावती, नेहरू गाँधी के बाथरूम में साबुन निहारती मिलीं, किस हाल में मिली होंगी  यह न पूछो ! कभी कभी यह पंडिताइन बहुत तल्ख़ हो जाती हैं,' जूता खाओगे, पागल आदमी !' और यहाँ से टल लीं । मुझको राहुल बेटवा या मायावती बहन से क्या लेना देना, लेकिन यह लोकतंत्र का तीसरा खंबा मायावती की मायावी माया में टेढ़ा हुआ जा रहा है, इसको थोड़ा अपनी औकात भर टेक तो लूँ, तुम जाओ अपना काम करो ।

मुझसे यानि एक आम आदमी से क्या मतलब, कि राहुल अपने घर में इंपीरियल लेदर से नहाते हैं या रेहू मट्टी से ? चलो हटाओ, बात ख़त्म करो, हमको इसी से क्या मतलब कि वह नहाते भी हैं या नहीं ? हुँह, खुशबूदार साबुन बनाम लोकतंत्र ! लोकतंत्र ? मुझे तो लोकतंत्र का मुरब्बा देख , वैसे भी मितली आती है, किंन्तु ... !

सुश्री मायावती का सार्वज़निक बयान कि " यह राजकुमार, दिल्ली लौटकर ख़सबूदार ( मायावती उच्चारण !! ) साबुन  से नहाता है ।" मेरी सहज़ बुद्धि तो यही कहती है, बिना राहुल के बाथरूम तक गये , ई सबुनवा की ख़सबू उनको कहाँ नसीब होय गयी ? अच्छा चलो, कम से कम उहौ तो राहुल से सीख लें कि दिन भर राजनीति के कीचड़ में लोटने के बाद, कउनो मनई खसबू से मन ताज़ा करत है, तो पब्लिकिया का ई सब बतावे से फ़ायदा  ? दलितन का तुमहू पटियाये लिहो, तो वहू कोसिस कर रहें हैं ! दलित कउन अहिं, हम तो आज़ तलक नही जाना । अगर उई इनके खोज मा घरै-घर डोल रहे है, तौ का बेज़ा है ?

माफ़ करना बहिन जी, चुनाव के बूचड़खाने में दलित तो वह खँस्सीं है, वह पाठा है, कि जो मौके पर गिरा ले जाय, उसी की चाँदी ! दोनों लोग बराबर से पत्ती, घास दिखाये रहो । जिसका ज़्यादा सब्ज़ होगा, ई दलित कैटेगरी का वोट तो उधर ही लपकेगा । ई साबुन-तेल तो आप अपने लिये सहेज कर रखो, आगे काम आयेगा । अब आप जानो कि  न जानि काहे..   चुनाव पर्व  के  नहान  के फलादेश पर बज्रपात कईसे हुई गवा .. रामा रामा ग़ज़ब हुई गवा .. चोप्प, मैं कहता कहती हूँ चौप्प ! चुप हो जाओ, चुप्पै से !

लो भाई, चुपाये गये.. अब तो राम का नाम लेना भी गुनाह हो गया । लोग  सँदिग्ध निगाह से  घूरते हैं, कि  अडवाणी  से अब भी सबक  नहीं ले रहे.. राम  का  नाम  बदनाम  करके  ऊहौ  कुँकुँआत  फिर  रहे  हैं,  फिर  तो  कोई  रावणै  इनका  भला  करी..  
करै दो यार,  भलाई  के  नाम  पर  कोई  तो कुछ  करे, भले  ही  वह प्रजापालक रावण होय ! सीताहरण तो अबहूँ होबै करी ..          जस नेता रहियें तौ सीताहरण होबै करी.. चुनविया का हुईहै अगन परिच्छा तौ धमक हुईबे करी…
एक कुँवारी-एक कुँवारा ! बेकार में, काहे को खुल्लमखुल्ला तकरार करती हो ? भले मोस्ट हैंडसम के गालों के गड्ढे में आप डूब उतरा रही हो, लेकिन पब्लिकिया को बख़्स दो । सीधे मतलब की बात पर आओ, हम यानि पब्लिक मदद को हाज़िर हैं ।  अब दुनिया  भर  का  ई साबुन - तौलिया वाला…  टिराँस्फ़र पोस्टिंग की नँगी माया .. काहे ?
सोनिया बुआ, उधर अलग बड़बड़ा रही हैं, " मेरा लउँडा होआ बैडनेम, नैस्सीबन तिरे लीये...ऽ ..ऽ

 

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16 April 2009

कँघा आरक्षण के लिये ग़ँज़ों की गणना

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बड़ा बेहूदा शीर्षक है, न ? मुझे भी लग रहा है, पर समय के पैंतरेबाजी के आगे सभी नतमस्तक.. तो मैं भी नतमस्तक !  हालाँकि ऎसे समय लोकतंत्र के हज़्ज़ाम सबसे ज़्यादा नतमस्तक हैं !
जरा ध्यान से.. आचार संहिता जारी आहे .. गड़बड़ लिखोगे तो माफ़ीनामें पर दस्तख़त करने को हाथ भी न बचेंगे । यह कोई और नहीं.. बल्कि मेरी स्वतंत्र अभिव्यक्ति की पहरेदार पंडिताइन हैं !    थोड़ा सा दिनेश जी का लिहाज़ है, वरना गंज़ों से अधिक धर्म-निरपेक्ष, वर्ग निरपेक्ष सदियों से उपेक्षित मुझे तो कोई अन्य वर्ग न दिखता ! किसी मीडिया वाले ने ध्यान ही न दिया, इनपे !
हाँ तो बात “  तू मेरा चाँद.. मैं तेरी चाँदनी “ के श्री चँदा जी की हो रही थी ! अच्छा तो चलिये जरा आप ही बताइये, आपके शहर में कितने होंगे ? इस अनुपात से आपके जिले में इनकी संख्या कितनी होगी ? फिर तो पूरे प्रदेश में इनकी जनसंख्या का आकलन करना भी आपके लिये बहुत ही सुगम होगा । न होय तो ज्ञान दद्दा से पूछि लेयो । लो, अपना तो  बन गया काम !
तो अब एक छोटी सी सहायता और,जरा यह जानकारी भी एकत्रित कर लें कि इनमें से अधिकांश का रूझान किधर है,  कंघा पार्टी की तरफ़ या आईना पार्टी की तरफ़ ? यह भंग की तरंग नही है, यह मश्शकत तो हमारे मीडियाकर्मी कर तो  रहे हैं । आपौ बुड्ढीजीवी कहात हो, अपने दालान बैठ के आपौ ई चुनाव सार्थक कर लेयो ।
मुला,उनके इस वर्गीकरण का खाका कुछ अपनी ही तरह का होता है । अगड़े, पिछड़े, सवर्ण, जनजाति, मुस्लिम, हिंदू , सिक्ख इत्यादि इत्यादि । इतने पर भी संतोष नहीं,तो फिर इनकी शाखायें और परिशाखाओं पर सिर खपाऊ रिपोर्ट उछाली जाती हैं । अगड़े मानी ब्राह्मण ( घर में खाने को नहीं है ) , क्षत्रिय कुलीन वर्ण , पिछड़े बोले तो .. कोनो मँहगी कार का नाम बताओ भाई, हाँ तो, उसी में घूमते यादव जी सहित  कुर्मी ,पासी जैसे मलिन वर्ण । हमारी छोड़ो.. हम कायस्थ तो खैर त्रिशंकु जैसे टंगे हैं वर्ण निरपेक्ष ! काहे में हैं, आज तलक यहि पता नहिं.. कोनो कहत है, तुम तो आधे ऊई मा हो !  मतलब हम धरम से भी गये !
किंतु इस प्रकार के जाति एवं वर्णव्यस्था को लेकर चलने वाले जद्दोजहद की कोई मिसाल इस सदी में कहीं और भी है ?  हमारे  यहाँ तो है.. आओ देखो इनक्रेडिबल इन्डिया ! अब आप भी वक़्त की नज़ाकत पहचानो.. और जरा अपने पितरों के गोत्र और पुरखों के ठौर ठियाँ का पता लगा के रखो । अब अगले के अगले के अगले के पिछली बार यही होने वाला है । वँशावली तलाशी होगी.. फिर न कहना कि आगाह न किया था ! सरम काहे का.. हमरे मर्यादा देशोत्तम यूएसए का तो यही चलन है.. मेड इन यू.एस.ए. भाई साहब आपन झोला उठाइन और चल दिये हिन्दुस्तान दैट्स इन्डिया.. भटक रहे मालेगाँव तालेगाँव टिंडा भटिंडा .. जाने कहाँ कहाँ ! क्या कि अपना रूट्स तलाश रहे हैं !
हद्द खतम है, हमरे सुघढ़ मीडिया वाले इतने थोथी बुद्धि के कैसे निकले ? कैच इट गाय.. जस्ट बिफ़ोर एनिवन एल्स टेक्स द क्रेडिट । माफ़ करना,  ऊ लोग भी अँग्रेज़िये में सोचते हैं, बोलते भी वोहि मा हैं ( धुत्त ! लालू झाँक रिया था ! ) क़ाफ़ी हाउस के बाहर आकर हिदी उचारना उनकी मज़बूरी है.. पैसा मिलेगा तो हिन्दी चनलों में ताक जाँक करने वालों की दया से !
यह इनकी लोमड़पँथी है, यदि यह आंकड़े न पैदा करें, तो हमारे स्वयंभू भारत भाग्यविधाता ऎसी नितांत अप्रासंगिक समीकरण कैसे बैठायेंगे ? लोगों के ' माइंडसेट ' में अपनी गणित कैसे आरोपित की जाये, यही इनकी मुख्य चिंता है । आख़िर वह कौन से लोकतांत्रिक सरोकार हैं, जो इनको इस मुद्दे में अपनी मथानी चलाने को बाध्य करती हैं ? उनके सरोकार किसी को लेकर नहीं हैं किंतु उनका संदेश स्पष्ट है, "अरे ओ भारतवासियों , बहुत नाइंसाफ़ी है रे, पोंगापंथी सेकुलर सरकार में !" इस मंथन से नवनीत कैसा निकलता रहा है, आप स्वयं साक्षी हैं !
जनतंत्र का चौथा स्तम्भ कितना लचर होता जा रहा है क्या किसी गवाह सबूत की वाकई ज़रूरत है ?  क्या हम गँवारों को यह सब गणित पढ़ने समझने की जरूरत है ? कहां से, कैसे इस जातिगणित की शुरुआत हुई और इसे समीकरणों ,थ्योरम की हवा देकर मीडिया कहां तक ले जाकर इसका अंत करेगी ? इसके पटाक्षेप का कोई अंधा मुकाम तो होगा ही, जहां इनके अपने हित सधने पर ' इति सिद्धम ' के उदघोष की ध्वनि क्षीण होती जायेगी ।
आज यह क्या हो गया डाक्टर साहब को, कहां की लंतरानी कहां घुसेड़ रहे हैं ? इस आलेख को मीडिया पर हमला न समझा जाये, चलिये हमला ही समझिये.. पर जो मन में समाया था , वह निकाल दिया । इसके ज़ायज और नाज़ायज होने का फैसला आप  करें न करें ।
सच है, क्योंकि यहां कोई राजनीतिक उद्देश्य नहीं है,  यह बानगी महज़ आपको कुरेदने की कवायद भर है। इस सिक्के का दूसरा पहलू है देश के आबादी के शिक्षा का प्रतिशत ! ज़ाहिर है शिक्षा और किरानी के नौकरी का आनुपातिक संबन्ध मैकाले के समय से ही शाश्वत चला आ रहा है ।
किंतु यहां तो मीडिया अपनी सुविधानुसार इस पहलू को फ़िल्म 'शोले' में डबलरोल का किरदार निभाने वाले सिक्के की तरह छुपाये रखना चाहती है, शायद वांछित क्लाईमेक्स की प्रतिक्षा में ।
अब शायद धुंधलका कुछ छंट रहा हो, यह उनका शग़ल है, जनमानस के सोच की दिशा बदलने का । बोले तो ? पब्लिक माइंडसेट पर फटका मारने का माफ़िक । ई साला अपुन के माइंड का स्टीयरिंग रखेला हाथ में , बहुत बड़ा ग़ेम है, बाप ! आप मुझसे सवाल करें, क्या वाकई ऎसा ही है .... तो तुम भी तो इसी को टापिक बना कर ठेले पड़े हो !
अधिकांश जन शायद भोजपुरी न पकड़ पायें, अवधी में कहते हैं, " गाये गाये तौ बियाहो हुई जात है ", आप न मानें पर यह सही  है, अच्छा खासा समझदार आदमी भी " यह देश है अगड़े पिछड़े का.. " के लगातार बजते जाते बैंड पर सम्मोहित होकर पाँच-साला फंदे के सम्मुख शीश नवा देता है । अब भी संशय है तो  किसी  प्रोपेगंडा मशीन तक न जाकर अपने को ही ले लीजिये .. 
नहीं लेते..  पर मैंने तो खुद सुना है कि लगातार 'कांटा लगा..हाय रे हाय...', 'बीड़ी जलईले ज़िगर से..' और 'झलक दिखला जा..आज्जा आज्जा आआज्जा' सुनते सुनते आप स्वयं भी विभोर हो कर गुनगुना रहे थे ,..' उंअंज्जाअंजाअंज्जाअंजाउंउंउंऊं ! ' 
स्टीयरिंग मेरे हाथा या चैनल के साथ Indian General Election 2009
स्टीयरिंग किसके हाथ.. हमारे या उनके ? 
क्यों उस पल हमारी सारी लिखाई पढ़ाई संस्कार सरोकार मास कैज़ुअल लीव पर चली गयी ?
तो यह मीडिया के माइंडसेट स्टीयर करने के इस खेल का अंपायर बन प्रबुद्ध समाज भी लगातार ’ नो बाल या वाइड बाल ' दिये जा रहा है । सबकी निग़ाह घुड़सवार पर है.. Sheep-01-june
जाकी होशियार.. घोड़ा कमजोर.. जाकी कमजोर तो घोड़ा मज़बूत !   घोड़े पर दाँव लग रहा है.. यह जीतेगा वह जीतेगा । लेकिन मीडिया वाले  दादा,हमका ई तौ बताय देयो ई रेसवा काहे हुई रहा है, मकसद ?  फिर तो देश के अस्सी फ़ीसदी निरक्षर भट्टाचार्यों की क्या बिसात !  बेचारे इसी में बह रहेंगे, कि 'कुछ तौ है.........झूठ थोड़े होई ? साँचै जनात है,  तबहिन सबै जउन देखो तउन  टी-वी मा एकै चीज देखावत हैं ' झूठ थोड़े होई ? मज़किया नाहिं हौ ! सरकार केर आय ई टीवी.. ऊप्पर अकास से आवत है ! " लो कर लो बात !
BREAKING NEWS : चुनाव परिणामों के बाद गँजों को कँघा देने का वादा कर जीतने वाले घुड़सवार ने  अब इन्हें उस्तरा देने की पेशकश की !  कँघा आरक्षित !
उधर अपुन के निट्ठल्ले ने इसके लिये उस्तरे आयात  किये जाने की आशंका जतायी !
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05 January 2009

भाई साहब, हैप्पी नियू ईयर टू यू !

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पुरानी पोस्ट है, तो क्या हुआ… 3 जनवरी 2008

हैप्पी न्यू ईयर, सर्र. . . . मैं पलटता हूँ, एक किंचित परिचित चेहरा मेरी तरफ़ मुखातिब मुस्कुराता हुआ दृष्टिगोचर होता है । इनको कहाँ देखा है , दिमाग में चल रहा होता है किंतु ज़ुबान से फिसल पड़ता है, " थैंक यू , सेम टू यू ! "
यहाँ ठहरें कि आगे बढ़ जायें ( न जाने किस वेष में आने वाले कल का कोई  महामहिम ही हो ), मेरे इस असमंजस से उबरने के पहले ही उनका हाथ मेरी तरफ़ को उठता दिखता है । अब रूकना तो लाज़िमी है । ठिठक कर सोच रहा हूँ, किस तरह पेश आया जाये । उन सज्जन की दृष्टि तो सामने के फुटपाथ पर जाती हुई किसी महिला को आँखों ही आँखों मे तौलती हुई सी ' वकोध्यानम एकाग्र ' थी, बाँया हाथ कान से सटे मोबाइल को थामे और दाहिना हाथ जैसे कुछ टटोलती हुई मेरी ओर हवा में लहरा रही थी । अच्छा, लगता तो यह हैंड शेक का न्यौता है ? अशिष्टता न झलके, इस मज़बूरी में ' चलो मिलाय लेते हैं ', मैंने भी हाथ बढ़ा ही दिया ।

सिगरेट दबे होने के कारण वह फ़क़त चार ऊँगलियों से मेरी हथेली को उपर नीचे हिलाते हुए मोबाइल अपने मुँह के सामने ' माइक्रोफोन टेस्टिंग 'के अंदाज़ में ला दहाड़ से रहे हैं, "जल्दि आओ भाई, ईंहाँ डिग्री कलैजिया के सामने दुई घंटे से तुम्हरे इंतजरिया में खड़े हँय । " खट्टाक्क, मोबइलिया बंद, हमारी तरफ़ घूमे, " अउर, बाल बच्चे ठीक ? भाभी जी मज़े में ? आप लोग दिखबै नाँहीं करते हैं । इहाँ एक पार्टी का इंतजार कर रहे थे कि आपै दिखायी दइ गये , नया साल मुबारक़ हो ।"  मुझे भी बोलना ही पड़ता है, " आपको भी "।

सहसा दिमाग में बिज़ली सी कौंधती है, " आप बाजपेयी ठेकेदार हैं न ? " आहाहा हा, हाँ, हाँ । चलो धन्न-भाग हमको, जो आप पहचानै लिये सेवक को । लो, इतने में उनका मोबाइल फिर बीच में कूद पड़ा, पैन्ट की बाँयीं ज़ेब से चीखने लग पड़ा, ' हो रे .. राम, होरे राम, हो रे क्रिश्ना, हो रे राऽऽआम...होऽऽऽ ', और वह मेरी तरफ़ पीठ करके बेचारे मोबाइल का टेंटुआ दबाते हुए फौरन कान से चिपका लेते हैं, ' हलऊ हल्लऊ, हाँ..... ' भाग लो अमर कुमार यही मौका है । एक खिसियाहट से बाहर आने की कोशिश करते हुये, मैं आगे बढ़ लेता हूँ, मन में थोड़ा रंज़ भी है, ' भाभी जी, मज़्ज़े में ? स्साला भाभी के मज़े का ठेकेदार …  ..  हरामी कहीं का ? '

और मेरी वह भी तो ,जिसको देखेंगी मीठी-मीठी मुस्की मार निहाल ही कर देंगी, जैसे एसेम्बली इलेक्सन की उम्मीदवारी मिली हो, बेहया ! हूँह, भाभी जी के मज़े की औलाद कहीं का, स्साला हरामी । ' अब अपनी पूरी बिलागर बिरादरी की पंचायत से दरख़्वास्त है कि, मेरे स्वगत कथन को माइनस करके ज़रा ग़ौर करें कि यह कैसा ' हैप्पी नियू ईयर ' है, और ऎसे रस्मी ' थ्रो अवे गुडविशेज़ ' की कितनी अहमियत है ? चलिये इन बीहड़ बाजपेयी जी को फिलहाल अलग बैठाय देते हैं, लेकिन यह ' नववर्ष की बधाईंयाँ, शुभकामनायें वगैरह वगैरह ' तो जिधर नज़र दौड़ाओ, उधर ही हावी है । यह सब काहे को भाई ?

पच्चीस बवालों के बावज़ूद भी लुटते पिटते 2008 निकाल लाये, इसीलिये 2009 की मुबारक़बाद मिल रही है । मानों तिहाड़ से बाहर आ , अब यरवदा में जारहे हों , सुख शान्ति की ओर...बधाई हो । यह सब मेरी संकुचित समझदानी में नहीं आरहा है तो कैसे खीसें निपोर दूँ ? कोई भाव नहीं, कोई सरोकार नहीं, बस हैप्पी नियू इयर उछाले रहो । यह बधाई तो मुझे की बकरे माँ के ख़ैर मनाने जैसा लगता है, कब तक ? भगवान जाने, शायद जब तक ज़िन्दा रहोगे तब तक । यही सब देते दिलाते दम निकल जाये तो भी यह संतोष तो है कि फलाँ साहब हमारे शुभकामनाओं के चलते ही इतने दिन सकुशल काट लाये । वैसे तो इस रिवाज़ में ज़ाहिराना तौर पर कोई खोट नहीं लउकता । वाज़िब बात, दुनिया की रीत है यह सब ।

सभी हमारे जैसे लंठई सोच के पैदा हो जायें , तो हो गया कल्याण ? लेकिन अगर अब्भी भी हमारा पाइंट नहीं पकड़ पाये हों तो बात खुलासा हो ही जाये । इतना लम्बा चौड़ा ख़ाका सिरिफ़ इस लिये खींचा है, कि शायद कोई लाल बुझ्झकड़ सिरे तक पहुँच ही जाये हम अपनी असभ्य लंठई सोच को गठरिया के बगल रख देते हैं, तो आप पंच लोग यह बतायें कि हम भले अंग्रेज़ी में फिस्सड्डी  होंय, लेकिन परंपरा की कसम खाने को अंग्रेज़ियत का बासी गाउन कब तक सूँघते रहेंगे ? क्या गाँधी का स्वदेशी केवल कपड़ों की होली जलाने भर को ही था, या कि हम कभी अपनी भी कोई सुदेशी सोच कायम कर पायेंगे ? यह भारतदेश है मेरा......। अनेकता में एकता की अद्भुत मिसाल ( भरी सभा में सिगार पीते और  भाषा के गठन पर प्रलाप करते राजेन्द्र याद आरहे हैं ) वाह क्या थ्योरेटिकल बात है ? अब जरा देशी नववर्ष की तिथियों की झलक भी देखें ....
उत्तर भारतीय राज्य - चैत्र शुक्लपक्ष प्रथम
गुजरात - दीपावली के दूसरे दिन, ( जिसे हम परेवा कहते हैं, यानि कामधंधा बंद ) पर वहाँ हर्षोल्लास का दिवस !
पंजाब - बैसाखी के पर्व से
बंगाल - पोइला बोईशाख ( वैशाख शुक्लपक्ष प्रथम )
भारतीय मुस्लिम - मोहर्रम की पहली चाँद के दिन से
दक्षिण भारत – पोंगल

 नववर्ष 2009
यदि मेरे अवलोकन में कोई त्रुटि हो, तो नाचीज़ की इल्मअफ़ज़ाई करने की ज़हमत ग़वारा करें एवं यदि कुछ अतिरिक्त जानकारियाँ साझी करने को है, तो क़िबला मेरे सिर आँखों पर नोश फ़रमायें । ग़र मेरी ख़ुज़ली ख़ारिज़ कर भी दें, पर किससे ग़िला ? यह तो आप देख ही रहे हैं कि अंग्रेज़ियत के नकली शिष्टाचार हमारे महान भारतदेश को एक सूत्र में बाँधे हुये हैं तो फिर मैं ही इसको मुद्दा बनाने पर क्यों आमदा हूँ ? ज़वाब तो भाई मेरे पास भी नहीं है, वरना यहाँ क्यों चिचिया रहा होता ?  फिर भी, मेरे प्रलाप के पीछे कुछ तो है ही ...


चलो भाई, मैं दकियानूस खूसट सही.. पर, आदरणीय शास्त्री जी का सूत्रवाक्य ' हिन्दी ही हिन्दुस्तान को एक सूत्र में पिरो सकती है ' यहाँ पर मुझे कन्फ़्युजिया देती है ! इसका समाधान कैसे हो ? यह भी माना कि, आधुनिकता के संदर्भ में इतनी अंग्रेज़ियत तो ज़ायज़ है .. सहमत हूँ श्रीमान ! पर.. यह पर, किन्तु, परन्तु जैसे मेरे पीछे पीछे डोला करते हैं ! अंग्रेजी में बोले तो.. चलेंगा, लेकिन 'लेडीज़ फ़र्स्ट' की परंपरा वाली अंग्रेज़ियत की पैरवी करने वाले आख़िर बुकिंग विन्डो पर महिलाओं को धकियाते हुये देखे जाते हैं.. ताज़्ज़ुब नहीं कि, वहीं से पलट कर हाँक लगा दें.. 'मैंने कहा हैप्पी न्यू ईयर, डाक्टर साहब !' तो... तो, मेरे ऊपर क्या बीतती होगी ? यही कि, ऎसी बकवास लिख मारो... और क्या ? जो मेरे मन आया, यहाँ उड़ेंल दिया, ज़रूरी नहीं कि आप सहमत ही हों ! नमस्कार !

इससे आगे

23 December 2008

वो अन्डरस्टैंडिंग थी और ये सियासत है !

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स्थान: सीमा चौकी, इस बार उत्तर-पश्चिम क्षेत्र
बात बात पर उबल पड़ने और भारत माँ की सौगंध लेने की आदत के चलते रामनिहारी जाटव अपने बटालियन में रामबवाली भारती पुकारे जाते थे ! हमारे चरित्रनायक रामबवाली जी अब लांसनायक भारती के नाम से पुकारे जाने लगे हैं । दीपावली मनाने दो वर्ष बाद छुट्टियों में घर आये हैं । सब ठीक ठाक गुज़र रहा था, मात्र चार दिन ही रह गये थे, कि बेस से वारंट आगया.. ... रिपोर्ट इमिडीयेटली ! बीबी ने उनका सामान बाँधा, उन्होंनें कुलदेवी के सम्मुख सिर पर क़फ़न बाँधा और चल पड़े लाम पर ! रिपोर्टिंग की औपचारिकतायें पूरी हुईं, एक संक्षिप्त मीटिंग... और यह तय पाया गया कि जिसको जिस क्षेत्र की अधिक जानकारी है,उन्हें वहीं भेजा जाय !   
आज लगभग दस दिनों बाद कुछ लिखने बैठा हूँ |ये अन्डरस्टैंडिंग है...का दूसरा भाग पूरा करना शेष था । ब्लागर की सीमित दुनिया में सुरक्षा संचेतना सुनामी या कहिये कापी-पेस्ट काँव-काँव के थमने की प्रतीक्षा में स्वामी का यह आम आदमी पाँच दिनों के लिये टीकमगढ़ के बंज़र की खाक छान आया ! बस ऎंवेंई ही... वहाँ की दुरावस्था पर बहुत कुछ सुना था, सो देख भी आया ! वहीं पाकिस्तान के विषय में गाम की एक औरत बमुश्किल बता पाती है, " किस्तान -उस्तान तै हम्मैं नाहीं पतौ ! लड़कन बतावत जे अपँयैं भारत माता  ते जरन वारे लोग गुंडन के भेज के बम्बई मां दंगो धमाकौ कराय रहै अउर जे सरकार हाथै पै हाथ धरै आगि तापि रही !" किंचित हिचकिचाहट के बाद साहस बटोर कर एक झटके में पूछ भी लेती है, " तू कोनि सरकारी जसूस तै नाहीं ? " एक पोस्ट का मैटर है, सो छोड़िये यहीं ! कल शाम साबिहा समर की पाकिस्तानी पंज़ाबी फ़िल्म खामोश पानी देखी जिसमें ज़िया-उल हक़ के ज़माने की किरन खेर अपने लड़के सलीम मलिक को रफ़्ता रफ़्ता इस्लामी कट्टरवाद में डूबते जाते देखती है, असहाय बेबस ! निःसंदेह एक सशक्त फ़िल्म है, यह ! आज की विहंगम चिट्ठाचर्चा पर श्री सत्यनारायण ' कमल ' से परिचय हुआ.. उनकी वयोवृद्ध लेखनी से निकली जोशीली पोस्ट ने जैसे मुझे जगा दिया .. काल करै सो आज कर...  लिख ले जो लिखना है, तुझे ! आपको मेरा सादर धन्यवाद शर्मा जी, Island with a palm tree यह रहा…      वो अन्डरस्टैंडिंग थी और ये सियासत है ! 

  अन्डर्स्टैंडिंग और.....सियासत

अब शुरु हुआ कठोर श्रम और चुहलबाजी का दौर.. ख़तरों के इतने नज़दीक रह कर.. बारूद की गंध में भी यह ज़वान हँसने के मौके तलाश लेते हैं ! जीवट के जीवंत मिसाल हैं हमारे ज़वान ! यम भी इनसे पनाह माँगें, ऎसे हैं

पर, इस बार चुहल में वह बात नहीं थी.. चौकी पर लगे लाउडस्पीकर अपना अलग मक़सद रखते हैं ! पर, इसी के ज़रिये सीमा पार के सैनिकों से नोंक-झोंक भी कर ली जाती थी.. जस्ट फ़ार चेन्ज़ ! टैंक अदल बदल के किस्से तो अब चुटकुलों में भी शामिल हो गये हैं ! एक दूसरे की आवाज़ों के इतने अभ्यस्त..कि नाम भी पहचान लिये जाते हैं..  मसलन पिछली बार मोहायम.. परवेज़ वगैरह की ज़िन्दादिल पर रस्मी ललकार कभी कभी इनको भी मोह लेती थी ! एक बार मैंने पूछा भी था कि, " यह सब कैसे बर्दाश्त करते हैं ?" उन्होंने तन कर कहा फ़ौज़ी की कोई धर्म- जाति नहीं होती.. बस हमारे को एक चीज मालूम होता है, कि हमारा मुल्क सबसे ऊपर .. पीछू को चाहे मज़हब बोलो तो.. चाहे पालिटिक्स बोलो और चाहे.. और चाहे तो क्या और क्या .. करते हुये वह अपनी किसी लक्ष्मणरेखा पर ही  अटक  जाया करते ! मोर्चेपरमैं कायल था उनकी सतर्कता का..चींईं ईंईं ब्रेक लगा लेने का गुण !

हाँ तो, इस बार चुहल में वह बात नहीं थी । उस पार के लाउडस्पीकरों से पाक़ीज़ा, उमरावज़ान सरीखी उर्दू फ़िल्मों के गाने बजते, जो रेगिस्तान में दूर तक गूँजते हुये अज़ब का दिशाभ्रम पैदा करते । स्साले.. हमारा गाना सुने बिना ख़ाना हज़म नहीं होता.. अबे दुपट्टा ओढ़ता ही काहे है.. जो इन्हीं लोगों ने..इन्हीं लोगों ने ले लीना का रट लगाये है.. फिर हा हा हा उहू उहूः हू से बैरक गूँज जाता ! देखीए यूयन्नो में भि इ सार मुसरफ़वा ईहै दोपाट्टा गा गाके बुसवा को खसम बनाय लिहिस है .. सुमेर बलियाटिक ठुसकी मारते.. वह हमेशा यू.एन.ओ. को यूयन्नो ही कहते,   और फिर वही अहाहाहा हा ह्हा ह्हायगे माई.. भाई लोग अगले पल से बेख़बर हँसते हँसते खुद ही दोहरे हो जाते, वाह जीना इसीका नाम है!

पर नहीं, इस बार चुहल में वह बात नहीं थी ! एक ख़ामोशी छायी हुई थी.. उस पार से " यूँ दी हमें आज़ादी कि दुनिया हुई हैरान.. कैयदेअज़म तेरा एहसान तेरा एहसान " जैसा कुछ लगातार सुनाई पड़ रहा था ! लांसनायक अपने ज़वानों से आँखें चुराने लगते.. काहेकि उनके ज़वान ऎसे लम्हों में अपनी प्रश्नवाचक निगाह उनके ऊपर लगातार साधे रहते,“बोलो,हमें क्या बोलते हो नायक ? ” 

क्या करते लांसनायक भारती ? अभी तक ऊपर से एक्शन का कोई आर्डर नहीं आया है.. एक भद्दी गाली मन में दे लेते.. हमारे ज़वानों का मोरल डाउन हो रहा है.. एक बार आर्डर मिल जाये तो इनका रोज का किस्सै ख़ैत्तम कै दें। चबा कर बोलने के चलते उनका ख़तम हमेशा से ख़ैत्तम ही रहा है ! गौरमिन्ट सट्ट साधे है... कुछेक क्षण अपने को संयत कर दायें हाथ से छुक छुक गाड़ी जैसा एक्सन करते हुये बोलते, " पब्लिकिया  भी ये नहीं करती और दुनिया का नाटकबाजी.. हाँय नहीं तो ? " उनकी हताश मुद्रा पर उनके ज़वान भी द्रवित हो उठते, पर.. क्या ?

ख़ैर, अब जल्दी से आगे बढ़ते हैं.. क्योंकि मेरा कुप्रसिद्ध तीन बजने को ही है ! इस रोज रोज की चिक चिक से ऊब कर आपस में यह तय पाया गया कि इस बार गश्त पर हम भी आमने सामने थोड़ा बहुत ज़ुबानी ज़माख़र्च हो लेंगे ! ताकि यह कुछ दिन तो शांत रहें !  अगली गश्त पर देखा तो सामने बाड़ के उस पार परवेज़ मियाँ गश्त पर हैं.. ' चलो, इनसे थोड़ा शिकवा शिकायत हो जाये । मियाँ नम्बरी चीज हैं.. टैंक अदल बदल करने का आइडिया इनका ही था..स्साला फ़रेबी ! बातचीत में इतने सधे और मीठे कि लगेगा अपनी बिटिया का रिश्ता देने आये हैं ! चलो अपना क्या है.. हाल चाल ले लें इनका भी मन बहल जायेगा और इस बदले मिज़ाज़ का रंग भी मिल जायेगा ।' यही सब मन में सोचते आगे बढ़े.. ऒईलो, ये तो स्साला गाली दिये जा रहा है ! एकदम से खौल गये, " ज़नानियों की तरह गाली क्यों देता है, बे ? " ससुरा वह आधी घुटी हुई दाढ़ी और जोर-शोर से गरियाने लग पड़ा.. क्या कहा वह आप न ही पढ़ें तो अच्छा है । भारती दहाड़े, "अबे गाली क्यों देता है.. सिर्फ़ दो हाथ लड़ ले तो जानें !" परवेज़वा जैसे गाँज़ा लगाये था, "किसने क्या कहा बे , सबूत है तेरे पास ?" भारती ऎसी स्थिति के लिये कतई तैयार न थे.. "ऒईलो, खुल्लम-खुल्ला गरिया भी रहा है और उल्टे मुझीसे सबूत भी माँग रहा है, धूर्त ?"

क्या करते लांसनायक भारती ? उन्होंने हनहना कर एक लात उसके पिछवाड़े जड़ दिया । बस, इतना ही था कि, सहसा तड़ तड़.. तड़ तड़ गोलियों की बौछार शुरु कर दिया मरदूद ने ! छिटक कर एक गोली हमारे लांसनायक के बाँयें टखने पर लगी, उन्होंने झटपट आड़ में पोज़िशन ले ली । तनिक झाँक कर चिल्लाये, "दिमाग ख़राब हो गया है... कल तक तो हमारे दम पर ऎश कर रहा था, 15-15 दिनों की दो छुट्टी दिलायी .. सो भूल गया ? " वह मेरी तरफ़ से अन्डरस्टैंडिंग थी.. यह था परवेज़ का ढीठ ज़वाब ! " तो फिर गाली क्यों देता है और कहता है कि सबूत दो, मक्कार ? "  परवेज़ की मशीनगन थमने का नाम ही नहीं ले रही है ! फिर चिल्लाये हमारे नायक, "अबे, वार डिक्लेयर तो होने दे..!!" परवेज़ सचमुच मक्कारी से हँसने लग पड़ा, " किसी गाली वाली का कोई सबूत तो दिया नहीं.. उल्टे हमारे पिछवाड़े लात ठोंक दिया... हमलावर तो तू है, पाज़ी ! वार तो तूने ही डिक्लेयर कर दिया है !"

“ऒईलो, यह क्या कह रहा है, तू ? “ भोले भारती चकराये ! ” मैं कुछ नहीं कह सुन रहा... यह तो दुनिया ने देखा कि पहला वार तूने ही किया है ! जाकर किसी से पूछ..  यह सियासत है !” परवेज़ अबतक हँस रहा है 

अकारण स्पष्टीकरण: जूताखोर भुश्श पर नपुसंक क्रोध के प्रतीक ज़ैदी के जूते पर हमारा ब्लागजगत आह्लादित है, चुहल में व्यस्त है । जहाँ संवेदनाओं के विलाप का बाज़ार नित्य नये तराने ला रहा हो, ऎसे में फिर वही मुंबई धमाके को संदर्भित पोस्ट ? आपके ऎतराज़ की कद्र करते हुये भी न्यू मैरीन लाइन्स के बिटिया के हास्टल की छत से मोबाइल पर आती धमाकों की अस्फुट आवाज़ें, लड़कियों का डर और घबड़ाहट के मारे गश खाकर गिरना, उन सबको एक कमरे में बंद करके रखे जाना फिलहाल मैं भूल नहीं पाया , क्योंकि यह सब एक अलग किसिम की सिहरन देती आ रही है ! क्या करें ?
एक बात और :पोस्ट का ऎसा अंत सामयिक संदर्भों के चलते अपरिहार्य सा प्रतीत होता लगता है.. साथ ही अनिवार्य सा भी लग रहा है ! फिर भी, मुझे इस पोस्ट का ऎसा अंत प्रस्तुत करने का सदैव पश्चाताप रहेगा । पर, यह पश्चाताप अब तक के लाखों उ्जड़े परिवारों के हाहाकार एवं वतन की आज़ादी के राह पर कुर्बान हुये हुतात्माओं के ठगे जाने के शोक से लाख दर्ज़े हल्का बैठ रहा है ! खैर, कूटनीति, सियासत व मज़हब की आड़ में पल रही सत्ता-लिप्सा का कहीं तो अंत होगा ? प्रतीक्षा है, ऎसे स्वर्णिम आशा के फलीभूत होने की... बस, आप भी इस प्रतीक्षारत कतार में लग जायें, और क्या ?
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13 December 2008

ये अन्डरस्टैंडिंग है और वो सियासत थी

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स्थान : सीमा चौकसी चौकी, देश में कहीं भी..
खट्ट्क्क खट्ट्क्क खट्ट्क्क .. हवलदार रामबवाली भारती मेज़र फ़ेरन सिंह के सामने जा खड़े हुये, पंज़ों पर उचक कर एक सैल्यूट मारा, " शौह्हः , मेरा 10 दिन का लीव एप्लिकेशन रिकेमेन्ड एन्ड फ़ारवर्ड कर दीजिये ।" मेज़र उनसे भन्नाये अंदाज़ में पूछते हैं, "क्यों, क्या है ?" हवलदार बगलें झाँकते हुये बोले, "शौह्हः, मेरा ताऊ इलेक्शन में पिल पड़ा है... सो, थोड़ा परचार-उरचार कर आयें, फ़ेमिली की नाक ख़तरे में है, प्लीज़ शौह्हः !"
मेज़र किचकिचा पड़े, "अरे ज़वान, पहले यहाँ तुम अपने देश की नाक की सोचो. " बीस हफ़्ते की कैम्पिंग में सत्तरह हफ़्ते तुमने ऎंवेंई बिता दिये । दस दिन के छुट्टी और चार दिन की मूवमेन्ट के बाद तुम्हारे पास बचा ही क्या ? " हवलदार रामबवाली भारती उतावले हो उठे, " शौह्हः मेरी रेगुलर पेट्रोलिंग चल रही है, आज भी नाइट पेट्रोलिंग पर रिपोर्ट करना है ।" मेज़र भभक पड़े, " तो ? तो, अब तक की ड्यूटी में तुमको एक भी इन्ट्रूडर या घुसपैठ की रिपोर्टिंग का चांस ही नहीं मिला ? जाओ, अपनी ड्यूटी पर.. कोई कारनामा दिखाओ, तभी रिकेमेन्डेशन की सोचेंगे.. मूव नाऔ !" दहाड़ सुन कर, बेचारे भारती हवलदार उल्टे पाँव वापस हो लिये, गिनती परेड होनी  थी ।
अगली सुबह रामबवाल हवलदार फिर मेज़र साहब के सामने हाज़िर, " शौह्हः रामबवाल रिपोर्टिंग सर !" पर, मेज़र जैसे कुछ सुनना ही नहीं चाहते थे, "नो नो, आई सेड नो वेऽऽ.. गो बैक टू योर पोस्ट !" अबकी हवलदार एकदम तड़क कर बोले, " शौह्हः हमने कल रात दुश्मन का एक टैंक अपनी सीमा के अंदर घुसते पकड़ लिया ।  सर, पूरा का पूरा  क्रू तो एस्केप कर गया लेकिन टैंक हमारे क़ब्ज़े में आगया है ! आप गैरिसन में देख लीजिये, सर !"

   nitthalla  binavajah

अब मेज़र फ़ेरन सिंह हैरान.. यह कैसे ? बाहर निकल कर देखा तो सचमुच एक पाकिस्तानी टैंक खड़ा है ! ख़ुशगवार माहौल में अपने कुछ ज़वान उस पर टँगे हुये मग्गों में चाय पी रहे हैं और दो जन एक रज़िस्टर में कुछ औपचारिकतायें दर्ज़ कर रहे हैं । मानना ही पड़ा मेज़र को, उन्होंने आगे बढ़ कर रामबवाल को अपनी बाँहों में दबोच लिया, " वेलडन ज़वान, तुमने अपना वादा पूरा किया, तुम्हारी छुट्टी मंज़ूर हुई समझो.. मैं वायरलेस पर बेस को पूरी इन्फ़ार्मेशन दे देता हूँ, जाओ.. आराम करो !"
शाम को अनौपचारिक गपशप में मेज़र ने हुलस कर कहा, " बधाई हो, ज़वान छुट्टी मंज़ूर हो गयी । पर, यह सब तुमने अकेले कैसे कर लिया ?" रामबवाली ने सिर झुका लिया, "मैं आपका मातहत हूँ, सर.. झूठ नहीं बोल पाऊँगा ! सिपाही का दर्द सिपाही ही जानता है, अन्डरस्टैंडिंग है, सर ! उधर का सिपाही भी जब छुट्टी चाहता है, हमसे टैंक माँग कर ले जाता है ! यही अदला-बदली इसबार भी किया है, सर !"
"यह चीटिंग और जुगाड़ है, यू फ़्राड ?" मेज़र गुस्से जितना गुस्से से काँप रहे थे,                                          उतनी ही शांति से हवलदार ने कहा.. क्या कहा ? वह बाद में .. .. ..

F

चाहे तो इसे आप ..सनक के समावेश पर शिवभाई की व्याख्या की पुष्टि ही समझें, या कुछ और.. 
1995 से 2000 के दौरान अपने वार्षिक अवकाश का गंतव्य मैं सीमा को छूते हुये देश के हर उस भाग को बनाता रहा, जो सड़क मार्ग और कुछेक ट्रैकिंग से नापा जा सकता था । इसी कड़ी में 1996 के शीतावकाश में मेरा जैसलमेर के निकट  लगभग 27 किलोमीटर पर स्थित, सीमावर्ती गाँव सम तक जाना हुआ ! एक यादगार यात्रा, क्योंकि कई औपचारिकताओं से मुक्ति मिल गयी थी !


एक दूरी के बाद फोटो लेना मना है, इसलिये अंतिमबिन्दुके चित्र ही आप देख पा रहे हैं ! सच में बड़ा रोमांचक रहता है, नो मेन्स लैंड पर खड़े होकर विश्व का सर्वथा स्वतंत्र स्वछंद नागरिक होने का अनुभव करना ! कुछेक सुरक्षा नियमों का उल्लंघन करते हुये..( जिसका मुझे खेद है ) और अपने एक नितांत अंधभक्त की सहायता से हम सीमावर्ती बाड़ तक जा सके ! दस कदम आगे और बढ़िये, और.. आपकी नागरिकता बदल गयी ! उधर से भाग कर आती हुयी पाकिस्तानी भेड़, दो छलांग में हिन्दुस्तानी कहलायेगी ! है न, अज़ीब बात ? खैर छोड़िये.. वहाँ रेत पर एक माचिस की खाली डिब्बी पड़ी देखी.. पिंज़रे में बंद बंदर छाप, उसपर कुल क़ैफ़ियत उर्दू में ही थी ! अंकों को छोड़ कर कुछ भी अंगेज़ी में नहीं था ।  मैंने यादव जी ( काल्पनिक नाम ) से पूछा, " पाकिस्तानी माचिस हिन्दुस्तान की ज़मीन पर कैसे ? " उसने बेपरवाही से उत्तर दिया, "हमारे किसी ज़वान ने सिगरेट वगैरह सुलगाने के वास्ते लिया होगा ।" मेरा 12 वर्षीय बेटा अपने जिज्ञासाओं का अनंत कोष यादव के सम्मुख खोल बैठा ! कुल ज़मा निष्कर्ष यह था, कि अपनी अपनी सीमाओं में हम अपनी ड्यूटी कर रहे हैं.. उसमें कोई ढील नहीं.. पर किसी चरवाहे या ज़वान से कुछ माँग लेना या कुछ दे देना एक सामान्य बात थी वहाँ ! लाउडस्पीकर से एक दूसरे के हाल चाल तक पूछ लिये जाते थे ! मुझे अटपटा लगा और मैं सत्ताधारियों के झगड़ों और इन सुरक्षा प्रहरियों में इन झगड़ों के प्रति कोफ़्त को नज़दीक से देख पाया ! कोलकाता से निकलने वाले देश ( দেশ ) के  पूज़ा विशेषांक 2002 में यह प्रकाशित भी हुआ है ! पोस्ट उसी को आधार बना कर थोड़े अलग ढंग से लिखी गयी है, क्योंकि.. हवलदार भारती ने क्या कहा, इसका समावेश तो अभी बाकी है !

हवलदार ने फ़ीकी हँसी के साथ कहा, " अब आप जो भी कह लो साहब पर, जुगाड़ से ही तो दोनों मुल्कें बनी हैं, जुगाड़ से ही उनकी सरकारें चल रही हैं, और उनके इस जुगाड़ को ज़िन्दा रखने और चलाते रहने के लिये हमलोग नाहक आमने सामने खड़े ड्यूटी के नाम पर अपनी ज़िन्दगी खराब कर रहे हैं.." 
यह तो उसने मुझसे कहा था, जिसको मैंने इस पोस्ट में मेज़र के मत्थे मढ़ दिया है, पर आलेख पूर्णरूप से आपबीती पर आधारित है

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09 December 2008

चैट्क्क.. डोन्ट वरी फ़ॅऽर इट, अंकल !

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यह विषय पड़ा तो बहुत दिनों से था... पर वही सनातन रोना, कुछ असलियत का और कुछ फ़ैशन में, बोले तो.. समय का टोटा, वह तो आपके पास भी होगा ! ब्लागिंग और लिखने का विषय ?  अरे, राम भजो... . जिस दिशा में  भी नज़र डालो, विषय  ललकार  रहे हैं ! ब्लागर वही, जो बात  पकड़ बतंगड़ बनाये ! टैग जो मन आये, वही घुसेड़ दो... संस्मरण, संवेदना, हलचल, विविध, व्यंग्य या कुछ भी ? अपुन के समीर भाई जी ने कहीं लिखेला है, " ब्लागिंग की  लत लग भर जाये, फिर तो सोते में, जागते हुये , रास्ते में, श्मशान में, लड़की में, कड़की में.. जित देखो ब्लाग सब्जेक्ट , जैसे मीरा के कान्हा ! उन्होंने तो अपना पक्का इंतज़ाम कर ही लिया है..लोकल ट्रेन के डिब्बों में भी अपना माल ताड़ लेते हैं, और मसाला लाइब्रेरी में मिल जाता है, सेफ़ हैं.. लकी हैं ! पर,  मुझे तो पहले का सोचा हुआ हर एक नुक्ता..  जैसे अब कुरेद रहा हो !

हुआ यह कि चिट्ठाचर्चा  के जिसका जितना आँचल था, उतनी ही सौग़ात मिली  पर मेरी एक टिप्पणी दर्ज़ होगी,
".....  लट्ठ ताऊ का पेटेन्ट है, राज भाटिया छुट्टियों पर निकले हैं, और यहाँ..
बिटिया को उड़ान भरने की लेट हो रही है,
जब तक हमारे सारथी जी, फ़्लाइट का कोई अतिशुद्ध हिन्दी विकल्प नहीं निकालते ,
तब तक आप अपनी बेटियों को उड़ने से कैसे रोक सकते हैं ?
सो, अभी चलता हूँ ! ....."
इसमें यह जिक्र करना आवश्यक न समझा कि मेरी बेटी की एक सहेली भी आयी थी, शिवानी लोढा ! कभी महाराष्ट्र से बाहर न निकली थी, सो वह आई थी यू.पी. का ज़लाल देखने ! जो भी देखा हो, पर  उसका रोज सुबह घूम घूम कर पेड़ पर लटके शरीफ़े, पकते अमरूद और बचे खुचे करौंदों को देख देख रोमांचित होना, मुझे आह्लादित करता था.. " आईला, दीज़ ग्वाआज़.. ओह ईषी, इट इज़ अ लाइफ़टाइम एक्सपेरियेन्स ! सच्ची अंकल, मैंने इत्ती बड़ी ज़िन्दगी में फ़र्स्ट टाइम देखा है.." इत्ती बड़ी पर उसका खास जोर रहता ! तो अपने स्टेट गेस्ट.. शास्त्री जी नाराज़ न हों, भूलसुधार किये लेता हूँ... तो, अपने राजकीय मेहमान को सकुशल विदा करना भी एक उत्तरदायित्व था ! मेरी बेटी ईषिता तो बाय बाय कर गयीं, फ़्लाइट समय पर थी । शिवानी चूँकि बाद में, लालू तत्काल पर आयी थी, सो उसे ट्रेन से ही जाना था, और.. उसे सी आफ़ करने तक लादे-लादे लखनऊ में विचरते रहना और  नान-स्टाप बकर बकर सुनते रहना था ! शाम को पुष्पक है, स्टेशन सात बजे पहुँचना है... तब तक ?

तब तक..' ये खाओगी, अच्छा यह ट्राई करके देखो, जरा शुक्ला के दहीबड़े भी चख कर देखो । ' यही सब चलता रहा । बेचारी पंडिताइन कुढ़ कुढ़ कर मरी जा रहीं थीं.. छिपा कर आँख तरेरा, "मैं कभी इन चीजों के लिये कहती हूँ, तो तुम उन्नीस का पहाड़ा बताने लगते हो, और इसपर बिछे जा रहे हो ? " हाय रब्बा, तूने अपनी रचना में इतना सारा कुड़कुड़त्व क्यों भर रखा है ? बच्ची है, कुछ घंटो के लिये अपनी मेहमान है, शर्म करो ! " अच्छा तो मुझे शेखर के यहाँ छोड़ दो, ट्रेन के बाद आ जाना.."  उनकी ओर से शह दी गयी और मैंने मात स्वीकार कर ली !

लगता है, विषयांतर हो रहा है.. कीबोर्ड हाथ आ जाये तो कंट्रोल ही नहीं होता ! स्वामी-संयम अभी मुझसे दूर है ! कुलज़मा किस्सा यह कि शाम को स्टेशन पहुँचा, जब तक कार पार्किंग में अपना जगह बना पाती, तब तक मिस लोढा दो बैग लेकर नीचे कूद चुकीं थीं, एक बड़ा सूटकेस डिक्की में था ! " इट्स मिनिमम,  अंकल ! आफ़्टर आल यू विल हैव टू कैरी अटलीस्ट फ़ोर सेट्स फ़र सेवेन डेज़, ना ? " यह बेवज़ह सफ़ाई मैं तब तक एक दर्ज़न बार सुन चुका था। खैर.कार से उतरा तो देखा शिवानी बगल में ही खड़ी है, डिकी के पास, सूटकेस निकालने को तत्पर.शिवानी लोढा-ईषिता अमर-बिनावजह निट्ठल्ला उसके बैग कहीं आसपास नहीं दिख रहे थे । " बैग्ज़ ? " मेरी प्रश्नवाचक मुद्रा भाँप, वह तपाक से बोली, "ओह, यू मीन बैग्ज़ ? दे आर एट प्लेटफ़ार्म एन्ट्री गेट !" मैं मन ही मन दहल गया, ' अरे लड़की, यह यूपी है.. बैग तो अब ना मिलता ।' इन लड़कियों की छठी इन्द्रिय बड़ी तेज होती है, भई ! बिना कुछ पूछे ही खट से ज़वाब भी आ गया.. तेज तेज कदमों से सूटकेस घसीटती हुई, उसने दोनों कंधे उछाले, "  चैट्क्क.. डोन्ट वरी फ़ॅऽर इट, अंकल !" तालू से जीभ चटकाते हुये वह बोली, " डोन्ट वरी, नो वन विल टच इट.. दे मस्ट बी सेफ़ देयर । " वह किंचित ढीठायी से हँसती है.. " यू नो, पीपुल आर सो स्केयर्ड, दे वोन्ट इवेन टच द बैग्ज़ !" उसके इस तरह के मुँहजोरपन पर मैं मन मसोस रहा था, पर उसने अपना बकबक जारी रखा, " यू नो, अंकल.. इन दिस एट्मास्फेयर.. नो सेंसिबल परसन डेयर टच एनीवंस लगेज़.. एट नरीमन वी लीव आअर पर्स एंड लव टू वाच द फ़नी  पैनिकी फ़ेसेज़ !

इस लड़की पर क्रोध तो बहुत आ रहा था, लगातार अंग्रेज़ी गिटरपिटर, ऊपर से ऎसी गैरज़िम्मेदार ग़ुस्ताख़ी.. पर ? पर.. वही स्टेट गेस्ट का मसला और यूपी की इमेज़ ! जाओ रे लड़की, बहुत होगया..पंडिताइन भी प्रतीक्षा में होंगी! पोस्ट लम्बी होते जाने के आसार बन रहे हैं, वह अलग से ?  क्या करें, यह लड़की अब ज़ल्दी  जाती  भी तो नहीं !

पुष्पक एक्सप्रेस यार्ड से आकर प्लेटफ़ार्म पर लग चुकी थी, कोच B-2, बीटू.. बीटूबीटू... बीटू हाँ यह रहा बीटू ! बर्थ इसी में है, चाल्ह छे्त्ती टुर लै गड्डी विच्च ! वह ज़ल्दी से अपना बड़ा सा बटुआ खोला, दाँतों से ओंठ भींच कर अपना हाथ उसके अंदर डाल जादूगर कुंडू के गिल्लि-गिली बुब्ब्लाबू स्टाइल में हिलाती है..   खरगोश तो नहीं, हाँ एक अज़ीब सा डिब्बा निकाल कर उसमे जड़े आईने में चेहरा दायें बाँयें घुमा कर ज़ायज़ा लेती है, और तपाक से एक गोल डिब्बी निकाल काम्पेक्ट अपने चेहरे पर फेरने लगती है.. अचानक वह काम्पेक्ट की डिब्बी कब लिपस्टिक में तब्दील हो जाती है, पता ही नहीं चलता और वह तमाम तरह के मुँह बना हौले हौले लिपस्टिक अपने गंतव्य पर इधर उधर दौड़ा रही है । ई लेडीस लोग का यह तामझाम मुझे हमेशा से ही बड़ा रहस्यमय लगता रहा है.. सो आज भी खड़ा खड़ा उसे हैरत से  देखता रहा.. खाना खाकर सोने के लिये इसकी क्या ज़रूरत ?  उसके किसी अदृश्य एंटेना ने सहसा मेरी यह वेव-लेंग्थ पकड़ ली हो जैसे, ऎसे उसने चौंक कर देखा । " ओह सारी, जस्ट अ लाइट टच-अप !" अपनी खिसियाहट छिपाने का प्रयास करते हुये, वह बोली ! फिर बेसाख़्ता हँसने लग पड़ी, " जस्ट अ मेक-ओवर टू टैली माई फ़ेस विद माई आई.डी.कार्ड फोटो.. इन केस द ट्रेन ब्लास्ट्स एंड यू आर काल्ड टू आईडेन्टीफ़ाई मी !" मैंने अपने दाँत पीसे, लगता है आज पिट कर ही जायेगी यह परकाला ?

ख़ैर, एक एक करके दोनों गयीं ! लौटते समय बड़ा सूना लग रहा था. और मैं डा. बशीर की कहीं पढ़ी हुई नज़्म याद करने का प्रयत्न कर रहा था.. ' गुल नहीं, गुलज़ार हैं.. बेटियाँ ख़ुदा का उपहार हैं.. बेटियाँ तो ख़ुशबू का झोंका हैं.. ये खेलती-कूदती, मचलती-महकती ख़ुशबू की बयार हैं.. ' जैसा ही कुछ ! " कहाँ ध्यान है, तुम्हारा.. नींद आरही है, क्या ? " लो, पंडितइनिया ने चौंका दिया । इनका यही है, एक झपकी मार लेंगी.. फिर पुकार पड़ेंगी,जागते रहो..

_________________________________9 दिसम्बर, मंगलवार ____________________________

यह विभाजन रेखा क्यों ? क्योंकि यह घटना 17 नवम्बर की है.. पोस्ट लिखी गई 25 नवम्बर, मंगलवार को.. सोचा कि, फ़ाइनली कोई इमेज़-ऊमेज़ लगाकर शनिवार को पोस्ट करेंगे ! इसीलिये कहा है, " काल करे सो आज कर " क्योंकि 26/27 नवम्बर की रात में जो हुआ, उसके आगे यह पोस्ट अप्रासंगिक हो गया था ! आपही बताइये. कहाँ वह मौत का तांडव, और कहाँ असुरक्षित माहौल को  भी एन्ज़्वाय करती इस मुंबईया लड़की का ये अफ़साना !

विचारों की कड़की का बयार लगता है, पछुआ हो गई है..  कल छुट्टी है, आज कुछ पोस्ट करना है.. कल तो पंचम जी को हलाल कर दिया आज कुछ लिखने को ज़ंग लग गया है । सो इसी को झाड़-पोंछ कर पब्लिश किये देता हूँओह, मुंबई-अमरकेवल कुछ सेकेन्ड और लूँगा : यह ऊपर वाला इमेज़ लेकर एडिट करते समय यह फ़र्क़ कर पाना कठिन हो रहा था, कि यह चारबाग, लखनऊ का प्लेटफ़ार्म है या सी.एस.टी. का ? यह तो आपके शहर का भी हो सकता था ?  पर, ईश्वर न करे (क्योंकि, सरकार तो बेबस है) कि ऎसा हो.. मैं मन को भरोसा देने को ' राम की शक्ति-पूजा ' की लाइनें दिमाग में बरबस लाने का प्रयास करता रहा.. ठीक से याद न आयीं ! मुझे ही क्या, पूरे देश को ही भूल गया होगा...

ईश जानें, देश का लज्जा विषय
तत्व है कोई कि केवल आवरण
उस हलाहल-सी कुटिल द्रोहाग्नि का;
जो कि जलती आ रही चिरकाल से
स्वार्थ-लोलुप सभ्यता के अग्रणी
नायकों के पेट में जठराग्नि-सी !

नहीं.. नहीं, यह तो शायद दिनकर के कुरुक्षेत्र में है.. अब इतनी रात में किताब कहाँ मिले ?                       आप ही देख लीजियेगा ! निराला की लाइनें तो शायद यह हैं :

है अमानिशा, उगलता गगन घन-अंधकार;
खो रहा है दिशा का ज्ञान, स्तब्ध है पवन चार;

या यह ............................................................................ ? 

शत-शुद्धि-बोध-सूक्ष्मतिसूक्ष्म मन का विवेक,
जिनमें है क्षात्र-धर्म का घृत पूर्णाभिषेक,
जो हुये प्रजापतियों से संयम से रक्षित,
वे शर हो गये आज रण में श्रीहत, खण्डित !

मात्र 15 दिनों में एक पोस्ट का पूरा संदर्भ ही बदल गया.. , सिंहासन का सेमीफ़ाइनल चल रहा है, लोग झूम रहे हैं, बम फ़ुटा रहे हैं.. नाच रहे हैं, और हम कह रहे हैं कि विषय का टोटा है..यह भी भला कोई बात हुई,वाह !

इससे आगे

07 December 2008

सनद रहे कि यह नकल है..

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अब ढूँढ़िये, इसका मूल लेखक ?
यदि आप जागरूक पाठक हैं, तो पहचान ही जायेंगे..
इस पोस्ट के मूल लेखक को... नहीं पहचाना ?  कोई बात नहीं., फिर तो..
यह रचना मेरा हिन्दी के प्रसार में योगदान माना जाये                                                            और इस नक्काल के पोस्ट-मर्म को अनदेखा कर दें
art-thief_e0मैं नक्काल - अमर
ओ पैणचो मंत्री लोकी की करदे ने, हुण पता लगिया ।
ओ पता तां पैलां ही सी, पर अद्दे जाके दिसदा पिया वे।
ये वो संवाद थे जो मुंबई के किंग्स सर्कल से सटे पंजाबी कॉलोनी में एक दुकान पर चल रहे थे। तीन लोगों के ये हिंदी-पंजाबी मिश्रित संवाद इतने रोचक थे कि मैने इनकी कुछ बातें अपने अदने नोकिया 2626 पर रिकॉर्ड कर लिया लेकिन अगल बगल उठ रहे ट्रकों और काली-पीली टैक्सियों के उठते शोर के बीच सब कुछ दब गया। अपने एक मित्र के साथ एक दुकान पर कुछ काम से गया था, वहीं पर ये रोचक संवाद सुनने मिले। ये रोचक संवाद जरा आप Text में देखें ।
पहला - ओ साले मंत्री अपणी मां ** रहे सी, पैण चो कर (घर) विच् टांगा विच टांगा डाल के पये होणगे मां दे लौ*
दूसरा - उन्ना नु लोकां नाल की मतलब, माचो खुद ते ऐश-उश करांगे पांवै ( भले) इधर पबलिक दे लो* लग जाण।
तीसरा - ओ पैंचो मिडिया वाले वी अपणी मां *** पै ने । एक नू हत्थ नाल खून रिसदा पिया वे ते माचो मु विच्च माइक पा के दस्सदे पये ने - ये देखो कितना खून निकल रहा है - ओ मांचो कून (खून) नहीं निकलेगा ते के चाशनी निकलेगी....... मां दे दीने।
पहला- ओ लौंडा( पकडा गया एक आतंकी) टुटण लगिया वे, ओन्नु चंगी तरह कुटणा चहीदा, पैणचो हुणे टंग नाल बाल नहीं निकलिया, माचो अटैक करन चलिया सी, मां दे दीने नु पुन्न के रखणा चहिदा ए ऐसे लोकां नुं।
दूसरा - ओ बीबीसी वाले आतंकवादीयां नुं टेररिस्ट नहीं बोलदे.....उन्ना नुं गनमैन बोलदे ने ......इन्ना दे तराह ( भारतीय मीडिया की तरह) ढाम-ढूम मूजिक-व्यूजिक ला के चिल्ला के नई बोलदे - आतंकवादी यहाँ अपनी मां चु* रहा है।
( तीनों ने जोरदार ठहाका लगाया)
पहला - ओ तैनु पता ऐ I B वालियां ने उन्नी तरीक नु ( उन्नीस तारीख को) एन्ना नु बोलिया सी कि तुहाडे ताजमहल होटल विच खतरा हैगा। पर ऐ मंत्रीयां नु मां *** नाल फुरसत मिले तां ना।
तीसरा - इस देश दा हुण की होउगा, पता नी यार।
दूसरा - ओ विलासराव, लैके गिया सी रामगोपाल वरमा नुं ......ऐ के तमाशा विखाण वास्ते लै गिया सी के.......नाल अपणे मुंडे नुं वी लै के गिया सी के नां है उसदा.....?
पहला - रीतेश देशमुख....।
दूसरा - हां....रितेश.....के लौड ( जरूरत) पै गई सी ओन्नु लै के जाण दी। हुण के अपणें मुंडे वास्ते लोकेशन वेखण गिया सी कि देख लै बेटा - तैनु इधरे शुटिंग करनी है।
तीसरा - देश दा तमाशा बना के रख दित्ता है होर कुछ नहीं।
अभी ये बातें चल रही थीं कि उन लोगों का ही कोई परिचित एक मोना पंजाबी अपने साथ एक बैग लेकर वहीं से गुजर रहा था। उसे आवाज देकर बुलाते हुए एक ने कहा -
ओए.....बैग वैग लै के कित्थे कोई अटैक उटैक करने जा रिहा है के।
सत श्री अकाल जी।
सत श्री अकाल ( तीनों ने सम्मिलित जवाब दिया)
पास आ जाने पर उस युवक से उन लोगों की बातचीत चल पडी।
कित्थे जा रिहा है।
ओ कल मनजीते दी बर्थडे पार्टी है, उस लई कुछ सामान-सुमून खरीदीया है।
पहला - ओ इधर अटैक-शूटैक हो रिया वे .....ते तुस्सी पार्टी शार्टी कर रहे हो।
( एक हल्की हंसी इन चारों में फैल गई)
उदरों ही आ रिहा वां ( उधर से ही आ रहा हूँ) , लोकी सडकां ते आ गये ने बैनर-शुनर लै के ( लोग सडक पर आ गये हैं, बैनर वैनर लेके )।
सडक ते आणा ही है यार, बंबे दी पब्लिक चूतिया थोडे है.....सैण दी वी लीमट हुंदी ए ( सहने की भी लिमीट होती है)।
यह बातचीत और लंबी चली होगी। लेकिन इधर मैं अपने मित्र के काम निपट जाने पर दुकान से निकल आया....... जब कि इच्छा थी की अभी और इन लोगों की बातचीत सुनूं।
_____________________________________________________________पहचान तो नहीं लिया ? मैं क्यॊ बताऊँ कि यह सतीश पंचम की पोस्ट है, या मेरी ? अब कुछेक पल को कल्पना करें, कि यह पोस्ट मई 2007 में लिखी गयी होती तो ? क्या पता, लेखक अपना पोस्ट मैटर कहाँ से खोद कर लाया है ? आप तो पब्लिक की शार्ट-मेमोरी के मुरीद हैं, न ? शर्मा-शर्मी में भी, कोई शर्मदार एक टिप्पणी तो डाल ही जायेगा, नीचे वाले चौकोर कमेन्ट-कटोरे में ! चलिये मान लेते हैं कि यह सतीश पंचम जी की ही पोस्ट है, तो मैं उनकी लोकप्रियता में श्री-वृद्धि ही तो कर रहा हूँ ?  यह बौद्धिक संपदा पर अतिक्रमण कैसे माना जाये, आप ही बोलिये ?
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01 December 2008

ब्लागिंग विदाउट परपज़ !

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नेट पर बस इधर उधर टहल रहा हूँ । लोगों ने आनन फ़ानन मुंबई हादसे पर अपनी हाज़िरी लगा दी है । कुछेक जन तो बहुत ही गंभीर रहे हैं, कुछेक डाक्टर सेक्योरिटी को मारने पीटने के तेवर में दिखे । डाक्टर तो आपने ही चुना होगा । पर, मैं क्या लिखूँ, यह सोचता हुआ अपने इमेज़ एडीटर से खिलवाड़ कर रहा था, मन में चल विचारों को संयत भाषा में बाँधने की उठापटक चल रही है, सहसा कहीं छिपे किसी अदृश्य विचार ने यह इमेज़ बनवा दिया

    क्या आप...अमर       

कोई एकमत न हो पाने पर दूसरी एक और मीटिंग रखने का मौका हाथ में रहेगा
दो मिनट के मौन में, आप शाम को घर ले जाने वाली शाक-भाजी का निर्णय तो ले ही सकते हैं ?

तो.. आइये आज हम देश की सुरक्षा व्यवस्था पर अपनी मीटिंग जारी रखें

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16 November 2008

अमर कुमार का ई-कचरा

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eswami  आज शनिवार है या समझिये कि था...
वैसे तो इतने दिनों गायब रहा ही, पर आज है मेरी साप्ताहिक छुट्टी, और यही दिन तो असल छुट्टी में शुमार है, सो अपने मेल इनबाक्स का थोड़ा बहुत ज़ायज़ा वगैरह लिया ही था, कि एक हितैषी का मेल देखा.. वैसे तो इनका लगाई-बुझाई करने जैसा व्यक्तित्व नहीं है,  पर इन्होंने श्री ई-स्वामी जी के किसी साइड एफ़ेक्ट पोस्ट का जिक्र कर, इशारा दिया कि मैं  अपना  भी पक्ष रखूँ ! अब मैं अपना भेजा तो अंबाला में छोड़ आया हूँ, गुड़ाई-निराई व सिंचाई के लिये, क्या करूँ ? पक्ष धरी धरी.. या न धरी !

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लेकिन अपना पक्षवा काहे रखूँ, भाई.. ई कोनो ज़िल्ले-इलाही हैं ? अगर हैं भी, तो होंगे... ईहाँ सैकड़न के भाव से स्वामी भरे पड़े हैं.. सभी समझते अपने को तारणहार
आजौकाल एक फँसा पड़ा है, दर्ज़नन के भाव से बेभाव की पड़ रही है, स्वा्मी अमृतानंद को.. बोलिये
गली गली में फलाहारी, वृथाकारी, ब्रह्मचारी, दुराचारी, व्यभिचारी इत्यादि जनता बेचारी को चर रहे हैं
धत्त-स्वामी, हट्ट-स्वामी, ऊ-स्वामी, ई-स्वामी.. अब किस किस को क्या क्या साइड-इफ़ेक्ट होता है, हम्मैं क्या करना ? लै दस्स, भगवान का इफ़ेक्ट भले न दिखे.. स्वामियों का इफ़ेक्ट औ' साइड-इफ़ेक्ट तो जग को गंधा रहा है इंटरनेट को भी नहीं बख़्सा, आसमान से गिरे.. नेट पर अटके, भला यह कोई बात हुई ? हे राम.. नेट पर साँस भी न ले पाये थे, कि यहाँ भी ई-स्वामी ! क्या पता, रामचन्द्र क्या कह गये रहें अपने सिया से.. त्राहिमाम त्राहिमाम, हम तो ईहाँ देख रहें हैं, एक अउर स्वामी ?     

बहुत गुलामी हुई गयी भगवन, अब क्या ई-ग़ुलामी भी करवाओगे ?

अमर कुमार का ई-कचरा 

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मन में बहुत कुछ चलता है.. यानि कि यही सब ! मन है तो मैं हूँ, मेरे होने का दस्तावेजी प्रमाण बन रहा है.यह  विचार, पाकिट में पड़ा गुरु ज्ञानदत्त जी का यह सूत्र चिढ़ा रहा है.. चल रहा है, तो ठेलो ! सो, किंचित विचलित हुआ, पर यह स्वमिया शुरु से ही बड़ा खुरखुंदी है... स्थितप्रज्ञ तो नहीं ही लगता, शायद मुझे विचलित करना ही उसका मन्तव्य रहा हो, ज़बरन दिमाग को झटका देकर, बाहर आकर अपने एक प्रिय आँवलें के पेड़ के नीचे बैठ गया, शांति की आस में.. एक बाग के बीचोबीच मेरा आवास है, आबादी से कुछ दूर एक अलिखित  से डोन्ट डिस्टर्ब डिस्टेन्स पर..इस सुख से वंचित बंधु इससे मिलने वाले मनोरम एहसास को महसूस करने को आमंत्रित हैं , इंडिया के रोम..  यानि कि अपुन सोनिया के रायबरेली में 

सामने निर्माणाधीन चहारदीवारी चार-पाँच ईंट तक उठ कर रुकी हुई है,
वैभव और रिशी के बीच की बहन पल्लवी उस पर उछल-कूद मचाये है
( यह पल्लवियाँ ऎसी ही खुराफ़ाती होतीं हैं क्या ? एक पल्लवी जोशी अभिनेत्री को जानता था, बड़ी भूचाली कन्या थी..एक ताँगे वाली पल्लवी है, हमारे कबीले में भी,...खैर ! ) हमारे पोस्ट की इस पल्लवी बिटिया के संग आज एक कोई नया लड़का भी है । मात्र 4 या 4½ वर्ष का यह बच्चा दोनों हाथ व पैरों का सहारा लेकर लगभग काँखते हुये इन ईटों पर चढ़ता है.. इतनी ऊँचाई तक जा फ़ुरसतिया ब्रांड पुलकित च किलकित होते हुये, सबको शेरपा-तेन्ज़िंगनुमा  एक स्माइल देता है, आवाज़ भरसक मोटी बना कर,सबको पुकार पुकार अपना करतब मिस न करने की हिदायत भी दोहराये जा रहा है. फिर धम्म से कूद पड़ता,  यही क्रम चल रहा है । कूदते हुये स्वयं ही मुँह से आवाज़ भी निकालता है, अंकल देखो, देखिये.. हैय्यऽहः धर्रड़ाम्म, अब देखना.. देखो देखो, ओऽओय्यः धऽड़ाम्म.
अपनी इतनी बड़ी उपलब्धि से पुलकित होता जाता उसका चेहरा  देखते ही बनता था,आनन्दम..वह विजय आभा ! 

arrows जैसे कि कोड बदल बदल कर साफ़्टवेयर बनाने वाले मिस्त्री एक दूसरे से अपनी उपलब्धि बघारते हैं               व उसपर ध्यान न देने वालों को देख लेने की धमकी देने के अंदाज़ का अनोखापन,अति आनन्दम
धमकी भी क्या.. कि जाओ तुमसे नहीं बोलेंगे ! भला किस पाषाणहृदय के मन में रस नहीं घुलेगा ?
आनन्दम च आनन्दम, ज़रूर इसपर कभी पोस्ट लिखूँगा, कैसे लिखा जाय.. इसी पर सप्रयास मनन कर रहा था.. लिखने-ऊखने में मेरा दिमाग दर-असल एक सुस्त किसिम के बाबू-किरानी की तरह टालू व्यवहार किया करता है, शनैः शनैः.... धीरे धीरे..किसी भी घटनाक्रम की फ़ाइल तो खोल लेगा.. फिर उसपर, सुस्त रफ़्तार बैलगाड़ी सा.. और से भी और धीरे धीरे मनन करते करते जैसे ऊँघ जाता है । फिर थके होने का बेवज़ह बहाना बना, मनन हो गया, अब बाद में इसपर खनन करेंगे कह कर पूरी की पूरी फैइलिया खोपड़ी के पिछले कोने में कहीं दबा-सरका देता है, श्री आलोक पुराणिक कृपया ध्यान दें,सुखराम से सीख लेकर मैंने डायरी में कुछ भी दर्ज़ करने की आदत से तौबा कर ली है, आप भी कल्लो !  सो मेरा दस्तावेज़ी मन दिल को बहलाने को ग़ालिब के अच्छे ख़्यालों की गवाही में, आगामी किसी मनन सत्र में फ़रदर खनन करने का भरोसा दिला, इस मनन को दफ़न कर देता है,  इसीलिये रह गया.. यूँ ही निट्ठल्ला !  अलबत्ता मुझको यह इत्मिनान दिलाता है, कि..आगामी किसी संभावित खनन में इसी में से एक नायाब हीरा सा पोस्ट निकाल कर दिखलाऊँगा,  इन टिप्पणीचूसों को..arrows

eswami

अपनी सोच का यह लड्डू मन ही मन टूँग रहा था,कि.. ... कि,  क्या ?
अरे, थोड़ा दम धरने दो.. कोई भूचाल नहीं आया, यह तो मेरी वाली ' ..कि ' हैं ! तो यह तथाकथित कि,साइड-डोर से एक अमरूद कचरती हुई पंडिताइन के रूप में अवतरित हुईं.. कचर कचर कचर..ऎई, कचर.. तुमसे ही कह रहीं हूँ, कचर कचर... नहाओगे नहीं ? कच्च कच्च, भईय्या तुम्हारी...कचर..कचर कचर,      ये छुट्टी क्या होती है.. मेरा तो सारा.. कचर कचर सेड्यूल ( सोने का ) बिगड़ जाता है, कच्चक कच्च....चलो उट्ठो.. कचर कचर कचर.. निट्ठल्ले बैठे कैसे समय काट लेते हो..कचर कचर ! अब इनको बीबी के परमानेन्ट पोस्ट पर बहाल किहौ है.. तो सुनो, कुछ तो बीबी कहेगी.. बीबियों का काम है कैनाऽ ऽ..छोड़ोऽ बेकार की इस कचर-कचर में छिन न जायेऽ चैना ♫♪ मैंने उचटती हुई एक थेथ्थर दृष्टि उन पर डाली, एक पर्याप्त उत्तर, "चलता हूँ यार, दम न करो " फिर सामने वाले बच्चे की शौर्य-क्रीड़ा देखने लगा,  मेरी दृष्टि का पीछा कर, वह भी बच्चे पर केन्द्रित होती भयीं, आंटी को दिखा कर वह फिर कूद पड़ा, धर्रड़ाम्मः, इस बार दो गुलाटी खा स्पाइडरमैन सा खड़ा भया पुल्लिंग चाहे जिस आयु का भी हो, स्त्रीलिंग को देखकर क्यों करतबी हो जाता है ? सो, मोहतरमा कचर कच्च के कंठ से फूटा, “ बच्चे को देखो तो, इतनी कम उम्र में भी किस तरह  बेचारा कूद कूद कर अपने को शाबासी दे रहा है… “ अमरूद पर हुआ एक और लास्ट-ओवर दंतप्रहार, ख़च्चाक कच्चक कच्चक कच्च...   कौन है यह , .. कचर कचर कचर... कचर, तुम इसको, बच्चे को जानते हो ?   यह बच्चा कौन है ? मैं उसको देख देख, अब तक इतना मुदित हो गया था.. कि हठात मेरे मुँह से निकल पड़ा…. ये बच्चाऽ ?  नाम तो यार मैं भी नहीं जानता, यह बच्चा शायद … ठीक से तो पता नहीं,पर  समझो तो लगता  है  अपना ई-स्वामी !" श्री विशु उर्फ़ ई-स्वामी   

हो सकता है,कि मेरे प्रमुदित मन के अवचेतन में भी स्वामी जी कचर कचर मचाये रहें हों, तभी तो.. वरना इस तरह, ऎसा ज़ुलुम बात हमरा मुँह से निकलता ही कइसे, भाई ? एथिक्स भी तो अथिया कुच्छौ  है न जी ?

“ई-स्वामी ? यह स्वामी कौन है, क्या यहाँ भी स्वामी होते हैं, कौन है.. ई-स्वामी ?”  अब उनके ज़ुल्मी संग लड़ी भयी अनुभवी  आँखों में बार्नविटा क्विज़ कांटेस्ट के रैपिड राउंड प्रश्नावली की ये इनबिल्ट अधीरता मुझको ऎसे ही परेशान करती है ! “क्या यार,तुम भी ? अरे, ई-स्वामी बोले तो ई-स्वामी, इतनी भी समझ नहीं है ?” अब धनिये की चटनी चाटी जा रही है, “तो चिल्ला क्यों रहे हो ? मैं तो यह पूछ रही हूँ, कि जैसे अरुण-पंगेबाज़ हैं तरुण- निट्ठल्ला चिंतन हैं, लिंकित मन-नीलिमा हैं, अपने अनूप जी-फ़ुरसतिया हैं.. वैसे ही इसका  भी  तो  कोई  नाम होगा ?” ब्लागीवुड की इतनी गहन जानकारी देख, मैं अचंभित होगया..‘कैसी चलायी ये हवा भाभी रीता पांडे ने’

“हाँ हाँ हाँ, याद आया.. वही तो नहीं, जो तुम्हारी टिप्पणी माडरेट-वाडरेट करके लौटा दी थी, कि तुम चार महीने से लिख रहे हो, मैं चार साल पुराना ब्लागर हूँ. जाकर पहले मेरा लिखा पढ़ो, फिर टिप्पणी करने लौट कर आओ।”

अमर, आपकी टिप्पणी मिली. ज़रा ड्राफ़्डिया मोड में लिखी हुई है! यह समझ में नहीं आया की आप किसे गरिया रहे हैं? किसके लेखन को कचरा कह रहे हैं? कौन दबाव में लिख रहा है और कौन वेश्यावृत्ती कर रहा है? आपकी यह टिप्पणी प्रकाशित नहीं कर रहा, आपका संदेश मुझ तक पहुंचना था पहुंच गया, ठीक! मेरा एक निवेदन है, प्रवचन देने में जल्दबाज़ी ना करें, आप चार माह से ब्लागिंग कर रहे होंगे हम साढे चार साल से हिंदिनी चला रहे हैं! जरा समय लें और हमारा पुराना लिखा ही पढ लें! शेष कुशल, ई-स्वामी 2008/8/18 WordPress A new comment on the post #182 "प्रतिक्रियाएं जो टिप्पणियों में नहीं मिलतीं! " is waiting for your approval http://hindini.com/eswami/?p=182 Author : डा.अमर कुमार (IP: 59.94.129.81 , 59.94.129.81) E-mail : c4Blog@gmail.com URL : http://c2amar.blogspot.com Whois : http://ws.arin.net/cgi-bin/whois.pl?queryinput=59.94.129.81

“हाँ यार, वही !” मैं आज़िज़ हो गया, इस वाचाल नारी से !“क्या फिर कुछ लिखा-ऊखा है, क्या नाम है, इसका ?” फिर वही ढाक के तीन पात..मैं खीझ गया, “ अरे, तुम उसके नाम के पीछे काहे पड़ी हो, जब वह अपने माँ-बाप का दिया नाम ज़ाहिर नहीं करना चाहता, तो मुझे क्या पड़ी है.. होगी कोई बात ?” हार कैसे मान जाय, सो एक छोटा सा ज़ुमला उछाल दिया, “फिर भी..?” हे राम, अब इसका क्या करूँ.. सो, मैं चिल्लाने लग पड़ा, “ जाकर ताली ठोकूँ, शौनक की अम्मा, ज़रा ये तो बता, तेरे शौनक के बप्पा का नाम क्या है ? वैसे भी इस सब का उसकी सोच, लेखन और भाषा से क्या ताल्लुक है ?” उन्होंने मुँह फेर लिया, पर बन्द न किया,” मुझे क्या करना, लेकिन कहाँ का है,यह तो बता दो ?” यह थी अगली  बाल! अज़ीब परेशानी है, पता नहीं क्यों इस सनीचर को आज ही सवार होना था, “अमें यार खोपड़ी ख़लास मत करो, सभी उड़न-तश्तरी नहीं हुआ करते, कि जबलपुर से कनाडा सर्रर्रर्र हो जाने को स्वीकार करें.. यह शायद अंबाला से लांच हुये थे, अब ग्लोबल आरबिट में मँडरा रहे हैं, नीचे उतर आयें..फिर काहे के ई अउर काहे के स्वामी ? वैसे CA से कंट्रोल किये जाते हैं ।” अब आगे कुछ न पूछना, पाप लगेगा ! पर पंडिताइन आज भिड़ाने के मूड में है,” फिर भी जाकर देख तो लो, कि क्या उल्टा-सीधा लिखा है, वहाँ ?“ अरे राम, ई शनिचरवा के हम का करी ? “ तुम तो जानती हो कि मैं कई ज़गहों पर मूतने भी नहीं जाता, फिर क्यों भेज रही हो ? जाऊँगा तो कुछ लिखूँगा ज़रूर, कुछ टिप्पणी बक्से ऎसे हैं, जो सब हज़म कर जाते हैं, इट्स शीयर वेस्टेज़ आफ़ टाइम ! ज़नानियाँ ऎसा करें तो ठीक भी लगता है, पर,” इससे आगे मैं बोल नहीं पाया

क्योंकि बीच में ही टपक पड़ीं,” पर ज्ञानदत्त जी को लेकर..” छड्डयार, उनकी बात अलग है, मुझको हमेशा लगता है कि टिप्पणी-लोलुपता के चलते अपनी विद्वता व क्षमता का सदुपयोग न करके वह ज़मीनी हक़ीक़त को इग्नोर कर जाते हैं ! इशारों में ही तो बताया,और क्या ? अपना बिना परिचय दिये मिल भी आया, और क्या ? अब बस्स!

वैसे मेरे शनिवार अवकाश का तो कचरा हो ही गया, यह कचरा पोस्ट लिख कर ! इस माहौल में सृजनशीलता..   ना बाबा, ना !

cvcbttn आदरणीय दिनेशराय द्विवेदी जी, आपकी रात्रि/प्रातः 3 बजे वाली पोस्ट की फ़रमाइश पूरी की गयी, ख़ुश ! लवली बिटिया, तू अपनी ज़ान की ख़ैर मना, हमारे तंत्र द्वारा रख़्शंदा नेट पर सक्रिय पायी गयी है, औ’ तू फँस गयी ! निजता की बात करने वालों से बाद में बात होगी । ई-कचरा जारी रहेगा, असहमत, कुछ तो है..पर

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यह अपना हिन्दी ब्लागजगत, जहाँ थोड़ा बहुत आपसी विवाद चलता ही है, बुद्धिजीवियों का वैचारिक मतभेद !

शुक्र है कि, सैद्धान्तिक सहमति अविष्कृत हो जाते हैं, और यह ज़्यादा नहीं टिकता, छोड़िये यह सब, आगे बढ़ते रहिये !

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