जो इन्सानों पर गुज़रती है ज़िन्दगी के इन्तिख़ाबों में / पढ़ पाने की कोशिश जो नहीं लिक्खा चँद किताबों में / दर्ज़ हुआ करें अल्फ़ाज़ इन पन्नों पर खौफ़नाक सही / इन शातिर फ़रेब के रवायतों का  बोलबाला सही / आओ, चले चलो जहाँ तक रोशनी मालूम होती है ! चलो, चले चलो जहाँ तक..

पोस्ट सदस्यता हेतु अपना ई-पता भेजें



NO COPYRIGHT यह पृष्ठ एवं इस ब्लाग पर प्रकाशित सम्पूर्ण सामग्री कापीराइट / सर्वाधिकार से सर्वथा मुक्त है ! NO COPYRIGHT टेम्पलेट एवं अन्य सुरक्षा कारणों से c+v नकल-चिप्पी सुविधा को अक्षम रखा गया है ! सर्वाधिकार मुक्त पृष्ठ सुधीपाठक पूर्ण आलेख अथवा उसके अंश को जानकारी के प्रसार हेतु किसी भी प्रकार से उपयोग करने को स्वतंत्र हैं ! यह पृष्ठ एवं इस ब्लाग पर प्रकाशित सम्पूर्ण सामग्री कापीराइट / सर्वाधिकार से सर्वथा मुक्त है ! NO COPYRIGHT टेम्पलेट एवं अन्य सुरक्षा कारणों से c+v नकल-चिप्पी सुविधा को अक्षम रखा गया है ! सर्वाधिकार मुक्त पृष्ठ सुधीपाठक पूर्ण आलेख अथवा उसके अंश को जानकारी के प्रसार हेतु किसी भी प्रकार से उपयोग करने को स्वतंत्र हैं ! यह पृष्ठ एवं इस ब्लाग पर प्रकाशित सम्पूर्ण सामग्री कापीराइट / सर्वाधिकार से सर्वथा मुक्त है ! NO COPYRIGHT टेम्पलेट एवं अन्य सुरक्षा कारणों से c+v नकल-चिप्पी सुविधा को अक्षम रखा गया है ! सर्वाधिकार मुक्त पृष्ठसुधीपाठक पूर्ण आलेख अथवा उसके अंश को जानकारी के प्रसार हेतु किसी भी प्रकार से उपयोग करने को स्वतंत्र हैं ! यह पृष्ठ एवं इस ब्लाग पर प्रकाशित सम्पूर्ण सामग्री कापीराइट / सर्वाधिकार से सर्वथा मुक्त है !NO COPYRIGHT टेम्पलेट एवं अन्य सुरक्षा कारणों से c+v नकल-चिप्पी सुविधा को अक्षम रखा गया है ! सर्वाधिकार मुक्त पृष्ठ सुधीपाठक पूर्ण आलेख अथवा उसके अंश को जानकारी के प्रसार हेतु किसी भी प्रकार से उपयोग करने को स्वतंत्र हैं ! यह पृष्ठ एवं इस ब्लाग पर प्रकाशित सम्पूर्ण सामग्री कापीराइट / सर्वाधिकार से सर्वथा मुक्त है ! NO COPYRIGHT टेम्पलेट एवं अन्य सुरक्षा कारणों से c+v नकल-चिप्पी सुविधा को अक्षम रखा गया है ! सर्वाधिकार मुक्त पृष्ठ सुधीपाठक पूर्ण आलेख अथवा उसके अंश को जानकारी के प्रसार हेतु किसी भी प्रकार से उपयोग करने को स्वतंत्र हैं ! यह पृष्ठ एवं इस ब्लाग पर प्रकाशित सम्पूर्ण सामग्री कापीराइट / सर्वाधिकार से सर्वथा मुक्त है ! NO COPYRIGHT टेम्पलेट एवं अन्य सुरक्षा कारणों से c+v नकल-चिप्पी सुविधा को अक्षम रखा गया है ! सर्वाधिकार मुक्त पृष्ठ सुधीपाठक पूर्ण आलेख अथवा उसके अंश को जानकारी के प्रसार हेतु किसी भी प्रकार से उपयोग करने को स्वतंत्र हैं !सर्वाधिकार मुक्त वेबपृष्ठ

NO COPYRIGHT यह पृष्ठ एवं इस ब्लाग पर प्रकाशित सम्पूर्ण सामग्री कापीराइट / सर्वाधिकार से सर्वथा मुक्त है ! NO COPYRIGHT टेम्पलेट एवं अन्य सुरक्षा कारणों से c+v नकल-चिप्पी सुविधा को अक्षम रखा गया है ! सर्वाधिकार मुक्त पृष्ठ सुधीपाठक पूर्ण आलेख अथवा उसके अंश को जानकारी के प्रसार हेतु किसी भी प्रकार से उपयोग करने को स्वतंत्र हैं ! यह पृष्ठ एवं इस ब्लाग पर प्रकाशित सम्पूर्ण सामग्री कापीराइट / सर्वाधिकार से सर्वथा मुक्त है ! NO COPYRIGHT टेम्पलेट एवं अन्य सुरक्षा कारणों से c+v नकल-चिप्पी सुविधा को अक्षम रखा गया है ! सर्वाधिकार मुक्त पृष्ठ सुधीपाठक पूर्ण आलेख अथवा उसके अंश को जानकारी के प्रसार हेतु किसी भी प्रकार से उपयोग करने को स्वतंत्र हैं ! यह पृष्ठ एवं इस ब्लाग पर प्रकाशित सम्पूर्ण सामग्री कापीराइट / सर्वाधिकार से सर्वथा मुक्त है ! NO COPYRIGHT टेम्पलेट एवं अन्य सुरक्षा कारणों से c+v नकल-चिप्पी सुविधा को अक्षम रखा गया है ! सर्वाधिकार मुक्त पृष्ठसुधीपाठक पूर्ण आलेख अथवा उसके अंश को जानकारी के प्रसार हेतु किसी भी प्रकार से उपयोग करने को स्वतंत्र हैं ! यह पृष्ठ एवं इस ब्लाग पर प्रकाशित सम्पूर्ण सामग्री कापीराइट / सर्वाधिकार से सर्वथा मुक्त है !NO COPYRIGHT टेम्पलेट एवं अन्य सुरक्षा कारणों से c+v नकल-चिप्पी सुविधा को अक्षम रखा गया है ! सर्वाधिकार मुक्त पृष्ठ सुधीपाठक पूर्ण आलेख अथवा उसके अंश को जानकारी के प्रसार हेतु किसी भी प्रकार से उपयोग करने को स्वतंत्र हैं ! यह पृष्ठ एवं इस ब्लाग पर प्रकाशित सम्पूर्ण सामग्री कापीराइट / सर्वाधिकार से सर्वथा मुक्त है ! NO COPYRIGHT टेम्पलेट एवं अन्य सुरक्षा कारणों से c+v नकल-चिप्पी सुविधा को अक्षम रखा गया है ! सर्वाधिकार मुक्त पृष्ठ सुधीपाठक पूर्ण आलेख अथवा उसके अंश को जानकारी के प्रसार हेतु किसी भी प्रकार से उपयोग करने को स्वतंत्र हैं ! यह पृष्ठ एवं इस ब्लाग पर प्रकाशित सम्पूर्ण सामग्री कापीराइट / सर्वाधिकार से सर्वथा मुक्त है ! NO COPYRIGHT टेम्पलेट एवं अन्य सुरक्षा कारणों से c+v नकल-चिप्पी सुविधा को अक्षम रखा गया है ! सर्वाधिकार मुक्त पृष्ठ सुधीपाठक पूर्ण आलेख अथवा उसके अंश को जानकारी के प्रसार हेतु किसी भी प्रकार से उपयोग करने को स्वतंत्र हैं !सर्वाधिकार मुक्त वेबपृष्ठ
Showing posts with label कवितायें. Show all posts
Showing posts with label कवितायें. Show all posts

04 February 2009

बिन बुलायी, एक अपूर्ण कविता

Technorati icon

आज व्याधिग्रस्त माया श्रीवास्तव धुर 5 बजे अवतरित हुईं, टालने का प्रश्न नहीं.. पर थोड़ी व्यग्रता थी क्योंकि यह आज के परामर्श समय की अंतिम बेला थी, हिस्ट्री लेने के दौरान मेरे मुँह से ' परिवेश ' शब्द का उल्लेख  हुआ । बस, उनके पतिदेव महोदय ने मुझसे एक छोटा सा ब्रेक लेने का अनुयय किया,  और बिना किसी भूमिका के यह पंक्तियाँ सुनाने लग पड़े । एक-डेढ़ मिनट के बाद ही मैंने एक ट्रैफ़िक पुलिसिया इशारा कर उन्हें रूकने का संकेत दिया, और अपना काम पूरा कर सका.. पर एक स्थानीय कवि के इस कविता की पंक्तियाँ रह रह कर जैसे चिंचोड़ रही है, इतना अलाय-बलाय, लटरम-पटरम नेट पर ठेलता / पेलता रहता है, थोड़ा बहुत जगह मुझे भी दे दे । मैं खीझ गया, " तू तो अभी अपूर्ण है.. जो कुछ लाइनें छोड़ आयीं है.. जा उन्हें भी लेकर आ, तो विचारार्थ सहेज लूँगा । " कविता के मुखड़े से ही उसके सामयिक होने का दंभ छलका पड़ रहा था । सो, एकदम से तमक गयी, तैश में अपनी दो-चार और लाइनें झटक कर फेंक दीं और मटक कर चल पड़ीं " तू तो स्वयं में ही अपूर्ण है मानव ! निरूपाय होकर या विभोर होकर, तू मेरे आँचल में ही आँसू छलकाने आता है । अब इतना बढ़ चढ़ कर तो न बोल ।" ई का हो ? अई देखा, कवितिया एतना अकड़ती काहे है, भाई ? हम ठहरे ताऊ स्कूल आफ़ ब्लागर के ज़ाहिल-बुच्च डाक्टर मनई, जो असोक चक्रधर जी से एथिआ ई कबीता की खास फरमाईसी परिभाखा लिखाईस है :

गोया रोगी होगा पहला कवि, कराह से उपजा होगा गान
टीसती फुड़िया से चुपचाप ,  बही होगी कविता अनजान

अरी दईय्या रे, कविता जी बिफ़र कर पलटीं.. "ऎई, मवाद से मेरी तुलना तो करना मत ? पहले ही मेरा ऋँगार पोंछ पाँछ कर दुनिया की गंद मेरे से परोसवा रहा है, और अब सीधे सीधे मवाद पर मत उतार ।" फिर ठिठक कर जैसे मुझे निरूत्तर करने को प्रहार किया, " अच्छा चल, मवाद ही सही.. लेकिन बह जाने से तू और तेरे रोगी का दर्द हल्का हुआ कि नहीं, बोल ? " बोलिये न !

feelingwarpedvअय-हय, इनका देखो  ? अधूरी हैं, तब ये हाल है, दो चार अच्छी लाइनें और मिल जायें तो हम जैसे टाइमखोटीकारों की गुलामी भी मंज़ूर न करें ! सो, मैंने अपना पिंड छुड़ाने की कोशिश की, " अच्छा चल, तू जैसी है वैसी ही रह, मेरे को क्या ? आओ, जरा  इधर को आ.. तुझे अंतर्जाल पर टाँग दूँ.. ताकि तेरी हसरत भी पूरी हो जाये । पर तेरी वज़ह से कोई मुझे हूट-हाट करेगा, तो तेरा गला घोंट दूँगा । वईसे भी ईहाँ ब्लाग-प्रदेश में गुणीजन अल्पसंख्यक हैं ! और यह बहुसंख्यक समाज भी चर्चाजगत का अल्पसंख्यक कोटा  तक हड़पे बैठे हैं,  हाँज्जी.. सच्ची !  उसको क्या कहते हैं.. हाँ, तो  अपलोड होते होते  भी वह  ढीठायी से हँसती है... डाक्टर,  बहाना चाहे जो भी बना लो.. पर गाहे बगाहे अपनी सुविधानुसार मेरा गला तुम लोग वैसे भी घोंटते रहते हो कि नहीं ?

न जन कैसे जी रहा है, उमस के वातावरण में
दुःस्वप्न में दिन बीतते रात बीतती जागरण में

है यदि बेशर्म आँखें, घूँघट व्यर्थ ही क्या करेगा
मानवता नग्न घूमती सौजन्यता के आवरण में

कपटयुग है घोर यह, हुये राम औ'  रावण एक हैं
लक्षमणों का ही हाथ रहता आज सीताहरण में

शब्द को पकड़ो यदि तो सहसा अर्थ फिसल छूटते
सन्धि कम विग्रह अधिक आज क्यों व्याकरण में

छल-बल के माथे मुकुट है सत्य की है माँग सूनी
क्यों कोयल गीत सीखती बैठ कौव्वों के चरण में

चिढ़ा रहे  ये तुच्छ जुगनू चाँदनी के चिर यौवन को
भगत बगुले  हैं मेंह हड़पते हँस के छद्म आवरण में

यह मुँहजोर ठहाके के साथ ऊपर से भी एक ताना कसने से बाज न आयी, " अब, अब.. इस स्थिति की जैसी पूर्णता चाहता है.. वैसी लाइनें तू ड्राइंगरूम में आराम से चाय सुड़क सुड़क कर गढ़ता रह ! या फिर, वर्ष दर वर्ष अनाचार कि नयी लाइनें स्वतः ही जुड़ती जायेंगी और तुझे बिना प्रयास ही अपनी दुर्दशा के नये तराने मिलते रहेंगे ।" पर, दो हज़ार से कम में इसे मंच से न पढ़ना

इससे आगे

19 January 2009

तुम पार नेट परमेश्वर तुम ही नेट पिता

Technorati icon

google-animated-holoween-logo 

ॐ जय गूगल हरे, स्वामी जय गूगल हरे
फ़्रस्ट (एटेड ) जनों के संकट, त्रस्त जनों के संकट
एक क्लिक में दूर करे
ॐ जय गूगल हरे…

जो ध्यावै सो पावै
दूर होवै शंका, स्वामी दूर होवै शंका
सब इन्फ़ो घर आवै, सब इन्फ़ो घर आवै
कष्ट मिटै मन का
ॐ जय गूगल हरे…

नेट पिता तुम मेरे
शरण गहूं किसकी, स्वामी शरण गहूं किसकी
तुम बिन और न दूजा, तेरे बिन और न दूजा
होप करूं किसकी
ॐ जय गूगल हरे…

तुम पूरन हो खोजक
तुम वेबसाइटयामी, स्वामी तुम वेबसाइटयामी
पार नेट परमेश्वर, पार नेट परमेश्वर
तुम सबके स्वामी
ॐ जय गूगल हरे…

तुम ब्लागर. के फ़ादर
तुम ही इक सर्चा, स्वामी तुम ही इक सर्चा
मैं मूरख हूं सर्चर, मैं मूरख हूं सर्चर
कृपा करो भरता
ॐ जय गूगल हरे…

तुम सर्वर के सर्वर
सबके डाटापति, स्वामी सबके डाटापति
किस विधि एन्टर मारूं, किस विधि एन्टर मारूं
तुममें मैं कुमति
ॐ जय गूगल हरे…

दीनबंधु दु:खहर्ता
खोजक तुम मेरे, स्वामी शोधक तुम मेरे
अपने फ़ण्डे दिखाओ, कुछ तो टिप्पणी दिलाओ
साइट खड़ा तेरे
ॐ जय गूगल हरे…

बोरियत तुम मिटाओ
टेंशन हरो देवा, स्वामी टेंशन हरो देवा
गूगल अकाउण्ट बनाया गूगल अकाउण्ट बनाया
पाया ब्लागिंग मेवा स्वामी पाया ब्लागिंग मेवा
जो नर ब्लागिंग धावैं करैं निजभाखा सेवा
ॐ जय गूगल हरे

go

इससे आगे

09 December 2008

चैट्क्क.. डोन्ट वरी फ़ॅऽर इट, अंकल !

Technorati icon

यह विषय पड़ा तो बहुत दिनों से था... पर वही सनातन रोना, कुछ असलियत का और कुछ फ़ैशन में, बोले तो.. समय का टोटा, वह तो आपके पास भी होगा ! ब्लागिंग और लिखने का विषय ?  अरे, राम भजो... . जिस दिशा में  भी नज़र डालो, विषय  ललकार  रहे हैं ! ब्लागर वही, जो बात  पकड़ बतंगड़ बनाये ! टैग जो मन आये, वही घुसेड़ दो... संस्मरण, संवेदना, हलचल, विविध, व्यंग्य या कुछ भी ? अपुन के समीर भाई जी ने कहीं लिखेला है, " ब्लागिंग की  लत लग भर जाये, फिर तो सोते में, जागते हुये , रास्ते में, श्मशान में, लड़की में, कड़की में.. जित देखो ब्लाग सब्जेक्ट , जैसे मीरा के कान्हा ! उन्होंने तो अपना पक्का इंतज़ाम कर ही लिया है..लोकल ट्रेन के डिब्बों में भी अपना माल ताड़ लेते हैं, और मसाला लाइब्रेरी में मिल जाता है, सेफ़ हैं.. लकी हैं ! पर,  मुझे तो पहले का सोचा हुआ हर एक नुक्ता..  जैसे अब कुरेद रहा हो !

हुआ यह कि चिट्ठाचर्चा  के जिसका जितना आँचल था, उतनी ही सौग़ात मिली  पर मेरी एक टिप्पणी दर्ज़ होगी,
".....  लट्ठ ताऊ का पेटेन्ट है, राज भाटिया छुट्टियों पर निकले हैं, और यहाँ..
बिटिया को उड़ान भरने की लेट हो रही है,
जब तक हमारे सारथी जी, फ़्लाइट का कोई अतिशुद्ध हिन्दी विकल्प नहीं निकालते ,
तब तक आप अपनी बेटियों को उड़ने से कैसे रोक सकते हैं ?
सो, अभी चलता हूँ ! ....."
इसमें यह जिक्र करना आवश्यक न समझा कि मेरी बेटी की एक सहेली भी आयी थी, शिवानी लोढा ! कभी महाराष्ट्र से बाहर न निकली थी, सो वह आई थी यू.पी. का ज़लाल देखने ! जो भी देखा हो, पर  उसका रोज सुबह घूम घूम कर पेड़ पर लटके शरीफ़े, पकते अमरूद और बचे खुचे करौंदों को देख देख रोमांचित होना, मुझे आह्लादित करता था.. " आईला, दीज़ ग्वाआज़.. ओह ईषी, इट इज़ अ लाइफ़टाइम एक्सपेरियेन्स ! सच्ची अंकल, मैंने इत्ती बड़ी ज़िन्दगी में फ़र्स्ट टाइम देखा है.." इत्ती बड़ी पर उसका खास जोर रहता ! तो अपने स्टेट गेस्ट.. शास्त्री जी नाराज़ न हों, भूलसुधार किये लेता हूँ... तो, अपने राजकीय मेहमान को सकुशल विदा करना भी एक उत्तरदायित्व था ! मेरी बेटी ईषिता तो बाय बाय कर गयीं, फ़्लाइट समय पर थी । शिवानी चूँकि बाद में, लालू तत्काल पर आयी थी, सो उसे ट्रेन से ही जाना था, और.. उसे सी आफ़ करने तक लादे-लादे लखनऊ में विचरते रहना और  नान-स्टाप बकर बकर सुनते रहना था ! शाम को पुष्पक है, स्टेशन सात बजे पहुँचना है... तब तक ?

तब तक..' ये खाओगी, अच्छा यह ट्राई करके देखो, जरा शुक्ला के दहीबड़े भी चख कर देखो । ' यही सब चलता रहा । बेचारी पंडिताइन कुढ़ कुढ़ कर मरी जा रहीं थीं.. छिपा कर आँख तरेरा, "मैं कभी इन चीजों के लिये कहती हूँ, तो तुम उन्नीस का पहाड़ा बताने लगते हो, और इसपर बिछे जा रहे हो ? " हाय रब्बा, तूने अपनी रचना में इतना सारा कुड़कुड़त्व क्यों भर रखा है ? बच्ची है, कुछ घंटो के लिये अपनी मेहमान है, शर्म करो ! " अच्छा तो मुझे शेखर के यहाँ छोड़ दो, ट्रेन के बाद आ जाना.."  उनकी ओर से शह दी गयी और मैंने मात स्वीकार कर ली !

लगता है, विषयांतर हो रहा है.. कीबोर्ड हाथ आ जाये तो कंट्रोल ही नहीं होता ! स्वामी-संयम अभी मुझसे दूर है ! कुलज़मा किस्सा यह कि शाम को स्टेशन पहुँचा, जब तक कार पार्किंग में अपना जगह बना पाती, तब तक मिस लोढा दो बैग लेकर नीचे कूद चुकीं थीं, एक बड़ा सूटकेस डिक्की में था ! " इट्स मिनिमम,  अंकल ! आफ़्टर आल यू विल हैव टू कैरी अटलीस्ट फ़ोर सेट्स फ़र सेवेन डेज़, ना ? " यह बेवज़ह सफ़ाई मैं तब तक एक दर्ज़न बार सुन चुका था। खैर.कार से उतरा तो देखा शिवानी बगल में ही खड़ी है, डिकी के पास, सूटकेस निकालने को तत्पर.शिवानी लोढा-ईषिता अमर-बिनावजह निट्ठल्ला उसके बैग कहीं आसपास नहीं दिख रहे थे । " बैग्ज़ ? " मेरी प्रश्नवाचक मुद्रा भाँप, वह तपाक से बोली, "ओह, यू मीन बैग्ज़ ? दे आर एट प्लेटफ़ार्म एन्ट्री गेट !" मैं मन ही मन दहल गया, ' अरे लड़की, यह यूपी है.. बैग तो अब ना मिलता ।' इन लड़कियों की छठी इन्द्रिय बड़ी तेज होती है, भई ! बिना कुछ पूछे ही खट से ज़वाब भी आ गया.. तेज तेज कदमों से सूटकेस घसीटती हुई, उसने दोनों कंधे उछाले, "  चैट्क्क.. डोन्ट वरी फ़ॅऽर इट, अंकल !" तालू से जीभ चटकाते हुये वह बोली, " डोन्ट वरी, नो वन विल टच इट.. दे मस्ट बी सेफ़ देयर । " वह किंचित ढीठायी से हँसती है.. " यू नो, पीपुल आर सो स्केयर्ड, दे वोन्ट इवेन टच द बैग्ज़ !" उसके इस तरह के मुँहजोरपन पर मैं मन मसोस रहा था, पर उसने अपना बकबक जारी रखा, " यू नो, अंकल.. इन दिस एट्मास्फेयर.. नो सेंसिबल परसन डेयर टच एनीवंस लगेज़.. एट नरीमन वी लीव आअर पर्स एंड लव टू वाच द फ़नी  पैनिकी फ़ेसेज़ !

इस लड़की पर क्रोध तो बहुत आ रहा था, लगातार अंग्रेज़ी गिटरपिटर, ऊपर से ऎसी गैरज़िम्मेदार ग़ुस्ताख़ी.. पर ? पर.. वही स्टेट गेस्ट का मसला और यूपी की इमेज़ ! जाओ रे लड़की, बहुत होगया..पंडिताइन भी प्रतीक्षा में होंगी! पोस्ट लम्बी होते जाने के आसार बन रहे हैं, वह अलग से ?  क्या करें, यह लड़की अब ज़ल्दी  जाती  भी तो नहीं !

पुष्पक एक्सप्रेस यार्ड से आकर प्लेटफ़ार्म पर लग चुकी थी, कोच B-2, बीटू.. बीटूबीटू... बीटू हाँ यह रहा बीटू ! बर्थ इसी में है, चाल्ह छे्त्ती टुर लै गड्डी विच्च ! वह ज़ल्दी से अपना बड़ा सा बटुआ खोला, दाँतों से ओंठ भींच कर अपना हाथ उसके अंदर डाल जादूगर कुंडू के गिल्लि-गिली बुब्ब्लाबू स्टाइल में हिलाती है..   खरगोश तो नहीं, हाँ एक अज़ीब सा डिब्बा निकाल कर उसमे जड़े आईने में चेहरा दायें बाँयें घुमा कर ज़ायज़ा लेती है, और तपाक से एक गोल डिब्बी निकाल काम्पेक्ट अपने चेहरे पर फेरने लगती है.. अचानक वह काम्पेक्ट की डिब्बी कब लिपस्टिक में तब्दील हो जाती है, पता ही नहीं चलता और वह तमाम तरह के मुँह बना हौले हौले लिपस्टिक अपने गंतव्य पर इधर उधर दौड़ा रही है । ई लेडीस लोग का यह तामझाम मुझे हमेशा से ही बड़ा रहस्यमय लगता रहा है.. सो आज भी खड़ा खड़ा उसे हैरत से  देखता रहा.. खाना खाकर सोने के लिये इसकी क्या ज़रूरत ?  उसके किसी अदृश्य एंटेना ने सहसा मेरी यह वेव-लेंग्थ पकड़ ली हो जैसे, ऎसे उसने चौंक कर देखा । " ओह सारी, जस्ट अ लाइट टच-अप !" अपनी खिसियाहट छिपाने का प्रयास करते हुये, वह बोली ! फिर बेसाख़्ता हँसने लग पड़ी, " जस्ट अ मेक-ओवर टू टैली माई फ़ेस विद माई आई.डी.कार्ड फोटो.. इन केस द ट्रेन ब्लास्ट्स एंड यू आर काल्ड टू आईडेन्टीफ़ाई मी !" मैंने अपने दाँत पीसे, लगता है आज पिट कर ही जायेगी यह परकाला ?

ख़ैर, एक एक करके दोनों गयीं ! लौटते समय बड़ा सूना लग रहा था. और मैं डा. बशीर की कहीं पढ़ी हुई नज़्म याद करने का प्रयत्न कर रहा था.. ' गुल नहीं, गुलज़ार हैं.. बेटियाँ ख़ुदा का उपहार हैं.. बेटियाँ तो ख़ुशबू का झोंका हैं.. ये खेलती-कूदती, मचलती-महकती ख़ुशबू की बयार हैं.. ' जैसा ही कुछ ! " कहाँ ध्यान है, तुम्हारा.. नींद आरही है, क्या ? " लो, पंडितइनिया ने चौंका दिया । इनका यही है, एक झपकी मार लेंगी.. फिर पुकार पड़ेंगी,जागते रहो..

_________________________________9 दिसम्बर, मंगलवार ____________________________

यह विभाजन रेखा क्यों ? क्योंकि यह घटना 17 नवम्बर की है.. पोस्ट लिखी गई 25 नवम्बर, मंगलवार को.. सोचा कि, फ़ाइनली कोई इमेज़-ऊमेज़ लगाकर शनिवार को पोस्ट करेंगे ! इसीलिये कहा है, " काल करे सो आज कर " क्योंकि 26/27 नवम्बर की रात में जो हुआ, उसके आगे यह पोस्ट अप्रासंगिक हो गया था ! आपही बताइये. कहाँ वह मौत का तांडव, और कहाँ असुरक्षित माहौल को  भी एन्ज़्वाय करती इस मुंबईया लड़की का ये अफ़साना !

विचारों की कड़की का बयार लगता है, पछुआ हो गई है..  कल छुट्टी है, आज कुछ पोस्ट करना है.. कल तो पंचम जी को हलाल कर दिया आज कुछ लिखने को ज़ंग लग गया है । सो इसी को झाड़-पोंछ कर पब्लिश किये देता हूँओह, मुंबई-अमरकेवल कुछ सेकेन्ड और लूँगा : यह ऊपर वाला इमेज़ लेकर एडिट करते समय यह फ़र्क़ कर पाना कठिन हो रहा था, कि यह चारबाग, लखनऊ का प्लेटफ़ार्म है या सी.एस.टी. का ? यह तो आपके शहर का भी हो सकता था ?  पर, ईश्वर न करे (क्योंकि, सरकार तो बेबस है) कि ऎसा हो.. मैं मन को भरोसा देने को ' राम की शक्ति-पूजा ' की लाइनें दिमाग में बरबस लाने का प्रयास करता रहा.. ठीक से याद न आयीं ! मुझे ही क्या, पूरे देश को ही भूल गया होगा...

ईश जानें, देश का लज्जा विषय
तत्व है कोई कि केवल आवरण
उस हलाहल-सी कुटिल द्रोहाग्नि का;
जो कि जलती आ रही चिरकाल से
स्वार्थ-लोलुप सभ्यता के अग्रणी
नायकों के पेट में जठराग्नि-सी !

नहीं.. नहीं, यह तो शायद दिनकर के कुरुक्षेत्र में है.. अब इतनी रात में किताब कहाँ मिले ?                       आप ही देख लीजियेगा ! निराला की लाइनें तो शायद यह हैं :

है अमानिशा, उगलता गगन घन-अंधकार;
खो रहा है दिशा का ज्ञान, स्तब्ध है पवन चार;

या यह ............................................................................ ? 

शत-शुद्धि-बोध-सूक्ष्मतिसूक्ष्म मन का विवेक,
जिनमें है क्षात्र-धर्म का घृत पूर्णाभिषेक,
जो हुये प्रजापतियों से संयम से रक्षित,
वे शर हो गये आज रण में श्रीहत, खण्डित !

मात्र 15 दिनों में एक पोस्ट का पूरा संदर्भ ही बदल गया.. , सिंहासन का सेमीफ़ाइनल चल रहा है, लोग झूम रहे हैं, बम फ़ुटा रहे हैं.. नाच रहे हैं, और हम कह रहे हैं कि विषय का टोटा है..यह भी भला कोई बात हुई,वाह !

इससे आगे

27 September 2008

रानी रूठेगी… अपना सुहाग लेगी

Technorati icon

बात तो भाई, एकदम्मै सही है. !  हाँ तो, शुरु किया जाय ? एक महीने का अंतराल होने को है.. और महीने में एक पोस्ट देने का वायदा भी है । मौका और मोहाल दोनों ही माक़ूल हैं  सो, इस नामाक़ूल की कलम चले ? पहले यह तो पूछो, कि गायब ही क्यों था ? गायब होंय भूत प्रेत बैताल के दुश्मन, हम तो वइसे ही अपना नया शौक में उलझ गये थे । देखि लेयो ईहाँ, एच०टी०ऎम०एल० की एचटीमेंएल कर रहे थे, इस सइटिया का कोड सँवार बिगाड़ि रहे थे, अउर अब ख़ाज़ खुज़ाने आयें हैं, कोई ऎतराज़ ? मेरे काबिलतरीन दोस्त श्रीयुत दिनेश राय द्विवेदी जी, पहले ही फ़रमा भये हैं कि सबहिं फुलन्तरू हँईयन लौट के अईहें, भागि नाय सकत कोऊ, ईहाँ तै ? वइसे ऎसी दलीलन को ओवर-रूल करै को वन हण्ड्रेड वन रीज़न्स हैं, अपने पास ! काहे कि अइसे छुट्टा- बेलगाम सुहाग से तो रँड़ापा ही भला ! बात में असल ये है, कि हम आहत हुई गये थे, अउर हैं !

आहत होना तो ख़ैर ब्लागर-कुलरीति ही है । लेकिन पगलवा गुट बोला कि ई कउनो ख़ास रीज़न नहीं, कुछ सालिड बताओ । काहे कि इत्तै वाद-विवाद हुई गये, लोग गरियाइन.. मारिन.. चप्पल ज़ूता घसीटिन… बल्कि हियाँ तो पतलून-जम्फर तक उतरवा के घुमावा गवा है, लेकिन अपमानित नहीं किया कब्बौ कि हम आहत हो जायें। हम बिरझ गये, ठीक है भईय्या, तौन अब आप जाके देश का नेतृत्व संभाल लेयो, ब्लागिंग का तो अनुभव ही पर्याप्त है तुम्हरे लिये ! मज़ाक नहीं भाय, अच्छा लेयो ई नाड़ा पकरो… “ देश का नेता कैसा हो.. हिन्दी ब्लागर जैसा हो ! ज़िन्दाबाद ज़िन्दाबाद… चिरकुट अँधरा ज़िन्दाबाद ! अँधेरा तुम्हारे अंदर है.. बाहर तो उज़ाला है ! लेयो, अउर लेहो ? हम्मैं कउनो फ़िकिर नाहीं, ’  राजा नहीं फ़कीर ’  नारा वर्कशाप में काम किहा है ! यह तुलना ऎंवेंईं वाली नहीं बल्कि सच्ची की है, नेता ब्लागर और गैंडा के तुलनात्मक अध्ययन पर ज्ञानदत्त पांडेय जी ’ मानसिक हलचल फेम वाले ’ एक चार्ट भेजने वाले हैं, देखते रहिये यह   happy_feetस्पेस ] … गैंडा तो लीद करने को बैक गीयर में चलता है, सो उसको अलग किये दे रहे हैं,  अभी तो ब्लागिंग में अपार अन्यान्य  संभावनायें अन्वेषित होने को हैं  । गैंडत्व अभी दूर की कौड़ी है, मित्र श्री !

सो, हम सीनाठोंक आहत रहे अउर हैं। टंकी रिपेयरिंग अभी पूरी नहीं हुई है, वरना डिक्लेयर कर जाते । फिर यह भी सच है कि, 100 टुटपुँजिया पोस्ट के बूते टंकीरोहण करना समझदारी भी नहीं, वह भी ऎसे हालात में जबकि आप अपने नेटवर्किंग पर भी भरोसा नहीं कर सकते, यहाँ  कई तो आया राम - गया राम भी होंगे, कहाँ नहीं हैं ? तो, हम एक बार फिर दोहरा रहे हैं,कि .अँ,  कि ..ऊँ,  कि हम आहत थे  और आहत हैं ! आहत था…बोले तो…

मेरे एक सहकच्छामित्र ( एक नया शब्द, नोट करें अब लंगोटिया यार नहीं चलेगा । लंगोट पुराना और बासी माल है, हर गाँव पुरवे में रूपा की ही ठेलमठाल है। और यार, अरे यार तो यवन संबोधन है, मेरे यार ! भारत में यदि रहना होगा, सहकच्छामित्र कहना होगा )

Binavajah Sept'08

तो यह सहकच्छामित्र श्रीमान एक दिवस हमरे कनें टहल लिये,  ’मुन्ने ’ यानि कि मोहम्मद अज़हर खाँ मंथर चाल से प्रगट हुये, साहित्यानुरागी हैं ! सो, कभी कदार साहित्य चरने की गरज़ से भटक आते हैं । मित्र को आलोचक का दर्ज़ा देकर रखो, तो बड़प्पन कहलाता है । बट ही इज़ अ नाइस ज़ेन्टलमैन, अ बिट डिफ़ेरेन्ट फ़्राम शिवकुमार ! हज़ कर आये हैं, सो हाज़ी हैं.. पर ज़ेहादी नहीं हैं । चा – पानी की पूछ-ताछ दिल से हुयी  और वह जुगा़ड़ पक्का देख आश्वस्त हो  लिये, फिर बोले, ” और सुनाओ,, कुछ नया लिखा –ऊखा, या वही इन्टरनेट पर लिख रहे हो ? कुछ लिख रहे थे, ना ? और वह“ भउजी दर्शन को प्यासी अँखियाँ इधर उधर दौड़ा कर मेरे कंम्प्यूटर चेयर पर क़ाबिज़ हो लिये । सफ़ारी मिनिमाइज़्ड मोड में थे, एक चटका माउस का और चिट्ठाजगत का पन्ना स्क्रीन में से दीदे फाड़ फाड़ खाँ साहब को घूरने लगा । अज़हर मियाँ कौतूहल से आगे को झुक ज़ायज़ा लेने लगे, फिर अपने स्वभाव के विरूद्ध बिफ़र पड़े, “  अमाँ डाक्टर, यह क्या भँड़ैती है, तुम यही सब कर रहे हो ? तुम्हें और कोई चूतियापा नहीं मिला दुनिया में, फ़ालतू का टाइम-वेस्ट ? वह तो बेटा आज रंगे हाथ पकड़ लिया, तुम अपने लिटरेचर को क्या दे रहे हो, यह तो सोचो ? “ वह मेरे इतने अज़ीज़ हैं, इसलिये तारीफ़ न भी करते पर ऎसी असहमति भी क्या ? लिहाज़ा हिन्दी ब्लागिंग की ख़ातिर कुछ तो आहत होना ही पड़ा ! ईद के बाद मेरी क्लास फिर ली जायेगी, यह मुझे पता है । आहत हूँ… बोले तो.. .

लगभग इसी दौरान एक GhostBusterPhoto जी रूपी पुच्छल तारे का उदय हुआ । उनकी बेदुम बेसिर-पैर की जिन लोगों ने पढ़ी हो, वह मेरा विषय नहीं है, आप स्वयं ही बहुत कुछ जानते हैं । यदि ठीक से मौज़ लिये की मौज़ाँ ही मौज़ाँ लिये होंगे तो  ’ ये अंदर की बात है ’  का मर्म समझाने की आवश्यकता ही नहीं ! किन्तु मेरा केस  कुछ डिफ़ेरेन्ट है… वर्ज़नाओं को तोड़ना और गलत का विरोध  करना मेरा स्वभावगत दोष है, बस यूँ समझें कि जन्मजात मैन्यूफ़ैक्चरिंग डिफ़ेक्ट ! अब जो करना हो, करलो ! लेकिन गौर किया जाय कि मुझे तो इनका फोटो लगा कर संबोधित करना पड़ रहा है । धन्य हैं, जय हो.. इत्यादि इत्यादि इनके लिये, क्योंकि इन ज्ञानी GhostBusterPhoto जी के हलचल पैदा करके अपने को अमर कर लेने की सनक ने कुछ अधिक ही आहत किया, अब्भी अब्भी तो बताया था कि गैंडत्व अभी दूर की कौड़ी है ! क्योंकि यह तो मेरे पिछवाड़े की गली ही के निकले । धन्यवाद श्रीमती पुष्पा पांडेय, जिन्होंने अपने पद एवं तंत्र का उपयोग कर इनके नाम-पते को कालर पकड़  सामने ला खड़ा किया । कौन हैं, यह… जान कर हैरत होगी.. विचित्र किन्तु सत्य ? सच बड़ा ज़ालिम हुआ करता है, इस दुनिया में किसिम किसिम के लोग हैं । प्रणाम GhostBusterPhoto जी, एक दिन अचानक धमकूँगा, चाय पीने, दोहरा व्यक्तित्व या ’ स्प्लिट पर्सनालिटी ’  बड़ी कुत्ती चीज है, एक लाइलाज़ मनोरोग ! मुझे तरस आ रहा है, इन GhostBusterPhoto पर ! हलचल जो न करवा दे… इस वर्चुअल दुनिया में !  एक वर्चुअल चरित्र गढ़ने की फ़ैंटेसी बड़ी रोमांचक हो सकती है, इन GhostBusterPhoto जी के लिये .. पर इसके दुष्परिणाम बड़े भयावह हुआ करते हैं । सुना है, अवध के कोई नवाब ज़नाना कपड़े पहन के रंगरेलियाँ मनाया करते थे, नतीज़ा यह हुआ कि वतन गया फ़िरंगियों के पास ! आपको इतिहास से एलर्ज़ी है, क्योंकि यह आपको डराता है ! मुझे ऎसा कोई डर नहीं है ।

cf1fb102ea4766c0df39ac4b7aa1c2c7

मुझे तो एक मुहिम मिला था, वह पूरा हुआ समझो । इस बेगैरती में शायद न भी पड़ता किन्तु मुझे एक वक़्त की रोटी देने वाली पंडिताइन गश खा खा कर बेहाल थीं । इसको सामने लाओ.. देखें तो कि यह 75 किलो का औसत भारतीय कौन है ? कुछ पता तो चले कि यह नर हैं कि मादा… हिज़ड़ा कहीं का ! जरा देखो तो कैसे लिखा है… और अपनी लम्बाई बताने में हीन भावना से ग्रसित हो झूठ लिख गया है, सात पुश्तों का ज़नख़ा ! ओह्हः, इन स्त्रियों का क्वथनांक, ज़्वलनांक इतना कम क्यों हुआ करता है, रे विधाता ? पर एक बात ज़रूर है, तू चीज बड़ी है, मस्त मस्त !

अपने डाक्टर अनुराग जी चिट्ठाचर्चा पर टिप्पणी लिखते पाये गये, कि अब पोस्ट चढ़ाने से पहले सोचना पड़ता है । बस यही बात तुमको औरों से अलग करती है, अनुराग । तुम चमड़ी के उस पार देखने लगते हो ! जहाँ ठेलो-गुहार चल रही हो, तो ठेलने के उस पार मत देखो । लोग शौचते हैं, और तुम सोचते हो ! भला ब्लागिंग के लिये भी कोई सोचता है ? मेरे लिये यह नयी जानकारी है ।

देखो मुझे, बिना सोचे लिख रहा हूँ कि नहीं ? इसमें भी धुरंधरों को ज़लेबी इमरती दिख जाती है, तो मेरा अहोभाग्य ! भाषा पर कोई रोक टोक न लगा कर, खुद को.. खुद ही.. अपने अंदर की खुदखुद को परोसता हूँ, वह भी खुद्दारी के साथ खुद बन के ! इतना ही तो ?

भाई कुश सांप्रदायिक भाई गिरी से परीसान हैं, किंवा उन्होंने मेरी टिप्पणी पर ध्यान न दिया.. भाई यह फ़साद वहीं ख़त्म होगा, जहाँ से शुरु किया गया था । अब यदि मुसलमानों में पाकिस्तान ही ढूँढ़ा जाता रहा, तो उनको भारतीय बनने देने की राह का रोड़ा कौन है ?

Binavajah.set 2

एक पोस्ट चढ़ाने का घणा ताव तो मुझे उसी दिन से था, जब अपने ताऊ की कविता पढ़ी । मैं भी लिक्खूँगा कविता… पर भाया मेरे, पूरे तीन दिन बरबाद हो गये, कविता निकल के ना दी ! कमरे में अँधेरा करके महसूस करने की कोशिश की, महसूस हुआ मच्छरों का दंश ! आकाश को निहारा किया.. मिला कऊव्वे की बीट ! तलईय्या किनारे बैठा.. दिखा तैरता सिवार ! सुंदरियों को निहारा.. तो सुना ’ नमस्ते अंकल ’ ! आम आदमी के दर्द को टटोला… और कविता हवा हो गयी ! 27 सितम्बर की डेडलाइन सिर पर, स्वपनिल जी से कविता उधार माँगने गया । बेचारे गदगद हो गये… हैरत से पूछा, नेट पर दिक्खेगा ? तो लीजिये यह ताज़ा माल.. कल रात ही इसका प्रसव हुआ है, और वह सस्वर प्रसवपीड़ा से सड़क पर ही चीत्कारने लगे । दईय्या रे, मैं भाग खड़ा हुआ, ज़ूते पड़ जाते !

एक टूटी फूटी कविता हाथ लगी, इसी से काम चलाइये..

ब्लागरों के इस ज़मात में
रोज सुबह उगता कोहराम है
वह रोज आधीरात
फ़ाँसी के तख़्ते से वापस आता है
सुबह फिर चढ़ जाता है

यह उपक्रम तब से जारी है
जब से कुछ ब्लागर बैलों ने
संवेदनाओं और वास्तविकता का जुआ अपने कंधे पर रखा है
शायद जीतना चाहते हैं
ईमानदार लेखन का ख़िताब

टिप्पणीकारों से पूछा भाई
इसका कसूर क्या है
रोज फाँसी के तख़्ते पर
क्यों लाया जाता है ?
ज़वाब में वो भुन्न से बुदबुदाये

यह अपनी कलम से
उनकी हत्या क्यों करता है
जो झूठ व नफ़रत के खिलाफ़
बोलने वालों का मुँह सीना चाहते है
यह तो बुद्धिजीवी कहलाता है
फिर भी क्यों न समझता
लिखो और लिखने दो का रिश्ता


अरे, कितनी देर से क्या लिखे डाल रहे हो ? यह पंडिताइन हैं कि विक्रम की बैताल ? ( इनको सहकच्छाधर्मिणी कहें, तो चलेगा ? )बस फ़िनिशिंग मार दूँ । समझती नहीं है, मासिक स्राव पर भी रोक है, क्या ?  कुल निष्कर्ष ई बा मरदे जी कि हम्मैं अपने सुहाग की कोनौ चिन्ता नाहीं, जेहिका होखे ऊ करै । हिंयाँ त भतरा के लइनिया लागल हौ, मोहब्बत चाही.. त तुहौ मोहब्बतै देबा नू ? वरना हम तो भाई हमहिं हैं, अउर हमने कसम खा रखी है कि… हम न सुधरेंगे । आप टिप्पणी न करने लिये स्वतंत्र हैं, कोई वांदा नहीं ! टिप्पणी-ऊप्पणी राय विचार कर दीजियेगा कि इसका बी.आर.पी. केतना बढ़ाना है ! बोलिये,  जय हिन्द और सरकिये अगले पन्ने पर !

इससे आगे
MyFreeCopyright.com Registered & Protected

यह अपना हिन्दी ब्लागजगत, जहाँ थोड़ा बहुत आपसी विवाद चलता ही है, बुद्धिजीवियों का वैचारिक मतभेद !

शुक्र है कि, सैद्धान्तिक सहमति अविष्कृत हो जाते हैं, और यह ज़्यादा नहीं टिकता, छोड़िये यह सब, आगे बढ़ते रहिये !

ब्यौरा ब्लॉग साइट मैप