जो इन्सानों पर गुज़रती है ज़िन्दगी के इन्तिख़ाबों में / पढ़ पाने की कोशिश जो नहीं लिक्खा चँद किताबों में / दर्ज़ हुआ करें अल्फ़ाज़ इन पन्नों पर खौफ़नाक सही / इन शातिर फ़रेब के रवायतों का  बोलबाला सही / आओ, चले चलो जहाँ तक रोशनी मालूम होती है ! चलो, चले चलो जहाँ तक..

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28 September 2009

क़न्फ़्यूज़ियाई पोस्ट - हमका न देहौ, तऽ थरिया उल्टाइन देब

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मसल है...
खाय न देब तऽ थरिया उल्टाइन देब

अर्थात, हे पाठकों
यदि मुझे अपनी मर्ज़ी अनुसार पसँद नहीं मिलेगी,
तो मैं परसी हुई पूरी थाली उल्टा तो सकता ही हूँ !

खेद तो यह है कि, यह सब देखते देखते हो गया, जब  मैं  ब्लागवाणी  खोल  कर टिप्पणी के लिये पोस्ट चुन रहा था ।
रात्रि के 11.37 पर पेज़ रिफ़्रेश करने को F5 दबाया और आईला ’ रुकावट के लिये खेद है ’ जैसा ब्लागवाणी का पन्ना चमकने लगा । अफ़सोस दिल गड्ढे में जा गिरा । कीबोर्डवा से फौरन F5 नोंच कर फेंक दिया, ससुरी यही है, झगड़े की जड़ !  Freedom at Midnight पढ़ने में मन लगाना चाहा, देसी रियासत रज़वाड़ों की खुदगर्ज़ी के किस्से पढ़ कर अपनी कौम पर गर्व हो आया, लगा कि हम उनसे किसी मायने में अलग नहीं हैं । आख़िर अपने ब्लाग का मालिकाना हक़ है, हमरे पास..  जुगाड़ से चार ठो चारण भी जुटा लिये हैं । अयहय, अब कोई यह तो कहेगा कि ’ अलि कली सों बिन्ध्यौं, अब आगे कौन हवाल ! “ अउर हवाल यह कि अपने हाथन कली नोंच कर फेंक दिया । पाठकों के पसँद नापसँद को लेकर ऎसी सजगता, और कहाँ ? आख़िर कीबोर्ड के वाज़िद अली शाह हैं हम !

blogvani 
सिरफिरा था भगत सिंह जो कल अपने जन्म दिन पर अपने वतन में याद तक न किया गया । वयम पोस्ट लिखित्वा ब्लाग वाः साहित्यवाः के फेर में चिन्तामग्न साहित्यलॉग कर्मी दुष्यँत  कुमार की बरसी पर किसीको याद भी न आये | या तो स्मृति समारोह में जाने को पहनने को कमीज़ उठायी होगी, और लेयो थमक गये, “  हँय मेरी कमीज़ उसकी कमीज़ से मैली क्यों ? मेरे अद्वितीय पोस्ट की पसँद उसके सड़े पोस्ट से निचली क्यों ? “ लिहाज़ा  धप्प से बईठ गये, उनके शून्य विचार में बस यही आया होगा कि, " चलो आज एक धत्त तेरी की – हत्त तेरी की पोस्ट लिखी जाय, यह नूतन विधा है, मैथिली बाज़ार बड़े शवाब पर है ,थोड़ी भगदड़ सही !  ऎसे कुविचार ब्लागलेखन के अनिवार्य तत्व हैं, यह सब अनाप शनाप सोच नींद को अपने पैर जमाने से रोक रही थीं । एम.पी.थ्री प्लेयर का हेडफोन कान से लगा लिया,  धीरे से आजा री निंदिया अँखिंयों में निंदिया आजा री आजा !

अयईयो ये किया गडबड जे.. श्रीधर सुनिधि की जोड़ी हेडफोन में घुस कर चिढ़ाने लगीं । इनको कैसे पता चला कि, ब्लागवाणी ने रुसवाई चुन ली है ? चाहें तो आप ही लपक लें, वाह क्या स्क्रिप्ट बन पड़ी है, " ब्लाग आज कल ! "

चोर बाजारी दो नैनों की,
पहले थी आदत जो हट गयी,
प्यार की जो तेरी मेरी,
उम्र आई थी वो कट गयी,
दुनिया की तो फ़िक्र कहाँ थी,
तेरी भी अब चिंता मिट गयी...

तू भी तू है मैं भी मैं हूँ
दुनिया सारी देख उलट गयी,
तू न जाने मैं न जानूं,
कैसे सारी बात पलट गयी,
घटनी ही थी ये भी घटना,
घटते घटते ये भी घट गयी...

चोर बाजारी...
तारीफ तेरी करना, तुझे खोने से डरना ,
हाँ भूल गया अब तुझपे दिन में चार दफा मरना...
प्यार खुमारी उतारी सारी,
बातों की बदली भी छट गयी,
हम से मैं पे आये ऐसे,
मुझको तो मैं ही मैं जच गयी...
एक हुए थे दो से दोनों,
दोनों की अब राहें पट गयी...

अब कोई फ़िक्र नहीं, गम का भी जिक्र नहीं,
हाँ होता हूँ मैं जिस रस्ते पे आये ख़ुशी वहीँ...
आज़ाद हूँ मैं तुझसे, अज़स्द है तू मुझसे,
हाँ जो जी चाहे जैसे चाहे करले आज यहीं...
लाज शर्म की छोटी मोटी,
जो थी डोरी वो भी कट गयी
,
चौक चौबारे, गली मौहल्ले,
खोल के मैं सारे घूंघट गयी...
तू न बदली मैं न बदला ,
दिल्ली सारी देख बदल गयी...
एक घूँट में दुनिया सारी,
की भी सारी समझ निकल गयी,
रंग बिरंगा पानी पीके,
सीधी साधी कुडी बिगड़ गयी...
देख के मुझको हँसता गाता,
जल गयी ये दुनिया जल गयी....

वईसे विजयादशमी शुभकामनाओं की तो होती ही है, इसे चाहे जिस रूप में ग्रहण करें, मर्ज़ी आपकी

vvvvvv

ताज़ा अपडेट

ब्लागवाणी का यह निर्णय किन्हीं निहित तत्वों के मँसूबों को फलीभूत कर रहा है,
बल्कि होना तो यह चाहिये था कि, इनकी अवहेलना कर इस पर तुषारापात किया जाये,
ऎसा तभी सँभव है, यदि यह टीम अपने फैसले पर पुनर्विचार कर कुछ कड़े तेवर के साथ प्रकट हो ।

बल्कि होना तो यह चाहिये कि अभी कुछ दिनों तक त्राहि त्राहि मचने दें,
जिसके लेखन में दम हो वह अपनी पोस्ट अपने कलम और सम्पर्क के बूते औरों को पढ़वा ले ।

एक मज़ेदार तथ्य यह कि, मैं मूरख से ज्ञानी जी की पोस्ट पर ब्लागवाणी के जरिये ही पहुँचा,
उत्सुकता केवल इतनी थी कि, कल सर्वाधिक पसँद प्राप्त पोस्ट में आख़िर क्या है
!

मज़बूरी में, चलिये यही गाते हैं

तारीफ तेरी करना, तुझे खोने से डरना ,
हाँ भूल गया अब तुझपे दिन में चार दफा मरना...
प्यार खुमारी उतारी सारी,
बातों की बदली भी छट गयी,
 

इससे आगे

27 May 2009

नँगे सच में नहायी बहना

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देख भाया, मेरी गलती नहीं हैं । आजकल हाल है कि, ’ जाते थे जापान .. पहुँच गये चीन समझ लेना ’ तो पढ़ा ही होगा । अपनी प्रतिष्ठा के प्रतिकूल एक मिन्नी सी,  सौम्य.. लजायी हुई पोस्ट देकर अपने जीवित होने की गवाही देनी पड़ी । बताइये भला.. मेरी एक चिरसँचित इच्छा पूरी हुई,  दादा विनायक सेन रिहा हुये,  और  मैं  ब्लागर होकर  भी  अपनी खुशी की चीख-पुकार खुल कर न मचा सका । बिजली की आवाज़ाही, अफ़सरों का विदाई और स्वागत समारोह एटसेट्रा करीने से एक पोस्ट भी न लिखने दे रहा है !कुश जी,  अब तुम न कह देना, कि पहले ही कौन सा करीने से लिखा करते थे । मुझे यूँ छेड़ा ना करो, मैं ठहरा  रिटायर्ड नम्बर !

भूमिका इस करके बन रही है कि, आज बड़ी जोर की ठेलास लगी है.. और बुढ़ाई हुई बिजली नयी माशूका की तरियों कब दगा दे जाये कि अपुन कोई रिक्स लेने का नहीं ! लिहाज़ा, आज अपनी एक पुरानी वाली को ही ठेल-ठाल कर सँतोष किये लेते हैं,का करें ?

अप्रैल 2008, एक नया राष्ट्रीय मुद्दा उठा रहा, कि युवराज राहुल विदेशी साबुन से नहाते हैं : और समय का फेर देखो कि पट्ठा खुदै धूल फ़ाँक के सबैका धूल चटाय दिहिस । हमरी हिरोईन तिलक तलवार तराज़ू के तिपहिये पर दिल्ली कूच करते करते रह गयीं !

पहले तो यह बतायें कि इस पोस्ट का उचित शीर्षक क्या होना चाहिये था , नंगे सच की माया या  माया का नंगा सच ? जो भी हो, आपके दिये शीर्षक में एकठो नंगा अवश्य होना चाहिये, वरना आपको भी मज़ा नहीं आयेगा ! वैसे राजनीति पर कुछ कहने से मैं बचता हूँ । एक बार संविद वाले चौधरी के बहकावे में, मै ' अंग्रेज़ी हटाओ ' में कूद पड़ा था, अज़ब थ्रिल था, काले से साइनबोर्ड पोतने का ! लेकिन इस बात पर, मेरे बाबा ने अपने  इस चहेते पोते को धुन दिया था, पूरे समय उनके मुँह से इतना ही निकलता था, "भले खानदान के लड़के का बेट्चो ( किसी विशेष संबोधन का संक्षिप्त उच्चारण, जो तब मुझे मालूम भी न था ) पालिटिक्स  से  क्या मतलब ? " यह दूसरी बार पिटने का सौभाग्य था, पहली बार तो अपने नाम के पीछे लगे श्रीवास्तव जी  से पिंड छुड़ाने पर ( वह कहानी, फिर कभी ) तोड़ा गया था । खैर....

आज़ तो सुबह से माथा सनसना रहा है, लगा कि बिना एक पोस्ट  ठेले काम नहीं चलेगा, सो ज़ल्दी से फ़ारिग हो कर ( अपने काम से ) यहाँ पहुँच गया.. पोस्ट लिखने । पीछा करते हुये पंडिताइन  भी  आ  धमकीं, हाथ में छाछ का एक बड़ा गिलास ( मेरी दोपहर की खोराकी का लँच ! ) ,तनिक व्यंग से मुस्कुराईं, " फिर यहाँऽ ऽ , जहाँ कोई आता जाता नहीं ? " इनका मतबल शायद पाठक सँख्या  से  ही  रहा होगा । बेइज़्ज़त कर लो भाई, अब क्या ज़वाब दूँ मैं तुम्हारे सवाल का ? अब थोड़ी थोड़ी ब्लागर बेशर्मी मुझमें भी आती जारही है, पाठकों का अकाल है, तो हुआ करे ! ज़ब भगवान ने ब्लागर पैदा किया है, तो पाठक भी वही देगा , तुमसे मतलब ?  आज़ तो लिख ही लेने दो कि..

सुश्री मायावती, नेहरू गाँधी के बाथरूम में साबुन निहारती मिलीं, किस हाल में मिली होंगी  यह न पूछो ! कभी कभी यह पंडिताइन बहुत तल्ख़ हो जाती हैं,' जूता खाओगे, पागल आदमी !' और यहाँ से टल लीं । मुझको राहुल बेटवा या मायावती बहन से क्या लेना देना, लेकिन यह लोकतंत्र का तीसरा खंबा मायावती की मायावी माया में टेढ़ा हुआ जा रहा है, इसको थोड़ा अपनी औकात भर टेक तो लूँ, तुम जाओ अपना काम करो ।

मुझसे यानि एक आम आदमी से क्या मतलब, कि राहुल अपने घर में इंपीरियल लेदर से नहाते हैं या रेहू मट्टी से ? चलो हटाओ, बात ख़त्म करो, हमको इसी से क्या मतलब कि वह नहाते भी हैं या नहीं ? हुँह, खुशबूदार साबुन बनाम लोकतंत्र ! लोकतंत्र ? मुझे तो लोकतंत्र का मुरब्बा देख , वैसे भी मितली आती है, किंन्तु ... !

सुश्री मायावती का सार्वज़निक बयान कि " यह राजकुमार, दिल्ली लौटकर ख़सबूदार ( मायावती उच्चारण !! ) साबुन  से नहाता है ।" मेरी सहज़ बुद्धि तो यही कहती है, बिना राहुल के बाथरूम तक गये , ई सबुनवा की ख़सबू उनको कहाँ नसीब होय गयी ? अच्छा चलो, कम से कम उहौ तो राहुल से सीख लें कि दिन भर राजनीति के कीचड़ में लोटने के बाद, कउनो मनई खसबू से मन ताज़ा करत है, तो पब्लिकिया का ई सब बतावे से फ़ायदा  ? दलितन का तुमहू पटियाये लिहो, तो वहू कोसिस कर रहें हैं ! दलित कउन अहिं, हम तो आज़ तलक नही जाना । अगर उई इनके खोज मा घरै-घर डोल रहे है, तौ का बेज़ा है ?

माफ़ करना बहिन जी, चुनाव के बूचड़खाने में दलित तो वह खँस्सीं है, वह पाठा है, कि जो मौके पर गिरा ले जाय, उसी की चाँदी ! दोनों लोग बराबर से पत्ती, घास दिखाये रहो । जिसका ज़्यादा सब्ज़ होगा, ई दलित कैटेगरी का वोट तो उधर ही लपकेगा । ई साबुन-तेल तो आप अपने लिये सहेज कर रखो, आगे काम आयेगा । अब आप जानो कि  न जानि काहे..   चुनाव पर्व  के  नहान  के फलादेश पर बज्रपात कईसे हुई गवा .. रामा रामा ग़ज़ब हुई गवा .. चोप्प, मैं कहता कहती हूँ चौप्प ! चुप हो जाओ, चुप्पै से !

लो भाई, चुपाये गये.. अब तो राम का नाम लेना भी गुनाह हो गया । लोग  सँदिग्ध निगाह से  घूरते हैं, कि  अडवाणी  से अब भी सबक  नहीं ले रहे.. राम  का  नाम  बदनाम  करके  ऊहौ  कुँकुँआत  फिर  रहे  हैं,  फिर  तो  कोई  रावणै  इनका  भला  करी..  
करै दो यार,  भलाई  के  नाम  पर  कोई  तो कुछ  करे, भले  ही  वह प्रजापालक रावण होय ! सीताहरण तो अबहूँ होबै करी ..          जस नेता रहियें तौ सीताहरण होबै करी.. चुनविया का हुईहै अगन परिच्छा तौ धमक हुईबे करी…
एक कुँवारी-एक कुँवारा ! बेकार में, काहे को खुल्लमखुल्ला तकरार करती हो ? भले मोस्ट हैंडसम के गालों के गड्ढे में आप डूब उतरा रही हो, लेकिन पब्लिकिया को बख़्स दो । सीधे मतलब की बात पर आओ, हम यानि पब्लिक मदद को हाज़िर हैं ।  अब दुनिया  भर  का  ई साबुन - तौलिया वाला…  टिराँस्फ़र पोस्टिंग की नँगी माया .. काहे ?
सोनिया बुआ, उधर अलग बड़बड़ा रही हैं, " मेरा लउँडा होआ बैडनेम, नैस्सीबन तिरे लीये...ऽ ..ऽ

 

इससे आगे

04 February 2009

बिन बुलायी, एक अपूर्ण कविता

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आज व्याधिग्रस्त माया श्रीवास्तव धुर 5 बजे अवतरित हुईं, टालने का प्रश्न नहीं.. पर थोड़ी व्यग्रता थी क्योंकि यह आज के परामर्श समय की अंतिम बेला थी, हिस्ट्री लेने के दौरान मेरे मुँह से ' परिवेश ' शब्द का उल्लेख  हुआ । बस, उनके पतिदेव महोदय ने मुझसे एक छोटा सा ब्रेक लेने का अनुयय किया,  और बिना किसी भूमिका के यह पंक्तियाँ सुनाने लग पड़े । एक-डेढ़ मिनट के बाद ही मैंने एक ट्रैफ़िक पुलिसिया इशारा कर उन्हें रूकने का संकेत दिया, और अपना काम पूरा कर सका.. पर एक स्थानीय कवि के इस कविता की पंक्तियाँ रह रह कर जैसे चिंचोड़ रही है, इतना अलाय-बलाय, लटरम-पटरम नेट पर ठेलता / पेलता रहता है, थोड़ा बहुत जगह मुझे भी दे दे । मैं खीझ गया, " तू तो अभी अपूर्ण है.. जो कुछ लाइनें छोड़ आयीं है.. जा उन्हें भी लेकर आ, तो विचारार्थ सहेज लूँगा । " कविता के मुखड़े से ही उसके सामयिक होने का दंभ छलका पड़ रहा था । सो, एकदम से तमक गयी, तैश में अपनी दो-चार और लाइनें झटक कर फेंक दीं और मटक कर चल पड़ीं " तू तो स्वयं में ही अपूर्ण है मानव ! निरूपाय होकर या विभोर होकर, तू मेरे आँचल में ही आँसू छलकाने आता है । अब इतना बढ़ चढ़ कर तो न बोल ।" ई का हो ? अई देखा, कवितिया एतना अकड़ती काहे है, भाई ? हम ठहरे ताऊ स्कूल आफ़ ब्लागर के ज़ाहिल-बुच्च डाक्टर मनई, जो असोक चक्रधर जी से एथिआ ई कबीता की खास फरमाईसी परिभाखा लिखाईस है :

गोया रोगी होगा पहला कवि, कराह से उपजा होगा गान
टीसती फुड़िया से चुपचाप ,  बही होगी कविता अनजान

अरी दईय्या रे, कविता जी बिफ़र कर पलटीं.. "ऎई, मवाद से मेरी तुलना तो करना मत ? पहले ही मेरा ऋँगार पोंछ पाँछ कर दुनिया की गंद मेरे से परोसवा रहा है, और अब सीधे सीधे मवाद पर मत उतार ।" फिर ठिठक कर जैसे मुझे निरूत्तर करने को प्रहार किया, " अच्छा चल, मवाद ही सही.. लेकिन बह जाने से तू और तेरे रोगी का दर्द हल्का हुआ कि नहीं, बोल ? " बोलिये न !

feelingwarpedvअय-हय, इनका देखो  ? अधूरी हैं, तब ये हाल है, दो चार अच्छी लाइनें और मिल जायें तो हम जैसे टाइमखोटीकारों की गुलामी भी मंज़ूर न करें ! सो, मैंने अपना पिंड छुड़ाने की कोशिश की, " अच्छा चल, तू जैसी है वैसी ही रह, मेरे को क्या ? आओ, जरा  इधर को आ.. तुझे अंतर्जाल पर टाँग दूँ.. ताकि तेरी हसरत भी पूरी हो जाये । पर तेरी वज़ह से कोई मुझे हूट-हाट करेगा, तो तेरा गला घोंट दूँगा । वईसे भी ईहाँ ब्लाग-प्रदेश में गुणीजन अल्पसंख्यक हैं ! और यह बहुसंख्यक समाज भी चर्चाजगत का अल्पसंख्यक कोटा  तक हड़पे बैठे हैं,  हाँज्जी.. सच्ची !  उसको क्या कहते हैं.. हाँ, तो  अपलोड होते होते  भी वह  ढीठायी से हँसती है... डाक्टर,  बहाना चाहे जो भी बना लो.. पर गाहे बगाहे अपनी सुविधानुसार मेरा गला तुम लोग वैसे भी घोंटते रहते हो कि नहीं ?

न जन कैसे जी रहा है, उमस के वातावरण में
दुःस्वप्न में दिन बीतते रात बीतती जागरण में

है यदि बेशर्म आँखें, घूँघट व्यर्थ ही क्या करेगा
मानवता नग्न घूमती सौजन्यता के आवरण में

कपटयुग है घोर यह, हुये राम औ'  रावण एक हैं
लक्षमणों का ही हाथ रहता आज सीताहरण में

शब्द को पकड़ो यदि तो सहसा अर्थ फिसल छूटते
सन्धि कम विग्रह अधिक आज क्यों व्याकरण में

छल-बल के माथे मुकुट है सत्य की है माँग सूनी
क्यों कोयल गीत सीखती बैठ कौव्वों के चरण में

चिढ़ा रहे  ये तुच्छ जुगनू चाँदनी के चिर यौवन को
भगत बगुले  हैं मेंह हड़पते हँस के छद्म आवरण में

यह मुँहजोर ठहाके के साथ ऊपर से भी एक ताना कसने से बाज न आयी, " अब, अब.. इस स्थिति की जैसी पूर्णता चाहता है.. वैसी लाइनें तू ड्राइंगरूम में आराम से चाय सुड़क सुड़क कर गढ़ता रह ! या फिर, वर्ष दर वर्ष अनाचार कि नयी लाइनें स्वतः ही जुड़ती जायेंगी और तुझे बिना प्रयास ही अपनी दुर्दशा के नये तराने मिलते रहेंगे ।" पर, दो हज़ार से कम में इसे मंच से न पढ़ना

इससे आगे

01 February 2009

ऎसी आज़ादी और कहाँ, आज़ाद ख़्याल विवेचन

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विवेक भाई आग लगा कर अगले हफ़्ते के लिये बाई कर गये । गोया, चर्चाकार न हुये ज़मालो हो गये । यह तीसरी बार है, जब मैं इन चिट्ठाचर्चा वालों के उकसावे में पोस्ट लिखने को मज़बूर हो रहा हूँ । भुस्स मे आग लगा कर बी ज़मालो दूर खड़ी ।

मेरी पिछली कई पोस्ट से तो अंदाज़ ही लिया होगा, कि ई डाक्टर धँधे में जैसा भी  ठस्स हो, लेकिन यहाँ दिमाग का निख़ालिस भुस्स डम्प करने आता है । भगवान ठस्स भेजा देता, तो ई आग लगबे काहे करती  ? सो भगवान दुश्मन के दिमाग में  भी ऎसा भूसे का ढेर भर कर न भेजे । इन  चर्चाकार ने गणतंत्र-दिवस पर पोस्ट लिखने वालों की पूरी क्लास ले ली । पाखंडम शरणम गच्छामि संस्कृति में  हम  भी  पाखंड-देव से रक्षा की भीख माँगते हुये,  बरामद हुये, ऊ हमरा बेकूफ़ी पर हँस दीये,  और का हो ?ऎसी आज़ादी और कहाँ-अमर

26 जनवरी मैं क्लिनिक कर्मचारियों की छुट्टी रखता हूँ, सो आते जाते दिन भर नेट-ब्राउज़र को हँकाता रहा । ससुरा ब्राउज़र इधर भागे उधर भागे, और.. जाकर टिक जाये गणतंत्रीय पोस्ट पर ! मैंनें भी सोचा.. चलो 26 जनवरी 2009  वन टाइम इन इंडिया इवेन्ट है, सो  गूगल वाले  भारत  का अपना  नमक- टाटा नमक अदा कर रहे हैं । लिहाज़ा ज़्यादा माइंड-उंड भी नहीं किया । कोई पोस्ट हमसे ज़बरिया कमेन्टियाने का तकादा नहीं करता रहा,सो हमहूँ कुछ कुछ टूँग टाँग के आगे बढ़ते रहे । बधाई  हो, मेरा भारत महान, जीसका हर नेता बेईमान लीखने का मन था, लीखे नहीं, ब्लगिंगिया में पदमशिरी डीक्लेयर कर दीये, तो ? 

ऊप्पर देखे हैं कि नहीं ? पहले ही बोल दिया हूँ, ई फा्स्ट-ब्लागिंग का ड्राफ़्टिया पोस्ट है.. सो बाई मिस्टेक कोई गलती हुआ हो, और दीखाए तो निचका डिब्बवा में लीख दीजीयेगा । हम भी गुरुवर का सिलो-बिलागिंग का संदेश देखे हैं, अउर ड्राफ़्टिया लीखने पर आपलोगों के ई-स्वमिया हम्मैं डाँटिस भी है, लेकिन हम तो पहले से ही बिन्दास डीक्लेअर कीये हैं, सो भाई ज़्यादा लटर-सटर नहीं जानते ! बस एतना सुन लीजीये, "हम नहीं सूधरुँगा ।"  तनि सोचिये.. हम हूँ आज़ाद भारत के आज़ाद ब्लागर,  ऊ भि हीन्दी के, जिसको कहीये कि... ईश्श !  अरे डा. अरविन्द जी, लगता है, कि हम अज़दकीय मोड में प्रवेश कर रहें हैं ? चलिये, आपके लिये ई पोस्ट पूरा होने तक सुधर जाते हैं ! जाइयेगा नहीं, पोस्ट जारी है

शिवभाई इस ब्रेक में तनी खोजीए तो,कि भासा कहाँ से ऊठा के ईहाँ पटकाया है

हाँ, तो अब ज़्यादा न लपेसते हुये  परदा उठाने देंगे ?  त,  हमलोग हूँ, आज़ाद भारत के आज़ाद ब्लागर.. बाताइये ऎसी आज़ादी और कहाँ ? बोलीए जय हिन्द !

विवेक जी,  ई सब पोस्ट पढ़ते तो अपने गान्हीं महतमा एकदमैं गुलाम अलिये गुनगुनाते,
" स्यापा है क्यों बरपाऽ..♫ आज़ादी ही तो दी है..♩♬" 
अब कोई यह लिखे तो लिखता रहे, कि ' मुल्क ही है.. तो बाँटाऽऽ..♩♬♪,रियासतें ही तो दीं हैऽऽ..♫'
पिताश्री हैं, तो गरियाने दुलराने और बरसी पर फूल-माला पहनाने का सिलसिला तो लगा रहेगा..
वह दुखित मन से सोच रहे होंगे.. कि रिज़र्व कोटा के गोली खाने का यही सिला है,
कि आज़ाद भारत के लोग अबतक यह क्यों नहीं फील कर पा रहे हैं, ऎसी आज़ादी और कहाँ ?

अब अपनी ही एक बात बताता हूँ । छोड़िये, जगह का नाम जान कर भी क्या करियेगा..
पहले का एडविन क्रास, पिछले साल तक शास्त्री चौक कहलाते कहलाते अब झलकारी चौराहा होगया है
लेकिन परसों मुलायम संदेश यात्रा वाले कह गये हैं,
सन 1958 में इस चौमुहानी से गुज़र कर लोहिया जी की मोटर ने इसे ऎतिहासिक महत्व का दर्ज़ा दिया है,
लिहाज़ा इस शहर के लिये उनकी पहली प्राथमिकता यहाँ पर उनकी मूर्ति स्थापित करने की रहेगी.. ऎसी आज़ादी और कहाँ
इले्क्शन शान्तिपूर्ण निपटने के बाद पार्टी मेनिफ़ेस्टो में तय होगा कि,
मूर्ति मोटर की लगेगी या उन मोटरारूढ़ महापुरुष की.
जो भी हो, हमारे शहर में तो होगा स्टैच्यू आफ़ लिबर्टी.. ऎसी आज़ादी और कहाँ
हम भी कहते हैं, नाम में क्या रखा है ?
सो, हर क्रासिंग का नाम शेक्सपियर ग्रैंडपा को सुपुर्द कर देना चाहिये,
काहे से कि ऎसी आज़ादी और कहाँ

यार, तुम अटकते बहुत हो, आगे बढ़ो.. हाँ, बस आने ही वाला है..
इस व्यस्त चौराहे पर जहाँ गुंज़ाइश मिला दिवार पर पोत-पात कर रख दिया है,
बड़ा बड़ा लिखा है, महबूबा को मुट्ठी में कैसे करें.. मिलें या लिखें.
इसके ऎवज़ में मालिक-दीवार ख़ान लखीमपुर खीरवी साहब ने पेंटर से सेंत-मेंत में यह भी लिखवा लिया,
यहाँ पेशाब करना सख़्त मना है, पकड़े जाने पर 50 रूपये ज़ुर्माना
मेरा हाथ ऎटौमेटिक पैंन्ट की ज़िप पर चला जाता है, बताइये ऎसी आज़ादी और कहाँ
हल्के होकर सोचता हूँ, कि नीम का पेड़ तो दिख नहीं रहा,
किस भले मानुष से उन्नाव वाले नूर अहमद " गारंटीड कामाख्या तांत्रिक "  का ठियाँ पूछूँ
हम खुद ही पंडिताइन की चँगुल से आज़ाद कैसे हों.. वाले को तलाश रहे हैं
लगे हाथ अपनी उनसे भी आज़ाद हो लें.. फिर तो मौज़ा ही मौज़ा, क्योंकि ऎसी आज़ादी और कहाँ

बड़ी भीड़ है, आज, क्यों ? अच्छा अच्छा.. बगल के पटेल मार्ग पर पब्लिक ने जाम लगा रखा है,
हाथ कंगन को आरसी क्या.. लीजिये आप ही देखिये.. ऎसी आज़ादी और कहाँ
अब हमारे पास कोई चारा नहीं, घुसेड़ दो कार नो-पार्किंग में,
ऎई लड़के ! कोई पूछे तो बता देना हाथीपार्क वाले डाक्टर साहब की गाड़ी है..
सब स्साला तो मिसमैनेज़्ड है, पर पोस्ट लिखेंगे.. ऎसी आज़ादी और कहाँ
पढ़े लिखे होकर भी, नो पार्किंग में ज़बरिया पार्किंग ?
ऒऎ छ्ड्डयार, यह तो आज़ादी एन्ज़्वाय करने एक छोटा सा आप्शन है, ऎसी आज़ादी और कहाँ
मैं कोई गलत काम जानबूझ कर थोड़ेई करता हूँ, जी !
मेरी मज़बूरी समझिये,  आज सैटरडे है, एक हफ़्ते के लिये टल जायेगा ।

उधर अपने षड़यंत्र की अगली कड़ी भी देनी है, कल भी छूट गई थी
यह न हो कि, शहीद आकर पकड़ लें कि, हम तो बेट्टा तेरे लिये चने खा कर तख़्ते पर टँग लिये थे,
और तू मुझे छोड़ कर यहाँ नो-पार्किंग में विलाप करता फिर रहा है..और क्या चाहिये तुझे, ऎसी आज़ादी और कहाँ
फिर तो मेरी घिघ्घी बँध जायेगी, इतना भी न कह पाऊँगा..कि,
हम अपने ही घर में आज़ाद नहीं हैं, सर 
आज सैटरडे है सर, एक हफ़्ते के लिये टल जायेगा, सर.. प्लीज़ मेरी मज़बूरी समझिये सर,
सो, नूर अहमक " गारंटीड कामाख्या तांत्रिक " को पकड़ना भी ज़रूरी है न, सर

ऒऎ कोई नीं, जितने टैम तक चाहे, जो पकड़ना है.. जिसको पकड़ना है..
जा छॆत्ती पकड़ लै.. पण छड्डणा नीं, जा अपनी पूरी आज़ादी ले लै !
जबसे मेरे कान में यह पड़ा है,  कि
" डैडी सीरियस हो रहे हैं.. भईया ज़ल्दी से एक डाक्टर पकड़ लाओ "
आई रियली लव दिस पकड़ लाओ
हे हे हे, बैठे बैठे फ़ालतू टाइमखोटी करते रहते हो...बेशरम कहीं के !
कौन है ? यह पंडिताइन हैं जी, दूजा न कोई, हे हे हे !

इससे आगे

21 November 2008

ज़वाब कोई ज़रूरी तो नहीं, फिर भी ?

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RECAP: बिग-बी अपने कबीले में होने की खोजबीन से उपजे एक प्रतिक्रियात्मक पोस्ट के आगे...

अपने चहेते मंच चिट्ठाचर्चा से सूतनिट्ठल्ले की कपास को लेकर एक बेवज़ह लट्ठम-लट्ठा हो चली । नतीज़तन जुलाहे की लट्ठम-लट्ठा की प्रामाणिकता पर चंद सवाल उठे व ख़ारिज़ भी कर दिये गये । यह एक अप्रिय प्रसंग है, जो टाला जा सकता था, किन्तु... ? बहुत सारे किन्तु, जब एक प्रश्न बन कर खड़े होते हैं, तो ज़वाब माँगने लग पड़ते हैं, लिहाज़ा.. मन में यह चल रहा था कि क्या ज़वाब से मुँह मोड़ लिया जाय या अपने ब्लागिया-सिकंदर को पोरस की सीख याद दिलायी जाय, जो भी हो यह तो पूछा ही जा सकता है कि, ज़वाब देना क्या ज़रूरी है ?
पर यह ज़नाब क्या कह रहे हैं “ जब संविधान बना, तो सबसे ज्यादा अहमियत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को दी गयी। अगर आप किसी की आलोचना (गलत आलोचना नहीं, बल्कि सही) को सहन नहीं कर पाते हैं, तो आपको दूसरे की आलोचना करने का भी हक नहीं है। विचारों की दुनिया में आप तभी तक जिंदा रह सकते हैं,जब तक आप दूसरे लोगों के विचारों का सम्मान करते हैं।”
सो, मेरे साहज्य को निरूत्तर करता हुआ वर्तमान स्थियों का अपना ही अलग थलग उत्तर है.. क्योंकि,
अमर टू स्वामी हाँ और नहीं... इस तराजू के दो पलड़े हैं….
पहले हाँ से शुरु करते हैं
वह इसलिये कि मुझे ही क्या शायद किसीको भी दंभ नहीं सुहाता
वह इसलिये कि यहाँ साँस रोके रोके दम घुटने को हैं
वह इसलिये कि हम विवादप्रिय ब्लागिंग के रहनुमा नहीं हैं
वह इसलिये कि यह स्वतंत्र ब्लागिंग है, पराधीन लेखन नहीं
वह इसलिये कि अन्य बहुत से कारण हैं,                                     जो अकारण बताये नहीं जाते और..

वह इसलिये भी कि गुबार अभी थमता दिख नहीं रहा है

“इधर इंटरनेट पर बिखरे ज्ञान के डबरों में हर-हर गंगे करते लोग उधर  इन्टरनेट की गटर-गंगा मे मनचाहा उत्सर्जित करने की स्वछंदता का मजा लेते लोग. ये जो पूछ जाएं कम, वो जो लिख जाएं कम!
मामला खतरनाक होता है जब बंदर के हाथ तलवार लग जाए या आदमी के हाथ की-बोर्ड! कॉमेडी ऑफ़ एरर्स - त्रुटियों का हास्य - गलतियों पर गलतियां और उस पर गलतियां.. पढने-सुनने वाला हंसते हंसते जब कुढ जाए तो ब्लाग लिख मारे.”
स्वतंत्र ब्लागिंग बनाम तमाम असहमतियाँ
बयान नम्बर एक बकौल स्वामी “मालूम है यार! मगर "." पूर्ण-विराम का काम भी करता है और दशमलव का भी, कम कोड मे काम हो रहा है. हम <Edi tor> नही बना रहे यार, हम जनता को सार्वजनिक शौचालय बना के दे रहे हैं ताकी वो <Internet> पे जब चहे फटा फट हग सकें ... " आपको <Internet> पे कुछ हगना है? <HUG> का प्रयोग कीजिये और खुश हो जाईये!" टिन्ग-टिडि न्ग. आप हिन्दि अन्ग्रेज़ी कि खिचडी ऐसे "<" ">" मे लिख के कर सकते हो - वो ज्यदा महत्वपूर्ण है.”
तो स्वामी जी मैं आया भले देर से किन्तु हगने की प्रेरणा तो 2005 में ही आपसे प्राप्त कर ली थी, सो आज तलक  हग रहा हूँ !
अब किसीको बदबू आये तो भी कोई चारा नहीं है, इस 'लिखेला ठेलेला' के पास ! 
साथ ही एक आशंकित मन जो यह बयान करता या कहता है कि
“जो हो सो हो - गेन्द अब पराये पाले मे है, जिसको जमे उपयोग करो ! हिंदी ब्लॅग वालो से निवेदन है - हिन्दी मे जवाब देने के इस टूल को ब्लॅग मे भी घुसेडने की प्रक्रिया पे विचार हो सके तो वाह - अपन इस गेम मे नये हैं मदद करो यार लोग - ये कट-पेस्ट कि झन्झट खतम हो!”
और आपने उदारतापूर्वक माँ बहन करने की छूट देदी वह अलग “एक तरफ़ तुरन्त हिन्दी की सेवा का दौरा ... दूसरी तरफ़ अपने बनाए हुए टूल के इस्तेमाल की खुशी. मध्यम-मार्ग - अपन ने भी एक ठीक-ठाक सा टूल उतारा इन्टर्नेट से और बदले में अपना टूल दुरुस्त कर के हरम ... मतलब फ़ोरम वालों को कोड देने की प्लानिंग - पूराने अड्डे है अपने आना-जाना लगा रहता है उधर जनता देवनागरी में मां-बहन करती रहे और क्या चाहिये जिस फ़ोरम वाले को हिन्दी लिखने कि सुविधा देना है अपने कोड कि लिन्क हाज़िर है. हिन्दी पेलने का दौरा कितना घातक हो सकता है इसका सटीक प्रमाण - पेलो और पेलने के टूल बना के दो - आखिर मेरे अन्दर का लेखक, कलाकार और शिल्पी अपना सही सन्तुलन पा ही गया - ढिंग - टिडिंग! “
साथ ही एक क्षोभ भी दिख रहा है  “ Nahee yaar .... tune try kiya kya software -
भइ, मैंने ट्राई कर लिया इस को. युनिकोड नही देता! मैंने दूसरी युनिकोड फोन्ट के साथ टेस्ट किया - अपने काम की चीज़ नही है! हम को इन्टर्नेट पे लिखना है सीधे-सीधे ... मेरि गान्ड क्यों जलेगी? वो १५ दिन का एव ेल्युएशन दे रहा है फिर पैसे मांग रहा है - तु पैसे दे और खरीद ले यार! हर बात लिख ले क्यों समझनी पदती है तेरे को ... उपरवाले ने अच्छा-भला दिमाग दिया तेरे को, कितनी बार बोला, गन्डमस्ती करने मे जितना दिमा ग लगाता है उतना काम कि चीज़ मे लगा - लाईप बन्न जयेगी तेरी!”
लेकिन अंतिम बाजी आलोक व श्रीष जी के हाथ लगी, खैर.. छोड़िये यह बीते वक़्त की बाते हैं
किसी ज़माने में भदेस को लेकर आपकी ज़द्दोज़हद से मैं भी द्रवित हुआ था, इस आलेख पर..
ई-स्वामी से ई-पेलवान हो जाऊं ?
“आजकल हिंदी ब्लाग्स पढते हुए मेरे ज्ञानचक्षुओं में नए नए ब्रांड का गुलाबजल पडता जा रहा है. मुझे तो लगता था संस्कृत रामायण की तुलना में तुलसी की रामायण भदेस है क्योंकी वे सर्वसुलभ भाषा में हैं, कबीर और रहीम के दोहे उच्चकोटी का भदेस हैं क्योंकी वे जितने जटिल विषय पर हैं समझने-समझाने और बोलने में उतने ही आसान. श्लोकों और ऋचाओं की तुलना में भक्तिगीत भदेस है.. हीरें-काफ़ीयां-कव्वालियां भदेस हैं.
मुझे नही पता था की भाषा तब तक भदेस नही होती जब तक वो बुजुर्गों के सामने बोलने लायक ही ना बचे. बच्चों महिलाओं के सामने सम्मान खोने लायक ही बचे. क्या हम पर अपने पाठकों को ये फ़ील गुड देने का जिम्मा नही है की मै आपकी रिस्पेक्ट कन्ना चा रिया हूं! अपना ना सही अपने भदेस का तो सम्मान करो यार!
टेंशन मे नींद नही आ रही बाबा!
हिंदी के ब्लाग पढने के बाद हाल ही में मुझे एहसास तो हुआ है की  मेरा ब्लाग भी सांप्रदायिक है चूंकी इसके नाम ई-स्वामी में ’स्वामी’ शब्द आता है जो जनरली हिंदू स्वामियों के लिये प्रयोग मे आता है. अब हर एक के पास नाम का मतलब निकालने की ना तो अक्ल है ना समय है. जाहिर तौर पर  इस बात से कोई सरोकार नही होना चाहिये की मेरी सोच क्या है - नाम के आधार पर ही पूर्वाग्रह बनाए जाने चाहिए.....
वैसे तो अपने ब्लाग का नाम ‘ई-बुद्धा’ ‘ई-ज्ञानी’ या ’ई-उस्ताद’ भी हो सकता था लेकिन हुआ नहीं - इतने समझदार होते हम तो हिंदी ब्लागिंग करते? फ़िर सिख संप्रदाय में ज्ञानी शब्द धर्म के ज्ञान रखने वाले के लिये भी प्रयोग होता है इसलिये भी मामला थोडा लोचे वाला है.  स्वयं-भू स्वामी होने के लिये ज्ञानी होने की कोई कंडिशन नही ना थी तो रख लिये नाम!
चूंकी नाम से अगर मेरे सांप्रदायिक होने का प्रमाण बन सकता है तो देसी शैली में उस प्रमाण को मिटाना जरूरी है.  डर के मारे कभी कभी लगता है कोई रेडिकल स्टेप ले लूं .. लेकिन अब अचानक “ई-मौलवी” हो जाऊं, तो भी, नया लफ़डा तब भी हो सकता है!  (क्या करूं यार कुछ समझ नही आ रिया!) “

खैर,इन मुर्दे आलेखों को कुरेदने से क्या लाभ ?

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लेखक हो या ब्लागर, उसके शब्द ही उसकी सोच के प्रतिबिंब बन कर, यहाँ उसका प्रतिनिधित्व करते हैं.. जैसे कि यह प्रतिक्रिया, जो हमारे विज्ञान में भी साइड इफ़ेक्ट ही कहलाती है !
” डॉ. अमर को बिग बी उनके अपने कबीले के नहीं लगते, यानी मैं भी उन्हें अपने कबीले का नहीं लगता (बिग बी और मैं एक ही कबीले के हैं).वैसे बिग बी और मैं, डॉ. अमर को अपने कबीले के लग भी नहीं सकते.. हम अपनी उदारता और ओढी हुई इन्क्लूसिवनेस के चलते आम आदमी के करीब होना चाहें ना, तो भी नहीं!
देखिये, डॉ अमर एक आम आदमी हैं, हम जैसे कोई सेलिब्रिटी तो हैं नहीं… यही वजह है!....
मेरी पिछली पोस्ट में मैंने बिग बी को अपने कबीले का कहा! अगर कोई भी ७०+ आई.क्यू. वाला, लेख को पढेगा तो समझ लेगा की लेख में ‘कबीला’ एक प्रोवर्बियल/एब्स्ट्रैक्ट टर्म की तरह प्रयोग किया गया है. डॉ. अमरजी चिढ गए.. मुझे उनसे सहानुभूति नहीं हो पा रही है है क्योंकि मुझे तो बस अपने कबीले की सेलेब्रिटीज़ से ही सहानुभूती होती है! सोचा डॉ. अमर जैसे आम लोगों कों उन हालातों का अंदाज़ा होगा - जो की स्पष्ट तौर पे उन्हें नहीं था! दन्न से कम्यूनिस्टों की माफ़िक विरोध दर्ज कर दिया …असंतुष्टों की माफ़िक अमिताभजी द्वारा मात्र हिंदी में ही लिखने की मांग भी अपने ब्लाग पर धर दी! आपकी टैग है “अपन तो बस लिखेला और ठेलेला” ये कैसे चलेला?  अमिताभ बच्चन जब अपना ब्लाग हिन्दी में लिखते हैं तो वे ईस्वामी को अपने कबीले के आदमी लगते हैं”

क्या सच्ची में... एक सोच का पुनःनिरीक्षण है ( मैंने मूल लेख को पढ़ने की ज़हमत भी नहीं की ) मुझे भान था कि साढ़े चार साल से हिन्दिनी चलाने वाले से मुझे बहुत कुछ सीखना है, सो यह मेरा अपना मत है, यह किसी स्वामी का विरोध नहीं था बल्कि इससे मिलता जुलता कोई नाम तक उस आलेख के आसपास भी फटकने नहीं दिया गया है, बहुतों ने पढ़ा होगा इसे !
पर साइड-इफ़ेक्ट में इसके उलट किन्हीं डा. अमर को परिलक्षित करके ही उन्होंने अपने शब्दों को नाहक ही जाया किया है, अरे बंधु 50 माइनस आई क्यू ही सही, पर चासर की अंग्रेज़ी इतिहास में भी कबीले के संदर्भ को लेकर CLAN का प्रयोग है, जो बिरादरी के रूप में परिभाषित हुआ है.. यह ज्ञान क्या केवल आपको ही प्राप्त है ? ARIN व मोडरेशन की सुरक्षा में यदि आप अपने निजी शौचालय में यह दोहराते पाये जाते हैं कि..हम को इन्टर्नेट पे लिखना है सीधे-सीधे ... मेरि गान्ड क्यों जलेगी ? अभिनव का सोना हो, या अमिताभ का ब्लाग यदि आपको सहसा अपने लगने लगते हैं, तो मैं क्यों आपको याद दिलाऊँ कि.. उपरवाले ने अच्छा-भला दिमाग दिया तेरे को, कितनी बार बोला, गन्डमस्ती करने मे जितना दिमा ग लगाता है उतना काम कि चीज़ मे लगा - लाईप बन्न जयेगी तेरी!  

दन्न से कम्यूनिस्ट होने का अर्थ जानते हैं, आप ? अब मैं किस पर तरस खाऊँ, अपने आप पर ? पर तरस खाने के संदर्भ में अपने के साथ हमेशा आप को भी क्यों लपेटा जाता है, इस पर गौर करियेगा ! रही बात आम आदमी की.. तो मैं सहर्ष स्वीकार करता हूँ कि मैं आम आदमी हूँ, और आम आदमी के रूप में ही पहचान बनाये रखना चाहता हूँ, मैं आम आदमी इसलिये भी हूँ, क्योंकि झाबुआ के हाटों में घूम कर आम आदमियों को जंगल से बीन कर लायी चिरौंजी के बदले तौल में नमक दाल लेते देखा है, इसी वर्ष अप्रैल में 0.3 डालर ( Rs.15) के एवज़ में  12 घंटे की मज़दूरी करती झारखंड की औरतों से रूबरू हुआ हूँ, और अभी हालिया मिज़ोरम यात्रा में कलकता के साहूकारों को मात्र 2 रूपये किलो के भाव से शिमला मिर्च ( Capsicum-for your reference) ख़रीद कर ट्रक लोड करवाते देखा है । सो आपका गाली के रूप में आम आदमी का प्रयोग किये जाना तो बेकार गया कि नहीं ? यदि नहीं, तो बात ख़तम ! फिर भी याद दिलाना चाहूँगा कि..  वह आम ही हैं, जो अपने टाँगों के बीच से किसी ख़ास को निकालते हैं । यदि दो पीढ़ी पीछे जा सको, तो पूर्वजों को लोटे से चाय सुड़क सुड़क कर पीते देख पाओगे ! जब यही बिग-बी साइकिल पर कटरा से सब्ज़ियाँ लाते देखे जाते थे, या जब वह  अपनी आवाज़ के चलते रेडियो एनाउंसर के तौर पर भी अस्वीकार कर दिये गये थे, तब आप किस कबीले में शुमार होते थे ? तब भी आप कबीला ढ़ूँढ़ ही लेंगे, नान सेलेब्रिटी होने का !

यह तिवारी जी तो बड़े सुलझे माने जाते हैं,फिर भला क्यों ऎसी बेतुकी हाँकने की ज़ुर्रत कर बैठे
जरा बानगी लेंगे ? चलो, यह लेख इतना बड़ा हो रहा है, तो यह भी आज यहीं समेट दिया जाय
“.....अब ये ईस्वामी क्या हैं.. मैं नहीं जानता.. वे सनक, सनन्दन, सनातन हैं या सनत्कुमार.. हो सकता है कुछ लोग जानते हों.. मैं नहीं जानता.. हाँ उनके हाल के एक डर के बारें में ज़रूर जान गया हूँ.. उन्हे डर है कि साम्प्रदायिकता के इस (ऑफ़ कोर्स आर्टीफ़ीशिएल) हल्ले में उन्हें साम्प्रदायिक समझ लिया जायेगा.. इस पर मेरा जवाब उन्हे यह है..
साम्प्रदायिकता के मसले पर आप न ही बोलते तो कम से कम हमें आप के बारे में भम बना रहता.. पर बोल के आप ने खुद ही अपना कचरा कर लिया.. अब तो पोल खुल गई कि आप की समझ भी उतनी ही संवेदनहीन है जितनी एक बहुसंख्यक समुदाय के किसी खाते पीते व्यक्ति की होती है.. क्या समस्या है.. क्यों गला फाड़ रहे हो? थोड़ी शांति रहने दो.. हर चीज़ में साम्प्रदायिकता साम्प्रदायिकता.. हद कर रखी है तुम लोगों ने.. छी.. कब तक इस तरह का ज़हर फैलाओगे..आदि आदि.. इस प्रकार के विचार आप के नारद समुदाय में कूट कूट के भरे हैं.. “
लगता है, अभय जी को कुछ और गहरे उतरते हुये भी देखना पड़ेगा, आख़िर वह क्यों बाध्य हुये यह लिखने को, कि...
“ समझ रहे हैं..? नहीं.. आप को ये नहीं समझ में आएगा.. क्योंकि आप बहुसंख्यक संवेदनहीनता के शिकार है.. और फिर देश से बाहर भी हैं..आप अपने सपने को भयानक कह रहे हैं.. माफ़ करें आप नहीं जानते कि भय क्या होता है और भयानक क्या होता है..
आप लोगों ने एक समय में देश से बाहर रह कर अपनी ज़मीन से अपनी भाषा से जुड़े रहने के लिए एक सचेत कोशिश के तहत एक सार्थक मंच बनाया.. हम आप के उस योगदान को समझते हैं.. उसकी एक वक्त तक एक भूमिका थी.. पर हर चीज़ की तरह उस भूमिका की भी एक सीमा है.. पिछले कुछ महीनों में आप के इस मंच से जो लोग जुड़े वे अलग ज़मीन और पृष्ठभूमि से आते हैं.. आप उनकी ज़रूरत और जज़्बे को नहीं समझते.. वे विदेशी ज़मीन पर अपनी भाषा को जिलाये रखने की चिंता से ग्रस्त नहीं है.. उनका आकाश दूसरा है.. आप की खिड़कियों से वो नज़र नहीं आयेगा..
आप अभी भी नारद को एक किटी पार्टी समझ रहे हैं..जबकि इस में आजकल बहुत सारे भूखे नंगे अवर्ण अछूत आप की पार्टी स्पॉयल करने घुस आए हैं.. आप के पास दो ही रास्ते हैं या तो अपनी समझ को परिमार्जित कीजिये और इस मंच को शुद्ध व्यावसायिक स्तर पर दुबारा खड़ा कीजिये.. या अछूतों अवर्णों को बाहर कर के अपने घर के दरवाजे और कस के बंद कीजिये.. और चालू रखिये अपनी किटी पार्टी को..”
जो भी हो, मुझे क्या ? बड़े उदार हैं आप, आपने तो कृपापूर्वक उनको टिप्पणी भी दे दी…
“.......व्यक्ति, उसकी छवि, उसके व्यक्तिगत सरोकार, उसके ब्लाग, ब्लाग की एक पोस्ट और उसके अन्य इन्टरनेट सरोकारों को ऐसे मनघडंत सुविधाजनक कनेक्शन्स में जोड कर देखा जाना और फ़िर तुरत-फ़ुरत राय प्रकाशित किया जाना कितना सही है? ऐसे जजमेंटल लेखन का क्या मूल्य हो उस पर प्रतिक्रिया ही क्यों करूं? प्रतिक्रिया इसलिये की अब तक मैं आपका प्रतिक्रिया करने जितना पूरा सम्मान करता हूं भई ! नज़र-अंदाज़ नही करता ! “
अब स्वामी जी लाख टके का सवाल ... Sorry Sorry Sorry, लेट मी बी मोर क्लीयर,  So, pondering over a million dollar question कि आपकी यह नीति अभी  की हालिया साइड-इफ़ेक्ट लिखते समय, आखिर  किस अंतरिक्ष में बिला गयी थी ? इन्फ्लेटेड अहं को ठेस पहुँच गयी क्या.. वह भी इंडिया से सीधे अमरीका ?  अरे धत्त, ऎछा नेंईं करते  !
मैं तो आपकी आज्ञा शिरोधार्य करके सुधरने के प्रयास में लगा ही हूँ, अब सार्वजनिक शौचालय की छोड़िये, जो बीत गया वह लौटेगा नहीं..आप चाहें तो भी नहीं लौटा सकते, सबजन मिलि के अब आगे की सुधि लेय…. सो, कृपया यह तो बता दें कि आपको किस  नाकामयाब सुधारगृह ने शरण दी थी ?  स्वामी लोग तो वैसे भी राग-द्वेष से दूर रहते हैं, सो यह सब तज हम अकिंचनों का पथप्रदर्शन करते रहें, बट इन अ हेल्दी वे ! सबको दर्द होता है ! हम तो जपने को तैयार हैं.. अहं ई-स्वामी शरणम गच्छामि, और यदि आप चाहेंगे तो, जयकारा भी लगाया जायेगा, जय हो ई-स्वामी !colorbar_e0

यह पोस्ट लिखने की मज़बूरी आप समझते हैं, न ? आप तो साढ़े चार वर्षीय ब्लागर ठहरे, नहीं ? सो अहंवाद, महंतवाद या मठाधीशी वगैरह से एक आम ब्लागर को कितनी तक़लीफ़ होती है, अब आपसे बेहतर कौन समझता है ? वह कहते हैं न कि, पसंद अपनी अपनी..  ख़्याल अपना अपना.. शायद इसी ज़द्दोज़हद में नारद भी आक्सीजन माँग गये । सो, बचा खुचा हिन्दी ब्लागिंग साबूत रहने दीजिये । लिखेला-ठेलेला वाले आम मनुष्यों के लिये आपके पास क्लिक करने को एक माउस तो होगा ही ? ऎसे में उसे प्रयोग कर लिया करें, बात खत्म ! आपके आदेशानुसार आपका पुराना लिखा ही तो पढ़ रहा हूँ, वही यहाँ दिखाया भी है,पाठक यदि इसमें स्वादानुसार नमक मिर्च डाल कर पढ़ें,तो भला कोई बताये कि मेरा क्या दोष ? चरित्र-विच्छेदन या व्यक्तित्व-संधान मेरा शगल नहीं है ! इसको हनन भी न कहें, क्योंकि एक एक शब्द आपका ही  है !

इससे आगे

31 October 2008

फ़ौरी तौर पर….

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यह या कोई अन्य पोस्ट लिखना तो नहीं चाह रहा था । Aaj ka background श्री परसाई  जी,  ज़नाब कन्फ़्यूसियस साहब, महादेवी जी इत्यादि के उत्तराधिकारियों के मध्य मुझ  जैसे लावारिस बेलौस ब्लागर का क्या काम ? प्रतिक्रियाहीन असम्पृक्त समाज का यह सदस्य कुछ भी लिखेगा, तो..  ख़ैर जाने दीजिये ! वैसे ही यहाँ साहित्यिक हिन्दी, आंचलिक हिन्दी, प्रचलित हिन्दी, खड़ी हिन्दी, पड़ी हिन्दी etc. को उठाने वाले बहुजनों की बहुतायत है | ब्लागिंग के  पेशेवर, गैरपेशेवर, तक्नीकी, भड़ासी, फ़ँतासी इत्यादि किसी वर्ग में फ़िट हूँ ? शायद नहीं,  तो ?
आज सुबह उठने के बाद गैलरी में ज़मीन पर पड़े अख़बार से आँखें चुराता हुआ, मैं टायलेट की ओर बढ़ लेता हूँ । इससे तो आप भी सहमत होंगे कि मुद्दों से ज़्यादा संडास ज़रूरी है, बड़े बुज़ुर्ग यह कहते पाये गये थे कि, “ पेट भारी तो सिर भारी !“ अब उनके ज़माने में यह ब्लागिंग नामक पंछी तो सोचा भी न गया होगा, वरना  वह  ब्लागिंग को अपवाद स्वरूप अवश्य ही शामिल कर लेते ! शायद कहते “ पेट भारी तो सिर खाली “, यह शिव का यह ज्ञान मुझ पर भी लागू होता होगा ! हाँ तो, मैं अख़बार से नज़रें चुराता गया, जाने क्या संदेशा लाया हो, मुख्यपृष्ठ पर अच्छी ख़बरों का टोटा तो बना ही रहता है, वैसे भी । अक्खा इंडिया में कुझबी तो मस्त नहीं दिखेला है, भिड्डू !
अब गिरे हुये को तो उठाना ही पड़ता है न, भाई ? देहरी पर पड़े की कब तक अवहेलना करोगे, जब इनका बहुमत हो जायेगा, तब ? सो, मैंने अख़बार उठा ही तो लिया.. और जिसका डर था बेदर्दी … वही बात हो गयी ! सामने शिवम सुंदरम से अटा पन्ना !
  असहमत मौन
किंचित अफ़सोस है, यह पहले ही देख लेता तो संडास के लिये काँखना तक न पड़ता ! सरकारें आती हैं.. खुद को बचाती हैं, संभल तो जाओगे.. कभी तो संभल ही जाओगे… खुद को बेखुदी से बचाओगे… संभल तो जाओगे.. . कि तुम बिन सूना सूना है ! छोड़िये जी, आपको कोई इसी लिये पसंद नहीं करता, सदा कंधे पर सवार पंडिताइन लानत मलानत करती हैं,” क्या ज़रूरत है, सब काम छोड़कर यह कार्टून गढ़ने की… और यह पैरोडी बनाने की ? आराम से चाय पियो, ठंडी हो जायेगी तो क्या मज़ा देगी ?”
हिन्दी मत बोलो, मारे जाओगे
सत्यवचन पंडिताइन, मैं ख़्वामख़ाह ही अली-रज़ा पर लानतें भेजता रहता हूँ, मज़ा तो यहीं रखा है.. बिल्कुल सामने ही, इस गरम चाय की प्याली में ! वह तो हमारे लोकतंत्र की संप्रभुता सार्थक कर रहे हैं.. पंज़ाब सिंधु गुजरात मराठा.. अब द्राविड़ उत्कल बंगा !
amar2
“ फिर भी तुम यह पोस्ट ठेले जा रहे हो, बेशर्म कहीं के ! जाओ, क्लिनिक जाओ.. बारह यहीं बजा रहे हो !” बट नेचुरल, इट इज़ माई एनिमी नंबर वन, पंडिताइन ! सो, मैं चलता हूँ मित्रों ( कहने में क्या जाता है ? ), यदि आपमें से कोई टिप्पणी बक्से की ओर जाये, तो जरा यह ज़रूर बताये कि बारह किसके बज रहें हैं ?  बाकी लिखा सुना माफ़ करना.. आप सब को मेरा सुप्रभात !


इससे आगे

07 October 2008

नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः मीमांसा

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डिस्क्लेमर:  यदि आप लम्बी पोस्ट पढ़ने का धैर्य रखते हों, तभी यह पोस्ट पढ़ें   !  अधूरी पोस्ट पढ़कर इसमें दी जारही महत्वपूर्ण जानकारियों की अवहेलना करके, देवी का कोपभाजन न बनें। इसे तत्वबोधीय पोस्ट समझने का यह मित्रवत आग्रह है ! कृपया अपनी टिप्पणी यहाँ रखे टिप्पणी बक्से में ही डालें । ई-मेल या अन्य इलेक्ट्रानिक माध्यम से प्रेषित टिप्पणियाँ स्वीकार नहीं की जायेंगी। अपने दिमाग की सुरक्षा स्वयं करें ।

वस्तुतः मेरी पिछली पोस्ट पर श्री अनूप जी की टिप्पणी आयी, कि महाराज इस पोस्ट में वर्णित श्लोकों का अर्थ तो दे देते । सतीश बोले कि गागर में सागर.. ! इस प्रकार अपने ही हाथों यह धर्मसंकट उत्पन्न किया, सो प्रायश्चित स्वरूप यह पोस्ट ठेलने का साहस किया गया है । गवारा तो नहीं था, पर जैसा कि होता आया है… इस पोस्ट को ठेलने के सुझाव के पीछे पंडिताइन का हाथ है.. सो यह जन्म जन्मांतर के पाप की कड़ी मात्र है । मेरे ख़्याल से तो हर गृहस्थी में एक अदद सोनिया गाँधी अवश्य होती होंगी ! मूल रूप में 7 अक्टूबर 2007 को लिखे गये पोस्ट का यह संशोधित एवं संवर्धित स्वरूप है । मैं इसको रिठेल कहने को बाध्य भी नहीं हूँ, क्योंकि रिठेलने का मेरा कद नहीं है । बल्कि कोई कद ही नहीं है,…. चिट्ठाकारी का कद से क्या संबन्ध ?  वरिष्ठता का सदैव आदर किया जायेगा और टिप्पणियों की बाढ़ को प्रत्यक्षतः तो सराहा जायेगा  किन्तु परोक्षतः ईर्ष्या की जायेगी, ऎसा मेरा निश्चय है । इसको टिप्पणी की प्रतिटिप्पणी के रूप में भी कृपया न लें, यह मेरी विधा नहीं है । इतनी लम्बी पोस्ट के मायने ? कुछ तो यह लम्बी ही  पैदा हुई थी… बाकी रहा सहा मैंने और खींच दिया । वज़ह ?  वर्तमान हालात व मेरी समझ के समीकरण से, निकट भविष्य में मेरा हृदयपरिवर्तन हुआ ही चाहता है, बस घोषणा ही बाकी है । सो, इस पोस्ट को फ़ुरसतिया घराने में शुमार किये जाने की संभावनायें टटोलना  आरंभ किया जायें । प्रशंसक टिक जायेंगे   और  मुँहदेखी  वाले भग जायेंगे ।


अथ आरंभः या देवि सर्वभूतेषु ब्लागररूपेण संस्थिता lgupdated_e0

यह शीर्षक, क्यों ? आज षष्ठी है....' सप्तमं कालरात्री च महागौरीति अष्टकम', और इस दुर्लभ संधिबेला में , ऎसे पोस्ट  से कहीं अनर्थ तो न हो जाये , कुछ तो माँ से डरो, यह कोई और नहीं, पंडिताइन की भयातुर शंका है…. वाह री अनारकली, कबूतर कैसे उड़ा ?  तो,  ऎसे… नित्यप्रति अनर्थ देख रही हो । इस पावन नवरात्रि की महिमा, आजकल तो घर घर गायी जा रही है, और तुम ? तुम ऎसा करोगे, मैं सोच भी नहीं सकती, छिःह !!  ई जो है न, अपना लेडीज़ लोग !  ऊ काहे मौका-बेमौका अपना टिप्पणी  देता रहता  है ?  अउर.. लिजिऎ न, साथ में मीमांसा.. .. फ़्री  !  कहिन कि रिठेल आज़माओ,  और अब अनर्थ को डेराय रहीं हैं !  उकसा के पिटवाओ.. फिर फूँक फूँक मरहम लगाओ । मेरी पोस्ट तो वैसे  भी पिटती रहती हैं, सो हम काहे डेरायँ ? 
सोच तो मैं भी रहा हूँ ! जो बंदा सन 1968-69 के दौर से ही माँ का आँचल पकड़े हुये हो, श्री दुर्गा सप्तशती पर सन 1980-81  तक अधिकार प्राप्त कर चुका हो (  लोग ऎसा मानते हैं ) , वह अनायास ऎसी पोस्ट क्यों लिखने बैठ गया ? मन को दो दिन समझाने में लगे, ' मत लिखो, भाईलोग  इसको किंवा पब्लिसिटी हथकंडा ही मान लें तो ?  पर ज्ञानू गुरु का हलचलजड़ित पोस्ट देखकर बल मिलता है  कि अपने को व्यक्त कर ही देना चाहिये ।  हरज़ नहीं, जो सामने दिखे.. तड़ाक फोटो खींचो फड़ाक ठेल दो ! पीछे से सुकुल महाराज ( चिट्ठाचर्चा फ़ेम वाले ) भी कान में गूँज रहे थे , लिखो यार , तुम्हार कोऊ का करिहे ! संशय से उबरा तो फिर, यह डर सताने लगा कि कहीं मैं ही माँ की चोखेर बाली ( চোখের বালি - means - आँख की किरकिरी ) ही न बन जाऊँ ?

                                                          

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इतने वर्षों की सेवा साधना के बाद , पिछले दो वर्ष से व्रत-पाठ इत्यादि छोड़े बैठा हूँ । यहाँ तक तो ठीक था, क्योंकि मेरे आस्था-विश्वास में लेशमात्र भी कमी नहीं आयी है, बस केवल कलश स्थापन, भाँति भाँति के नियम विधानों से उपवास एवं ' हों-हों ' करते हुये सप्तशतीपाठ करना छोड़ रखा है । जबकि यही सब नवरात्रि के दिनों का स्टेटस सिम्बल है ! कई वर्षों तक दशमी को तड़के उठ अपने घर की पूजा से तृप्त हो, पूर्णाहुति के लिये 120 कि०मी० कार भगाता हुआ, गोविन्दपुरी, इलाहाबाद पहुँचा करता था । अकेले मैं ही नहीं, बल्कि राजा नहीं फ़कीर के बेटे अजयप्रताप सिंह, तरुण तेजपाल इत्यादि का तहलका भी वहाँ नियमपूर्वक उपस्थित रहा करता था, तिवारी जी के विशेष हवन में । तो, अब क्या मैं असंतुष्ट धड़े में चला गया.. ?  नहीं, कदापि नहीं ! फिर,यह प्रश्नचिह्न क्यों ?
यह प्रश्नचिह्न तो  मैं अपने सम्मुख रख रहा हूँ । वस्तुतः ' देवि के सर्वभूतेषू ' होने पर संशय करने की विद्यता, मेरे पास है ही नहीं, और न तो मैं चार्वाक का चेला ही हूँ । मार्कण्डेय महाराज भी उवाचते रहे हैं, ' भविष्यति न संशय : '   बल्कि इसी सम्पुट के साथ वह ऊँघते श्रोता को जगाते भी रहे हैं, जैसे इस युग में राहत कोष  जैसी घोषणा करके उखड़ती हुई पब्लिक को जगाया जा रहा हो… ऎई उठो, जागो और सुनो… सर्वाबाधाविनिर्मुक्तो धनधान्यसुतान्वितः । मनुष्यो मत्प्रसादेन भविष्यति न संशयः ॥

फिर ?  लफ़ड़ा कहाँ है, संशय क्या है ?  मेरी आहत आत्मा जैसे कचोट रही हो… आस्था में तर्क का स्थान तो निर्दिष्ट भी नहीं है, फिर बवाल क्यों काट रहे हो ?  बिल्कुल वाज़िब बात  बोले हैं, आप ! तो, सुनिये ... जितना अध्याय सुन सकते हों, उतना ही सुनिये, , फिर बोलियेगा !  पूरे नवरात्रि में ऎसा अफ़रातफ़री लोग मचाये रहते हैं कि मेरी भैंस बुद्धि जहाँ भी पानी देखती है, वहीं गोते खाने लगती है, भले ही वह कितना गंदा हो ।

यह एक ख़ास सीज़न है, जब कलंकित माथों पर भी लाल टीके चमचमाने लग पड़ते हैं, इतना लाल.. कि एकबारगी तय कर पाना कठिन होता है कि यह कोई सिद्ध पुरुष है या कोई 11000 वोल्टीय डैंज़र आदमी, जो सीधे माँ के पास से ही महिषासुर का रक्त  उड़ा कर चला आरहा हो । आप इस सकते से उबर गये हों और ख़ुदा न ख़्वास्ता वह महापुरुष आपके परिचित हुये तो वह सार्वभौमिक श्वानपरिचय ( कूकुर पिछाड़ा सुँघायी )  के अंदाज़ में आपको सूँघते हैं, ' सर, आप तो व्रत होंगे ? ' अब यह तो सीधे आपके ठसके पर प्रहार है, या तो आप खिसिया लीज़िये, ' नहीं, थोड़ी तबियत खराब थी, शरबत वरबत पीना पड़ता सो मिसेज़ ने मना कर दिया । ' अब यहाँ एक दूसरे किस्म का सामंजस्य दृष्टिगोचर होता है । आपका मातहत है,या आपके पास कोई फँसी गोट नवरात्रि में ही सुलटा लेने के संकल्प से टीकायमान हो घर से कूच किया है, तो वह चेहरे से कनस्तर भर सहानुभूति ढरकाता हुआ दोनों हाथ आसमान की तरफ़ उठा देता है, ' सब माँ की इच्छा, भला करें माई ' , यदि आपके चेहरे पर फूँक न मार दे तो आप अपने को हतभागी  समझें । वह पैंतरा बदल कर आपका मूड टटोलता है, “चलो साहब प्रोग्राम बनाओ, विंध्यांचल घूम आवा जाय… मयडमों का लेयि लियें” ।

स्थिति एक :

अब आप तय करो कि क्या माना जाय ? अच्छा चलो, मान लेते हैं कि आपमें कुछ VIP  होने का ठसका ठुँसा पड़ा है, यानि की आप अपने आप में तो वेरी इम्पार्टेन्ट परसन हैं, पर अन्य भक्तजनों  के लिये वेरी इन्कन्विनियेन्ट परसन,  फिर भला क्या कहना ? अष्टमी भले नवमी में बदल जाये, VIP जी देवी के गोड़ पकड़े निहोरा कर रहे हैं । अभयदान दो माँ, यह लात मेरे ऊपर न रख देना, कभी ! हर नवरात्र के नवरात्र आपका हिसाब कर दिया करेंगे, मेरा ध्यान रखना माई…

स्थिति दो :


आप फ़ौरन तमक कर, मत चूके चौहान, अपुन को जमा ही लो, आन बिहाफ़ आफ़ होल फ़ेमिली के, अंदाज में कहते हैं, ' नहीं यार, व्रत है । '  , ' हमारे यहाँ पूरा परिवार, बल्कि बच्चे भी व्रत रखते हैं, दसियों साल से ! ' थोड़ा ज़्यादा हो गया, दो कदम पीछे हट लो, गुरु । आप संशोधन पेश करते हैं, ' बशर्ते बच्चा घुटनों के बल न चल रहा हो, हमारी तो कुलदेवी ठहरीं, दद्दू ! ' कह कर माँ की परमानेंन्ट पोस्टिंग अपने यहाँ होने की तस्दीक़ कर ही दीजिये । अगला भगत यदि बगुला भगत हुआ तो स्वयं ही चुप हो जायेगा ।
लेकिन क्यों चुप हो जाये ? भगवान ने जब फाड़ने को मुँह दिया है, तो क्यों चुप हो जाये ? गाल बजाना हमारी राष्ट्रीय अस्मिता है । केन्द्र से आरंभ हो कर, यह महामारी राज्य तक ही नहीं थमती बल्कि अपुन के घर-परिवार तक को संक्रमित किये हुये है

यह विषय, फिर कभी !  क्योंकि मैं भी तो यहाँ गाल ही बजा हूँ । तो ज़नाब, डिफ़ेंस को तैयार रहें । उनकी भेदभरी निग़ाह अभी भी आप पर ही टिकी हुई है, " पूरा कि सिर्फ़ अगला-पिछला ? "  पूरा नवरात्रि स्पेशल बुक करवाये हो कि सिर्फ़ इंज़न औ' गार्ड के डिब्बे से काम चलाय रहे हो ? खैर छोड़ो, अब शुरु होता है... पाँचवी पास वाला सवाल, " एक टाइम खाते होंगे, फलाहारी नमक वाला ? " कलश भी बैठाते हैं कि केवल रात में छान-फूँक कर  इतिश्री कर लेते हैं ? " आप तन जाते हैं,' नहीं भाई, स्साला पंडित आता है हमारे ईहाँ, दुबे..छज़लापुर वाला !' यह आपका बड़प्पन हैं कि आपने स्वीकार तो किया कि ' माताजी ' को रिझाने में आप स्वावलंबी नहीं अपितु छज़लापुर वाली पार्टी को ठेका दिये पड़े हैं । पार्टी  इसलिये कह रहा हूँ,क्योंकि पंडित महाराज की एक पूरी टीम है, सीज़नल मस्टर रोल वाले से लेकर मेट-सुपरवाइज़र लेवल तक के बाम्हन ! बाकी मैनेज़ वह स्वयं ही करते हैं, यजमान के स्टेटस के हिसाब से किसको कहाँ फ़िट करना है, यही उनकी विद्यता है, यानि कि यजमान मैनेजमेन्ट ! फ़कत 700 श्लोक तो यजमानरूपी कोई भी ग्राहक बाँच लेगा।

या देवि सर्वभूतेषू  वृत्तिरूपेण संस्थिता । नमस्तस्यै । नमस्तस्यै । नमस्तस्यै नमो नमः ॥                    
तो पंडित महाराज वृत्तिनुसार ही आचरण कर रहें हैं। चलिये कोई बात नहीं, इसमें कोई त्रुटि नहीं है, जग की रीत है , लेकिन सरजी, जरा ख़ुद से, स्वयं, परसनली देख लीजियेगा कि कलश सही दिशा में स्थापित करवाया है कि नहीं ? हम भी कुछ तो जानते ही हैं, माताजी की दया से..,एक संक्षिप्त चुप्पी ( रहस्य का आवरण उत्पन्न करने के लिये वार्तालाप का अनिवार्य तत्व ! )  इसीलिये अपना समझ कर कह रहे हैं। अउर झेलौ, ई लेयो एकठईं स्लो पेस बाल ! अब आपका भविष्यति न संशयः तिरोहित हो जाता है, आफ़िस में  झूठा बहाना मार कर, या नज़रें बचा कर आप फूट लेते हैं । स्वगृहम गच्छामि, मन दोहराता है, ..कि हे वत्स धर्म के किया गया अधर्म निन्दनीय नहीं होता ! 

और एक नयी दुविधा के साथ आप घर में प्रविष्ट होते हैं, पहले दिसा कन्फ़र्म कर लो यार, सब साले प्रुफ़ेसनल होय गये हैं,  वर मरे या कन्या इनको द्क्षिना से मतलब, यही घोर कलयुग है । इससे पहले कि, अपना संशय आप श्रीमती जी को पकड़ायें, वह स्वयं ही लपक पड़ती हैं । पल भर आपको निरख कर बिलख पड़ती हैं," अब कुछ करो, गुड्डी के पापा, हमरी तो तपिस्या भंग हुई जा रही है । अबकी बार एकठईं बेटवा का माने हुये हैं, अउर देखो ई परेसानी खड़ी होय गई । सोनम की मम्मी आयीं रहीं,  बताइन कि अबकी मोहल्ले में पाँचें-छेः कन्या रह गयीं हैं। एक्कै दिन बचा है, अउर उई दुष्टा अब जाके बताइन, बताओ हम्म का करें ? हमतो नौ कन्या खिलावे का माने बइठे हैं, जनात है, मईया हमार परिच्छा लेय रहीं हैं। कुछौ करो नाहिं तो वंश नाश हुई जायी !


या देवि सर्वभूतेषू क्षुधारूपेण संस्थिता । नमस्तस्यै । नमस्तस्यै । नमस्तस्यै नमो नमः ॥                   
आप क्या करेंगे, भला ? एक दिन में बच्चा तो बना नहीं सकते, वह भी बिटिया ?  सो खीझ जाते हैं, दोस्तों को फोन वोन करके देखते हैं, कुछ व्यवस्था बनानी पड़ेगी । लेकिन साले मज़ाक उड़ायेंगे, किसको दोस्त समझें इस कलयुग में । साले मौज़ लेंगे कि दुई बिटिया तो तुम अपनी निजी मेहरिया की गिरवा चुके हो, अउर अब बाहर बिटिया हेर रहे हो ?   ससुरी में कुछ देवित्व बचा है, शायद… तभी तो गुड्डी की मम्मी ने मन पढ़ लिया, रास्ता दिखाया, "उपाध्याय से बात करो, ऊ तो नया आया है और अभी ई सब नहीं जानता होगा । उसके तो दुई बिटिया हैं, चलो मईय्या रस्ता निकाल दिहिन ।" अपार संतोष से ठुमक कर वह पलट पड़ती हैं । आप इस बेला एकदम कनफ़्यूज़ियाये हैं, " अरे, दो कहाँ है ? एक ही तो है, दो-तीन साल की लड़की,और दूसरी?" गुड्डी की मम्मी तो अब पूरे मौज़ में हैं, समिस्या हल होती जान मस्त हुई जाती हैं । "भूल गये, वह बड़ी वाली भी तो है, छैः कि सात वाली, अरे जिसका डांस जेसी मेले में हुआ था ।" और वह लहकते हुये घूम कर, अपनी स्थूल कमर को मटकाने का प्रयास कर, याद दिलाने की चेष्टा करती हैं,"छोटी सी उमर में लग गया रोग.., लग गया रोऽग..म्मईं मर जाऊँगी...ओऽ ओऽ म्मईं मर जाऊँगी, …..  ले आओ उसी को, हलुआ पूरी खिलायेंगे तो लगे हाथ एक्ठो नाच वाच भी देख लेंगे । एक एक कटोरी भी तो देय रहें हैं, सबको "


या देवि सर्वभूतेषू भ्रान्तिरूपेण संस्थिता । नमस्तस्यै । नमस्तस्यै । नमस्तस्यै नमो नमः ॥                  
अरे नहीं, फोन वोन करना ठीक नहीं, इस समय सीज़न है, साला लड़कियों की शार्टेज़ चल रही है, फोन पर टरका न दे। आमने सामने बात करना ठीक रहेगा, अभी आता हूँ " कह कर आप कलशा-वलशा भूल फ़ौरन पलट पड़ते हैं ।  " इत्ती धूप में ? कल चले जाना। या छोड़ो आज रात में चले जाना, आफ़िस से निकल आये हो, तो थोड़ा आराम कर लो…. व्रत किया है " ससुरी अपनी चलायेगी ज़रूर,.. .. कुलक्षनी ! पर आप ज़ब़्त करके बोलने हैं, ' ठीक है, पक्खफेना जी के यहाँ भी हो लेंगे, रास्ते में ही पड़ेंगे.. आज देवी जागरण रक्खा है ।' ," देवी जागरण… कियूँ  ?"  उनसे  स्कूप आफ़ द नौरात्रों छूटा जा रहा है, गुड्डी की मम्मी के स्वर से अधीरता चिंघाड़े मार रही है । यह कमबख़्त टोकेगी ज़रूर, लौट कर तो इसी घर में आना है, पंगा टाल जाओ,  देवीचरन !  पिछली नवरात्रि में ही तो छोटी सी बात का इतना बतंगड़ हो गया था, कि इनको पीटना पड़ गया, तब जाकर इनकी तरफ़ से सीज़फ़ायर हुआ था । हे माँ, इस बार ऎसा न हो, यह हिडिम्बा पिटने का कोई मौका न खड़ा कर दे ।

हमरी पोस्ट वाटर आफ़ इंडिया हुई रही है, का ? चलो चलो, आगे पढ़ो, बस खतमै समझॊ


या देवि सर्वभूतेषू बुद्धिरूपेण संस्थिता । नमस्तस्यै । नमस्तस्यै । नमस्तस्यै नमो नमः ॥                      
बुद्धि से काम लो, देवीचरन । काल बताये सो आज बताय, आज बताय सो अब्ब, नहीं तो बहुरिया पल में प्रलय  दिखाय देहै ! आप दरवाजे पर ही ठिठक कर खुलासा करते हैं, 'अरे, वो माया वाला केस नहीं था, उनकी मँझली बहू ?  मारत पीटत रहें सो केस करवा दिहिस था, अपने मयके में ? बाप पेशकार हैं सो पइसा कउड़ी तो खरच नहीं होना था । पक्खफेनवा जमानत तो पाय गये लेकिन तीन साल से बँधें बँधें घूमत रहे, वही मईय्या से माने रहें सो माँ की कृपा होय गयी, अचानक आउट आफ़ कोर्ट सेटल हुई गया, मामला ।  बेचारे सोफ़ै अल्मारी लौटा के संतोष कई ले गये । बिन्धाचल-उचल माने रहें, बदले में जागरण करवाय रहे हैं । मईय्या ने नहीं बुलाया होगा ।


या देवि सर्वभूतेषू विष्णुमायेति शब्दिता । नमस्तस्यै । नमस्तस्यै । नमस्तस्यै नमो नमः ॥                             
उपाध्याय के मकान से चार मकान पहले ही पक्खफेनाजी विराजते हैं, पहले वहीं चलें । उपाध्ययवा तो जूनियर है, उसका बाप भी दरवाज़ा खोलेगा या फिर माँ ने चाहा तो यहीं मिल जायेगा, पहले यहीं चलें । जागरण पूरे शबाब पर है, कानपुर की पार्टी है,  लेकिन सस्ते में पाय गये । लौंडे मस्त हो कर हाथ पैर फेंकते हुये, पसीने पसीने हुये जा रहे हैं । स्टेज़ से उनको लगातार ललकारा जा रहा है, 'ऊँ ऊँ ऊँ..दरँस दिख्ला जा दरँस दिख्ला जा, एक्क बार आज्जा आज्जा.. आज्जा आज्जा ऽ माताऽ ..ऽ ..ऽ , ओ मात्ता मात्ता मात्ता मात्ता.. मात्ताऽ ..ऽ ..ऽ मात्ता मात्ता मात्ता मात्ता.. मात्ताऽ ..ऽ ..ऽ कूल्हे टकराये जा रहे हैं, वह अपने भक्ति  को उछालने की प्रतियोगिता में  हारना नहीं चाहते !

या देवि सर्वभूतेषू  भी मगन हैं, क्या ? जरा देखूँ । देखा तो, हमारी माँ  हैलोज़न से आकर्षित हुये भुनगे पतंगों से आच्छादित हैं, कोई भी हाथ खाली नहीं कि वह कुछ प्रतिरोध भी  कर सकें ।  मैं उन पर टकटकी लगाये स्तुति कर रहा था , श्रीदुर्गेस्मृताहरषि  भीतिमशेषजन्तोः स्वस्थैः स्मृता मतिमतीव शुभांददासि .. सहसा लगा कि इस माँ भी इसी आर्केस्ट्रा के साथ विलाप कर उठेंगी,  इन्हीं लोगों ने..इन्हीं लोगों ने ले लीना सर्वभूतेषु मेराऽ
यदि आप मेरी बकवास पर अब तक टिके हुयें हैं ,तो धन्यवाद ! यह थी मेरे कर्मकांडी आडंबर से विमुख होने की कथा  देवि की महत्ता का बखान या इस महत्ता का आदर, दोनों में आप किसको कितना महत्व देते हैं, यह मेरा विषय नहीं है

लगे रहें, जमाये रहें... माँ भला करेंगी । पर घर में जरा अपनी बूढ़ी अम्मा का भी ख़्याल रखा करें ! क्यों वह अपनी वेटिंग सीट कन्फ़र्म करने की गुहार रामजी से लगाया करतीं हैं ? यह केवल मेरे निट्ठल्ले क्षणों के असहमत मौन का स्वर था, सो मूँहवा फाड़ दिया.. नारायण नारायण ! तो चलें ? नमस्कार.... 
या देवि सर्वभूतेषू ब्लागररूपेण संस्थिता ।  नमस्तस्यै । नमस्तस्यै । नमस्तस्यै नमो नमः ॥ 

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12 June 2008

मैं किस कबीले से हूँ ?

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पता नहीं मुझे कभी कभी क्या हो जाता है, किसी घटना को लेकर लगता है कि अरे, यह तो मेरे साथ घटित हुआ था, या हो रहा है । अनजानी जगह पर अनायास यह भावना जोर मारने लगती है कि यहाँ तो मैं आ चुका हूँ । जानता हूँ कि यह कोई रोजमर्रा की सामान्य घटना नहीं मानी जायेगी । किन्तु यह पागलपन भी नहीं है । यह चिकित्साजगत की एक सर्वमान्य प्रतिभासिक तथ्यपरता ( Phenomenon ) है । कारण ? अभी तक हम अनुसंधान ही कर रहे हैं कि ये Déjà-Vu क्यों होता है ?

कभी कभी लगता है कि पंडिताइन का चेहरा बहुत दूर होते होते अजनबी सा हो गया है, और मैं इस अजनबी चेहरे से कब  और कैसे मिला था, इसमें गुम हो जाता हूँ । दिमाग पर जोर देते देते सहसा एक झटके से मैं वर्तमान में लौट आता हूँ , सबकुछ झटक कर सहज होने के प्रयास में गुनगुनाने लगता हूँ, ' अज़नबी ..ऽ ऽ तुम जाने पहचाने से लगते होऽ ..ऽ ...ऽऽ

रुकिये भाई, खीझिये मत ! आप इस प्रोब्लेम में कुछ कर नहीं सकते, तो यह आपकी प्रोब्लेम है , किंतु ब्लागस्पाट पर आने को कम से कम इस डाक्टर ने तो आपको नहीं ही कहा था । अब आयें हैं, तो थोड़ा शेयर भी करना ही होगा , ब्लागर स्प्रिट का निषेध चल भी रहा है तो क्या ? मान लीजिये आपको सौजन्यवश यदि टिप्पणी ही करनी पड़ जाये तो, क्या लिखेंगे ?

इधर कुछ दिनों से सुबह सुबह अख़बारों  पर सरसरी निगाह मारने मात्र से मुझको लगने लगता है कि मेरा संबन्ध किसी न किसी कबीले से अवश्य है ! ऎसी अनुभूति  Déjà-Vu के सैद्धान्तिक अवधारणा के एकदम उलट है, किंतु यह मेरा सच है ।

अव्वल तो मैं कभी पूरा समाचार नहीं पढ़ता, यहाँ कोई शाश्वत साहित्य तो होता नहीं कि इसपर समय दिया जाये, और दूसरे अल्लसुबह निगेटिव किसिम की सुर्खियों से दिन की शुरुआत करना मुझे रास नहीं आता । स्साला, क्या हो रहा है ... कहते हुये अख़बार को मोड़ बगल में सहेज कर रख देने के शुतुरमुर्ग़ी सोच से मेरा असहमत मौन आहत होता है । क्या करें, भला ?

इन दिनों मैं अपने रूट्स यानि कि जड़ें कबाइली हलकों में तलाश रहा हूँ । अपने ख़ानदान का सज़रा भी टटोल डाला, किंतु ड्राफ्टपेपर पर यह मेरे बाबा स्व० नागेश्वर प्रसाद सिन्हा को लाँघता  हुआ  परबाबा बाबू मनोरथ प्रसाद से उचक कर राय बिलट लाल पर थम जाता है ।  बड़ी मुश्किल है, ब्लागर पर भी आना जाना छूट गया । खैर, लौट कर इसी जहाज़ पर आना पड़ा,  अब आ ही गया हूँ ,तो मेरी  सहायता करें ।  अब श्री बिलट लाल जी को पछाड़ कर मैं पश्चगमन ( Retrograde Journey ) करता हुआ, सुपरफ़ास्ट प्रागैतिहासिक आदिमानव टाइम कैप्सूल से  नानस्टाप द्वापर-त्रेता-सतयुग  छोड़ वहाँ  तक पहुँच भी जाऊँ , तो यह कौन बतायेगा कि, " वह देखो, वह है तुम्हारा छिन्नाछिन्नी लाऊखाऊ पेंचक्कचेंपक  हूओअहोऊ  कबीला ! " सो यह मेरा भ्रम ही था

 ्गु़अज़रा ज़माना - अमर ्सरदार अमर - अमर मेरा कबीला - अमर

भ्रम तोड़ा भी किसने ? कबीरदास नाम के किसी अनपढ़ जुलाहे ने ! पीछे से आवाज़ दी, ' मोको कहाँ ढूँढ़ो रे बंदे... ' तेरा कबीला तो यहीं है, देख तो जरा ।  'पोथी पढ़ पढ़ जग मुआ ' तो डरता क्यूँ है ? अच्छा पोथी मत पढ़, चल अख़बार तो पढ़ेगा ? चाय की चुस्की का मज़ा दुगना कर, अख़बार पढ़ ! परेशान मत हुआ कर, यदा कदा लाली भी देख लिया कर ।  कबीला बाद में देखना ।

   मेरा परिवार - अमरxxx ्काश मैं ऎसा होता - अमरtt

हा विधाता, यह कैसी बारिश करवा रहे हो कि आज अख़बरवै नहीं आया ।  तो क्या ? जाके आज कुछ रिवीज़न ही कर ले ।     धन्य धन्य कबीरा ज़ुलहे , मेरा कबीला तो यहीं बिखरा पड़ा है !

अरे वाह, बरेली ( मेरी वाली नहीं ) में प्रेम करने वाली लड़की घर वालों द्वारा मार डाली गयी और लौंडे को दौड़ा दौड़ा कर पीटा फिर जला डाला गया । बाँदा में तीन ग्रामीणों ने चौथे की रोटी लूट ली । मार लेयो, रोटी तो गयी पेट में । भूख से मरने से अच्छा कि कुछ झापड़ वापड़ खा लिया जाये । हरदोई में लड़की को निर्वस्त्र करके पेड़ से लटका दिया, क्योंकि वह किसी दूसरे से ब्याह रचाना चाहती थी । महोबा में लाठी डंडों से हमला कर गाँव वालों ने पानी लूट लिया । हुँह, अरे पानी है ही लूटने की चीज ! प्यास से कौन मरना चाहता है ? बंगलुरू में खाद माँग रहे कुछ बेवकूफ़ों में एक मारा गया । कोट्टायम में लड़के के लिये ऊलूऊलूलजुलूल ओझा ने दो वर्षीय कन्या की बलि दे दी ।  देवि खुस्स भयीं, अब देवा आवेगा । देवा अगर होनहार निकला तो बड़े होकर फिर किसी देवी को जलावेगा । गाज़ियाबाद में इस साल अबतक 121 बच्चे गायब किये जा चुके हैं । बलात्कार ? यह तो यहाँ मनोरंजन है । बलात्कारी और न्यायाधिकारी (?) दोनों के मौज की चीज ! अपनी या किसी और की सही माँ, बहन, बहू, बेटी, भाँजी, भतीजी, बच्ची, बूढ़ी... बस औरतिया हो , बदसूरत हो तो भी ठीक, खूबसूरत हो तो क्या कहने.. उसे  उठा लो.. इच्छा तृप्त करो और किनारे फेंक दो, ज़िंदा या मुर्दा ! औरतिया तो मरद की ज़रूरत है..तो फिर बवाल काहे का ?

अब तो कोई शक औ ' शुब़हा न रहा कि मेरा वाला कबीला भी यहीं कहीं होगा । क्या ज़रूरत है पुरखों को कूद फाँद कर पीछे भागने की ? सब तो यहीं है । मेरा मन मृग फिर क्यों कबीलाई कस्तूरी की खोज में भाग रहा है ? यहीं तो है कलयुगी कस्तूरी !

धन्य धन्य कबिरा ज़ुलहे, सो मेरा कबीला तो यहीं बिखरा पड़ा है।                                                                             मैं मूरख déjà-Vu का राग अलाप रहा हूँ, बलिहारी  ज़ुलहे आपनो सत्य दियो बताय । फिर भी एक मुश्किल है  कि  मेरा वाला कौन सा है ?  अभी तो, मैं किनारे खड़ा खड़ा लख रहा हूँ कि अपने लोगों का मौन रहने वाला शांतिप्रिय कबीला आख़िर किस खोह में मिल सकता है ?  मेरे कबीले की भी तो कोई पहचान अवश्य होगी । बस वही पहचान  मुझे चाहिये । प्लीज़,  भले मानुष कृपया सहायता करें, मुझे मेरे अपने कबीले से मिला दें  ! या  कहीं..  ..  आप भी तो चक्कर नहीं खा रहे कि ' मैं किस कबीले से हूँ ? '

इससे आगे

14 May 2008

आओ सखि जरा निन्दिया लें

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दूर कहीं किसीके रेडियो से गाने की आवाज़ सन्नाटे से संघर्ष करके आती प्रतीत हो रही है । नहीं जी, मैं बहरा नहीं हूँ,गाने का प्रतीत होना एक अलग तरह का एहसास है । गाना गाया जारहा है, यह निर्विवादित होता है, धुन भी चिरपरिचित लग रही है, किंतु स्पष्टता के अभाव में, आप गाने के बोल नहीं पकड़ पा रहें हैं, तो इसे क्या कहेंगे ? मन को अशांत कर देने वाली छटपटाहट ! साइडरूम से कुछ खाना खा कर लौटा, तो अनमने ढंग से टी०वी० खोल कर बैठ गया, जरा देखा जाये कि बाहर की दुनिया में क्या चल रहा है ? वैसे टी०वी० में मेरी आस्था न के बराबर रह गयी है, पर कोई और चारा भी नहीं है । ब्लगियाऊँगा तो शायद रात ही न बीत जाये । छोड़ो, सुबह लौटना भी है, अपनी  प्रैक्टिस के  दिहाड़ी  पर !

कल रात से हम तोता-मैना यहाँ प्रवास कर रहे हैं , रायबरेली से तीस किलोमीटर पर  डलमऊ स्थित नहर विभाग के अतिथिगृह  में । गंगा के ठीक किनारे एक ऊँचे टीले पर टिका यह गेस्टहाउस बड़ी शांति देता है, किंतु यह गाना मुझे क्यों अशांत कर रहा है ? दरअसल इसकी धुन व लयबद्धता से यह तो पक्का है कि लता जी का स्वर है, किंतु मुझे उनका कोई ऎसा गाना याद नहीं आता, " Note हम हिंदूस्तान में रहने वालों को..ओऽ ..ऽ, चैन कहाँऽ हाये ए एऽ आराम कहाँ, हम.. हिंन्दस्ताँ में रहने वालों को ओ ओ ओऽ Crying ^"

मैं शर्त लगा सकता हूँ कि ऎसा कोई गाना ही नहीं है, लेकिन इसके धुन से मेरे दिमाग में तो यही बज रहा है, क्या करें ? मेरी बालीवुड एनसाइक्लोपेडिया पंडिताइन मेरी मदद अवश्य करती किंतु वह तो खाना खाकर लौटते ही ध्यानस्थ हो गयी । इस समय वह निद्रायोग में परमब्रह्म से एकाकार होती सी लग रहीं हैं, चलो यह वरदान तो बिरलों को ही नसीब है । मैं  यहाँ  आ गया था कि एक दिन में लगकर अपने सभी ब्लाग्स को रिस्ट्रक्चर कर लूँगा, पंडिताइन का एक शनिवार चुरा लिया था, वह भी उनको लौटा दूँगा । आज सोनिया गाँधी रायबरेली आ रहीं हैं, सो शहर में बड़ी अफ़रा तफ़री रहेगी । यहाँ तो अर्ज़ुन सिंहों की भरमार है, एक ढूँढो तो दस हज़ार मिलेंगे । हर उम्र जाति वर्ण और ओहदे के अर्ज़ुन सिंह, हर गली गली में देखो । वैसे भी फ़िज़िक्स के नियम के अनुसार सोनियाजी के आने पर मैं निष्क्रिय होकर अवक्षेपित हो जाता हूँ, एक किनारे को !

हाँ, याद आया कि दिमाग में 'चैन कहाँ-आराम कहाँ Sad ' क्यों हो रहा है । टी०वी० पर बाहरी दुनिया का हाल देखने की नौबत ही नहीं आयी । यहाँ तो अपने ही घर में धूम-धड़ाम चल रहा है, जयपुर में धमाकों को लेकर । चैनलों की सक्रियता एवं धाक के मुताबिक इनकी गिनती 6 से 8 के दरम्यान डोलती फिर रही थी । एक ज़नाब तो रस्सी पकड़े पकड़े इतनी देर से साँप साँप चिल्ला रहे थे कि साला टीवीए बंद कर देना पड़ा । एकठो निष्क्रिय किया हुआ बम पा गये थे । उसी को उधेड़ उधेड़ पूरे देश को दिखा रहे थे , 65 उजड़े परिवारों की बाइट से आह्लादित एवं बिछोह की वेदना से बिलखती महिला को कैमरेCamera में कैद कर लेने की सफलता से परम उत्साहित । ऎसा अवसर दुबारा नहीं आयेगा, न तो उनके लिये और न उस बेचारी महिला के लिये । कुछ बरबादियाँ अपने को कभी रिपीट नहीं करतीं, न ही मौत दुबारा दस्तक देने आती है । दे आर जस्ट वन टाइम डील !

                            जाने वाले लौट के आ-अमर ्जैअपुर जयपुर-अमर जैयपुर धमाके-अमर

हटाओ यार, अपना मन ख़राब मत करो । यह असहमति की स्थिति मेरे आसपास ही निरंतर क्यों मँडराया करती है ? यह क्या वस्तुस्थिति का अस्वीकार नहीं कहलायगा ? संभालो अपने को, यही सब अपने मन को समझाता मैं गंगा पर बनते पुल को नीम अँधेरे में अनमना निहारता रहा। लौटा कि टीवी बंद न करूँ तो आवाज़ ही कम कर दूँ ,वरना पंडिताइन अपने खर्राटा तप में विघ्न पड़ने से जग गयीं तो इस निशाचर की ख़ैर नहीं

लेटा लेटा चलते हुये कैप्शन देखता हुआ निन्दियाने का प्रयास कर रहा था कि ज़बरन मेरे दिमाग के साथ एक हादसा होगया । सामने स्क्रीन पर स्क्राल कर रहा है, " राष्ट्रपति ने धमाकों की निन्दा की...प्रधानमंत्री ने घटना की निन्दा की... सोनिया ने भी निन्दा की... वामपक्ष ने निन्दा की... विपक्ष ने निन्दा की... इसने निन्दा की.. उसने निन्दा की.. सबने निन्दा की.. बिन्दा ने निन्दा की.. स्वयं निन्दा ने निन्दा की !" हद है भाई !

अब इतनी निन्दा भी ठीक नहीं कि बेचारे हूज़ी फ़ूज़ी के लड़के शर्म से पानी पानी हो जायें । चलिये मान लेते हैं कि बाहर से आये हैं, देन दे मस्ट बी ट्रीटेट लाइक ' देवो भवः '। भर्त्सना करते तो भी गनीमत, उनको छोड़ अपनी ही आधी जनसंख्या इसके मानी न समझ पाती । और यहाँ हर छोटा बड़ा निन्दा पर उतारू ! अब इतनी निन्दा अच्छी बात नहीं है, ' ज़ंग तो नहीं छेड़ाऽ..आऽऽ, दस्तक ही तो दी हैऽऽ ..ऽ, हंगामा है क्यूँ बरपाऽ.. आऽऽ  ऽ , बम ही तो फोड़ी है ' इन्हीं उल्टे पुल्टे विचारों के साथ निन्दिया से बोझिल होती आँखों से यह पोस्ट लिख रहा हूँ कि बाहर के सन्नाटे को भंग करती आवाज़ें आने लगीं.., ' हुँआ हों हों हुँआ हुँआ..हुँआहुँआहुँआ हुँआ हुँआ होंहुँआ ' फिर सहस्त्रों हुँआ हुँआ से रात थर्राने लगी । बहुत दिनों के बाद असली सियार या फिर गीदड़ की आवाज़ सुनी है । शायद वह भी निन्दा कर रहे हैं, या मुझे ललकार रहे हैं, ललकारेंगे क्या भला ? इनकी तो गीदड़भभकी ही सुहाती है । रात के सन्नाटे में या समझो इस समय पूरे देश  में पसरे सन्नाटे में यह इनका समवेत क्रंदन है ।  कहीं मुझे तो नहीं न्योत रहे हैं कि भाई बिरादर तुमने तो निन्दा की ही नहीं सो ' आओ सखे जरा निन्दिया लें ' । उन उजड़े सुहागों और घायलों के तीमारदारों को छोड़ सभी सो चुके हैं । मैं भी जा रहा हूँ लंबी तानने, तुम धिक्कारते रहो या निन्दियाते रहो, नो वन केयर्स यू ब्लडी इंडियन गीदड़्स !        आप सब को भी नाचीज़ की शुभ    जैसी तैसी रात्रि !

इससे आगे

10 May 2008

दुल्हन वही जो ....

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यहाँ तक तो आगये, अब खीज हो रही होगी । फ़ोकस बहुत बनाये पड़े हैं, और घिसे पिटे शीर्षक देकर लोगों को बेवक़ूफ़ बना रहे हैं ।          सीधी सी बात है, दुनिया मानती है कि दुल्हन वही जो पिया मन भाये

एकदम बरोबर सोच रहे हैं, आप । फिर आपकी इस ज़ायज़ सोच में मेरा असहमत मौन क्यों कुलबुला रहा है ? यह तो मैं भी मानता हूँ कि   बरदे की खुर सींग दाँत देखने की ही तरह, अभी भी कन्या यानि कि भावी दुल्हन के रूप गुण की कई कई बार बड़ी तगड़ी स्क्रूटिनी की जाती है ।  आज लड़के की बुआ देख कर गयीं हैं, तो कल मामीजी पधार रहीं हैं । अगले हफ़्ते सुना है कि लड़के के जीजा अपनी होने वाली सरहज को टटोलने आ रहे हैं, उनकी भी पसंद का ख़्याल रखा जा रहा है । आखिर घर के दामाद हैं । पाहुन रूठ गये तो शादी की किरकिरी हो जायेगी ।

चलो भाई, मान लेते हैं यह चोंचले । आख़िर बेटी जो ब्याहनी है । किंतु इस पूरे परिदृश्य में लड़का आख़िर कहाँ है ? शायद आता ही नहीं है ।    हाँ यदि तगड़ा कमाऊ है, मल्टीनेशनल का नौकर है, घूस वाली पोस्ट पर काबिज़ होनहार सरकारी अफ़सर, बाबू वगैरह है, तो उसे भी आख़िर में एक मौका मिलता है, जाओ भाई तुम भी देख आओ तो बात आगे बढ़े, बल्कि फ़ाइनल ही कर देना । फिर कुछ एडवांस-उडवांस लिया जाये ।     का कहते हैं सुकुल जी, जो जग का रीत है, ऊ तो निबाहना पड़ेगा न ? और छोटे नबाब अपनी कालेज के दिनों की सहपाठिनियों के चेहरे याद करते हुये चल पड़ते हैं, अपने लिये दो टाँग की गईया एप्रूव करने । चोखेरवालियों, आप कुछ कहेंगी, नहीं ? यह शोर क्यों मचा करता है या मान लीजिये कि मच रहा है, दुल्हन वही जो पिया मन भाये Love Struck

साइलेंस !Time out

छोड़िये, जब सुकुल जी मान रहे हैं कि जग की रीत के हिसाब से ई सब कस्टम कोनो बेज़ा नहीं है, तो पांडेय जी भला मुँह खोलेंगे , धुत्त ?   फिर ? फिर मैं यहाँ क्या कर रहा हूँ ? आज ही मेरे बढ़ते वज़न का क्लू मिला है, आज तो चैन से लंबी तानी जाये । पंडिताइन यानि कि मेरे   हर सुख आराम की सौतन, टपक पड़ीं," ये क्या करने जा रहे हो ? इतने लोगों को दुल्हन का टाइटिल दिखा कर न्यौत लिया है, अब भाग रहे हो । अच्छा जाओ, तुम्हारे बेबी का फोन आया है, जल्दी बात करके आओ । आज फिर न चिपक जाना, उसकी आधी बात तो मेरे पल्ले ही नहीं पड़ती है "

बेबी यानि कि डाक्टर देवेन्द्र श्रीवास्तव, ओरई (जालौन) में अपनी स्वयं की क्लिनिक धूम से चला रहे हैं, झाँसी रोड पर नर्सिंग होम भी है । उनका फोन अक्सर आधी रात में ही आता है । मेरे कनपुरिया बैचमेट व अभिन्न सखा । बेबी और बाबी की जोड़ी मेडिकल कालेज़ में हर अच्छे बुरे कामों  के लिये प्रसिद्ध हुआ करती थी । बाबी यानि कि मैं ! बैच में हम दोनों ही सबसे कमसिन थे, अनायास जोड़ी बन गयी, और खूब बनी । अक्सर ही वह रात में गहरे सुरूर में पाये जाते हैं, और तभी शायद बीते दिनों के संदर्भ में मेरी याद आती होगी । आधे घंटे से कम बात नहीं होती ।Kiss

फोन उठाते हुये मेरे मन में चल रहा था,' आज एक पोस्ट लिखने की ठानी थी, और यहाँ दुल्हनिया के चक्रव्यूह में फँसा था, बेड़ागर्क करने अब ये आगये । ' हेल्लो बेबी...मैं उनसे और वह मुझसे उलझ गये । क्या कर रहे थे ? पोस्ट ? इतनी रात में किसको पोस्ट कर रहे हो, बात करूँ भाभी से..?...सँभल जाओ किसी चीजके ! साले सुधरोगे नहीं, खखेड़ करने की आदत नहीं गयी, अब तक ? बेचारा बेबी मेरी मुहब्बत में हर इतवार को मेरे साथ परेड जाया करता था, और मैं उसको छोड़ के रविवार को लगने वाले मार्केट परेड बजार में गुम हो जाता था, पुरानी किताबों की तलाश में । समय का अंदाजा न लग पाता और अक्सर निरमा वाशिंग पाउडर निरमा के वक़्त या उससे भी बाद में हम पिक्चर हाल में घुसते थे । लिहाज़ा वह झींकता झगड़ता हुआ थक कर गहरी नींद में सो जाता था, सिनेमा ख़त्म होने पर फिर वही मुझको, मेरे होने को, मेरे सेल्फ़िशपने को कोसने का सिलसिला चालू हो जाता, जो डिनर के बाद मेरे बिल अदा करने पर ही शांत होता । हम चुपचाप कैप्सटन फूँकते हुये लौटा करते ।

चलो, आज बेबी के सितम झेल ही लूँ, उफ़्फ़ न करूँगा चाहे जितनी भी देर तक बलबलाये । उसने पोस्ट का पोस्टमार्टम फिर शुरू कर दिया, क्या पेल रहा है, पोस्ट में ? क्या कहा, दुल्हन ?  पिया मन भाये ? हा हा हा.. उसके ठहाकों से मेरा खून जल रहा था, लेकिन उसकी उधार देने की उदारता को याद कर, मैं  एक खिसियायी संगत की तर्ज़ पर अँए अँए करता रहा । वह थमा, "अबे ज़मीन पर आजा राजश्री के भँड़वे, किस दुनिय में रहता है ?" और कुछ बताने लगा..... आपको भी बताऊँ कि क्या बताया ? Peace Sign

अपने भारत महान के बृहत्तर प्रदेश, उत्तर प्रदेश में बुंदेलखंड हुआ करता है, कल कौनखंड होगा, इसका नाम क्या होगा , हमें क्या लेना देना ! इस समय पिछले कई वर्षों से, बल्कि दशकों से, पानी की किल्लत से बुरी तरह जूझ रहा है । यह किल्लत इस कदर यहाँ के वासियों की नसों में रच गयी है कि अब रोटी बेटी के संबन्ध पानी की उपलब्धता से संचालित होते हैं । एक गाँव से बेटी का बाप, दूसरे गाँव रिश्ता करने जाता है, तो यह तसल्ली कर लेता है कि बावड़ी, पोखर या नदी जमाई के घर से ज़्यादा दूर तो नहीं है ? दिखा दिखाई पर अब तक तो कोई जोर नहीं रहता था, किंतु अब आंशिक रूप से अनिवार्य हो गया है । अनिवार्य..वह भी आंशिक, जम नहीं रहा ! अनिवार्य बोले तो लड़के वाले बिना लड़की देखे, रिश्ते के लिये हाँ  तो करते ही नहीं, औ..र आंशिक बोले तो वह पूरी लड़की नहीं बल्कि उसकी गठन और ख़ास तौर पर बाँहें देखते हैं । चेहरे का क्या करना ? घर में पानी कोई खूबसूरत चेहरे के जोर से तो आने से रहा, जैसा भी हो ! पानी भर कर लाने के लिये मज़बूत बाँहें और दमदार शरीर की आवश्यकता होती है, वह है तो ठीक वरना अपनी कोमलांगी को बैठाये रहो घर में, इन्ने तौ राज्जा के मैअल जाणा है  के ताने सुना करो । यह तो बड़ा गड़बड़ हो गया मित्रों, मुझे अपनी पोस्ट के क्लाइमेक्स का फ़ज़ीता होता दिख रहा है, किंतु सच को कैसे नकार दूँ ? चलो, ठीक भी है......

दुल्हन वही, जो पानी भर लाये 

                           पनघट-अमर पनघट_अमर

अब आप मग़ज़मारी करो कि भारत सरकार 2010 से 2012 तक महाशक्ति के रूप में दुनिया के तमाम देशों को पानी पिला देने का स्वप्न देख रही है, वह किस मुरव्वत में अपने देशवासियों को पानी नहीं पिला पा रही है ? मेरी पोस्ट का लालित्य जाता रहा वो अलग....चलते हैं, हुक़्म ?

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यह अपना हिन्दी ब्लागजगत, जहाँ थोड़ा बहुत आपसी विवाद चलता ही है, बुद्धिजीवियों का वैचारिक मतभेद !

शुक्र है कि, सैद्धान्तिक सहमति अविष्कृत हो जाते हैं, और यह ज़्यादा नहीं टिकता, छोड़िये यह सब, आगे बढ़ते रहिये !

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