जो इन्सानों पर गुज़रती है ज़िन्दगी के इन्तिख़ाबों में / पढ़ पाने की कोशिश जो नहीं लिक्खा चँद किताबों में / दर्ज़ हुआ करें अल्फ़ाज़ इन पन्नों पर खौफ़नाक सही / इन शातिर फ़रेब के रवायतों का  बोलबाला सही / आओ, चले चलो जहाँ तक रोशनी मालूम होती है ! चलो, चले चलो जहाँ तक..

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27 May 2009

नँगे सच में नहायी बहना

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देख भाया, मेरी गलती नहीं हैं । आजकल हाल है कि, ’ जाते थे जापान .. पहुँच गये चीन समझ लेना ’ तो पढ़ा ही होगा । अपनी प्रतिष्ठा के प्रतिकूल एक मिन्नी सी,  सौम्य.. लजायी हुई पोस्ट देकर अपने जीवित होने की गवाही देनी पड़ी । बताइये भला.. मेरी एक चिरसँचित इच्छा पूरी हुई,  दादा विनायक सेन रिहा हुये,  और  मैं  ब्लागर होकर  भी  अपनी खुशी की चीख-पुकार खुल कर न मचा सका । बिजली की आवाज़ाही, अफ़सरों का विदाई और स्वागत समारोह एटसेट्रा करीने से एक पोस्ट भी न लिखने दे रहा है !कुश जी,  अब तुम न कह देना, कि पहले ही कौन सा करीने से लिखा करते थे । मुझे यूँ छेड़ा ना करो, मैं ठहरा  रिटायर्ड नम्बर !

भूमिका इस करके बन रही है कि, आज बड़ी जोर की ठेलास लगी है.. और बुढ़ाई हुई बिजली नयी माशूका की तरियों कब दगा दे जाये कि अपुन कोई रिक्स लेने का नहीं ! लिहाज़ा, आज अपनी एक पुरानी वाली को ही ठेल-ठाल कर सँतोष किये लेते हैं,का करें ?

अप्रैल 2008, एक नया राष्ट्रीय मुद्दा उठा रहा, कि युवराज राहुल विदेशी साबुन से नहाते हैं : और समय का फेर देखो कि पट्ठा खुदै धूल फ़ाँक के सबैका धूल चटाय दिहिस । हमरी हिरोईन तिलक तलवार तराज़ू के तिपहिये पर दिल्ली कूच करते करते रह गयीं !

पहले तो यह बतायें कि इस पोस्ट का उचित शीर्षक क्या होना चाहिये था , नंगे सच की माया या  माया का नंगा सच ? जो भी हो, आपके दिये शीर्षक में एकठो नंगा अवश्य होना चाहिये, वरना आपको भी मज़ा नहीं आयेगा ! वैसे राजनीति पर कुछ कहने से मैं बचता हूँ । एक बार संविद वाले चौधरी के बहकावे में, मै ' अंग्रेज़ी हटाओ ' में कूद पड़ा था, अज़ब थ्रिल था, काले से साइनबोर्ड पोतने का ! लेकिन इस बात पर, मेरे बाबा ने अपने  इस चहेते पोते को धुन दिया था, पूरे समय उनके मुँह से इतना ही निकलता था, "भले खानदान के लड़के का बेट्चो ( किसी विशेष संबोधन का संक्षिप्त उच्चारण, जो तब मुझे मालूम भी न था ) पालिटिक्स  से  क्या मतलब ? " यह दूसरी बार पिटने का सौभाग्य था, पहली बार तो अपने नाम के पीछे लगे श्रीवास्तव जी  से पिंड छुड़ाने पर ( वह कहानी, फिर कभी ) तोड़ा गया था । खैर....

आज़ तो सुबह से माथा सनसना रहा है, लगा कि बिना एक पोस्ट  ठेले काम नहीं चलेगा, सो ज़ल्दी से फ़ारिग हो कर ( अपने काम से ) यहाँ पहुँच गया.. पोस्ट लिखने । पीछा करते हुये पंडिताइन  भी  आ  धमकीं, हाथ में छाछ का एक बड़ा गिलास ( मेरी दोपहर की खोराकी का लँच ! ) ,तनिक व्यंग से मुस्कुराईं, " फिर यहाँऽ ऽ , जहाँ कोई आता जाता नहीं ? " इनका मतबल शायद पाठक सँख्या  से  ही  रहा होगा । बेइज़्ज़त कर लो भाई, अब क्या ज़वाब दूँ मैं तुम्हारे सवाल का ? अब थोड़ी थोड़ी ब्लागर बेशर्मी मुझमें भी आती जारही है, पाठकों का अकाल है, तो हुआ करे ! ज़ब भगवान ने ब्लागर पैदा किया है, तो पाठक भी वही देगा , तुमसे मतलब ?  आज़ तो लिख ही लेने दो कि..

सुश्री मायावती, नेहरू गाँधी के बाथरूम में साबुन निहारती मिलीं, किस हाल में मिली होंगी  यह न पूछो ! कभी कभी यह पंडिताइन बहुत तल्ख़ हो जाती हैं,' जूता खाओगे, पागल आदमी !' और यहाँ से टल लीं । मुझको राहुल बेटवा या मायावती बहन से क्या लेना देना, लेकिन यह लोकतंत्र का तीसरा खंबा मायावती की मायावी माया में टेढ़ा हुआ जा रहा है, इसको थोड़ा अपनी औकात भर टेक तो लूँ, तुम जाओ अपना काम करो ।

मुझसे यानि एक आम आदमी से क्या मतलब, कि राहुल अपने घर में इंपीरियल लेदर से नहाते हैं या रेहू मट्टी से ? चलो हटाओ, बात ख़त्म करो, हमको इसी से क्या मतलब कि वह नहाते भी हैं या नहीं ? हुँह, खुशबूदार साबुन बनाम लोकतंत्र ! लोकतंत्र ? मुझे तो लोकतंत्र का मुरब्बा देख , वैसे भी मितली आती है, किंन्तु ... !

सुश्री मायावती का सार्वज़निक बयान कि " यह राजकुमार, दिल्ली लौटकर ख़सबूदार ( मायावती उच्चारण !! ) साबुन  से नहाता है ।" मेरी सहज़ बुद्धि तो यही कहती है, बिना राहुल के बाथरूम तक गये , ई सबुनवा की ख़सबू उनको कहाँ नसीब होय गयी ? अच्छा चलो, कम से कम उहौ तो राहुल से सीख लें कि दिन भर राजनीति के कीचड़ में लोटने के बाद, कउनो मनई खसबू से मन ताज़ा करत है, तो पब्लिकिया का ई सब बतावे से फ़ायदा  ? दलितन का तुमहू पटियाये लिहो, तो वहू कोसिस कर रहें हैं ! दलित कउन अहिं, हम तो आज़ तलक नही जाना । अगर उई इनके खोज मा घरै-घर डोल रहे है, तौ का बेज़ा है ?

माफ़ करना बहिन जी, चुनाव के बूचड़खाने में दलित तो वह खँस्सीं है, वह पाठा है, कि जो मौके पर गिरा ले जाय, उसी की चाँदी ! दोनों लोग बराबर से पत्ती, घास दिखाये रहो । जिसका ज़्यादा सब्ज़ होगा, ई दलित कैटेगरी का वोट तो उधर ही लपकेगा । ई साबुन-तेल तो आप अपने लिये सहेज कर रखो, आगे काम आयेगा । अब आप जानो कि  न जानि काहे..   चुनाव पर्व  के  नहान  के फलादेश पर बज्रपात कईसे हुई गवा .. रामा रामा ग़ज़ब हुई गवा .. चोप्प, मैं कहता कहती हूँ चौप्प ! चुप हो जाओ, चुप्पै से !

लो भाई, चुपाये गये.. अब तो राम का नाम लेना भी गुनाह हो गया । लोग  सँदिग्ध निगाह से  घूरते हैं, कि  अडवाणी  से अब भी सबक  नहीं ले रहे.. राम  का  नाम  बदनाम  करके  ऊहौ  कुँकुँआत  फिर  रहे  हैं,  फिर  तो  कोई  रावणै  इनका  भला  करी..  
करै दो यार,  भलाई  के  नाम  पर  कोई  तो कुछ  करे, भले  ही  वह प्रजापालक रावण होय ! सीताहरण तो अबहूँ होबै करी ..          जस नेता रहियें तौ सीताहरण होबै करी.. चुनविया का हुईहै अगन परिच्छा तौ धमक हुईबे करी…
एक कुँवारी-एक कुँवारा ! बेकार में, काहे को खुल्लमखुल्ला तकरार करती हो ? भले मोस्ट हैंडसम के गालों के गड्ढे में आप डूब उतरा रही हो, लेकिन पब्लिकिया को बख़्स दो । सीधे मतलब की बात पर आओ, हम यानि पब्लिक मदद को हाज़िर हैं ।  अब दुनिया  भर  का  ई साबुन - तौलिया वाला…  टिराँस्फ़र पोस्टिंग की नँगी माया .. काहे ?
सोनिया बुआ, उधर अलग बड़बड़ा रही हैं, " मेरा लउँडा होआ बैडनेम, नैस्सीबन तिरे लीये...ऽ ..ऽ

 

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15 January 2009

चला बाघ मंत्री बनने !

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सुबह सुबह पंडिताइन ने झकझोर मारा, " एई उट्ठो.. एई उठो न, देखो बाघ लखनऊ तक आगया  !
अरे, मैं तो अपना ही किस्सा लेकर बैठ गया, एक आवश्यक औपचारिकता तो पहले पूरी कर लूँ  !

आपसब ब्लागर भाई व भौजाईयों को  समस्त उत्तरायण पर्वों की हार्दिक शुभकामनायें !
जिनको भौजाई कहलाने में आपत्ति हो, कृपया नोट करें.. वह मेरी पोस्ट भले न पढ़ें, पर, उनका एतराज़ किसी भी दशा में दर्ज़ नहीं किया जायेगा !

tiger एई उट्ठो.. एई उठो न, देखो बाघ लखनऊ तक आगया  ! “  क्या यार, धत्तेरे की जय हो !  तुम भी क्या बच्चों की तरह किलकारी मार रही हो ? बाघ-साँप मंगल-जुपिटर के अलावा तुम्हें कुछ और नहीं सूझता ?” दरअसल यह सब इनको बड़ा रोमांचित करता रहा है । सो, मैं गिड़गिड़ाया, “ बाघ अभी 80 किलोमीटर दूर है, अभी सोने दो.. बेकार शोर मत मचाओ !  बाघ है तो मैं क्या करूँ ? “  और,  मैं दुबारा से रज़ाई में कुनमुनाने लग पड़ा  !
प्रसंगवश बता दूँ, कि इन मैडम जी ने शादी करने के लिये तो मुझ गदहे को चुना, पर मोहतरमा की दिलचस्पी हमेशा से बाघ, शेर, हाथी, साँप, ग्रह.. नक्षत्र और भी न जाने क्या क्या में रहती है ? कुल ज़मा किस्सा यह कि आजकल मुझपर रोब गाँठने के सिवा मुझसे शायद ही इनका कोई नाता हो ? तिस पर भी दिसम्बर माह में मेरा कीबोर्ड आतंक और आतंकवादियों से ही जूझने में खरच होता रहा !  वह नाराज़ी अलग से है.. “ एई सुनो, अब आजकल तुम अपने, क्या कहते हैं कि पोस्ट में.. मेरा ज़िक्र तक नहीं करते हो ! अरी भागवान, तू नादान क्या जाने कि तेरा आतंक उन आतंकियों का पसंगा भी नहीं है !  जो भी हो,  तेरा आतंक तो मैं अकेले झेल ही रहा हूँ, डियर ! उधर सारा देश दाँव पर लगा है !
मैंने तो अब तक एक गुनाह तुमसे ब्याह करने का ही किया है और अब मैं उतना मासूम भी न रहा । पर.. पहले इन आतंकियों पर अपना गुस्सा निकाल लेने दे, जो मासूम, बीमार.. बेगुनाहों में फ़र्क़ करने की तमीज़ भी नहीं रखते.. पता नहीं, किन नामाकूल आकाओं ने इनको ट्रेनिंग देकर भेजा है ?  संसद वसंद पर एक बार और हो आते, एक दो खद्दर-कुर्ता टोपी-अचकन टपका भी देते तो,  देश न सही  मैं तो कृत्तज्ञ  होता ही  और, आप लोग भी अगर बाई-चाँस पकड़ में आ भी जाते, तो कसाब जैसा हाल तो न बनता, और  अफ़ज़लवा की तरह दोनों मुल्क की सरकारों को लटकाये रखते, वो अलग से ? tdots5tdots5tdots5tdots5
ईश्श्श, पोस्टिया तो लगता है, फिर आतंकियों की तरफ़ रेंग चली है ! पीछे मुड़.. कीबोर्ड चला.. सामने देख.. नज़र सामने रख, निगाह बाघ पर.. 80 किलोमीटर दूर है, तो क्या हुआ ?  तेरा कीबोर्ड अटलांटा ज़र्मनी तक का रेंज़ रखता है ! बाघ तो मात्र 80 कि.मी. पर  है !
पूरे दिसम्बर माह बड़ा शोर रहा.. दुधवा का एक बाघ नखलऊ की तरफ़ बढ़ रहा है ! जी हाँ, जगप्रसिद्ध लखनऊ अपने घर में नखलऊ ही कहलाता है ! हाँ तो, बाघ नखलऊ की तरफ़ बढ़ रहा है.. रोज सुबह पंडिताइन अख़बार आते ही, चट से उसकी लोकेशन देखतीं, और मुझे झकझोर देतीं । मैं खीझ जाता, " तो मैं क्या करूँ ? " उनका तुर्रम ज़वाब होता, " मैं क्या करूँ.. अरे भाई बाघ है, कोई मामूली चीज नहीं, कुछ लिखो. !." तुम्हें क्या बताऊँ ऎ अनारकली, कि बाघ की टी०आर०पी० इन दहशतगर्दों के सामने दुई कौड़ी की भी नहीं ! एक मौज़ आयी कि समीर भाई इंडिया पधारे हैं.. इनको ही एन-रूट दुधवा तैनात कर दूँ, यहाँ भी बाघ दुबक जाता । अब छोड़िये.. उनकी पावर तो बांधवगढ़ में ही शेष हो गयी.. बाकी जो बचा था वह शायद कमसन समधन ले गयी ! चुँनाचें, आज फिर बाघ महोदय हेडलाइनों में प्रकट होते भये हैं । यह साला दुधवा से सीधे लखनऊ को ही क्यों चल पड़ता है  ?  पर, सोना क्या था ?  इस प्रयास में, बाघ को लेकर मन में किसिम किसिम की धमाचौकड़ी  मचती रही.. वह निट्ठल्लई  भी बताऊँ क्या ?
अरे, बाघ  तो ज़ंगल का राजा है, भला लखनऊ आकर क्या कर लेगा ? भूखा है.. तो उसे वहीं आस पास के गाँवों में हाड़-मांस के पुतले मिल ही जाते ! पर, उन बेचारे पुतलों में सिर्फ़ हाड़ ही हाड़ बचा हो ?  सो,  किबला मांस की तलाश में राजधानी की तरफ़ चल पड़े  हैं ?  लेकिन, यहाँ के रसीले, गठीले, स्वस्थ, दमकते मांसल पुतले तो सरकारी ख़र्चे  के सुरक्षा-कवच से घिरे रहते हैं.. क्या बाघ महाशय  का  इंटेलीज़ेन्स-डिपार्ट भारतीय सुरक्षा-तंत्र से भी गया बीता है, जो उन तक इतनी मामूली सूचना भी न पहुँचायी होगी ? ज़रूर  मामला  कुछ और ही है.. झपकी आ गई.. सामने अभय की मुद्रा में साक्षात बाघ महाशय दिखते भये । नहीं, डर मत, तू मुझे ब्लागर पर कवरेज़ देता रह, मैं अपनी सरकार  में सूचना सलाहकार बना दूँगा ! आईला, बाघ ज्जिज्जी जी, क्षमा करें.. माननीय बाघ जी, सरकार बनायेंगे ? पर.. दिल की बात रही मेरे मन में, कुछ कह न सका कच्छे की सीलन में
lion3 सरकार, आप तो खुदै ज़ंगल के राजा हो, फिर ? माननीय बाघ जी दहाड़ते दहाड़ते एकदमै संभल गये, लहज़ा बदल कर बोले.. “ भई देख डाक्टर, वहाँ भी सभी मौज़ है, लेकिन यह ज़गमगाती बिज़ली बत्ती, ठंडक देने वाली ए,सी. वगैरह वगैरह कहाँ ? अगर हम्मैं ज़ंगल ही पर  राज करना है, तो  तेरे इस बेहतरीन ज़ंगलराज में करेंगे । भला बता तो,  तेरे नखलऊ से अच्छा ज़ंगलराज और कहाँ मिलेगा, रे ? तू वहाँ घूमने जाता है,हमारे लोग यहाँ घूमने आयेंगे !
पर, माननीय महामहिम दुधवा से सीधे.. हा हा हा, अरे मूर्ख दुधवा क्या उल्टा-प्रदेश से अलग है, क्या ? यहाँ अलीगढ़ के वकील, इटावा के मास्टर, मांडा के राजा, बिज़नौर की बहनजी आ सकती हैं, तो मैं क्यों नहीं ? कड़क्ड़कड़ मेरे दिमाग में जैसे हज़ार पावर की बत्ती जल उठी.. अब्भी अबी माननीय ने मांडा के राजा का नाम उचारा था, पकड़ लो  इनको । “ हुज़ूर, आप तो पैदायशी राजा हैं, सत्ता पर आपका  जन्मजात अधिकार होता है… नहीं मेरा मतबल है, आप तो  आलरेडी डिक्लेयर्ड राजा होते हैं, फिर यहाँ हम इंसानों के बीच…मतबल ? ज़ब्त करते हुये भी बाघ जी गुर्रा पड़े,  और अपनी तो..?
निकल पड़ी ? निकल पड़ी न, तुम्हारी गंदी ज़ुबान से चालबाजी की बातें ? बताओ तुम्हारे कने परिवारवाद.. वंशवाद नहीं है, क्या ? ज़ाल तू ज़लाल तू, आई बला को टाल तू.. सो तो है, सरकार ! फिर, मेरे को क्या समझाता है ?  मुझे तुम इंसानों की पोल पट्टी पता है !
पर, हज़ूर वहाँ...  आपके मतबल राजा के जूठन पर सैकड़ो गीदड़-सियार लोमड़ी पलते हैं । उसकी चिन्ता मत कर, यहाँ भी पहले से बहुत पल रहे हैं, हमारे भी उन्हीं में खप जायेंगे.. बोल आगे बोल ?  डर मत, तेरे बहाने  मेरा प्रेस-कांफ़्रेन्स का प्रैक्टिस हो रैया है ।
यार, इनको यहीं से दफ़ा करो, नहीं तो राजनीति के नाम पर तो, यह हमारे दाद बन जायेंगे ! सो, मैं मानवता की रक्षा के लिये सनद्ध होता भया.। यदा यदा हि लोकतंत्रस्य… पर, सरकार यहाँ तो लोकतांत्रिक बवाल चलता है.. भला आप ? अपने लिये सरकार सुनकर वह नरम पड़े । रहने दे, रहने दे.. वह मीठे स्वर में गुर्राये, " मुँह न खुलवा.. लेकिन सिर्फ़ तेरे को बताता हूँ, लोकतांत्रिक-वांत्रिक के लिये मेरे कने  बंदरों की बहुत बड़ी फ़ौज़ है, सभी बूथ कवर कर लेंगे ।"  तो, यह जनशक्ति की धौंस दे रहें हैं  ?
अब तक मेरी घिघ्घी बँध चुकी थी.. बंदरों की फ़ौज़ से घिरे होने की कल्पना मात्र से, आगे के सैकड़ों प्रश्न उड़न-छू हो चुके थे । ज़्यादा बोलना, अब ऎसे भी उचित न था, इनका महामहिम बनना तय था । क्या पता, यह सूचना सलाहकार के भावी पद से अभी से सस्पेन्ड करके कोई जाँच-वाँच बैठा दें ! पर, भईय्यू वह ठहरे ज़ंगल के राजा सो, फ़ौरन मेरा असमंजस भाँप गये, "लोकतंत्र-पोकतंत्र कि चिन्ता मत किया कर ! नखलऊ में सभी लोकतंत्र की दहाड़ मारते हुये आते हैं । फिर, कोई फ़कीर बन जाता है, कोई मुलायम हो जाता है, कोई माया बन जाती है । मैं बाघ बन कर आऊँगा.. तो आख़िर तक बाघ ही रहूँगा .. राज करने के लिये हाथी नहीं बन जाऊँगा, समझे कि नहीं ? मैं मिनमिनाया, " समझ गया सरकार, हमारी क्रांति का प्रभाव हमसे ज़्यादा ज़ानवरों पर है । लो, चलते चलाते महामहिम का मूड बिगड़ गया.. " फिर तुमने ज़ानवरों को इंसानों की बराबरी में रखा ? छिः, तौबा कर ! "
आभार: डा. अनुराग का, जिन्होंने मुझे यह पोस्ट लिखने को टँगे पर चढ़ा दिया था । आफ़कोर्स पंडिताइन का, जिन्होंने आतंकवाद पर अरण्य-रूदन पर झाड़ पिलायी..और सामने रखी घड़ी का, जिसमें तीन नहीं बजे हैं,एवं सोचताइच नहीं, लिखेला ठेलेला के टैग का Nerd
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16 May 2008

जरा सामने तो आओ छलिये .. ..

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अब इन्हें छलिया न कहूँ तो आप ही कोई नाम सुझायें । वैसे तो इनका परिचय  शाह हनुमानुद्दीन के रूप में दिया जा चुका है, पर ये मौके पर हाथ से फिसल जाते हैं नतीज़न इनके इंटरव्यू की तारीख़ दिवानी के मुकदमें की तरह आगे बढ़ती जाती है । ज़ालिम, तुम क्या ब्लागिंग से मेरे उखड़ जाने बाद ही आओगे ? इस माथमंथन की नौबत ही न आती, ग़र मैं इनकी ज़ुस्तज़ू छोड़ किसी हिट होते आदमी को आईना दिखा देता ।smile_embaressed

कल रात की ही बात है, मेरे मित्र मुन्ने उर्फ़ अज़हर खान का एकाएक फोन आया, " अरे यार डाक्टर, अब तुम जम्पिंग ब्लागिंग पर उतर आये हो, आख़िर कौन ज़ल्दी पड़ी है, तुम्हें ? "मैं अचकचा गया, " अमें क्या हो गया मियाँ, और यह जम्पिंग ब्लागिंग क्या बला है ? इसको किस डिक्शनरी से खोद लाये हो, बताओगे ? " वह प्रतिवाद पर उतर आये, "बेट्टा मैं तुमको रेगुलरली वाच कर रहा हूँ, तुम कुछ ज़्यादा ही कूद-फाँद रहे हो ? अरे यार कोई काम का सलीका भी होता होगा कि जब मर्ज़ी जो पकड़ में आ गया, उसीको लेकर ठेल दिया यहाँ ! अब मैं कमेन्ट नहीं कर पाता हूँ तो क्या? " ( मेरा स्वगत कथन - छोड़ो, यह सौजन्य तो अधिकांश ब्लागर बंधु में भी नहीं है, तुम तो महज़ पाठक हो ) मैं-" अब बोलोगे भी मियाँ, क्यों उखड़ रहे हो ? " उनकी आलोचना में मुझे रस आ रहा था, वह भाँप गये । स्वर मद्धिम हुआ, " ट्रैक न छोड़ा करो, एक अच्छी खासी चल रही थीम का कबाड़ा हो जाता है ।"  मसलन ?  मैंने दागा । "अमें मसलन वसलन क्या ? एक दिलचस्प किरदार हनुमानुद्दीन को तुमने अलग टाँग के रख दिया । अब किस भकुये की दिलचस्पी रह गयी होगी कि इन ज़नाब का हश्र क्या हुआ ?"  ( स्वगत- यह किरदार नहीं, बल्कि हक़ीक़त हैं और हस्बे मामूल राँची में कहीं रिक्शा चला रहे होंगे, इनके हश्र को रोने वाला ही कौन है ? ) उधर भाईज़ान चढ़े ही जा रहे  थे, " हिट होने की उतावलनेपन में, आजकल जो भी सामने दिखता है, तुम उसी को पकड़ कर पिल पड़ते हो । ट्रैक न छोड़ो डाक्टर, किसको फ़ुरसत है कि रोज़ रोज़ तुम्हारी एक नयी लंतरानी पढ़े ?smile_nerd

बात में कुछ दम तो है, सब एक दूसरे की पढ़ने में मगन हैं, फ़ुरसत तो शायद  फ़ुरसतिया का पेटेन्ट हुआ चाहता है । ख़ान ठीक कह रहा है, इसको मैं दख़लअंदाज़ी नहीं कहूँगा । मैंने उनको डिसमिस किया, " चलो यार , आज ही निपटाये देते हैं इनको, अब तो ख़ुश ?" और फोन रख के साँस ली Smiley Kiss

पलटा तो देखा कि सामने मेरी ज़िन्दगी का एक शाश्वत दख़लअंदाज़ मौज़ूद है ! पैचान कउन ?  बट नेचुरल पंडिताइन ही हैं, यह इम्यूनिटी उनको ही हासिल है । वह शायद हमारी बातचीत सुन चुकी थीं, सो डिफ़र कर रही थीं । डिफ़र बोले तो डिफ़ेरेंस आफ ओपिनियन ! भले ही एक दो सूत बाँयें दाँयें किसी भी रिलेवेंस को ख़िसका दें, पर डिफ़र करना..असहमत होना, हर ज़ुमला मेरे ख़्याल से के सम्पुट से बोलना इन चोखेरबालियों का जैसे जन्मसिद्ध है ! और यही हुआ, " जब टाइम नहीं है, तो इतना क्यों फैलते जारहे हो ? अचपन पचपन का क्या होगा ? कुछतो उस पर डालो, आज । तुम्हीं बता रहे थे कि अभी टेस्ट पोस्ट है, फिर भी 6 विज़िटर आ चुके हैं, अब तक । न हो तो किसी 8-9 साल पुरानी मैगज़ीन से ही कुछ उठा कर पचपन में डाल दो,ऎसे अच्छा नहीं लग रहा । अब इन दाल-रोटी-चावल ब्राँड को इस हवाई दुनिया के दाँव-पेंच क्या बताऊँ कि यह विज़िटर कोई मेरे पंख नहीं, बल्कि टोही-टटोलू हैं । हमारी इंटरनेट की दुनिया में, बहुतेरे ऎसे धूर्त भी हैं, जिनका काम केवल यहाँ वहाँ टटोलना ही हुआ करता है। Chatterbox

तिरिया से हार मानने का सुख व फ़ायदे कुछ अलग ही हैं, सालिड टर्म डिपाज़िट माफ़िक़ । एक दो बार टेन-लव पर गेम छोड़ दो फिर बाकी उम्र चैन से वाकओवर लेते रहो । चलो आज फिर इन्हीं की मान लो, पचपन के बचपन में ही झाँक लो । ख़ान का क्या बिगड़ जायेगा, भाड़ में जाये ।Praying

वैसे मेरा बहुत मन कर रहा है कि आज रात सुश्री मायावटि को लपेटा जाये । समेट लो अमर बाबू आज इन्हीं को, इनको तुम ही समेट पाओगे । ( यदि दूसरे बंधु भी कतार में हैं, तो अपनी दावेदारी पेश करने के लिये  यहाँ चटका लगायें  ) आजकल सुश्री बहुत चहक चहक कर बहक सी  रहीं हैंBatting Eyelashes

सुना करता हूँ कि कोई मोहतरमा क्लियोपेट्रा हुआ करती थीं, जो गधी के दूध से नहाती थीं, उड़ती उड़ती चर्चा उनके सौंदर्य की भी मेरी जानकारी में आयी है । झूठ नहीं बोलूँगा, मैंने तो उन्हें देखा नहीं । जो देखा नहीं तो मान कैसे लूँ, मैं तो आब्ज़ेक्टिव सांइस का छात्र हूँ । जो देखता हूँ, वही मानूँगा । वैसे देख तो माया जी को भी रहा हूँ, सत्तासुख का निखार चेहरे से फ़ोकसिया सर्चलैट मार रहा है । तबियत खुसकैट हो जाती है, चंदा को देख कर । ऎसा नूर बरकरार रहे, बड़े भाग्य से मिलता है । किसी ज़माने में फोटो स्टुडियो वाले पैसा लेकर भी फोटो खींचने में बत्तीस कोने का मुँह बनाते थे ( अपुष्ट सूत्रों से ) वहीं अब कुमारी श्री के फोटो लेने के लिये बड्डे  बड्डे फोटूबाज़ों में  भी धक्कमधुक्का हुआ करती है । कौन कहता है कि ज़माना नहीं बदला ?  या हमारी नज़रों का ही कसूर हो, कहा नहीं जा सकता ! ऎसे में भला हूर भी कोई चीज़ है ?   लगता है मैं  ही बहक गया । I dont know

लेकिन शायद नहीं, अब देखिये इन्होंने हाथी को पसंद किया । तो अब सभी हाथी देख देख ललचाये जा रहे हैं, तृषित दृष्टि से निहार रहे हैं । इशारा मिलते ही हाथी के पाँव के नीचे भी आने को सन्नद्ध !  कुछेक तो नाँवा लेकर टहल रहे हैं, पता नहीं कब सुश्री का मन बदल जाये । ( बाई द वे, यह हाथी भी तो किसी वर्ण में आता ही होगा, कोई सज्जन जानकारी देंगे ? वाईकेपेडिया में तो नहीं है, नाहर साहब ध्यान दें । खैर, वर्ण वगैरह की बात छोड़िये, अलबत्ता पिछड़ा तो नहीं लगता । देखो, कैसे मदांध डोल रहा है । अभी अभी सूचना मिली है कि हाथी क्रीमी लेयर में रखा गया है, मोटे क्रीमी लेयर में ! महावत गुज़र गया तो क्या, हाथी  भी गया गुज़रा नहीं है । ) माफ़ करियेगा, कुछ ज़्यादा विभोर हो रहा हूँ, बात ही ऎसी है ।

सुश्री जी ने अभी हाल में बीते कल परसों नरसों में अपनी सरकार के जन्मदिन पर करोड़ो लुटा डाले । उसी दिन से सुश्री ने इस पोस्ट की सुरसुरी पैदा कर दी । तीन दिन तक तो पंडिताइन ने दबोच कर रखा, " रानी हैं भाई, वह कुछ भी करें ।" घणी खम्मा अन्नदाता, मैं लम्बी साँस लेकर रह गया । पूरे जोर शोर से समारोह मना, पूछा क्या है भाई ?  फल का ठेला वाला सेब सजाते हुये बगल मुँह करके पिच्च से थूक कर बोला," कुच्छौ नहिं, गौरमिंन्टिया हिट्ट होय गई, वही चिल्लाहट मचाये हैं । बाबूजी सेब तौल दें ?" इतना पूछने के एवज़ में 80 रुपिये किलो का सेब, आरे नाहीं ! ज़शन अपने टशन पर है, बन्देमातरम कहना होगा वाले अंछल-कंछल बिरझ गये वरना उस दिन प्रदेश में सबकुछ मुफ़्त में मुहैया किया जाना था ।Chow time!

ज़िन्दे रह कुड़ी, लक्ख लक्ख पद्धाईयाँ । तेरी और तेरे चमचों की उमर हज़ार बरस होवे । हर वर्ष यदि 85-90 करोड़ रूपिये लुटाती रहीं तो हज़ार छोड़, दहाई बरस में ही शहद की नदियाँ बहेंगी और हर खरा खोटा शुद्ध दूध से कुल्ला करते पाया जायेगा । ठीक कैंदा तुस्सी, ज़िन्दे रह पुत्तर !Birthday Cake

मेरे अंदर बैठे सतत आलोचना ने कुलबुला कर आगाह किया, ' फिर बहक रहे हो, डाक्टर । आख़िर उसने लुटाये तो, तुम्हीं पर ही तो लुटाये । तुम थाली में छेद करने वाली बातें बंद करो । ' मैं अपनी आत्मा कुचल कर बैठ गया । लेकिन कितने देर तक कुचल कर रखोगे ?  ज़्यादा कुचलोगे तो हम भी अपनी सरकार बना कर बैठ जायेंगे । मियाँ की जूती और दुनिया का सिर ! पैसा हमारा और ख़ज़ाना खोल दिया आपने, जन्मदिन के नाम पर, कैसे ? भाई, बड़े बड़े अख़बार तो यही कह रहे हैं कि ख़ज़ाना लुटाया । हमीं पर लुटाया और हमारा ही लुटाया, तो ढिंढ़ोरचियों को क्या तक़लीफ़ ?Tongue

मन रे तू काहे न धीर धरे ?  फिर अंदर से एक चिकोटी आयी, खुल के बोलता क्यों नहीं, कि क्या राजकीय कोष किसी ख़ास दिन ही खोले जाने का प्राविधान है ?  हाँ बहना, ज़वाब दो कि चाहे जितनी भी कल्याणकारी योजना हो, किस प्रोटोकाल से एक विशिष्ट मंच से जतलायी गयीं ? पइसा हमारा और राजनीति तुम्हारी, अंगीठी पब्लिकिया की, और  रोटी तुम सेंको ! और घोषणा करने का सबब ? अच्छा काम चुपचाप भी किया जा सकता है ।Thinking

जनता ? उसकी छोड़ो, यहाँ तो मनचले लौंडे भी बूँदी चाटते हुये  गाते जा रहे हैं, " कसमें वादे, आसुवासन सब घोषणा हैं, घोषणा का क्या.... कोई किसी का नहीं राजाआआअनीति में...सब घोषणा है.. घोषणा से चौंधियाना क्याऽ ..ऽ बड़े शरारती हैं यह लड़के ? हँसी ठठ्ठा में भी सच बोल रहें हैं। मेरा मन हो रहा है, पीछे से पुकार कर कहूँ, " अरे लड़कों, यह चौंध नहीं, औंध है । तुम्हरे बप्पा चिरकाल से औंधे पड़े थे, तो औंधे पड़े रहें ! तुम भी जब पहाड़ के नीचे आओगे तो औंधे हो जाओगे । जो कर रहे हो, मन लगा कर करो, बूँदी मिली है..तो बूँदी खाओ ! इन योजनाओं के ब्लूप्रिंट बनने में ही कितना इधर से उधर हो जायेगा, ख़बरदार सूँघने की कोशिश भी न करना । बूँदी मिली है.. .. बूँदी खाओ Dancing

इस बार अंतर्मन चिल्ला पड़ा, " अमें हद्द कर दिया, बहकने की भी कोई लिमिट होती है, नहीं लिखते तो लिखते ही नहीं ! लिखने लगते हो तो बेलगाम हो जाते हो । क्या सफ़ाई दोगे पाठकों को, तुम्हारा हनुमानुद्दीन आज फिर कहाँ रह गया ? हरिभजन छोड़ के डेढ़ घंटे से कपास ओट रहे हो, यूज़लेसली ! " चिल्ला लो भाई, मैंने तो ईमानदारी से जो मन में आया सो लिख दिया । ब्लगियाना इसी को तो कहते हैं, फिर चिल्लाये क्यों ?Lighting

रहा सवाल हनुमानुद्दीन का ?  तो चिल्लाओ उल्लाओ मत भाई, उसको तो रह ही जाना था । बड़े लोगों के बीच, इस आम आदमी को घुसेड़ोगे तो मुँह की खाओगे । आगे कोशिश भी न करना । हनुमानुद्दीन क्यों नहीं मिलेगा ? सामने ज़रूर आयेगा एक दिन ! पोलिंग वाले दिन लोग उसको पकड़ कर बाहर निकाल ही लेंगे , लगे हाथ तुम भी अपना इंटरव्यू ले लेना । उन दिनों उसकी टी०आर०पी० भी हाई रहती है, लोग पैसे देकर तुम्हारा ब्लाग पढ़ेंगे । माफ़ करना अज़हर भाई, आज तो न ख़ुदा ही मिला न विसाले सनम , एक मौका और दो । नमस्कार ! Wave

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04 May 2008

ज़िन्दगी की ' चंगुल ' में कैद या कुछ और ?

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भाई माफ़  करना, अच्छा भला सोने का मूड बन रहा था, कि मति मारी गयी । एक नादान हरकत  और नींद की लक्ज़री से फ़ुरसत ! जाते जाते सोचा कि लाओ चिट्ठाजगत एक बार खंगाल लिया जाय, मेरे चिट्ठा खिंचायी में क्या घालमेल चल रहा है, देखूँ तो ? प्रवेश करते ही डिबिया से टकरा गया, और जैसे उसमें से कोई ज़िन्न निकल आया हो । यह सरबजीत का मामला क्या है भाई, कोई बतायेगा ? सरबजीत की फाँसी फिर टली । समझ नहीं आता कि यह मुश्शर्रफ़ की दरियादिली है, या लोमड़ीगिरी है । इस तरह का टुकड़े टुकड़े एक्सटेंशन, सरबजीत, उसके परिवारजन और हम भारतीयों के लिये  कितना यंत्रणादायक है । क्या सरबजीत को अपनी एक एक साँस ज़िन्दगी की चंगुल में कैद न लगती होगी ?  देश के लिये ज़ाँनिसार करने का ज़ज़्बा लिये एक चलता फिरता मनुष्य, अपने पूरे होशोहवास में यदि पल पल अनिश्चय का जीवन जी रहा हो, तो इसे क्या कहेंगे ? मैं तो इन पलों को, अपना आज का शीर्षक ही कहूँगा ।
              20050923004402701203976587-sarabjit
सदर-ए-ज़म्हूरियत ज़नाब मुश्शर्रफ़ मियाँ एक ब्लैकमेलर सरीखे हरकतें करके क्या साबित कर रहे हैं ? शु़क्र है उनके ईमान का कि वह " हुण इत्थों राजीखुसी हाँ, चिन्ता दी कोई लोड़ नईं,छेत्ती आँवंगे, तुस्सी फिकिर ना करीं " जैसा  फोनालाप सरबजीत के घर वालों से नहीं करवा रहे हैं । किंतु यह तय है कि किसी किसिम का फोनालाप दोनों सरकारों के बीच चल तो रहा है । इंडिया बोले तो भारत जब सोचने का समय माँगता है, तो पाकी ज़ल्लाद फाँसी की रस्सी ढीली कर सुस्ताने लग पड़ते हैं । ज़ाहिर है कि राजनयिक स्तर की सौदेबाजी चल रही है । पर सारा हिन्दोस्ताँ क्यों चुप है ?
यही नाटक कश्मीर सिंह के साथ भी चला था । उनको रात दो बज़े उठा कर रस्सी की मज़बूती परखने वास्ते बोरे में बराबर वज़न का मिट्टी भर कर तौल लिया गया । डाक्टरों ने फाँसी से पहले की औपचारिकता के तहत मुयायना करके उनके ज़िन्दा होने की तस्दीक भी कर दी । चार बजने के इंतज़ार  में सब टहल रहे थे कि ढाई बजे रिहायी के हुक्म का तामील करवाया गया, निश्चय ही आधी रात में पैगंबर के फ़रिश्ते तो न आयें होंगे, रहम की दरख़्वास्त करने, तो ? मुझे आडियो क्लिप अभी  लगानी नहीं आती, बीबीसी हिंदी पर दिये गये  इस इंटरव्यू की क्लिपिंग अवश्य पेश करता ।
प्रणव दादा रहम की भीख माँग कर पहले ही देश को शर्मिन्दा कर चुके हैं, " मैं पाकिस्तान से अपील करता हूँ कि मामले की कानूनी पहलुओं को अलग रखते हुये इंसानियत के आधार पर ही इस बदकिस्मत इंसान के साथ दया दिखायी जाये । " 18 अप्रैल का बयान क्यों ऎसी ज़रूरत आन पड़ी दादा ? क्या महाशक्ति बनने से पहले ही देश को फ़ुस्स कर दोगे । उनकी ज़मीन, उनका कानून ! यदि वह यह कहें कि अफ़ज़ल कुकुर को छोड़ दो, तब ? और यही चल रहा है । इंसानियत का आधार उसको दिखाओ, जो यह फ़ारसी जानता हो । उन्हें हिंदी में याद दिलाओ कि तुमने कभी उनके साथ इंसानियत दिखाने की नादानी की थी । घुटने टेक चुके 93,000 पाकियों को लौटाने की नादानी, अंडमान में एक बंदिस्तान क्यों नहीं बन सकता था ? ये बुज़दिल सही किंतु इतने फ़ौज़ियों से हाथ धोने के बाद उनकी यह ताकत आज न होती कि आप दया की भीख माँगते दिखते । जो जीता वही सिकंदर, फिर भी आप हारे को हरिनाम गा रहे हैं ।
                                                   
                                     180px-Lieutenant_General_Sarabjit_Singh_Dhillon india_flag
मैं तो अपने गुरु पूर्णेन्द्र मिसिर का शठे शाठ्यम समाचरेत से ज़्यादा जानना भी नहीं चाहता । जाइये, आज आपको छोड़ता हूँ, मेरी पंडिताइन के जगने का समय हो रहा है, वरना कल को आप उससे भी दया की भीख माँगते दिखोगे । भाई, आप भी लोग भी जाइये, अपना अपना काम करिये, कोई ख़ास बात नहीं है । और...यह कुछ भी तो नहीं है । नमःस्कार ! अपने तिरंगे पर टूलटिप फिरायें, धन्यवाद
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24 December 2007

हे , डोल्ला रे, डोला रे....डोला...

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तो क्या सतयुग-त्रेता में भी समर्थन से ही सत्ता चला करती थी ?
बात बेसिर- पैर की नहीं है, जनाब . आई एम सीरीयस !
अपने धार्मिक आख्यानों को पढ़ने में अक्सर महाराज इन्द्रदेव के सिंहासन डोलने का संदर्भ वर्णित है, बचपन में दो-तीन चुनाव देखे जरूर थे, लेकिन तो जनता 'तू ही रे...तू ही रे....तेरे बिना कैसे जियुं ' ही कांग्रेस के लिये गाती रहती थी । हां कुछ सिरफिरे अलबत्ता स्वतंत्र पार्टी, प्रजा सोशलिस्ट वगैरह की डफ़ बजाते दिख जाते थे । जब चौधरी साहब की संविद आयी ,तब से यदा-कदा इस प्रसंग पर ठिठक जाता था कि मिलीजुली सरकार तो हमें अधुनातन से ही मिली भयी है और शंका समाधान के प्रस्तुत करते ही मेरे बाबा मेरी अजन्मी बेटी से सम्बन्ध जोड़ कर शुरू हो जाते थे । उनकी निगाह में मेरे जैसा कुलबोरन नास्तिक चिंतक पैदा होने पहले ही मर जाता ,तो उत्तम रहता । वही मेरे एकमात्र सखा थे, उनको नाराज़ करके रहा नहीं जासकता था सो लिहाज़ा चुप रह जाता और माफ़ी मांग लेता ।
अब यह शंका लघु से दीर्घ में परिवर्तित होती दिक्खै तो निट्ठल्ले के पल्ले बांध मन हल्का कर लेने में कोई बुराई नहीं दिखती । इस शंका को सर्वसुलभ करदूं,
कभी तो कोई गुनी इधर को भटकेगा और
कमेंटियाने की तकलीफ़ कर बैठेगा
भला मन में रखे रहने से लाभ भी तो नहीं है ।

अस्तु, मेरा लाख टके का प्रश्न यह है कि जब भी कोई सज्जन पुरुष किंन्ही भी स्वार्थ से तपस्या में लीन होते थे ( निःस्वार्थ तपस्या ! यह क्या होता है ? ). हां तो, वह तपस्या की पराकाष्ठा पर पहुंचने को होते थे कि इन्द्र का सिंहासन डोलने लग पड़ता था ! भाग कर हाई कमान की शरण में उपस्थित हो जाते थे,
मानों कि ब्रह्मा-विष्णु-महेश की तिकड़ी सृष्टि संचालन नहीं अपितु उनके सत्ता के संचालन के निमित्तही हों ! उनका परेशान होना स्वाभाविक ही था । ऎरावत हाथी, चंचला लक्ष्मी, सोने का सिंहासन, राजनर्तकियां और न जाने क्या-क्या ! यह सब छिन जाने का भय किसी को भी हिला देगा । सवाल फिर वहीं घूम कर आजाता है कि आखिर इतने भर से उनका सिंहासन कैसे डोलने लग पड़ता था ? क्या तब भी सरकारें कमजोर हुआ करती थीं ? तप किया भक्त प्रह्लाद ने परेशानी उनको, उभर कर आन्जनेय् आ रहे हैं और यह उनका मुंह तोड़ने को वज्र लिये तैयार ! किसी राक्षस को भोलेनाथ वर देने को सहमत और यहां इन्द्रदेव पर आफ़त ! कहां तक गिनाऊं ? और अभी हाल के अपने अध्ययन में मैंने एक संदर्भ और पाया, ज़नाब इन्द्र महोदय सत्ता के संघर्ष की कुटिल चालों में भी माहिर थे । जरागौर करिये...
'वानरेन्द्रं महेन्द्राभमिन्द्रो वालिनमात्मजम् । सुग्रीवं जनयामास् तपन्स्तपतां ।' यानि देवराज इन्द्र ने वानरराज वालीको पुत्ररूपमें उत्पन्न किया एवं सूर्य ने सुग्रीव को । लो, पहले से ही अपना एक आदमी बैठा दिया ! यह 'डोल्ला रे, डोला रे...डोला' अनायास ही थोड़े लिखने बैठा हूं , संदर्भ और साक्ष्य हैं मेरे पास ! ज़्यादा लिखूंगा तो कोई ऎसे ही नहीं फटकता इधर और मैं एक टिप्पणी को भी तरस जाउंगा, हिट्स तो चला जायेगा , तेल लेने !
वैसे मैं इन्द्रदेव का आभारी भी हूं , मुझे विरोधी घड़े में कतई न समझा जाये । यह सब तो मैंनें अपनी मूढ़ जिज्ञासा रखीं हैं, आप चाहे तो खंडन कर दो । आभारी यूँ कि उन्होंने हमको नित्य स्मरण करने के लिये अनोखी शक्तियों का एक व्यक्तित्व तो दिया ही है !

उनकी खुचड़्पेंच की देन हैं , हमारे हनुमान !
'मत्करोत्सृष्ट्वज्रेण् हनुरस्य् यथा हतः । नाम्ना वै कपिशार्दूलो भविता हनुमानिति ॥'
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यह अपना हिन्दी ब्लागजगत, जहाँ थोड़ा बहुत आपसी विवाद चलता ही है, बुद्धिजीवियों का वैचारिक मतभेद !

शुक्र है कि, सैद्धान्तिक सहमति अविष्कृत हो जाते हैं, और यह ज़्यादा नहीं टिकता, छोड़िये यह सब, आगे बढ़ते रहिये !

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