जो इन्सानों पर गुज़रती है ज़िन्दगी के इन्तिख़ाबों में / पढ़ पाने की कोशिश जो नहीं लिक्खा चँद किताबों में / दर्ज़ हुआ करें अल्फ़ाज़ इन पन्नों पर खौफ़नाक सही / इन शातिर फ़रेब के रवायतों का  बोलबाला सही / आओ, चले चलो जहाँ तक रोशनी मालूम होती है ! चलो, चले चलो जहाँ तक..

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21 July 2008

शिव को कैसे मनाऊँ रे….शिव मानत नाहिं ऽ

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शिव को कैसे मनाऊँ रे शिव मानत नाहिं … शाल दुसाला शिव लेतो नाहीं है, बाघचर्म कहाँ पाऊँ रे शिव मानत नाहीं । मेवा मिठाई शिव भावत नाहीं है, भाँग धतूरा कहाँ पाऊँ रे शिव मानत नाहीं ….आह ! बचपन में सुनी हुई मिथिला-वैशाली के ’नचारी ’ लोकगीत की यह पंक्तियाँ आज भी कान में गूँजा करती हैं । भोले शिव..  औघड़ शिव…  दानी शिव… आशुतोष शिव… क्रोधी  शिव…  महानुरागी शिव… नेपथ्य से श्रीराम की लीलाओं को संचालित करते शिव

हलाहल पान करते शिव.. प्रियतमा विरह से दग्ध तांडव करते शिव.. .. आह ! अनोखे हैं हमारे शिव – आज है श्रावण मास का प्रथम सोमवार..  पंडिताइन का व्रत..  मेरे जैसा औघढ़ पाकर कुपित होती है..  फिर भी क्यों छोड़े अपना शिव ? शिव पर इनका इतराना देखो तो आप भूल ही जाओगे..  जल चढ़ाने को मंदिर को लपकते श्रद्धालु , उत्साह उछाह.. आस्था विश्वास.. वर और वरदान के प्रतीक भोले शिव…  देते पहले हैं, सोचते बाद में शिव !

                                       हमारे शिव भोले शिव -अमर एवं रूबी शिवार्पित 21 जुलाई 2008

         हर हर महादेव शिव शंभु त्रिपुरारीॐ नमः शिवाय

अब ऎसे औघड़दानी को हम क्या चढ़ा सकते हैं, सभी में तो..  शिव मानत नाहीं ! आज एक पोस्ट ही चढ़ा देते हैं, किंवा चिहुँक कर इसी से मान जायें

                                            श्रीरुद्राष्टकम

                          ani_leaf         ॐ        ani_leaf

नमामी शमीशान् निर्वार्णरूप्ं । विभुं व्यापक्ं ब्रह्म् वेद स्वरूप्ं ।

निज्ं निर्गुण्ं निर्विकल्प्ं निरीह्ं । चिदाकाशमाकाशवास् भजेऽह्ं ॥१॥

निराकारमोङ्कारमूल्ं तुरीय्ं । गिराज्ञान् गोतीतमीश्ं गिरीश ।

कराल्ं महाकाल् काल्ं कृपाल्ं । गुणागार स्ंसारपार्ं नतोऽह्ं ॥२॥

तुषाराद्रि स्ंकाशगौर्ं गभीर्ं । मनोभूत् कोटि प्रभाश्री शरीर्ं ।

स्फुरन्मौलि कल्लोलिनी चारूग्ंगा । लसद्भाल् बालेन्दु कण्ठे भुज्ंगा ॥३॥

चलत्कुण्डल्ं भ्रुसुनेत्र्ं विशाल्ं । प्रसन्नानन्ं नीलकण्ठं दयाल्ं ।

मृगाधीश् चर्माम्बर्ं मुण्डमाल्ं । प्रिय्ं श्ंकर्ं सर्वनाथ्ं भजामि ॥४॥

प्रचण्ड्ं प्रकृष्ट्ं प्रगल्भ्ं परेश्ं । अखण्ड्ं अज्ं भानुकोटि प्रकाशम् ।

त्रय्ःशूलनिर्मूलन्ं शुलपाणिं । भजेऽह्ं भवानीपतिं भावगम्य्ं ॥५॥

कलातीत कल्याण कल्पान्तकारी । सदा सज्जनान्ंद् दाता त्रिपुरारि ।

चिदान्ंद - सदोह मोहापहारी।प्रसीद प्रसीद प्रभो मन्मथहारी ॥६॥

न यावद् उमानाथ पादारविन्द । भजतीह लोके परे वा नराणां ।

न तावत्सुख्ं शान्ति सन्ताप नाश्ं । प्रसीद् प्रभो सर्व भूताधिवास्ं ॥७॥

न जानामि योग जप्ं नैव पूजां। नतोऽह्ं सदा सर्वदा श्ंभु तुभ्यं ।

जरा जन्म दुःखौघतातप्य मान्ं।प्रभो पाहि आपन्नमामीश श्ंभो।रुद्राष्टकमिद्ं प्रोक्त्ं विप्रेण् हरतोषये।ये पठन्ति तेषां शम्भुःप्रसीदति ॥८॥

                                                        इति श्री गोस्वामी तुलसीदास कृत्ं श्री रुद्राष्टकं सम्पूर्णम् ॥

सो, मित्रों मेरे पास जो श्रद्धा-सुमन हैं, वह इस पोस्ट के रूप में त्रिपुरांतकारी भोलेनाथ को चढ़ा दिया । आप साक्षी हैं, कैलाशपति आपको सुख-शांति दें ।

इससे आगे

19 July 2008

ब्लागजगत में टिप्पणियों का भविष्य – एक सार्थक पेशकश

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पहले तो यह बता दूँ कि हमारे शिवकुमार मिसिर महा के खखेड़ी जीव हैं, आज सुबह नित्यकर्म से अर्धनिवृत होकर ( दूसरी खेप बकाया कर आया था ) पंडिताइन की सौतन को पकड़ कर बैठ गया । पहले बड़कऊ को देखा..उनकी दिनोंदिन गंभीर से गंभीतम होती जाती पोस्ट पर घिघ्घी बँध गयी, एक स्माइली ठोका और ब्लागस्वामी के रहम-ओ-करम पर छोड़ कर आगे बढ़ा । येल्लो..छोटकऊ तो सो रहे थे । गंगानहान के दिन तो दिखाने भर का पुण्य तो कर लेते..बाद में चित्रगुप्त ताऊ से कह कहा कर उनके खाते में दो-तीन ज़ीरो मैं बढ़वा ही देता । बहुतों से मुलाकात वगैरह हुई । कवि के बाद ब्लागर प्रजाति ही ऎसी है जिससे आने वाली पीढ़ीयाँ पनाह माँगेंगी । उनकी रचनाधर्मिता से नहीं.. बल्कि पेलो और ठेलोधर्मिता *। * से  ! किसी कवि के चिंचिंयाते तरन्नुम से निज़ात पानी हो..एक फ़िकरा भर छोड़ने की देरी होगी..” भागिये भाई साहब, वो ब्लागर आ रहा हैं  ! “ कहाँ है ? हमारे चौराहा-कवि सहम कर अपनी सद्यःउगली हुई आधी कविता कंठ में सटक कर चौकन्ने होते हैं । वो देखिये नुक्कड़ पर टहल रहा है, और लीजिये महाशय-जी यह जा.. वह जा । खड़बड़  खड़बड़ बगल की गली में घुसायमान हो थरथर काँप रहे हैं, आशंकित हैं… कोस रहे हैं, दाँत पीस रहे हैं..,’ छुट्टा हो गये हैं.. कोई भरोसा नहीं आज क्या लिये टहल रहे हों,  पा जायें तो यहीं के यहीं ठेल दें..होरॆ राम होरॆ राम हॊरे कृ..’ जेई देशे बाघेर भय - सेई देशे रात हॊय ( जहाँ बाघ का डर था – वहीं पर रात हो गयी ) अब जय हनुमान ज्ञानगुन सागर की रुँधीं गुहार 33 rpm में, उनके पता नहीं कहाँ से निकल रही है । निकल रही है तो बस समझ लीजिये कि निकल ही पड़ी है, यहीं बात ख़त्तम ! असल बात तो ब्लागर पावर की है, सो देख लें, चवन्नी उछाल के । चवन्नी फ़ुरसतिया  गुरु के पास प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है, संपर्क करें । नहीं, चवन्नी चैप तो रांग नम्बर है, जी । उछालै वाली चवन्नी तो हम सुकुल गुरु को कानपुर छोड़ते वक्त ही दे आये थे ! मुकर जायें तो बात दूसरी है । कलयुग में तो भगवान भी फुसला कर ही सही एकाध पुण्य-कार्य तो करवा ही लेते हैं, फिर बाद में मुकर जाते हैं, बाँयें हाथ से आम चूसते हुये दायें हाथ से बरज देते हैं, ‘चल फूट, फलप्राप्ति की चिंता जिन कर ।’ जा आपस में टिप्पणी लड़ा.. वही तेरा प्रारब्ध है ! खुद तो चूसने को आम पा गये हैं, और… इहाँ फ़क़त टिप्पणियों से बहटिया बहटिया के हम संतों से गवा रहे हैं, “ चलो टिप्पणी लड़ायें ♪ ♪चलो टिप्पणी लड़ायें ♪ ♪चलो टिप्पणी लड़ायें..♪ ♪ सन्नम..♫ ♫ ऊह्हू ﬠ ♪ऊह्हू ﬠ ♪ “ लगे रहिये….जमाये रहिये ….ऊह्हू ﬠ♪ऊह्हू ﬠ♪ एडसेंस तो पीठ पर झाड़ू मार गया.. ऊह्हू ﬠ♪ऊह्हू ﬠ♪ ऽऽ चलो टिप्पणी लड़ायें ♪ ♪चलो टिप्पणी लड़ायें ♪ ♪चलो टिप्पणी लड़ायें..♪ ♪ सन्नम..♫ ♫ ऊह्हू ﬠ ♪ऊह्हू ﬠ ♪
                                                                                mail (2)
                                                        DalmBar
                                                                       मेरी चिरकुट मंडली
तो भाईयों ( अउर उनके सिर पे सवार बहिनों ), कैसी चली है..ये हवा अपुन के ब्लागिंग में..ऽ ♫ऽ ♫♪♪ ,क्या हो गया है ? चिरकुट चिंतन के संक्रमण की ऎसी महामारी फैलती दिख रही है, कि पूछो ही मत ! ब्लागर ने तो अपनी ताकत से सरकारों को हिला दिया है, कुछ तो है.. जो कि, फ़िलिम वाले हिज़ हाइटनेस  भी दुनिया से लुकाय-छिपाय के नहीं बल्कि गुर्राय-गुर्राय के रोज अइसी-तइसी पेले पड़े हैं । ऎसे में देखिये..आजकल अपने ज़िंदादिल शिवकुमार जी किस कदर चिरकुटग्रस्त दिख रहे हैं ।  न्यू-इम्प्रूव्ड के उलट अपनी पोस्ट के शीर्ष में ऊह्हू-चिरकुट काहे चिपका देते हो मित्रवर ? हमारी गौरमिंन्टिया गाहे बगाहे विरोध जताने की परंपरा निभाती है, सो… समझॊ कि हम भी विरोधई जता रहे हैं, अपनी गली से ! आपके टिप्पणी बक्से में आधा घंटे फँसे रहने के बाद, निकल कर हिंयाँ से यानि अपने परदेश से विरोध प्रगट कर रहें हैं । तो जानम समझा करो, बुरा मानोगे तो बाकी लोग हँसेंगे । हँसेंगे.. काहे कि प्रगट ही तो कर रहे हैं… आप रिसीविंग ले लीजिये । किसी को विरोध दिखायी दिया अब तक ? तो मेरा यह चिरकुट विरो…ऽऽध, ईश्श..ऽ उड़ि बाबा ऒरॆ ठाकुर, संगॆ दोषे ग्रामॊ  नष्टॊ  ( সংগে দোষে গ্রামো নষ্ট ) बूझलेन तो दादा ? संगत में तो गाँव तबाह हो जाता है । नाहिं नाहिं ऊशमें गोरमाने का बात नेंईं है, ऊ तो गलती से बोलाः गया था, मूँ से ! अच्छा तो एक काम करते हैं, आप तो मिलीजुली को चलाने का पर्याप्त अनुभव रखते हैं, सो…..पहले बोलिये मानेंगे तो ? सो… भविष्य को देखते हुये, क्यों न एक टिप्पणी बैंक खोली जाये ?
                                                         शिवकुमार-अमर कुमार टिप्पणी बैंक स्थापित 18 जुलाई 2008
शिवकुमार मिश्र-ज्ञानदत्त पाण्डेय का ब्लाग की परंपरा में एक शिव अमर टिप्पणी बैंक खोलने का विचार कैसा है ? यह 3-5 का काम अच्छा चलेगा, यानि तीन ले जाओ...पाँच दे जाओ । लोग ज़रूरत पड़ने पर यदि तीन टिप्पणी उधार हाँ हाँ.. वही वही, लोन लेंगे और बदले में गैर-ब्लागिंग के फ़ालतू टाइम में दो नई टिप्पणी गढ़ के ओरिज़िनल तीन के संग जोड़ कर पाँच बना कर दे जायेंगे । यानि अपनी बैंक की पूँजी में बिना लागत मुनाफ़ा । टिप्पणियों की शुरुआती पूँजी ? हम हैं ना, काहे फिकिर करते हो ? अभी सबसे जमा करा लिया जाय । जमा की हुई पाँच टिप्पणी पर फ़ी पोस्ट दो नई टिप्पणी का ब्याज़ लिया जायेगा । है ना चोखा आइडिया ? धन्यवाद दो कि तुमको पार्टनर बनाने का प्रस्ताव भेज रहा हूँ, वरना तुम्हरे बड़कऊ तो हास्य-व्यंग ( लेबल लगा देने से व्यंग थोड़े बन जाता है, जी ) में घायल होकर वैकल्पिक विधा की खोज में भटक कर हमारे दरवज़्ज़े पर भड़भड़ा कर जा चुके हैं । जल्दी जवाब दो भैय्या, आख़िर हम कब तक लैट्रिन में छुपे बैठे रहेंगे ? उनका कोनो भरोसा नहीं, हिंयईं लैट्रिनवा में घुसि के फोटू अँईंच लें और भोर में छापि दें । तब तक हमार ई पोस्टिओ ससुर गंधा जायेगी । उनकी तो चौंचक हलचल  होय जावेगी, अउर लेकिन अपनी भी तो सोचो, भईय्या । भागि आवो, बोलि देयो, “ अब लौं नसानि – अब न नसइहौं “ ताड़ाताड़ी ( झटपट ) ! हाँय भइय्या ?
                                                      newsflash
                     अमर शिव टिप्पणी बैंक का गूगल चीफ़ द्वारा भव्य उद्घाटन ।
              श्री शिवकुमार भारत स्थित ब्लागर टिप्पणी ब्यूरो के चीफ मनोनीत किये गये
ऎसी सुर्खियाँ आपके कदम चूमेंगी । सच्ची में..लोग टिप्पणी जमा कर जाया करेंगे और हम लोग ऎश करेंगे, ठीक एमवे वालों की तरह, बड़ी सोच का बड़ा जादू तो सुनबै किये होंगे । हमलोग तो माछेर तेले माछ भाजा ( মাছের তেলে মাছ ভাজা ) हमें उसी मछली के तेल से उसी मछली की फ़्राई बनाना है । टिप्पणी जमा करो…कौन सी किस गुट के खाते व स्कीम में रखी जायेगी, यह निर्धारित करो । इतने गुटों के बीच निर्गुटों का भी एक गुट सामने आ रहा है, वह मुश्किल पैदा कर सकता है, कोई वांदा नहीं, इनको देख लिया जायेगा । कन्याभेदी, हृदयभेदी, सिसकारी, हुँकारी कैटेगरी वगैरह की विशेष माँग रहेगी । वाह-वाह , लगे रहिये, जमा गये जी जैसे लुहाती टिप्पणियों पर ब्याज़ दर इसके टर्नओवर के हिसाब से कम भी की जा सकती है । जरा इधर भी घूम जाइये की गुहार लगाने वालों से रिरियाहट सरचार्ज़ लेने पर भी विचार किया जा सकता है । गोहार लगा लगा कर टिप्पणी माँगने वाले भी हैं, उनको अपात्रता की चेतावनी देनी पर सकती है, खैर अपने घर में तो इसको आप मौखिक ही संभाल लेंगे, यह विश्वास है । एक मुफ़्त सुविधा ( शुरुआत में ) बाद में अर्थ का अनर्थ विशेषज्ञ तो आप हो ही, अब तक आये डिपाज़िट की झलक भर दूँगा ( बीमा नहीं है अभी ) , यह जुगाड़ू सुविधा अधिक दिन तक मुफ़्त देना ठीक नहीं, ब्लागर बंधुओं के मुँह जुगाड़ बुरी तरह लग गया है । अच्छा, अब तक आये टिप्पणियों को देख लीजिये , यह कुछ ऎसी है…
                                                       जित देखो तित समीर
©आपकी सोच को नमन है
©एक और संवेदनशील पोस्ट..
©संवेदना का झरना..
©बहुत मार्मिक प्रस्तुति !
©यही जिन्दगी है जी।
©एक विचारणीय आलेख।
©माल की पोस्ट है... साधुवाद :-)
©बहुत खूब सत्य को उकेरती रचना।
©कल्‍पनालोक का यथार्थ बहुत क्रूर है...
©लिखते रहिये, ©Bahut badhiya
©सुंदर प्रस्तुति....बधाई
©Ha ha ha, Nice and fine blog
©बड़ी ही गहरी बात मार दी जी....
©बहुत सुन्दर लिखा है
©just mindbloowingggggggg
©बहत सुन्दर.बहुत बधाई.
©यह लेख सोचने पर मजबूर कर देता है
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©विचारणीय लेख है ....यह तो
©खूबसूरत रचना...हमेशा की तरह.
©अच्छी लगी आपकी रचना
©रचना मस्त है
©बहुत अच्छी रचना
©रचना पसंद आई.
©हमेशा की तरह संवेदना जगाती रचना.
©अजी गजब ढा दिया रचना ने
©सही कह रहे हो
©बहुत कायदे से भाव उकेरे हैं-बेहतरीन
©पोस्ट मार्मिक बन पड़ी है
©अच्छा है, कभी इधर भी घूम जाइये
©बहुत सुन्दर हे इस कविता के भाव
©बात तो ठीक है, पर करें क्या ?
©बहुत अच्छा पोस्ट लिखा है आपने.
©आपकी अभिव्यक्ति बेहद सुंदर है
©बहुत बढिया और सुंदर आलेख !
©वास्तव में बहुत लाजवाब लेख  बधाई |
©दिल को अन्दर तक हिला डाला आपके लेख ने
©खुश कर दिया भाई
©हाहाहा मजा आ गया
मज़ा तो ले गये अल्ली रज़ा, अब सिर्फ़ हम और आप बचे हैं । टिप्पणियों की मारकेटिंग में अपना भविष्य देखिये, प्रभु । आज 3609 चिट्ठे तो धड़ाधड़ महाराज के यहाँ दर्ज़ हैं, मान ही लें कि मात्र 900 ही सक्रिय हैं, तो जुटे लगभग 450 पाठक, पेट भरने भ्रर को लोग 5 टिप्पणी से बहल जाते हैं..तो 450 X 5 = 2250 टिप्पणियों की माँग नित्यप्रति होगी । और…अपने बफ़र स्टाक में तो 500 भी नहीं है, जी । तो चिरकुटई..ऽऽईश्श..वही न, संगॆ दोषे ग्रामॊ  नष्टॊ  ! हाँ, मेरी वाली पंडिताइन अभी अभी एक भूलसुधार कर गयी हैं..पहली वाली लाइन में पंडिताइन की सौतन बोले तो मेरी कम्पू-बेबी..न कि तेरी वाली पंडिताइन ! कृपया आप बंधुगण भी ध्यान दें, गलती सुधार ली गयी है । तो शिवकुमार गुरु, सोचो मत…हिंदी ब्लागिंग का स्वर्णयुग आना ही चाहता है, एकदम से आसमाँ पर घिरी चली आ रही है । देयर इज़ अ बिग एन्ड प्रोसपेरस मार्केट इन टिप्पणीज़ , हरी-अप !
जरा सोचिये, क्या बात होगी… ख़ूब ग़ुज़रेगी, जब बैठेंगे तीन यार, हम तुम और (सोडा-) ब्लागर ! लोग आराम से तहमद का पिछवाड़ा खजुआते हुये, उबासी लेते अल्ल्सुबह आयेंगे, नो टेंशन आफ़ करी करी न करी, दन्न से ये उठाया, वो कापी-पेस्ट । देखा रचना जी पर तो अभिव्यक्ति वाली माकूल रहेगी..खड़बड़ खड़बड़ । नहीं मिल रही है..फोन घुमाया, अरे डाक्टर साहब, अभी तो बिज़ी होंगे, अच्छा बताइये वो अभिव्यक्ति वाली खाली है, क्या ? हाँ हाँ वही, रंजू जी को बहुत पसंद है । अँय, नहीं है..कुश ने अभी लौटायी नहीं, अच्छा रोज़ ब्याज में नई टिप्पणी भेज देता है, लेकिन भाई डाक्टर साहब जरा देखिये इसको ? आप देख नहीं रहें हैं । अरे यहाँ टिप्पणियों की अदला बदली चल रही है..और आप बेख़बर हैं । कल नहीं तो शायद परसों..कुशजी उड़न तश्तरी की ‘ हा हा..हाहाहूती ‘वाली वह चेंप रहे थे, और ई उड़नतश्तरिया न, भाई का बतायें सीनियर होगये हैं , अउर ई सब काम करते हैं । भाई रोकिये इसको आप लोग, GB की मीटिंग में बवाल कर दूँगा हम । आखिर कोनो ईहाँ वोट-बैंक बनाने का पिलेट्फारम तो नहीं है, नू ? नाहिं नाहिं हमारा ऊ सब मानी मतलब नहिं था , मिसकोट मत करिये हमको । हमारा ग्रुपवा जानते तो अईसे बोलबे नहिं करते आप ! अब आप बताइये साहब…क्या आप भी बोलेंगे या कि बोलतिये बंद हो गयी है ? चलिये होता ई सब, लेकिन पूरा पढ़ें हैं कि ऎसे ही आगे बढ़ें हैं ? हम भी चलता हूँ शीव-भाई, नमस्कार !
सूचना : यह आलेख सद्यःप्रकाशित ‘ अमर कुमार के पत्र शिवकुमार के नाम ® ’ से साभार ली गयी है । © हलचल प्रकाशन, प्रयाग- 2008
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05 July 2008

इसका शीर्षक क्या हो सकता है , ?

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हेरा-फेरी ठोंकि के एकु पोस्टिया तौ लिया बनाय, पाठक आपहू बाँचि कै शीर्षक दियो बताय । दो दिन से वाकई निट्ठल्ले से माहौल से दो-चार हो रहा हूँ, वज़ह—  अनवरत वर्षा ! बादल देख कर किसका मनमयूर न नाचता होगा, केवल हाइड्रोफोबिया का मरीज़ एक अपवाद है । लेकिन जब नाच नाच कर मनमयूर थक जाये, और भीगे पंख सुखाने को कोई ठौर न मिल न रहा हो, तो मनमयूर का सारा उल्लास हवा हो जाता है । दूसरे अपवाद फ़ुरसतिया गुरु दिख रहे हैं । बरसात पर बड़ी मस्त काव्य-पोस्ट ठोकी है । लेकिन हमारे जैसे दिहाड़ी पर मज़ूरी करने वाले से पूछो, महीने का पहला हफ़्ता…, पाँच – छः जन की सैलरी ( चलो, वेतन ही सही, आगे बढ़ें ? ) निकालनी है, ऎसे में मरीज़ों का आनाजाना ठप्प है, सो अलग ….

कल दोपहर को क्लिनिक से लौटते हुये ऊबा हुआ सा लौट रहा था, पेट्रोल की पोज़ीशन देखने की हिम्मत जुटाते जुटाते फिर टाल ही गया । आज छुट्टी है, कल रात से लगातार झिर्र-झिर्र लगी है । आज सुबह बरसात का मज़ा लेने के शगुन करने भर को दूर हाई-वे पर यादव के होटल तक जा उसकी प्रसिद्ध पकौड़ी खाने निकल गया । लौटने में पेट्रोल-मीटर की सूई पर निगाह गयी और यादवजी की पकौड़ी गले में आकर जैसे अटकने लगी ।

तेल अगर ऎसे ही हमारा तेल निकालता रहेगा.. तो कैसे चलेगा ?  शायद ऎसे ्तेरी दुनिया से दूर - अमर

ाखिर काम आ रही हार्स-पावर-अमर  रजिस्ट्रेसन करवाया है भाई - अमर  एक सवारी - अमर     

आख़िर फ़िज़िक्स ( भौतिकी ) में पढ़ी हुई  हार्स-पावर की महिमा दिखने लगी । घोड़े जी को लोग भुला बैठे, अब बुला रहे हैं । कुछ तो है.. जो कि ! वैज्ञानिक लोग बैलशक्ति, भैंसशक्ति या गदहाशक्ति को एक किनारे कर अश्व-शक्ति पर टिक गये । अब देखो, घोड़ा होता तो पेट्रोल की ज़रूरत ही कहाँ पड़ती ? अधिक से अधिक हर जगह पर घास-डिपो ही तो होते, घास की खपत इतनी बढ़ जाती कि हमारे लिये चरने को घास ही न बचती । घोड़े की सवारी की सवारी और लीद से बायोगैस बना कर रसोई गैस सिलिंडर के लिये लाइन न लगाना पड़ता । सो…मित्रों, अश्वम शरणम गच्छामि ॥

 ्पंछी बनूँ उड़ता फिरूँ - अमर निट्ठल्ला एक्सप्रेस - अमर डैशबोर्ड मेरी गाड़ी का - अमर

       चलो ऎसे ही उड़ो - अमर हवा में उड़ता जाये - अमर एक विकल्प यह भी - अमरकुमार  

 

                                         < इस तस्वीर > अरे दीदी, बाबू अम्मा ने मना किया था कि बेचारे कार वालों से पैसा मत माँगना-पहले ही परेशान हैं तुम भी न नोचों जाइये अंकल आपको छोड़ दिया  - अमर <पर क्लिक करें >

अब देखिये जरा, इस लड़की बेचारी को याद दिलाया जा रहा है कि गाड़ी वालों से पैसा क्यों माँग रही हो ? बेचारे कार वाले खुद ही मँगते हो रहे हैं ! तेल बेचने वालों की इतनी क़दर बढ़ गयी है, कि फ़ारसी पढ़ना भी अब कोई ज़रूरी न रह गया । कोई जन इ्नका विकल्प दोपहिया  को न बताने लगना ।

दोपहिया वालों को भी तो अब यह रास्ता अख़्तियार करना पड़ेगा…

                                                                mail-1 (2)

अब आप भी जाकर प्रैक्टिस करो, आगे काम आयेगा । और मुझे भी चलने दो…यह निट्ठल्ला चिंतन तो इस समय जैसे दिमाग उड़ाये दे रहा है ।  बाहर बारिश भी रुक गयी है, देखूँ जरा शहर में अमन-चैन है तो ? यदि इंन्दौर में नहीं रहते तो..आप भी अपने शहर का हाल लिख भेजना ।

 चलो इस पर स्यापा करने को ज़िन्दगी पड़ी है, अभी तो एक शीर्षक सुझाओ

 

 

 

 

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02 July 2008

आओ , आज जरा डाक्टरों की खबर ली जाये !

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निबन्ध

                                                                                    तुम आगे हम पीछे हम आगे तुम पीछे -अमर 1.7.8

शीर्षक – डाक्टर दिवस

प्रस्तावना :- हमारा भारत एक महान देश है । भारत एक निराश कृषकप्रधान देश भी है । भारतवर्ष को एक दिवस-प्रधान देश भी कहा जा सकता है । हमारे देश में समारोहों की बहुतायत है । भारतवर्ष में नित नये नये दिवस और समारोह मनते देखे जा सकते हैं । उदाहरण के लिये:- स्वतंत्रता दिवस, गणतंत्र दिवस, बाल दिवस, शिक्षक दिवस, हिंदी दिवस, सैनिक दिवस, यह दिवस-वह दिवस  इत्यादि । इसी प्रकार भारतवर्ष में हर वर्ष एक जुलाई को डाक्टर-दिवस भी मनाया जाता है । यह दिन डाक्टरों के आदर्शों और नैतिकता के जागरूकता दिवस के रूप में भी जाना जाता है

विषय-वस्तु :- हर वर्ष की भाँति इस वर्ष भी एक जुलाई को पूरे भारत में डाक्टर-दिवस जिसको डाक्टर्स-डे भी कहते हैं, मनाया जा रहा है । डाक्टर हमारे समाज के एक आवश्यक अंग हैं । इनके बिना किसी सभ्यता की कल्पना नहीं की जा सकती । इसीलिये एक जुलाई को डाक्टर-दिवस  के रूप में मनाते हैं । एक जुलाई 1882 को हमारे देश के बिहार प्रान्त में स्थित पटना शहर मॆं डाक्टर बिधानचंन्द्र राय का जन्म हुआ था । मध्यमवर्ग के परिवार में जन्मे बिधानचन्द्र ने अपने परिश्रम एवं तीक्ष्णबुद्धि से  मेडिकल के द्वितीय वर्ष से ही छात्रवृत्ति प्राप्त कर अपनी पढ़ाई पूरी करने में सफल रहे ।  डा० राय 1925 में  राष्ट्रपिता गाँधी के सम्पर्क में आये, एवं राजनीति में भी सक्रिय हुये । वह एक सफ़ल डाक्टर, सफल प्राध्यापक, कलकत्ता के लोकप्रिय मेयर, सफल सांसद, जनता के चहेते मुख्यमंत्री  सिद्ध होने के साथ ही अन्त तक एक सफल शल्यचिकित्सक रहे ।

23 जनवरी 1948 को वह पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री चुने गये । भुखमरी, साम्प्रदायिक दंगों, नये ज़िलों के गठन, आबादी की अदला बदली से संकटग्रस्त बंगाल का दायित्व उन्होंने कुशलतापूर्वक निभाया । वह इन्डियन मेडिकल काउंसिल ( IMA ) के संस्थापक सदस्य और  प्रथम राष्ट्रीय-अध्यक्ष भी रहे ।  वह बहुआयामी कुशाग्रता की एक अनोखी मिसाल हैं । भारत के डाक्टर लोग उनको अपना आदर्श एवं पथप्रदर्शक मानते हैं ।

सारांश :- यह हमारे समाज में पाये जाने वाले डाक्टरों की सेवाओं को सम्मान देने का अवसर है । इस दिन हम लोग इन डाक्टरों  के सेवाओं की सराहना में जश्न मनाते हैं । डाक्टर लोग भी समाज से सम्मानित न किये जाने की परवाह किये बिना, आपस में ही लड्डू-पेड़ा वगैरह मिल बाँट कर खाते हैं । कहीं कहीं पर तो भाषण और नाच-गाना भी होता है । एक दूसरे के गले मिलने की रस्म भी पूरी की जाती है । इस दिन गरीबों की सेवा और परस्पर एकता की कसमें खाने का रिवाज़ भी आजकल चल पड़ा है । कसम एक सुपाच्य भारतीय व्यंजन है, और हर तबके में बड़े चाव से उत्साह के साथ खाया जाता है । डाक्टर लोग भी अपनी डाक्टरी की शुरुआत, कसम खाकर ही करते हैं, जैसे सांसद या मंत्री वगैरह ।

उपसंहार :- अधिकांश दिवसों की परंपरा में डाक्टर्स-डे भी रखा जा सकता है । महान भारत के महान युगपुरुष पन्डित जवाहिरलाल नेहरू ने, नवभारत के निर्माण का इतिहास रचने के लिये कुछ दिवसों की परिकल्पना की । इसी क्रम में उनके साथ साथ कुछ अन्य व्यक्तियों के जन्मदिन को दिवसों के रूप में मनाना घोषित किया गया । इस प्रकार यह शिक्षक दिवस, डाक्टर-दिवस इत्यादि अपने आदर्शों को दोहराने, स्मरण करने से अधिक जन्म-समारोहों के रूप में मनाया जाता है । फलस्वरूप यह सभी दिवस इत्यादि जनता के हृदय से अधिक सामान्य ज्ञान की पुस्तकों में अपना स्थान रखते हैं । डाक्टर बी०सी० राय का निधन भी इसी तारीख़ को यानि एक जुलाई 1962 में हुआ था । अतः डाक्टर बी०सी० राय जयंती डाक्टर्स-डे के रूप में एक जुलाई को मनाये जाने का प्राविधान है ।  आओ, हम सब मिल कर उनके आदर्शों को दोहरायें.. और खूब उत्सव मनायें ।

----x----x----x----x--- श्री सरस्वत्याय नमः ---x---x---x---x---

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30 June 2008

आह, नारको रोको... रोको ना... ये नारको

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टाइमिंग के मामले में, मुझे कमज़ोर समझा जाता रहा है , गलत समय पर टप्प से बोल देना । शायद आज फिर यह साबित होने जा रहा है । पिछली बार डा० अमित कांड के समय, मैं एम्स के हड़ताली ( ? ) डाक्टरों के पक्ष में कुछ लिख-विख रहा था... अब डाक्टर तलवार सुर्ख़ियों में हैं, तो नारको टेस्ट पर लिखने को ऊँगलियों में कई दिन से ऎंठन हो रही है । लिखूँ  ?
बड़ा फ़ैशन में है यह नारको, अ हैपेनिंग थिंग । हम भारतीयों की एक विशेषता है, अंधानुकरण ! बहुधा फ़ैशन को केवल एक शब्द ' प्रचलन ' से ही परिभाषित करके फ़ारिग हो लिया जाता है । ठीक है, लेकिन प्रचलन तो प्रचलित होने के बाद ही तो उपजता होगा, यह जैसे मुर्ग़ी और अंडे के अबूझ पहेली सरीखा समीकरण है । बिना दिमाग लगाये, किसी भी अच्छी-बुरी चीज को लपक लेना, अंधानुकरण ही कहलायेगा, शायद ? इतने सारे शायद क्यों ? क्योंकि मैं कोई समाजशास्त्री नहीं हूँ, इसलिये !
नारको आख़िर है क्या ? यह केवल इस अवधारणा पर आधारित है कि एक व्यक्ति यदि कोई झूठ बोलता है तो उसमें  वह अपनी कल्पनाशक्ति से ही ऎसा झूठ गढ़ने में सक्षम हो पाता है । किंतु अर्द्धचेतन अवस्था में, ऎसा संभव नहीं हो पाता ..वह केवल ज्ञात तथ्यों को ही बता पाता है। इसके लिये ट्रुथ सीरम (Truth Serum) का प्रयोग कर उसे इस अवस्था में लाया जाता है ।
                                      नारको कार्टून-अमर ट्रुथ सीरम-कितना ट्रुथफ़ुल बताओ साले बताओ-कि तुमने ही ख़ून किया है-अमर
और, क्या है ट्रुथ सिरम ? यह कम अवधि वाले शल्यचिकित्साओं में प्रयोग किया जाने वाला निःश्चेतक सोडियम पेंटाथाल या ऎमाइटाल सोडियम है, जो कि एक निर्धारित मात्रा में सूई से नसों के ज़रिये दी जाती है । मनुष्य इतना निःस्तेज हो जाता है कि अर्धबेहोशी में पूछे जाने वाले सवालों के मनमाने ज़वाब गढ़ने लायक ही नहीं रहता । क्या जादुई चीज है, यह ट्रुथ सिरम ?
किसने खोजा ट्रुथ सिरम ? सच बतायें, तो आधुनिक विज्ञान के अधिकांश खोजों की तरह यह भी अनायास ही हाथ में आया बटेर है । यह किसी चरणबद्ध अनुसंधान का परिणाम नहीं है । सन 1916, शहर- डेलास, प्रैक्टिशनर डा० राबर्ट अर्नेस्ट हाऒस किसी महिला को दर्द कम करने के प्रयास में स्कोपेलेमाइन दवा से मूर्छित करके प्रसव कराने के लिये जाने जाते थे । एक बार वह इस तरह से कराये गये प्रसव के उपरांत कोई घरेलू वस्तु, संभवतः स्केल खोज रहे थे । उस महिला ने बेहोशी में भी जैसे उनकी परेशानी भाँप ली हो, और उसने उस वस्तु का बिल्कुल सही ठिकाना उसी स्थिति में बता दिया । अब डाक्टर राबर्ट के चौंकने की बारी थी । उन्होंने इस कोटि की दवाओं के इस प्रकार के प्रभाव से चमत्कृत होकर इसे ट्रुथ सिरम नाम दिया, जो अबतक चला आ रहा है । 1920-30 के दशक में कुछ अदालतों ने इसको साक्ष्य के रूप में मान्यता दे तो दी, किंतु एक ही व्यक्ति पर इसके अलग अलग परिणाम देख 1950-51 में वैज्ञानिकों ने स्वयं ही इसे अनुचित करार दिया । दुनिया के अधिकांश विकसित देश इसको आज़मा कर, बहुत पहले ही छोड़ चुके हैं, कारण कि परिणामों में अस्थायित्व का होना,..यानि गैर-भरोसेमंद !
                               नारको रे नारको-अमर नारको शय्या वाह रे-अमर नारको की बानगी-अमर 
 कैसे होता है यह सब ? एक ऎनेस्थिसिया एक्सपर्ट उस व्यक्ति को उसके स्वास्थ्य, वज़न एवं अन्य जाँच रिपोर्टों के आधार पर पेंटाथाल की एक निश्चित मात्रा देकर उसे अर्धमूर्छित अवस्था में ला देता है । अपराध मनोविज्ञान की पृष्ठभूमि का दूसरा एक्सपर्ट उससे सरल किंतु केस से संबन्धित  व दिशाग्रित प्रश्न पूछता, दोहराता रहता है, और उसके उत्तर रिकार्ड होते रहते हैं, विश्लेषण हेतु ।
सही तो है, फिर लफ़ड़ा क्या है ? एक आम हिंदुस्तानी नज़रिये से देखा जाय, तो कोई लफ़ड़ाइच नहीं । राज काज है... , कौन सिर खपाये ? मुझ जैसे अवैतनिक मुल्ले तो ख़्वामख़ाह परेशान रहा करते हैं  ! यदि पढ़ना जारी रखा हो तो लफ़ड़े भी गिनवाऊँ ?
तो गिनिये ...arrow7_e0 एक - यह तो जाँच एज़ेंसियाँ भी मानती हैं कि इसे साक्ष्य के रूप में प्रस्तुत नहीं किया जाता, केवल यह किसी जाँच का हिस्सा भर है ! फिर, इस नाटक की वजह ?  इसके परिणामों पर भरोसा इतना कि साथ में ब्रेन-मैपिंग कर इसकी सत्यता आँकी जाती है ।  arrow7_e0 दो - क्या यह बर्बर तरीका नहीं है ? एक अर्धमूर्छित व्यक्ति के गाल पर लगातार चाँटे पड़ रहे हों, और उससे सुझाने वाले प्रश्न पूछे जा रहे हों । सूखे ओठों से निकलती मुरझायी उदास आवाज़ों में किसी सच्चाई का अन्वेषण किया जा रहा हो ।  असंगत क्या, यह हास्यास्पद भी है !   I dont knowएक पल को कल्पना करें - अमर कुमार का नारको टेस्ट हो रहा है, उसके गाल पर तड़ाक से एक चाँटे के साथ पूछा जाता है, " बताओ, उड़न तश्तरी का इस अपहरण में क्या हाथ है ? " मेरे उस प्रतिरोधहीन अवचेतन से सिर्फ़ इतना ही निकल पाता है कि, " अँ..अँ.. टिप्पणीसम्राट... 71 टिप. टिप्प .. ...अँ अँ..हँ आज 71 टिऽऽ..टिप्पणी... टिप्पा..णि ..जी उड़नटिप्पणी हैं वो ! " आगे फिर एक जोरदार चाँटा, " तुमने कहाँ देखा था इस उड़नतश्तरिया को ? " मेरा ज़वाब, " अँ.. कनाडा के जब्बल्पु... में.. हाँअँ ..कन्नाडा केह.. हँ.. जबलपुर मँय ! " अब माई का लाल एक्सपर्टवा अपना निष्कर्ष निकाल ले, जो निकालना होमैंने तो कोई झूठ नहीं बोला,सच ही कहा । सारे तथ्य तो दे ही दिये । उनके हाथ हाथी की सूँड़ आयी या दुम, यह उनकी किस्मत ! और हो गया ऎलान, जाँच असफ़ल रही..अमर कुमार से सच उगलवाना आसान नहीं ! I dont know   arrow7_e0 तीन - मादक द्रव्य की सहायता से किसी के शरीर को अवश कर अपना मनोवांछित प्राप्त कर लेना अपराध माना गया है.. बलात्कार ! यदि मैं दारू पिला कर, नशे की हालत में डा० अनुराग की सारी ज़ायदाद लिखवा लेता हूँ, तो यह भी एक अपराध ही बनेगा.. धोखाधड़ी ! अब इसी तर्ज़ पर नशे की दवा से किसी के मन को अवश कर अपना सोचा  हुआ सच उगलवाने की चेष्टा अपराध क्यों नहीं ? मेरा तार्किक मन यह तथ्य निगल नहीं पाता । हो सकता है, कि दिनेश जी इस पर कुछ प्रकाश डालें, मेरा तो भाई, सिर घूम रहा है ! आपने सहमतिपत्र पर हस्ताक्षर ले लिये हैं, तो कोई कमाल नहीं किया... भारतीय पुलिस तो हाथी से भी उसकी सूँड़ ऎंठ कर उसका चूहा होना कबूलवा सकती है । arrow7_e0 चार - इस पूरे परिप्रेक्ष्य को देखते हुये, इसे साइकोलोज़िकल थर्ड डिग्री से अलग करके कैसे देखा जाये ? मेरे मूढ़ मन का मनन - मरोड़ तो यही चिल्ला कर कह रहा है, क्यों व कैसे ? arrow7_e0 पाँच - क्या वज़ह है कि सन 2000 से फ़ोरेंसिक-साइंस लैब, बैंगलोर द्वारा फोर इन वन ( 4 in 1 ) का यह किफ़ायती पैकेज़ दिये जाने के बाद से ही नारको टेस्ट .. नारको टेस्ट होने लगा है ? कम  ख़र्च  तो  ठीक  है.. पर बालानँशीं कहाँ है ? तेलगी से तलवार तक हम्मैं तो ना दिक्खी ! arrow7_e0 छः - छ से छोड़िये । छोड़िये  भी ..पोस्टिया  लंबी खिंच रही है...होना जाना , कुछ है नहीं फ़ालतू का टाइमपास । आज बहुत ब्लगिया लिये.. बाकी फिर !
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26 June 2008

अनुशासन ही देश को महान बनाता है ?

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यही तो मैं भी कहूँ, कि दिमाग से कुछ फिसल रहा है ! क्या, क्यों और कैसे ? मुझे आज दोपहर तक स्वयं ही मालूम न था । आज क्लिनिक जाते समय, अचानक वोह मारा इस्टाइल में  बोधित्सव ( ब्लागर वाले नहीं ) ज्ञान कौंधा कि अनुशासन ही देश को महान बनाता है । सत्य वचन, हम तो  भुलाय बैठे थे कि इस मुलुक में अनुशासन नामक चिड़िया  भी हुआ करती है । भला हो इस मानसून का कि हमें इसका याद दिलाय दिया ! अनुशासन ही देश को महान बनाता है, हुँह यह कौन सी नयी बात है ? कुशल बहुतेरे महाशय का तो यह तो पुराना पर-उपदेश है ! 

यह तो भूल ही गया था कि यह मेरे भारत महान का महान राष्ट्रीय नारा है । मानसून की बारिश ने आज याद दिलाया ।  नहीं भाई , आप सबने तो गलत लाइन पर सोचने का जैसे ठेका ले रखा है ? मानसून का जिक्र आते ही आप  नरकपालिका  क्यों पहुँच जाते हैं ? यहाँ मैं म्यूनिसपालिटी की बखिया क्यों उधेरूँगा ? वैसे भी म्यूनिसपालिटी का अनुशासन से क्या लेना देना ? घबराइये नहीं, आज एक छोटी सी अनुशासित पोस्ट लिखूँगा, पूरी पढ़ते जाइयेगा । हाँ, यदि अनुशासन से एलर्ज़ी हो तो अलग बात है । वैसे भी हम हिंदुस्तानियों के पास अनुशासन पर लिखने-कहने को कुछ बचा ही कहाँ है ? खैर, नरकपालिका वालों के लाख मनौती-मिन्नतों के बावज़ूद भी इसबार मानसून झूम कर आ गया । उनकी तक़लीफ़, वो जानें, मेरी तो बला से ।

तो मित्रों, आज दोपहर बरसते हुये पानी में प्रस्थान-ए-क्लिनिक कर रहा था, कि एक जगह रोडसाइड होर्डिंग पर निगाह टिक गयी । उस पर से झरझर बहते पानी ने  चिपके  हुये कोचिंग इंस्टीट्यूटों को धो कर अंदर की कलई उजागर कर दी । होर्डिंग पर जमी हुयी इन्दिरा गाँधी बड़े सलीके से मुस्कुराते हुये थप्पड़ दिखाती, देश को होमवर्क दे रही थीं ' अनुशासन ही देश को महान बनाता है ।'  कार में ब्रेक लगते लगते रह गयी, बाँयें से एक सुज़ुकी फर्रर्र से लहरा कर निकल गयी । पीछे की सीट पर एक लड़का, इस तेज़  रफ़्तार सुज़ुकी पर खड़ा दोनों हाथ आसमान की तरफ़ उठाये हो-हो करता हुआ जा रहा था । मैंनें दाँत पीसे, " कहाँ कहाँ देखें ? इस अनुशासन कुलक्षणी के चक्कर में तो आज एक्सीडेंट ही हो जाता । "  वैसे तो मैं बहुत ही वीर हूँ, लेकिन ईश्वर के बाद सिर्फ़ पंडिताइन और एक्सीडेंट, इन्हीं दो से डरता हूँ । हँसो मत यार, यदि कोई  डाक्टर अपने क्लिनिक में "एक्सीडेंट होगया, रब्बा रब्बा.."  गाते कराहते, लँगड़ाते हुये दाखिल हो, तो आपको कैसा लगेगा, एक घायल सुपरमैन ? कत्तई नहीं न !   यह अनुशासन और नागरिक का  चक्कर  तो चोर सिपाही का खेल है, छोड़िये इसे यहीं ! उनकी तक़लीफ़, वो जानें, मेरी तो बला से ।

' आठवीं फेल गारंटीड हाईस्कूल पास करें ' इन्दिराजी के नाक से लिसड़ता हुआ बरसते पानी में चूने चूने को था । क्या यार, क्या मुलुक है ? लगता है, अफ़सरों को होर्डिंग सफ़ाई का ठेका देने की नहीं सूझी । टेंडर होता, मंज़ूरी दी जाती, सफाई हो गयी की रिपोर्ट लगा कर पेमेंट हो जाता, फिर से नया टेंडर होता, फिर मंज़ूरी .... ! लहरें गिनने का अंतहीन सिलसिला सदैव जारी रहता, चलो देश न सही, देश का अफ़सर और ठेकेदार तो समृद्ध हो रहा होता|फिर एक से अनेक समृद्धों की जमात बढ़ती जाती । आख़िर नदियों से ही तो समुद्र बनता है । यह लोग आगे बढ़ना ही नहीं चाहते, पता नहीं क्यॊं ? यह वही जानें, मेरी तो बला से !

अंतर से मेरा चिल्लाता है, " तब से क्या मेरी बला से.. मेरी बला से अलापे जा रहे हो ? इसी मेरी बला से वाली सोच ने तो तुमको इतनी बलाओं से ढक दिया है । चढ़ा दे कहीं ब्लाग पर, मलाल तो नहीं रहेगा कि ' जनम..उदर-पोषण-उपक्रम...मैथुन..प्रजनन.. .और मृत्यु '  के अलावा भी तुम दुनिया में कहीं नहीं  याद किये जाते । " मैंने हड़क दिया, ' चुप्पबे, इस समय एक शरीफ़  डाक्टर के रोल में हूँ । भले आदमी लोग सिर्फ़ अपने काम से काम  रखा करते  हैं, बस्स ! थोड़ा बहुत यानि ख़ाना हज़म होने भर को देश दुनिया पर चिन्ता कर लेते हैं, यही कम है क्या ?  अब बाकी दुनिया क्या करती है, क्या कर रही है ? यह वो जानें, मेरी तो बला से !

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        सर, क्लिनिक तो पिच्छू को रै गई !  " अच्छा, यह टापिकवा तो लपक ले, चल आज यही टीप दे धाँय से ! " अंतर ने क्षीण प्रतिवाद करके    दूसरी  तरफ़ को करवट ले ली । ठीक तो है, ब्लागर तो खोजत फिरत टपोरी टापिक टिप्पणी ! यहाँ दो मौज़ूद हैं । देखा जायेगा । क्या देखा जायेगा ? देश तो तुम्हारा पहले भी महान था, अब तो बयान भी जारी हो गया कि हम महान हो गये हैं । रोज ही नया बयान जारी होता है, हो रहा है कि 'आगे और.. और... और महान होते जाने की संभावना है । ' फिर अनुशासन पर क्या लिखोगे ?   अनुशासन तो देश को महान बना चुका, अब लकीर पीटने से फायदा ? अनुशासन की ढपली बजाओगे, तो देश के महान होने से गद्दारी करोगे । और अगर अनुशासनहीनता का दामन पकड़ते हो तो अपने यहाँ की  राजनीति  और बेचारे बेरोज़गार राजनीतिज्ञ क्या  घास  खोदेंगे ? अंदर के शरीफ़ आदमी ने चेताया, ' छोड़ो भी, क्या खोदते हैं, क्या खोदेंगे ? ' यह तो वही जानें, मेरी तो बला से !

 

" सर, आप आगे चले जा रहे हैं,"  पिच्छू से मेरा अटेंडेंट बोला, " क्लिनिक तो पीछे रह गयी ।" मैंने झट से अनुशासन पर ब्रेक लगाया, और बैक में ले लिया । लौट लो यार, अपनी मंज़िल तो यहीं तक है !  अच्छा, तो चलें ? ओक्के..बॅ।य !

इन्हें भी पढ़ें;

अथ मनुष्य योनिः

कैसे कैसों को दिया है, मेरी ब्लगिया हिट करा दे ..

 

 

 

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21 June 2008

क्यों .. ... ?

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सुबह से मन कुछ अनमना सा हो रहा है । आज क्लिनिक भी नहीं गया । अभी ब्लागजगत की सैर करके लौटा हूँ, कुछ ख़ास पोस्ट नहीं दिखीं । अब बाकी कल देखा जायेगा..सोच कर सोने आया । प्रयास करने पर नींद और भी आँखमिचौली खेलती है । एफ़०एम० लगा दिया है, कुछेक गाने बज गये, क्या सुना, मुझे स्वयं पता नहीं । दो बजने वाले हैं,  जब गानों में मन गड़ाने का प्रयास किया तो फ़ालतू सवाल ज़वाब होने लग पड़ा.. ..

wildlifephotographer

 

FM. क्यों चलती है पवन
मैं. हवा का दबाव कम होने से                                                                            

FM.क्यों झूमे है गगन
मैं.धरती की अपनी धुरी पर घूमने के कारण
FM.क्यों मचलता है मन
मैं.हृदय की गति और साँस बढ़ जाने के कारण
FM.न तुम जानो ना हम
मैं.अरे भाई अभी सभी कारण बताया तो

FM.क्यों आती है बहार
मैं.मौसम बदलने की वज़ह से
FM.क्यों लुटाता है करार
मैं.दिमागी तनाव से
FM.क्यों होता है प्यार
मैं.विपरीतलिंगी आकर्षण से
FM.ना तुम जानो ना हम
मैं.अरे भाई यह सब वैज्ञानिक बाते हैं , इनमें सिर मत खपाओ

FM.क्यों गुम है हर दिशा
मैं.क्योंकि तुम्हें दिशाभ्रम होगया है
FM.क्यॊ होता है नशा
मैं.ड्रुग्स लेने लगे होगे

FM.क्यों आता है मज़ा
मैं.अरे यार सांइस इसका ज़वाब दे चुका है

FM.ना तुम जानो ना हम
मैं.बड़े वाहियात आदमी हो, यार !
इतनी देर से तुमको बता क्या रहा हूँ, समझ नहीं आता !

मैं रेडियो बंद कर देता हूँ, इस अकारण खिन्नाहट की वज़ह ? मैं स्वयं ही नहीं जानता और इस खुशनुमा गीत का कबाड़ा परोसने टेबल पर आ गया हूँ !

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15 June 2008

काहे भाई , काहे परेसान हो ?

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बुश आजुकाल फिर से बौराये भये हैं, पता नहीं उन पर कौन सी खुज़ली सवार होय गयी है ?  डा० आर्या बतावें तो बता दें, चमड़ी की परख रखते हैं, वरना हम तो सीधी बात जानते हैं कि वह अपने जाते हुये राज का डर इस नवी किसिम  के  ख़ाज़ से छुपा रहे हैं । हमारी किताबें तो इसको कन्वर्ज़न रियेक्शन के नाम से पुकारती है । हुच्च हुच्च कर बता रहे हैं कि देखो दुनिया वालों, जिस भारतवर्ष की आबादी दुई बेर खाती थी और अब उसी की आधी आबादी दुई बेर खाने के जुगाड़ में हलाकान है, उसी नवे खलनायक हिंन्डियाः ( भारत ) के नालायकी से पूरी दुनिया में अनाज का टोटा पड़ा है ।

ओऎ बुश, तू अपनी बगलें खुजा । हमें काहे दिखा रहा है ? हमारे यहाँ का तो बच्चा बच्चा जानता है कि ' जो मज़ा ख़ाज़ में है, वह राज में  नहीं  ! ' इसलिये तुझे माफ़ करते हैं । तू चुपचाप अपना ख़ाज़सुख भोग । ऒऎ अमेरिकन झंखाड़, हम्मैं तो तू मुंडेरी पर बैठा बंदर लाग्गे है । बाँयें हाथ में रोट्टी दाब के अटारी से हम्मैं  घुड़क रहा है । तेरे पीठ की ख़ाज़ तो हमैं जैसे दिक्ख ना रही  ? अच्छा चल भई, मान ही लेते हैं कि ये हिंन्डियाः वाले बहुत दुष्ट हैं, सारा अनाज इकट्ठा करके वा में आग लगा दी , पण तेरे को क्या ?  तेरे यहाँ तो सूअर भी मक्का खा खाके मोटा हो रहा है, फिर तू तो उसको भी काट के खा जावेगा । फिर तेरे को क्या ?  अमेरिकन तो पेट भरने के वास्ते कुछ भी ठूँस लेता है, पर अनाजाश्रित तो हमारी आबादी ठहरी   

   happy_indians

तू काहे परेसान है ? क़ाज़ी के रोल में तो यार, तू फ़्लाप होगया, अब किसने तेरे को मौला बना दिया ?  कौन तेरे से रोट्टी माँगने जा रिया है ?  शायद यही तेरी तक़लीफ़ है ?  बोल तो, भेजूँ ओरिज़िनल हिंन्डियःन चाँदसी वालों को ?  तेरा बवासीर तो अब हमैं तक़लीफ़ देने लग पड़ा है, मान भी जा ऒऎ नासमझ, एक टीके में जड़ से खत्त्म !  नहीं मंज़ूर, तो चुप्प करके बैठ । किसने कहा था, तेरे से चौधरी बनणे को ?  चौधराहट भी तेरे को सूट करती ना दिक्खै । तू तो किसी का नन्हा सा भी ठेंगा देखते ही उछलने लग पड़ता है । अब भई, इतना तो झेल ही लिया कर,  काहे परेसान है ?

नाज़ियों की उलटखोपड़ी के चलते, तेरे को इतनी बेहतरीन खोपड़ियाँ मिल गयीं कि भगोड़ों लुटेरों का बेनाम मुलुक, अमेरिका कहलाने लगा । फिर हमारे हिंन्डियःन दिमागदारों  के तड़के-रेसिपी ने तेरी मार्केट वल्यू  कुछ ज़्यादा ही बढ़ा दी । और अब तेरी भी खोपड़ी नाज़ी तर्ज़ पर नाचती नाचती उलट रही दिक्खै है । चल भई हम  तेरी बकवास  गाँधी बाबा के नाम पर सह लेते हैं । पण एक शर्त है, तू दुनिया के सामने सिर्फ़ एक, बस सिर्फ़ एक पीस कच्ची घानी का ओरिज़िनल अमेरिकन   रक्ख दे ! ईब्ब, इतणा गुमान भी ठीक नहीं, भाई ! ' मतिभ्रम तोर प्रगट मैं जाना '

ऒऎ झंखाड़ कहीं के, खों खों करता दुनिया भर में अपनी गाल बजाता हुआ, अपनी चौधराहट की ऎसी तैसी क्यों करवा रहा है ? हर बार उछल कूद मचा कर फिस्स हो जाता है, भकुये ! अच्छा चल, यही बता दे कि हमारे भुक्खड़ भारत ने तो बिना तेरी मदद और धमकी को ठेंगा दिखा कर तीन तीन ज़ंग जीती है । तेरे पिट्ठुओं को छक कर पानी पिलाया है । अब तू अपनी बता, आज तलक कौन सी ज़ंग तैने जीती है ? वियतनाम से शुरु कर और सिर झुका कर अपनी जीत के निशान ढूँढ़ता हुआ  हम अनाजखोरों की गली तक आकर तो दिखा ! छड्डयार, होगा तू अपने मुँह मियाँमिट्ठू का महाशक्ति ? ताकत मशीनी मक्कारी के तामझाम में नहीं, इंसानों के बाजूओं में और हौसले में होती है, बे ! तेरे सिपाही तो मोर्चे पर भी दिल को बहलाने को लौंडिया माँगते हैं, तेरी आतुर बालायें भी देशसेवा के नाम पर लाल-सफ़ेद-नीली सितारा पट्टी की स्कर्ट उतारने फ़ौरन हाज़िर हो जाती हैं । क्यों मुँह खुलवाता है, निट्ठल्ला बैठा हूँ, तो क्या ? सोचता हूँ कि तेरे रंगरूटों का सारी ताकत यूनिफ़ार्म के पैंटों में ही भरी पड़ी है, बुरा मत मान भई ( बुरा मान भी जायेगा तो के कर लैग्गा ? ) तेरे रंगरूट अपना सारा ज़ौहर तो औरतों, बच्चों और बुड्ढों पर ही तो दिखाते हैं ! डरपोक कहीं का !

मानसून मेरे यहाँ अभी भले न आया हो, लेकिन अमेरिका में साइरन बजने लग पड़ा कि मुंबई के सड़कों के मेनहोल से ज़िन्दा बचकर भाग आओ, छिः ! चूहे का दिल भी इससे जियादा मज़बूत होता होगा । अपनी प्लेट के पुडिंग को छोड़, परायी रूखरी देख देख काहे परेसान है, भाई ?

 

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12 June 2008

मैं किस कबीले से हूँ ?

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पता नहीं मुझे कभी कभी क्या हो जाता है, किसी घटना को लेकर लगता है कि अरे, यह तो मेरे साथ घटित हुआ था, या हो रहा है । अनजानी जगह पर अनायास यह भावना जोर मारने लगती है कि यहाँ तो मैं आ चुका हूँ । जानता हूँ कि यह कोई रोजमर्रा की सामान्य घटना नहीं मानी जायेगी । किन्तु यह पागलपन भी नहीं है । यह चिकित्साजगत की एक सर्वमान्य प्रतिभासिक तथ्यपरता ( Phenomenon ) है । कारण ? अभी तक हम अनुसंधान ही कर रहे हैं कि ये Déjà-Vu क्यों होता है ?

कभी कभी लगता है कि पंडिताइन का चेहरा बहुत दूर होते होते अजनबी सा हो गया है, और मैं इस अजनबी चेहरे से कब  और कैसे मिला था, इसमें गुम हो जाता हूँ । दिमाग पर जोर देते देते सहसा एक झटके से मैं वर्तमान में लौट आता हूँ , सबकुछ झटक कर सहज होने के प्रयास में गुनगुनाने लगता हूँ, ' अज़नबी ..ऽ ऽ तुम जाने पहचाने से लगते होऽ ..ऽ ...ऽऽ

रुकिये भाई, खीझिये मत ! आप इस प्रोब्लेम में कुछ कर नहीं सकते, तो यह आपकी प्रोब्लेम है , किंतु ब्लागस्पाट पर आने को कम से कम इस डाक्टर ने तो आपको नहीं ही कहा था । अब आयें हैं, तो थोड़ा शेयर भी करना ही होगा , ब्लागर स्प्रिट का निषेध चल भी रहा है तो क्या ? मान लीजिये आपको सौजन्यवश यदि टिप्पणी ही करनी पड़ जाये तो, क्या लिखेंगे ?

इधर कुछ दिनों से सुबह सुबह अख़बारों  पर सरसरी निगाह मारने मात्र से मुझको लगने लगता है कि मेरा संबन्ध किसी न किसी कबीले से अवश्य है ! ऎसी अनुभूति  Déjà-Vu के सैद्धान्तिक अवधारणा के एकदम उलट है, किंतु यह मेरा सच है ।

अव्वल तो मैं कभी पूरा समाचार नहीं पढ़ता, यहाँ कोई शाश्वत साहित्य तो होता नहीं कि इसपर समय दिया जाये, और दूसरे अल्लसुबह निगेटिव किसिम की सुर्खियों से दिन की शुरुआत करना मुझे रास नहीं आता । स्साला, क्या हो रहा है ... कहते हुये अख़बार को मोड़ बगल में सहेज कर रख देने के शुतुरमुर्ग़ी सोच से मेरा असहमत मौन आहत होता है । क्या करें, भला ?

इन दिनों मैं अपने रूट्स यानि कि जड़ें कबाइली हलकों में तलाश रहा हूँ । अपने ख़ानदान का सज़रा भी टटोल डाला, किंतु ड्राफ्टपेपर पर यह मेरे बाबा स्व० नागेश्वर प्रसाद सिन्हा को लाँघता  हुआ  परबाबा बाबू मनोरथ प्रसाद से उचक कर राय बिलट लाल पर थम जाता है ।  बड़ी मुश्किल है, ब्लागर पर भी आना जाना छूट गया । खैर, लौट कर इसी जहाज़ पर आना पड़ा,  अब आ ही गया हूँ ,तो मेरी  सहायता करें ।  अब श्री बिलट लाल जी को पछाड़ कर मैं पश्चगमन ( Retrograde Journey ) करता हुआ, सुपरफ़ास्ट प्रागैतिहासिक आदिमानव टाइम कैप्सूल से  नानस्टाप द्वापर-त्रेता-सतयुग  छोड़ वहाँ  तक पहुँच भी जाऊँ , तो यह कौन बतायेगा कि, " वह देखो, वह है तुम्हारा छिन्नाछिन्नी लाऊखाऊ पेंचक्कचेंपक  हूओअहोऊ  कबीला ! " सो यह मेरा भ्रम ही था

 ्गु़अज़रा ज़माना - अमर ्सरदार अमर - अमर मेरा कबीला - अमर

भ्रम तोड़ा भी किसने ? कबीरदास नाम के किसी अनपढ़ जुलाहे ने ! पीछे से आवाज़ दी, ' मोको कहाँ ढूँढ़ो रे बंदे... ' तेरा कबीला तो यहीं है, देख तो जरा ।  'पोथी पढ़ पढ़ जग मुआ ' तो डरता क्यूँ है ? अच्छा पोथी मत पढ़, चल अख़बार तो पढ़ेगा ? चाय की चुस्की का मज़ा दुगना कर, अख़बार पढ़ ! परेशान मत हुआ कर, यदा कदा लाली भी देख लिया कर ।  कबीला बाद में देखना ।

   मेरा परिवार - अमरxxx ्काश मैं ऎसा होता - अमरtt

हा विधाता, यह कैसी बारिश करवा रहे हो कि आज अख़बरवै नहीं आया ।  तो क्या ? जाके आज कुछ रिवीज़न ही कर ले ।     धन्य धन्य कबीरा ज़ुलहे , मेरा कबीला तो यहीं बिखरा पड़ा है !

अरे वाह, बरेली ( मेरी वाली नहीं ) में प्रेम करने वाली लड़की घर वालों द्वारा मार डाली गयी और लौंडे को दौड़ा दौड़ा कर पीटा फिर जला डाला गया । बाँदा में तीन ग्रामीणों ने चौथे की रोटी लूट ली । मार लेयो, रोटी तो गयी पेट में । भूख से मरने से अच्छा कि कुछ झापड़ वापड़ खा लिया जाये । हरदोई में लड़की को निर्वस्त्र करके पेड़ से लटका दिया, क्योंकि वह किसी दूसरे से ब्याह रचाना चाहती थी । महोबा में लाठी डंडों से हमला कर गाँव वालों ने पानी लूट लिया । हुँह, अरे पानी है ही लूटने की चीज ! प्यास से कौन मरना चाहता है ? बंगलुरू में खाद माँग रहे कुछ बेवकूफ़ों में एक मारा गया । कोट्टायम में लड़के के लिये ऊलूऊलूलजुलूल ओझा ने दो वर्षीय कन्या की बलि दे दी ।  देवि खुस्स भयीं, अब देवा आवेगा । देवा अगर होनहार निकला तो बड़े होकर फिर किसी देवी को जलावेगा । गाज़ियाबाद में इस साल अबतक 121 बच्चे गायब किये जा चुके हैं । बलात्कार ? यह तो यहाँ मनोरंजन है । बलात्कारी और न्यायाधिकारी (?) दोनों के मौज की चीज ! अपनी या किसी और की सही माँ, बहन, बहू, बेटी, भाँजी, भतीजी, बच्ची, बूढ़ी... बस औरतिया हो , बदसूरत हो तो भी ठीक, खूबसूरत हो तो क्या कहने.. उसे  उठा लो.. इच्छा तृप्त करो और किनारे फेंक दो, ज़िंदा या मुर्दा ! औरतिया तो मरद की ज़रूरत है..तो फिर बवाल काहे का ?

अब तो कोई शक औ ' शुब़हा न रहा कि मेरा वाला कबीला भी यहीं कहीं होगा । क्या ज़रूरत है पुरखों को कूद फाँद कर पीछे भागने की ? सब तो यहीं है । मेरा मन मृग फिर क्यों कबीलाई कस्तूरी की खोज में भाग रहा है ? यहीं तो है कलयुगी कस्तूरी !

धन्य धन्य कबिरा ज़ुलहे, सो मेरा कबीला तो यहीं बिखरा पड़ा है।                                                                             मैं मूरख déjà-Vu का राग अलाप रहा हूँ, बलिहारी  ज़ुलहे आपनो सत्य दियो बताय । फिर भी एक मुश्किल है  कि  मेरा वाला कौन सा है ?  अभी तो, मैं किनारे खड़ा खड़ा लख रहा हूँ कि अपने लोगों का मौन रहने वाला शांतिप्रिय कबीला आख़िर किस खोह में मिल सकता है ?  मेरे कबीले की भी तो कोई पहचान अवश्य होगी । बस वही पहचान  मुझे चाहिये । प्लीज़,  भले मानुष कृपया सहायता करें, मुझे मेरे अपने कबीले से मिला दें  ! या  कहीं..  ..  आप भी तो चक्कर नहीं खा रहे कि ' मैं किस कबीले से हूँ ? '

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यह अपना हिन्दी ब्लागजगत, जहाँ थोड़ा बहुत आपसी विवाद चलता ही है, बुद्धिजीवियों का वैचारिक मतभेद !

शुक्र है कि, सैद्धान्तिक सहमति अविष्कृत हो जाते हैं, और यह ज़्यादा नहीं टिकता, छोड़िये यह सब, आगे बढ़ते रहिये !

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