जो इन्सानों पर गुज़रती है ज़िन्दगी के इन्तिख़ाबों में / पढ़ पाने की कोशिश जो नहीं लिक्खा चँद किताबों में / दर्ज़ हुआ करें अल्फ़ाज़ इन पन्नों पर खौफ़नाक सही / इन शातिर फ़रेब के रवायतों का  बोलबाला सही / आओ, चले चलो जहाँ तक रोशनी मालूम होती है ! चलो, चले चलो जहाँ तक..

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10 October 2008

साहब तनि ई फरमवा भरवा दिजीए

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सुबह सबेरे दरवाज़े पर खड़खड़ … खड़खड़, यह कौन है भाई ? पीछे से अम्मा चिल्लायीं, ‘अरे रुको, पक्का गँवार है का, घंटी नहीं देखाता है ?’ “घंटिया तो देख रहें हैं, माई.. बीजलियो होगा के नहीं, ई नहीं बूझे थे । बाबू साहेब से तनिका काम था, भोरे में भेंटाइये जायेंगे, तब्बे न आयें हैं । बोले थे कि कोनो काम होगा त मदत-ऊदत कर देंगे ।”  यह उसका प्रत्युत्तर था ! अब मैं चैतन्य हुआ, कोई पैसा उधार माँगने तो नहीं आया है ? इस समय राँची में हूँ, और यह आम बात है, सो यही होगा ! मैं किचकिचा कर निकला, देखा हनुमानुद्दीन खड़े हैं, चेहरे से याचना टपक रही है । ‘का है रे ?’ मेरा प्रश्न.. कुच्छौ न सरकार तनि ई फरमवा भरवा देंतीं न, बिहार राज्य  के डेलाइभर के पोस्ट निकलल बा, अब लाइसेन्सैया नईखे त अपलाई करे के बा ।

लाओ देखें, सरसरी तौर पर देख कर ही माथा चकराने को हुआ, अंग्रेज़ी में- था । इसको तुम कइसे भरेगा,रे ? हिन्दी का लेके आओ । ऊहे त संकट है बाबू, हिन्दिया त खतम हो गया सो.. बाबू इहे दिया है । बड़ा मारामारी है, बाबू साहेब । बड़ा मोश्कील में आये हैं । बोला कि कोनो से भरवा लो, लेकिन दसख़त आँगूठा अपना ही रखना । अब फँसे, बच्चा अमर कुमार !

Monkey20

Driving License Form for bihari drivers
Here is for those who would want to apply for driving licence in Bihar-
No offence intended - its the new user friendly form
BIHAR DRIVING LICENSE APPLIKASON PHAROM
NOTE : If you dont know the answers,
please copy from another applikason phorom and submit.
For further instructions, see bottom applikason.
Please do not shoot the person at the applikason kounter.
He will give you the lisence immediately.


Last name: (Yadav/Sinha/Pandey/Mishra/do not know)
First name: (_) ramprasad (_) Lakhan (_) Sivaprasad (_) Jamnaprasad (_) Dont know (Check appropriate box)
Age: (_) Less than zero (_) Zero (_) Greater than zero (_) Don't know
Sex: ____ M _____ F _____ not sure _____ not applicable
Chappal Size: ____ Left ____ Right
Occupation: (_) Farmer (_) Mechanic (_) Pehelwaan (_) House wife (_) Un-employed Spouse's Name: __________________________ Relationship with spouse : (_) Sister (_) Brother (_) Aunt (_) Uncle (_) Cousin (_) Mother (_) Father (_) Son (_) Daughter (_) Pet Number of children living in household: ___
Number that are yours: ___
Mother's Name: _______________________
Father's Name: _______________________ (If not sure, leave blank)
Education: 1 2 3 4 (Circle highest grade completed)                                                                                              If FAIL then give Duplicate Pass Cartifikat
Do you (_)own or (_)rent your home? (Check appropriate box) ___
Total number of vehicles you own ___
Number of vehicles that still crank ___
Number of vehicles in front yard ___
Number of vehicles in back yard ___ Number of vehicles on cement blocks
Firearms you own and where you keep them: ____ truck ____ bedroom ____ bathroom ____ kitchen ____ shed
Do you have a gun rack? (_)Yes (_) No; If no,please explain:
Newspapers/magazines you subscribe to: (_) Champak (_) Indrajal (_) Star and style (_) Blank sheets ___
Number of times you've SHOT any one ___
Number of times you've SHOT another person exactly like you ___ 
Do you bathe? (_) Yes (_) No (_) Not applicable
If yes, how often do you bathe? (_) Weekly (_) Monthly (_) Yearly
Color of teeth: (_) Yellow (_) Brownish-Yellow (_) Brown (_) Black (_) Others -
Give exact color
(call nearest Asian Paints dealer if you don't know the color of your teeth) :______________ (_) Not applicable
How far is your home from a paved road? (_)1 mile (_)2 miles (_)don't know
Your thumb impresson (


If you are copying from another applikason pharom,please do not copy thumb impression also.             Please  provide your own thumb impression.
PLEASE DO NOT USE FINGERS ON YOUR EVERY HANDS. Use thumb on your left hand only.
If you dont have left hand, use your thumb on right hand.
If you do not have right hand, use thumb on left hand.
NOTE : IF YOU DONT HAVE BOTH HANDS, YOU CANNOT DRIVE.
For instructions to fill this applikason pharom, see beginning of applikason phorom


बंधुओं, मैं सही दिमागी हालत में रायबरेली लौटने के मूड में हूँ, सो मैंने उसको टरकाया..”अच्छा एक काम करो, मैं इसको हिन्दी में कर देता हूँ, तुम देख देख कर अपने आप इसको भर लेना ।”  तब त भरिये लेंगे, हाज़ूर । हम बिहान आयेंगे ? हाँ वह तो खुश होगया पर लगता है कि मैं और गहरे फँस गया । इसका हिन्दीकरण तो लगता है, मेरे पुरखे भी न कर पायेंगे।  अपने ब्लागसंसार की याद आयी, हमारे सारथी शास्त्री जी अवश्य ही  इस  भाषादरित्र ( गौर करें, एक नया शब्द  ) की सहायता करेंगे । यदि वह मुकरते हों, तो कृपया यह प्रारूप रतलाम वाया भोपाल भेज सकते हैं । एक गरीब की रोज़ी का सवाल है ! वह बेचारा तो अपना रिक्शा बेच कर 6000. रुपये भी इस मद में एडवांस कर चुका है,कृपया उसकी सहायता करें ।

 

 

इससे आगे

07 October 2008

नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः मीमांसा

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डिस्क्लेमर:  यदि आप लम्बी पोस्ट पढ़ने का धैर्य रखते हों, तभी यह पोस्ट पढ़ें   !  अधूरी पोस्ट पढ़कर इसमें दी जारही महत्वपूर्ण जानकारियों की अवहेलना करके, देवी का कोपभाजन न बनें। इसे तत्वबोधीय पोस्ट समझने का यह मित्रवत आग्रह है ! कृपया अपनी टिप्पणी यहाँ रखे टिप्पणी बक्से में ही डालें । ई-मेल या अन्य इलेक्ट्रानिक माध्यम से प्रेषित टिप्पणियाँ स्वीकार नहीं की जायेंगी। अपने दिमाग की सुरक्षा स्वयं करें ।

वस्तुतः मेरी पिछली पोस्ट पर श्री अनूप जी की टिप्पणी आयी, कि महाराज इस पोस्ट में वर्णित श्लोकों का अर्थ तो दे देते । सतीश बोले कि गागर में सागर.. ! इस प्रकार अपने ही हाथों यह धर्मसंकट उत्पन्न किया, सो प्रायश्चित स्वरूप यह पोस्ट ठेलने का साहस किया गया है । गवारा तो नहीं था, पर जैसा कि होता आया है… इस पोस्ट को ठेलने के सुझाव के पीछे पंडिताइन का हाथ है.. सो यह जन्म जन्मांतर के पाप की कड़ी मात्र है । मेरे ख़्याल से तो हर गृहस्थी में एक अदद सोनिया गाँधी अवश्य होती होंगी ! मूल रूप में 7 अक्टूबर 2007 को लिखे गये पोस्ट का यह संशोधित एवं संवर्धित स्वरूप है । मैं इसको रिठेल कहने को बाध्य भी नहीं हूँ, क्योंकि रिठेलने का मेरा कद नहीं है । बल्कि कोई कद ही नहीं है,…. चिट्ठाकारी का कद से क्या संबन्ध ?  वरिष्ठता का सदैव आदर किया जायेगा और टिप्पणियों की बाढ़ को प्रत्यक्षतः तो सराहा जायेगा  किन्तु परोक्षतः ईर्ष्या की जायेगी, ऎसा मेरा निश्चय है । इसको टिप्पणी की प्रतिटिप्पणी के रूप में भी कृपया न लें, यह मेरी विधा नहीं है । इतनी लम्बी पोस्ट के मायने ? कुछ तो यह लम्बी ही  पैदा हुई थी… बाकी रहा सहा मैंने और खींच दिया । वज़ह ?  वर्तमान हालात व मेरी समझ के समीकरण से, निकट भविष्य में मेरा हृदयपरिवर्तन हुआ ही चाहता है, बस घोषणा ही बाकी है । सो, इस पोस्ट को फ़ुरसतिया घराने में शुमार किये जाने की संभावनायें टटोलना  आरंभ किया जायें । प्रशंसक टिक जायेंगे   और  मुँहदेखी  वाले भग जायेंगे ।


अथ आरंभः या देवि सर्वभूतेषु ब्लागररूपेण संस्थिता lgupdated_e0

यह शीर्षक, क्यों ? आज षष्ठी है....' सप्तमं कालरात्री च महागौरीति अष्टकम', और इस दुर्लभ संधिबेला में , ऎसे पोस्ट  से कहीं अनर्थ तो न हो जाये , कुछ तो माँ से डरो, यह कोई और नहीं, पंडिताइन की भयातुर शंका है…. वाह री अनारकली, कबूतर कैसे उड़ा ?  तो,  ऎसे… नित्यप्रति अनर्थ देख रही हो । इस पावन नवरात्रि की महिमा, आजकल तो घर घर गायी जा रही है, और तुम ? तुम ऎसा करोगे, मैं सोच भी नहीं सकती, छिःह !!  ई जो है न, अपना लेडीज़ लोग !  ऊ काहे मौका-बेमौका अपना टिप्पणी  देता रहता  है ?  अउर.. लिजिऎ न, साथ में मीमांसा.. .. फ़्री  !  कहिन कि रिठेल आज़माओ,  और अब अनर्थ को डेराय रहीं हैं !  उकसा के पिटवाओ.. फिर फूँक फूँक मरहम लगाओ । मेरी पोस्ट तो वैसे  भी पिटती रहती हैं, सो हम काहे डेरायँ ? 
सोच तो मैं भी रहा हूँ ! जो बंदा सन 1968-69 के दौर से ही माँ का आँचल पकड़े हुये हो, श्री दुर्गा सप्तशती पर सन 1980-81  तक अधिकार प्राप्त कर चुका हो (  लोग ऎसा मानते हैं ) , वह अनायास ऎसी पोस्ट क्यों लिखने बैठ गया ? मन को दो दिन समझाने में लगे, ' मत लिखो, भाईलोग  इसको किंवा पब्लिसिटी हथकंडा ही मान लें तो ?  पर ज्ञानू गुरु का हलचलजड़ित पोस्ट देखकर बल मिलता है  कि अपने को व्यक्त कर ही देना चाहिये ।  हरज़ नहीं, जो सामने दिखे.. तड़ाक फोटो खींचो फड़ाक ठेल दो ! पीछे से सुकुल महाराज ( चिट्ठाचर्चा फ़ेम वाले ) भी कान में गूँज रहे थे , लिखो यार , तुम्हार कोऊ का करिहे ! संशय से उबरा तो फिर, यह डर सताने लगा कि कहीं मैं ही माँ की चोखेर बाली ( চোখের বালি - means - आँख की किरकिरी ) ही न बन जाऊँ ?

                                                          

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इतने वर्षों की सेवा साधना के बाद , पिछले दो वर्ष से व्रत-पाठ इत्यादि छोड़े बैठा हूँ । यहाँ तक तो ठीक था, क्योंकि मेरे आस्था-विश्वास में लेशमात्र भी कमी नहीं आयी है, बस केवल कलश स्थापन, भाँति भाँति के नियम विधानों से उपवास एवं ' हों-हों ' करते हुये सप्तशतीपाठ करना छोड़ रखा है । जबकि यही सब नवरात्रि के दिनों का स्टेटस सिम्बल है ! कई वर्षों तक दशमी को तड़के उठ अपने घर की पूजा से तृप्त हो, पूर्णाहुति के लिये 120 कि०मी० कार भगाता हुआ, गोविन्दपुरी, इलाहाबाद पहुँचा करता था । अकेले मैं ही नहीं, बल्कि राजा नहीं फ़कीर के बेटे अजयप्रताप सिंह, तरुण तेजपाल इत्यादि का तहलका भी वहाँ नियमपूर्वक उपस्थित रहा करता था, तिवारी जी के विशेष हवन में । तो, अब क्या मैं असंतुष्ट धड़े में चला गया.. ?  नहीं, कदापि नहीं ! फिर,यह प्रश्नचिह्न क्यों ?
यह प्रश्नचिह्न तो  मैं अपने सम्मुख रख रहा हूँ । वस्तुतः ' देवि के सर्वभूतेषू ' होने पर संशय करने की विद्यता, मेरे पास है ही नहीं, और न तो मैं चार्वाक का चेला ही हूँ । मार्कण्डेय महाराज भी उवाचते रहे हैं, ' भविष्यति न संशय : '   बल्कि इसी सम्पुट के साथ वह ऊँघते श्रोता को जगाते भी रहे हैं, जैसे इस युग में राहत कोष  जैसी घोषणा करके उखड़ती हुई पब्लिक को जगाया जा रहा हो… ऎई उठो, जागो और सुनो… सर्वाबाधाविनिर्मुक्तो धनधान्यसुतान्वितः । मनुष्यो मत्प्रसादेन भविष्यति न संशयः ॥

फिर ?  लफ़ड़ा कहाँ है, संशय क्या है ?  मेरी आहत आत्मा जैसे कचोट रही हो… आस्था में तर्क का स्थान तो निर्दिष्ट भी नहीं है, फिर बवाल क्यों काट रहे हो ?  बिल्कुल वाज़िब बात  बोले हैं, आप ! तो, सुनिये ... जितना अध्याय सुन सकते हों, उतना ही सुनिये, , फिर बोलियेगा !  पूरे नवरात्रि में ऎसा अफ़रातफ़री लोग मचाये रहते हैं कि मेरी भैंस बुद्धि जहाँ भी पानी देखती है, वहीं गोते खाने लगती है, भले ही वह कितना गंदा हो ।

यह एक ख़ास सीज़न है, जब कलंकित माथों पर भी लाल टीके चमचमाने लग पड़ते हैं, इतना लाल.. कि एकबारगी तय कर पाना कठिन होता है कि यह कोई सिद्ध पुरुष है या कोई 11000 वोल्टीय डैंज़र आदमी, जो सीधे माँ के पास से ही महिषासुर का रक्त  उड़ा कर चला आरहा हो । आप इस सकते से उबर गये हों और ख़ुदा न ख़्वास्ता वह महापुरुष आपके परिचित हुये तो वह सार्वभौमिक श्वानपरिचय ( कूकुर पिछाड़ा सुँघायी )  के अंदाज़ में आपको सूँघते हैं, ' सर, आप तो व्रत होंगे ? ' अब यह तो सीधे आपके ठसके पर प्रहार है, या तो आप खिसिया लीज़िये, ' नहीं, थोड़ी तबियत खराब थी, शरबत वरबत पीना पड़ता सो मिसेज़ ने मना कर दिया । ' अब यहाँ एक दूसरे किस्म का सामंजस्य दृष्टिगोचर होता है । आपका मातहत है,या आपके पास कोई फँसी गोट नवरात्रि में ही सुलटा लेने के संकल्प से टीकायमान हो घर से कूच किया है, तो वह चेहरे से कनस्तर भर सहानुभूति ढरकाता हुआ दोनों हाथ आसमान की तरफ़ उठा देता है, ' सब माँ की इच्छा, भला करें माई ' , यदि आपके चेहरे पर फूँक न मार दे तो आप अपने को हतभागी  समझें । वह पैंतरा बदल कर आपका मूड टटोलता है, “चलो साहब प्रोग्राम बनाओ, विंध्यांचल घूम आवा जाय… मयडमों का लेयि लियें” ।

स्थिति एक :

अब आप तय करो कि क्या माना जाय ? अच्छा चलो, मान लेते हैं कि आपमें कुछ VIP  होने का ठसका ठुँसा पड़ा है, यानि की आप अपने आप में तो वेरी इम्पार्टेन्ट परसन हैं, पर अन्य भक्तजनों  के लिये वेरी इन्कन्विनियेन्ट परसन,  फिर भला क्या कहना ? अष्टमी भले नवमी में बदल जाये, VIP जी देवी के गोड़ पकड़े निहोरा कर रहे हैं । अभयदान दो माँ, यह लात मेरे ऊपर न रख देना, कभी ! हर नवरात्र के नवरात्र आपका हिसाब कर दिया करेंगे, मेरा ध्यान रखना माई…

स्थिति दो :


आप फ़ौरन तमक कर, मत चूके चौहान, अपुन को जमा ही लो, आन बिहाफ़ आफ़ होल फ़ेमिली के, अंदाज में कहते हैं, ' नहीं यार, व्रत है । '  , ' हमारे यहाँ पूरा परिवार, बल्कि बच्चे भी व्रत रखते हैं, दसियों साल से ! ' थोड़ा ज़्यादा हो गया, दो कदम पीछे हट लो, गुरु । आप संशोधन पेश करते हैं, ' बशर्ते बच्चा घुटनों के बल न चल रहा हो, हमारी तो कुलदेवी ठहरीं, दद्दू ! ' कह कर माँ की परमानेंन्ट पोस्टिंग अपने यहाँ होने की तस्दीक़ कर ही दीजिये । अगला भगत यदि बगुला भगत हुआ तो स्वयं ही चुप हो जायेगा ।
लेकिन क्यों चुप हो जाये ? भगवान ने जब फाड़ने को मुँह दिया है, तो क्यों चुप हो जाये ? गाल बजाना हमारी राष्ट्रीय अस्मिता है । केन्द्र से आरंभ हो कर, यह महामारी राज्य तक ही नहीं थमती बल्कि अपुन के घर-परिवार तक को संक्रमित किये हुये है

यह विषय, फिर कभी !  क्योंकि मैं भी तो यहाँ गाल ही बजा हूँ । तो ज़नाब, डिफ़ेंस को तैयार रहें । उनकी भेदभरी निग़ाह अभी भी आप पर ही टिकी हुई है, " पूरा कि सिर्फ़ अगला-पिछला ? "  पूरा नवरात्रि स्पेशल बुक करवाये हो कि सिर्फ़ इंज़न औ' गार्ड के डिब्बे से काम चलाय रहे हो ? खैर छोड़ो, अब शुरु होता है... पाँचवी पास वाला सवाल, " एक टाइम खाते होंगे, फलाहारी नमक वाला ? " कलश भी बैठाते हैं कि केवल रात में छान-फूँक कर  इतिश्री कर लेते हैं ? " आप तन जाते हैं,' नहीं भाई, स्साला पंडित आता है हमारे ईहाँ, दुबे..छज़लापुर वाला !' यह आपका बड़प्पन हैं कि आपने स्वीकार तो किया कि ' माताजी ' को रिझाने में आप स्वावलंबी नहीं अपितु छज़लापुर वाली पार्टी को ठेका दिये पड़े हैं । पार्टी  इसलिये कह रहा हूँ,क्योंकि पंडित महाराज की एक पूरी टीम है, सीज़नल मस्टर रोल वाले से लेकर मेट-सुपरवाइज़र लेवल तक के बाम्हन ! बाकी मैनेज़ वह स्वयं ही करते हैं, यजमान के स्टेटस के हिसाब से किसको कहाँ फ़िट करना है, यही उनकी विद्यता है, यानि कि यजमान मैनेजमेन्ट ! फ़कत 700 श्लोक तो यजमानरूपी कोई भी ग्राहक बाँच लेगा।

या देवि सर्वभूतेषू  वृत्तिरूपेण संस्थिता । नमस्तस्यै । नमस्तस्यै । नमस्तस्यै नमो नमः ॥                    
तो पंडित महाराज वृत्तिनुसार ही आचरण कर रहें हैं। चलिये कोई बात नहीं, इसमें कोई त्रुटि नहीं है, जग की रीत है , लेकिन सरजी, जरा ख़ुद से, स्वयं, परसनली देख लीजियेगा कि कलश सही दिशा में स्थापित करवाया है कि नहीं ? हम भी कुछ तो जानते ही हैं, माताजी की दया से..,एक संक्षिप्त चुप्पी ( रहस्य का आवरण उत्पन्न करने के लिये वार्तालाप का अनिवार्य तत्व ! )  इसीलिये अपना समझ कर कह रहे हैं। अउर झेलौ, ई लेयो एकठईं स्लो पेस बाल ! अब आपका भविष्यति न संशयः तिरोहित हो जाता है, आफ़िस में  झूठा बहाना मार कर, या नज़रें बचा कर आप फूट लेते हैं । स्वगृहम गच्छामि, मन दोहराता है, ..कि हे वत्स धर्म के किया गया अधर्म निन्दनीय नहीं होता ! 

और एक नयी दुविधा के साथ आप घर में प्रविष्ट होते हैं, पहले दिसा कन्फ़र्म कर लो यार, सब साले प्रुफ़ेसनल होय गये हैं,  वर मरे या कन्या इनको द्क्षिना से मतलब, यही घोर कलयुग है । इससे पहले कि, अपना संशय आप श्रीमती जी को पकड़ायें, वह स्वयं ही लपक पड़ती हैं । पल भर आपको निरख कर बिलख पड़ती हैं," अब कुछ करो, गुड्डी के पापा, हमरी तो तपिस्या भंग हुई जा रही है । अबकी बार एकठईं बेटवा का माने हुये हैं, अउर देखो ई परेसानी खड़ी होय गई । सोनम की मम्मी आयीं रहीं,  बताइन कि अबकी मोहल्ले में पाँचें-छेः कन्या रह गयीं हैं। एक्कै दिन बचा है, अउर उई दुष्टा अब जाके बताइन, बताओ हम्म का करें ? हमतो नौ कन्या खिलावे का माने बइठे हैं, जनात है, मईया हमार परिच्छा लेय रहीं हैं। कुछौ करो नाहिं तो वंश नाश हुई जायी !


या देवि सर्वभूतेषू क्षुधारूपेण संस्थिता । नमस्तस्यै । नमस्तस्यै । नमस्तस्यै नमो नमः ॥                   
आप क्या करेंगे, भला ? एक दिन में बच्चा तो बना नहीं सकते, वह भी बिटिया ?  सो खीझ जाते हैं, दोस्तों को फोन वोन करके देखते हैं, कुछ व्यवस्था बनानी पड़ेगी । लेकिन साले मज़ाक उड़ायेंगे, किसको दोस्त समझें इस कलयुग में । साले मौज़ लेंगे कि दुई बिटिया तो तुम अपनी निजी मेहरिया की गिरवा चुके हो, अउर अब बाहर बिटिया हेर रहे हो ?   ससुरी में कुछ देवित्व बचा है, शायद… तभी तो गुड्डी की मम्मी ने मन पढ़ लिया, रास्ता दिखाया, "उपाध्याय से बात करो, ऊ तो नया आया है और अभी ई सब नहीं जानता होगा । उसके तो दुई बिटिया हैं, चलो मईय्या रस्ता निकाल दिहिन ।" अपार संतोष से ठुमक कर वह पलट पड़ती हैं । आप इस बेला एकदम कनफ़्यूज़ियाये हैं, " अरे, दो कहाँ है ? एक ही तो है, दो-तीन साल की लड़की,और दूसरी?" गुड्डी की मम्मी तो अब पूरे मौज़ में हैं, समिस्या हल होती जान मस्त हुई जाती हैं । "भूल गये, वह बड़ी वाली भी तो है, छैः कि सात वाली, अरे जिसका डांस जेसी मेले में हुआ था ।" और वह लहकते हुये घूम कर, अपनी स्थूल कमर को मटकाने का प्रयास कर, याद दिलाने की चेष्टा करती हैं,"छोटी सी उमर में लग गया रोग.., लग गया रोऽग..म्मईं मर जाऊँगी...ओऽ ओऽ म्मईं मर जाऊँगी, …..  ले आओ उसी को, हलुआ पूरी खिलायेंगे तो लगे हाथ एक्ठो नाच वाच भी देख लेंगे । एक एक कटोरी भी तो देय रहें हैं, सबको "


या देवि सर्वभूतेषू भ्रान्तिरूपेण संस्थिता । नमस्तस्यै । नमस्तस्यै । नमस्तस्यै नमो नमः ॥                  
अरे नहीं, फोन वोन करना ठीक नहीं, इस समय सीज़न है, साला लड़कियों की शार्टेज़ चल रही है, फोन पर टरका न दे। आमने सामने बात करना ठीक रहेगा, अभी आता हूँ " कह कर आप कलशा-वलशा भूल फ़ौरन पलट पड़ते हैं ।  " इत्ती धूप में ? कल चले जाना। या छोड़ो आज रात में चले जाना, आफ़िस से निकल आये हो, तो थोड़ा आराम कर लो…. व्रत किया है " ससुरी अपनी चलायेगी ज़रूर,.. .. कुलक्षनी ! पर आप ज़ब़्त करके बोलने हैं, ' ठीक है, पक्खफेना जी के यहाँ भी हो लेंगे, रास्ते में ही पड़ेंगे.. आज देवी जागरण रक्खा है ।' ," देवी जागरण… कियूँ  ?"  उनसे  स्कूप आफ़ द नौरात्रों छूटा जा रहा है, गुड्डी की मम्मी के स्वर से अधीरता चिंघाड़े मार रही है । यह कमबख़्त टोकेगी ज़रूर, लौट कर तो इसी घर में आना है, पंगा टाल जाओ,  देवीचरन !  पिछली नवरात्रि में ही तो छोटी सी बात का इतना बतंगड़ हो गया था, कि इनको पीटना पड़ गया, तब जाकर इनकी तरफ़ से सीज़फ़ायर हुआ था । हे माँ, इस बार ऎसा न हो, यह हिडिम्बा पिटने का कोई मौका न खड़ा कर दे ।

हमरी पोस्ट वाटर आफ़ इंडिया हुई रही है, का ? चलो चलो, आगे पढ़ो, बस खतमै समझॊ


या देवि सर्वभूतेषू बुद्धिरूपेण संस्थिता । नमस्तस्यै । नमस्तस्यै । नमस्तस्यै नमो नमः ॥                      
बुद्धि से काम लो, देवीचरन । काल बताये सो आज बताय, आज बताय सो अब्ब, नहीं तो बहुरिया पल में प्रलय  दिखाय देहै ! आप दरवाजे पर ही ठिठक कर खुलासा करते हैं, 'अरे, वो माया वाला केस नहीं था, उनकी मँझली बहू ?  मारत पीटत रहें सो केस करवा दिहिस था, अपने मयके में ? बाप पेशकार हैं सो पइसा कउड़ी तो खरच नहीं होना था । पक्खफेनवा जमानत तो पाय गये लेकिन तीन साल से बँधें बँधें घूमत रहे, वही मईय्या से माने रहें सो माँ की कृपा होय गयी, अचानक आउट आफ़ कोर्ट सेटल हुई गया, मामला ।  बेचारे सोफ़ै अल्मारी लौटा के संतोष कई ले गये । बिन्धाचल-उचल माने रहें, बदले में जागरण करवाय रहे हैं । मईय्या ने नहीं बुलाया होगा ।


या देवि सर्वभूतेषू विष्णुमायेति शब्दिता । नमस्तस्यै । नमस्तस्यै । नमस्तस्यै नमो नमः ॥                             
उपाध्याय के मकान से चार मकान पहले ही पक्खफेनाजी विराजते हैं, पहले वहीं चलें । उपाध्ययवा तो जूनियर है, उसका बाप भी दरवाज़ा खोलेगा या फिर माँ ने चाहा तो यहीं मिल जायेगा, पहले यहीं चलें । जागरण पूरे शबाब पर है, कानपुर की पार्टी है,  लेकिन सस्ते में पाय गये । लौंडे मस्त हो कर हाथ पैर फेंकते हुये, पसीने पसीने हुये जा रहे हैं । स्टेज़ से उनको लगातार ललकारा जा रहा है, 'ऊँ ऊँ ऊँ..दरँस दिख्ला जा दरँस दिख्ला जा, एक्क बार आज्जा आज्जा.. आज्जा आज्जा ऽ माताऽ ..ऽ ..ऽ , ओ मात्ता मात्ता मात्ता मात्ता.. मात्ताऽ ..ऽ ..ऽ मात्ता मात्ता मात्ता मात्ता.. मात्ताऽ ..ऽ ..ऽ कूल्हे टकराये जा रहे हैं, वह अपने भक्ति  को उछालने की प्रतियोगिता में  हारना नहीं चाहते !

या देवि सर्वभूतेषू  भी मगन हैं, क्या ? जरा देखूँ । देखा तो, हमारी माँ  हैलोज़न से आकर्षित हुये भुनगे पतंगों से आच्छादित हैं, कोई भी हाथ खाली नहीं कि वह कुछ प्रतिरोध भी  कर सकें ।  मैं उन पर टकटकी लगाये स्तुति कर रहा था , श्रीदुर्गेस्मृताहरषि  भीतिमशेषजन्तोः स्वस्थैः स्मृता मतिमतीव शुभांददासि .. सहसा लगा कि इस माँ भी इसी आर्केस्ट्रा के साथ विलाप कर उठेंगी,  इन्हीं लोगों ने..इन्हीं लोगों ने ले लीना सर्वभूतेषु मेराऽ
यदि आप मेरी बकवास पर अब तक टिके हुयें हैं ,तो धन्यवाद ! यह थी मेरे कर्मकांडी आडंबर से विमुख होने की कथा  देवि की महत्ता का बखान या इस महत्ता का आदर, दोनों में आप किसको कितना महत्व देते हैं, यह मेरा विषय नहीं है

लगे रहें, जमाये रहें... माँ भला करेंगी । पर घर में जरा अपनी बूढ़ी अम्मा का भी ख़्याल रखा करें ! क्यों वह अपनी वेटिंग सीट कन्फ़र्म करने की गुहार रामजी से लगाया करतीं हैं ? यह केवल मेरे निट्ठल्ले क्षणों के असहमत मौन का स्वर था, सो मूँहवा फाड़ दिया.. नारायण नारायण ! तो चलें ? नमस्कार.... 
या देवि सर्वभूतेषू ब्लागररूपेण संस्थिता ।  नमस्तस्यै । नमस्तस्यै । नमस्तस्यै नमो नमः ॥ 

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04 October 2008

तू चल... मैं जन्मजन्मांतर का पाप काट कर आता हूँ,

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‘स्कन्दमाता श्रीमती शिवेसर्वार्थसाधिके  आज प्रातः से ही अनमनी सी थीं । कई बार शिवशंकर भोलेनाथ भूतभावन ने प्रश्नवाचक दृष्टि डाली, नज़रें बचा गयीं ! गणेश तो सुबह से ही सजने बजने में भागदौड़ मचाये हैं । कल अम्मा के साथ मृत्यलोक की तीन दिन की पिकनिक पर जाना है, कार्तिकेय को तो कोई चिन्ता ही नहीं है । रिद्धि- सिद्धि गणपति से उदासीन हो गयीं हैं, अब इनके सूँड़ कौन लगे.. अभी अभी विदायी लेकर आये हैं, चिल्ला चिल्ला कर प्राणियों ने कहा अगले बरस तू जल्दी आ, फिर भी ये है कि.. ऊँह कौन समझाये ?  विनायक माज़रा भाँप ही तो गये, सफाई पेश की "अरे भागवानों, तब मैं जम्बूद्वीपे  भारतखंडे कहाँ गया था ?  वह तो दुष्ट ठाकरे का आमची महाराष्ट्र था, पगलियों ! पिताश्री के सेना के सेनानी हैं, सो संकोचवश चला जाता हूँ । पिताश्री के सखा निर्वासित अयोध्यानरेश राम की गुहार पर अम्मा ने साथ चलने को कहा, तभी तो जाता हूँ वरना मिलावटी मोदक का मुझे कोई लोभ नहीं ।   भला बताओ 25-30 हाथ की प्रतिमाओं के सम्मुख स्वयं कितना अपमान लगता होगा ?

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उधर दुष्टदमिनी अपने शस्त्र वगैरह बेमन से चमका रहीं थीं !  व्यस्त सी दिखने को , वह भूतभावन ब्रह्मवेदस्वरूपं  के सामने इधर से उधर को डोल रहीं थीं । गिरिजापति से दृष्टि-विनिमय होते ही, अनायास ठुनक पड़ीं, " मन नहीं कर रहा जाने का, फिर भी जाऊँ क्या  तुम क्या कहते हो ?" महादेव ठठा कर हँस पड़े, " क्यों अनमनी हो रही हो, त्रिपुरसुंदरी ? जाओ अपने क्षेत्र का एक बार तो दौड़ा कर ही आओ, इतना तो मान रखो ।" अरे बाप रे, करुणामयी तो एकदम से बिफ़र पड़ीं, " ऎ महाराज, यह आशुतोषवृत्ति अपने ही तक सीमित रखो । देखो, देवों के बीच ही तुम्हारी चतुराई शोभा देती होगी, जो तुमसे घड़ी घड़ी समर्थन माँगा करते हैं ! मैं अर्धांगिनी तुम्हारी, क्या पूछ सकती हूँ कि संहार के अधिष्ठाता तुम हो, और तुम ही नहीं जानते कि वहाँ संहार ही नहीं नरसंहार चल रहा है, और  मैं वहाँ अपने को पुजवाने जाऊँ ? "  भँग की तरंग में शिवदूती अरूपा ने जैसे कंकड़ फेंक दिया हो, किंचित तिलमिलाये फिर सहसा ही संभल कर ईश्वरोचित गरिमा से बोले, " जा भक्तों का मन रख ले, थोड़ा पूजपाज लेंगे तो तेरा क्या ?  उन आर्तजनों में किंचित साहस   व सांत्वना  की लौ जलाती आना ।"  घृणा से नारायणी एकदम काली पड़ गयीं, बोलीं "  स्वामी मेरे पास  आपके जैसा हलाहल रोक लेने वाला नीलकंठ नहीं है, सो जो देखती हूँ वह पीना ही पड़ता है । मुझे स्वयं ही आग्नेयास्त्रों की सुरक्षा में प्रवास करना पड़ता है । माटी बाँस का एक महिषासुर मेरे चरणों में डाल कर, सहस्त्रों महिष अपने मनोकामना फलप्राप्ति निमित्त हाथ जोड़ कर वंदना करने  लगते हैं । माँ माँ.. चहुँओर     माँ माँ .. का ऎसा कोहराम मचाते हैं, कि अपनी सदार्तर्चित्ता की छवि बचाना कठिन हो जाता है ।

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" क्या करें, यह आदिशक्ति  नामी आदिमाता ?  जब सभी कपूत हो जायें, तो कोई माँ उनका क्या भला कर लेगी  ? यह मूढ़ तो बस '  कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि ' गा गा कर दुर्गा-सप्तशती का ऎसा पाठ सुनाते हैं, कि खिन्नता व्यापने लगती है ।"  दुर्गतिशमनी का भुनभुनाना जारी था, कल षष्टी है ! त्रयंबकम की तरंग तो तिरोहित हो चुकी थी, सो मौज़ लेने लगे, स्वांग करते हुये उवाचे, " रूपं देहि, जयं देहि, यशो देहि, द्विषो जहि " ... थमक गये ।

" क्या इतने मात्र से, तुम यह सब प्रदान कर देती हो..  विजय भी कहीं भीख में मिलती है ?  देहि देहि की रट  लगवाये जाओ, भला न होगा कभी .. स्वयमेव मृगेन्द्रा  !  विजयश्री तो पराक्रमी का वरण करेगी या आसन पर पलथा लगाये ' रूपं देहि, जयं देहि, यशो देहि द्विषो जहि' का ? सहसा क्रुद्ध हो गये, " कब तक इस भिक्षुक मनोवृत्ति का वरण कर अपने जम्बूद्वीपे भारतखंडे  को अकर्मण्य बनाये रहोगी ?  पाताललोक वासी मलेच्छपति से भी माँगने पहुँच गये, ये लोग ।"  भोलेनाथ थरथर काँपने लगे... हाय बप्पा,  ई औघड़नाथ आजु तांडवै देखाय दिहें का ?   मेरी सरक गयी ! smile_angry

मैं  स्वयं ही जैसे भँग की तरंग में आ गया । इतने वर्षों से पाठ वगैरह करता आया, वह सब लग रहा कि उड़न छू .... ? आस्था में तर्क को स्थान न मिलता हो, किन्तु इस तर्क में तो आस्था ही आस्था है ।lightbulb मनमोदक खाते रहना छोड़ कर बुद्धिबल व बाहुबल पर भरोसा क्यों न रहा ? 

जकारो जन्मविच्छेदः पकार पापनाशकः

जन्मपापहरो यस्मात जप इत्यभिधीयते

यह तो हुई जप की महत्ता ! चंड-मुंड मारे गये, शुंभ-निशुंभ भी खेत रहे, रक्तबीज का अंत हुआ और महिषासुर का वध हुआ । 700 श्लोकों में समेटी गयी इस कथा का सार वही अनादि सत्य है, कि बुराई का अंत व अच्छाई की विजय ... यही ना, सहमत ? तो फिर मित्र जरा यह तो बताओ कि इनको हज़ार बार, लाख बार एक जगह बैठ कर जपते रहने से समाज का, और आपके स्वयं का क्या भला होगा ?  यस्स, इनमें निहित बीजमंत्रों की उपादेयता से इन्कार नहीं किया जा सकता, बशर्ते  हम यह बघारना छोड़ दें कि असली वाले मंत्र तो ज़र्मनी चले गये व एक भारतीय राज भाटिया की देखरेख में हैं, इसीलिये इन बचखुच लाइना में अब दम न रहा । जन्म लेना क्या इतना बड़ा पाप है, कि हम इससे उबरने की कोशिश में पूरा जीवन ही होम कर दें ।  उस पर भी यह विलासिता कि नारीस्वरूप को पूज्या बनाने में इतनी रसिकता का आश्रय लिया गया है, कि आश्चर्य होता है कि ऋषिगण ने नारीदेह सौष्ठव  को कितना नज़र गड़ा कर, बारीकी से देखा होगा । मैं कहीं बहक रहा हूँ क्या ? बता देना भाई, समेट लूँगा !  अच्छा, चलो जल्दी से निपटा ही दिया जाय...  वैसे ही फ़र्ज़ी तौर पर, या कि सोदाहरण ? सोच लो, इसमें संस्कृत है ।

पत्नी मनोरमां देहि मनोवृत्तानुसारिणीम । तारिणीं दुर्गसंसारसागर्स्य कुलोद्भवाम । जपत तो एहिका हो, अउर करत का हौ ? आपै देखि लेयो हम न बोलब !smile_zipit    ततो वव्रे नृपः राज्यमिति मंत्रस्य जपे स्वराज-लाभः । गाँधी एहिका पढ़बे नहिं भे, लाठी-डंडा खा लिहिन, जेलु गये सेंत में ! एहिकै जपि लेत, छुट्टी हुई जात अंग्रेज़न की !smile_wink    बलिप्रदाने पूजायामग्निकार्यै महोत्सवे । सर्वं ममैतच्चरित मुच्चार्यं श्राव्यमेव ॥ अब आप ही बताओ भाय, कि सर्वोपकारकरणाय सदार्द्रचित्ता बकरा-भैंसा से काहे बैर ठाने हैं ?blacksheep     वह तो शायद पशुत्व की बलि माँग रहीं, अउर ई मनई काटि रहे बकरा ! बकरे का पशुत्व भी इतना निरीह कि गाँधी जी प्रायश्चित में एहिका दूध पियत पियत मर गये !Devil                                   कामदा कामिनी कामा कांता कामांगदायनी । अब एहिका देखि लेयो, साफ़ै साफ़ बतावत हैं कि देवी का अंश नवयौवनाओं में ही है, तबहिन हम सोचित रहा कि कुमारीतंत्र तो है,smile_embaressed  किंतु वृद्धातंत्र कब्बौ नहिं सुना भवा है ! सही है, भाय सही है... चढ़ी- चढ़ै का सबहिन पूजत है । तबै ई नकलची ललमुँहें भी तो मरियम गढ़ि लिहिन रहा । हमरे ईहाँ तो हद खतम कर दिहिन, भाय । एहिका देखो..                                                  नव तरूणशरीरा मुक्तकेशी सुहारा । शवहृदि पृथुतुंगस्तन्ययुग्मा मनोज्ञा ॥ अरूणकमल्संस्था रक्तपद्मासनस्था । शिशुरविसमवस्त्रा सिद्ध कामेश्वरी सा ॥ एहिका मतलब माता बहिनन का सोचि कै नाहिं बतावा चाहित है, यहि से मन नाहिं भरा तो.. स्तनौ रक्षेत महादेवी मनःशोक विनाशिनी । नाभौ च कामिनी रक्षेत गुह्यं गुह्येश्वरी तथा ॥ रोमकूपेषु कौमारी त्वचं वागीश्वरी तथा । शुक्रं भगवती रक्षेत जानुनी विंध्यवासिनी ॥ गिनवा गिनवा कर अंग प्रत्यंग की रक्षा का भार देवी के मत्थे दे दिया, यहाँ तक कि शुक्र भी ! आख़िर तो हम उन्हीं की वंशज ठहरे, ना ?  अब डोलते रहिये, इधर-उधर... क्योंकि इधर पहले ही बहुत कुछ सुपुर्द किया जा चुका है ! शूलिनी वज्रिणी घोरा गदिनी चक्रिणी तथा । शंखिनी चापिनी वाणा भुशुंडी परिघायुधा ॥ शूलेन पाहि नो देवि पाहि खड्गेन चांबिके । घंटास्वनेन नः पाहि चापज्यानिखनेन च ॥ मतलब साफ़ है, कि एक भी आयुध अपने लिये नहीं रखा.. तौन अब देखि लेयो कि देश देश घूम रहें हैं, हथियार के जुगाड़ में ! तब हमरे मनई इंद्र-वरूण इत्यादि से सहायता माँगा करते थे, अब अमेरिका रूस चीन से ! फ़र्क़ इतना ही है, बस !

तो अब चला जाय, कि अबहिन कछु  और खला जाय ?

या देवी सर्वभूतेषु लज्जारूपेणसंस्थिता

नमःतस्यै नमःतस्यै  नमःतस्यै  नमो नमः

 

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27 September 2008

रानी रूठेगी… अपना सुहाग लेगी

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बात तो भाई, एकदम्मै सही है. !  हाँ तो, शुरु किया जाय ? एक महीने का अंतराल होने को है.. और महीने में एक पोस्ट देने का वायदा भी है । मौका और मोहाल दोनों ही माक़ूल हैं  सो, इस नामाक़ूल की कलम चले ? पहले यह तो पूछो, कि गायब ही क्यों था ? गायब होंय भूत प्रेत बैताल के दुश्मन, हम तो वइसे ही अपना नया शौक में उलझ गये थे । देखि लेयो ईहाँ, एच०टी०ऎम०एल० की एचटीमेंएल कर रहे थे, इस सइटिया का कोड सँवार बिगाड़ि रहे थे, अउर अब ख़ाज़ खुज़ाने आयें हैं, कोई ऎतराज़ ? मेरे काबिलतरीन दोस्त श्रीयुत दिनेश राय द्विवेदी जी, पहले ही फ़रमा भये हैं कि सबहिं फुलन्तरू हँईयन लौट के अईहें, भागि नाय सकत कोऊ, ईहाँ तै ? वइसे ऎसी दलीलन को ओवर-रूल करै को वन हण्ड्रेड वन रीज़न्स हैं, अपने पास ! काहे कि अइसे छुट्टा- बेलगाम सुहाग से तो रँड़ापा ही भला ! बात में असल ये है, कि हम आहत हुई गये थे, अउर हैं !

आहत होना तो ख़ैर ब्लागर-कुलरीति ही है । लेकिन पगलवा गुट बोला कि ई कउनो ख़ास रीज़न नहीं, कुछ सालिड बताओ । काहे कि इत्तै वाद-विवाद हुई गये, लोग गरियाइन.. मारिन.. चप्पल ज़ूता घसीटिन… बल्कि हियाँ तो पतलून-जम्फर तक उतरवा के घुमावा गवा है, लेकिन अपमानित नहीं किया कब्बौ कि हम आहत हो जायें। हम बिरझ गये, ठीक है भईय्या, तौन अब आप जाके देश का नेतृत्व संभाल लेयो, ब्लागिंग का तो अनुभव ही पर्याप्त है तुम्हरे लिये ! मज़ाक नहीं भाय, अच्छा लेयो ई नाड़ा पकरो… “ देश का नेता कैसा हो.. हिन्दी ब्लागर जैसा हो ! ज़िन्दाबाद ज़िन्दाबाद… चिरकुट अँधरा ज़िन्दाबाद ! अँधेरा तुम्हारे अंदर है.. बाहर तो उज़ाला है ! लेयो, अउर लेहो ? हम्मैं कउनो फ़िकिर नाहीं, ’  राजा नहीं फ़कीर ’  नारा वर्कशाप में काम किहा है ! यह तुलना ऎंवेंईं वाली नहीं बल्कि सच्ची की है, नेता ब्लागर और गैंडा के तुलनात्मक अध्ययन पर ज्ञानदत्त पांडेय जी ’ मानसिक हलचल फेम वाले ’ एक चार्ट भेजने वाले हैं, देखते रहिये यह   happy_feetस्पेस ] … गैंडा तो लीद करने को बैक गीयर में चलता है, सो उसको अलग किये दे रहे हैं,  अभी तो ब्लागिंग में अपार अन्यान्य  संभावनायें अन्वेषित होने को हैं  । गैंडत्व अभी दूर की कौड़ी है, मित्र श्री !

सो, हम सीनाठोंक आहत रहे अउर हैं। टंकी रिपेयरिंग अभी पूरी नहीं हुई है, वरना डिक्लेयर कर जाते । फिर यह भी सच है कि, 100 टुटपुँजिया पोस्ट के बूते टंकीरोहण करना समझदारी भी नहीं, वह भी ऎसे हालात में जबकि आप अपने नेटवर्किंग पर भी भरोसा नहीं कर सकते, यहाँ  कई तो आया राम - गया राम भी होंगे, कहाँ नहीं हैं ? तो, हम एक बार फिर दोहरा रहे हैं,कि .अँ,  कि ..ऊँ,  कि हम आहत थे  और आहत हैं ! आहत था…बोले तो…

मेरे एक सहकच्छामित्र ( एक नया शब्द, नोट करें अब लंगोटिया यार नहीं चलेगा । लंगोट पुराना और बासी माल है, हर गाँव पुरवे में रूपा की ही ठेलमठाल है। और यार, अरे यार तो यवन संबोधन है, मेरे यार ! भारत में यदि रहना होगा, सहकच्छामित्र कहना होगा )

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तो यह सहकच्छामित्र श्रीमान एक दिवस हमरे कनें टहल लिये,  ’मुन्ने ’ यानि कि मोहम्मद अज़हर खाँ मंथर चाल से प्रगट हुये, साहित्यानुरागी हैं ! सो, कभी कदार साहित्य चरने की गरज़ से भटक आते हैं । मित्र को आलोचक का दर्ज़ा देकर रखो, तो बड़प्पन कहलाता है । बट ही इज़ अ नाइस ज़ेन्टलमैन, अ बिट डिफ़ेरेन्ट फ़्राम शिवकुमार ! हज़ कर आये हैं, सो हाज़ी हैं.. पर ज़ेहादी नहीं हैं । चा – पानी की पूछ-ताछ दिल से हुयी  और वह जुगा़ड़ पक्का देख आश्वस्त हो  लिये, फिर बोले, ” और सुनाओ,, कुछ नया लिखा –ऊखा, या वही इन्टरनेट पर लिख रहे हो ? कुछ लिख रहे थे, ना ? और वह“ भउजी दर्शन को प्यासी अँखियाँ इधर उधर दौड़ा कर मेरे कंम्प्यूटर चेयर पर क़ाबिज़ हो लिये । सफ़ारी मिनिमाइज़्ड मोड में थे, एक चटका माउस का और चिट्ठाजगत का पन्ना स्क्रीन में से दीदे फाड़ फाड़ खाँ साहब को घूरने लगा । अज़हर मियाँ कौतूहल से आगे को झुक ज़ायज़ा लेने लगे, फिर अपने स्वभाव के विरूद्ध बिफ़र पड़े, “  अमाँ डाक्टर, यह क्या भँड़ैती है, तुम यही सब कर रहे हो ? तुम्हें और कोई चूतियापा नहीं मिला दुनिया में, फ़ालतू का टाइम-वेस्ट ? वह तो बेटा आज रंगे हाथ पकड़ लिया, तुम अपने लिटरेचर को क्या दे रहे हो, यह तो सोचो ? “ वह मेरे इतने अज़ीज़ हैं, इसलिये तारीफ़ न भी करते पर ऎसी असहमति भी क्या ? लिहाज़ा हिन्दी ब्लागिंग की ख़ातिर कुछ तो आहत होना ही पड़ा ! ईद के बाद मेरी क्लास फिर ली जायेगी, यह मुझे पता है । आहत हूँ… बोले तो.. .

लगभग इसी दौरान एक GhostBusterPhoto जी रूपी पुच्छल तारे का उदय हुआ । उनकी बेदुम बेसिर-पैर की जिन लोगों ने पढ़ी हो, वह मेरा विषय नहीं है, आप स्वयं ही बहुत कुछ जानते हैं । यदि ठीक से मौज़ लिये की मौज़ाँ ही मौज़ाँ लिये होंगे तो  ’ ये अंदर की बात है ’  का मर्म समझाने की आवश्यकता ही नहीं ! किन्तु मेरा केस  कुछ डिफ़ेरेन्ट है… वर्ज़नाओं को तोड़ना और गलत का विरोध  करना मेरा स्वभावगत दोष है, बस यूँ समझें कि जन्मजात मैन्यूफ़ैक्चरिंग डिफ़ेक्ट ! अब जो करना हो, करलो ! लेकिन गौर किया जाय कि मुझे तो इनका फोटो लगा कर संबोधित करना पड़ रहा है । धन्य हैं, जय हो.. इत्यादि इत्यादि इनके लिये, क्योंकि इन ज्ञानी GhostBusterPhoto जी के हलचल पैदा करके अपने को अमर कर लेने की सनक ने कुछ अधिक ही आहत किया, अब्भी अब्भी तो बताया था कि गैंडत्व अभी दूर की कौड़ी है ! क्योंकि यह तो मेरे पिछवाड़े की गली ही के निकले । धन्यवाद श्रीमती पुष्पा पांडेय, जिन्होंने अपने पद एवं तंत्र का उपयोग कर इनके नाम-पते को कालर पकड़  सामने ला खड़ा किया । कौन हैं, यह… जान कर हैरत होगी.. विचित्र किन्तु सत्य ? सच बड़ा ज़ालिम हुआ करता है, इस दुनिया में किसिम किसिम के लोग हैं । प्रणाम GhostBusterPhoto जी, एक दिन अचानक धमकूँगा, चाय पीने, दोहरा व्यक्तित्व या ’ स्प्लिट पर्सनालिटी ’  बड़ी कुत्ती चीज है, एक लाइलाज़ मनोरोग ! मुझे तरस आ रहा है, इन GhostBusterPhoto पर ! हलचल जो न करवा दे… इस वर्चुअल दुनिया में !  एक वर्चुअल चरित्र गढ़ने की फ़ैंटेसी बड़ी रोमांचक हो सकती है, इन GhostBusterPhoto जी के लिये .. पर इसके दुष्परिणाम बड़े भयावह हुआ करते हैं । सुना है, अवध के कोई नवाब ज़नाना कपड़े पहन के रंगरेलियाँ मनाया करते थे, नतीज़ा यह हुआ कि वतन गया फ़िरंगियों के पास ! आपको इतिहास से एलर्ज़ी है, क्योंकि यह आपको डराता है ! मुझे ऎसा कोई डर नहीं है ।

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मुझे तो एक मुहिम मिला था, वह पूरा हुआ समझो । इस बेगैरती में शायद न भी पड़ता किन्तु मुझे एक वक़्त की रोटी देने वाली पंडिताइन गश खा खा कर बेहाल थीं । इसको सामने लाओ.. देखें तो कि यह 75 किलो का औसत भारतीय कौन है ? कुछ पता तो चले कि यह नर हैं कि मादा… हिज़ड़ा कहीं का ! जरा देखो तो कैसे लिखा है… और अपनी लम्बाई बताने में हीन भावना से ग्रसित हो झूठ लिख गया है, सात पुश्तों का ज़नख़ा ! ओह्हः, इन स्त्रियों का क्वथनांक, ज़्वलनांक इतना कम क्यों हुआ करता है, रे विधाता ? पर एक बात ज़रूर है, तू चीज बड़ी है, मस्त मस्त !

अपने डाक्टर अनुराग जी चिट्ठाचर्चा पर टिप्पणी लिखते पाये गये, कि अब पोस्ट चढ़ाने से पहले सोचना पड़ता है । बस यही बात तुमको औरों से अलग करती है, अनुराग । तुम चमड़ी के उस पार देखने लगते हो ! जहाँ ठेलो-गुहार चल रही हो, तो ठेलने के उस पार मत देखो । लोग शौचते हैं, और तुम सोचते हो ! भला ब्लागिंग के लिये भी कोई सोचता है ? मेरे लिये यह नयी जानकारी है ।

देखो मुझे, बिना सोचे लिख रहा हूँ कि नहीं ? इसमें भी धुरंधरों को ज़लेबी इमरती दिख जाती है, तो मेरा अहोभाग्य ! भाषा पर कोई रोक टोक न लगा कर, खुद को.. खुद ही.. अपने अंदर की खुदखुद को परोसता हूँ, वह भी खुद्दारी के साथ खुद बन के ! इतना ही तो ?

भाई कुश सांप्रदायिक भाई गिरी से परीसान हैं, किंवा उन्होंने मेरी टिप्पणी पर ध्यान न दिया.. भाई यह फ़साद वहीं ख़त्म होगा, जहाँ से शुरु किया गया था । अब यदि मुसलमानों में पाकिस्तान ही ढूँढ़ा जाता रहा, तो उनको भारतीय बनने देने की राह का रोड़ा कौन है ?

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एक पोस्ट चढ़ाने का घणा ताव तो मुझे उसी दिन से था, जब अपने ताऊ की कविता पढ़ी । मैं भी लिक्खूँगा कविता… पर भाया मेरे, पूरे तीन दिन बरबाद हो गये, कविता निकल के ना दी ! कमरे में अँधेरा करके महसूस करने की कोशिश की, महसूस हुआ मच्छरों का दंश ! आकाश को निहारा किया.. मिला कऊव्वे की बीट ! तलईय्या किनारे बैठा.. दिखा तैरता सिवार ! सुंदरियों को निहारा.. तो सुना ’ नमस्ते अंकल ’ ! आम आदमी के दर्द को टटोला… और कविता हवा हो गयी ! 27 सितम्बर की डेडलाइन सिर पर, स्वपनिल जी से कविता उधार माँगने गया । बेचारे गदगद हो गये… हैरत से पूछा, नेट पर दिक्खेगा ? तो लीजिये यह ताज़ा माल.. कल रात ही इसका प्रसव हुआ है, और वह सस्वर प्रसवपीड़ा से सड़क पर ही चीत्कारने लगे । दईय्या रे, मैं भाग खड़ा हुआ, ज़ूते पड़ जाते !

एक टूटी फूटी कविता हाथ लगी, इसी से काम चलाइये..

ब्लागरों के इस ज़मात में
रोज सुबह उगता कोहराम है
वह रोज आधीरात
फ़ाँसी के तख़्ते से वापस आता है
सुबह फिर चढ़ जाता है

यह उपक्रम तब से जारी है
जब से कुछ ब्लागर बैलों ने
संवेदनाओं और वास्तविकता का जुआ अपने कंधे पर रखा है
शायद जीतना चाहते हैं
ईमानदार लेखन का ख़िताब

टिप्पणीकारों से पूछा भाई
इसका कसूर क्या है
रोज फाँसी के तख़्ते पर
क्यों लाया जाता है ?
ज़वाब में वो भुन्न से बुदबुदाये

यह अपनी कलम से
उनकी हत्या क्यों करता है
जो झूठ व नफ़रत के खिलाफ़
बोलने वालों का मुँह सीना चाहते है
यह तो बुद्धिजीवी कहलाता है
फिर भी क्यों न समझता
लिखो और लिखने दो का रिश्ता


अरे, कितनी देर से क्या लिखे डाल रहे हो ? यह पंडिताइन हैं कि विक्रम की बैताल ? ( इनको सहकच्छाधर्मिणी कहें, तो चलेगा ? )बस फ़िनिशिंग मार दूँ । समझती नहीं है, मासिक स्राव पर भी रोक है, क्या ?  कुल निष्कर्ष ई बा मरदे जी कि हम्मैं अपने सुहाग की कोनौ चिन्ता नाहीं, जेहिका होखे ऊ करै । हिंयाँ त भतरा के लइनिया लागल हौ, मोहब्बत चाही.. त तुहौ मोहब्बतै देबा नू ? वरना हम तो भाई हमहिं हैं, अउर हमने कसम खा रखी है कि… हम न सुधरेंगे । आप टिप्पणी न करने लिये स्वतंत्र हैं, कोई वांदा नहीं ! टिप्पणी-ऊप्पणी राय विचार कर दीजियेगा कि इसका बी.आर.पी. केतना बढ़ाना है ! बोलिये,  जय हिन्द और सरकिये अगले पन्ने पर !

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12 September 2008

असली…. “ और भी काम हैं ज़माने में “

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लोगबाग यहाँ पूरी की पूरी पोस्ट साफ़ कर देते हैं, मैं तो केवल शीर्षक से गु़ज़ारा चला रहा हूँ। माफ़ करना समीर भाई, यह गुस्ताखी न करता लेकिन आपको यह शीर्षक एक ही दिन के लिये दिया था .. ब्याज़ के 21-22 टिप्पणियाँ आप रख लो, फिलहाल तो मैं यह शीर्षक उठाये लिये जा रहा हूँ, कल्लो जो करना हो । आप ढाई साल बड़े हो हमसे .. तो हमारे परिवार की परिपाटी अनुसार आपकी उतरन पर हमरा हक़ बनता है, आप कहोगे तो इसके बाद राजीव को दे दूँगा । नाराज़ हो गये ? ठीक है..
खैर मैं भी नाराज हूँ, आपसे तो नहीं … पर, किस किस से नहीं हूँ, यह तो पूछि लेयो भ्राता ? जब  हमरे शिवकुमार भईय्या श्रीयुत, दुर्योधन ( Last Name, Optional रहा वोहि युग में ) को हीरो बनाय रहे हैं, तो इस ब्लागर सभा में धृतराष्ट्रन की पैठ तो होबे करेगी । कल सुबह देबाशीष पैदा लेने वाले हैं, सो ब्लागस्पाट, वर्डप्रेस वगैरह को दुई घंटा से निरंतर अगोरे बैठे रहें, कि कोई एक्सक्लूसिव बाइट मिल जाय । जम्हुँआई लेते लेते, कुछेक लोगन को टिप्पणोपकृत करे को टहलने निकले, हौसला लेना अउर देना, कितना ज़रूरी है.. यह आपसे अच्छा भला कउन जानता  है, लेकिन भाई एक जगह पर तो होश ही उड़ गये.. कौउनो घोश्त-बस्तर के दुआरे बड़ी  हसरत से  आरज़ू…. ज़ुस्तज़ू … अउर भी कई तरह तरह के ’ज़ू ’ लेकर पहुँचे, कि मनावेंगे, बड़े रिसियाये हुये कई दिनों से तहमद की गाँठ खोल-कस रहें हैं । किंतु भ्राता, हमरे दिमाग में तो 11 सितम्बर हुई गवा, सच्ची बताय रहें हैं भाय !
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झूठ नहीं, अब आपै देख लेयो.. सो भाई, हमतो अपनी आधी अधूरी टिप्पणी लइके भागि आये, ज़ल्दबाज़ी में चिट्ठाजगत पर जो टाप नम्बर वाला शीर्षक रहा, वही समेट के सीधे यहीं साँस लिया । ई चिट्ठाजगत वाले आपै का शीर्षक ऊप्पर रखते हैं, कि हमला होय.. तो जाय देयो इन्हीं का शीर्षक । एक दुई दिन में फिर कोई शीर्षक लेकर उतरेगी ’ उड़न तश्तरी ’, जरा ध्यान रखा करो इन बातों का !जो हुआ सो हुआ,ब्लागर एकता ज़िन्दाबाद..’टिप्पणी हमारी – हेडिंग तुम्हारे’ बिल्कुल हिट पोस्ट का जुगाड़ है, गुरु अरे वही.. समीर भाई !
अथ आरंभ भूत – प्रेत – बेताल – अगिया बेताल विनाशक टिप्पणी ( सभी लोग अपनी अपनी मुट्ठी खोल लीजिये.. )
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इस मंगलमूरत को प्रनाम किःजीएऽए
शिरिमान ’ पता नहीं क्या जी ’
सादर छिह्हः अभिनंदन
क्या बवाल फैला रखा है, भई आप लोगो ने ?
आप एक मिशन पर बिज़ी हैं, इसलिये माफ़ी चाहूँगा, पर..
दुनिया में हज़ारहाँ काम है, एक दूसरे के लिंग ढूँढने के सिवा...
आप स्वयं विचार करो कि आप हिन्दी ब्लागिंग को कुछ् दे भी रहे हो.. या केवल विध्वंस ( Sabotage ) करने के इरादे से बेवज़ह जूझे पड़े हो । यदि आपके लिंग सत्यापन करवाने  की माँग अब तक नहीं उठायी गयी है, तो आप दूसरे के जम्फर में झाँकने पर क्यों आमदा हो ? जिस सनसनी-परक ख़ुज़ली से मीडिया परेशान है, वह वहीं तक रहने दो भाई या बहन मेरे ! यदि ब्लाग पर दिया गया आलेख दमदार है, तो क्या फ़रक पड़ता है कि लिक्खाड़ नर है या मादा, बुड्ढा है ज़वान, नवा है कि घिसा माल है ?  हद है भई , यह क्या बवाल है ? चाँय.. चाँय.. चाँय.. चाँय..  महीना बिता कर आये हो, अपनी बिसरायी गदरायी ज़ोरू के पास, चैन से रहो ! ब्लागिंग की बुद्धि किसी नसीब वाले को ही मिलती है…. उसमें भी, ये नहीं वो ?

मैं अमरकुमार अपने प्रोफ़ाइल पर किस जीवित या मृत व्यक्ति की फोटो टाँगे पड़ा हूँ, इससे मेरी सोच या लेखन में क्या अंतर पड़ता  है ? अब किस किस की सूँघते फिरें कि यह नर हैं या मादा, और इनकी तहमद खींच कर या चीरहरण करके किस तरह ब्रेकिंग न्यूज़ बनाया जाये ? क्या बक़वास है, और यह किस तरह की चिट्ठाकारिता है, और इसका ब्लागमैटर से क्या ताल्लुक है ? कोई आपके विचारों के उलट लिखता है.. तो उसका ज़वाब अपने तर्क से दो, जनमत को अपनी तरफ़ खींचो या उसके लत्ते नोचने लग पड़ोगे ? यह तो कतिपय विद्वानों के हिसाब से श्वानवृत्ति है, काहे के प्रेत हो स्पष्ट तो कर दो ! बोलो, हम इसी पितृपक्ष में ब्लागर पर प्रेत-बाधा नाशक अनुष्ठान करवा देंगे, भटकने से मुक्ति पा जाओगे और ब्लागर को भी मुक्त करोगे !
छिःह, घिन आ रही है.. ऎसे ब्लाग पर और घटिया विवेचनात्मक आलेख पर टिप्पणी देने में भी !
अब मैं यहाँ कभी टिपियाने से तो रहा.. साथ ही यहाँ के टिप्पणी कालम में दिखने वाले हर   सज्जन और सजनी के सहभागिता निभाने वाले का डब्बा गोल !
अब ये पूछिये कि मैं यहाँ कर क्या रहा हूँ ? आपको अपने फ़ीडरीडर से हटाने गया था तो कौतूहलवश यहाँ की सड़ी बज़बज़ाती सोच को अलविदा कहने आ गया था । देखा कि द्विवेदी जी भी आपकी चोखेरबाली हैं । मेरे खिचड़ी-भोजी ज्ञानदत्त जी के इर्द-गिर्द ऎसा ताना बाना बुना कि एक टीम अन्वेषण में जुटी पड़ी है.. कि  ज्ञानदत्त ही प्रेतावतार हैं !
कापुरुषों को युगपुरुष में शुमार करने के पाप का यही अंज़ाम हर किसी के साथ हो सकता है । क्या वाहियात बात है, पोस्ट लिखने वाले को अपना लिंग टटोलवाना पड़ेगा, ऎसा प्राविधान बनाने  की सनक का क्या अंत होगा, यह तो सोचो ? क्यों चिराँधबाज़ी फैलाये पड़े हो यार ? यारा ?
यह भी पूछोगे कि मैं क्यों परेशान हूँ.. क्योंकि रख़्शंदा को एक मानसपुत्री के रूप में देखता हूँ,  और उसके वज़ूद को भौतिक रूप से सत्यापित कर चुका हूँ , इसलिये  !  मज़हब के झमेलों  की  टुच्चई मुझे नहीं भाती, इसलिये ! उसके समकक्ष के सभी समलिंगी या विपरीतलिंगी भी मेरी इस फ़ेहरिश्त में शामिल हैं, इसलिये !

आपको एक नया होमवर्क दिये जा रहा हूँ, अब आप सिर धुनिये कि यह सत्यापन कब कैसे और क्यों हुआ, पर पहले अपना चश्मा साफ़ कर लीजियेगा, ब्लड सुगर वगैरह करवा लीजियेगा । ईश्वर आपको किंचित बुद्धि दे, जो वेबपेज़ों और दूसरे की मेहनत से तैय्यार किये अध्ययन को टीप लेने मात्र से नहीं मिला करती ।
शुभाकांक्षी - आप की पसंदीदा गाली ( जो भी आपके श्रीमुख से उच्चरित हो रही हो..कोई वांदा नहीं  )
baby5tb4 ऎई सुनो… सुनो तो ? जरा मेरा भी लिंग बताते जाओ, मेरा भी एक ब्लाग है ! बताओ ना, ऊँऊँ
बयान इकबालिया – टिप्पणी कुछ कसैली थी न ? मुझे भी लग रहा था .. किसी ने बताया ही नहीं ? तभी तो मैं ’ न उधो का लेना.. न माधो का देना ’ टाइप ज़ेन्टलमैन ब्लागर समीर लाल जी के चिट्ठाचर्चा का शीर्षक ही उठा लाया.. और उसी की टिकुली साट दी यहाँ…  इससे कुछ तो डिप्लोमेटिक इम्यूनिटी..मिलबे करेगा कि नहीं ? हम हैं पीर.. अनूप बीर… समीर भाई फत्ते !

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06 September 2008

शब्दों की तलाश में निकली एक प्राणहीन पोस्ट

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कुछेक अहसास को आप शब्दों में बाँध नहीं सकते । लगता है, बहुत कुछ ऎसा ही अभी सारे देश और पूरे विश्व में देखा गया है । इसकी आप भर्त्सना कर लें, निंदा करें, बहसियायें, गरियायें.. फिर भी इस तरह के वतनी शर्मिन्दगी को लफ़्ज़ों मे कैद न कर पाने की छटपटाहट जस की तस बनी रहती है । किसी उपयुक्त शब्द को तलाशने आप कंदराओं में क्या जा पायेंगे, क्योंकि आपका तपोबल तो बलात्कार ( चलो भाई, मानसिक ही सही ) करते रहने और अपने साथ अनेक ( आर्थिक स्तर के ) बलात्कार होने देने में ही चुक गया है । ध्यान रहे, कि यहाँ  मैं नैतिकता का कोई  प्रश्न ही नहीं उठा रहा । मुझे उठाना भी न चाहिये, क्योंकि अनैतिकता की थाली में खाते रहने वाले कराह भले लें, पर गरजा नहीं करते । यह तो.. ऎंवेंई उबाल है, संभवतः कल तक ठंडा भी हो जाय । एक ई-मेल ने कुछ कुरेद दिया, सो आप मित्रों के सामने बिलबिला पड़ा । नैतिकता की कस्तूरी की खोज में भागा करता था, ज़नाब फ़लाँ-ढिंकाँ ने फ़रमाया …  इसको कहाँ ढूँढ़े रे बंदे.. शाम  को बुलाया है कि मेरे भीतर से ही बरामद करके दिखा देंगे । अब देखिये.. क्या होता है ?  अगर कल को यहीं ब्लागर पर ’ निट्ठल्ला टाइप ’ पोस्ट लिखते पाया जाऊँ, तो समझो नैतिकी ब्रांड कस्तूरी बरामद होने से रह गयी । अपनी जगह पर है तो, सवा सोलह आने , पर मैं भी तो आप सब की तरह बाल बच्चे वाला आदमी हूँ .. सुना है कस्तूरी के लिये उस्तरा चलने का दर्द झेलना पड़ता है.. माफ़ करना बंधु, यह तो मुझसे न होगा ! अरे भाई, को घर फूँके आपना.. !

प्राणहीन देश  या शब्दहीन पोस्ट --- क्लिक करें असलियत देखें

इस चित्र /कार्टून ने भाई बवाल काट रखा है । पूरे देश का कार्टून बना रखा है, तब भी चैन न मिला तो नीरज गुप्ता जी से कह सुन कर मेरे मेल-इनबाक्स में प्रगट हो गये… और मैं उलझ गया । पंडिताइन की सोहबत अभी तक तो ठीकठाक है, सो प्यार से गोहरा कर बोली.. “  बहुत दिनों के बाद समय से घर आये हो, आओ आराम कर लो ।“ कोई ज़वाब न पाकर दौड़ी आयीं कि क्या हो रहा है ? कुछ संतोष से बोलीं… पोस्ट लिख रहे हो.. अच्छा लिखो लिखो । उनको बड़ा कष्ट था कि लोग रोज एक पोस्ट पेलते हैं, और मैं महीने से नहीं लिख रहा । वह कुछ और ही समझ कर, सांत्वना देतीं, “ अरे तुमको समझने वाले कितने लोग ही हैं, यहाँ, जो टिप्पणी दें । मेरे लिये लिखो, मैं तो पढ़ती हूँ !”  अरे भाई, परेशान कर दिया था.. उनका नारी तत्व ( श्श्शः कोई है तो नहीं ? ) बोल पड़ा करता, “ ये क्या हो रहा है, आज फिर टिप्पणियाँ बाँटीं जा रही हैं ? “ मैं विहँस पड़ता हूँ ( अब क्या ज़वाब दूँ, मैं… तुम्हारे सवाल की ) मौका है, अपने को आफ़ताब बना ले यार अमर कुमार, “ अरे पंडिताइन छोड़ो भी, दान देने वाले प्रतिदान की परवाह नहीं करते “

ओह्हः लगता है कि विषयांतर हो रहा है ? यही तकलीफ़ है, मुझे ब्लागिंग में.. बेलगाम छुट्टा लेखन पर उतारू हो जाता हूँ । और, मज़बूरी है, संपादक का भेजा फ़र्मा नहीं कि लेख चढ़ा कर भेज दो, मारकेटिंग विभाग का ऎतराज़ नहीं कि प्रसार संख्या कम हो जायेगी, पाठक की परवाह नहीं कि आहत हो जायेगा । बड़े धोखे हैं, ब्लागिंग  की राह में.. अमर बाबा जरा संभलना । तो, मित्रों ( जलकुकड़े मित्रों ) आप लोग ई-मेल प्रेषक को धन्यवाद दो कि ना ना करते पोस्ट हम ये लिख बैठे ! देश को कार्टून कोना बनाते नेता जी ( लेता जी, चलेगा ? ) पर एक चटका लगाओ.. और बायस्कोप देखो,  बस वोट मत फेंक देना ! यह नोट शोट भी रहने दो.. बस मेरी जान छोड़ो और मुझे चलने दो । सत श्री अकाल !  राम राम हरे हरे

भूल सुधारअपने आपसे.. मैं राजनीति पर लिखने से परहेज़ किया करता हूँ, अपने बाबा की पीठ पर सन 42 में पड़े बेंत के निशान याद आ जाते हैं। यह आलेख मलाई काटते क्रीमी अवसरवादियों के लिये अरण्य रूदन से अधिक कुछ नहीं !  इससे पहले एक गलती आज ही दोपहर में हो चुकी थी । अपनी क्लिनिक में 12” x 8” का एक डिस्प्ले बरसों से ( 1989 से – किस्सा ए पृष्ठभूमि फिर कभी.. ) लगा रखा है । परामर्श अधिकार सुरक्षित साथ ही रोगी कृपया अपने को नेता, पत्रकार या अफ़सर के रूप में प्रस्तुत न करें , आलोचनायें हुईं, हमहू कहा चाहे माड्डाले जाई, बोर्डवा न हटिहे ! सो, इसका निर्वाह हो रहा है । आज एक सज्जन आये, संयोगवश गुप्ता जी ही थे, कुल मिला कर यह साबित पाया गया कि वह डायबिटीज़ के सताये हुये हैं । दवा अपनी जगह पर.. पर थोड़ी काउंसलिंग आवश्यक हुआ करती है, इनके लिये । सो, पूछा , क्या करते हैं.. जी कोई ख़ास  नहीं, दुकान भाई देखते हैं, मैं पालिटिक्स करता हूँ । शकल से तो दलाल लगते थे, और अकल से भी .. पूछ बैठे कि रात में ज़्यादा नहीं, बस 60-70 एम.एल. इन्ज़्वाय चल सकता है, कोई नुकसान तो नहीं.. इसमें सुगर तो नहीं है ना ? बड़ी मुसीबत है, भाई .. कइसे समझायें । मैंने प्रयास किया देखिये त्रिलोकी जी, डायबिटीज़ से आज तक एक भी व्यक्ति नहीं मरा, फिर भी नियंत्रण ज़रूरी है.. क्योंकि यह अन्य तत्वों को उकसाने का मौका ढूँढ़ती है, यूँ समझिये कि… समझिये कि आपके शरीर के सिस्टम में ममता बनर्जी है !  हा हा हा.. सहसा वह एकदम सीरियस हो गये.. बात लग गयी डाक्टर साहब, शुरु में ही कंट्रोल कर लें, नहीं तो बवाले-बवाल है ! जाते जाते एक पुस्तिका भेंट में ( बल्कि सप्रेम भेंट में ) दे गये.. मज़हब ही सिखाता आपस में बैर रखना , आगे थोड़े महीन टाइप में ’ सिवा सनातन धर्म के ’ । घर लौटा तो देखा यह ई-मेल !  तबियत मेरी भन्ना गयी और झेला आपको दिया ।

एक निट्ठल्ला सवाल – इससे पहले कि कबाड़खाना वाले निट्ठ्ल्ला-चिंतन का छोड़ा हुआ कबाड़ बटोर ले जाते, मैं भी कुन्नु सिंह को साथ लेकर लपक पड़ा, कुछ बीन लाया जाय.. पकड़े जायें कुन्नु, मुसीबत में हमारे ताऊ की मदद ना करी । कुछ खास हाथ नहीं लगा सिवाय इस सवाल के.. “ यदि आपने रूपा की अंडरवियर पहन रखी है.. तो भला आपकी रूपा ने क्या पहना है ? “ यह भी कोई भला आदमी पूछता है, इससे क्या मतलब ?

आज से ब्लागिंग बन्द - तो अब हम भी फाइनली चल ही दें, पंडिताइन ( मेरी रूपा ) प्रगट होती भयी हैं, “ आज क्या पूरी रामायण ही लिखी जायेगी ? खाना वाना खाओगे कि नहीं ? “ मैंने कनखियों से उनके चेहरे का बदलता रंग देख फटाक से फ़ुरसतिया दाँव फेंका “  अरे यार, इतने सालों से तो गुलामी कर रहा हूँ, कुछ तो कंसीडर किया करो “ यह दाँव फ़ुरसतिया युग का होगा, फौरन ख़ारिज़ हो गया, “ कंसीडर कर लूँ, ताकि तुम जो है, आज़ादी के ख़्वाब देखने लगो ? “ अब देख ले भाया, इतनी देर में ही इनकी सोहबत बिगड़ कइसे गयी, कंम्प्यूटर पर तो मेरा कब्ज़ा था । आज ही से ब्लागिंग बन्द !

चिट्ठाजगत

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27 August 2008

अहो… तो आज टिप्पणिये बंद है !

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वाह भाई, क्या नज़ारा है….. तू रूठा रहे, मैं मनाता रहूँ…  तो मज़ा जीने का और भी आता है ! अय हय, अरविन्द भाई.. एकदम्मै से भभक पड़े.. अभी क्लिनिक से लौटा तो देखा, कि एक सार्थक ’ क्वचिदन्यतोअपि...’ चल रही है । देखा तो ज़ाकिर भाई भी कतार में खड़े गा रहे हैं..’आपने याद दिलायाऽ ऽ..तो मुझे याद आया ’ आनन्दम आनन्दम, जय हो भोलेनाथ त्रिपुरारी.. बोल बम्म

                                                   binavajah3

इधर स्साला मँईं बी बिज़्ज़ी रहा और.. अरॆऽऽ हः ,ऊ क्या बोलता कि लीखने ऊखने का जइसे मनइच नॆंईं करता ! लीखने का नॆंईं तो पढ़ने का.. कुच्छ तो करेंगा न बाबा… खाली पीली अक्खा टाइम का क्या करेंगा, मैन ? सो हम लेरका - लेरकी लोग का बिलाग पढता, जब्बी कोई बिलाग बेलाग किसिम का होता तो टीपता ज़रूर से.. ई तौ अमारा डियूटी है, के नॆंईं ? मँईं तो जिस बी का कुच्छ बी करेगा, जब्बी करेगा तो हार्ट से करेगा, के नेंईं ?  अब्बी हानेस्टी मैनेज़मेन्ट का ऎडमिशन कानपुर में ई लेंगा, के नॆंईं ?

हुआ क्या कि मई महीने में पंडिताइन को विस्फ़ोट पढ़ने को मिल गया, और काउंटर विस्फ़ोट मुझ पर हो गया । ऎई सुनो.. अब तुम मुझे कंम्प्यूटर पर दिखना नहीं, कब अकल आयेगी तुमको ? हाँ नहीं तो.. एक से एक चीज़ बना बना के खिलाती हूँ, इसलिये नहीं कि रात रात भर जग कर गूगल की गुलामी करो । विस्फ़ोट नहीं पढ़ा होगा ना, तुमको हर जगह चँगू मँगू ही मिलते हैं, हुँह.. लगे रहिये.. जमाये रहिये, मुझी से सुन लिया करो, हुँह..फिर सड़क के एक कुत्ते को देख न जाने क्यों शरमा गयीं, यह तो चोखेरवालियाँ ही बता सकती हैं… या आपकी गैर-जागरूक घरैतिन । पूछ सके तो पूछ । अब, आगे बढ़ें ?

रात मॆं, थोड़ा नरम पड़ी.. ज़्वालामुखी कुछ कुछ सूरजमुखी फ़ेज़ में एन्टर हो रहा है..क्वेरी,  वो क्या कहते हैं, जिस पर तुमलोग लिखते हो ? पता नहीं.. । ऊँउँहुँ बोलो तो सही, एक बात है । डोमेन.. चिहुँक कर देखा, अविश्वास से बोलीं.. डोमेन क्या नाम हुआ भला ? एक संशय.. जैसे उठता सा दिखा, कि मैं पहले ही  हँस पड़ा.. हा हा हा, रात भर डोमिन के साथ ही तो बिताता हूँ ! मज़ाक छोड़ो..कहाँ मिलता है ? सहारागंज़ में ढाई-तीन हज़ार लगेंगे । बऽस्स, निराश हुईं, इससे भी कहीं स्टेट्स बनेगा ? बेचारी सोच रही हों कि 20-25 हज़ार की चीज हो, तो ठसके से अपनी किटी पार्टी में बतायें, कि मेरे हस्सबैंड का वेबसाइट है..

तीन-चार दिन से पूछा जा रहा था कि यह बरात की घोड़ी जैसे क्यों कर रहे हो ? कुछ लिखते क्यों नहीं, कब तक बेचारे फ़ुरसतिया तुमको हुर्र्पेटते रहेंगे ? डोमेन तो रिलीज होने दो । अभी भादों है, नयी चीज नहीं लेते हैं । वाह रे पंडिताइन.. पहले न समझ में आया था कि मुआ यह करमकल्ला भी भादों की फसल है, और मैं कोई सेकेन्ड हैंड भी नहीं हूँ..

सुबह पहुँचा चिट्ठाजगत पर.. देखा लेट चल रही है.. क्या पता कब आये ? किसी लिंक से सुराग मिला, चलो बतकही में शामिल हो लें.. बाप रे, चुहिया सी पोस्ट और लंगूरी लंबाई की टिप्पणी कतार, भाभी-देवर और गुजरात मालवा दर्शन कर के लौटा तो मिल लिये ’ क्वचिदन्यतोअपि...’ पढ़के एक टिप्पणी भी टपका दी, मालूम न था कि पोस्टिया में इतनी आग है । सो, डाक्टर आज तो तुम एक बिखरे मित्र को मान देने गये थे और फँसा पड़े अपना ही टेंटुआ । अरविन्द साहब से कुछ मुद्दों पर पंखा कूलर लगाना पड़ा था.. किंतु मेरे मतभेद विचारों और एकांगी निष्कर्षों पर ही टिके होते हैं । क्या लेना देना इन बातों से कि अगला नाटा है, मोटा है, खरा है, खोटा है, कंज़ा है, गंज़ा है, धोती है, कुर्ता है । लेकिन दूसरी फेरा में लोगों की प्रतिक्रियायों को देख कर मन व्यथित च पीड़ित होता भया । आज हम भी टिप्पणी तो नहियें देंगे, और पढ़ेंगे भी नहीं..

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बैठे छाती पीटेंगे, क्योंकि मेरा मयख़ाना ही बंद है, आज टिपियाने लायक पोस्ट भी एक से बढ़ एक हैं, ऒऎ रब्बा हुण की कराँ

अरविन्द भाई, मेरा खली एकदम गुस्से में है,किसके ऊपर छोड़ना है..जरा बताओ तो ? ये सब रस निचुड़े रसिक हैं,समझो कि टें ! बड्डे बड्डे लेवेल की बातें हो रही हैं, मेरे को तो लगे कि आभिजात्य तो हावी है, किंतु ख़ानदानी आभिजात्य का नितांत टोटा है, यहाँ । भाई, मेरे बाबा परबाबा अपनी ज़मीनी सच को चरितार्थ करते हुये तश्तरी में उड़ेल उड़ेल सुर्र सुर्र – सुड़ुक सुड़ुक  चाह पीते रहे , जबकि क्या ज़ुबान थी और ग्रंथों पर क्या पकड़ थी, सो मैं ज्ञान की सरलता और विनम्रता से अपरिचित भी नहीं हूँ । अब क्या कहें ज्ञानजी को, जो उछल उछल कर झाड़ पिला गये कि “ अभिजात्य अभिजात्य रहेंगे और प्लेबियन (plebeian) प्लेबियन। “ अब क्या कहें, गुरु हैं तो इनकी गुरुडम भी झेल ही लेंगे, यदि इनका पांडित्य मुझे हिंदुस्तान में इनका मूल सोदाहरण समझा दे । ई ससुर प्लेबियन के समधियाने का पता अब गुरु भी न बतायें तो क्या गोविन्द बतावेंगे ? हम तो पूरे चिट्ठाजगत को ज्ञानजी का जजमान समझते हैं, मुकर जायें, ई और बात है । क्या साबित करना चाहते हैं लोग अपने को ?

                         binavajah2 binavajah1

 

टिप्पणियों पर, या उसके आदान प्रदान से तो मेरा कोई विशेष सरोकार नहीं ही रहता । पोस्ट है.. खेत की, टिप्पणी आयी खलिहान की ! तेरा मर्म न जाने कोय ! एनिमल क्रुयलिटी की बात की जा रही है, टप्प.. तन्मय शीघ्र स्वस्थ हों । भारतीय किशोरों में मीडिया फ़्रेंज़ी से उपज रही राजनैतिक सोच की कट्टरता अनुपम को इन्सेक्टिसायड पिलवा देती है.. चार ठईं मूड़ हिल गये ’ क्या कहा जाये.. बड़ा ख़राब ज़माना है । ’ वकील साहब बिलबिला दिये कि काला कोट को सिरे से उड़ा दिया जाय । मित्र होने का दम भरते हैं, सो आप कहो तो, कालाकोट क्या, अपना मूड़ ही सिरे से उड़ा  देंगे । अउर हमारा मूड़ पिराने लगा, ’ ये कहाँ आ गये हम.. सरे राह चलते चलते.. ! ’ घंटे भर बाद देखता हूँ, कि वह अपनी टिप्पणी ही ज़ेब में समेट कर ले गये । इस तरियों कुछ भी डिलीट करने या करवाने से ही लेखक को शायद इलीट का दर्ज़ा मिला करता होगा । हमें तो कोई इलीट कह दे, तो मुझे ज़मीन से ऊपर उठ जाने की आत्मग्लानि तो कहीं का न रखेगी । मुझे जन व ज़मीन ही भाते हैं । तभी मैं विदेश से भाग आया.. भात दाल हाथ से सान कर न खाया, तो क्या जिया । फिर पान के लिये भटकना..

                                                 kilroy_boy_e0

फ़ुरसतिया गुरु परेशान हो रहे होंगे, लंबी पोस्ट का रिकार्ड न तोड़ दे यह डाक्टर बकलोला, सो स्वामी-चरित्र पर फिर कभी !

सूचना – आज दिनांक 28/8 को विशेष माँग पर फोटूओं को लिंकित कर दिया है । जिन बहन और भाईयों को देखना हो, वह अपनी पसंद के फोटू पर माउस ले जा कर किल्कित करें अउर बड़का फोटू देखें । व इसे बंदरवे को सबसे ज़्यादा हिट मिला है

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18 August 2008

मुझे इतना ज़लील भी न करो.. बेटों

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अरे यह शीर्षक कैसे चला गया ? यह तो मैंने सहेज़ कर किसी और पोस्ट के लिये रख छोड़ा था । चलिये.. भगवान की मर्ज़ी या मेरे अवचेतन का चोर ! बचपन से घुट्टी पिलायी गयी है.. जो होता है, अच्छे के लिये ही होता है । सो, इसी को चलने देते हैं !

लोगों के मेल आ रहे हैं, सक्रिय नहीं हूँ । तो, भाई क्या करें ? मुलुक की सक्रियता तो दूसरे पाले में बैठी ठेंगा दिखा रही है । तो हम उसके अपने पाले में आने का इंतज़ार ही तो कर सकते हैं ? सो विकास के प्लेटफ़ार्म पर टहलते हुये देख कर भी, यदि मैं आपको निष्क्रिय लगता हूँ, तो लगा करे ! अरे कुछ नहीं तो, इस वेबपेज़ को ही निरख लीजिये, भाई..कितने ईंट रोड़े बटोरे हैं !

                                                                  mail (4)

सोचा कि पन्दरहा अगस्त पर कुछ लिखूँ, अच्छा अवसर है.. देश के लिये, भारत माता की लुटती अस्मिता पर चिन्ता जताने वालों में अपना भी नाम दर्ज़ करा लूँ, लेकिन… ? यही तो मेरी तक़लीफ़ है कि सोचता ही सोचता हूँ, करता कुछ भी नहीं । चाय पी कर चायवाले को पैसे देने में जितना भी समय लगता है, उसका सदुपयोग सोचने में ही करता हूँ ! यह कोई कम है, क्या ? सोच लेता हूँ.. वह भी आलू, टमाटर, बैंगन, करेले के भाव पर नहीं, बल्कि देस-मुलुक के हालत पर.. यही क्या कम है ? वरना यहाँ तो 88 फ़ीसदी पब्लिक तो सोचने लायक भी न रही । अपने को ज़िन्दा रखने की, होः तूऽऽ तू.. चल्हः कबड्डी कबड्डी कबडी कबडी कबडि कबडि बडि बडि बड्डिः बड्डिहः हः हः …में हाँफ कर जैसे तैसे साँझ ढले अपने पाले में लौट गुईंया संग लेट लेते हैं । सो, सोचने का चारज़ आजकल हमईं लोगन के पास है, उनके बिहाफ़ पर सोच लेते हैं, चिन्तित हो लेते हैं । और क्या चाहिये ?

पंडिताइन थोड़ी चिन्तित भाव से पूछती हैं, “ ऎई, कुछ लिखोगे नहीं.. देखना सबलोग पंद्रह अगस्त पर कितना लेख-ऊख लिखेंगे, और तुम रोज़ खटर पटर करते रहते हो.. यह नहीं कि कुछ लिख ही डालो । अब नाटकीय हुये बगैर, मेरी गुज़र नहीं.. सो, जो आज्ञा, चोखेरवाली-सखी ! फिर भी मैं अपना झोला-पिटारी टटोलता हूँ, कि शायद कुछ आफ़-बीट हाथ ही लग जाये ? देखते हैं !

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वह चीख उठी, “ पवित्र-पावन पर्व पर.. मुर्दाबाद ? हे भगवान, इस आदमी को हो क्या गया है ? “ क्या बवाल है, भाई.. मेहरिया से दोस्ती, समझो जी का ज़ंज़ाल ! ऎ भाई, बोलना मत बीच में, पूरा नहीं हुआ है, दूसर के लुगाई से दोस्ती, समझो आँधी भूचाल ! सोचा, थोड़ा खीझने की होती है, “बोला था न कि, हमरे बिलागींग को न भड़काओ.. अरे मनगढ़ंत फोटू थोड़े ही है, यह ? न ही ‘पाकिस्तान से आयी है’ का डिस्क्लेमर लगाया है । यह तो ख़ालिस अपने देश की छाती चीर कर चलती हुयी भारत की जीवनरेखा जी.टी. रोड पर ली गयी है ।  अरे यार.. वही जी.टी.रोड जो शेरशाह सूरी बनवा कर, हमारी गौरमिन्ट के लिये सिरदर्द छोड़ गया, जो इसके रखरखाव में ही काँख रही है । यह हमारे मुलुक की अर्थव्यवस्था का अनर्थ करने का अंतर्राष्ट्रीय षड़यंत्र करार दिया जाता, अंग्रेज़ इस रास्ते से सोना ढो कर ले गये, वो अलग ! उस ज़माने में सी.आई.ए. या आई.एस.आई. न होने का अफ़सोस भला किस पार्टी को न होगा । ई बिलागींग बड़ी बेलाग चीज़ होती है, यारों.. बेलाग = बेलागिंग = बेलगाम ~~.आगिंग !

सो हम बेलगाम हुई गये थे । तोऽ.. फोटो खींचा गया, मुनमुन  ( मेरी बेटी ) के कोडक हाटशाट से । ना, ना.. हाटशाट की वजह से यह हाट नहीं है, न ही कोडरमा के पास के गाँव के मंदिर की दीवार पर उकेरे जाने से, और ई मुर्दाबाद – ज़िन्दाबाद तो भाई गाँधी-ज़िन्ना की विरासत है, सो हमलोग इसको आगे नहीं बढ़ायेंगे, तो क्या हमारी आईपाड  पीढ़ी इसको संभालेगी ? उसने तो एक आसान रास्ता खोज निकाला है, जो अच्छा न लगे.. असहमत हो.. ज़्यादती हो गयी…  पेरेन्ट आउटडेटेड हैं…  बस, शिटशिटा के विरोध कर दो..ओहः शिट यार ! इतिश्री, और  सुनाओ ! सुनायें क्या, कद्दू ? आज तो जैसे इस कीबोर्ड से शिट ही निकल रहा है !

तो, मित्रों.. मैंने जानबूझ कर इस भित्तिलेख के मज़मून को धुँधला कर दिया है, क्योंकि यह हमारी व्यवस्था के शिट को दिखाय रहा है, सामाजिक न्याय माँग रहा है, माल पेलते नेतृत्व से ज़वाब तलब कर रहा है..काहे भाई, ई तो पन्द्राह अगस्त का 61वाँ है !

ई तो राधिका परसाद मास्साब रटा गये थे कि 14 के बाद 15 ही आता है । अब देखिये, कि 14 को एक देश आज़ाद हुआ, पता नहीं, अंगेज़ से कि हिन्दुस्तान से ? लेकिन ऊहाँ राजगद्दी हुई गयी, सो बाकी बचा भी स्वतंत्र घोषित किया गया.. औ’ विश्व में देखा गया एक अद्भुत व्यायाम.. नायक बोला – प्रसन्नचित्त… जनता झूमी – अहा हा हा हा , प्रसन्नचित्त…  अहा हा हा हा ! तिस पर भी आप सब 15 अगस्त पर ईहाँ अच्छा ख़ासा रो गा गये ! जाओ.. देखो जाके, अगड़म-बगड़म पुराण में लिक्खा भया है.. मौत औ’ मार्केटिंग से कोई सयाना भी नहीं बच सकता, तो हम ही काहे को इससे बचने का कलंक लें ? तब के गद्दीनशी़नी की मार्केटिंग  आज तलक चल रही है, सत्ता  एक ऎसा ही अनोखा ब्रांड है, यारों ! 15 अगस्त.. अहा हा हा हा, स्वतंत्र हो..अहा हा हा हा

दोस्त लोग इस मुबारक मौके पर बिसूर रहे हैं, यह उनकी सोच और किस्मत । मैं तो अपने ‘ अहा हा हा हा ‘ के साथ रात के अँधेरे में, चुपके से सुतंत्र भारत माई के पास पहुँचा कि जन्मदिन की बधाई दे आऊँ । हे राम, यह क्या ? वहाँ सचिवालय पर तो जगमग रोशनी और यहाँ टिमटिमाते ढिबरी का अतिमंद प्रकाश ! माई पड़ी कराह रही थीं.. चौंका..”माई क्या हो गया ? “ माई ने मुँह ढके ढके उत्तर दिया, “ पता नहीं, बेटा.. बहुत दर्द  हो रहा है । “ अरे कहाँ दर्द हो रहा है, यह तो बताओ ? माई तो उल्टे तैश खा गयीं, खीझ कर बोलीं “ कहाँ कहाँ बताऊँ ? सिर से पैर.. कश्मीर से कन्याकुमारी तक की रग रग दुख रही है । “ फिर अचानक उनके अंदर की माँ चैतन्य हो गयीं, संभल कर उठने का प्रयास करते हुये प्रतिप्रश्न किया “ और बता.. लड्डू वड्डू खाये कि नहीं ? अरे पगले मेरी सुध काहे ले रहा है ? जब से बहाल हुयी हूँ, सब मेरा डिमोशन दर डिमोशन ही तो करते आ रहे हैं । चलो, अपने ही बच्चे तो हैं.. मेरा क्या ? मेरी तो बहाली के 61 पूरे हो गये.. बीमार भी चल रही हूँ…  मुझ बीमार को अब और इतना ज़लील भी न करो, बस  62 में मेरी बची खुची इज़्ज़त के साथ मुझे रिटायर करवा दो ,और अब नूतन माई लाने की जुगत करो,मेरे बेटों ! उनको मुझ लाचार को एक्सटेंसन में मत घसीटने देना । जाओ.. मेरी तरफ़ से  सबको बोलना जय हिन्द !

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ladywinks कहीं कुछ गलत तो नहीं लिख गया ? ढेर सारे स्वर उठे हैं कि मैं तंज़ में लिखता हूँ । क्या ऎसा है ? तो, होने दीजिये कौन मैं रोज़ रोज़ लिख ही पाता हूँ ? आज यथार्थ और व्यंग दोनों इस कदर घुलमिल गये हैं कि उनको अलग करके लिख पाने की विद्वता मुझमें तो नहीं है । ज़बरन आप सब के बीच में घुस जाने से ही क्या होता है ? आप सहनशील देश के नागरिक हैं, सो मुझे भी सह लीजिये । रख़्शंदा को इस तंज़ से तंज़ीदगी है.. तो रख़्शंदा, तुम्हें मालूम हो कि मैं तंज़ानिया के पासपोर्ट पर इस मुलुक में रह रहा हूँ । अब मेरा पासपोर्ट तो बदलने से रहा, भले ही किसी दिन एक्सपायर हो जाये.. वह अलग बात है, देखेंगे ! 

इससे आगे

09 August 2008

नारी – नितम्बों तक की अंतर्यात्रा

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कल अनूप भाई का  उलाहना पढ़ा चिट्ठाचर्चा पर, सक्रिय रहने की सलाह भी नत्थी थी । अनूप भाई का मैं आदर करता हूँ, वैसे तो अनादर भी किसी का नहीं किया करता । यह तो अपने विनम्र होने की परंपरा में कहा जाता है, सो कह रहा हूँ । वैसे आप इसको अपने लिये सीरियसली भी ले सकते हैं । उन्होंने दो कदम आगे बढ़ कर मेरे सहज और चुटीले होने की सूचना भी दे दी । अनूप भाई को मैं ब्लागिंग में आदर्श मानता हूँ, सो मैं गौरवान्वित होता भया, आभार !

सहज तो समझ में आता है, क्योंकि मैं साहित्य मेरा विषय नहीं रहा।साहित्य व्यसनी होना अलग बात है, साहित्यकार होना अलग..वैसे ही जैसे कि शराबी और डिस्टलरी का होता होगा । दशहरे पर एक लेख लिखा था, आठवी कक्षा में... और यह लेख जैसे मेरा काल बन गया । मेरे हिंदी आचार्य जी, जिनको हमलोग अचार-जी भी पुकारते थे, पंडित सुंदरलाल शुक्ला ( यहाँ भी एक शुक्ला ! ) ने मुझमें साहित्यकार का कीड़ा होने की संभावनायें देख कर, इतना रगड़ना इतना रगड़ना आरंभ कर दिया कि आज तक इंगला-पिंगला, मात्रा-पाई, साठिका-बत्तीसा के इर्द गिर्द जाने से भी भय होता है । निराला की ' अबे सुन बे गुलाब 'जैसी अतुकांत में भी वह ऎसा तुक ढु़ढ़वाते कि मुझे धूप में मुर्गा बन कर पीठ पर दो दो गुम्मे वहन करना कुछ अधिक सहल लगता । बाद में तो खूब जली हुई, झावाँ बनी तीन चार ईंटें मैं स्वयं ही चुन कर, क्लास के छप्पर के पीछे एक गुप्त कोने में रखता था । ये ईंटें हल्की हुआ करती हैं, और घर पर गृहकार्य करने में समय खराब न कर उतने समय तक मुर्गा बने रहने का अभ्यास मैं पर्याप्त रूप से कर चुका था, सो कोई वांदाइच नहीं के भाव से नाम पुकारे जाने पर लपक कर दोनों हाथ में गुम्मे लेकर उपस्थित हो जाता । ज़ेब में साप्ताहिक हिन्दुस्तान का एक बड़ा पन्ना मोड़कर रखता, जिसे बिछा कर कोनों को पैर के अंगूठे से दबाकर मुर्गा बन जाता, और झुका हुआ पढ़ता रहता । अब बताइये ब्लागर पर ऎसी साहित्यसाधना कितने जनों ने की होगी ? खैर..मैंने तो शपथ ली कि अब से नकल नहीं टीपूँगा। लोगों की अपेक्षायें बढ़ जाती हैं...और आप फिस्स हो जाते हैं । मैंने वह लेख साप्ताहिक हिंदुस्तान के विज़यादशमी विशेषांक से टीपा था और बिना कुल्लु की भौगोलिक स्थिति जाने, मेले का आँखों देखा पूरा वर्णन कर दिया । गुरुजी ताड़ गये और मुझ गरीब को पकड़ लिया, बाद की रगड़ाई-आख्यान तो आप फ़्लैश बैक में देख ही चुके हैं ! फिर भी मैं उनका हृदय से आभारी रहूँगा, शब्दों के चयन की सीख वह मेरे मिडिल पास होने के बाद भी देते रहे ।
 

फिस्स के हिस्स्श में पिन और गुब्बारे की बातें होने लगती हैं और जैसा कि होता आया है... लंबी रेस का मरीज़ फिर मरीज़ नहीं रह जाता । वह तीन चार डाक्टरों के कान काट कर अपनी ज़ेब में रखा करता है । तो पाठक ही क्यों अपवाद रहे ? खास तौर पर जब वह यह तीसरी किताब में पाता है कि ' भईय्या पूरी किताबिया पढ़ लेना ' की याचना में लेखक विज्ञ पाठक, विज्ञ पाठक घिघियाये जा रहा है, तो मेरे जैसे टुच्चे पाठक को यह गुमान होना स्वाभाविक ही होगा कि जब पाठक ही विज्ञ है, तो वह लेखक अविज्ञ को क्यों पढ़े ? तो तय कर लिया कि हम स्वालंबी बनेंगे... कम से कम अपने पढ़ने के लिये तो, स्वयं ही लिखा करेंगे और... चरखा-तकली, ओहहो.. पेन पैड ढूँढ़ा जाने लगा । कहानी... ऊँहुः भाई, देख अंकल को लैटर डाल दूँगा ! मेरे कक्षभागी ( मतलब रूम पार्टनर मित्रों... देखो मैंने एक दूसरा शब्द भी गढ़ लिया, श्रेय आपै लोग बाँट-खूँट लो ), हाँ तो मेरे कक्षभागी महोदय धमकाते, बल्कि किचकिचा उठते साले.. डाक्टर बनने आया है कि गुलशन नंदा बनने ? उनकी दृष्टि में गुलशन नंदा एक महान लेखक थे.. जो बिकता है, समझो वही लिखता है ! बात दीगर है, कि वह स्वयं भी तीन चार ' मस्तराम '  लिख कर चुपचाप रामनारायण बाज़ार में देकर छपवा-वपवा कर दो-ढाई सौ रूपये भी ला चुके थे, लीक होते ही मैंने पकड़ा, ' अब बोल अशोक, तू लेटर लिखता है..कि मैं चाचा जी को लिखूँ ? ' बेचारे ढीले पड़ गये..देखो मैं तो एक घंटे में लिख लेता हूँ, और तुम एक कहानी में एक महीने लगाओगे, दस बार लिखोगे, पाँच बार काटोगे और फिर कोई भरोसा नहीं कि फाड़ ही दो, यह तुम्हारा बड़ा ही टाइम-कन्ज़्यूमिंग चोंचला है ! फिर होना क्या था.. तू-तू , मैं-मैं और सीज़फ़ायर, बोलचाल बंद, एक चुप हज़ार चुप !

इतने में अचानक मेस बंद हो गया.. महीने का आख़िर, गुट्टैय्या के ढाबे कब तक उधार खिलाते ? सो, मैं कमरे में ही कुछ बना बुनू लेता था, फल और दूध तो मुझे इतना प्रिय है कि हफ़्तों उसी पर खुशी खुशी काट दूँ । बेचारे अशोक जी थे रोटी-चावल प्रेमी, तीन चवन्नी उछाल कर ढाबे पर चार या पाँच रोटी मिल जाया करती थी, सब्जी चावल
कमरे में, सो अशोक जी झुक गये । तय हुआ कि मैं कविता लिख सकता हूँ और वह तब तक बरतन साफ़ किया करेंगे, बेचारे मस्तराम ! एक-दो बार जबलपुर हो आया था, और वहाँ एक विचित्रता पायी कि नर्मदा झील के मल्लाह तुकबंदी में बातें किया करते थे । बाज़ार में भी कई ऎसे ही महानुभाव दिखे । सोचा कि चलो, कविता ही लिख लेते हैं ।

लेकिन हिंदी में कविता लिखने से अधिक आसान मुझे बरतन साफ़ करना लगता था । एक तो ‘टहनी पर टँगा चाँद ‘ मेरे समझ में तो नहीं आता.. भाई साहब, जरा अपनी पोज़ीशन और एंगल बदल लो, चाँद तो बादस्तूर आसमान में ही बरामद होगा ।  दूसरे कि दो तीन लाइन लिखते ही पंडित सुंदरलाल की हृष्ट-पुष्ट काया आँखों के सामने खड़ी हो जाती थी, लाल लाल आँखें लिये, मैं सहम कर मात्राओं के अंकगणित को समेट कर अलग रख दिया करता था । अंग्रेज़ी में Oh, kanpur.. I love you..Still I hate you  और yes, I am a fab...I crack a joke or two.. But knows the few सरीखी बचकानी कवितायें छपी भी.. अरे बाप रे, मैं तो यहाँ जैसे आत्मकथा ही लिखने लग पड़ा। कहाँ की बातें कहाँ ?

                                                                                                                                                          होरे राम होरे राम, होरे राम... हरे हरे ..
अनूप भाई की दूसरी बात पर.. तो, भईय्यू, एक चुटीला दूसरे को चुटीला कहे, तो इससे चुटीली बात और क्या हो सकती है ? और, देखिये तो अनूप जी को, कि कितने महीन तरीके से उन्होंने चिट्ठाचर्चा-पंचायत के मंच पर लाकर मुझको पटका है, कुछ लोग उल्टी गिनती गिन भी रहे होंगे कि लिखूँगा कि नहीं लिखूँगा । बालाओं ने फूल की पंखुड़ियाँ तो न ही तोड़ी होंगी, लिक्खेगा, विल ही राइट...नहीं लिक्खेगा,विल ही नाट राइट, क्योंकि मैंने छाँट कर प्रोफ़ाइल में अपनी एक भद्दी फोटो लगा रखी है, दरअसल मैं तो इससे भी ज़्यादा भद्दा हूँ । डर जाओगे, आप लोग !

सो, अनूप भाई मेरे मन में चल रहा था कि यदि सभी लिखने ही लग पड़ेंगे, तो पढ़ेगा कौन ? नतीज़न आपस ही में पढ़- पढ़ा कर हाँज्जी हाँज्जी होता रहेगा, फिर तो भविष्य चौपट ही समझो । एग्रीगेटर ने सूचना दी..इन्होंने यह लिक्खा - हाँज्जी, लपक पड़ो - हाँज्जी, शीर्षक यह है - हाँज्जी, कैची है यह -  हाँज्जी, रुतबे वाला -  हाँज्जी, दरियादिल है - हाँज्जी, टिप्पणी देगा - हाँज्जी.. सो, यहाँ पर हाँज्जी महोदय हमको बरजने लगे । यह हाँज्जी गण मुलुक को किस दिशा में हँका रहे हैं, यह तो यहाँ तक भूला भटका आया हर पाठक जानता ही है । इस हाँज्जी में मुझे असहमत होने की गुंज़ाइश तो दिखती ही नहीं ? यह निश्चित रूप से अस्वस्थता का संकेत है । मित्रों के सुझाव और  अन्य पाठकों की असहमति आपको आगे बढ़ने का बल देती है, बशर्ते अगला अपने अहं को परे रख इसे स्वीकार करे या तो अपना दृष्टिकोण स्पष्ट करे, ताकि दूसरा भी अपने अंधेरे से बाहर निकल तो सके । तभी हिंदी माता स्वस्थ होंगी, अन्यथा…

उनको चरपईय्या पर लिटाये के करो कुछ और जयकारा लगाते रहो हिंदी माई की, ताकि दुनिया यही समझे कि हिंदी के सपूत अपनी महतारी के हाथ-गोड़ मींज रहे हैं । अब महतरिया इत्ते सालन मा भी उठ के खड़ी नहीं हो पा रही हैं, तो ई सपूतवे कोनो कपूत थोड़े हुईगे ? सट्टीफ़िक्केट ईश्य्यूड, डिराइंग-रूम की शोभा में इज़ाफ़ा, अउर छुट्टी राम छुट्टी ! रेडियो सीलोन कभी बहुत सुनाया करता था.." मस्तराम बन के ज़िंदगी के दिन गुज़ार दे... । अब का करें, ब्लागर पर आकर हमको वही याद आरहा है..मस्तराम बन के ब्लागिंग के दिन गुज़ार दे...

महबूबा की गली से रूसवा होने पर भी उसकी गली किसको न याद आती होगी ? भई मुझे तो याद आती है..सो, यहाँ बैठ कर HTML कोड्स से खिलवाड़ किया करता हूँ, बिगड़ता है, तो बनता भी है औ’ इस तरह मेरे ब्लाग्स अपना रूप बदलते जा रहे हैं । मन को और पंडिताइन को समझा लेता हूँ कि यह भी एक तरह की सृजनात्मक विधा है, भाई ।

श्री अनूप शुक्ल ' फ़ुरसतिया ' रही बात  ज्ञानदत्त जी की… रुकिये, पहले आब्ज़ेशन ओवर-रूल करा लूँ !  श्री ज्ञानदत्त पाँडेय ' हलचल  'भाई लोग भड़क तो  नहीं रहे कि  नारी नितम्बों का साइनबोर्ड लगा कर बटोर तो लाया.. अब अलाय बलाय पढ़ा रहा है , तब से ! डाक्टर पता नहीं यहाँ असली नितम्ब-शो कब शुरु करेगा ? करेगा भी कि नहीं ? या मँजे मदारी की तरह काला जादू देखने वालों की भीड़ बटोर बतकही करता रहेगा ? अउर अब ज्ञानदत्त जैसे रीताव्रता को कहाँ नितम्बों में घुसेड़े दे रहा है ? बस दो मिनट, कद्रदान..यहीं से तो अनूप जी की भूमिका शुरु हुयी थी.. तो, एलर्ज़ी जैसी कोई बात नहीं है । ज्ञानदत्त जी से तो मेरी कभी मुलाकात तो क्या बोलचाल भी नहीं हुई है । लेकिन गुरु-गोविंद दोऊ खड़े..तो पहले किधर जाओगे ? हर कोई शिवकुमारिया सुदामा तो नहीं है कि गुरुवे को ठेंगा दिखा दे । शुरुआती दिनों में, मेरी परेशानी भाँप उन्होंने ही मुझे बरहा का लिंक पकड़ाया था, बाद में आपको पढ़ा तो लगा कि अपनी भाषा के ब्लागिंग में भी उत्कृष्टता की संभावनायें हैं । अब गुरु और गुरुवर में किसको पहले देखें  ? हम डिक्लेयर करता हूँ कि ज्ञानदत्त इज़ प्रोटेक्टेड नाऊ !

और ज्ञानदत्त जी तो मूलतः बहुत ही निरीह चीज हैं, जिसमें सहज हास्यबोध न हो उसे मैं निरीह ही कहूँगा । बुद्धिमता और जागरूकता दर्शाने के अतिरेक में वह फँस ही गये थे, बाकी कसर ई ससुरी हाँज्जी हाँज्जी पूरी करती रही ।लेकिन खिचड़ीभोजी बेनाइन ( निस्पृह ) मनुष्य हैं,...उनका न सही पर खिचड़ी का तो लिहाज़ करिये । हारी बीमारी कड़की उधारी में एक वही काम आती है । सो, ज्ञानदत्त जी को न गुदगुदाइये जाकि छूछी हास । सो, मुझे लग रहा था कि वह यदि गुदगुदाहट फ़ील ही नहीं कर रहे, तो क्यों गुदगुदाया जा रहा है, ऎसे में तो किसी के भी आँसू निकल आयेंगे। एक बात और..मौका है, मुहाल है, सो बोल ही दूँ .. 
अरविन्द जी, नारी के सौन्दर्य सौष्ठव से इतने चमत्कृत हैं कि उन्होंने उसके नितम्बों को भी नहीं बख़्सा । ईमानदारी से कहूँ  तो, न मुझे उस पोस्ट में सौन्दर्य दिखा और न ही विज्ञान ! तो क्यों न बोलता ? पब्लिक प्लेस है, भाई... मूतते पकड़े जाओगे तो ज़ुर्माना तो कोई नहीं कर सकता किंतु थुड़ीथुड़ी को भी मत न्यौतो, या फिर अपनी मंशा ही स्पष्ट कर दो । मुझे तो रुनझुन चलत रामचंद्र बाजे पैजनिया के राम के नितम्ब ज़्यादा आकर्षित करते हैं, किंतु उसका वर्णन करने की शक्ति मेरे कीबोर्ड कम लेखनी में नहीं है, सो चुप रह जाने में ही भलायी है, आप भी अपना गुड़ दाब के चुप रहो।

तो.. अरविन्द जी, आप स्वयंभू नितम्ब विज्ञानी हो, जरा अब बताओ 

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थिरकते नित्म्बों का जादू तो मैं विज़ुअल में भी दिखा सकता हूँ, किंतु यहाँ नहीं इस फोटू *** पर क्लिक करके आपही देख लो । भाषा की रवानगी के लिये भदेसपन की ज़रूरत मुझे भी पड़ती है..किंतु गुप्तांगों का उल्लेख ना बाबा ना । नैसर्गिक होते हुये भी उनका वर्णन अश्लील लगता है, तो कोई समझे या न समझे....यह है मेरी नज़रों का कसूर । दकियानूस ही सही !


आख़्रिर मैं भी लगता है कि दीवाना ही हूँ । है ना बंधुगण, क्या आपको अब तक ऎसा नहीं लगा ? फिर छोड़िये चलिये, मैं अपनी बीन अपने थैले में रख लेता हूँ, अनूप भाई ! आप सब को भी नमस्कार !

इससे आगे
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यह अपना हिन्दी ब्लागजगत, जहाँ थोड़ा बहुत आपसी विवाद चलता ही है, बुद्धिजीवियों का वैचारिक मतभेद !

शुक्र है कि, सैद्धान्तिक सहमति अविष्कृत हो जाते हैं, और यह ज़्यादा नहीं टिकता, छोड़िये यह सब, आगे बढ़ते रहिये !

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