जो इन्सानों पर गुज़रती है ज़िन्दगी के इन्तिख़ाबों में / पढ़ पाने की कोशिश जो नहीं लिक्खा चँद किताबों में / दर्ज़ हुआ करें अल्फ़ाज़ इन पन्नों पर खौफ़नाक सही / इन शातिर फ़रेब के रवायतों का  बोलबाला सही / आओ, चले चलो जहाँ तक रोशनी मालूम होती है ! चलो, चले चलो जहाँ तक..

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16 May 2008

जरा सामने तो आओ छलिये .. ..

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अब इन्हें छलिया न कहूँ तो आप ही कोई नाम सुझायें । वैसे तो इनका परिचय  शाह हनुमानुद्दीन के रूप में दिया जा चुका है, पर ये मौके पर हाथ से फिसल जाते हैं नतीज़न इनके इंटरव्यू की तारीख़ दिवानी के मुकदमें की तरह आगे बढ़ती जाती है । ज़ालिम, तुम क्या ब्लागिंग से मेरे उखड़ जाने बाद ही आओगे ? इस माथमंथन की नौबत ही न आती, ग़र मैं इनकी ज़ुस्तज़ू छोड़ किसी हिट होते आदमी को आईना दिखा देता ।smile_embaressed

कल रात की ही बात है, मेरे मित्र मुन्ने उर्फ़ अज़हर खान का एकाएक फोन आया, " अरे यार डाक्टर, अब तुम जम्पिंग ब्लागिंग पर उतर आये हो, आख़िर कौन ज़ल्दी पड़ी है, तुम्हें ? "मैं अचकचा गया, " अमें क्या हो गया मियाँ, और यह जम्पिंग ब्लागिंग क्या बला है ? इसको किस डिक्शनरी से खोद लाये हो, बताओगे ? " वह प्रतिवाद पर उतर आये, "बेट्टा मैं तुमको रेगुलरली वाच कर रहा हूँ, तुम कुछ ज़्यादा ही कूद-फाँद रहे हो ? अरे यार कोई काम का सलीका भी होता होगा कि जब मर्ज़ी जो पकड़ में आ गया, उसीको लेकर ठेल दिया यहाँ ! अब मैं कमेन्ट नहीं कर पाता हूँ तो क्या? " ( मेरा स्वगत कथन - छोड़ो, यह सौजन्य तो अधिकांश ब्लागर बंधु में भी नहीं है, तुम तो महज़ पाठक हो ) मैं-" अब बोलोगे भी मियाँ, क्यों उखड़ रहे हो ? " उनकी आलोचना में मुझे रस आ रहा था, वह भाँप गये । स्वर मद्धिम हुआ, " ट्रैक न छोड़ा करो, एक अच्छी खासी चल रही थीम का कबाड़ा हो जाता है ।"  मसलन ?  मैंने दागा । "अमें मसलन वसलन क्या ? एक दिलचस्प किरदार हनुमानुद्दीन को तुमने अलग टाँग के रख दिया । अब किस भकुये की दिलचस्पी रह गयी होगी कि इन ज़नाब का हश्र क्या हुआ ?"  ( स्वगत- यह किरदार नहीं, बल्कि हक़ीक़त हैं और हस्बे मामूल राँची में कहीं रिक्शा चला रहे होंगे, इनके हश्र को रोने वाला ही कौन है ? ) उधर भाईज़ान चढ़े ही जा रहे  थे, " हिट होने की उतावलनेपन में, आजकल जो भी सामने दिखता है, तुम उसी को पकड़ कर पिल पड़ते हो । ट्रैक न छोड़ो डाक्टर, किसको फ़ुरसत है कि रोज़ रोज़ तुम्हारी एक नयी लंतरानी पढ़े ?smile_nerd

बात में कुछ दम तो है, सब एक दूसरे की पढ़ने में मगन हैं, फ़ुरसत तो शायद  फ़ुरसतिया का पेटेन्ट हुआ चाहता है । ख़ान ठीक कह रहा है, इसको मैं दख़लअंदाज़ी नहीं कहूँगा । मैंने उनको डिसमिस किया, " चलो यार , आज ही निपटाये देते हैं इनको, अब तो ख़ुश ?" और फोन रख के साँस ली Smiley Kiss

पलटा तो देखा कि सामने मेरी ज़िन्दगी का एक शाश्वत दख़लअंदाज़ मौज़ूद है ! पैचान कउन ?  बट नेचुरल पंडिताइन ही हैं, यह इम्यूनिटी उनको ही हासिल है । वह शायद हमारी बातचीत सुन चुकी थीं, सो डिफ़र कर रही थीं । डिफ़र बोले तो डिफ़ेरेंस आफ ओपिनियन ! भले ही एक दो सूत बाँयें दाँयें किसी भी रिलेवेंस को ख़िसका दें, पर डिफ़र करना..असहमत होना, हर ज़ुमला मेरे ख़्याल से के सम्पुट से बोलना इन चोखेरबालियों का जैसे जन्मसिद्ध है ! और यही हुआ, " जब टाइम नहीं है, तो इतना क्यों फैलते जारहे हो ? अचपन पचपन का क्या होगा ? कुछतो उस पर डालो, आज । तुम्हीं बता रहे थे कि अभी टेस्ट पोस्ट है, फिर भी 6 विज़िटर आ चुके हैं, अब तक । न हो तो किसी 8-9 साल पुरानी मैगज़ीन से ही कुछ उठा कर पचपन में डाल दो,ऎसे अच्छा नहीं लग रहा । अब इन दाल-रोटी-चावल ब्राँड को इस हवाई दुनिया के दाँव-पेंच क्या बताऊँ कि यह विज़िटर कोई मेरे पंख नहीं, बल्कि टोही-टटोलू हैं । हमारी इंटरनेट की दुनिया में, बहुतेरे ऎसे धूर्त भी हैं, जिनका काम केवल यहाँ वहाँ टटोलना ही हुआ करता है। Chatterbox

तिरिया से हार मानने का सुख व फ़ायदे कुछ अलग ही हैं, सालिड टर्म डिपाज़िट माफ़िक़ । एक दो बार टेन-लव पर गेम छोड़ दो फिर बाकी उम्र चैन से वाकओवर लेते रहो । चलो आज फिर इन्हीं की मान लो, पचपन के बचपन में ही झाँक लो । ख़ान का क्या बिगड़ जायेगा, भाड़ में जाये ।Praying

वैसे मेरा बहुत मन कर रहा है कि आज रात सुश्री मायावटि को लपेटा जाये । समेट लो अमर बाबू आज इन्हीं को, इनको तुम ही समेट पाओगे । ( यदि दूसरे बंधु भी कतार में हैं, तो अपनी दावेदारी पेश करने के लिये  यहाँ चटका लगायें  ) आजकल सुश्री बहुत चहक चहक कर बहक सी  रहीं हैंBatting Eyelashes

सुना करता हूँ कि कोई मोहतरमा क्लियोपेट्रा हुआ करती थीं, जो गधी के दूध से नहाती थीं, उड़ती उड़ती चर्चा उनके सौंदर्य की भी मेरी जानकारी में आयी है । झूठ नहीं बोलूँगा, मैंने तो उन्हें देखा नहीं । जो देखा नहीं तो मान कैसे लूँ, मैं तो आब्ज़ेक्टिव सांइस का छात्र हूँ । जो देखता हूँ, वही मानूँगा । वैसे देख तो माया जी को भी रहा हूँ, सत्तासुख का निखार चेहरे से फ़ोकसिया सर्चलैट मार रहा है । तबियत खुसकैट हो जाती है, चंदा को देख कर । ऎसा नूर बरकरार रहे, बड़े भाग्य से मिलता है । किसी ज़माने में फोटो स्टुडियो वाले पैसा लेकर भी फोटो खींचने में बत्तीस कोने का मुँह बनाते थे ( अपुष्ट सूत्रों से ) वहीं अब कुमारी श्री के फोटो लेने के लिये बड्डे  बड्डे फोटूबाज़ों में  भी धक्कमधुक्का हुआ करती है । कौन कहता है कि ज़माना नहीं बदला ?  या हमारी नज़रों का ही कसूर हो, कहा नहीं जा सकता ! ऎसे में भला हूर भी कोई चीज़ है ?   लगता है मैं  ही बहक गया । I dont know

लेकिन शायद नहीं, अब देखिये इन्होंने हाथी को पसंद किया । तो अब सभी हाथी देख देख ललचाये जा रहे हैं, तृषित दृष्टि से निहार रहे हैं । इशारा मिलते ही हाथी के पाँव के नीचे भी आने को सन्नद्ध !  कुछेक तो नाँवा लेकर टहल रहे हैं, पता नहीं कब सुश्री का मन बदल जाये । ( बाई द वे, यह हाथी भी तो किसी वर्ण में आता ही होगा, कोई सज्जन जानकारी देंगे ? वाईकेपेडिया में तो नहीं है, नाहर साहब ध्यान दें । खैर, वर्ण वगैरह की बात छोड़िये, अलबत्ता पिछड़ा तो नहीं लगता । देखो, कैसे मदांध डोल रहा है । अभी अभी सूचना मिली है कि हाथी क्रीमी लेयर में रखा गया है, मोटे क्रीमी लेयर में ! महावत गुज़र गया तो क्या, हाथी  भी गया गुज़रा नहीं है । ) माफ़ करियेगा, कुछ ज़्यादा विभोर हो रहा हूँ, बात ही ऎसी है ।

सुश्री जी ने अभी हाल में बीते कल परसों नरसों में अपनी सरकार के जन्मदिन पर करोड़ो लुटा डाले । उसी दिन से सुश्री ने इस पोस्ट की सुरसुरी पैदा कर दी । तीन दिन तक तो पंडिताइन ने दबोच कर रखा, " रानी हैं भाई, वह कुछ भी करें ।" घणी खम्मा अन्नदाता, मैं लम्बी साँस लेकर रह गया । पूरे जोर शोर से समारोह मना, पूछा क्या है भाई ?  फल का ठेला वाला सेब सजाते हुये बगल मुँह करके पिच्च से थूक कर बोला," कुच्छौ नहिं, गौरमिंन्टिया हिट्ट होय गई, वही चिल्लाहट मचाये हैं । बाबूजी सेब तौल दें ?" इतना पूछने के एवज़ में 80 रुपिये किलो का सेब, आरे नाहीं ! ज़शन अपने टशन पर है, बन्देमातरम कहना होगा वाले अंछल-कंछल बिरझ गये वरना उस दिन प्रदेश में सबकुछ मुफ़्त में मुहैया किया जाना था ।Chow time!

ज़िन्दे रह कुड़ी, लक्ख लक्ख पद्धाईयाँ । तेरी और तेरे चमचों की उमर हज़ार बरस होवे । हर वर्ष यदि 85-90 करोड़ रूपिये लुटाती रहीं तो हज़ार छोड़, दहाई बरस में ही शहद की नदियाँ बहेंगी और हर खरा खोटा शुद्ध दूध से कुल्ला करते पाया जायेगा । ठीक कैंदा तुस्सी, ज़िन्दे रह पुत्तर !Birthday Cake

मेरे अंदर बैठे सतत आलोचना ने कुलबुला कर आगाह किया, ' फिर बहक रहे हो, डाक्टर । आख़िर उसने लुटाये तो, तुम्हीं पर ही तो लुटाये । तुम थाली में छेद करने वाली बातें बंद करो । ' मैं अपनी आत्मा कुचल कर बैठ गया । लेकिन कितने देर तक कुचल कर रखोगे ?  ज़्यादा कुचलोगे तो हम भी अपनी सरकार बना कर बैठ जायेंगे । मियाँ की जूती और दुनिया का सिर ! पैसा हमारा और ख़ज़ाना खोल दिया आपने, जन्मदिन के नाम पर, कैसे ? भाई, बड़े बड़े अख़बार तो यही कह रहे हैं कि ख़ज़ाना लुटाया । हमीं पर लुटाया और हमारा ही लुटाया, तो ढिंढ़ोरचियों को क्या तक़लीफ़ ?Tongue

मन रे तू काहे न धीर धरे ?  फिर अंदर से एक चिकोटी आयी, खुल के बोलता क्यों नहीं, कि क्या राजकीय कोष किसी ख़ास दिन ही खोले जाने का प्राविधान है ?  हाँ बहना, ज़वाब दो कि चाहे जितनी भी कल्याणकारी योजना हो, किस प्रोटोकाल से एक विशिष्ट मंच से जतलायी गयीं ? पइसा हमारा और राजनीति तुम्हारी, अंगीठी पब्लिकिया की, और  रोटी तुम सेंको ! और घोषणा करने का सबब ? अच्छा काम चुपचाप भी किया जा सकता है ।Thinking

जनता ? उसकी छोड़ो, यहाँ तो मनचले लौंडे भी बूँदी चाटते हुये  गाते जा रहे हैं, " कसमें वादे, आसुवासन सब घोषणा हैं, घोषणा का क्या.... कोई किसी का नहीं राजाआआअनीति में...सब घोषणा है.. घोषणा से चौंधियाना क्याऽ ..ऽ बड़े शरारती हैं यह लड़के ? हँसी ठठ्ठा में भी सच बोल रहें हैं। मेरा मन हो रहा है, पीछे से पुकार कर कहूँ, " अरे लड़कों, यह चौंध नहीं, औंध है । तुम्हरे बप्पा चिरकाल से औंधे पड़े थे, तो औंधे पड़े रहें ! तुम भी जब पहाड़ के नीचे आओगे तो औंधे हो जाओगे । जो कर रहे हो, मन लगा कर करो, बूँदी मिली है..तो बूँदी खाओ ! इन योजनाओं के ब्लूप्रिंट बनने में ही कितना इधर से उधर हो जायेगा, ख़बरदार सूँघने की कोशिश भी न करना । बूँदी मिली है.. .. बूँदी खाओ Dancing

इस बार अंतर्मन चिल्ला पड़ा, " अमें हद्द कर दिया, बहकने की भी कोई लिमिट होती है, नहीं लिखते तो लिखते ही नहीं ! लिखने लगते हो तो बेलगाम हो जाते हो । क्या सफ़ाई दोगे पाठकों को, तुम्हारा हनुमानुद्दीन आज फिर कहाँ रह गया ? हरिभजन छोड़ के डेढ़ घंटे से कपास ओट रहे हो, यूज़लेसली ! " चिल्ला लो भाई, मैंने तो ईमानदारी से जो मन में आया सो लिख दिया । ब्लगियाना इसी को तो कहते हैं, फिर चिल्लाये क्यों ?Lighting

रहा सवाल हनुमानुद्दीन का ?  तो चिल्लाओ उल्लाओ मत भाई, उसको तो रह ही जाना था । बड़े लोगों के बीच, इस आम आदमी को घुसेड़ोगे तो मुँह की खाओगे । आगे कोशिश भी न करना । हनुमानुद्दीन क्यों नहीं मिलेगा ? सामने ज़रूर आयेगा एक दिन ! पोलिंग वाले दिन लोग उसको पकड़ कर बाहर निकाल ही लेंगे , लगे हाथ तुम भी अपना इंटरव्यू ले लेना । उन दिनों उसकी टी०आर०पी० भी हाई रहती है, लोग पैसे देकर तुम्हारा ब्लाग पढ़ेंगे । माफ़ करना अज़हर भाई, आज तो न ख़ुदा ही मिला न विसाले सनम , एक मौका और दो । नमस्कार ! Wave

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14 May 2008

आओ सखि जरा निन्दिया लें

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दूर कहीं किसीके रेडियो से गाने की आवाज़ सन्नाटे से संघर्ष करके आती प्रतीत हो रही है । नहीं जी, मैं बहरा नहीं हूँ,गाने का प्रतीत होना एक अलग तरह का एहसास है । गाना गाया जारहा है, यह निर्विवादित होता है, धुन भी चिरपरिचित लग रही है, किंतु स्पष्टता के अभाव में, आप गाने के बोल नहीं पकड़ पा रहें हैं, तो इसे क्या कहेंगे ? मन को अशांत कर देने वाली छटपटाहट ! साइडरूम से कुछ खाना खा कर लौटा, तो अनमने ढंग से टी०वी० खोल कर बैठ गया, जरा देखा जाये कि बाहर की दुनिया में क्या चल रहा है ? वैसे टी०वी० में मेरी आस्था न के बराबर रह गयी है, पर कोई और चारा भी नहीं है । ब्लगियाऊँगा तो शायद रात ही न बीत जाये । छोड़ो, सुबह लौटना भी है, अपनी  प्रैक्टिस के  दिहाड़ी  पर !

कल रात से हम तोता-मैना यहाँ प्रवास कर रहे हैं , रायबरेली से तीस किलोमीटर पर  डलमऊ स्थित नहर विभाग के अतिथिगृह  में । गंगा के ठीक किनारे एक ऊँचे टीले पर टिका यह गेस्टहाउस बड़ी शांति देता है, किंतु यह गाना मुझे क्यों अशांत कर रहा है ? दरअसल इसकी धुन व लयबद्धता से यह तो पक्का है कि लता जी का स्वर है, किंतु मुझे उनका कोई ऎसा गाना याद नहीं आता, " Note हम हिंदूस्तान में रहने वालों को..ओऽ ..ऽ, चैन कहाँऽ हाये ए एऽ आराम कहाँ, हम.. हिंन्दस्ताँ में रहने वालों को ओ ओ ओऽ Crying ^"

मैं शर्त लगा सकता हूँ कि ऎसा कोई गाना ही नहीं है, लेकिन इसके धुन से मेरे दिमाग में तो यही बज रहा है, क्या करें ? मेरी बालीवुड एनसाइक्लोपेडिया पंडिताइन मेरी मदद अवश्य करती किंतु वह तो खाना खाकर लौटते ही ध्यानस्थ हो गयी । इस समय वह निद्रायोग में परमब्रह्म से एकाकार होती सी लग रहीं हैं, चलो यह वरदान तो बिरलों को ही नसीब है । मैं  यहाँ  आ गया था कि एक दिन में लगकर अपने सभी ब्लाग्स को रिस्ट्रक्चर कर लूँगा, पंडिताइन का एक शनिवार चुरा लिया था, वह भी उनको लौटा दूँगा । आज सोनिया गाँधी रायबरेली आ रहीं हैं, सो शहर में बड़ी अफ़रा तफ़री रहेगी । यहाँ तो अर्ज़ुन सिंहों की भरमार है, एक ढूँढो तो दस हज़ार मिलेंगे । हर उम्र जाति वर्ण और ओहदे के अर्ज़ुन सिंह, हर गली गली में देखो । वैसे भी फ़िज़िक्स के नियम के अनुसार सोनियाजी के आने पर मैं निष्क्रिय होकर अवक्षेपित हो जाता हूँ, एक किनारे को !

हाँ, याद आया कि दिमाग में 'चैन कहाँ-आराम कहाँ Sad ' क्यों हो रहा है । टी०वी० पर बाहरी दुनिया का हाल देखने की नौबत ही नहीं आयी । यहाँ तो अपने ही घर में धूम-धड़ाम चल रहा है, जयपुर में धमाकों को लेकर । चैनलों की सक्रियता एवं धाक के मुताबिक इनकी गिनती 6 से 8 के दरम्यान डोलती फिर रही थी । एक ज़नाब तो रस्सी पकड़े पकड़े इतनी देर से साँप साँप चिल्ला रहे थे कि साला टीवीए बंद कर देना पड़ा । एकठो निष्क्रिय किया हुआ बम पा गये थे । उसी को उधेड़ उधेड़ पूरे देश को दिखा रहे थे , 65 उजड़े परिवारों की बाइट से आह्लादित एवं बिछोह की वेदना से बिलखती महिला को कैमरेCamera में कैद कर लेने की सफलता से परम उत्साहित । ऎसा अवसर दुबारा नहीं आयेगा, न तो उनके लिये और न उस बेचारी महिला के लिये । कुछ बरबादियाँ अपने को कभी रिपीट नहीं करतीं, न ही मौत दुबारा दस्तक देने आती है । दे आर जस्ट वन टाइम डील !

                            जाने वाले लौट के आ-अमर ्जैअपुर जयपुर-अमर जैयपुर धमाके-अमर

हटाओ यार, अपना मन ख़राब मत करो । यह असहमति की स्थिति मेरे आसपास ही निरंतर क्यों मँडराया करती है ? यह क्या वस्तुस्थिति का अस्वीकार नहीं कहलायगा ? संभालो अपने को, यही सब अपने मन को समझाता मैं गंगा पर बनते पुल को नीम अँधेरे में अनमना निहारता रहा। लौटा कि टीवी बंद न करूँ तो आवाज़ ही कम कर दूँ ,वरना पंडिताइन अपने खर्राटा तप में विघ्न पड़ने से जग गयीं तो इस निशाचर की ख़ैर नहीं

लेटा लेटा चलते हुये कैप्शन देखता हुआ निन्दियाने का प्रयास कर रहा था कि ज़बरन मेरे दिमाग के साथ एक हादसा होगया । सामने स्क्रीन पर स्क्राल कर रहा है, " राष्ट्रपति ने धमाकों की निन्दा की...प्रधानमंत्री ने घटना की निन्दा की... सोनिया ने भी निन्दा की... वामपक्ष ने निन्दा की... विपक्ष ने निन्दा की... इसने निन्दा की.. उसने निन्दा की.. सबने निन्दा की.. बिन्दा ने निन्दा की.. स्वयं निन्दा ने निन्दा की !" हद है भाई !

अब इतनी निन्दा भी ठीक नहीं कि बेचारे हूज़ी फ़ूज़ी के लड़के शर्म से पानी पानी हो जायें । चलिये मान लेते हैं कि बाहर से आये हैं, देन दे मस्ट बी ट्रीटेट लाइक ' देवो भवः '। भर्त्सना करते तो भी गनीमत, उनको छोड़ अपनी ही आधी जनसंख्या इसके मानी न समझ पाती । और यहाँ हर छोटा बड़ा निन्दा पर उतारू ! अब इतनी निन्दा अच्छी बात नहीं है, ' ज़ंग तो नहीं छेड़ाऽ..आऽऽ, दस्तक ही तो दी हैऽऽ ..ऽ, हंगामा है क्यूँ बरपाऽ.. आऽऽ  ऽ , बम ही तो फोड़ी है ' इन्हीं उल्टे पुल्टे विचारों के साथ निन्दिया से बोझिल होती आँखों से यह पोस्ट लिख रहा हूँ कि बाहर के सन्नाटे को भंग करती आवाज़ें आने लगीं.., ' हुँआ हों हों हुँआ हुँआ..हुँआहुँआहुँआ हुँआ हुँआ होंहुँआ ' फिर सहस्त्रों हुँआ हुँआ से रात थर्राने लगी । बहुत दिनों के बाद असली सियार या फिर गीदड़ की आवाज़ सुनी है । शायद वह भी निन्दा कर रहे हैं, या मुझे ललकार रहे हैं, ललकारेंगे क्या भला ? इनकी तो गीदड़भभकी ही सुहाती है । रात के सन्नाटे में या समझो इस समय पूरे देश  में पसरे सन्नाटे में यह इनका समवेत क्रंदन है ।  कहीं मुझे तो नहीं न्योत रहे हैं कि भाई बिरादर तुमने तो निन्दा की ही नहीं सो ' आओ सखे जरा निन्दिया लें ' । उन उजड़े सुहागों और घायलों के तीमारदारों को छोड़ सभी सो चुके हैं । मैं भी जा रहा हूँ लंबी तानने, तुम धिक्कारते रहो या निन्दियाते रहो, नो वन केयर्स यू ब्लडी इंडियन गीदड़्स !        आप सब को भी नाचीज़ की शुभ    जैसी तैसी रात्रि !

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10 May 2008

मैं मोटा क्यों हूँ...मैं मोटा क्यूँ हूँ ?

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अरे भाई बिरादर, जब ऋतिक रोशन जैसी फ़िगर न रही, तो खिसियाहट मिटाने को यही पैरोडी बाथरूम में घुसते हुये, लोगों को जोर से सुनाते हुए, गुनगुना कर काम चलाना पड़ता है । हँसिये मत भाई, सही में इसे मैं काम चलाना ही कहूँगा, मज़बूरी है । अपने चाणक्य बाबा मलेच्छ भाषा में कह गये हैं, ( मलेच्छों का प्रवेश वर्जित तो नहीं ? ) Offence is the best Defence सो उनका अनुसरण  करते हुये, दूसरों के हँसने से पहले मैं स्वयं ही गाने लगता हूँ । अगला भला क्या खाकर कोई किसी छिनरो का भतार छीनेगा ? जरा नमूना देख लीजिये, यह मैं नहीं, मैन्यूल  है, बोले तो मेरा फिज़िशियन  सैम्पल!

अड़सठ तो नहींहो-अमर       बेचारा मैनुअल - अमर    साला हमसे बराबरी करेगा - अमर      

अरे, कोई पूछ भी लो कि मैं यह सब क्यों लिख रहा हूँ ? छोड़ो, मैं स्वयं ही बेशर्म नेताओं की तरह अपना स्पष्टीकरण दिये देता हूँ । दरअसल पिछले महीनों से मेरा वज़न अचानक बढ़्ने लगा । 68 किलो के सदाबहार देवानंद, शनैः शनैः उत्सव  के अमज़द खान की तरह होने लगा, कोई कहता कि आप पचपन के नहीं लगते तो मैं लक्का कबूतर सा गरदन नचा कर कहता, " अभी तो पचपन का बचपन है, यार ! " किंतु पता नहीं कौन सी टेलीपैथी हुयी कि जिस दिन मेरी   पंडिताइन ने  श्री ज्ञानदत्त जी का फोटू देख कर कहा, "अरे, यह तो तुम्हारे उम्र के ही लगते हैं, लेकिन खासे मोटे हैं ! " बस्स यारों, समझो उसी दिन मेरी फ़ुरसत हो गयी ।  ज्ञानदत्त जी का बोलबाला था उन दिनों हमारी गृहस्थी में, वह मेरी पोस्टों के सोलो शोमैन यानि टिप्पणीकार थे । आख़िर यह ज़नानियाँ दूसरों के पति से अपने की तुलना ही क्यों किया करती हैं ? उसके वो हमारे इनसे मोटे हैं, हमारे ये उ्सके आदमी से तो लाखगुना अच्छे हैं, गोया आदमी न हो गया हैंगर से उतारा कपड़ा होगया । इतराती हुई बलखाती हुई, बोलीं बहुत जतन किये हैं, इन हाथों नें ! ममता जी, आप यह पोस्ट पढ़ रही हैं, ठीक ठाक लग रहा है, यहाँ ? हाँ तो, जरा हमारे पाठकों को यह बतायेंगी कि ऎसा क्यों सोचा जाता है ? और यह कि महिलाओं की गोष्ठियों में पतियों का तुलनात्मक अध्ययन/ परिचर्चा क्यों अनिवार्य हुआ करती है ? हाँ तो ....

मैं चिढ़ जाता हूँ, ऎसी तुलनाओं से ! अरे, तुम तो दिन में दस बार, जब मर्ज़ी आया पति को धोकर टाँग देती हो । चलो, इसे मुहब्बत करने का सितम मान लेते हैं ( और चारा भी क्या है ? चारा डिपार्टमेन्ट भी तो इन्हीं का है ), सो सब सिर आँखों मंज़ूर ! लेकिन क्या ज़रूरी है, गैरपुरुषों पर टीका टिप्पणी करना ? क्यों जताया जाता हैं, कि सर्फ़ से सहेज़ा गया है, या घड़ी डिटरज़ेन्ट से रगड़ा जाता है,यह चोखेरवालियों का पोस्ट कांटेन्ट ?

सो, श्रीमान गुरु जी के मोटा कहे जाने पर मेरा क्लेश क्रोध बन कर, कलहप्रिया पर फूटा । उसी पल, जैसे किसी टेलीपैथी से मैं शापग्रस्त हो गया । वैशाख के गदहे की तरह मैं दिनोंदिन मोटा होने लगा । मित्रों की भ्रुकुटियाँ व्यंगात्मक तंज़ में चौड़ी होने लगीं । मैं बेचारा क्या कहता, दस वर्षों से तो मेन्टेन कर रहा हूँ । दही, मट्ठा, छाछ, सत्तू का शरबत, ढेरों फल व ब्लैक काफ़ी पर दिन गुज़रता है, रात में भोजन के नाम पर चिड़िया का चुग्गा व सवासेर सब्ज़ी ! बीच में यदि कभी ज़रूरत हुयी तो गुड़-चूड़ा या लाई-चना से तृप्त हो लेता हूँ, अब मोटा हो रहा हूँ तो क्या प्राण तज दूँ ?

सलाहें आने लगीं, नियति मुस्कुराने लगी, पंडिताइन गुर्राने लगीं, " मार्निंग वाक पर जाओ, कल से ! " मैं जनम जनम का निशाचर, एकदम काँप गया । 'हाय भगवान, मैंने कितनों को अब तक टहला दिया, अब तुम मुझे टहला रहे हो ?'  फ़ीस ज़ेब के हवाले कर, मरीज़ों को टहलाना तो मेरे पेशे की ज़रूरत है । न टहलाऊँ तो बाबा रामदेव उनको हँका ले जायेंगे । अब तुम मुझे तो न टहलाओ, दीनबंधु दीनानाथ ! यह भला क्यों सुनें ? वैसे भी हाइटेक बाबाओं ने उनको फ़ुसला लिया है, वह वहीं सुगंधित वातावरण में डोलते हैं । लिहाज़ा टहलने की सज़ा की तारीख़ तक तय हो गयी।

पहली सुबह, एलार्म बज पड़ा । माई कसम, अग़र घड़ी विदेशी न होती, तो उठा कर बाहर फेंक देता । नहीं फेंक पाया और वह मेरे कानों में किर्राती रही । किर्राओ, जितना किर्राना है, हम न उठेंगे । पंडिताइन का प्रवेश....," उठो यार, पहले दिन ही मक्कारी कर रहे हो ।" तुम भी चलो, मैंने शो करवाना चाहा ।" नहीं नहीं तुम जाओ, मुझे कितना काम है, वह कौन करेगा ? बच्चे अभी पढ़ रहे हैं, तुम्हें ज़्यादा ज़रूरी है । कहीं कुछ हो गया, तो मैं क्या करूँगी ?" लो, मेरे स्वास्थ्य में भी एक अर्थशास्त्र छिपा है । मज़बूरी का दूसरा नाम मिडिल क्लास आदमी है, देख लीजिये यहाँ !चल्लो..उट्ठो, दिन भर बैठे रहते हो । क्लिनिक, कार, कम्प्यूटर भला खड़े होकर भी चलाई जा सकती है ? इस नादान को कौन समझाये ? इतने में फाइनल वर्डिक्ट आ गया," जाओ कम से कम ओवरब्रिज़ तक तो हो आओ ।" मैं पड़ा पड़ा दार्शनिक होने लगा, ' नारी तेरे रूप अनेक ' रात में तो प्राणप्यारी लग रही थीं, अब इस समय प्राणहत्यारी का जलवा बिखेर रही हो । कसम देकर एक कटोरी खीर दी थी, अब पद्दी पदाने पर आमदा !smile_angry खैर, जो न होना चाहिये था, वह होकर रहा । मुझे घर से निकलना ही पड़ा । धकियाया गया, पैर घसीटते हुये चल पड़े, जायें तो जायें कहाँ ?Sleepy

अज़ब गज़ब नज़ारा, लगता था पूरे शहर के बेडौल डील डौल वालों की कोई रैली चल रही हो । उचकते, भचकते सभी भागे जा रहे हैं, उत्तर को ! नज़रें चुराते हुये हम भी शामिल हो लिये, इस अनोखे कारवाँ में । कुछ शिकारी निगाहों ने मुझे ताड़ लिया, पीछे लग लिये, " डाक्टर साहब, इस डायबिटीज़ में बेल का शरबत लेना चाहिये , और हरा कद्दू ? अबे कद्दू तो तू खुद ही लग रहा है, अब तू किस कद्दू को खायेगा ?Eye-rolling क़ोफ़्त होने लगी ।

सुबह की अपनी अच्छी खासी तरो-ताज़ा खोपड़ी कई जगह चटवाते, नुचवाते, सरकारें बनवाते गिरवाते , अंत में मंत्रिमंडल में फेरबदल करवा कर ही घर लौटा । पंडिताइन के आशा के विपरीत, मैं चहकते हुये घर में दाखिल हुआ । पंडिताइन भौंचक, फिर सहसा पैंतरा बदल, वह भी राग हर्षित में संगत देने लगीं, "देखा, एक ही दिन में कितना फ़र्क़ पड़ गया ।" हुँह, कीतना फरक पर गिआ ? बोला कुछ नहीं, कुछ न बोलो तो बीबी की परेशानी का कोई ओर-छोर नहीं मिलता ( आप भी यह मंतर आज मुझसे मोफ़त में लेलो ), मैं तो अपनी अन्य उपलब्धियों पर झूम रहा था, शहर के बहुत सारे सहतोंदू एक साथ, इस अवसर पर मिले । किबला तोंदू तो मैं भी हूँ, तभी तो इन गणमान्यों को सहतोंदू कह रहा हूँ । इन सहतोंदुओं में, अपनी पकड़ में आने वाले कई को चिन्हित किया, और उनसे अतिप्रेम से मिला । अब यह समझो कि प्रैक्टिस में, कुछ नहीं तो 15% का इज़ाफ़ा तो कहीं गया नहीं है ।Wink 

मुझसे कोई उचित रिस्पांस न पाकर पंडिताइन अपने में व्यस्त हो गयीं । अंदर शायद किसी से फोन पर बात हो रही थी, " हाँ हाँ, हाँ हाँ हैं ! हाँ घर में ही हैं, अभी अभी वाक कर के लौटे हैं, थोड़ा (?) रिलैक्स हो रहे हैं । मैं बता दूँगी, वह 8 बजे तक ख़ुद ही बात कर लेंगे । जी अच्छा, जी अच्छा, नमस्कार !" अरे ! यह तो एक दूसरे तरह की उपलब्धि हाथ में आ गयी, ' अभी अभी वाक कर के लौटे हैं ' में उनका दर्प इस कदर टपक रहा था कि मानो मेरे जैसी शूरता शायद ही किसी मर्द के बच्चे ने दिखायी हो । अब तो शाम तक मेरा पूरा समाज़, मेरी इस मर्दानगी से वाक़िफ़ हो जायेगा, बड़ा तेज चैनल है इनका। सीना चौड़ा कर के चाय के इंतज़ार में बैठ गया । लेकिन,यह तो जीत रही हैं । क्या किया जाये, भला ?Nerd

आगमन पंडिताइन का,"और सुनाओ, कैसी रही आज की वाक ?" मेरा प्रत्युत्तर; ’ अरे एकदम मूड फ़्रेश होगया । अंबेदकर वाले मोड़ पर ही मिसेज़  खन्ना मिल गयीं, ज्यों की त्यों रक्खी हैं, पिछले दस साल से ! एकदम छोकरी लगती है,यह मंजुला ! बहुत देर तक बातें हुईं, कहने लगीं कि वह अपने फ़िगर के लिये कुछ भी कर सकती हैं, बुरा न मानो तुम तो उसकी ताई लगने लगी हो । लौटते में वह गर्ग साहब की वाइफ़, आईटीआईवाले,  जो मंटू की शादी में झूम झूम कर नाच रही थी, हाँ वही मिली । उस दिन तो मैं भी चक्कर खा गया कि इस उम्र में भी यह  लचक,Bananaभाई कमाल की चीज है, उसकी कमर....कभी उसको चूड़ीदार में देखा है ?

मेरी बात पूरी ही कहाँ होने पायी, पंडिताइन के चेहरे से धुँआ उड़ता दिखायी देने लगा, कुछ बारूद की गंध भी हवा में थी । अचानक फट ही तो पड़ीं, " कब बंद होगी तुम्हारी लम्पटई ? बेटी जवान हो रही है, और तुम सुबह सुबह औरतबाजी  के  कारनामे मुझे सुना सुना कर रस ले रहे हो । हद हो गयी बेशर्मी की ! " हाँफते हुये आगे बढ़ते बढ़ते, पलट कर फिर एक वार किया, " आख़िर कब सुधरोगे ? सुधरोगे भी कि नहीं ? कोई ज़रूरत नहीं है, कल से कहीं जाने की ! जो करना हो घर में करो ।" चलो अमर कुमार, अपना काम तो बन गया । अब इनसे पूछूँगा,' घर में  करना क्या है, एक्सरसाइज़ या औरतबाजी ? " काँटे से काँटा तो निकल गया, लेकिन मेरा बहत्तर किलो किस घाट लगेगा ? खैर, निदान मिल गया । बची खुची पढ़ाई ही काम आयी ।

संभावित कारणों की पड़ताल में, थायरायड महाशय दोषी पाये गये । टेस्ट में रंगेहाथों कामचोरी करते पकड़े गये । यानि हाइपोथायराडिज़्म ! बस एक गोली का सवाल था, वह ले रहा हूँ । जैसे मेरे दिन बहुरे, वैसे ही आप सब भी राजी खुशी रहें । इन्हीं सद्कामनाओं के साथ, मेरा नमस्कार !

 

 

 

 

 

 

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दुल्हन वही जो ....

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यहाँ तक तो आगये, अब खीज हो रही होगी । फ़ोकस बहुत बनाये पड़े हैं, और घिसे पिटे शीर्षक देकर लोगों को बेवक़ूफ़ बना रहे हैं ।          सीधी सी बात है, दुनिया मानती है कि दुल्हन वही जो पिया मन भाये

एकदम बरोबर सोच रहे हैं, आप । फिर आपकी इस ज़ायज़ सोच में मेरा असहमत मौन क्यों कुलबुला रहा है ? यह तो मैं भी मानता हूँ कि   बरदे की खुर सींग दाँत देखने की ही तरह, अभी भी कन्या यानि कि भावी दुल्हन के रूप गुण की कई कई बार बड़ी तगड़ी स्क्रूटिनी की जाती है ।  आज लड़के की बुआ देख कर गयीं हैं, तो कल मामीजी पधार रहीं हैं । अगले हफ़्ते सुना है कि लड़के के जीजा अपनी होने वाली सरहज को टटोलने आ रहे हैं, उनकी भी पसंद का ख़्याल रखा जा रहा है । आखिर घर के दामाद हैं । पाहुन रूठ गये तो शादी की किरकिरी हो जायेगी ।

चलो भाई, मान लेते हैं यह चोंचले । आख़िर बेटी जो ब्याहनी है । किंतु इस पूरे परिदृश्य में लड़का आख़िर कहाँ है ? शायद आता ही नहीं है ।    हाँ यदि तगड़ा कमाऊ है, मल्टीनेशनल का नौकर है, घूस वाली पोस्ट पर काबिज़ होनहार सरकारी अफ़सर, बाबू वगैरह है, तो उसे भी आख़िर में एक मौका मिलता है, जाओ भाई तुम भी देख आओ तो बात आगे बढ़े, बल्कि फ़ाइनल ही कर देना । फिर कुछ एडवांस-उडवांस लिया जाये ।     का कहते हैं सुकुल जी, जो जग का रीत है, ऊ तो निबाहना पड़ेगा न ? और छोटे नबाब अपनी कालेज के दिनों की सहपाठिनियों के चेहरे याद करते हुये चल पड़ते हैं, अपने लिये दो टाँग की गईया एप्रूव करने । चोखेरवालियों, आप कुछ कहेंगी, नहीं ? यह शोर क्यों मचा करता है या मान लीजिये कि मच रहा है, दुल्हन वही जो पिया मन भाये Love Struck

साइलेंस !Time out

छोड़िये, जब सुकुल जी मान रहे हैं कि जग की रीत के हिसाब से ई सब कस्टम कोनो बेज़ा नहीं है, तो पांडेय जी भला मुँह खोलेंगे , धुत्त ?   फिर ? फिर मैं यहाँ क्या कर रहा हूँ ? आज ही मेरे बढ़ते वज़न का क्लू मिला है, आज तो चैन से लंबी तानी जाये । पंडिताइन यानि कि मेरे   हर सुख आराम की सौतन, टपक पड़ीं," ये क्या करने जा रहे हो ? इतने लोगों को दुल्हन का टाइटिल दिखा कर न्यौत लिया है, अब भाग रहे हो । अच्छा जाओ, तुम्हारे बेबी का फोन आया है, जल्दी बात करके आओ । आज फिर न चिपक जाना, उसकी आधी बात तो मेरे पल्ले ही नहीं पड़ती है "

बेबी यानि कि डाक्टर देवेन्द्र श्रीवास्तव, ओरई (जालौन) में अपनी स्वयं की क्लिनिक धूम से चला रहे हैं, झाँसी रोड पर नर्सिंग होम भी है । उनका फोन अक्सर आधी रात में ही आता है । मेरे कनपुरिया बैचमेट व अभिन्न सखा । बेबी और बाबी की जोड़ी मेडिकल कालेज़ में हर अच्छे बुरे कामों  के लिये प्रसिद्ध हुआ करती थी । बाबी यानि कि मैं ! बैच में हम दोनों ही सबसे कमसिन थे, अनायास जोड़ी बन गयी, और खूब बनी । अक्सर ही वह रात में गहरे सुरूर में पाये जाते हैं, और तभी शायद बीते दिनों के संदर्भ में मेरी याद आती होगी । आधे घंटे से कम बात नहीं होती ।Kiss

फोन उठाते हुये मेरे मन में चल रहा था,' आज एक पोस्ट लिखने की ठानी थी, और यहाँ दुल्हनिया के चक्रव्यूह में फँसा था, बेड़ागर्क करने अब ये आगये । ' हेल्लो बेबी...मैं उनसे और वह मुझसे उलझ गये । क्या कर रहे थे ? पोस्ट ? इतनी रात में किसको पोस्ट कर रहे हो, बात करूँ भाभी से..?...सँभल जाओ किसी चीजके ! साले सुधरोगे नहीं, खखेड़ करने की आदत नहीं गयी, अब तक ? बेचारा बेबी मेरी मुहब्बत में हर इतवार को मेरे साथ परेड जाया करता था, और मैं उसको छोड़ के रविवार को लगने वाले मार्केट परेड बजार में गुम हो जाता था, पुरानी किताबों की तलाश में । समय का अंदाजा न लग पाता और अक्सर निरमा वाशिंग पाउडर निरमा के वक़्त या उससे भी बाद में हम पिक्चर हाल में घुसते थे । लिहाज़ा वह झींकता झगड़ता हुआ थक कर गहरी नींद में सो जाता था, सिनेमा ख़त्म होने पर फिर वही मुझको, मेरे होने को, मेरे सेल्फ़िशपने को कोसने का सिलसिला चालू हो जाता, जो डिनर के बाद मेरे बिल अदा करने पर ही शांत होता । हम चुपचाप कैप्सटन फूँकते हुये लौटा करते ।

चलो, आज बेबी के सितम झेल ही लूँ, उफ़्फ़ न करूँगा चाहे जितनी भी देर तक बलबलाये । उसने पोस्ट का पोस्टमार्टम फिर शुरू कर दिया, क्या पेल रहा है, पोस्ट में ? क्या कहा, दुल्हन ?  पिया मन भाये ? हा हा हा.. उसके ठहाकों से मेरा खून जल रहा था, लेकिन उसकी उधार देने की उदारता को याद कर, मैं  एक खिसियायी संगत की तर्ज़ पर अँए अँए करता रहा । वह थमा, "अबे ज़मीन पर आजा राजश्री के भँड़वे, किस दुनिय में रहता है ?" और कुछ बताने लगा..... आपको भी बताऊँ कि क्या बताया ? Peace Sign

अपने भारत महान के बृहत्तर प्रदेश, उत्तर प्रदेश में बुंदेलखंड हुआ करता है, कल कौनखंड होगा, इसका नाम क्या होगा , हमें क्या लेना देना ! इस समय पिछले कई वर्षों से, बल्कि दशकों से, पानी की किल्लत से बुरी तरह जूझ रहा है । यह किल्लत इस कदर यहाँ के वासियों की नसों में रच गयी है कि अब रोटी बेटी के संबन्ध पानी की उपलब्धता से संचालित होते हैं । एक गाँव से बेटी का बाप, दूसरे गाँव रिश्ता करने जाता है, तो यह तसल्ली कर लेता है कि बावड़ी, पोखर या नदी जमाई के घर से ज़्यादा दूर तो नहीं है ? दिखा दिखाई पर अब तक तो कोई जोर नहीं रहता था, किंतु अब आंशिक रूप से अनिवार्य हो गया है । अनिवार्य..वह भी आंशिक, जम नहीं रहा ! अनिवार्य बोले तो लड़के वाले बिना लड़की देखे, रिश्ते के लिये हाँ  तो करते ही नहीं, औ..र आंशिक बोले तो वह पूरी लड़की नहीं बल्कि उसकी गठन और ख़ास तौर पर बाँहें देखते हैं । चेहरे का क्या करना ? घर में पानी कोई खूबसूरत चेहरे के जोर से तो आने से रहा, जैसा भी हो ! पानी भर कर लाने के लिये मज़बूत बाँहें और दमदार शरीर की आवश्यकता होती है, वह है तो ठीक वरना अपनी कोमलांगी को बैठाये रहो घर में, इन्ने तौ राज्जा के मैअल जाणा है  के ताने सुना करो । यह तो बड़ा गड़बड़ हो गया मित्रों, मुझे अपनी पोस्ट के क्लाइमेक्स का फ़ज़ीता होता दिख रहा है, किंतु सच को कैसे नकार दूँ ? चलो, ठीक भी है......

दुल्हन वही, जो पानी भर लाये 

                           पनघट-अमर पनघट_अमर

अब आप मग़ज़मारी करो कि भारत सरकार 2010 से 2012 तक महाशक्ति के रूप में दुनिया के तमाम देशों को पानी पिला देने का स्वप्न देख रही है, वह किस मुरव्वत में अपने देशवासियों को पानी नहीं पिला पा रही है ? मेरी पोस्ट का लालित्य जाता रहा वो अलग....चलते हैं, हुक़्म ?

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08 May 2008

खौंखिया रहा ललमुँहा बानर, भला काहे ?

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बड़कन के बीच में बोलना न चाहिये । बोले बिन रहा भी नहीं जा रहा है । ई ससुरा ललमुँहा बानर पूरे भारत महान पर खौंखिया रहा है, किसी को कोई चिन्ता फ़िकिर ही नहीं । मंत्री ताल ठोक रहे हैं, संतरी सुरती ठोक रहे हैं । और हम पता नहीं पूरे संसार के अंदेशे में दुबले हुये जा रहे हैं । थोड़ा लताड़ दें, ई बनरवे को तो, आज चैन की नींद आये । होगा पाताल नरेश, तो हम भी ब्लागर भदेश हैं !  जिसकी कहो तो धो के, उसीको पिला दें ।  अइसा ब्लागिंग सुख बड़ी तपस्या के बाद, पूर्वजों के करमों से मिलता है । पूरा का पूरा हठयोग है, पंडिताइन अभी रिझा के गयीं हैं, हमने कहा, 'तुम चलो हम आते हैं । बताओ ऎसा नियम संयम इस कलिकाल में किसको नसीब है  ? बड़ा संतोष मिलता है, एक सेफ डिस्टेंस से घर बैठे, जो चाहो, जितना चाहो , जइसे चाहो, जिसको चाहो ठेल देयो, तबियत से । अपने फ़ुरसतिया सुकुल कउनो ऎसे ही ठुमका थोड़े मार रहे हैं, 'हमार कोऊ का करिहे ! ' एकदम बरोबर बात, गुरु , जब अपने कीबोर्डवा में ही बड़े से बड़ा IBM  मिसाइल वगैरह के रिमोट कंट्रोल की ताकत है, तो फिर कौन का करिहे, भाई ?  भड़ास पदास हगास संडास जउन चाहो, सब मिली इहाँ । भले कोई खुल कर न बोले, बदबू तो सबको आती होगी । नहीं आती तो अवधिया जी से अपना केस रेफ़र कराके हमारे पास आओ । लेकिन मुझको भी, यह कौन डिस्टर्ब रहा है, बीच में ? हटो लिखने दो ।
                                                            पिछलग्गू-अमर
यह डिस्टर्बिंग एलिमेंट तो अपनी ही आत्मा निकली । चलो किसीके पास कुछ बची खुची आत्मा मिली तो सही । भले दिन भर मरी पड़ी थी, और इस समय बेमौके जाग गयी । ( द्विवेदी जी, अब डिस्टर्बिंग धातु पर एक पोस्ट हो जाये, जब तक आपकी चाय की बंद  दुकनिया नहीं खुलती, यही करो ) तो अपने आत्माराम की आवाज़ आरही है, "  अरे रुको, सुनो सुनो, सुनिहो तो ? सुन तो लो, ई बड़कन को छोड़, अपने ही बिरादरी पर कहाँ पिल पड़े ? ठीक है कि ब्लागिंग में महाभारत घमासान पर है, लेकिन तुमको अर्ज़ुन का एपांइटमेंट लेटर किसने दे दिया ? चुप्पे अपना काम करो और सो जाओ। हनुमानुद्दीन को तो लटकाये पड़े हो, अब क्या ललमुँहे को भी लटकाने का इरादा है ? "  सत्यवचन प्रिये,  ललमुँहा तो लटकाने ही लायक है ! यह ससुरा आजकल अलाप रहा है, " खा गये गल्ला...,पी गये तेल,   यह देखो इंडिया का खेल "
                                                       ललमुंहा-अमर११३४५ ललमुँहा बंदर-अमर ललमुंहा-अमर१
अब बताओ अपने शस्य श्यामला मातरम की खोज में, कोलंबस की भयंकर भूल का खमियाज़ा हमको भरना पड़ रहा है ? बाँस तो उसीने पैदा किया, और बेसुरी बाँसुरी हमीं को सुननी पड़ रही है ! ऎहसान फ़रामोश ललमुँहा कह रहा है कि पूरे विश्व का गल्ला भारतीय भुक्खड़ खा गये ।  अब कह रहा है कि यही लोग तेल भी पी गये, तभी इतनी त्राहि त्राहि है । ये चुनाव के समय भी क्या उधार के इंडियन दिमाग से बोल रहा है। यह सब अलाय बलाय बयान तो हमारे नेता लोगों के लिये छोड़ दो, ललमुँहें । अभी हल्दी पर लपक रहे थे, और पेटेंट इनके दिमाग का लेलिया ?
                 बुश के तेवर-अमर साले बुश का क्लोन-अमर बुश के तेवर-अमर४४५५
अब इनको ज़वाब देने का साहस यहाँ किसी के पास नहीं है । इस ललमुँहे से पूछो कि इसी वर्ष जनवरी में तो तू शेखी बघार रहा था कि अमेरिका में प्रति व्यक्ति प्रोटीन की खपत, अविकसित देशों की तुलना में साढ़े बारह गुने ज़्यादा है । यानि कि हम आदिम युग के कंदमूल पर पलने वाले कुपोषित आदिवासी हैं, उनकी बराबरी तक आने में हमें 30 वर्ष तक लग सकता है । तो ज़िल्ले कायनात, यह अचानक तेरे देश समेत पूरे संसार में अनाज़ का टोटा भारतीयों के मत्थे क्यों मढ़ रहा है । अब खंभा इतना भी न नोचों कि हाथ ही में आ जाये । भारत और चीन इतना तेल जला डाले, इतना तेल जला डाले कि अब तेरे यहाँ की लंबी लंबी लाइमोस्यूनें कबाड़ी भी नहीं ख़रीद रहा है । ओए ललमुँहें, इसी फ़रवरी में तो पूरे संसार को अपना बड़प्पन दिख रहा था कि अमेरिका में एनर्ज़ी बोले तो उर्ज़ा की खपत यूरोप से भी तीनगुना ज़्यादा है । भारत में तो इतने बेकार  हैं कि वह  लखटकिया पर टकटकी लगाये हैं, चीन भी उर्ज़ा संरक्षण में इतना चौकस है कि 20 वर्ष से कम आयु के लड़कों को दोपहिया बाइक चलाने की अनुमति नहीं देता । एक परिवार में केवल एक ही कार रखी जा सकती है, और प्राइवेट कार से यदि केवल एक व्यक्ति चल रहा है, तो उसे अर्थदंड भरना पड़ता है कि शेयर करके पेट्रोल बचाने के प्रति उदासीन क्यों है । पिछले शनिवार तक वहाँ पेट्रोल मात्र 19.87 रूपये लीटर थी । फिर तुम रोज़ एक नया चूतियापा उछाल कर किसको डराना चाहता है ?  काँकड़ पाथर जोड़ के अमेरिका लियो  बनाय, औ खु़दा से भी न रह्यो डेराय ,  भला ई कउन भलमंशी  आय ?  दंभ तो रावण का भी नहीं रहा है, और तू किस खेत की मूली है, यह तो शायद तू भी न जानता होगा ?
              तोते उड़ाओ बुश-अमर   खबीस बुश-अमर  बंदर बुश-अमर
तुझमें खैर इतनी अक्ल तो है कि तू समझ गया है कि आने वाला समय भारत का है । चीन भी भारत के इर्द गिर्द ही बना रहेगा । यूरोप अमेरिका पर एशिया भारी पड़ता जा रहा है । फिर इतना घबड़ा क्यों रहा है ? इसको स्वीकार करके इज़्ज़त से रह, तेरे यहाँ तो बाप भी अपने लौंडे से इज़्ज़त को तरसते हैं । और हम दे भी रहे हैं, तो तुझको पहले से ही डकारें आने लगी । देख तेरे अपने देश में तेरी कितनी कदर है, देख ज़रा !
                                                                          जिंदा या मुर्दा-अमर
ख़बरदार जो हमारे ऊपर ऊँगली उठाया तो ! समीर भैय्या, इसको आपका लिहाज़ भी नहीं है, कि आप पड़ोस में अंगोछा पहने बैठे हो, और यह रोज़ कुछ न कुछ बके जा रहा है । कुछ कहते क्यों नहीं ?  एक बार देख भर ले, खुद ही चुप हो जायेगा । फिर भी न माने तो अपनी उड़नतश्तरी सीधे व्हाइट हाउसिया पर लैंड करा दो । सारा जग आपका ऎहसान मानेगा ।
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04 May 2008

ज़िन्दगी की ' चंगुल ' में कैद या कुछ और ?

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भाई माफ़  करना, अच्छा भला सोने का मूड बन रहा था, कि मति मारी गयी । एक नादान हरकत  और नींद की लक्ज़री से फ़ुरसत ! जाते जाते सोचा कि लाओ चिट्ठाजगत एक बार खंगाल लिया जाय, मेरे चिट्ठा खिंचायी में क्या घालमेल चल रहा है, देखूँ तो ? प्रवेश करते ही डिबिया से टकरा गया, और जैसे उसमें से कोई ज़िन्न निकल आया हो । यह सरबजीत का मामला क्या है भाई, कोई बतायेगा ? सरबजीत की फाँसी फिर टली । समझ नहीं आता कि यह मुश्शर्रफ़ की दरियादिली है, या लोमड़ीगिरी है । इस तरह का टुकड़े टुकड़े एक्सटेंशन, सरबजीत, उसके परिवारजन और हम भारतीयों के लिये  कितना यंत्रणादायक है । क्या सरबजीत को अपनी एक एक साँस ज़िन्दगी की चंगुल में कैद न लगती होगी ?  देश के लिये ज़ाँनिसार करने का ज़ज़्बा लिये एक चलता फिरता मनुष्य, अपने पूरे होशोहवास में यदि पल पल अनिश्चय का जीवन जी रहा हो, तो इसे क्या कहेंगे ? मैं तो इन पलों को, अपना आज का शीर्षक ही कहूँगा ।
              20050923004402701203976587-sarabjit
सदर-ए-ज़म्हूरियत ज़नाब मुश्शर्रफ़ मियाँ एक ब्लैकमेलर सरीखे हरकतें करके क्या साबित कर रहे हैं ? शु़क्र है उनके ईमान का कि वह " हुण इत्थों राजीखुसी हाँ, चिन्ता दी कोई लोड़ नईं,छेत्ती आँवंगे, तुस्सी फिकिर ना करीं " जैसा  फोनालाप सरबजीत के घर वालों से नहीं करवा रहे हैं । किंतु यह तय है कि किसी किसिम का फोनालाप दोनों सरकारों के बीच चल तो रहा है । इंडिया बोले तो भारत जब सोचने का समय माँगता है, तो पाकी ज़ल्लाद फाँसी की रस्सी ढीली कर सुस्ताने लग पड़ते हैं । ज़ाहिर है कि राजनयिक स्तर की सौदेबाजी चल रही है । पर सारा हिन्दोस्ताँ क्यों चुप है ?
यही नाटक कश्मीर सिंह के साथ भी चला था । उनको रात दो बज़े उठा कर रस्सी की मज़बूती परखने वास्ते बोरे में बराबर वज़न का मिट्टी भर कर तौल लिया गया । डाक्टरों ने फाँसी से पहले की औपचारिकता के तहत मुयायना करके उनके ज़िन्दा होने की तस्दीक भी कर दी । चार बजने के इंतज़ार  में सब टहल रहे थे कि ढाई बजे रिहायी के हुक्म का तामील करवाया गया, निश्चय ही आधी रात में पैगंबर के फ़रिश्ते तो न आयें होंगे, रहम की दरख़्वास्त करने, तो ? मुझे आडियो क्लिप अभी  लगानी नहीं आती, बीबीसी हिंदी पर दिये गये  इस इंटरव्यू की क्लिपिंग अवश्य पेश करता ।
प्रणव दादा रहम की भीख माँग कर पहले ही देश को शर्मिन्दा कर चुके हैं, " मैं पाकिस्तान से अपील करता हूँ कि मामले की कानूनी पहलुओं को अलग रखते हुये इंसानियत के आधार पर ही इस बदकिस्मत इंसान के साथ दया दिखायी जाये । " 18 अप्रैल का बयान क्यों ऎसी ज़रूरत आन पड़ी दादा ? क्या महाशक्ति बनने से पहले ही देश को फ़ुस्स कर दोगे । उनकी ज़मीन, उनका कानून ! यदि वह यह कहें कि अफ़ज़ल कुकुर को छोड़ दो, तब ? और यही चल रहा है । इंसानियत का आधार उसको दिखाओ, जो यह फ़ारसी जानता हो । उन्हें हिंदी में याद दिलाओ कि तुमने कभी उनके साथ इंसानियत दिखाने की नादानी की थी । घुटने टेक चुके 93,000 पाकियों को लौटाने की नादानी, अंडमान में एक बंदिस्तान क्यों नहीं बन सकता था ? ये बुज़दिल सही किंतु इतने फ़ौज़ियों से हाथ धोने के बाद उनकी यह ताकत आज न होती कि आप दया की भीख माँगते दिखते । जो जीता वही सिकंदर, फिर भी आप हारे को हरिनाम गा रहे हैं ।
                                                   
                                     180px-Lieutenant_General_Sarabjit_Singh_Dhillon india_flag
मैं तो अपने गुरु पूर्णेन्द्र मिसिर का शठे शाठ्यम समाचरेत से ज़्यादा जानना भी नहीं चाहता । जाइये, आज आपको छोड़ता हूँ, मेरी पंडिताइन के जगने का समय हो रहा है, वरना कल को आप उससे भी दया की भीख माँगते दिखोगे । भाई, आप भी लोग भी जाइये, अपना अपना काम करिये, कोई ख़ास बात नहीं है । और...यह कुछ भी तो नहीं है । नमःस्कार ! अपने तिरंगे पर टूलटिप फिरायें, धन्यवाद
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03 May 2008

एक खुला चैलेंज !

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अजी चैलेंज़ मैं क्या खाकर दूँगा, इसको तो कोई मल्टिनेशनल का नौकर भी देख ले तो भाग खड़ा हो,जोड़तोड़ में माहिर आला दिमाग भी गश खा जायें । यहाँ उ०प्र० ( उल्टा प्रदेश नहीं यारों, उत्तर प्रदेश या चलो उल्टा प्रदेश ही रहने दो ) के हाल पर तो स्यापा करने का फ़ैशन है, लेकिन कल कानपुर आना हुआ, हर जगह बिज़ली की त्राहि त्राहि सुनी तो नज़रें बरबस बिज़ली के खंभों पर दौड़ गयीं । देखा तो लगा, सुकुल महाराज शायद सच्ची मुच्ची के फ़ुरसतिया हैं, उनको हलचल न सताती हो तो क्या ? एक ठईं फोटो खींचने वाला मोबाइल तो ले ही सकते हैं, खैर...मेरे पास भी नहीं है ( भाँजे की नज़र में चढ़ गया सो उसी को दे दिया ) ! अपने मित्र सुर्यभानु सिंह के मोबाइल से खंबे का निशाना साधा और कैमरे ने जो देखा वह सीधे गुरुदेव पैलेस के सामने के साइबर कैफ़े से ठेल रहा हूँ, अपने सुकुल गुरु के गढ़ से! हमार का कर लेहो गुरू ?

                   गुटैय्या कैंसर अस्पताल के सामनेपार्वती बागला रोड-ग्वालटोली वाला मोड़मेडिकल कालेज़ के पीछे आज़ाद नगर

चैलेंज काहे का भाई ? यह तो बानगी है, अगर कहीं कोई खराबी देखनी हो, तो कौन सा तार पकड़ोगे ? ईल्लेयो, पकड़ के बैठगये !

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यह अपना हिन्दी ब्लागजगत, जहाँ थोड़ा बहुत आपसी विवाद चलता ही है, बुद्धिजीवियों का वैचारिक मतभेद !

शुक्र है कि, सैद्धान्तिक सहमति अविष्कृत हो जाते हैं, और यह ज़्यादा नहीं टिकता, छोड़िये यह सब, आगे बढ़ते रहिये !

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