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अथ कथा शाह हनुमानुद्दीन

टाइमखोटीकार- डा. अमर कुमार- Wednesday, April 30, 2008- छाँट फटक

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तेक्नोराती पर

तुमने किया था कल आने का वादा...बुढ़वा गंगा किनारे वाले की मोटी खड़खड़ाती आवाज़ कहीं दूर से तैरती हुई आरही है । इसको कैसे पता लग गया कि मेरा हनुमानुद्दीन कल आने का वादा करके मुकर रहा है । बुढ़वा तो धूमकेतु की तरह छाता जा रहा है, खैर... वह शेरवुड वाला है, और मैं मिडिल स्कूल टाट-पट्टी की उपज, वह क्रीमी लेयर तो मैं सड़ा छाछ ! फिरभी अपने ब्लाग का राजा भोज तो हूँ ही, हम कोई अनिल अंबानी के वेबसाइट के मोहताज़ थोड़े हैं ।  यहाँ सभी राजा हैं, हम हैं राजा ब्लाग के, हमसे कुछ न बोलिये..हमसे कुछ न बोलिये, रूँ रुँ रुँ रुँ..जिसने भी हमें टिप्पणी दी..हम उसी के हो लियेऽ ..ऽ, हम उसी के हो लियेऽ ..ऽ, हम हैं राही ब्लाग के,हो होहो हे हे ! यह ब्लागर एंथम है,सनद रहे मैंने लिखा है

आप सोचो, जो सोचना है, सोचना और शौचना नितांत व्यक्तिगत मामला है । इसमें तो कोई झाँक भी नहीं सकता ।

सुर नहीं बदल रहा हूँ, श्रीमन ! आप ठीक सोच रहे हो, एक पात्र तो गढ़ दिया और अब हाथ से फिसल रहा है, तो आँय बाँय शाँय से बहला रहे हैं । लगता है, शाह हनुमानुद्दीन साहब गये तेल लेने.. ! ऎसी बददुआ मत दो भाई, तेल लेने  जायें उसके दुश्मन । तेल.., तेल का खरा-खोटापन.., तेल के भाव का मिज़ाज़.., तो जिसका तेल न निकाल ले, वह कम है !

सब एक से बढ़ कर एक .. । यदि आज़ादी के समय मैं पैदा हो गया होता, और मेरा अनशन सफल हो जाता तो, आज हम आपा-धापीस्तान के नागरिक होते । खैर..., छोड़ो नाम में क्या रक्खा है ? समझो कि आप आपाधापीस्तान में ही हो । समझो क्या ? वाकई आपाधापीस्तान में ही हो। मन बहुत खिन्न है..फिर भी ब्लगिया रहा हूँ । खिन्नता इसी ब्लगिया को लेकर है, सेट, कैमरा, लाइट सब तैयार और नायक गायब ! ससुर दुई कशीदा क्या पढ़ दिया कि हनुमानुद्दीन धूल के फूल के रजिन्दर कुमार हुईगे । घुरहू का रोल कटवाया, स्वयं भी कहीं चुप चुप खड़े हैं, पोस्ट डिले हो रही है । चलो थोड़ी देर और इंतज़ार कर लें...

इंतज़ार में, अपने सिरहाने रक्खी अख़बार की गड्डी में से एकठो अख़बार खींच लिया, टाइमपास का ज़रिया ! और.. जैसाकि हमेशा से होता आया है,पंडिताइन हाज़िर, " फलाहारी बाबा, कुछ खाओगे या मैं भी तुम्हारे चक्कर में भूखी मरूँ ? " लो, इस घोर कलिकाल में अन्नपूर्णा को भोलेनाथ से भोजन की गुहार लगानी पड़ रही है ! चोखेरवालियों, यह उनका स्वांतः सुखाय पतिव्रत है, आपलोग मोर्चा वोर्चा न खोल देना । मैंने कुछ व्यस्त होने का दिखावा करते हुये, हाथ हिलाया, 'अभी रूक जाओ । ' अख़बार पर आँखें गड़ायी तो पाया 23 अप्रैल का हिंदुस्तान है । ठीक है यार, चलेगा ! अपने समीर दद्दा बोले हैं, सब अख़बार एक से ही होते हैं, तारीख़ से  क्या फ़र्क़ पड़ता है ? फ़र्क पड़ता है दद्दा, यहतो तुरंतै दिख गया । पहले आप यह भेद की बात बताओ कि आपने उड़नतश्तरी नाम क्यों चुना ? मैं इसका विरोध करता हूँ । अगली बार इंडिया आओगे, तो धरना प्रदर्शन करूँगा । हुँह, उड़नतश्तरी ? भले आप जुरासिकयुग के लगते हों, लेकिन हैं तो इसी ग्रह के जम्बूद्वीपे भारतखंडे से ! अश्कों के समंदर को दर्द की कश्ती से पार करने वालों की ज़मात में यह उड़नतश्तरी कहाँ से पा गये ? एक्ठो हमको भी चाहिये । बेलगाम लिखे जारहा हूँ, लगता है कि यही हाल रहा तो अपने शाह हनुमानुद्दीन वाकई तेल लेने चले जायेंगे । जायें, हमतो अपनी स्लिम-लइनिया को आज रगड़ के रहेंगे । ( यह मेरे डेस्कटाप का निकनेम है, भाई )

बिरंजीदास व बुधिया- डा० अमर हिन्दुस्तान 23 अप्रैल 2008- डा० अमरबुधिया-डा०अमर

हाँ तो, अख़बार पुराना सही, लेकिन चिहुँका दिया नयी नवेली के नख़रे सा । कोशिश करके हार गये, जितना मिलना था उससे कुछ कम ही मिला ।

वैसे देखो तो कुछ भी नहीं, और हमारे जैसी खखेड़ी नज़रों से देखोगे तो लगेगा कि, 'कुछ तो है.. जो कि !                                                        एक सहमी सी ख़बर, जैसे IPL की चकाचौंध से घबड़ायी हुई सी एक कोने में दुबकी हुयी पड़ी थी । ख़बर की नन्हीं सी बाइट तो जैसे कराह रही थी । कराह सुन के क्या करोगे ? ख़बर तो कह रही है कि, चलो हम पूरी खबर ही जस का तस उतार देते हैं, आप बाँच लो । 

भोपाल । बुधिया के पूर्व कोच बिरंजी्दास की हत्या में कथित रूप से शामिल एक ‘ कांट्रेक्ट किलर ‘ हीरो की तरह निजी टीवी चैनल पर प्रकट हुआ । उसने बाकायदा इंटरव्यू दिया । सीधे प्रसारण के दौरान पुलिस भी चैनल के आफ़िस में पहुँची और उस हत्यारे को हिरासत में ले लिया ।

मंगलवार को इस कथित ‘ कांट्रेक्ट किलर ‘ छागला ने खुलासा किया कि बुधिया के पूर्व कोच की हत्या के लिये उड़ीसा खेल निदेशालय और खेलजगत से जुड़े कुछ लोगों ने सुपारी दी थी । उसने यह भी बताया कि बिरंजीदास के पास विदेशों से लगातार लाखों रुपये बुधिया के नाम पर आरहे थे । छागला ने कहा कि उड़ीसा खेल संचालनालय और अन्य लोग इसमें हिस्सा माँग रहे थे, जिसे नहीं देने पर उसकी हत्या की सुपारी दी गयी थी । छागला ने बताया कि इस हत्या के लिये उसे दस लाख का ठेका दिया गया था । दो लाख रूपये अग्रिम के तौर पर मिले थे । इस हत्या में उसका एक साथी भी शामिल था । ( एजेंसी )

अब यह आप पता लगाइये कि छागला साहब का अचानक हृदय परिवर्तन होगया याकि लेनदेन न सुलट पाने की वजह से वह बाग़ी हो गये । इस स्तब्धकारी ख़बर को देश ने कैसे लिया, यह बहस का विषय हो सकता है, किंतु मेरा विषय तो एकमात्र यह ख़बर ही है । पूरा देश तीतर बटेरबाजी की तर्ज़ पर चलने वाले IPL  के लटकों से लहालोट हुआ जा रहा है । कुछेक हाकी के कर्ताधर्ताओं की कारगुज़ारियाँ बखान कर गिलगिल हुये जा रहे हैं । सरकार-ए-भारत शांति की मशाल को ऎतिहासिक सुरक्षा में गुजार कर चीन को तृप्त निगाहों से निहार रही है, " और कोई हुक़्म मेरे आका ? " लोग इस ऎतिहासिक प्रतीक की झलक तक न देख पाये, और स्तंभकार अभिव्यक्ति की आज़ादी पर सिर धुन कर, ऎवज़ में चेक आने के इंतज़ार में दीन दुनिया से बेख़बर मन में आमदनी ख़र्चे का हिसाब लगा रहे हैं । और...

और यहाँ शाह हनुमानुद्दीन की प्रतीक्षा हो रही है ! कौन कहता है कि ब्लागिंग फालतू का काम नहीं है ? निराश न हों, शाह हनुमानुद्दीन से मिलवाऊँगा अवश्य, यह लाला की ज़ुबान है । बस.... जरा उसे तेल लेकर लौटने तो दें । नमस्कार !

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मस्ती आयेला रे

यही कुछ है

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