जो इन्सानों पर गुज़रती है ज़िन्दगी के इन्तिख़ाबों में / पढ़ पाने की कोशिश जो नहीं लिक्खा चँद किताबों में / दर्ज़ हुआ करें अल्फ़ाज़ इन पन्नों पर खौफ़नाक सही / इन शातिर फ़रेब के रवायतों का  बोलबाला सही / आओ, चले चलो जहाँ तक रोशनी मालूम होती है ! चलो, चले चलो जहाँ तक..

पोस्ट सदस्यता हेतु अपना ई-पता भेजें



NO COPYRIGHT यह पृष्ठ एवं इस ब्लाग पर प्रकाशित सम्पूर्ण सामग्री कापीराइट / सर्वाधिकार से सर्वथा मुक्त है ! NO COPYRIGHT टेम्पलेट एवं अन्य सुरक्षा कारणों से c+v नकल-चिप्पी सुविधा को अक्षम रखा गया है ! सर्वाधिकार मुक्त पृष्ठ सुधीपाठक पूर्ण आलेख अथवा उसके अंश को जानकारी के प्रसार हेतु किसी भी प्रकार से उपयोग करने को स्वतंत्र हैं ! यह पृष्ठ एवं इस ब्लाग पर प्रकाशित सम्पूर्ण सामग्री कापीराइट / सर्वाधिकार से सर्वथा मुक्त है ! NO COPYRIGHT टेम्पलेट एवं अन्य सुरक्षा कारणों से c+v नकल-चिप्पी सुविधा को अक्षम रखा गया है ! सर्वाधिकार मुक्त पृष्ठ सुधीपाठक पूर्ण आलेख अथवा उसके अंश को जानकारी के प्रसार हेतु किसी भी प्रकार से उपयोग करने को स्वतंत्र हैं ! यह पृष्ठ एवं इस ब्लाग पर प्रकाशित सम्पूर्ण सामग्री कापीराइट / सर्वाधिकार से सर्वथा मुक्त है ! NO COPYRIGHT टेम्पलेट एवं अन्य सुरक्षा कारणों से c+v नकल-चिप्पी सुविधा को अक्षम रखा गया है ! सर्वाधिकार मुक्त पृष्ठसुधीपाठक पूर्ण आलेख अथवा उसके अंश को जानकारी के प्रसार हेतु किसी भी प्रकार से उपयोग करने को स्वतंत्र हैं ! यह पृष्ठ एवं इस ब्लाग पर प्रकाशित सम्पूर्ण सामग्री कापीराइट / सर्वाधिकार से सर्वथा मुक्त है !NO COPYRIGHT टेम्पलेट एवं अन्य सुरक्षा कारणों से c+v नकल-चिप्पी सुविधा को अक्षम रखा गया है ! सर्वाधिकार मुक्त पृष्ठ सुधीपाठक पूर्ण आलेख अथवा उसके अंश को जानकारी के प्रसार हेतु किसी भी प्रकार से उपयोग करने को स्वतंत्र हैं ! यह पृष्ठ एवं इस ब्लाग पर प्रकाशित सम्पूर्ण सामग्री कापीराइट / सर्वाधिकार से सर्वथा मुक्त है ! NO COPYRIGHT टेम्पलेट एवं अन्य सुरक्षा कारणों से c+v नकल-चिप्पी सुविधा को अक्षम रखा गया है ! सर्वाधिकार मुक्त पृष्ठ सुधीपाठक पूर्ण आलेख अथवा उसके अंश को जानकारी के प्रसार हेतु किसी भी प्रकार से उपयोग करने को स्वतंत्र हैं ! यह पृष्ठ एवं इस ब्लाग पर प्रकाशित सम्पूर्ण सामग्री कापीराइट / सर्वाधिकार से सर्वथा मुक्त है ! NO COPYRIGHT टेम्पलेट एवं अन्य सुरक्षा कारणों से c+v नकल-चिप्पी सुविधा को अक्षम रखा गया है ! सर्वाधिकार मुक्त पृष्ठ सुधीपाठक पूर्ण आलेख अथवा उसके अंश को जानकारी के प्रसार हेतु किसी भी प्रकार से उपयोग करने को स्वतंत्र हैं !सर्वाधिकार मुक्त वेबपृष्ठ

NO COPYRIGHT यह पृष्ठ एवं इस ब्लाग पर प्रकाशित सम्पूर्ण सामग्री कापीराइट / सर्वाधिकार से सर्वथा मुक्त है ! NO COPYRIGHT टेम्पलेट एवं अन्य सुरक्षा कारणों से c+v नकल-चिप्पी सुविधा को अक्षम रखा गया है ! सर्वाधिकार मुक्त पृष्ठ सुधीपाठक पूर्ण आलेख अथवा उसके अंश को जानकारी के प्रसार हेतु किसी भी प्रकार से उपयोग करने को स्वतंत्र हैं ! यह पृष्ठ एवं इस ब्लाग पर प्रकाशित सम्पूर्ण सामग्री कापीराइट / सर्वाधिकार से सर्वथा मुक्त है ! NO COPYRIGHT टेम्पलेट एवं अन्य सुरक्षा कारणों से c+v नकल-चिप्पी सुविधा को अक्षम रखा गया है ! सर्वाधिकार मुक्त पृष्ठ सुधीपाठक पूर्ण आलेख अथवा उसके अंश को जानकारी के प्रसार हेतु किसी भी प्रकार से उपयोग करने को स्वतंत्र हैं ! यह पृष्ठ एवं इस ब्लाग पर प्रकाशित सम्पूर्ण सामग्री कापीराइट / सर्वाधिकार से सर्वथा मुक्त है ! NO COPYRIGHT टेम्पलेट एवं अन्य सुरक्षा कारणों से c+v नकल-चिप्पी सुविधा को अक्षम रखा गया है ! सर्वाधिकार मुक्त पृष्ठसुधीपाठक पूर्ण आलेख अथवा उसके अंश को जानकारी के प्रसार हेतु किसी भी प्रकार से उपयोग करने को स्वतंत्र हैं ! यह पृष्ठ एवं इस ब्लाग पर प्रकाशित सम्पूर्ण सामग्री कापीराइट / सर्वाधिकार से सर्वथा मुक्त है !NO COPYRIGHT टेम्पलेट एवं अन्य सुरक्षा कारणों से c+v नकल-चिप्पी सुविधा को अक्षम रखा गया है ! सर्वाधिकार मुक्त पृष्ठ सुधीपाठक पूर्ण आलेख अथवा उसके अंश को जानकारी के प्रसार हेतु किसी भी प्रकार से उपयोग करने को स्वतंत्र हैं ! यह पृष्ठ एवं इस ब्लाग पर प्रकाशित सम्पूर्ण सामग्री कापीराइट / सर्वाधिकार से सर्वथा मुक्त है ! NO COPYRIGHT टेम्पलेट एवं अन्य सुरक्षा कारणों से c+v नकल-चिप्पी सुविधा को अक्षम रखा गया है ! सर्वाधिकार मुक्त पृष्ठ सुधीपाठक पूर्ण आलेख अथवा उसके अंश को जानकारी के प्रसार हेतु किसी भी प्रकार से उपयोग करने को स्वतंत्र हैं ! यह पृष्ठ एवं इस ब्लाग पर प्रकाशित सम्पूर्ण सामग्री कापीराइट / सर्वाधिकार से सर्वथा मुक्त है ! NO COPYRIGHT टेम्पलेट एवं अन्य सुरक्षा कारणों से c+v नकल-चिप्पी सुविधा को अक्षम रखा गया है ! सर्वाधिकार मुक्त पृष्ठ सुधीपाठक पूर्ण आलेख अथवा उसके अंश को जानकारी के प्रसार हेतु किसी भी प्रकार से उपयोग करने को स्वतंत्र हैं !सर्वाधिकार मुक्त वेबपृष्ठ

03 May 2009

एक एक्कनम एक, दो दूनी चार, तीन तियाँ नौ.. ..

Technorati icon

ई लेयो, दुनिया चैन से रहने भी न दे.. और पूछे ’ बेचैन क्यों रहते हो ? "
हम पहले ही ब्लागर से मोहोबत करके सनम.. रोते भी रहे.. हँसते भी रहे गुनगुनाय रहे थे, कि आजु एकु मोहतरमा हमसे पूछि बैठीं, " क्षमा करें डाक्साब, आप काहे के डाक्टर हैं ? "

अब जानवरों के डाक्टर होते तो अपने प्रिय ब्लागर भाईयों के लिये क्यों लिखते ? हम भी किसी चुनावी जनसभा में भाड़े की जुटी भीड़ में शामिल मिमिया रहे पब्लिक से मुख़ातिब होते, या अपनी पढ़ाई-लिखाई का भरपूर दुरुपयोग करते हुये कहीं चैनल-नवीसी कर रहे होते ! और कुछ नहीं तो.. ’ नखलऊ लायब्रेरी  में लोकसाहित्य की अनुपब्धता ’ पर एक्ठो शोध का जुगाड़ करके मेहता अँकल के गाइडेन्स में एक दूसरे किसिम की डाक्टरी का जुगाड़ बना लेते ! और..  अब तक हिन्दी जी के बीमार दिल में कई प्राकृत , अपभ्रँश इत्यादि के शब्दों का प्रत्यारोपण भी कर चुके होते ?   पर,  हाय री फूटी किस्मत.. इतनी घिसाई के बाद एक अदद ’ पब्लिक प्रापर्टी डाक्टर ’ बनना ही नसीब में रहा, सो होय गये !

इत्तेफ़ाक़ से.. चढ़ती उमिर में एक बुरी सँगत होय गयी । पँडिताइन के शासनकाल के बहुत पहले की बात है,  लेकिन वुई भी एक ठँई ज़नानिये रहीं.. यानि कि वह कोमल भावनायें  अउर मैं फूटी कौड़ी  भी नहीं !
फिर भी रँग था, कि जम ही गया ! तब यह ’ खूब जमेगा रँग ’ वाला विज्ञापन नहीं चला था.. सो हम साहित्य-वर्चा  करके ही मदहोश हो लिया करते थे ! ग़र मदहोश हो बैठे, तो कुछ लिखने-ऊखने का गुनाह भी त होबे करेगा, एक किताब मयखाना नाम से पढ़ा तो था .. पर, मयखाना होता कहाँ है, यही न जानता था  ! थोड़ा बहुत सुलेखा रोशनाई खरच करके हल्के हो लेते थे । मत याद दिलाओ, वह सब !

दिन भर की मगज़मारी के बाद ज़ीमेल खोला, . 384 अनपढ़े मेल ( ये अपुण का इनबाक्स है, भिडु ! अक्खा यूनिवर्स अपुण का भेज़ाफ़्राई करनाइच माँगता ) साहस ज़वाब दे इससे पहले ही देवनागरी फ़ान्ट वाले सभी मेल खोलकर अपने कच्चे-पक्के ढंग से बाँच मारे, कुछ का उत्तर भी दे दिया । आगे एक मेल और देखा , बड़े नाज़ुक अँदाज से पूछा गया है, " आप काहे के डाक्टर हैं ? "

उनके शब्दों की सौजन्यता, मानों कह रहीं हों, "  ग़ुस्ताख़ी माफ़ ! चेहरे पर झुकी ज़ुल्फ़ें हटा दूँ तो...... "
मैडम जी, बहुत देर हो चुकी है, अब वोह चेहरा.. वोह ज़ुल्फ़ें.. सब बीते लम्हों में कैद हैं !
अब क्या ज़वाब दूँ, मैं तुम्हारे सवाल का ?

एक दफ़ा यही सवाल , यही सवाल ’ चिट्ठाकार ’ से भी फेंका गया था । मैंने किसी तरह इसको गली में सेफ़ ड्राइव करके, अपने को आउट होने से बचाया ! जी हाँ, मैडम जी.. हमरा दिमाग हर बेतुकेपन पर  आउट होने वाला लाइलाज़ ट्यूमर पाले है ! हालाँकि, समीर भाई आश्वासन दे गये हैं, कि वह कनाडा जाते ही जल्द ब जल्द मुझे इलाज़ के लिये बुलावेंगे ! अब देखो, उनके आश्वासन का क्या होता है ? सुना है, वह राजनीति में भी कभी सक्रिय रहे हैं । यह और बात है, कि तब  उनके घाघ साथियों ने आपके टँकी चढ़ते ही सीढ़ी गायब कर दी ! उतरने के प्रयास में लेखन की डाल पर अटक कर रह गये ।

पर्याप्त मनोरँजन हो चुका हो, तो फिर अपने पुराने पहाड़े पर आया जाय , या टाला जाय । अब तो मैं भी वरिष्ठ में घुस सकता हूँ । सो, चुप मार लिया जाय ? अब क्या ज़वाब दूँ, मैं तुम्हारे सवाल का ?

या फिर, मेहरबान कद्रदानों की तरफ़ टिप्पणी बक्से की चौकोर टोपी घुमा कर, क्रमशः लिख, इसे कभी न पूरा करने को यहाँ से सरक लिया जाय ?  वैसे भी आजकल मेरा ’वृहद-पोस्ट लेखन कलँकोद्धार व्रत ’  चल रहा है !  अपना सेहरा स्वयं ही पढ़ना तो शोभा न देगा, सो सकल प्रोटोकाल,  शिष्टाचार तज एक पोस्ट में मामला आज लगे हाथ यहीं सलटा दिया जाय ?

उत्सुकता एकदम ज़ेनुईन है, बहुतेरे डाक्टर घूम रहे हैं । ज़रूरी नहीं कि शोध करके ही Ph.D. शोधा हो, मानद भी तो बाँटी जा रही है । कई रंगबाज तो अपने को ऎसे ही डाक्टर लगाते हैं और लगभग ज़बरन आपसे मनवाते भी हैं । कच्छे से लेकर लंगोटावस्था तक आपने उनको गर्ल्स कालेज़ के इर्द गिर्द ही पाया होगा , फिर अचानक ही उनके नेमप्लेट पर एक अदद डाक्टर साहब नाम बन के टँगे दिखने लग पड़ते हैं,  डा.  हुक्का, ए. ट. पो. री. ( हि. ब्ला.)  ,  क्या करियेगा ? ये अपुण का इंडिया है, भिडु ! आपका मेरे ' कुछ ' होने पर संदेह नाज़ायज़ नहीं है । होना भी नहीं चाहिये,  माहौल ही ऎसा है !

एक एक्कनम एक
reply-to  dramar21071@yahoo.com
to Chithakar@googlegroups.com
date 6 Feb 2008 01:02
subject  Re: [Chitthakar] Re: याहू पर माईक्रोसॉफ्ट की बोली
mailed-by gmail.com

प्रिय बंधु,
ब्लागीर अभिवादन
विदित हो कि मैं डाक्टर अमर कुमार एततद्वारा घोषित करता हूँ कि मैं
पेशे से कायचिकित्सक बोले तो फ़िज़िशीयन हूँ
,अतः मेरी भाषा या लेखन की
त्रुटियों पर कत्तई ध्यान न दिया जाय । ईश्वर प्रदत्त आयू में से 55 बसंत को
पतझड़ में बदलने के पश्चात अनायास ही हिंदी माता के सेवा के बहाने से
कुछेक टुटपुँजिया ब्लागिंग कर रहा हूँ । वैसे युवावस्था की हरियाली में ही
हिंदी, अंग्रेज़ी,बाँगला साहित्य के खर पतवार चरने की लत लग गयी थी ,
और अब तो लतिहरों में पंजीकरण भी हो गया है ।
गुस्ताख़ी माफ़ हो तो अर्ज़ करूँ... इन उत्सुक्ताओं को देख मुझे दर-उत्सुक्ता
हो रही है कि आपकी उत्सुक्ता के पीछे कौन सी उत्सुक्ता है ? मेरी हाज़त
का खुलासा हो जाय, वरना कायम चूर्ण जैसी किसी उत्पाद के शरणागत
होना पड़ेगा । आगे जैसी आपकी मर्ज़ी..
सादर - अमर

ज़ाहिर है कि उपरोक्त रिप्रोडक्शन से व्यक्तिगत प्राइवेसी का हनन हो रहा है ,तो विवाद भी उठेंगे । उचित अनुचित पर सिर धुने जायेंगे । पर सनद तो सनद ही रहेगा ... यह इंटरनेट भी झक्कास चीज है भिडु , जो लिख दिया सो लिख दिया, दीमक के चाटने का लोचाईच नहीं इधर को !  बड़े बड़े को फँसायला है, बाप.. सोच के लिखने का इधुर को !
दो में लगा भागा
तो सज्जन और ….?, ( सज्जन का स्त्रीलिंग ? मेरे को नईं मालूम, नाहर साहब से पूछो ! )    
अमिं जी०एस०वी०एम० मेडिकल कालेज, कानपुर से चिकित्सा स्नातक इत्यादि इत्यादि हूँ, और सम्प्रति राहू सरीखा हिंदी ब्लागिंग से बरसने वाला अमृत चखने आप देव व देवियों की पंगत में चुपके से  आय  के ठँस गया हूँ । महादशा का अँदेशा तज दें, और इससे ज्यादा और कुछ भी तो नहीं
चोर निकल के भागा
अब यहाँ से फूट रहा हूँ,  आप इस राहू के शान्ति का आयोजन करें । नमस्कार !
us-thy outline
पर, सुराग क्या मिला भला ?
सुराग़ पुख़्ता या ख़स्ता जो भी मिला हो, पँडिताइन जाँच समिति ने 24 वर्षों बाद आज रिपोर्ट दी है.
कि मैं कड़वी दवाई-दारू वाला घिसा हुआ असली टाइटलर  हूँ ।
ओह,  लगता है सारथी जी  से स्लिप आफ़ माँइड , स्लिप होकर यहाँ  भी हिन्दी की निगरानी करने  आ पहुँचा है ! हाँ तो , मैं  अँग्रेज़ी  दवाई  वाला असली डाक्टर हूँ ! अँग्रेज़ी में दवाई लिखता हूँ, फिर  मुई  इसी  अँग्रेज़ी से गद्दारी  कर  के हिन्दी में बिलाग लिखता हूँ !
अलबत्ता कोई दलबदलू नेता नहीं हूँ !
अपने डाक्टर होने का हवाला देने में,  व्यक्तिगत मेल बिना इज़ाज़त सार्वजनिक कर दिये, तो क्षमा किया जाय । वैसे भी मैं आप सब की दया का पात्र हूँ । बड़ी बदतर हालत है मेरी,   न घर का - न घाट का ! मेरे मरीज़ भी सहज कहाँ विश्वास करते हैं कि मैं नुस्ख़े के अलावा कुछ और भी लिखने की अक्लियत रख सकता  हूँ !   जय हिन्द !

अनूप भाई पूछिन हैं,  कि पिछली पोस्ट कित्ते बजे लिखी गयी है !  वहू वतावेंगे गुरु, जरा  टैम तो मिले ? ब्लागजगत का फ़ुरसत तो आप हथियाये बैठे हो । ’ अथ तीन बजे रहस्यकम ’ जो केवल कुश जानते हैं, आप सब पब्लिक को कब लीक किया जाय ?  डेढ़ – दो  सौ  ग्राम  फ़ुरसत  कभी  इधर  भी  वाया  उन्नाव ट्राँस्फ़र करो न ? वहू बतावेंगे !  दुबारा से, जय हिन्द !

 

इससे आगे

01 May 2009

अनटाइटिल्ड !

Technorati icon

आज यहाँ मतदान का दिन था । हुँह, मतदान .. हम करें दान, ताकि वह कर सकें जनकल्याण !         बेहन माया ने सुबह सुबह मतदान किया ! मीडिया ने पर्याप्त कवरेज़ भी दिया ! अभी स्पष्ट ही नहीं है, 16-17-18-19 मई ( मोटामोटी बाद के बाद यह तीन दिन कुछ मोलभाव के रखिये न, भाई ! )जाने कौन प्रकट कृपाला - दीनदयाला आ जाँय और इन्हें नये सिरे से उनकी विरुदावली रचनी पड़ जाये ! फाइलों में कुछ तो रिकार्ड यह भी रखेंगे कि नहीं ? यही तो है, इनके  तरकश के तीर !
खैर.. मुझे क्या, यह उनकी प्रोब्लेम है !


सो, मतदान महापर्व पर आज पूरी छुट्टी मनाई ! ब्लागर से विद्रोह कर आज एक भरी पूरी पिक्चर भी देख डाली, क्योंकि अपुन ने तो डाक से अपना मत भेज दिया था ! कैसे, जब यह ब्लागर ट्रिक्स में आयेगा.. तो आपको भी  दिया जायेगा ! मत तो देना ही था !  ब्लागिंग करने से ही क्या होता है,  पर उनसे सहमत होने की मज़बूरी में अपना साधुवाद तो ज़ाहिर करना ही पड़ता है, भले ही कोई लाख कुपात्र हो ! खैर.. छोड़िये, यह मेरी प्रोब्लेम है !


62 वर्ष के बीमार बूढ़े को ज़िन्दा रखने साथ ही उसकी रक्षा भी करने की अपीलें लगातार आ रही थीं !  ज़ाहिर है, किसने कैसे वोट डाला, क्या क्या न हुआ ! इसपर पोस्ट आना शुरु भी हो चुका होगा, साथ कैमरा भी होता तो पोस्ट में चार चाँद लग जाते ! वह हेलीकाप्टर से उड़ उड़ कर आते रहे, चार पहिया स्कार्पियो  में दूर दराज के अँधेरों तक विचरते रहे ! अपनी पँचसाला खुराक नहीं, बल्कि भीख माँगने आये थे ! सो, आप धूप में घिसट कर ,अपने महापर्वों पर अन्नदान, द्रव्यदान, स्वर्णदान देने की तरह मतदान के लिये भी गये होंगे । वह  एक बार बढ़िया तरीके से , भारतमाता के नाम पर गौदान करना चाहते हैं । यह महापर्व कोई ऎसे ही नहीं है, हम तो पूरी आस्था के साथ इसके साथ हैं ! अब आप ही क्यों, मतदान करने को आतुर धूप में तपते घिसते रहे ।
यह तो भाई आपकी प्रोब्लेम है !

बेहन माया जी, सुबह ’ फ़िरेस ’ होते ही मतदान को निकल पड़ीं, पिरेस मेडिआ वगैरह के कैमरे के सामने अपने खाली पेट होने की दुहाई भी दे डाली ! खाली रहना ही चाहिये, जनसेवा कोई हँसी ठट्ठा नहीं है, मित्रों ! खाली पेट निकली हैं, बताने की कौन ज़रूरत ? शायद यही उनकी निगाह में लोकतंतर के लिये किया जाने वाला त्याग है ! खाली पेट.. आखिर कब तक खाली रखेंगी, बेहन जी, वह तो जनसेवा के चूरे से शनैः शनैः  भर ही जायेगा । उनका पेट कभी भरेगा भी कि, नहीं ?
यही तो पूरे देश की प्रोब्लेम है !

ई क्या तब से प्रोब्लेम प्रोब्लेम किये जा रहा है, कुछ हल्की-फुल्की बेहतरीन टी. पी. आर. वाली पोस्ट लिख न भाई, मेरे.. टिप्पणियाँ प्यारी नहीं है, क्या ? ना ना, मित्रों.. यह पन्डिताइन नहीं, बल्कि निट्ठल्ले महाराज अँदर से कुड़्कुड़ा रहे हैं ! " चुप कर ऒऎ खोत्ते,  इस समय सुँदरम नक्षत्र अस्ताचल पर है, सो गूगल-गुरु के घर में बैठा हुआ मँगल अनायास ही ब्लागर को टिप्पणी-वैल्यू के शनि भाव से देखने लग पड़ा है, शाँत हो लेने दो । तब तक तू निट्ठल्ला ही बैठा रह ! "

शायद मति मारी गयी है, तभी यह पोस्ट बिना किसी विषय के ही लिखने लग पड़ा हूँ ! इसको आप कितना पढ़ पाते हैं, यह तो अब एडसेन्स की भी प्रोब्लेम न रही । बेचारों का स्टैटिक्स ही गड़बड़ा गया, किसी पेज़ पर कोई एक मिनट से अधिक तो ठहरता नहीं, ट्रैफ़िक बढ़ रही है , और क्लिक एक्को नहीं ? जनहित में जारी किये जाने वाले मोफ़त के प्रलोभनों पर तो कोई क्लिक करता नहीं, और ये अँटी ढीली करवाने वाले विग्यापनों की बाट जोह रहे हैं, चिरकुट !"  रहना नहीं देस बेगाना रे ..
शायद अब  हम सभी लोग एडसेन्स की ही प्रोब्लेम हैं !

अब कुछ कुछ ज्ञानोदय हो रहा है.. टी. पी. आर. पर टाइमखोटी करना था ! सोचा कि, जब तक  गूगल बाबा हिन्दी ब्लागिंग के भविष्य और संभावित, प्रोजेक्टेड टी. पी. आर.  पर सेमीनार करने में व्यस्त हैं, लाओ कुछ पोस्ट ही पढ़ डाली जाये । इस समय रात है, सभी सो चुके होंगे ! अभिषेक जी ने ऎसा पिलाया, कि मैं मदहोश होकर स्वाइन फ़्लू पर कुछ लिख आया, यह और बात है, कि यहाँ भी मुझे डम्प ड्रग डिस्पोज़ल की नीति दिख रही है !
 

तो, यदि कोई नवाब या को.. "  छड्डयार, वो मन्तरी बन जावेंगे, तुस्सीं देखदे रहियो "
ई डिस्टर्बिंग एलिमेन्ट कोई और नहीं, पँडिताइन हैं !
अंतिम शब्दों तक की बोर्ड छीना जा रहा है, मैं उसे बचाने के प्रयास में रिरिया रहा हूँ,
" रहम कर मेरी एक्स. अनारकली.. अभी अपने दिमाग का बग तो यहाँ डाला ही नहीं.. ! "
ई मरदानी भला काहे सुनें ? जौ सुन लेतीं, तो आज हमरी ज़नानी होतीं ! "
ईह्ह, लेयो बग डाल दिया, प्रणाम ब्लागिंग बग जी !!

2842

इससे आगे

29 April 2009

कभी कभी मेरे दिल में..

Technorati icon

….  यह ख़्याल आता है कि, ब्लागिंग में मुआ ब्लागर आख़िर करता क्या है ...  क्या केवल यही तो नहीं,   कि   " रमैया तोर दुल्हिन लूटै बजार " ?
शायद ऎसा नहीं ही होगा.. काहे कि सदियन पाछै कबीरौ पलटि के ठोकिं गये रहें,

" हम तुम तुम हम और न कोई । तुमहि पुरुष हम ही तोर जोई ॥ "
ब्लागर के जोई का कोई सगा सम्बन्धी क्यों न हो ? सो, ब्लागस्पाट की मेहरारू और पाठकों की भौजाई बने बिना ब्लागिंग  करना दिनों दिन जैसे दुष्कर होता जा रहा है..  sambhal ke- nitthalle( छिमा करो, माता ! )

जौन मज़बूरी में भौजाई बने हो.. तौनै मा ननद जी की गारी भी सुनो । वर्ड-वेरीफ़िकेशन  का नेग माफ़ करवा लेने से ही  काम   न चलेगा ..  बस जरा, आती हुई टिप्पणियों पर निगाह रखो ।

क्या पता, कोई गरियाने की आड़ में कहीं सच ही न उगल रहा हो ?  गरियाओ.. नेता को... अभिनेता को .. सराहो सतयुग को.. त्रेता को.. अर्थात,  कुल ज़मा अर्क-ए-ब्लागिंग यह है,

कि " हे तात तुस्सीं सत्यम ब्रूयात प्रियं ब्रूयान्न .. चँगी चँगी मिठियाँ गल्लाँ कीत्ता कर ! " मेरी भाषा ही गड़बड़ है क्या, दिल ने धिक्कारा, " ई का लिख रहा है, बे ? "  दिमाग ने ऊपरी मँज़िल से अलग दहाड़ लगायी, " जितना कहना था कह दिया, अब इससे आगे एक भी लैन नहिं लिखने का ! " ठीक है, श्री व्यवहारिकता जी.. इतने ही पर छोड़ देते हैं.. सत्यम ब्रूयात प्रियं ब्रूयान्न ! अर्थात हे पशु, पुच्छविहीना .. तुम सच ही बोलो , और प्रिय ही बोलो !  अब इससे आगे एक लफ़्ज़ भी निकालने की कौनो ज़रूरत नाहीं है !

तो,    फिर यहीं छोड़ते हैं.. आगे की लाइनें आज रहने देता हूँ, कि
सत्यम ब्रूयात प्रियं ब्रूयान्न ब्रूयात्सत्यमप्रियम
सत्य बोलो प्रिय बोलो । अप्रिय सत्य ( काने को काना ) मत बोलो ।
प्रियं च नानृतं ब्रूयादेव धर्म सनातनः ॥
पर, ऎसा ठकुरसुहाती प्रिय भी न बोलो, जिससे धर्म की हानि हो !kabhi kabhi

अधूरी जानकारी और अधूरे उद्धरण बड़ा सुख देते हैं !   नो हाय हाय.. एन्ड आफ कोर्स नो चिक चिक !
तब्भीऽऽ…  ऊपर वाला डाँट रहा था, कि दूसरी लैन मत पकड़ना,    अवश्य ही यह कोई स्पैम है !

लो,  स्थूलकाया मधु्रवाणी आपकी भौज़ी यानि पंडिताइन प्रकट हो कर, बरजती हैं,  “ तुम भीऽऽ.. ना,     क्या सुबह सुबह इस मुई को लेकर बैठ गये ? “ मैं विहँस पड़ा, ’ कुछ नहीं.. भाई,  जरा मैं भी दो लाइना मार दूँ,    यहाँ तो नित नये अनुभव हो रहे हैं ! "       फिर तो उधर से सीधा एक लिट्टाई हमला,  “ तो .. तुम अनुभव की कँघी पर लपकते रहो.. जब तक यह हाथ आयेगी, तुम खुद ही गँज़े हो चुके होगे ? " मुझे तो आज तक सैन्डिल भी नसीब न हुई, और यह मुझे ज़ूते का भय दिखा रहीं हैं ! भला  आपही     बताइये..         शब्दबाणों से कभी कोई गँज़ा हुआ है,   क्या ?     मैं तो आलरेडी पहले से ही सेमीगँज़ा हूँ !   शायद इसीलिये, कभी कभी मेरे दिल में...

इससे आगे

16 April 2009

कँघा आरक्षण के लिये ग़ँज़ों की गणना

Technorati icon
बड़ा बेहूदा शीर्षक है, न ? मुझे भी लग रहा है, पर समय के पैंतरेबाजी के आगे सभी नतमस्तक.. तो मैं भी नतमस्तक !  हालाँकि ऎसे समय लोकतंत्र के हज़्ज़ाम सबसे ज़्यादा नतमस्तक हैं !
जरा ध्यान से.. आचार संहिता जारी आहे .. गड़बड़ लिखोगे तो माफ़ीनामें पर दस्तख़त करने को हाथ भी न बचेंगे । यह कोई और नहीं.. बल्कि मेरी स्वतंत्र अभिव्यक्ति की पहरेदार पंडिताइन हैं !    थोड़ा सा दिनेश जी का लिहाज़ है, वरना गंज़ों से अधिक धर्म-निरपेक्ष, वर्ग निरपेक्ष सदियों से उपेक्षित मुझे तो कोई अन्य वर्ग न दिखता ! किसी मीडिया वाले ने ध्यान ही न दिया, इनपे !
हाँ तो बात “  तू मेरा चाँद.. मैं तेरी चाँदनी “ के श्री चँदा जी की हो रही थी ! अच्छा तो चलिये जरा आप ही बताइये, आपके शहर में कितने होंगे ? इस अनुपात से आपके जिले में इनकी संख्या कितनी होगी ? फिर तो पूरे प्रदेश में इनकी जनसंख्या का आकलन करना भी आपके लिये बहुत ही सुगम होगा । न होय तो ज्ञान दद्दा से पूछि लेयो । लो, अपना तो  बन गया काम !
तो अब एक छोटी सी सहायता और,जरा यह जानकारी भी एकत्रित कर लें कि इनमें से अधिकांश का रूझान किधर है,  कंघा पार्टी की तरफ़ या आईना पार्टी की तरफ़ ? यह भंग की तरंग नही है, यह मश्शकत तो हमारे मीडियाकर्मी कर तो  रहे हैं । आपौ बुड्ढीजीवी कहात हो, अपने दालान बैठ के आपौ ई चुनाव सार्थक कर लेयो ।
मुला,उनके इस वर्गीकरण का खाका कुछ अपनी ही तरह का होता है । अगड़े, पिछड़े, सवर्ण, जनजाति, मुस्लिम, हिंदू , सिक्ख इत्यादि इत्यादि । इतने पर भी संतोष नहीं,तो फिर इनकी शाखायें और परिशाखाओं पर सिर खपाऊ रिपोर्ट उछाली जाती हैं । अगड़े मानी ब्राह्मण ( घर में खाने को नहीं है ) , क्षत्रिय कुलीन वर्ण , पिछड़े बोले तो .. कोनो मँहगी कार का नाम बताओ भाई, हाँ तो, उसी में घूमते यादव जी सहित  कुर्मी ,पासी जैसे मलिन वर्ण । हमारी छोड़ो.. हम कायस्थ तो खैर त्रिशंकु जैसे टंगे हैं वर्ण निरपेक्ष ! काहे में हैं, आज तलक यहि पता नहिं.. कोनो कहत है, तुम तो आधे ऊई मा हो !  मतलब हम धरम से भी गये !
किंतु इस प्रकार के जाति एवं वर्णव्यस्था को लेकर चलने वाले जद्दोजहद की कोई मिसाल इस सदी में कहीं और भी है ?  हमारे  यहाँ तो है.. आओ देखो इनक्रेडिबल इन्डिया ! अब आप भी वक़्त की नज़ाकत पहचानो.. और जरा अपने पितरों के गोत्र और पुरखों के ठौर ठियाँ का पता लगा के रखो । अब अगले के अगले के अगले के पिछली बार यही होने वाला है । वँशावली तलाशी होगी.. फिर न कहना कि आगाह न किया था ! सरम काहे का.. हमरे मर्यादा देशोत्तम यूएसए का तो यही चलन है.. मेड इन यू.एस.ए. भाई साहब आपन झोला उठाइन और चल दिये हिन्दुस्तान दैट्स इन्डिया.. भटक रहे मालेगाँव तालेगाँव टिंडा भटिंडा .. जाने कहाँ कहाँ ! क्या कि अपना रूट्स तलाश रहे हैं !
हद्द खतम है, हमरे सुघढ़ मीडिया वाले इतने थोथी बुद्धि के कैसे निकले ? कैच इट गाय.. जस्ट बिफ़ोर एनिवन एल्स टेक्स द क्रेडिट । माफ़ करना,  ऊ लोग भी अँग्रेज़िये में सोचते हैं, बोलते भी वोहि मा हैं ( धुत्त ! लालू झाँक रिया था ! ) क़ाफ़ी हाउस के बाहर आकर हिदी उचारना उनकी मज़बूरी है.. पैसा मिलेगा तो हिन्दी चनलों में ताक जाँक करने वालों की दया से !
यह इनकी लोमड़पँथी है, यदि यह आंकड़े न पैदा करें, तो हमारे स्वयंभू भारत भाग्यविधाता ऎसी नितांत अप्रासंगिक समीकरण कैसे बैठायेंगे ? लोगों के ' माइंडसेट ' में अपनी गणित कैसे आरोपित की जाये, यही इनकी मुख्य चिंता है । आख़िर वह कौन से लोकतांत्रिक सरोकार हैं, जो इनको इस मुद्दे में अपनी मथानी चलाने को बाध्य करती हैं ? उनके सरोकार किसी को लेकर नहीं हैं किंतु उनका संदेश स्पष्ट है, "अरे ओ भारतवासियों , बहुत नाइंसाफ़ी है रे, पोंगापंथी सेकुलर सरकार में !" इस मंथन से नवनीत कैसा निकलता रहा है, आप स्वयं साक्षी हैं !
जनतंत्र का चौथा स्तम्भ कितना लचर होता जा रहा है क्या किसी गवाह सबूत की वाकई ज़रूरत है ?  क्या हम गँवारों को यह सब गणित पढ़ने समझने की जरूरत है ? कहां से, कैसे इस जातिगणित की शुरुआत हुई और इसे समीकरणों ,थ्योरम की हवा देकर मीडिया कहां तक ले जाकर इसका अंत करेगी ? इसके पटाक्षेप का कोई अंधा मुकाम तो होगा ही, जहां इनके अपने हित सधने पर ' इति सिद्धम ' के उदघोष की ध्वनि क्षीण होती जायेगी ।
आज यह क्या हो गया डाक्टर साहब को, कहां की लंतरानी कहां घुसेड़ रहे हैं ? इस आलेख को मीडिया पर हमला न समझा जाये, चलिये हमला ही समझिये.. पर जो मन में समाया था , वह निकाल दिया । इसके ज़ायज और नाज़ायज होने का फैसला आप  करें न करें ।
सच है, क्योंकि यहां कोई राजनीतिक उद्देश्य नहीं है,  यह बानगी महज़ आपको कुरेदने की कवायद भर है। इस सिक्के का दूसरा पहलू है देश के आबादी के शिक्षा का प्रतिशत ! ज़ाहिर है शिक्षा और किरानी के नौकरी का आनुपातिक संबन्ध मैकाले के समय से ही शाश्वत चला आ रहा है ।
किंतु यहां तो मीडिया अपनी सुविधानुसार इस पहलू को फ़िल्म 'शोले' में डबलरोल का किरदार निभाने वाले सिक्के की तरह छुपाये रखना चाहती है, शायद वांछित क्लाईमेक्स की प्रतिक्षा में ।
अब शायद धुंधलका कुछ छंट रहा हो, यह उनका शग़ल है, जनमानस के सोच की दिशा बदलने का । बोले तो ? पब्लिक माइंडसेट पर फटका मारने का माफ़िक । ई साला अपुन के माइंड का स्टीयरिंग रखेला हाथ में , बहुत बड़ा ग़ेम है, बाप ! आप मुझसे सवाल करें, क्या वाकई ऎसा ही है .... तो तुम भी तो इसी को टापिक बना कर ठेले पड़े हो !
अधिकांश जन शायद भोजपुरी न पकड़ पायें, अवधी में कहते हैं, " गाये गाये तौ बियाहो हुई जात है ", आप न मानें पर यह सही  है, अच्छा खासा समझदार आदमी भी " यह देश है अगड़े पिछड़े का.. " के लगातार बजते जाते बैंड पर सम्मोहित होकर पाँच-साला फंदे के सम्मुख शीश नवा देता है । अब भी संशय है तो  किसी  प्रोपेगंडा मशीन तक न जाकर अपने को ही ले लीजिये .. 
नहीं लेते..  पर मैंने तो खुद सुना है कि लगातार 'कांटा लगा..हाय रे हाय...', 'बीड़ी जलईले ज़िगर से..' और 'झलक दिखला जा..आज्जा आज्जा आआज्जा' सुनते सुनते आप स्वयं भी विभोर हो कर गुनगुना रहे थे ,..' उंअंज्जाअंजाअंज्जाअंजाउंउंउंऊं ! ' 
स्टीयरिंग मेरे हाथा या चैनल के साथ Indian General Election 2009
स्टीयरिंग किसके हाथ.. हमारे या उनके ? 
क्यों उस पल हमारी सारी लिखाई पढ़ाई संस्कार सरोकार मास कैज़ुअल लीव पर चली गयी ?
तो यह मीडिया के माइंडसेट स्टीयर करने के इस खेल का अंपायर बन प्रबुद्ध समाज भी लगातार ’ नो बाल या वाइड बाल ' दिये जा रहा है । सबकी निग़ाह घुड़सवार पर है.. Sheep-01-june
जाकी होशियार.. घोड़ा कमजोर.. जाकी कमजोर तो घोड़ा मज़बूत !   घोड़े पर दाँव लग रहा है.. यह जीतेगा वह जीतेगा । लेकिन मीडिया वाले  दादा,हमका ई तौ बताय देयो ई रेसवा काहे हुई रहा है, मकसद ?  फिर तो देश के अस्सी फ़ीसदी निरक्षर भट्टाचार्यों की क्या बिसात !  बेचारे इसी में बह रहेंगे, कि 'कुछ तौ है.........झूठ थोड़े होई ? साँचै जनात है,  तबहिन सबै जउन देखो तउन  टी-वी मा एकै चीज देखावत हैं ' झूठ थोड़े होई ? मज़किया नाहिं हौ ! सरकार केर आय ई टीवी.. ऊप्पर अकास से आवत है ! " लो कर लो बात !
BREAKING NEWS : चुनाव परिणामों के बाद गँजों को कँघा देने का वादा कर जीतने वाले घुड़सवार ने  अब इन्हें उस्तरा देने की पेशकश की !  कँघा आरक्षित !
उधर अपुन के निट्ठल्ले ने इसके लिये उस्तरे आयात  किये जाने की आशंका जतायी !
इससे आगे

12 April 2009

मत मानो मेरा मत, पर यह मत कहना कि मत नहीं दिया था

Technorati icon
विष्णु प्रभाकर जी नहीं रहे । कुछेक शीर्ष अख़बारों के लिये यह ब्रेकिंग न्यूज़ न रही होगी ! अनूप जी ने उचित सम्मान दिया !  विष्णु जी ने आवारा मसीहा के लिये सामग्री जुटाने के लिये जो कल्पनातीत श्रम किया है, मैं तो केवल इसी तथ्य से ही उनका भक्त बन गया । बाद के दिनों में तो उनके अन्य तत्व भी दिखने लगे थे ! अपने साहित्य साधना में वह विवादो की काग़ज़ की रेख से अपने को बचा ले गये, यह उनकी एक बड़ी उपल्ब्धि है !
उन्हें सच्चे मन से श्रद्धाँजलि ! 
चिट्ठा-चर्चा को लेकर अनूप जी की व्यथा बहुत ही स्पष्ट है,  इससे  भी  अधिक इसके प्रति आज उनका दृष्टिकोण भी स्पष्ट और मुखर है । 
     
हालाँकि एक बार उन्होंने ही चिट्ठों के चयन को लेकर चर्चाकार की अबाध्यता को ज़ायज़ ठहराते हुये अपना पल्ला झाड़ लिया था !  एक वरिष्ठ चिट्ठाकार को सलाह देना कितना प्रासंगिक हो सकता है, नहीं जानता .. पर मेरा ’ सचेतक ’ चरित्र अपनी बात ठेलने को प्रेरित कर रहा है !
आगे बढ़ने के लिये परस्पर विमर्श आवश्यक है, क्या वज़ह है कि आज़ तमिल चिट्ठाकारी हिन्दी से कहीं आगे है ? कोई 2005-2006 के मध्य वहाँ चलने वाली बहसों की बानगी लेकर देख सकता है ! आपसी सिर-फ़ुट्टौवल तो नहीं, पर बाँगला ब्लागरों में परस्पर अहंभाव ने उसे भी न पनपने दिया ! बीस पोस्ट के बाद स्वयं का डोमेन लेकर अपना चूल्हा अलग !
बहुचर्चित  एक लाइना को चिट्ठों के शीर्षक के पैरोडी मात्र के रूप में लिया जाना, मुझे कभी से भी अच्छा न लगा । हरि अनन्ता-संता बंता अपवाद भले हो, संभवतः आज तक मैंनें इनकी तारीफ़ न किया होगा !  आनन्द अवश्य लेता रहा ! पोस्ट के लिंक को सपाट रूप से न देकर रोचक बनाने का प्रयास ही माना जाय, एक लाइना !  होता यह है, कि लोग चर्चा के मूल पाठ को भी न पढ़. .. सीधे एक लाइना पर एक टिप्पणी ठोक कर बढ़ लेते हैं ।
और.. इसमें भी वह इतने ईमानदार हैं, कि जिस भी चिट्ठे के शीर्षक और लाइना की जुगलबन्दी पर झूम उठते हैं, शायद ही वहाँ पहुँचते हों !
जी हाँ, मैंने चिट्ठाचर्चा के कई नियमित टिप्पणीकारों का ’ पीछा किया है :), और ताज़्ज़ुब है कि पोस्ट तो छोड़िये.. पूरे के पूरे ब्लाग पर ही उनकी टिप्पणी नदारद है !  मानों वह यहाँ चर्चा पर, केवल छींटाकशी करने के लिये ही आते हों !
फिर तो हो चुका कल्याण ? यदि पाने की अपेक्षा रखते हैं, तो देने की क्यों नहीं ?
किसी भी बहस के निष्कर्ष सभी को एक दिशा देते हैं ।  भले ही पाठक-चिट्ठाकार उस पर न चले, पर दिशा तो मिले ? इसका यहाँ अभाव केवल इसलिये है, कि ऎसी बहस में अंतिम मत मोडरेटर या चर्चाकार का होना ही चाहिये, जो कि बहुधा नहीं होता  ! गोया हनुमान गुरु अपने चेलों का रियाज़ देख रहे हों ।  नतीज़ा.. हर सार्थक  बहस ’ दूर खड़ी ज़मालो के आग़ ’ जैसी बुझ कर राख़ हो जाती है  !  यह अलंकार लगभग हर बहस में खरी उतरती है,  आपके पास अनुभव है,  चिट्ठाकारी का रोमांचक इतिहास है.. सो विषम मोड़ों पर,  कुछ तो.. मोडरेटर का मत होनाइच मँगता, बास !  बुरा मानने का नेंईं..
अपने पोस्ट का लिंक यहाँ सभी देखना चाहते हैं.. पर, दूसरे के लिये ?
मत लीजिये मेरा मत, कि चर्चा के लिये माडरेशन का एक सार्थक उपयोग भी  हो सकता है.. !
वह यह कि हर टिप्पणीकार के लिये अपनी टिप्पणी में एक पढ़े हुये पोस्ट का लिंक और उसके  साथ उस पोस्ट पर अपनी मात्र दो पंक्तियाँ जोड़ कर देना अनिवार्य समझा जाये  .. अन्यथा उनकी टिप्पणी हटा दी जायेगी ! हाँ, मुझ सरीखे लाचार टिप्पणीकार को यह छूट मिल सकती है ! इससे लाभ ?
१. चर्चा का दुरूह का कार्य चर्चाकार के लिये आसान हो पायेगा !
. दूरदराज़ के अलग थलग पड़े चिट्ठों का संचयन स्वतः ही होने लग पड़ेगा !
३. एक लाइना की नयी पौध भी सिंचित हो सकेगी !
४. यदा कदा कुछ चर्चा जो थोपी हुई सी लगती है, न लगेगी !
५.  मेरे सरीखा   घटिया आम पाठक भी चर्चा तक ले जाने को एक बेहतर लिंक तलाशेगा,
६. ज़ाहिर है, कि ऎसा वह अपनी मंडली से बाहर निकल कर ही कर पायेगा !
मानि कि, कउनबाजी तउनबाजी कम हो जायेगी !
७. ’ तू मेरा लिंक भेज-मैं तेरा भेजूँगा ’  जैसी लाबीईंग हो शुरु सकती है, पर ऎसे जोड़े भी काम के साबित होंगे ! क्योंकि  तब भाई भाई में मनमुटाव भी न होगा !
८. क्योंकि इस होड़ में नई और बेहतर पोस्ट आने की रफ़्तार बढ़ेगी.. धड़ाधड़ महाराज़ का हाल आप देख रहे हैं, श्रीमान जी स्वचालित हैं.. वह क्यों देखें कि यूनियन बैंक की शाखा के उद्द्घाटन सरीखी पोस्ट हिन्दी को क्या दे रहीं हैं ?
. मेरे जैसा भदेस टिप्पणीकार अपने साथी से पूछ भी सकता है, चर्चाकार ने तुमको क्या दिया, वह बाद में देखेंगे ! पहले यह दिखाओ कि, टिप्पणी बक्से के ऊपर वाले हिस्से में तुम्हारा योगदान क्या  है ?
१०. लोग कहते हैं, चर्चा है कि तुष्टिकरण मंच.. मैं कहुँगा कि, नो तुष्टिकरण एट आल ! तुष्टिकरण के दुष्परिणामों पर यदि हम पोस्ट लिखते नहीं थकते, तो अपने स्वयं के घर में तुष्टिकरण क्यों ?
११. यहाँ पर मैं श्री अनूप शुक्ल से खुल्लमखुला नाराज़ हूँ.. किसी के ऎतराज़ पर कुछ भी हटाया जाना.. नितांत गलत है !   कीचड़ में गिरने को अभिशप्त या संयोगवश, मैं उस रात धुर बारह बजे पाबला-प्रहसन देख रहा था ! बीच बीच में तकरीबन डेढ़ घंटे तक मेरा F5 सक्रिय रहा, निष्कर्ष यह रहा कि कुश ( बे... चारा ! )  को सोते से जगा कर उनकी अनुमति  से एक चित्र हटाया गया.. अन्य भी प्रसंग हैं ।
कुश देखने में शरीफ़ लगते हैं, तो होंगे भी ! क्योंकि मैं इन दोनों की तीन कप क़ाफ़ी ढकेल गया.. पर यह अरमान रह गया कि वह इस प्रकरण को किस रूप से देखते हैं, कुछ बोलें !
१२. विषय का चयन, निजता का हनन, अभिव्यक्ति का हनन इत्यादि नितांत चर्चाकार के विवेक पर हो, और ऎसा डिस्क्लेमर लगा देनें में मुझे तो कोई बुराई नहीं दिखती !
१३. क्या किसी को लगता है, कि इस प्रकार पोस्ट सुझाये जाते रहते जाने की परंपरा से अच्छे पोस्ट की वोटिंग भी स्वतः होती रहेगी ?
१४. चिट्ठाचर्चा के अंत में के साथ ही आभार प्रदर्शन के एक स्थायी फ़ीचर में अपना नाम कौन नहीं देखना चाहेगा ?
१५. स्वान्तः सुखाय लिखने वालों के लिये, कोई भी व्यक्ति बहुजन-हिताय जैसे चर्चा श्रम में क्यों शेष हो जाये ?  जानता है, वह कि, यह श्रमसाध्य कार्य भी अगले दिन आर्काईव में जाकर लेट जायेगी..  कभी खटखटाओ तो Error 404 - Not Found कह कर मुँह ढाँप लेंगीं !
१६. गुरु, अब ई न बोलिहौ..  लेयो सामने आय कै आपै ई झाम कल्लो, इश्माईली !  यह मेरा मत है.. जिसका शीर्षक  है.. मत मानों मेरा मत ! क्योंकि मेरा तो यह भी मत है, कि एक को ललकारने की अपेक्षा सभी को अपरोक्ष रूप से शामिल किये जाने की आवश्यकता है !
१७. इन सब लटकों से पाठकों की संख्या घट सकती है, तो ?  मेरी भी तो नहीं बढ़ रही है !   लेकिन  कमेन्ट-कोला की माँग पर ’कोई  भी बंदा ’  खईके पान बनारस वाला ’  तो नहीं  गा सकता .. " मेरे अँगनें में तुम्हारा क्या काम है ..
यह रहा कविता जी के कालीदास का १८ सूत्र ... उन्नीसवाँ सूत्र निच्चू टपोरी का टिप्पणा वाला डब्बा में पड़ेला सड़ेला होयेंगा !  बीसवाँ सूत्र तो शायद स्व. इन्दिरा गाँधी का पेटेन्ट रहा है, सो, इस चुनाव में कौन गाये… अबकी बरस भेजऽऽ,  उनको रे  तू वोटर…   गरीबी जो देयँ हटाऽऽय हो
माहौल गड़बड़ाय रहा है.. लोकतंत्र लड़खड़ाय रहा है... चिट्ठाचर्चा खड़बड़ाय रहा है.. ज़िन्दा सभी को रहना है.. ज़िन्दा हैं.. तो ज़िन्दा रहेंगे भी ! चर्चा चलती रहेगी..  मरें चर्चा के दुश्मन ..
कुछ अधिक हो गया क्या ?
मैं चाहता तो न था , कि छोटे मुँह से बड़ी बातें करूँ ! लोग मुँहफट कहेंगे..  पर यदि  चर्चा के मोडरेटरगण ने  किसी को चर्चा के लिये चुना है, तो यह उन्हीं का अपना वरडिक्ट है । अगला चर्चा करने ही  न आये तो दुःखी क्यों ?  मैं भी तो ब्लाग  लिखने तक  ही दुःखी  होता हूँ.. जबकि हमारे वरडिक्ट की भी ऎसी तैसी मचा कर भाई लोग संसद ही नहीं पहुँचते, तो ?
मैं कब आपसे या किसी और से रात के डेढ़ बजे तक बैठ कर चर्चा अगोरने का हर्ज़ाना माँग रहा हूँ smile_regular ?
१७ ही बिन्दु रह गये ?  श्री कालीदास जी १७ को १८ ही गिना करते थे, ऎसा उल्लेख मिला है !
हमका लागत है, निट्ठल्ले की आत्मा यहूँ मँडराय लागि काऽऽ हो,  तौन अब चलि ? 
इससे आगे

15 March 2009

नतीज़ा रहा सिफ़र ?

Technorati icon

नतीज़ा आज की पालीमिक्स-चर्चा ने मुझे एक बार  फिर बाध्य किया है.. कि मैं भी टपक पड़ूँ ! परमस्नेहिल लावण्या दीदी आहत हुईं.. उनकी तात्कालिक प्रतिक्रिया अपना कितना प्रभाव छोड़ पायी होगी.. यह देखना बाकी है ! मैं भी अपने साथी चिट्ठाकारों के विषय-कल्लोल पर यथाशक्ति – तथाबुद्धि कुछ टीप –टाप भी आया ! यहां पर वही दोहराना आत्ममुग्धता के संदर्भ में न लेकर, ‘ ऎसी बहसें टिप्पणी बक्से में ‘ डिब्बा – बंद ‘ हो अपना संदर्भ खो देने को ही जन्म लेती हैं ‘ की धारणा को नकारने को ही है । मुई पैदा हुईं – कोलाहल मचवाया – फिर मर गयीं ! तदांतर विषयांतर का दो तीन  ब्रेक ( राष्ट्रपति शासन या ब्लागपति शासन ? ) के बाद दूसरे ने स्थान ग्रहण किया.. फिर वही कोलाहल – वही अकाल मृत्यु .. ब्रेक .. एक अलग तरह की तोतोचानी है ! ज़रूरी नहीं, कोई इससे सहमत ही हो.. क्योंकि  मैं नासमझ, निट्ठल्ला कोई अश्वमेध के घोड़े भी नहीं खोलने जा  रहा । जिसको मन हो अपने दुआरे यह दुल्लत्ती जीव बाँध ले, जो भी हो, पर यह सनद रहे कि..

lavanya-dee मैं उपस्थित हो गया, लावण्या दी !
मैं कुछ दिनों के लिये हटा नहीं, कि झाँय झाँय शुरु ?
इस बहस में आज मुझे अन्य चिट्ठाकारों की भी टिप्पणी पढ़नी पड़ी..
पढ़नी पड़ी.. बोले तो, हवा का रूख देख कर टीपना मुझे नहीं सुहाता !
खैर... इस पूरे प्रकरण को क्या एक मानव की संघर्षगाथा मात्र के रूप में नहीं लिया जा सकता था ?

मानव निर्मित जाति व्यवस्था पर इतनी चिल्ल-पों कहीं अपने अपने सामंतवादी सोच को सहलाने के लिये ही तो नहीं किया जा रहा ?  किसी पोथी पत्रा का संदर्भ न उड़ेलते हुये, मैं केवल इतना ही कह सकता हूँ..    यह एक बेमानी बहस है.. क्योंकि ज़रूरत कुछ और ही है !
ज़रूरत समानता लाने की है.. न कि असमानता को जीवित रखने की है ?
इस बहस से, यह फिर से जी उठा है ! नतीज़ा ?
चलिये, सुविधा के लिये मैं भी चमार को चमार ही कहता हूँ,
क्योंकि मुझे यही सिखाया गया है.. दुःख तब होता है.. जब बुद्धिजीवियों के मंच से इसे पोसा जाता है !
समाज में केचुँये ही सही.. पर हैं तो मानव ?
बल्कि यहाँ पर तो, मैं लिंगभेद भी नहीं मानता..
यदि हर महान व्यक्ति के पीछे किसी न किसी स्त्री का हाथ होता है.. जो कि वास्तव में सत्य है..
तो स्त्री पीछे रहे ही क्यों.. और हम उसके आगे आने को अनुकरणीय मान तालियाँ क्यों पीटने लग पड़ें …
या कि लिंग स्थापन प्रकृति प्रदत्त एक संयोग ही क्यों न माना जाये ?
चर्मकार कालांतर में चमार हो गये.. मरे हुये ढोर ढँगर को आबादी से बाहर तक ढोने और उसके बहुमूल्य चमड़े
                    ( तब पिलासटीक रैक्शीन कहाँ होते थें भाई साहब ?
) को निकालने के चलते अस्पृश्य हो गये ! पर क्या इतने.. कि अतिशयोक्ति और अतिरंजना के उछाह में हमारे वेदरचयिता यह कह गये..कि " यदि किसी शूद्र के कानों में इसकी ॠचायें पड़ जायें.. तो उन अभिशप्त कानों में पिघला सीसा उड़ेलने का विधान है ", क्यों भई ?
क्या यह भारतवर्ष यानि " जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी " ' के उपज नही थे ?
या हम स्वंय ही इतने जनेऊ-संवेदी क्यों हैं, भई ?
नेतृत्व चुनते समय विकल्पहीनता का रोना रो..
उपनाम और गोत्र को आधार बना लेते हैं, क्या करें मज़बूरी कहना एक कुटिलता से अधिक कुछ नहीं ।
इसका ज़िक्र करना विषयांतर नहीं, क्योंकि मेरी निगाह में..यह एक बेमानी बहस है.. क्योंकि ज़रूरत कुछ और ही है !
मैं उपस्थित हो गया, लावण्या दी !

image008 अब कुछ चुप्पै से.. सुनो
इन दिनों अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को लेकर चल रही बहस में माडरेशन भी एक है ।
होली पर मेरा मौन ( मोमबत्ती कैसे देख पाओगे.. ? ) विरोध इसको लेकर भी था,
खु़द तो जोगीरा सर्र र्र र्र को गोहराओगे, अपने ब्लागर भाई को साड़ी भी पहना दोगे..
टिप्पणी करो.. तो " ब्लागस्वामी की स्वीकृति के बाद दिखेगा ! "
एक प्रतिष्ठित ब्लाग पर ऎसी टिप्पणी मोडरेशन को ज़ायज़ ठहराने के बहसे को उठा्ने की गरज़ से ही की गयी है ! यहाँ से एक टिप्पणी को सप्रयास हटाना भी यह संकेत दे रहा है.. कि ब्लाग की गरिमा और पाठकों को आहत होने से बचाने का यही एकमात्र अस्त्र है, सेंत मेंत में ऎसी बहसें अस्वस्थ होने से बच जाती है..वह हमरी तरफ़ से एक के साथ एक फ़्री समझो ! मसीजीवी के चर्चा-पोस्ट से चीन वालों को कान पकड़ कर क्यों नहीं बाहर किया गया था ? वह तो सच्ची – मुच्ची का स्पैम रहा ! मन्नैं ते लाग्यै, इब कोई घणा कड़क मोडरेटर आ ग्या सै !
राम राम !

एक पोस्ट यह भी… मोची बना सुनार


इससे आगे

18 February 2009

जैसा देश वैसा भेष

Technorati icon

आम तौर पर मैं पहेली-पचड़े में नहीं पड़ता । एक सर्प पहेली जिसका उत्तर मुझे भी नहीं मालूम ! कोई बताएगा ?    इस विचारोत्तेजक पहेली ने मुझे टिप्पणी बक्से में ज़बरन ढकेल ही दिया । उत्तर देने से पहले सतर्क होकर इधर उधर देखा,  सो माहौल के अनुसार मेरा उत्तर था ; भाई, मैं तो पटखनी खा गया,
                                                थोड़ा आयोडेक्स मिल सकता है, क्या ?
                                                उसे मल कर काम पर चला जाय ।

सर्प-पहेली का मेरा उपरोक्त उत्तर ' जैसा देश वैसा भेष ' नीति के अंतर्गत ही लिया जाय । उत्तर देकर मैं संतुष्ट था कि साँभा अगली कड़ी में तो खेल का मज़ा दिखायेगा ही । पर सरदार खुस न हो सका । आज चंद घंटे पहले अपनी वैलेन्टाइन को सँवारने की गरज़ से आया, तो मेल बक्से ने साउंड एलर्ट दिया. खोला तो वहाँ पहेली के उत्तर की कड़ी विराजमान है, चलो देखें !

क्या इडेन के बगीचे में अजगर था ...? का उत्तर प्रकाशित है “ यह पता चला है कि वह अजगर था जिसने बिचारे आदम और हौवा को भवसागर में उतरने और बल बच्चे पैदा करने को उकसा दिया था -इसलिए आज भी कई संस्कृतियों में साँप लिंग का प्रतीक का मन लिया गया है ! “ हालाँकि इसके साथ ही एक प्रश्नचिन्ह नत्थी करके इसे उत्तर का डिस्क्लेमर होने का टैग भी दिया है । सो, एक अच्छा प्रसंग असमय दम तोड़ता दिख रहा है । बात को आगे बढ़ाते हुये..

आपसे असहमत होने की अनुमति चाहूँगा.. मेरे विद्वान मित्र !  दो संभावनायें दी गई हैं.. अज़गर और पुरुष जननाँग ! पर.. संभावनायें अपनी प्रकृति के अनुसार अनंत होती हैं, न दोस्त ? सो.. मैं अपने इस पृष्ठ की असहमति का टैग थोड़ा जी लेना चाहता हूँ, कोई बुराई ?  आपको असहमत होने का पूर्ण अधिकार है, क्योंकि मैं तालिबानी नहीं.. कि जो उनसे सहमत नहीं.. उनका इस दुनिया में स्थान नहीं !

आपका... अज़गर ?   कभी नहीं... कदापि नहीं । कविता जी द्वारा प्रतिपादित ‘ पुरुष जननांग ? ‘ अरे राम भजो भाई ! 
इस पोस्ट के  कारण हैं, क्योंकि मेरे पास पड़े इसके संदर्भ अकारण ही व्यर्थ हो रहे थे ।  देखिये स्वयं की लाइब्रेरी के मेरे संदर्भ :

 
1. " So The Serpent (satan) successfully tempts Eve to "eat the forbidden fruit" and everything changed forever as innocence was lost."  यहाँ वर्जित फल को ही आप पुरुष जननांग से  परिभाषित तो  कर सकते हैं, क्योंकि आगे  दिया है कि.. ..  

 2. And Adam and Eve heard the
Voice of The Lord and they were
ashamed and covered themselves with fig leaves. "
  यह परिणाम मिला उन्हें, यह वर्जित फल चखने का..           जो कि सेब तो कदापि नहीं हो सकता ।

3. The shame of Adam and Eve clearly shows a new "knowledge" and awareness of sexuality and their own nakedness. अपने माइथोलोजी में.. खीर खाने से सन्तानोपत्ति के कई उल्लेख हैं, यह तथाकथित खीर आखिर वीर्य क्यों नहीं ?  सेब या खीर पेट में पहुँच जाने मात्र से क्या गर्भाधान हुआ करता है ?  फिर तो, यह देश में कब का प्रतिबन्धित हो गया होता !क्योंकि इसके परिणामों से चेताते हुये आकाशवाणी  ( इस पर फिर कभी .. )  होती है, कि.. 
4. And the Lord said unto the woman,

"You shall have pain
in childbirth and your desire
shall be towards your husband."

उपरोक्त सभी संदर्भ Ontario Consultant's Book on Religious Tolerance  से लिये गये हैं ! यह सी.डी. पर उपलब्ध है।
बात को और आगे बढ़ाते हुये लीमिंग बन्धुओं को भी गवाह कठघरे में बुलाना चाहूँगा

The Punishment upon Eve (womenhood) was pain in childbirth. This seems directly linked to sexual intercouse and pregnancy. Also her "desire" is to bear her husband's children yet have to endure this great suffering to do so. This "curse" provides more proof that "eating the forbidden fruit" does represent SEX. Soon after their "eating of the fruit", Adam and Eve were banned from the tree of life (that prevents aging leading to death). D. Leeming & M. Leeming, "A Dictionary of Creation Myths", Oxford University Press, New York, NY,

एहि बीच अज़गर महाराज कहाँ दुबक गये, हो ?
उनको सामने लाने का प्रयास करता हुआ, एक मान्य ग्रँथ Urantia Book  कहता है, कि जिसको आदम-हव्वा गँदा कर दिये थे , ऊ वाला ईडेन गार्डेन कोलकाता में नहीं, साईप्रस में पहले से ही था ।

Sarmast_Atlantis_525

Urantia Book :

Revealing the Mysteries of God, the Universe, Jesus  and  Ourselves.

As it has on numerous occasions, current scientific discovery confirms the dates, places, and events originally disclosed in The Urantia Papers more than 70 years ago. One of those recent discoveries shows a connection between the legend of the lost continent of Atlantis and of the first Garden of Eden. The picture at right  is from Robert Sarmast’s newly released book, Discovery of Atlantis (Copyright Robert Sarmast, Origin Press, October 2003). It pinpoints the lost continent of Atlantis in the exact location that The Urantia Book describes as that of the first Garden of Eden.

और किसी अज़गर के साईप्रस में ग्रीनकार्ड लेने का कोई रिकार्ड नहीं है । सो, अज़गर के साईप्रस में देखे जाने के सबूत का कोई अभिलेख लाइयेगा, तो.. मज़ा आयेगा असली खेल का !  आप द्वारा वैज्ञानिक जानकारियों को हिन्दी में दस्तावेज़ीकरण करने के प्रयास का यह टाइमखोटीकार सदैव से प्रशंसक रहा है, इसीलिये अपना मत / पक्ष रख रहा हूँ । आगे आपकी मर्ज़ी !

Keyway.ca_edenपिछले वर्ष दिल्ली से किताब-ए-अक़दस ( Kitab-i-Aqdas ) ले आया था, जिसमें भी इससे सम्बन्धित प्रसंग का उल्लेख है, थोड़ा ही पढ़ा था, कि पंडिताइन महाशय ने गायब कर दिया है, कि " तुम्हारा दिमाग ख़राब हो गया है ! "  यदि आप भी मेरे लिये यही सब  न मान रहे होते तो.. यहाँ संदर्भित किया जा सकता था । सो, चलता हूँ.. अपनी वैलेन्टैनिया को सँवारने, जो निश्चित समय से विलम्ब से चल रही है । यह ज़रूरी नहीं है, कि सभी  भारतीय परंपरा के  विलम्बित रहो नीति  के सभी फ़ालोअर ही हों ?वैलेन्टाइन डे के दिन भेलपूड़ी खाने पर भाई्कुश पहले ही डाँटें जा चुके हैं । कहीं हमारा भी लम्बर लग गया कि, समय-चौकस विदेशी आदत वाले संस्कृति का यह त्यौहार इतना लेट काहे कर रहे हो, भाई  !  तो,  आईएगा आप हमको बचाने ?

इससे आगे

04 February 2009

बिन बुलायी, एक अपूर्ण कविता

Technorati icon

आज व्याधिग्रस्त माया श्रीवास्तव धुर 5 बजे अवतरित हुईं, टालने का प्रश्न नहीं.. पर थोड़ी व्यग्रता थी क्योंकि यह आज के परामर्श समय की अंतिम बेला थी, हिस्ट्री लेने के दौरान मेरे मुँह से ' परिवेश ' शब्द का उल्लेख  हुआ । बस, उनके पतिदेव महोदय ने मुझसे एक छोटा सा ब्रेक लेने का अनुयय किया,  और बिना किसी भूमिका के यह पंक्तियाँ सुनाने लग पड़े । एक-डेढ़ मिनट के बाद ही मैंने एक ट्रैफ़िक पुलिसिया इशारा कर उन्हें रूकने का संकेत दिया, और अपना काम पूरा कर सका.. पर एक स्थानीय कवि के इस कविता की पंक्तियाँ रह रह कर जैसे चिंचोड़ रही है, इतना अलाय-बलाय, लटरम-पटरम नेट पर ठेलता / पेलता रहता है, थोड़ा बहुत जगह मुझे भी दे दे । मैं खीझ गया, " तू तो अभी अपूर्ण है.. जो कुछ लाइनें छोड़ आयीं है.. जा उन्हें भी लेकर आ, तो विचारार्थ सहेज लूँगा । " कविता के मुखड़े से ही उसके सामयिक होने का दंभ छलका पड़ रहा था । सो, एकदम से तमक गयी, तैश में अपनी दो-चार और लाइनें झटक कर फेंक दीं और मटक कर चल पड़ीं " तू तो स्वयं में ही अपूर्ण है मानव ! निरूपाय होकर या विभोर होकर, तू मेरे आँचल में ही आँसू छलकाने आता है । अब इतना बढ़ चढ़ कर तो न बोल ।" ई का हो ? अई देखा, कवितिया एतना अकड़ती काहे है, भाई ? हम ठहरे ताऊ स्कूल आफ़ ब्लागर के ज़ाहिल-बुच्च डाक्टर मनई, जो असोक चक्रधर जी से एथिआ ई कबीता की खास फरमाईसी परिभाखा लिखाईस है :

गोया रोगी होगा पहला कवि, कराह से उपजा होगा गान
टीसती फुड़िया से चुपचाप ,  बही होगी कविता अनजान

अरी दईय्या रे, कविता जी बिफ़र कर पलटीं.. "ऎई, मवाद से मेरी तुलना तो करना मत ? पहले ही मेरा ऋँगार पोंछ पाँछ कर दुनिया की गंद मेरे से परोसवा रहा है, और अब सीधे सीधे मवाद पर मत उतार ।" फिर ठिठक कर जैसे मुझे निरूत्तर करने को प्रहार किया, " अच्छा चल, मवाद ही सही.. लेकिन बह जाने से तू और तेरे रोगी का दर्द हल्का हुआ कि नहीं, बोल ? " बोलिये न !

feelingwarpedvअय-हय, इनका देखो  ? अधूरी हैं, तब ये हाल है, दो चार अच्छी लाइनें और मिल जायें तो हम जैसे टाइमखोटीकारों की गुलामी भी मंज़ूर न करें ! सो, मैंने अपना पिंड छुड़ाने की कोशिश की, " अच्छा चल, तू जैसी है वैसी ही रह, मेरे को क्या ? आओ, जरा  इधर को आ.. तुझे अंतर्जाल पर टाँग दूँ.. ताकि तेरी हसरत भी पूरी हो जाये । पर तेरी वज़ह से कोई मुझे हूट-हाट करेगा, तो तेरा गला घोंट दूँगा । वईसे भी ईहाँ ब्लाग-प्रदेश में गुणीजन अल्पसंख्यक हैं ! और यह बहुसंख्यक समाज भी चर्चाजगत का अल्पसंख्यक कोटा  तक हड़पे बैठे हैं,  हाँज्जी.. सच्ची !  उसको क्या कहते हैं.. हाँ, तो  अपलोड होते होते  भी वह  ढीठायी से हँसती है... डाक्टर,  बहाना चाहे जो भी बना लो.. पर गाहे बगाहे अपनी सुविधानुसार मेरा गला तुम लोग वैसे भी घोंटते रहते हो कि नहीं ?

न जन कैसे जी रहा है, उमस के वातावरण में
दुःस्वप्न में दिन बीतते रात बीतती जागरण में

है यदि बेशर्म आँखें, घूँघट व्यर्थ ही क्या करेगा
मानवता नग्न घूमती सौजन्यता के आवरण में

कपटयुग है घोर यह, हुये राम औ'  रावण एक हैं
लक्षमणों का ही हाथ रहता आज सीताहरण में

शब्द को पकड़ो यदि तो सहसा अर्थ फिसल छूटते
सन्धि कम विग्रह अधिक आज क्यों व्याकरण में

छल-बल के माथे मुकुट है सत्य की है माँग सूनी
क्यों कोयल गीत सीखती बैठ कौव्वों के चरण में

चिढ़ा रहे  ये तुच्छ जुगनू चाँदनी के चिर यौवन को
भगत बगुले  हैं मेंह हड़पते हँस के छद्म आवरण में

यह मुँहजोर ठहाके के साथ ऊपर से भी एक ताना कसने से बाज न आयी, " अब, अब.. इस स्थिति की जैसी पूर्णता चाहता है.. वैसी लाइनें तू ड्राइंगरूम में आराम से चाय सुड़क सुड़क कर गढ़ता रह ! या फिर, वर्ष दर वर्ष अनाचार कि नयी लाइनें स्वतः ही जुड़ती जायेंगी और तुझे बिना प्रयास ही अपनी दुर्दशा के नये तराने मिलते रहेंगे ।" पर, दो हज़ार से कम में इसे मंच से न पढ़ना

इससे आगे

03 February 2009

क्षमा करें डा. मान्धाता

Technorati icon

ब्लाग में आख़िर क्या लिखा जाना चाहिये..  पढ़ कर मेरी प्रतिक्रिया रोके ना रूक सकी ।
बड़ा अनुकूल विषय है,सो टिप्पणी के रूप में यह पोस्ट यहीं चेंप देता हूँ ।

18

डा. मान्धाता जी, आपने मेरा मनोनुकूल विषय उठाया है, अतएव..
सहमत हूँ, कि हिन्दी ब्लागिंग स्तरहीनता से ग्रसित है ।
पर किसी भी घटक को स्तरहीन मानने के सभी के अपने अपने मापदंड हैं, और सभी ज़ायज़ हैं ।

हिन्दी किताबों के स्टाल पर, यदि भीष्म साहनी और कृष्णा सोबती शोभायमान हैं..
तो उनको काम्बोज, शर्मा और भी न जाने कौन कौन अँगूठा दिखाते धड़ाधड़ माल बटोर रहे हैं ।
यह अपनी अपनी रूचि है.. और व्यवसायिकता की माँग है ।

पर, डा. मान्धाता, इसे बहस का मुद्दा न बनाते हुये मैं केवल यह बताना चाहूँगा,
कि यह तथाकथित स्तरहीनता हर भाषा के ब्लागिंग में समानांतर चलती रही, फलती फूलती और फिर दम भी तोड़ती रही है ।
यहाँ भी यह स्तरहीनता आर्कुटीय हैंग-ओवर के चलते उपस्थित है ।
साथ ही, साहित्यतिक स्तर बनाये रखने को कृतसंकल्पित ब्लाग भी यहाँ उपस्थित हैं ।
सो, दोनों ही समानांतर रूप से चलने चाहियें, हम अपना स्वरचित अंतर्जाल पर देते रहें.. नाहक क्यों परेशान हों ?

108

अंग्रेज़ी ब्लागिंग को मापदंड का आदर्श मानना तर्कसंगत नहीं है,
फिर तो, अपनी पहचान ही तिरोहित होने का खतरा सामने आ खड़ा होता है ।
अंतर्जाल पर हिन्दी-लेखन को बढ़ावा देने की मुहिम के पीछे बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के
अपने निहित अदृश्य स्वार्थ हो सकते हैं... पर यह बाज़ार आधारित एक अलग ही मुद्दा है ।

कुछ भी लिखते वक़्त, कम से कम मैं तो यह ध्यान रखता हूँ,
कि यदि इसे आगामी 25-30 वर्षों के बाद की पीढ़ी पढ़ती है,
क्योंकि लगभग हर सर्च-इंज़न के डाटाबेस में हिन्दी का अपना स्थान होगा.. ..
तो इस सदी और दशक के हिन्दी ब्लागिंग के किशोरावस्था को किस रूप में स्वीकार करेगी ?

यदि टिप्पणी के अभाव में कुछेक ब्लाग दम तोड़ते हैं,
तो उस ब्लागर की हिन्दी के प्रति निष्ठा पर संदेह होने लगता है ।
पर, यह भी यकीन मानें कि वह आपके ऎसे किसी संदेह की परवाह भी नहीं करते ।
ट्रैफ़िक-टैन्ट्रम और टिप्पणी प्रेम पर मेरा कटाक्ष, आप लगभग मेरे हर पोस्ट में देख सकते हैं ।

हाँ, एक गड़बड़ और भी है, जब हम अनायास किसी न किसी स्थापित (?) ब्लागर को
उसकी पाठक संख्या से ही अँदाज़ कर अपना आदर्श बना बैठते हैं या जब अपने किसी समकक्ष पर नज़र डालते हैं,
और पाते हैं कि 'सस्ती वाली साबुन की बट्टी के बावज़ूद भी उसकी कमीज़ मेरे से सफ़ेद क्यों ?'
पर, यह भी तो संभव है, कि आपको सस्ता लगने वाला माल उसकी औकात से अधिक मँहगा हो !

1008

स्तरहीन और स्तरीय के मध्य के बीच की खाई जब पाट नहीं सकते,
तो उसमें झाँकने और उसकी गहराई आँकने से लाभ ही क्या है ?

इससे आगे

01 February 2009

ऎसी आज़ादी और कहाँ, आज़ाद ख़्याल विवेचन

Technorati icon

विवेक भाई आग लगा कर अगले हफ़्ते के लिये बाई कर गये । गोया, चर्चाकार न हुये ज़मालो हो गये । यह तीसरी बार है, जब मैं इन चिट्ठाचर्चा वालों के उकसावे में पोस्ट लिखने को मज़बूर हो रहा हूँ । भुस्स मे आग लगा कर बी ज़मालो दूर खड़ी ।

मेरी पिछली कई पोस्ट से तो अंदाज़ ही लिया होगा, कि ई डाक्टर धँधे में जैसा भी  ठस्स हो, लेकिन यहाँ दिमाग का निख़ालिस भुस्स डम्प करने आता है । भगवान ठस्स भेजा देता, तो ई आग लगबे काहे करती  ? सो भगवान दुश्मन के दिमाग में  भी ऎसा भूसे का ढेर भर कर न भेजे । इन  चर्चाकार ने गणतंत्र-दिवस पर पोस्ट लिखने वालों की पूरी क्लास ले ली । पाखंडम शरणम गच्छामि संस्कृति में  हम  भी  पाखंड-देव से रक्षा की भीख माँगते हुये,  बरामद हुये, ऊ हमरा बेकूफ़ी पर हँस दीये,  और का हो ?ऎसी आज़ादी और कहाँ-अमर

26 जनवरी मैं क्लिनिक कर्मचारियों की छुट्टी रखता हूँ, सो आते जाते दिन भर नेट-ब्राउज़र को हँकाता रहा । ससुरा ब्राउज़र इधर भागे उधर भागे, और.. जाकर टिक जाये गणतंत्रीय पोस्ट पर ! मैंनें भी सोचा.. चलो 26 जनवरी 2009  वन टाइम इन इंडिया इवेन्ट है, सो  गूगल वाले  भारत  का अपना  नमक- टाटा नमक अदा कर रहे हैं । लिहाज़ा ज़्यादा माइंड-उंड भी नहीं किया । कोई पोस्ट हमसे ज़बरिया कमेन्टियाने का तकादा नहीं करता रहा,सो हमहूँ कुछ कुछ टूँग टाँग के आगे बढ़ते रहे । बधाई  हो, मेरा भारत महान, जीसका हर नेता बेईमान लीखने का मन था, लीखे नहीं, ब्लगिंगिया में पदमशिरी डीक्लेयर कर दीये, तो ? 

ऊप्पर देखे हैं कि नहीं ? पहले ही बोल दिया हूँ, ई फा्स्ट-ब्लागिंग का ड्राफ़्टिया पोस्ट है.. सो बाई मिस्टेक कोई गलती हुआ हो, और दीखाए तो निचका डिब्बवा में लीख दीजीयेगा । हम भी गुरुवर का सिलो-बिलागिंग का संदेश देखे हैं, अउर ड्राफ़्टिया लीखने पर आपलोगों के ई-स्वमिया हम्मैं डाँटिस भी है, लेकिन हम तो पहले से ही बिन्दास डीक्लेअर कीये हैं, सो भाई ज़्यादा लटर-सटर नहीं जानते ! बस एतना सुन लीजीये, "हम नहीं सूधरुँगा ।"  तनि सोचिये.. हम हूँ आज़ाद भारत के आज़ाद ब्लागर,  ऊ भि हीन्दी के, जिसको कहीये कि... ईश्श !  अरे डा. अरविन्द जी, लगता है, कि हम अज़दकीय मोड में प्रवेश कर रहें हैं ? चलिये, आपके लिये ई पोस्ट पूरा होने तक सुधर जाते हैं ! जाइयेगा नहीं, पोस्ट जारी है

शिवभाई इस ब्रेक में तनी खोजीए तो,कि भासा कहाँ से ऊठा के ईहाँ पटकाया है

हाँ, तो अब ज़्यादा न लपेसते हुये  परदा उठाने देंगे ?  त,  हमलोग हूँ, आज़ाद भारत के आज़ाद ब्लागर.. बाताइये ऎसी आज़ादी और कहाँ ? बोलीए जय हिन्द !

विवेक जी,  ई सब पोस्ट पढ़ते तो अपने गान्हीं महतमा एकदमैं गुलाम अलिये गुनगुनाते,
" स्यापा है क्यों बरपाऽ..♫ आज़ादी ही तो दी है..♩♬" 
अब कोई यह लिखे तो लिखता रहे, कि ' मुल्क ही है.. तो बाँटाऽऽ..♩♬♪,रियासतें ही तो दीं हैऽऽ..♫'
पिताश्री हैं, तो गरियाने दुलराने और बरसी पर फूल-माला पहनाने का सिलसिला तो लगा रहेगा..
वह दुखित मन से सोच रहे होंगे.. कि रिज़र्व कोटा के गोली खाने का यही सिला है,
कि आज़ाद भारत के लोग अबतक यह क्यों नहीं फील कर पा रहे हैं, ऎसी आज़ादी और कहाँ ?

अब अपनी ही एक बात बताता हूँ । छोड़िये, जगह का नाम जान कर भी क्या करियेगा..
पहले का एडविन क्रास, पिछले साल तक शास्त्री चौक कहलाते कहलाते अब झलकारी चौराहा होगया है
लेकिन परसों मुलायम संदेश यात्रा वाले कह गये हैं,
सन 1958 में इस चौमुहानी से गुज़र कर लोहिया जी की मोटर ने इसे ऎतिहासिक महत्व का दर्ज़ा दिया है,
लिहाज़ा इस शहर के लिये उनकी पहली प्राथमिकता यहाँ पर उनकी मूर्ति स्थापित करने की रहेगी.. ऎसी आज़ादी और कहाँ
इले्क्शन शान्तिपूर्ण निपटने के बाद पार्टी मेनिफ़ेस्टो में तय होगा कि,
मूर्ति मोटर की लगेगी या उन मोटरारूढ़ महापुरुष की.
जो भी हो, हमारे शहर में तो होगा स्टैच्यू आफ़ लिबर्टी.. ऎसी आज़ादी और कहाँ
हम भी कहते हैं, नाम में क्या रखा है ?
सो, हर क्रासिंग का नाम शेक्सपियर ग्रैंडपा को सुपुर्द कर देना चाहिये,
काहे से कि ऎसी आज़ादी और कहाँ

यार, तुम अटकते बहुत हो, आगे बढ़ो.. हाँ, बस आने ही वाला है..
इस व्यस्त चौराहे पर जहाँ गुंज़ाइश मिला दिवार पर पोत-पात कर रख दिया है,
बड़ा बड़ा लिखा है, महबूबा को मुट्ठी में कैसे करें.. मिलें या लिखें.
इसके ऎवज़ में मालिक-दीवार ख़ान लखीमपुर खीरवी साहब ने पेंटर से सेंत-मेंत में यह भी लिखवा लिया,
यहाँ पेशाब करना सख़्त मना है, पकड़े जाने पर 50 रूपये ज़ुर्माना
मेरा हाथ ऎटौमेटिक पैंन्ट की ज़िप पर चला जाता है, बताइये ऎसी आज़ादी और कहाँ
हल्के होकर सोचता हूँ, कि नीम का पेड़ तो दिख नहीं रहा,
किस भले मानुष से उन्नाव वाले नूर अहमद " गारंटीड कामाख्या तांत्रिक "  का ठियाँ पूछूँ
हम खुद ही पंडिताइन की चँगुल से आज़ाद कैसे हों.. वाले को तलाश रहे हैं
लगे हाथ अपनी उनसे भी आज़ाद हो लें.. फिर तो मौज़ा ही मौज़ा, क्योंकि ऎसी आज़ादी और कहाँ

बड़ी भीड़ है, आज, क्यों ? अच्छा अच्छा.. बगल के पटेल मार्ग पर पब्लिक ने जाम लगा रखा है,
हाथ कंगन को आरसी क्या.. लीजिये आप ही देखिये.. ऎसी आज़ादी और कहाँ
अब हमारे पास कोई चारा नहीं, घुसेड़ दो कार नो-पार्किंग में,
ऎई लड़के ! कोई पूछे तो बता देना हाथीपार्क वाले डाक्टर साहब की गाड़ी है..
सब स्साला तो मिसमैनेज़्ड है, पर पोस्ट लिखेंगे.. ऎसी आज़ादी और कहाँ
पढ़े लिखे होकर भी, नो पार्किंग में ज़बरिया पार्किंग ?
ऒऎ छ्ड्डयार, यह तो आज़ादी एन्ज़्वाय करने एक छोटा सा आप्शन है, ऎसी आज़ादी और कहाँ
मैं कोई गलत काम जानबूझ कर थोड़ेई करता हूँ, जी !
मेरी मज़बूरी समझिये,  आज सैटरडे है, एक हफ़्ते के लिये टल जायेगा ।

उधर अपने षड़यंत्र की अगली कड़ी भी देनी है, कल भी छूट गई थी
यह न हो कि, शहीद आकर पकड़ लें कि, हम तो बेट्टा तेरे लिये चने खा कर तख़्ते पर टँग लिये थे,
और तू मुझे छोड़ कर यहाँ नो-पार्किंग में विलाप करता फिर रहा है..और क्या चाहिये तुझे, ऎसी आज़ादी और कहाँ
फिर तो मेरी घिघ्घी बँध जायेगी, इतना भी न कह पाऊँगा..कि,
हम अपने ही घर में आज़ाद नहीं हैं, सर 
आज सैटरडे है सर, एक हफ़्ते के लिये टल जायेगा, सर.. प्लीज़ मेरी मज़बूरी समझिये सर,
सो, नूर अहमक " गारंटीड कामाख्या तांत्रिक " को पकड़ना भी ज़रूरी है न, सर

ऒऎ कोई नीं, जितने टैम तक चाहे, जो पकड़ना है.. जिसको पकड़ना है..
जा छॆत्ती पकड़ लै.. पण छड्डणा नीं, जा अपनी पूरी आज़ादी ले लै !
जबसे मेरे कान में यह पड़ा है,  कि
" डैडी सीरियस हो रहे हैं.. भईया ज़ल्दी से एक डाक्टर पकड़ लाओ "
आई रियली लव दिस पकड़ लाओ
हे हे हे, बैठे बैठे फ़ालतू टाइमखोटी करते रहते हो...बेशरम कहीं के !
कौन है ? यह पंडिताइन हैं जी, दूजा न कोई, हे हे हे !

इससे आगे
MyFreeCopyright.com Registered & Protected

यह अपना हिन्दी ब्लागजगत, जहाँ थोड़ा बहुत आपसी विवाद चलता ही है, बुद्धिजीवियों का वैचारिक मतभेद !

शुक्र है कि, सैद्धान्तिक सहमति अविष्कृत हो जाते हैं, और यह ज़्यादा नहीं टिकता, छोड़िये यह सब, आगे बढ़ते रहिये !

ब्यौरा ब्लॉग साइट मैप