जो इन्सानों पर गुज़रती है ज़िन्दगी के इन्तिख़ाबों में / पढ़ पाने की कोशिश जो नहीं लिक्खा चँद किताबों में / दर्ज़ हुआ करें अल्फ़ाज़ इन पन्नों पर खौफ़नाक सही / इन शातिर फ़रेब के रवायतों का  बोलबाला सही / आओ, चले चलो जहाँ तक रोशनी मालूम होती है ! चलो, चले चलो जहाँ तक..

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30 June 2008

आह, नारको रोको... रोको ना... ये नारको

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टाइमिंग के मामले में, मुझे कमज़ोर समझा जाता रहा है , गलत समय पर टप्प से बोल देना । शायद आज फिर यह साबित होने जा रहा है । पिछली बार डा० अमित कांड के समय, मैं एम्स के हड़ताली ( ? ) डाक्टरों के पक्ष में कुछ लिख-विख रहा था... अब डाक्टर तलवार सुर्ख़ियों में हैं, तो नारको टेस्ट पर लिखने को ऊँगलियों में कई दिन से ऎंठन हो रही है । लिखूँ  ?
बड़ा फ़ैशन में है यह नारको, अ हैपेनिंग थिंग । हम भारतीयों की एक विशेषता है, अंधानुकरण ! बहुधा फ़ैशन को केवल एक शब्द ' प्रचलन ' से ही परिभाषित करके फ़ारिग हो लिया जाता है । ठीक है, लेकिन प्रचलन तो प्रचलित होने के बाद ही तो उपजता होगा, यह जैसे मुर्ग़ी और अंडे के अबूझ पहेली सरीखा समीकरण है । बिना दिमाग लगाये, किसी भी अच्छी-बुरी चीज को लपक लेना, अंधानुकरण ही कहलायेगा, शायद ? इतने सारे शायद क्यों ? क्योंकि मैं कोई समाजशास्त्री नहीं हूँ, इसलिये !
नारको आख़िर है क्या ? यह केवल इस अवधारणा पर आधारित है कि एक व्यक्ति यदि कोई झूठ बोलता है तो उसमें  वह अपनी कल्पनाशक्ति से ही ऎसा झूठ गढ़ने में सक्षम हो पाता है । किंतु अर्द्धचेतन अवस्था में, ऎसा संभव नहीं हो पाता ..वह केवल ज्ञात तथ्यों को ही बता पाता है। इसके लिये ट्रुथ सीरम (Truth Serum) का प्रयोग कर उसे इस अवस्था में लाया जाता है ।
                                      नारको कार्टून-अमर ट्रुथ सीरम-कितना ट्रुथफ़ुल बताओ साले बताओ-कि तुमने ही ख़ून किया है-अमर
और, क्या है ट्रुथ सिरम ? यह कम अवधि वाले शल्यचिकित्साओं में प्रयोग किया जाने वाला निःश्चेतक सोडियम पेंटाथाल या ऎमाइटाल सोडियम है, जो कि एक निर्धारित मात्रा में सूई से नसों के ज़रिये दी जाती है । मनुष्य इतना निःस्तेज हो जाता है कि अर्धबेहोशी में पूछे जाने वाले सवालों के मनमाने ज़वाब गढ़ने लायक ही नहीं रहता । क्या जादुई चीज है, यह ट्रुथ सिरम ?
किसने खोजा ट्रुथ सिरम ? सच बतायें, तो आधुनिक विज्ञान के अधिकांश खोजों की तरह यह भी अनायास ही हाथ में आया बटेर है । यह किसी चरणबद्ध अनुसंधान का परिणाम नहीं है । सन 1916, शहर- डेलास, प्रैक्टिशनर डा० राबर्ट अर्नेस्ट हाऒस किसी महिला को दर्द कम करने के प्रयास में स्कोपेलेमाइन दवा से मूर्छित करके प्रसव कराने के लिये जाने जाते थे । एक बार वह इस तरह से कराये गये प्रसव के उपरांत कोई घरेलू वस्तु, संभवतः स्केल खोज रहे थे । उस महिला ने बेहोशी में भी जैसे उनकी परेशानी भाँप ली हो, और उसने उस वस्तु का बिल्कुल सही ठिकाना उसी स्थिति में बता दिया । अब डाक्टर राबर्ट के चौंकने की बारी थी । उन्होंने इस कोटि की दवाओं के इस प्रकार के प्रभाव से चमत्कृत होकर इसे ट्रुथ सिरम नाम दिया, जो अबतक चला आ रहा है । 1920-30 के दशक में कुछ अदालतों ने इसको साक्ष्य के रूप में मान्यता दे तो दी, किंतु एक ही व्यक्ति पर इसके अलग अलग परिणाम देख 1950-51 में वैज्ञानिकों ने स्वयं ही इसे अनुचित करार दिया । दुनिया के अधिकांश विकसित देश इसको आज़मा कर, बहुत पहले ही छोड़ चुके हैं, कारण कि परिणामों में अस्थायित्व का होना,..यानि गैर-भरोसेमंद !
                               नारको रे नारको-अमर नारको शय्या वाह रे-अमर नारको की बानगी-अमर 
 कैसे होता है यह सब ? एक ऎनेस्थिसिया एक्सपर्ट उस व्यक्ति को उसके स्वास्थ्य, वज़न एवं अन्य जाँच रिपोर्टों के आधार पर पेंटाथाल की एक निश्चित मात्रा देकर उसे अर्धमूर्छित अवस्था में ला देता है । अपराध मनोविज्ञान की पृष्ठभूमि का दूसरा एक्सपर्ट उससे सरल किंतु केस से संबन्धित  व दिशाग्रित प्रश्न पूछता, दोहराता रहता है, और उसके उत्तर रिकार्ड होते रहते हैं, विश्लेषण हेतु ।
सही तो है, फिर लफ़ड़ा क्या है ? एक आम हिंदुस्तानी नज़रिये से देखा जाय, तो कोई लफ़ड़ाइच नहीं । राज काज है... , कौन सिर खपाये ? मुझ जैसे अवैतनिक मुल्ले तो ख़्वामख़ाह परेशान रहा करते हैं  ! यदि पढ़ना जारी रखा हो तो लफ़ड़े भी गिनवाऊँ ?
तो गिनिये ...arrow7_e0 एक - यह तो जाँच एज़ेंसियाँ भी मानती हैं कि इसे साक्ष्य के रूप में प्रस्तुत नहीं किया जाता, केवल यह किसी जाँच का हिस्सा भर है ! फिर, इस नाटक की वजह ?  इसके परिणामों पर भरोसा इतना कि साथ में ब्रेन-मैपिंग कर इसकी सत्यता आँकी जाती है ।  arrow7_e0 दो - क्या यह बर्बर तरीका नहीं है ? एक अर्धमूर्छित व्यक्ति के गाल पर लगातार चाँटे पड़ रहे हों, और उससे सुझाने वाले प्रश्न पूछे जा रहे हों । सूखे ओठों से निकलती मुरझायी उदास आवाज़ों में किसी सच्चाई का अन्वेषण किया जा रहा हो ।  असंगत क्या, यह हास्यास्पद भी है !   I dont knowएक पल को कल्पना करें - अमर कुमार का नारको टेस्ट हो रहा है, उसके गाल पर तड़ाक से एक चाँटे के साथ पूछा जाता है, " बताओ, उड़न तश्तरी का इस अपहरण में क्या हाथ है ? " मेरे उस प्रतिरोधहीन अवचेतन से सिर्फ़ इतना ही निकल पाता है कि, " अँ..अँ.. टिप्पणीसम्राट... 71 टिप. टिप्प .. ...अँ अँ..हँ आज 71 टिऽऽ..टिप्पणी... टिप्पा..णि ..जी उड़नटिप्पणी हैं वो ! " आगे फिर एक जोरदार चाँटा, " तुमने कहाँ देखा था इस उड़नतश्तरिया को ? " मेरा ज़वाब, " अँ.. कनाडा के जब्बल्पु... में.. हाँअँ ..कन्नाडा केह.. हँ.. जबलपुर मँय ! " अब माई का लाल एक्सपर्टवा अपना निष्कर्ष निकाल ले, जो निकालना होमैंने तो कोई झूठ नहीं बोला,सच ही कहा । सारे तथ्य तो दे ही दिये । उनके हाथ हाथी की सूँड़ आयी या दुम, यह उनकी किस्मत ! और हो गया ऎलान, जाँच असफ़ल रही..अमर कुमार से सच उगलवाना आसान नहीं ! I dont know   arrow7_e0 तीन - मादक द्रव्य की सहायता से किसी के शरीर को अवश कर अपना मनोवांछित प्राप्त कर लेना अपराध माना गया है.. बलात्कार ! यदि मैं दारू पिला कर, नशे की हालत में डा० अनुराग की सारी ज़ायदाद लिखवा लेता हूँ, तो यह भी एक अपराध ही बनेगा.. धोखाधड़ी ! अब इसी तर्ज़ पर नशे की दवा से किसी के मन को अवश कर अपना सोचा  हुआ सच उगलवाने की चेष्टा अपराध क्यों नहीं ? मेरा तार्किक मन यह तथ्य निगल नहीं पाता । हो सकता है, कि दिनेश जी इस पर कुछ प्रकाश डालें, मेरा तो भाई, सिर घूम रहा है ! आपने सहमतिपत्र पर हस्ताक्षर ले लिये हैं, तो कोई कमाल नहीं किया... भारतीय पुलिस तो हाथी से भी उसकी सूँड़ ऎंठ कर उसका चूहा होना कबूलवा सकती है । arrow7_e0 चार - इस पूरे परिप्रेक्ष्य को देखते हुये, इसे साइकोलोज़िकल थर्ड डिग्री से अलग करके कैसे देखा जाये ? मेरे मूढ़ मन का मनन - मरोड़ तो यही चिल्ला कर कह रहा है, क्यों व कैसे ? arrow7_e0 पाँच - क्या वज़ह है कि सन 2000 से फ़ोरेंसिक-साइंस लैब, बैंगलोर द्वारा फोर इन वन ( 4 in 1 ) का यह किफ़ायती पैकेज़ दिये जाने के बाद से ही नारको टेस्ट .. नारको टेस्ट होने लगा है ? कम  ख़र्च  तो  ठीक  है.. पर बालानँशीं कहाँ है ? तेलगी से तलवार तक हम्मैं तो ना दिक्खी ! arrow7_e0 छः - छ से छोड़िये । छोड़िये  भी ..पोस्टिया  लंबी खिंच रही है...होना जाना , कुछ है नहीं फ़ालतू का टाइमपास । आज बहुत ब्लगिया लिये.. बाकी फिर !
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26 June 2008

अनुशासन ही देश को महान बनाता है ?

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यही तो मैं भी कहूँ, कि दिमाग से कुछ फिसल रहा है ! क्या, क्यों और कैसे ? मुझे आज दोपहर तक स्वयं ही मालूम न था । आज क्लिनिक जाते समय, अचानक वोह मारा इस्टाइल में  बोधित्सव ( ब्लागर वाले नहीं ) ज्ञान कौंधा कि अनुशासन ही देश को महान बनाता है । सत्य वचन, हम तो  भुलाय बैठे थे कि इस मुलुक में अनुशासन नामक चिड़िया  भी हुआ करती है । भला हो इस मानसून का कि हमें इसका याद दिलाय दिया ! अनुशासन ही देश को महान बनाता है, हुँह यह कौन सी नयी बात है ? कुशल बहुतेरे महाशय का तो यह तो पुराना पर-उपदेश है ! 

यह तो भूल ही गया था कि यह मेरे भारत महान का महान राष्ट्रीय नारा है । मानसून की बारिश ने आज याद दिलाया ।  नहीं भाई , आप सबने तो गलत लाइन पर सोचने का जैसे ठेका ले रखा है ? मानसून का जिक्र आते ही आप  नरकपालिका  क्यों पहुँच जाते हैं ? यहाँ मैं म्यूनिसपालिटी की बखिया क्यों उधेरूँगा ? वैसे भी म्यूनिसपालिटी का अनुशासन से क्या लेना देना ? घबराइये नहीं, आज एक छोटी सी अनुशासित पोस्ट लिखूँगा, पूरी पढ़ते जाइयेगा । हाँ, यदि अनुशासन से एलर्ज़ी हो तो अलग बात है । वैसे भी हम हिंदुस्तानियों के पास अनुशासन पर लिखने-कहने को कुछ बचा ही कहाँ है ? खैर, नरकपालिका वालों के लाख मनौती-मिन्नतों के बावज़ूद भी इसबार मानसून झूम कर आ गया । उनकी तक़लीफ़, वो जानें, मेरी तो बला से ।

तो मित्रों, आज दोपहर बरसते हुये पानी में प्रस्थान-ए-क्लिनिक कर रहा था, कि एक जगह रोडसाइड होर्डिंग पर निगाह टिक गयी । उस पर से झरझर बहते पानी ने  चिपके  हुये कोचिंग इंस्टीट्यूटों को धो कर अंदर की कलई उजागर कर दी । होर्डिंग पर जमी हुयी इन्दिरा गाँधी बड़े सलीके से मुस्कुराते हुये थप्पड़ दिखाती, देश को होमवर्क दे रही थीं ' अनुशासन ही देश को महान बनाता है ।'  कार में ब्रेक लगते लगते रह गयी, बाँयें से एक सुज़ुकी फर्रर्र से लहरा कर निकल गयी । पीछे की सीट पर एक लड़का, इस तेज़  रफ़्तार सुज़ुकी पर खड़ा दोनों हाथ आसमान की तरफ़ उठाये हो-हो करता हुआ जा रहा था । मैंनें दाँत पीसे, " कहाँ कहाँ देखें ? इस अनुशासन कुलक्षणी के चक्कर में तो आज एक्सीडेंट ही हो जाता । "  वैसे तो मैं बहुत ही वीर हूँ, लेकिन ईश्वर के बाद सिर्फ़ पंडिताइन और एक्सीडेंट, इन्हीं दो से डरता हूँ । हँसो मत यार, यदि कोई  डाक्टर अपने क्लिनिक में "एक्सीडेंट होगया, रब्बा रब्बा.."  गाते कराहते, लँगड़ाते हुये दाखिल हो, तो आपको कैसा लगेगा, एक घायल सुपरमैन ? कत्तई नहीं न !   यह अनुशासन और नागरिक का  चक्कर  तो चोर सिपाही का खेल है, छोड़िये इसे यहीं ! उनकी तक़लीफ़, वो जानें, मेरी तो बला से ।

' आठवीं फेल गारंटीड हाईस्कूल पास करें ' इन्दिराजी के नाक से लिसड़ता हुआ बरसते पानी में चूने चूने को था । क्या यार, क्या मुलुक है ? लगता है, अफ़सरों को होर्डिंग सफ़ाई का ठेका देने की नहीं सूझी । टेंडर होता, मंज़ूरी दी जाती, सफाई हो गयी की रिपोर्ट लगा कर पेमेंट हो जाता, फिर से नया टेंडर होता, फिर मंज़ूरी .... ! लहरें गिनने का अंतहीन सिलसिला सदैव जारी रहता, चलो देश न सही, देश का अफ़सर और ठेकेदार तो समृद्ध हो रहा होता|फिर एक से अनेक समृद्धों की जमात बढ़ती जाती । आख़िर नदियों से ही तो समुद्र बनता है । यह लोग आगे बढ़ना ही नहीं चाहते, पता नहीं क्यॊं ? यह वही जानें, मेरी तो बला से !

अंतर से मेरा चिल्लाता है, " तब से क्या मेरी बला से.. मेरी बला से अलापे जा रहे हो ? इसी मेरी बला से वाली सोच ने तो तुमको इतनी बलाओं से ढक दिया है । चढ़ा दे कहीं ब्लाग पर, मलाल तो नहीं रहेगा कि ' जनम..उदर-पोषण-उपक्रम...मैथुन..प्रजनन.. .और मृत्यु '  के अलावा भी तुम दुनिया में कहीं नहीं  याद किये जाते । " मैंने हड़क दिया, ' चुप्पबे, इस समय एक शरीफ़  डाक्टर के रोल में हूँ । भले आदमी लोग सिर्फ़ अपने काम से काम  रखा करते  हैं, बस्स ! थोड़ा बहुत यानि ख़ाना हज़म होने भर को देश दुनिया पर चिन्ता कर लेते हैं, यही कम है क्या ?  अब बाकी दुनिया क्या करती है, क्या कर रही है ? यह वो जानें, मेरी तो बला से !

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        सर, क्लिनिक तो पिच्छू को रै गई !  " अच्छा, यह टापिकवा तो लपक ले, चल आज यही टीप दे धाँय से ! " अंतर ने क्षीण प्रतिवाद करके    दूसरी  तरफ़ को करवट ले ली । ठीक तो है, ब्लागर तो खोजत फिरत टपोरी टापिक टिप्पणी ! यहाँ दो मौज़ूद हैं । देखा जायेगा । क्या देखा जायेगा ? देश तो तुम्हारा पहले भी महान था, अब तो बयान भी जारी हो गया कि हम महान हो गये हैं । रोज ही नया बयान जारी होता है, हो रहा है कि 'आगे और.. और... और महान होते जाने की संभावना है । ' फिर अनुशासन पर क्या लिखोगे ?   अनुशासन तो देश को महान बना चुका, अब लकीर पीटने से फायदा ? अनुशासन की ढपली बजाओगे, तो देश के महान होने से गद्दारी करोगे । और अगर अनुशासनहीनता का दामन पकड़ते हो तो अपने यहाँ की  राजनीति  और बेचारे बेरोज़गार राजनीतिज्ञ क्या  घास  खोदेंगे ? अंदर के शरीफ़ आदमी ने चेताया, ' छोड़ो भी, क्या खोदते हैं, क्या खोदेंगे ? ' यह तो वही जानें, मेरी तो बला से !

 

" सर, आप आगे चले जा रहे हैं,"  पिच्छू से मेरा अटेंडेंट बोला, " क्लिनिक तो पीछे रह गयी ।" मैंने झट से अनुशासन पर ब्रेक लगाया, और बैक में ले लिया । लौट लो यार, अपनी मंज़िल तो यहीं तक है !  अच्छा, तो चलें ? ओक्के..बॅ।य !

इन्हें भी पढ़ें;

अथ मनुष्य योनिः

कैसे कैसों को दिया है, मेरी ब्लगिया हिट करा दे ..

 

 

 

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21 June 2008

क्यों .. ... ?

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सुबह से मन कुछ अनमना सा हो रहा है । आज क्लिनिक भी नहीं गया । अभी ब्लागजगत की सैर करके लौटा हूँ, कुछ ख़ास पोस्ट नहीं दिखीं । अब बाकी कल देखा जायेगा..सोच कर सोने आया । प्रयास करने पर नींद और भी आँखमिचौली खेलती है । एफ़०एम० लगा दिया है, कुछेक गाने बज गये, क्या सुना, मुझे स्वयं पता नहीं । दो बजने वाले हैं,  जब गानों में मन गड़ाने का प्रयास किया तो फ़ालतू सवाल ज़वाब होने लग पड़ा.. ..

wildlifephotographer

 

FM. क्यों चलती है पवन
मैं. हवा का दबाव कम होने से                                                                            

FM.क्यों झूमे है गगन
मैं.धरती की अपनी धुरी पर घूमने के कारण
FM.क्यों मचलता है मन
मैं.हृदय की गति और साँस बढ़ जाने के कारण
FM.न तुम जानो ना हम
मैं.अरे भाई अभी सभी कारण बताया तो

FM.क्यों आती है बहार
मैं.मौसम बदलने की वज़ह से
FM.क्यों लुटाता है करार
मैं.दिमागी तनाव से
FM.क्यों होता है प्यार
मैं.विपरीतलिंगी आकर्षण से
FM.ना तुम जानो ना हम
मैं.अरे भाई यह सब वैज्ञानिक बाते हैं , इनमें सिर मत खपाओ

FM.क्यों गुम है हर दिशा
मैं.क्योंकि तुम्हें दिशाभ्रम होगया है
FM.क्यॊ होता है नशा
मैं.ड्रुग्स लेने लगे होगे

FM.क्यों आता है मज़ा
मैं.अरे यार सांइस इसका ज़वाब दे चुका है

FM.ना तुम जानो ना हम
मैं.बड़े वाहियात आदमी हो, यार !
इतनी देर से तुमको बता क्या रहा हूँ, समझ नहीं आता !

मैं रेडियो बंद कर देता हूँ, इस अकारण खिन्नाहट की वज़ह ? मैं स्वयं ही नहीं जानता और इस खुशनुमा गीत का कबाड़ा परोसने टेबल पर आ गया हूँ !

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15 June 2008

काहे भाई , काहे परेसान हो ?

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बुश आजुकाल फिर से बौराये भये हैं, पता नहीं उन पर कौन सी खुज़ली सवार होय गयी है ?  डा० आर्या बतावें तो बता दें, चमड़ी की परख रखते हैं, वरना हम तो सीधी बात जानते हैं कि वह अपने जाते हुये राज का डर इस नवी किसिम  के  ख़ाज़ से छुपा रहे हैं । हमारी किताबें तो इसको कन्वर्ज़न रियेक्शन के नाम से पुकारती है । हुच्च हुच्च कर बता रहे हैं कि देखो दुनिया वालों, जिस भारतवर्ष की आबादी दुई बेर खाती थी और अब उसी की आधी आबादी दुई बेर खाने के जुगाड़ में हलाकान है, उसी नवे खलनायक हिंन्डियाः ( भारत ) के नालायकी से पूरी दुनिया में अनाज का टोटा पड़ा है ।

ओऎ बुश, तू अपनी बगलें खुजा । हमें काहे दिखा रहा है ? हमारे यहाँ का तो बच्चा बच्चा जानता है कि ' जो मज़ा ख़ाज़ में है, वह राज में  नहीं  ! ' इसलिये तुझे माफ़ करते हैं । तू चुपचाप अपना ख़ाज़सुख भोग । ऒऎ अमेरिकन झंखाड़, हम्मैं तो तू मुंडेरी पर बैठा बंदर लाग्गे है । बाँयें हाथ में रोट्टी दाब के अटारी से हम्मैं  घुड़क रहा है । तेरे पीठ की ख़ाज़ तो हमैं जैसे दिक्ख ना रही  ? अच्छा चल भई, मान ही लेते हैं कि ये हिंन्डियाः वाले बहुत दुष्ट हैं, सारा अनाज इकट्ठा करके वा में आग लगा दी , पण तेरे को क्या ?  तेरे यहाँ तो सूअर भी मक्का खा खाके मोटा हो रहा है, फिर तू तो उसको भी काट के खा जावेगा । फिर तेरे को क्या ?  अमेरिकन तो पेट भरने के वास्ते कुछ भी ठूँस लेता है, पर अनाजाश्रित तो हमारी आबादी ठहरी   

   happy_indians

तू काहे परेसान है ? क़ाज़ी के रोल में तो यार, तू फ़्लाप होगया, अब किसने तेरे को मौला बना दिया ?  कौन तेरे से रोट्टी माँगने जा रिया है ?  शायद यही तेरी तक़लीफ़ है ?  बोल तो, भेजूँ ओरिज़िनल हिंन्डियःन चाँदसी वालों को ?  तेरा बवासीर तो अब हमैं तक़लीफ़ देने लग पड़ा है, मान भी जा ऒऎ नासमझ, एक टीके में जड़ से खत्त्म !  नहीं मंज़ूर, तो चुप्प करके बैठ । किसने कहा था, तेरे से चौधरी बनणे को ?  चौधराहट भी तेरे को सूट करती ना दिक्खै । तू तो किसी का नन्हा सा भी ठेंगा देखते ही उछलने लग पड़ता है । अब भई, इतना तो झेल ही लिया कर,  काहे परेसान है ?

नाज़ियों की उलटखोपड़ी के चलते, तेरे को इतनी बेहतरीन खोपड़ियाँ मिल गयीं कि भगोड़ों लुटेरों का बेनाम मुलुक, अमेरिका कहलाने लगा । फिर हमारे हिंन्डियःन दिमागदारों  के तड़के-रेसिपी ने तेरी मार्केट वल्यू  कुछ ज़्यादा ही बढ़ा दी । और अब तेरी भी खोपड़ी नाज़ी तर्ज़ पर नाचती नाचती उलट रही दिक्खै है । चल भई हम  तेरी बकवास  गाँधी बाबा के नाम पर सह लेते हैं । पण एक शर्त है, तू दुनिया के सामने सिर्फ़ एक, बस सिर्फ़ एक पीस कच्ची घानी का ओरिज़िनल अमेरिकन   रक्ख दे ! ईब्ब, इतणा गुमान भी ठीक नहीं, भाई ! ' मतिभ्रम तोर प्रगट मैं जाना '

ऒऎ झंखाड़ कहीं के, खों खों करता दुनिया भर में अपनी गाल बजाता हुआ, अपनी चौधराहट की ऎसी तैसी क्यों करवा रहा है ? हर बार उछल कूद मचा कर फिस्स हो जाता है, भकुये ! अच्छा चल, यही बता दे कि हमारे भुक्खड़ भारत ने तो बिना तेरी मदद और धमकी को ठेंगा दिखा कर तीन तीन ज़ंग जीती है । तेरे पिट्ठुओं को छक कर पानी पिलाया है । अब तू अपनी बता, आज तलक कौन सी ज़ंग तैने जीती है ? वियतनाम से शुरु कर और सिर झुका कर अपनी जीत के निशान ढूँढ़ता हुआ  हम अनाजखोरों की गली तक आकर तो दिखा ! छड्डयार, होगा तू अपने मुँह मियाँमिट्ठू का महाशक्ति ? ताकत मशीनी मक्कारी के तामझाम में नहीं, इंसानों के बाजूओं में और हौसले में होती है, बे ! तेरे सिपाही तो मोर्चे पर भी दिल को बहलाने को लौंडिया माँगते हैं, तेरी आतुर बालायें भी देशसेवा के नाम पर लाल-सफ़ेद-नीली सितारा पट्टी की स्कर्ट उतारने फ़ौरन हाज़िर हो जाती हैं । क्यों मुँह खुलवाता है, निट्ठल्ला बैठा हूँ, तो क्या ? सोचता हूँ कि तेरे रंगरूटों का सारी ताकत यूनिफ़ार्म के पैंटों में ही भरी पड़ी है, बुरा मत मान भई ( बुरा मान भी जायेगा तो के कर लैग्गा ? ) तेरे रंगरूट अपना सारा ज़ौहर तो औरतों, बच्चों और बुड्ढों पर ही तो दिखाते हैं ! डरपोक कहीं का !

मानसून मेरे यहाँ अभी भले न आया हो, लेकिन अमेरिका में साइरन बजने लग पड़ा कि मुंबई के सड़कों के मेनहोल से ज़िन्दा बचकर भाग आओ, छिः ! चूहे का दिल भी इससे जियादा मज़बूत होता होगा । अपनी प्लेट के पुडिंग को छोड़, परायी रूखरी देख देख काहे परेसान है, भाई ?

 

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12 June 2008

मैं किस कबीले से हूँ ?

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पता नहीं मुझे कभी कभी क्या हो जाता है, किसी घटना को लेकर लगता है कि अरे, यह तो मेरे साथ घटित हुआ था, या हो रहा है । अनजानी जगह पर अनायास यह भावना जोर मारने लगती है कि यहाँ तो मैं आ चुका हूँ । जानता हूँ कि यह कोई रोजमर्रा की सामान्य घटना नहीं मानी जायेगी । किन्तु यह पागलपन भी नहीं है । यह चिकित्साजगत की एक सर्वमान्य प्रतिभासिक तथ्यपरता ( Phenomenon ) है । कारण ? अभी तक हम अनुसंधान ही कर रहे हैं कि ये Déjà-Vu क्यों होता है ?

कभी कभी लगता है कि पंडिताइन का चेहरा बहुत दूर होते होते अजनबी सा हो गया है, और मैं इस अजनबी चेहरे से कब  और कैसे मिला था, इसमें गुम हो जाता हूँ । दिमाग पर जोर देते देते सहसा एक झटके से मैं वर्तमान में लौट आता हूँ , सबकुछ झटक कर सहज होने के प्रयास में गुनगुनाने लगता हूँ, ' अज़नबी ..ऽ ऽ तुम जाने पहचाने से लगते होऽ ..ऽ ...ऽऽ

रुकिये भाई, खीझिये मत ! आप इस प्रोब्लेम में कुछ कर नहीं सकते, तो यह आपकी प्रोब्लेम है , किंतु ब्लागस्पाट पर आने को कम से कम इस डाक्टर ने तो आपको नहीं ही कहा था । अब आयें हैं, तो थोड़ा शेयर भी करना ही होगा , ब्लागर स्प्रिट का निषेध चल भी रहा है तो क्या ? मान लीजिये आपको सौजन्यवश यदि टिप्पणी ही करनी पड़ जाये तो, क्या लिखेंगे ?

इधर कुछ दिनों से सुबह सुबह अख़बारों  पर सरसरी निगाह मारने मात्र से मुझको लगने लगता है कि मेरा संबन्ध किसी न किसी कबीले से अवश्य है ! ऎसी अनुभूति  Déjà-Vu के सैद्धान्तिक अवधारणा के एकदम उलट है, किंतु यह मेरा सच है ।

अव्वल तो मैं कभी पूरा समाचार नहीं पढ़ता, यहाँ कोई शाश्वत साहित्य तो होता नहीं कि इसपर समय दिया जाये, और दूसरे अल्लसुबह निगेटिव किसिम की सुर्खियों से दिन की शुरुआत करना मुझे रास नहीं आता । स्साला, क्या हो रहा है ... कहते हुये अख़बार को मोड़ बगल में सहेज कर रख देने के शुतुरमुर्ग़ी सोच से मेरा असहमत मौन आहत होता है । क्या करें, भला ?

इन दिनों मैं अपने रूट्स यानि कि जड़ें कबाइली हलकों में तलाश रहा हूँ । अपने ख़ानदान का सज़रा भी टटोल डाला, किंतु ड्राफ्टपेपर पर यह मेरे बाबा स्व० नागेश्वर प्रसाद सिन्हा को लाँघता  हुआ  परबाबा बाबू मनोरथ प्रसाद से उचक कर राय बिलट लाल पर थम जाता है ।  बड़ी मुश्किल है, ब्लागर पर भी आना जाना छूट गया । खैर, लौट कर इसी जहाज़ पर आना पड़ा,  अब आ ही गया हूँ ,तो मेरी  सहायता करें ।  अब श्री बिलट लाल जी को पछाड़ कर मैं पश्चगमन ( Retrograde Journey ) करता हुआ, सुपरफ़ास्ट प्रागैतिहासिक आदिमानव टाइम कैप्सूल से  नानस्टाप द्वापर-त्रेता-सतयुग  छोड़ वहाँ  तक पहुँच भी जाऊँ , तो यह कौन बतायेगा कि, " वह देखो, वह है तुम्हारा छिन्नाछिन्नी लाऊखाऊ पेंचक्कचेंपक  हूओअहोऊ  कबीला ! " सो यह मेरा भ्रम ही था

 ्गु़अज़रा ज़माना - अमर ्सरदार अमर - अमर मेरा कबीला - अमर

भ्रम तोड़ा भी किसने ? कबीरदास नाम के किसी अनपढ़ जुलाहे ने ! पीछे से आवाज़ दी, ' मोको कहाँ ढूँढ़ो रे बंदे... ' तेरा कबीला तो यहीं है, देख तो जरा ।  'पोथी पढ़ पढ़ जग मुआ ' तो डरता क्यूँ है ? अच्छा पोथी मत पढ़, चल अख़बार तो पढ़ेगा ? चाय की चुस्की का मज़ा दुगना कर, अख़बार पढ़ ! परेशान मत हुआ कर, यदा कदा लाली भी देख लिया कर ।  कबीला बाद में देखना ।

   मेरा परिवार - अमरxxx ्काश मैं ऎसा होता - अमरtt

हा विधाता, यह कैसी बारिश करवा रहे हो कि आज अख़बरवै नहीं आया ।  तो क्या ? जाके आज कुछ रिवीज़न ही कर ले ।     धन्य धन्य कबीरा ज़ुलहे , मेरा कबीला तो यहीं बिखरा पड़ा है !

अरे वाह, बरेली ( मेरी वाली नहीं ) में प्रेम करने वाली लड़की घर वालों द्वारा मार डाली गयी और लौंडे को दौड़ा दौड़ा कर पीटा फिर जला डाला गया । बाँदा में तीन ग्रामीणों ने चौथे की रोटी लूट ली । मार लेयो, रोटी तो गयी पेट में । भूख से मरने से अच्छा कि कुछ झापड़ वापड़ खा लिया जाये । हरदोई में लड़की को निर्वस्त्र करके पेड़ से लटका दिया, क्योंकि वह किसी दूसरे से ब्याह रचाना चाहती थी । महोबा में लाठी डंडों से हमला कर गाँव वालों ने पानी लूट लिया । हुँह, अरे पानी है ही लूटने की चीज ! प्यास से कौन मरना चाहता है ? बंगलुरू में खाद माँग रहे कुछ बेवकूफ़ों में एक मारा गया । कोट्टायम में लड़के के लिये ऊलूऊलूलजुलूल ओझा ने दो वर्षीय कन्या की बलि दे दी ।  देवि खुस्स भयीं, अब देवा आवेगा । देवा अगर होनहार निकला तो बड़े होकर फिर किसी देवी को जलावेगा । गाज़ियाबाद में इस साल अबतक 121 बच्चे गायब किये जा चुके हैं । बलात्कार ? यह तो यहाँ मनोरंजन है । बलात्कारी और न्यायाधिकारी (?) दोनों के मौज की चीज ! अपनी या किसी और की सही माँ, बहन, बहू, बेटी, भाँजी, भतीजी, बच्ची, बूढ़ी... बस औरतिया हो , बदसूरत हो तो भी ठीक, खूबसूरत हो तो क्या कहने.. उसे  उठा लो.. इच्छा तृप्त करो और किनारे फेंक दो, ज़िंदा या मुर्दा ! औरतिया तो मरद की ज़रूरत है..तो फिर बवाल काहे का ?

अब तो कोई शक औ ' शुब़हा न रहा कि मेरा वाला कबीला भी यहीं कहीं होगा । क्या ज़रूरत है पुरखों को कूद फाँद कर पीछे भागने की ? सब तो यहीं है । मेरा मन मृग फिर क्यों कबीलाई कस्तूरी की खोज में भाग रहा है ? यहीं तो है कलयुगी कस्तूरी !

धन्य धन्य कबिरा ज़ुलहे, सो मेरा कबीला तो यहीं बिखरा पड़ा है।                                                                             मैं मूरख déjà-Vu का राग अलाप रहा हूँ, बलिहारी  ज़ुलहे आपनो सत्य दियो बताय । फिर भी एक मुश्किल है  कि  मेरा वाला कौन सा है ?  अभी तो, मैं किनारे खड़ा खड़ा लख रहा हूँ कि अपने लोगों का मौन रहने वाला शांतिप्रिय कबीला आख़िर किस खोह में मिल सकता है ?  मेरे कबीले की भी तो कोई पहचान अवश्य होगी । बस वही पहचान  मुझे चाहिये । प्लीज़,  भले मानुष कृपया सहायता करें, मुझे मेरे अपने कबीले से मिला दें  ! या  कहीं..  ..  आप भी तो चक्कर नहीं खा रहे कि ' मैं किस कबीले से हूँ ? '

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29 May 2008

अबे , तुम खुश तो हुये नऊये ?

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कैसा लगा बंम्बक नाऊ का किस्सा, कुछ  ख़ास नहीं, बचकाना, मज़ेदार या कुछ  और  ? 

वैसे भी यह  पोस्ट गलत टाइम पर  रिलीज़ हो गयी । हमरे बिलागपुरा में टेंशन हुयी गयी, कुछ जन बौरिया के गाली गुफ़्ता पर उतर आये, मरद  मेहरिया सबै चिल्लाहट मचा दिये, सवा सोलह आने अराजकता के लेबल लायक । सब डिस्टर्ब होय गया । अभी तो ग़मी छायी है, बड़के मूड़ी जोड़ कर मंत्रणा कर रहे हैं, तमाशबीन मूड़ी पटक रहे हैं । पता नहीं इनको इस नऊये से का दुश्मनी रही ?  हमको लगता है कि यह सुनियोजित दंगा, हमरे पोस्ट को फ़्लाप करने के लिये ही किया गवा है ।  खैर, जितना भी कोशिश करो.. नऊआ अमर है, मरेगा नहीं !

वैसे सच बताऊँ तो, मुझको भी लग रहा था कि यह कुछ जमेगा नहीं , निहायत गैर बुद्धिजीवी किसिम का किस्सा ! आपने कहा और मैंने आपके कहे का पालन ही तो किया । लेकिन.... ?  आपमें से किसी को पिछले किस्से में ऎसा तो नहीं लगा  कि नऊआ यह साबित कर रहा हो कि शासक के निरंकुशता  के  धमक को कितना भी दबा लिया जाय, किंतु इसकी गूँज किसी न किसी रूप में सुनायी ही देती है ?  न भी लगा हो तो  आश्चर्य नहीं, दुनिया की रीत  एक ऎसा ज़ुमला है, जो  हर ज़्यादती को अपने में समा लेता है, ए ब्लैक होल !

खैर, छोड़िये भी, अगर ब्लागर ज़्यादा दिमाग लगायेगा तो हो चुकी ब्लागिंग !                                                                                                लगे हाथ दूसरा नया वाला किस्सा   भी झेल लीजिये, फिर न कहुँगा कि आओ मेरी लंतरानी पढ़ो ।

एक रहें राजा... रियासत लोकेशन जिला नांदेड़, मौजा- मज़रे  दू टीशन आगे, थाना लगता था- हमरी भैंस !                                               उनका एक निजी नाऊ था । ई राजा लोगन का तो हर चीजे परसनल होता है । नाऊ, पुरोहित.. बहुत लंबी लिस्ट है भाई । बस, इतना ही जान लीजिये कि किसी की भी बहू-बेटी,को समझते अपनी ही ज़ागीर । पसंद आयी, उठवा लिया । अब आपतो सब जानते ही हैं, ज़्यादा क्या बतायें  ? खैर.. छोड़िये, हमलोग भले आदमी हैं, किसी के चरित्र से क्या लेना देना ?  वैसे भी ब्लागर आज कल इसी सब  चलित्तर  से गुलज़ार है ।

सो, नाऊ राजा का अपना खास निजी था । रोज सुबह पहुँच जाता और राजा की दाढ़ी छीलछाल के, चम्पी वम्पी करके उनका चेहरा चमका देता था । नाऊ भला चुप रह सकता है, पूरे समय बकर बकर...बकर बकर । राजा को भी मौज आती थी, उनकी ऎंठू फारमल जिन्दगानी में एक यही था, जिससे वह रामायण से लेकर रमेसरिया राँड़ तक की बातें खुल कर किया करते । रमेसरिया के गदरायेपन का रस राजा के कानों में टपकाते हुये , उसकी आँखें इधर उधर नाचा करतीं । शायद राजकुमारी की एक झलक दिख जाये ?  वह मन को समझाया करता, औकात में रह ! लेकिन उसका दिल डपट देता, काहे की औकात ?  राजा साहेब रमेसरिया पर उतर सकते हैं, तो हम काहे नहीं राजकुमारी  तक चढ़ सकते ?  जिसका दिल जहाँ आजाये, कोई रोक है ? इसमें तो,  मुला  अपने ब्रह्मा विष्णु महेश भी रपट चुके हैं । और मेरी नियत में कौनो खोट थोड़े है, हम तो राजकुमारी को सिरिफ़ एक बार नज़दीक से छू छा कर, उनकी खसबू लेकर देखना चाहते हैं कि आखिर काहे की बनी है, उनकी उज्जर झकाझक्क काया ?  बेचारा इसी उधेड़ बुन में लगा रहता, मन ही मन उसको  दिन में कई बार निर्वस्त्र करके  देखा करता । अरे चलो, आगे बढ़ो आगे बढ़ते रहो !smile_omg

ख़ामोश नऊआ ( नाम गुप्त रखने की शर्त है, उसकी ), तो नऊआ ख़ामोशी से अपना काम कर रहा था ।                                                            राजा ने तिरछे होकर गैस निकाली और  गरदन पर खुज़ली करते हुये बोले, "आज  क्यों बड़ा चुप चुप है, कुछ बोल नहीं रहा ?"    नाऊ एकदम से अपने फार्म में आ गया, " कुछ नहीं सरकार, हमरे तो गँवारू मन में यही चल रहा था कि देखो भगवान भी कितनी नाइंसाफ़ी किये है । हमसे फँसती सब की है, हमरे बिना कुछ शुभ हो ही नहीं सकता , फिर भी दुत्तकारे जाते हैं ।"  राजा ने हुँकारी भरी, तो नऊये का हौसला बढ़ा, "अब देखिये हुज़ूर, कि दुनिया आपके आगे सिर उठाये तो सिर कलम कर दिया जाये, लेकिन आप हमरे सामने रोज़ ही मूड़ी झुकाते हैं । जिनको देख के लोगन की हवा गुम हो जाती है, अकड़ ढीली हो जाती है, उनके गरदन पर हमारा उस्तरा चला करता है । है कि नहीं हुज़ूर ?  आपके मोंछ की एक बाल के लिये सिपाही अपनी जान दे दें, अब भला मोंछ और मोंछन की लढ़ाई में  आपसे कोऊ आज तलक जीत सका है ? " सो तो है," राजा मगन हुये ।

"लेकिन हुज़ूर, अब इहाँ कौन देख रहा है कि ई साला नऊआ आपके मोंछन के एक एक बाल को खींच खींच, उनपर कैंची चला रहा है ? इहाँ मोंछन को लेकर जंग छिड़ी है, और हम आपके मोंछ रोज़ ही कतरा करते हैं !" अब राजा असहज हुये, यह बेलगाम नाऊ आगे  कुछ  और न बोल दे । उन्होंने उसके बकबक पर ब्रेक लगायी, "हाँ हाँ ठीक है, मेरा मन खुश होता भया,  बोल क्या ईनाम चाहिये ? " अब नाऊ जी सतर्क हुये, सही मौका है।

लहरा कर प्रतिवाद किया, "अरे नहीं हुज़ूर, ईनाम ऊनाम की कोई बात ही नहीं है, हम तो ऎसे ही कह दिये मन की बात ।" साले का मुँह तो बन्द करना ही पड़ेगा, गरज़े राजा "बोल क्या ईनाम चाहिये, अपने मुँह से बोल लेकिन जो जो यहाँ अभी बोला है, ख़बरदार जो बाहर जाकर किसी से बोला ।"  रंग में आगये नाऊ महाराज, " माई बाप, हमने ईनाम ऊनाम लायक तो कोनो काम नहीं किया, हम तो एकही बात बोले कि आपकी मोंछ पर हमारी कैंची...." राजा दहाड़ने लगे, ( बताया था न कि इन बड़कन के मिज़ाज़ का कोई भरोसा नहीं होता ) , " तू अपना बख़्सीश ले और चलता बन ।" नाऊ सयाने तो मन में झूम उठे, थोड़ा और गरम हों लें तो हम चोट करें । राजकुमारी से एक रात अकेले रहने की इज़ाज़त तो लेकर रहेंगे ।" राजा अब रंभाने लगे, "अरे बोल दे भाई, हाथी लेगा, घोड़ा लेगा, गाँव ज़ागीर चाहिये तो वह भी बोल, लेकिन अपना मुँह बन्द रखना ।" श्रीमान नाऊ ने अब अपना बैटिंग आर्डर बदल दिया,"हुज़ूर ई सब तो बड़े मनई को शोभा देता है, हाथी...ज़ागीर हमसे कहाँ संभलेगा ? "

हुज़्ज़त बढ़ती गयी, अंत में नाऊ श्री ने भूमिका बनायी, "सरकार चीज बस्त लेकर क्या करेंगे ? हम गरीब के बात से आपका मन खुश हुआ तो आप भी हमारा मन खुश कर दीजिये । हमको खुश करके अगर आपको खुश होना ही है तो बस हमको खुश कर दीजिये, चाहे जैसे... हम आगे कुछ नहीं बोलेंगे । हमको तो सिरिफ़ खुश होने से मतलब है ।"  राजा किचकिचा गये, "अबे  खुशखुश् खुशखुश किये जा रहा है, कुछ मुँह भी खोलेगा कि लगाऊँ दो जूते ?" नाऊ अब मन ही मन मुस्काया, थोड़ा और पगला जायें, तब तो हम कबूलवा ही लेंगे...जो हम चाहते हैं । मज़बूरी सब मंज़ूर करा देती है । वह मिमिया कर बोला, "हज़ूर चाहे दो जूते लगायें चाहे दो लाख ? हम उज़ुर ( उज़्र ) नहीं करेंगे । हमको तो बस खुश होने से मतलब है, ताकि हम भी कह सकें कि हम जिस मोंछ को जी जान से इतना तराशे भये हैं, उस मोंछ की शान में हुज़ूर ने बट्टा नहीं लगने दिया ।"

"यह तो बज़्ज़र हरामी है । मुँह भी नहीं खोल रहा है और इतने देर से मेरा मोंछ  खींचे जा रहा है कि बस, खुश्श कर दो .. कुछ लेंगे नहीं !"  राजा को अब गश आने लगा , हताशा में जो कुछ उनके मुखारबिन्द से झर रहा था, वह यहाँ ब्लागित किया जाना संभव नहीं है ( यहाँ से दो पेज़ बाँयें जा कर धाक गली 47 के क्रम संख्या 1857 पर इन का ज़ायज़ा लिया जा सकता है, कुत्तों से सावधान का बोर्ड घुँधला गया है, अपना ख्याल रखें )

चमगोईंयाँ की आहट पाकर मंत्री जी भी आगये, तुरंत माज़रा समझ गये । मंत्री जी ने आन बिहाफ़ आफ़ राजा साहब   नऊये से  एक दिन की मोहलत माँग कर उसे विदा किया । समेट रहा हूँ..   दो घड़ी बाद लौट कर, गुप्तचरों से प्राप्त जानकारी का निष्कर्ष राजा को रटवा दिया कि बस आप यही बोलना । फिर देखियेगा कि नाऊश्री कैसे नहीं खुश होते हैं ? राजा को संशय तो था किंतु लाचार थे , एक बार यही सही !

अगले दिन सज वज के नाऊश्री पधारे, सबको मात दे देने की अदा से सलाम किया । राजा ने देखते ही उनको एक ज़रूरी बात कहने को अपने पास बुलाया, और उसके कान में कुछ कहा । नाऊ एकदम से उछल पड़ा, हर्ष से नाच ही तो पड़ा," हज़ूर, आपने तो तबियत खुश कर दी । अरे सरकार आप नहीं समझेंगे कि हमने इसमें कितना दिमाग लगाया था । सरकार अगर हम कुछ देने लायक होते तो हम आप ही को कुछ इकराम दे देते । अब चलने दीजिये हज़ूर, एक बार हम अपनी आँख से जी भर के तो देख लें । तबियत खुश हो गयी , सरकार !"

राजा ने डपट कर पूछा,"अबे इतने कशीदे मत पढ़, सीधे सीधे बता कि तू खुश तो हुआ नऊये ?"                                                                 

नऊआ वहीं कलाबाजी खा गया, "अरे माई बाप, भला कौन नहीं खुश होगा । यह तो ऎसी चीज़ है की इस दुनिया का कौन नहीं खुश होगा ?               हम बहुत खुश हैं सरकार, बहुतै खुश !"

अब बारी राजा साहब की थी । वह चारों ओर गरदन घुमा कर दरबार का ज़ायज़ा लेते हुये , सगर्व बोले, " तो नऊये, तू खुश हुआ यानि कि हमारा देना पावना बरोबर !" नऊआ अब सहमा, फँस गये गुरु, " जी ऎसा ही समझा जाये, सरकार ।" और चलने को हुआ, कि राजा ने चुटकी ली," मतलब  तुम्हें ऎसे ही खुशी मिला करे तो किसी की मूँछ पर लपकोगे तो नहीं ? " नऊये ने पीछा छुड़ाया, "किसी की मूँछ क्या, अपनी मूँछ का भी ख़्याल मन से निकाल देंगे ।" उसने पूरे दरबार को जै राम जी की बोली, और सरपट चलता बना !

हमसे भूल हो गयी ;  वह क्या कि नऊआ की ख़ुशी में मैं भी बह गया । आप सब भी सोच रहे होंगे कि यह कोई आर्ट फ़िल्म की स्क्रिप्ट जैसे बीच में ही दि ऎन्ड कैसे हो गया ? गुप्तचरों ने सूचना क्या दी थी ? नउआ हर्षाया क्यों ?

दरअसल गुप्तचरों के अनुसार नाऊश्री एक ब्लाग लिखते थे ' तेरी कहानी - मेरे कैंचीं उस्तरे की ज़ुबानी' ' यह ब्लाग उनके दुश्मनों से निपटने के काम आता था । उनके उस्तरे के धार की बड़ी धाक थी । कैंचीं उस्तरे के बीच प्रतीकात्मक लड़ाई भी हुआ करती थी । लिहाज़ा यहाँ कोई आता जाता नहीं था । नाऊश्री यहाँ स्वयं स्खलित होकर संतुष्ट हो लेते थे, बस ! वह नोटिस न लिये जाने से भी परेशान रहा करते थे कि राजा ने उनके कान में भर दिया कि वहाँ टिप्पणी आयी है, व रातोंरात हिट संख्या ढाईगुनी हो गयी है । समझा तो यह भी जाता है कि इतनी सघन आवाजाही से स्टैटकाउंटर भी पनाह माँग गया । अब इससे कौन खुश नहीं होगा ? क्या आप खुश न होते ? नऊआ खुश हो रहा है, तो क्या बेज़ा है ?                                       मुस्कुराइये और आप भी इनकी खुशी में बह लीजिये । चलता हूँ, नमस्कार !

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26 May 2008

लो सुनो भाई, राजा और नउआ का किस्सा

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कहानियाँ बहुत समय पहले ही होती थीं, आज़ का सच कौन सुनना चाहता है ? तो, बहुत समय पहले की बात है , एक राजा थे  और एक उनका मुँहलगा नाई ! नाई उस्तरे का धनी किंतु बुद्धि का भोथड़ा था , पर बनता होशियार था । हर जगह अपनी टाँग घुसेरने को तत्पर ! उसके मन में आया कि यह काजू मेवे खाने वाला राजा भला हगता क्या होगा ?  जरा किसी दिन देखा जाये , कैसे भला ?  मुश्किल है । कोई मुश्किल नहीं, नाऊन ने सुझाया । उनको सुबह टहलाने व खुली हवा में मालिश करने ले ही जाते हो, एक दिन ज़ुलाब दे दो । इसमें तो अच्छे अच्छे ढीले हो जाते हैं, क्या राजा क्या प्रजा ?  बस असलियत देख लेना, और सुना है कि उनके दो सींग भी हैं, कनज़ेनिटल एनामेली ! पगड़ी में छुपाये रहते हैं, लगे हाथ यह भी देख लेना तो मैं रानी जी से कुछ ईनाम वगैरह झटक लाऊँगी । बहुत अपने को  बनती हैं ।

सो अगली सुबह उनको नसवार में मिला कर ज़ुलाब सुँघा दिया । फेंट नहीं रहा हूँ  हलचल यह तो अपने देश के प्राचीन फार्मा वालों के स्वर्णकाल का कमाल था । मुश्किल से दो मील गये होंगे कि गुड़गुड़ गुड़गुड़ होने लगी । राजा असहज हो चलने लगे, बोले बम्बक आज वापस हो लिया जाये । बम्बक नाम था नाई का, मगन हो गया कि लगता है तीर सही निशाने पर जा रहा है । वह उनको बहटियाने लगा, हज़ूर ये..तो हज़ूर वो । कोयल का संगीत, शीतल बयार, झरझर झरना, मनोरम लालिमा जैसी कवियों की भाषा बोलने लगा । राजा हो गये बेचैन । अंदर से गुड़गुड़ गुड़गुड़ जोर मारने लगा, यह गुड़गुड़ तो समदर्शी है, उसके लिये सब बराबर, क्या राजा और क्या प्रजा ?

गुड़गुड़ की आवाज़ भला कभी दबायी जा सकी है ? आश्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्शश्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्शश्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्द्फ़ फ़  स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स़्अ़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़व्व्व्व्व्व्व्व्व्व्व्व्वद्द्व्च्च्च्च्च्च्व०००                                                                               नहीं पढ़ पा रहे हैं ? कोई बात नहीं ! ऎसा पढ़े लिखों के साथ अक्सर हो जाता है । अनायास छोटी, मेरी काकर स्पेनियल बिच आकर लाड़ से इस कीबोर्ड पर बैठ गयी, और यह अनोखी स्वरलिपि तैयार हो गयी । चलिये, आप भी इसके साक्षी बन कृतार्थ हो लें, दि फ़र्स्ट कंट्रिब्यूशन आफ़ ए बीस्ट इन हिंदी ब्लागिंग ! एक और शोध प्रबंध का मसाला, क्या यह वाईकिपीडिया को भेज दूँ ? चौपाल पर चल रहे  किस्से कहानियों में तो ऎसे इंटरवल आते ही रहते हैं, यह शायद पहला है, ब्लागर पर ! नाहर जी, क्या बोलते आप ? है ना !

तो, गुड़गुड़ गुड़गुड़ की गुड़गुड़ी पेट में बजाते हुये राजा साहब तिलमिला कर खेतों की तरफ़ भागे, और झट एक पेड़ की आड़ में बैठ गये चूड़ीदार उतारते उतारते भी खराब हो ही गयी । निवृत्त हो चैन की साँस लेते हुये कमर में अपनी पगड़ी लपेटे हुये लौटे । बम्बक नाऊ को जो देखना था वह, और जो न देखना था वह भी, यानि सब कुछ  दिख गया । अब नउये के हाज़में की दवा तो हकीम लुकमान के पास भी नहीं थी । सो, बात इधर उधर फैलने लगी, गुप्तचरों ने आकर सूचना दी कि राज्य की प्रजा हज़ूर माई बाप की खिल्ली उड़ा रही है । क्या कहती है, प्रजा ?  राजा ने व्यग्र हो कर पूछा । क्या बोलते वह, गुप्तचर मुँह छिपा कर  हँसी रोकने  में असमर्थ हो रो पड़े । क्या है ?

क्या है भाई, बोलोगे भी ? अनिष्ट की आशंका से यह राजा लोग बहुत जल्दी सहम जाते हैं । हज़ूर जान बख़्स दी जाये, प्रजा में फुसफुसाहट है कि आपके कपड़े खराब हो गये थे, और यह भी कि आपने अपनी पगड़ी में दो सींग छिपा रखे हैं । यह आकृति दोष राज्य की खुशहाली को ग्रहण लगा सकती है । तेल, आटा, अनाज़ों का भाव पहले ही आसमान छू रहा है । बहुत असंतोष पनप रहा है, उनमें । कुछ कीजिये हज़ूर ।

यह बात , बमक उठे राजा ! बम्बक को तुरंत पकड़ लाओ और फौरन खाल खींच कर उसकी स्त्री के पास भिजवा दो । मेरा इतना घोर अपमान,... हाँफने लगे, " और इसके बाद पीटते हुये उसके स्त्री को राज्य से बाहर खदेड़ दो, मतलब LOC के उस पार, फौरन से पेश्तर ! "    यही कहा है कि बड़कन की दोस्ती, जी का जंजाल ! न जाने कितने जन ऎसी दोस्ती में जान गँवा चुके हैं, ख़ल्लास ! नउआ जो कि सयाना माना जाता है, पंडित की लूट में भी अपना हक रखवा लेने की हैसियत बना ली है, सत्ता के नज़दीक आकर गच्चा खा ही गया । बेचारा बम्बट, खाल खींची गयी । नाऊन खदेड़ी गयी । किसी अवसरवादी ने खाल का सौदा कर एक ढोलकिये को बेच दिया । फिर ?

फिर उस खाल को तबले पर मढ़ कर ऊँचे दामो पर बेच दिया गया । इस तबले से बड़े ही खरे बोल फूटते थे । तबले की शोहरत होगयी। राजा को भी सुनने की तलब लगी । महफ़िल सजी, तबले कसे गये, धुँधू ध्धा, धुँधू ध्धा, धँमक्क धिन ध्धा, धँऊह.. हँउ धँऊह, धुँधू ध्धा ।

और फिर तबले ने अपना रंग दिखाना शुरु किया ।                                                                        

एक बोला,  राजा के दो सिंग दो सिंग..हग्ग दिहिन दो सिंग दो सिंग                                                           

दूसरे ने संगत दी,   किंम्म कहाआ किंम्म क्कहा हुँन्न क्कहा किंम्म कहा                                                       

पहले से ज़वाब आयाबंम्बक्क हज़्ज़ाम्म बंम्बक्क हज़्ज़ाम्म  हुँअः बंम्बक्क हज़्ज़ाम्म                           

इतने में दूसरे का ताल बहक गया,   ऊँहुँ ब्लागर तम्माम  ब्लागर तम्माम
पहले ने आगाह किया,   हुँऎंअ हुँः,   त्ताल्ल संभाल्ल दो सिंग दो सिंग
दूसरा जिदिया गया हाँअः ब्ल्लाग्गर त्तम्माम  क्कहाः ब्ल्लाग्गर त्तम्माम  

 

भाई कोई बुरा मत मानना, भले ही खाल खींच ली जाये, बात तो हमारे पेट में भी कहाँ पचती है ?70903

दूसरा किस्सा कल देखना, मित्रों । और भी काम हैं दुनिया में....ब्लागिंग के सिवा

इससे आगे

25 May 2008

राजा और नऊआ का किस्सा

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समीर भाई की फ़रमाइश हुई है कि यह किस्सा क्यों दबा गये ? समीर भाई मेरे  बचपन  के साथी एवं सहयोगी भी हैं । सो आपके आगे आना  पड़ा । मौज का मसाला तो मौज में ही लिखेंगे न, दद्दू ? आप तो हेलिकाप्टर पर उड़ रहे हो और मुझ पर  धुर देहाती किस्से का सवाल ठोक दिया । मेरे लड़कईं की यहसब  बातें अब कौन पढ़ेगा , सैलून पार्लर के ज़माने में राजा अउर नउआ ? देख लो भाई, अगर चार ठईं पाठक भी न जुटे तो मुझको क्लेष पहुँचाने के भागीदार बनोगे । अपने को व्यक्त करते रहने की अपनी आदत तो है, किंतु इतना भी ठेलास नहीं सताता कि जुटे रहें, कंम्प्यूटरवा भी कल्ला कर बोले , '' भईय्या, अब अपना रिस्टार्ट ले लो !  ''  वैसे कुछ खलबली तो मेरे अंदर भी मचनी शुरु हो गयी है, पाठक न आवें तो क्या लिखना छोड़ दें ?  जब फ़ुरसतिया हमार कोउ  का करिहे का ताल ठोक हिट हो रहे हैं । पाठक संख्या तराज़ू पर तौले जा रहे हैं, तो मुझ जैसे पसंगे  को ऎसी टुच्ची परवाह नहीं करनी चाहिये, इन पाठकों की ! कोशिश करते हैं।

आज करे सो काल्ह कर

काल्ह करे सो परसों

सब ब्लागर आगे जाय रहें

तुम बोवत रह गये सरसों

तो समीर भाई ने ताव दिलाया कि राजा नउआ का किस्सा भी सुना डालो।  यह उनके फ़रमाइश  करने का निराला अंदाज़ है, उकसा कर कुछ भी ले लेने की अदा । वारी जाऊँ समीर भईया , मेरी अंटी में दबा माल निकलवाय ले रहे हो । नमक से नमक खाय चाहत हो !

आप सब पढ़ रहे हो ना ! तो आप गवाह हो वरना मुझे इतनी जल्दी नहीं थी । अब बताइये कि इतनी उदार हृदय  विशाल काया एक क्षुद्र प्राणी से कुछ माँग रहा है, वह भी एक पोस्ट ! फिर कोई टाल कैसे सकता है ? मैं दानी राजा उशीनर तो नहीं, न ही हर्षवर्धन हूँ । अलबत्ता दधिची में मुझे  गिना जा सकता हैं । माँस नहीं तो हड्डियाँ दे ही सकता हूँ, हड्डी  लटकाये  फिरना भी कोई बुद्धिमानी है ? बाई दि वे,  प्रिय  विज्ञजनों , मेरा यह कौतूहल शांत करें कि उनको अपने जाँघ का माँस क्यों देना पड़ा, क्या तब गोश्त नहीं बिका करता था ?

शोधार्थी जरा इस विषय पर ध्यान दें । हाँ तो, समीर भाई कौन सी कहानी सुनेंगे, नई वाली या फिर पुरानी वाली, या कि दोनों ? यह टंटा आज ही ख़त्म हो जाये, दोनों ही सुनाये देता हूँ ।हुँकारी भले  न भेजो लेकिन कोई सोयेगा तो नहीं ? अगर नींद आये तो .....  ....  ....  प्रमोद,  प्रत्यक्षा, बोधित्सव, यशवंत वगैरह के ब्लाग पर घूमफिर आओ, शायद आँखें खुल जायें । और  यह भी सुनते आना कि  दीपकबाबू का कहिन ?

लो फिर सुनो, पुराना वाला किस्सा..

 भाई माफ़ करना, पंडिताइन पंगा कर रही हैं, अब उठ् भी लो । जाकर चार पैसे कमा कर लाओ, शाम के सात बज रहे हैं ! बस अभी लौट कर सुनाता हूँ, बाकी का हवाल !  इसको लटकाऊँगा नहीं, बदनसीब शाह हनुमानुद्दीन की तरह...यह वादा रहा । नमस्कार !

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24 May 2008

पर मैं यह सब लिख क्यों रहा हूँ ?

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उफ़्फ़ कितनी गर्मी थी, यह अमेरिका, कनाडा व आयरलैंड में बैठे लोग क्या जानें ? वह तो सर्दियों में साइबेरियन प्रवासी पक्षियों की तरह अपने इंडिया आते हैं, और गर्मियों की शुरुआत होते ही फिर फ़ुर्र हो जाते हैं । पर इन बातों का यहाँ क्या लेना देना, फिर मैं यह सब लिख क्यों रहा हूँ ? अब निट्ठल्ला तो बकवास  ही करेगा, न ? सो कर रहा हूँ ! अब आप पढ़ने पर आमदा ही हैं, तो मैं क्या करूँ ?

हाँ, तो इस बार की गर्मी ग्लोबल वार्मिंग और बुश्श के भेज़े के तड़के के साथ आयी है, सो ज़ाहिर है कि कुछ ज़्यादा ही गर्म थी ।  यह कहा जाता है कि गर्मियों में हम डाक्टरों की ज़ेबें भी गर्म हुआ करती हैं, तो भाई मेरे, डाक्टर को खटना भी तो पड़ता है ! और एक आम हिंदुस्तानी को दूसरे की ज़ेब  और अपनी बीबी हमेशा से मोटी लगती आयी है, सो यह एक सार्वभौमिक हिंदुस्तानी वहम है । इसको छोड़ ही दो,   तभी तुम्हें सुख नसीब होगा । मैं सीज़नल प्रैक्टिस नहीं करता हूँ, उल्टी-दस्त के मरीज़ से अपने स्टाइल  में हिस्ट्री लेने लगूँगा तो मेरा चैम्बर ही गँधा जायेगा । लिहाज़ा मन को समझाने को यह ख़्याल अच्छा है कि मैं सीज़नल प्रैक्टिस नहीं करता । फिर भी व्यस्तता कुछ बढ़ ही जाती है, रेफ़रल केसेज़ की वज़ह से । वृश्चिक राशि है ( यह तो गुणीजन अब तक समझ ही गये होंगे ) सो गर्मियों में शिथिल हो फ़ुरसत के लम्हों में कहीं कोने कुचरे में पड़ा रहता हूँ । फिर वही बात यानि ढाक के तीन पात ? मेरी वृश्चिक राशि, मीन लग्न, मेष बुद्धि इत्यादि से अगले को क्या, कोई लग्नपत्रिका तो निकलवानी नहीं है ?  फिर, मैं यह सब लिख क्यों रहा हूँ ?  यह तो आप सोचें कि  आप पढ़ क्यों रहे हैं ?  निट्ठल्ले की साइट है, बल्कि ऊपर डिस्क्लेमर भी  है तो सोच कर संतोष कर लें कि पढ़ तो रहे हैं, यूँ ही निट्ठल्ला ...

मुझे स्वयं ही लगता है कि गलत बयाना ले लिया । यह सइटिया तो यह सोचकर बनायी थी कि अपने निट्ठल्ले क्षणों का कुछ चिंतन यहाँ उकेरूँगा । लोग कविता उविता लिखते हैं, चलो मैं एक नयी विधा  के सृजन में ही थोड़ा हाथ बँटा दूँ । सो, वह तो होता नहीं दिख रहा ।  आपाधापी  में जीने वालों को चिंतन की लक्ज़री कहाँ नसीब है । यदि कोई भदेस विचार मन में कौंध भी गया तो यहाँ तक  आते  आते  और  उन सब को शब्दों में संतुलित करने के प्रयास में ही सब धड़ाम हो जाता है । इस पेज़ के थीम की इज़्ज़त तो जैसे तैसे बची हुयी है।

रुकावट के लिये खेद है..., मूसलचंद खरदूषनचंद की वारिस पंडिताइन यहाँ ताकझाँक कर हँसते हुये चली गयीं । जाते जाते एक बोली कस गयीं वह अलग से, "यह क्या अलाय बलाय लिख रहे हो ?  न कोई सिर पैर है, न कोई विषय ! अगर किसी की टिप्पणी आयेगी भी तो यही होगी कि आप जैसे चुगद को लिखने उखने की कोई तमीज़ भी है ? " उनका हँसना फिर शुरु हो गया । हँस लो भई, हँस लो.., आपकी इसी हँसी में तो मेरी ज़िन्दगी फँसी है ! गृहस्थी के समरांगन में रोज़ ही तो शहीद किया जाता हूँ, तमीज़ से कुछ होता भी है ?

अब कौन बताये कि मानव विकास की श्रृंखला तो अभी कंप्यूटर के कीबोर्ड पर ही आकर थमी हुयी है, ब्लागिंग जिंदाबाद, जय ब्लागर !

                                                            ब्लागर का भविष्य - अमर

बड़े अरमान से रखा है मैंने यहाँ कदम..होओओ... यहाँ कदम,  कि ब्लागर की दुनिया में नहीं कोई खसम...होओओ नहीं कोई खसम,  हौ !  ऎसी आज़ादी और कहाँ ?  देखो अब तक का इतना बेसिर पैर,  मैंने इतने लोगों से पढ़वा लिया कि नहीं ? चाहें, तो भी नहीं छोड़ सकते ।

माईस्पेस व ब्लागर के अंग्रेज़न आंटी की गिरफ़्त से निकलने के बाद  मुझे बड़ा अज़ीब अज़ीब सा लगा यहाँ ! एक तो गुलामी की आदत ऎसी होगयी है कि अपनी हिंदी माता का साफ़ सीधा संवाद यदा कदा भारी लगता है । खैर, जब पूरा देश 60 साल से इसी में जी रहा है, तो सोचता था अपुन अकेला चना क्या करेगा ?  दूसरे यहाँ आकर पाया कि मैं तो जैसे चने की बोरी ही में आ गया हूँ, चलो भाड़ फोड़ने की गुंज़ायश बन रही है,  सब अपने अपने से लग रहे हैं । सब एक दूसरे को अभिवादन कर रहे हैं, ' लगे रहो..जमाये रहिये..क्या बात है! ' यानि कि यहाँ मेट्रोपोलिटन बू आने में अभी क़ाफ़ी समय लगेगा, तब तक तो हम भी जमा ले जायेंगे । अभी तो किसीके बिना कहे हुये भी लगे हुये हैं । हिंदी का अनौपचारिक मिज़ाज़ रास आने लगा । यह बाद में बताऊँगा कि आख़िर मैं यह सब लिख क्यों रहा हूँ ? लगे रहिये

मेरी तो शुरुआत ही चौधरी के पन्ने को पकड़ कर हुई । वह मेरा मेरा कहते रहे और मैं फूँद फाँद कर हलचल पर टँग गया । हलचल जी का  लिंक पकड़  नित्य रात्रि में उड़न खटोले पर उड़ने लगा । लेकिन उड़न तश्तरी के आगे भला खटोले की क्या औकात ?   सो उनको देख धरातल पर आगया । तेरे बस का नहीं है, बंधु ! यह बिरादरी ही दूसरे  किसिम के ज़ीनियसों की है । तू कड़के की तरह ज़ेब में हाथ डाल कर घूम । पहले मंडी का ज़ायज़ा ले , फिर लैस होकर आना । इसी फ़ुरसत में  फ़ुरसतिया दिखे जो धौंस से ज़बरिया लिख रहे हैं । इनका कोउ कुछ कर भी नहीं सकता, ब्रह्महत्या करके कुंभीपाक का वेटिंग टिकट कौन लेगा ?  लेकिन ज़बरिया लिखने का हौसला देख, सोचा, कि जूतों की परवाह मत कर, तमाशा घुस्स के देख । अलबत्ता  नभमार्ग छोड़ दे  बेटा, जलमार्ग पकड़ !  तो उल्टी गंगा बहाने में जुट गया । हिंदी कैसे लिखें ? चुप्पे से ज्ञानदत्त जी के  इंडिक ट्रांसलिटेरशन   विंडो में घुस घुस कर दो पोस्टें  लिख डालीं । लेखन में बहुत सारी चोरियाँ होतीं हैं, सो यही सही ! पर यह सब मैं लिख क्यों रहा हूँ ? 

शायद यहाँ पर अपने  होने को जस्टिफ़ाई  करने के लिये !                                                 

अब तो खुश हो लेयो !  कि राजा अउर नऊआ वाला किस्सा भी आजै सुनाय देई ?

कुछ शेष रहा जा रहा था
उल्टी गंगा पर पहली टिप्पणी उन्मुक्त जी की आयी, एक मीठी झाड़, कुछ आगे भी लिखो टाइप ! 
सारथी से बहुत प्रोत्साहन मिला । हिंदी चिट्ठाजगत के एक आदिपुरुष बंगबंधु का मिज़ाज़  आज
तक नहीं मिला सो नहीं मिला । ज्ञानदत्त जी की प्रेरणा एवं  बरहा के टिप्स भुलाये नहीं जा सकेंगे
इतना सब होने के बावज़ूद भी मेरे मन में यही चल रहा है कि...
मैं यह सब क्यों लिख रहा हूँ ?  Puppy dog eyes

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16 May 2008

जरा सामने तो आओ छलिये .. ..

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अब इन्हें छलिया न कहूँ तो आप ही कोई नाम सुझायें । वैसे तो इनका परिचय  शाह हनुमानुद्दीन के रूप में दिया जा चुका है, पर ये मौके पर हाथ से फिसल जाते हैं नतीज़न इनके इंटरव्यू की तारीख़ दिवानी के मुकदमें की तरह आगे बढ़ती जाती है । ज़ालिम, तुम क्या ब्लागिंग से मेरे उखड़ जाने बाद ही आओगे ? इस माथमंथन की नौबत ही न आती, ग़र मैं इनकी ज़ुस्तज़ू छोड़ किसी हिट होते आदमी को आईना दिखा देता ।smile_embaressed

कल रात की ही बात है, मेरे मित्र मुन्ने उर्फ़ अज़हर खान का एकाएक फोन आया, " अरे यार डाक्टर, अब तुम जम्पिंग ब्लागिंग पर उतर आये हो, आख़िर कौन ज़ल्दी पड़ी है, तुम्हें ? "मैं अचकचा गया, " अमें क्या हो गया मियाँ, और यह जम्पिंग ब्लागिंग क्या बला है ? इसको किस डिक्शनरी से खोद लाये हो, बताओगे ? " वह प्रतिवाद पर उतर आये, "बेट्टा मैं तुमको रेगुलरली वाच कर रहा हूँ, तुम कुछ ज़्यादा ही कूद-फाँद रहे हो ? अरे यार कोई काम का सलीका भी होता होगा कि जब मर्ज़ी जो पकड़ में आ गया, उसीको लेकर ठेल दिया यहाँ ! अब मैं कमेन्ट नहीं कर पाता हूँ तो क्या? " ( मेरा स्वगत कथन - छोड़ो, यह सौजन्य तो अधिकांश ब्लागर बंधु में भी नहीं है, तुम तो महज़ पाठक हो ) मैं-" अब बोलोगे भी मियाँ, क्यों उखड़ रहे हो ? " उनकी आलोचना में मुझे रस आ रहा था, वह भाँप गये । स्वर मद्धिम हुआ, " ट्रैक न छोड़ा करो, एक अच्छी खासी चल रही थीम का कबाड़ा हो जाता है ।"  मसलन ?  मैंने दागा । "अमें मसलन वसलन क्या ? एक दिलचस्प किरदार हनुमानुद्दीन को तुमने अलग टाँग के रख दिया । अब किस भकुये की दिलचस्पी रह गयी होगी कि इन ज़नाब का हश्र क्या हुआ ?"  ( स्वगत- यह किरदार नहीं, बल्कि हक़ीक़त हैं और हस्बे मामूल राँची में कहीं रिक्शा चला रहे होंगे, इनके हश्र को रोने वाला ही कौन है ? ) उधर भाईज़ान चढ़े ही जा रहे  थे, " हिट होने की उतावलनेपन में, आजकल जो भी सामने दिखता है, तुम उसी को पकड़ कर पिल पड़ते हो । ट्रैक न छोड़ो डाक्टर, किसको फ़ुरसत है कि रोज़ रोज़ तुम्हारी एक नयी लंतरानी पढ़े ?smile_nerd

बात में कुछ दम तो है, सब एक दूसरे की पढ़ने में मगन हैं, फ़ुरसत तो शायद  फ़ुरसतिया का पेटेन्ट हुआ चाहता है । ख़ान ठीक कह रहा है, इसको मैं दख़लअंदाज़ी नहीं कहूँगा । मैंने उनको डिसमिस किया, " चलो यार , आज ही निपटाये देते हैं इनको, अब तो ख़ुश ?" और फोन रख के साँस ली Smiley Kiss

पलटा तो देखा कि सामने मेरी ज़िन्दगी का एक शाश्वत दख़लअंदाज़ मौज़ूद है ! पैचान कउन ?  बट नेचुरल पंडिताइन ही हैं, यह इम्यूनिटी उनको ही हासिल है । वह शायद हमारी बातचीत सुन चुकी थीं, सो डिफ़र कर रही थीं । डिफ़र बोले तो डिफ़ेरेंस आफ ओपिनियन ! भले ही एक दो सूत बाँयें दाँयें किसी भी रिलेवेंस को ख़िसका दें, पर डिफ़र करना..असहमत होना, हर ज़ुमला मेरे ख़्याल से के सम्पुट से बोलना इन चोखेरबालियों का जैसे जन्मसिद्ध है ! और यही हुआ, " जब टाइम नहीं है, तो इतना क्यों फैलते जारहे हो ? अचपन पचपन का क्या होगा ? कुछतो उस पर डालो, आज । तुम्हीं बता रहे थे कि अभी टेस्ट पोस्ट है, फिर भी 6 विज़िटर आ चुके हैं, अब तक । न हो तो किसी 8-9 साल पुरानी मैगज़ीन से ही कुछ उठा कर पचपन में डाल दो,ऎसे अच्छा नहीं लग रहा । अब इन दाल-रोटी-चावल ब्राँड को इस हवाई दुनिया के दाँव-पेंच क्या बताऊँ कि यह विज़िटर कोई मेरे पंख नहीं, बल्कि टोही-टटोलू हैं । हमारी इंटरनेट की दुनिया में, बहुतेरे ऎसे धूर्त भी हैं, जिनका काम केवल यहाँ वहाँ टटोलना ही हुआ करता है। Chatterbox

तिरिया से हार मानने का सुख व फ़ायदे कुछ अलग ही हैं, सालिड टर्म डिपाज़िट माफ़िक़ । एक दो बार टेन-लव पर गेम छोड़ दो फिर बाकी उम्र चैन से वाकओवर लेते रहो । चलो आज फिर इन्हीं की मान लो, पचपन के बचपन में ही झाँक लो । ख़ान का क्या बिगड़ जायेगा, भाड़ में जाये ।Praying

वैसे मेरा बहुत मन कर रहा है कि आज रात सुश्री मायावटि को लपेटा जाये । समेट लो अमर बाबू आज इन्हीं को, इनको तुम ही समेट पाओगे । ( यदि दूसरे बंधु भी कतार में हैं, तो अपनी दावेदारी पेश करने के लिये  यहाँ चटका लगायें  ) आजकल सुश्री बहुत चहक चहक कर बहक सी  रहीं हैंBatting Eyelashes

सुना करता हूँ कि कोई मोहतरमा क्लियोपेट्रा हुआ करती थीं, जो गधी के दूध से नहाती थीं, उड़ती उड़ती चर्चा उनके सौंदर्य की भी मेरी जानकारी में आयी है । झूठ नहीं बोलूँगा, मैंने तो उन्हें देखा नहीं । जो देखा नहीं तो मान कैसे लूँ, मैं तो आब्ज़ेक्टिव सांइस का छात्र हूँ । जो देखता हूँ, वही मानूँगा । वैसे देख तो माया जी को भी रहा हूँ, सत्तासुख का निखार चेहरे से फ़ोकसिया सर्चलैट मार रहा है । तबियत खुसकैट हो जाती है, चंदा को देख कर । ऎसा नूर बरकरार रहे, बड़े भाग्य से मिलता है । किसी ज़माने में फोटो स्टुडियो वाले पैसा लेकर भी फोटो खींचने में बत्तीस कोने का मुँह बनाते थे ( अपुष्ट सूत्रों से ) वहीं अब कुमारी श्री के फोटो लेने के लिये बड्डे  बड्डे फोटूबाज़ों में  भी धक्कमधुक्का हुआ करती है । कौन कहता है कि ज़माना नहीं बदला ?  या हमारी नज़रों का ही कसूर हो, कहा नहीं जा सकता ! ऎसे में भला हूर भी कोई चीज़ है ?   लगता है मैं  ही बहक गया । I dont know

लेकिन शायद नहीं, अब देखिये इन्होंने हाथी को पसंद किया । तो अब सभी हाथी देख देख ललचाये जा रहे हैं, तृषित दृष्टि से निहार रहे हैं । इशारा मिलते ही हाथी के पाँव के नीचे भी आने को सन्नद्ध !  कुछेक तो नाँवा लेकर टहल रहे हैं, पता नहीं कब सुश्री का मन बदल जाये । ( बाई द वे, यह हाथी भी तो किसी वर्ण में आता ही होगा, कोई सज्जन जानकारी देंगे ? वाईकेपेडिया में तो नहीं है, नाहर साहब ध्यान दें । खैर, वर्ण वगैरह की बात छोड़िये, अलबत्ता पिछड़ा तो नहीं लगता । देखो, कैसे मदांध डोल रहा है । अभी अभी सूचना मिली है कि हाथी क्रीमी लेयर में रखा गया है, मोटे क्रीमी लेयर में ! महावत गुज़र गया तो क्या, हाथी  भी गया गुज़रा नहीं है । ) माफ़ करियेगा, कुछ ज़्यादा विभोर हो रहा हूँ, बात ही ऎसी है ।

सुश्री जी ने अभी हाल में बीते कल परसों नरसों में अपनी सरकार के जन्मदिन पर करोड़ो लुटा डाले । उसी दिन से सुश्री ने इस पोस्ट की सुरसुरी पैदा कर दी । तीन दिन तक तो पंडिताइन ने दबोच कर रखा, " रानी हैं भाई, वह कुछ भी करें ।" घणी खम्मा अन्नदाता, मैं लम्बी साँस लेकर रह गया । पूरे जोर शोर से समारोह मना, पूछा क्या है भाई ?  फल का ठेला वाला सेब सजाते हुये बगल मुँह करके पिच्च से थूक कर बोला," कुच्छौ नहिं, गौरमिंन्टिया हिट्ट होय गई, वही चिल्लाहट मचाये हैं । बाबूजी सेब तौल दें ?" इतना पूछने के एवज़ में 80 रुपिये किलो का सेब, आरे नाहीं ! ज़शन अपने टशन पर है, बन्देमातरम कहना होगा वाले अंछल-कंछल बिरझ गये वरना उस दिन प्रदेश में सबकुछ मुफ़्त में मुहैया किया जाना था ।Chow time!

ज़िन्दे रह कुड़ी, लक्ख लक्ख पद्धाईयाँ । तेरी और तेरे चमचों की उमर हज़ार बरस होवे । हर वर्ष यदि 85-90 करोड़ रूपिये लुटाती रहीं तो हज़ार छोड़, दहाई बरस में ही शहद की नदियाँ बहेंगी और हर खरा खोटा शुद्ध दूध से कुल्ला करते पाया जायेगा । ठीक कैंदा तुस्सी, ज़िन्दे रह पुत्तर !Birthday Cake

मेरे अंदर बैठे सतत आलोचना ने कुलबुला कर आगाह किया, ' फिर बहक रहे हो, डाक्टर । आख़िर उसने लुटाये तो, तुम्हीं पर ही तो लुटाये । तुम थाली में छेद करने वाली बातें बंद करो । ' मैं अपनी आत्मा कुचल कर बैठ गया । लेकिन कितने देर तक कुचल कर रखोगे ?  ज़्यादा कुचलोगे तो हम भी अपनी सरकार बना कर बैठ जायेंगे । मियाँ की जूती और दुनिया का सिर ! पैसा हमारा और ख़ज़ाना खोल दिया आपने, जन्मदिन के नाम पर, कैसे ? भाई, बड़े बड़े अख़बार तो यही कह रहे हैं कि ख़ज़ाना लुटाया । हमीं पर लुटाया और हमारा ही लुटाया, तो ढिंढ़ोरचियों को क्या तक़लीफ़ ?Tongue

मन रे तू काहे न धीर धरे ?  फिर अंदर से एक चिकोटी आयी, खुल के बोलता क्यों नहीं, कि क्या राजकीय कोष किसी ख़ास दिन ही खोले जाने का प्राविधान है ?  हाँ बहना, ज़वाब दो कि चाहे जितनी भी कल्याणकारी योजना हो, किस प्रोटोकाल से एक विशिष्ट मंच से जतलायी गयीं ? पइसा हमारा और राजनीति तुम्हारी, अंगीठी पब्लिकिया की, और  रोटी तुम सेंको ! और घोषणा करने का सबब ? अच्छा काम चुपचाप भी किया जा सकता है ।Thinking

जनता ? उसकी छोड़ो, यहाँ तो मनचले लौंडे भी बूँदी चाटते हुये  गाते जा रहे हैं, " कसमें वादे, आसुवासन सब घोषणा हैं, घोषणा का क्या.... कोई किसी का नहीं राजाआआअनीति में...सब घोषणा है.. घोषणा से चौंधियाना क्याऽ ..ऽ बड़े शरारती हैं यह लड़के ? हँसी ठठ्ठा में भी सच बोल रहें हैं। मेरा मन हो रहा है, पीछे से पुकार कर कहूँ, " अरे लड़कों, यह चौंध नहीं, औंध है । तुम्हरे बप्पा चिरकाल से औंधे पड़े थे, तो औंधे पड़े रहें ! तुम भी जब पहाड़ के नीचे आओगे तो औंधे हो जाओगे । जो कर रहे हो, मन लगा कर करो, बूँदी मिली है..तो बूँदी खाओ ! इन योजनाओं के ब्लूप्रिंट बनने में ही कितना इधर से उधर हो जायेगा, ख़बरदार सूँघने की कोशिश भी न करना । बूँदी मिली है.. .. बूँदी खाओ Dancing

इस बार अंतर्मन चिल्ला पड़ा, " अमें हद्द कर दिया, बहकने की भी कोई लिमिट होती है, नहीं लिखते तो लिखते ही नहीं ! लिखने लगते हो तो बेलगाम हो जाते हो । क्या सफ़ाई दोगे पाठकों को, तुम्हारा हनुमानुद्दीन आज फिर कहाँ रह गया ? हरिभजन छोड़ के डेढ़ घंटे से कपास ओट रहे हो, यूज़लेसली ! " चिल्ला लो भाई, मैंने तो ईमानदारी से जो मन में आया सो लिख दिया । ब्लगियाना इसी को तो कहते हैं, फिर चिल्लाये क्यों ?Lighting

रहा सवाल हनुमानुद्दीन का ?  तो चिल्लाओ उल्लाओ मत भाई, उसको तो रह ही जाना था । बड़े लोगों के बीच, इस आम आदमी को घुसेड़ोगे तो मुँह की खाओगे । आगे कोशिश भी न करना । हनुमानुद्दीन क्यों नहीं मिलेगा ? सामने ज़रूर आयेगा एक दिन ! पोलिंग वाले दिन लोग उसको पकड़ कर बाहर निकाल ही लेंगे , लगे हाथ तुम भी अपना इंटरव्यू ले लेना । उन दिनों उसकी टी०आर०पी० भी हाई रहती है, लोग पैसे देकर तुम्हारा ब्लाग पढ़ेंगे । माफ़ करना अज़हर भाई, आज तो न ख़ुदा ही मिला न विसाले सनम , एक मौका और दो । नमस्कार ! Wave

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यह अपना हिन्दी ब्लागजगत, जहाँ थोड़ा बहुत आपसी विवाद चलता ही है, बुद्धिजीवियों का वैचारिक मतभेद !

शुक्र है कि, सैद्धान्तिक सहमति अविष्कृत हो जाते हैं, और यह ज़्यादा नहीं टिकता, छोड़िये यह सब, आगे बढ़ते रहिये !

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