अभी टैम नहीं है, शिव भाई ! अभी अभी मेलबाक्स खोला, देखा शिव भाई का मेल ! आनन्दम, भाई की नयी पोस्ट होगी, मेल से सब्सक्राइब कर रखा है । हौले से नज़ाकत से खोला, हाय रब्बा.. यहाँ तो शिवभाई बड़े उखड़े मूड में किन्तु तनिक लिहाज़ से कहाँ का गुबार यहाँ निकाल रहे हैं । आद्योपांत बाँच गया, फिर धैर्य की चटनी से चाट चाट कर पढ़ा । वाह आपका यह अंदाज पसंद आया, भ्राता !
देखिये न, नकवा लक्ष्मण ने काटी, भुगत बेचरऊ राम गये, सीता हरवा बैठे, रीछ बानरों तक से समर्थन लेने को विवश हुये । सो, ईहाँ भि.. लीखे अमर कुमार अउर भीड़े सिव कुमार !
पर इस घोर कलयुग में यह भातृप्रेम... आनन्दम आनन्दम !
इसका उत्तर तो दूँगा, बरोबर दूँगा... पर जानते हैं न शिव भाई, कि हर आम ओ खास ब्लागर की तरह मेरे पास भी टईमिया का टोटा रहता है । सो अभी तो टैम नहीं है, शिव भाई ... का करियेगा, सब्र करिये । सब्र पर तो हिन्दुस्तान कायम है सो संप्रति आप भी कायम रहें ।
अब देखिये न, कितना बड़ा बड़ा मुद्दा सब बुला रहा है, ओबामा जीतेगा कि हारेगा...जीतेगा तो का होगा, वइसे त जितबे करेगा, हनुमान जी उसके ज़ेब में पड़ा कम्पेन में घूम रहा है, कोनो बीभिषन खोज के ले ही आवेगा । लेकिन ओबामा के नाम के अगल बगल में हम भी खड़ा हो जायेंगे तो कोनो SEO हमको खोजिये लेगा । आज पंडिताइन कूड़ी का आधा पसेरी आलू लायी हैं, जरा देखें कि पछला साल 8 रूपिये मे पसेरी भर आलू बिका गया, सो किस फ़ैक्टर से ? ई फ़ैक्टरवा पकड़ा जाय त जानिये अर्थ के अनर्थशास्त्र पर ब्लागर की नोबल प्राइज़ पक्का !
ऎतना मुद्दा सब हमको घेर के हो-हल्ला मचाये है के पहले घर का देखें के बाहर का ईहे में कन्फ़्यूजिया के गलत शलत हो जाता है । ई टिप्पणिवाला सब भी शलत पकड़ लेता है, अउर गलत बतईबे नहीं करता है ।
आजै चिट्ठाचर्चावाला एक्ठो लड़का बताइस कि..
ज्ञान दत्त पाण्डेय जी ने फिर नया शिगूफा छोडा ।
हिन्दी ब्लॉगिंग की कथा-व्यथा को टॉल्स्टॉय से जोडा
अब बताइये कि हमको एक्को आदमी नहीं बताया के टाल्स्टाय इतिहास का चीज हैं, और सर इससे आपको एलर्जी है, दूर रहिये... या 2008 में उनको समझने के लीये हमको 1828-1921 के टाइमकैप्सूल में बइठ के उस देशकाल परिवेश का दौरा करना चाहिये । उनके कहे का संदर्भ पर एक जाँचकमेटी बैठाने का दायित्व निभाना चाहिये । सो हमहूँ ई टालस्टयवा पर लपके लेकिन रस्तवे में ठंडाय गये ! अब मनन करके टाइम खोटी करने वाले ब्लागर तो हम हैं नहीं, टईमिया का केतना टोटा रहता है, अब आपसे ज़ादा कौन जानता होगा ? टाइम बड़ा है कि मुद्दा, कमेन्ट बड़ा है कि कमिटमेन्ट ? ई तो मुर्गी और अंडा वाला रिलेशन है, सो मनन करना छोड़ दिया !
ई घर- बाहर के जिकिर में हमको याद आया के ठाकरे आजकल बहुत ठक ठक मचाये है, पहिले उसी को ठोकि के आते हैं । ससुरा मुंबई से यूपी-बिहार लूटने वाला गाना सब भेज देता है, हम लोग दिल खोलके घर का एक एक चवन्नी न्यौछावर कर देते हैं, अउर हमरे ईश्टुडेन्ट सबको मारता है शालाबेटा ! लौट के आते हैं, अभी टैम नहीं है, शिव भाई !
एक्ठो फोटो उसके बाउंडरिया पर साट कर चले आयें हैं, समझना होगा तो समझिये जायेगा । ऎतना पढ़ालिखा आदमी जब ज़ाहिल होने का स्वांग करके सपोर्टर बटोर लेता है, तो उसको समझाने बुझाने में कोनो फायदा नहीं, फोटू साट दिया है, हमारा काम खत्तम । त आपके टिप्पणी पर आया जाय ? अभी टैम तो नहीं है, शिव भाई.. लेकिन गलतफ़ेमीलि दूर होना न चाहिये, ऊ काहे रहे ईहाँ.. देखिए न हम अपना टिप्पणी बक्सवे का स्टींग कर दिये हैं । सबूतवा त जनता को साबूत चाहिये न, किसके पास टैम है ? कुछ लोग परहेजी बक्सा ही देखते हैं !
अक्षरवा साफ कर देते हैं, सबके पास बड़का वाला इन्टरनेट ब्राडबैन्ड त नहीं न होगा । ईहाँ पढ़ लेगा तबहिं न ?
आत्ममुग्धता किसी भी शक्ल में दिखाई दे सकती है. कोई पाई चार्ट, काई चार्ट वगैरह बनाकर फीड अग्रीगेटर और ब्लॉग ट्रैफिक के ऊपर पोस्ट लिखता है तब भी और कोई इस बात का ढिढोरा पीटता है कि तीस साल पहले उसने बिना दहेज़ लिए शादी कर के एक कीर्तिमान बनाया था तब भी. कोई अगर अपना तथाकथित आत्मचिंतन ठेलता है तो भी और कोई अपनी तथाकथित सधुक्कड़ी भाषा में किसी वृद्ध महिला की चुचकी छाती के बारे में लिखता है तब भी. कोई अगर रोज-रोज सुबह पोस्ट ठेलता है तब भी और कोई अगर पिछली पाँच पोस्ट में से पाँचों में किसी के पीछे पड़ते हुए केवल उसे चिढ़ाने के लिए पोस्ट लिखता है, तब भी. कोई अगर किसी के लेख पर बिना कोई प्रतिक्रिया दिए हुए निकल लेता है, तब भी और कोई अगर किसी को प्रोवोक करने के लिए ही ब्लागिंग करता है, तब भी. इसलिए मेरा यही सुझाव है कि दूसरों की आत्ममुग्धता के बारे में सवाल उठाने से पहले अपनी आत्ममुग्धता को भी निहार लेना चाहिए. मेरी ब्लागिंग मेरी आत्ममुग्धता का परिणाम हो सकती है. मैं इस बात को बीच-बीच में स्वीकार भी करता हूँ. लेकिन आपकी ब्लागिंग ? मैं अगर आत्ममुग्ध हूँ तो इसमें आपको कौन सा नुकशान पहुँचा रहा हूँ साहब ? मेरी आत्ममुग्धता से आपको कोई नुकशान हो, तो आप ज़रूर बताईये. हम आपसे क्षमा मांग लेंगे. |
ऎसे करार ना आया तो, फिर पलट के आये, ई बताने कि.. अब ई कौन बताने का बात है, भला ? सोचियेगा तनि..
और हाँ, इस टिप्पणी पर मुझे कोई खेद नहीं है
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खेदवा होता त हमको जनाने आते ? ईहै बात है न, शिव भाई, कि आपको कोनो खेद नहीं है, त बतियै खतम है !
हम तो आजके पोस्ट को छ्त्तीसगढ़ी भाषा के गेट अप में लाने वाले थे, बड़ी मिठास है ! रसगुल्ला हिन्दी के साथ साथ गुड़ की ज़लेबी का अपना अलग ही मज़ा है । फिर सुबुद्धि आ गयी, सहसा भान हुआ, ’हे विधाता यह क्या लिखवा रहे हो ? अगर इस पोटली में ३६ की झलक मात्र भी दिख गयी, तो सुदामा भेज दिये जायेंगे तेल लेने और तुमको पड़ जायेंगे लेने के देने ! सो जल्दी जल्दी अदला बदली किया, कुछ यहाँ गिरा कुछ वहाँ गिरा ! बच गयी यह खिचड़ी ? सो इसको झेल लें पाठकों, बड़े.. विद्वान.. आचार्य.. धुरंधराचार्य वगैरह सादा जीवन-उच्च विचार के अचार संग यही खिचड़ी पसंद करते हैं । यदि आप भी बेनाइन निरीह सज्जनों में हों तो यह खिचड़ी विचार पसंद करेंगे । शिव भाई, आप पढ़ रहे हैं न ? तो सीधा सीधा अंगेज़ी कुछ में सवाल ज़वाब हो जाये, शिव भाई ?
तो जरा F0F8FF वाले हिस्से पर गौर किया जाये ( हाँ, वही हल्का नीला वाला ! )
आत्ममुग्धता किसी भी शक्ल में दिखाई दे सकती है.यस सहमत हूँ मित्र !वह पाईचार्ट, काईचार्ट, दोहावली, कवितावली, चिट्ठी, डायरी किसी भी रूप में दिख सकती है ! यह तो माया है.. और माया महा ठगिनी हम जानि
उसने बिना दहेज़ लिए शादी कर के.. सत्य वचन, आप बारात नहीं गये थे किन्तु त्रिकालदर्शी दिव्यदृष्टि से सबकी ख़बर रखते हैं ! फ़ज़ीहत से मुँह छिपाने को कुछ तो होना चाहिये.. दहेज़ हमने लिया नहीं क्योंकि उसने दिया ही नहीं.. दरअसल पिताजी ने माँगा नहीं और मैं घोड़े पर बैठा गधा सरीखा मुँह पर रूमाल रखे शादी होने का क्लोरोफ़ार्म सूँघता रहा … सो समझिये फिसल के गिर गये, तो हर गंगा ! यही ईमानदारी का मूलमंत्र है, भाई !
तथाकथित सधुक्कड़ी भाषा में… यह भाषा की बात तो कीजो मति, शिव भाई ! अपनी मौज़ है, जो माहौल होगा वही लिखेंगे, बोलेंगे ! इतनी फ़ारसी पढ़ी होती, तो क्या ब्लागिंग में टाइमखोटीकार के अस्थाई पद पर पोस्ट लिखते होते ? सो, मैं पोस्ट लिखता हूँ जी, गढ़ता तो कभी नहीं । पारिश्रमिक का चेक दिखाओ तो पोस्ट भी गढ़ूँगा, भाई. यह तो हुई भाषा, सधुक्कड़ी के विशेषण पर तो यह कहूँगा कि अपना मेल बक्सा टटोलें, मेरा प्रथम मेल देखें, जिसमें मैंने अपने जीवन की एकमात्र अपूर्ण इच्छा व्यक्त की है, अब बाकी के वर्ष आदिवासियों के मध्य रहने का. अब मेरे इतने दिनों के रंग-ढंग देख कर भी आप मुझे आदिवासियों से भी कम करके आँकतें हों, तो मेरा दोष ?
वृद्ध महिला की चुचकी छाती.. जो देखा वही तो लिखा, और क्या लिखता.. सूखे स्तन, सपाट छाती, तो झूलना किसका दिख रहा था ? बदहवासी के आलम में, कपड़ों की ओर से बेसुध स्त्री का क्या दिख सकता है ? आयु चाहे जो हो पुरुष की नज़र पहले वहीं जाती है, बंधु ! इसका दूसरा पहलू भी उकेरूँ ? मैं अपनी बेटी को देखता हूँ, तो आँखों से उसका इतिहास दिखाई देता है, वात्सल्य उमड़ता है.. इसके उलट कोई अन्य पुरुष देखता है, तो वह उसका भूगोल पढ़ता है और उसकी आँखें चुस्की भरती हुई सी लगती हैं । अश्लीलता कहाँ है, नज़रों में, लड़की में या मन में? मुकेश जी ‘ये न समझो तो है,तेरी नज़रों का कुसूर..’गा बजा के सटक गये, और मैं हकला रहा हूँ, क्यों ?
पाँचों में किसी के पीछे पड़ते हुए केवल उसे चिढ़ाने के लिए.. हाँ, यह मैं स्वीकार करता हूँ, कि ऎसा मुझसे हुआ होगा ! किसी को भी चेताने के लिये वन, टू. थ्री बोलने के बाद फ़ोर.. फ़ाइव नहीं बोलना चाहिये था, यदि वह आपके इशारे की अनदेखी कर रहा हो तो ! आपका धन्यवाद, वरना मैं तो सिक्स,सेवेन,एट,नाइन, टेन तक जाता
लेकिन आपकी ब्लागिंग ? मेरी ब्लागिंग पर यह ज़ायज़ प्रश्नचिन्ह है ! जरा सोचिये, मैंने दिया ही क्या है.. भाई लोग वाह वाह कविता लिखते हैं, कुछेक हाय हाय कहानियाँ लिख रहे हैं, किसी किनारे पर झाँय झाँय बहस चल रही है, इस आँय बाँय शाँय में भटकते हुये ब्लागिंग को हेरता हूँ, फिर डुबकी मार जाता हूँ ! पुकार मचती है, नियमित लिखिये.. यह तो बताओ भाई, कि नियमित लिखूँ तो, पर लिखूँ क्या ? उत्तर मिलता है, ‘कुछ भी !’ सो एकदम स्पान्टेनियस तौर पर मैं कुछ भी लिख देता हूँ, पर गैरजिम्मेदाराना तरीके से कभी नहीं ! यह जरा विचित्र लगेगा, शिव भाई… आपको ही नहीं, लगभग सभी को, कि अपने लिखे हुये पोस्ट के शीर्षक तो दूर, मैं सहसा यह भी नहीं बता सकता कि मैंने अब तक हिन्दी में कितनी पोस्ट लिखी हैं ! चार ब्लाग तो डिलीट कर चुका हूँ, जिसमें एक थी उल्टी गंगा, जोकि लगभग बह निकली थी । खुद से ही खुद को सहलाने में, कौन सी मौज़ है, जी ?
आपको कौन सा नुकशान पहुँचा रहा हूँ साहब ? कोई भी नुकसान नहीं कर रहे हैं आप, मेरा या किसी का ! आपकी बकरी है, आप झटका कर दें.. हलाल करें.. कसाई को बेच दें ! है तो आपकी ही.. सो वह दूसरों के वाह वाह की पत्ती पर … खैर, जाने दीजिये । लब्बोलुआब यह है, कि जहाँ लगाव होता है, वहीं आदमी दखल देता है !
आपने उस तथाकथित पोस्ट की अंतिम लाइनें शायद नहीं पढ़ी, या सुविधापूर्वक भूल गये । जहाँ यह स्पष्ट किया है
| यह पोस्ट लिखने का मंतव्य ? अपने गुरुवर के प्रति आशंकित मन ! यह उनका दग्ध भाव मुझे नहीं रास आ रहा है, टिप्पणीयों की प्रचुरता पौष्टिकता कितनी होती है, यह वह जानते हैं । विषयवस्तु में वह क्या पकड़ें, क्या छोड़ें, उनकी सोच है |
क्षमा करना मित्रों, खाया पिया कुछ नहीं.. गिलास टूटने का हर्ज़ाना दिया छैः आने ! बात की बेबात में यह पोस्ट हो गयी 6521 शब्दों की ! चलो लोग जब फ़ुरसतिया को सराहेंगे, तो जिक्र मेरी निट्ठल्लई का भी होगा ही ! अपना गंगू तेली भी तो ऎसे ही अमर हो गया । आज तो मुझे भी जैसे एक झपकी सी आ गयी, पर वहाँ भी चैन नहीं !


अब आपही बताओ, यह सब क्या है ? कल शायद किसी ब्लाग पर,ब्लागिंग से बेहतर विकल्प के रूप में बैंगन भाँटा वगैरह बेचने की बात हो रही थी, यह किंवा उसीका परिणाम है । ठीक से चैन की एक झपकी भी नसीब नहीं
अब कोई चाहे कुछ भी कहे, शिव भाई को माइनस करके पोस्टिया जाये भाड़ में,मैं तो चला सोने! सबको शुभ रात्रि