जो इन्सानों पर गुज़रती है ज़िन्दगी के इन्तिख़ाबों में / पढ़ पाने की कोशिश जो नहीं लिक्खा चँद किताबों में / दर्ज़ हुआ करें अल्फ़ाज़ इन पन्नों पर खौफ़नाक सही / इन शातिर फ़रेब के रवायतों का  बोलबाला सही / आओ, चले चलो जहाँ तक रोशनी मालूम होती है ! चलो, चले चलो जहाँ तक..

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19 January 2009

तुम पार नेट परमेश्वर तुम ही नेट पिता

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google-animated-holoween-logo 

ॐ जय गूगल हरे, स्वामी जय गूगल हरे
फ़्रस्ट (एटेड ) जनों के संकट, त्रस्त जनों के संकट
एक क्लिक में दूर करे
ॐ जय गूगल हरे…

जो ध्यावै सो पावै
दूर होवै शंका, स्वामी दूर होवै शंका
सब इन्फ़ो घर आवै, सब इन्फ़ो घर आवै
कष्ट मिटै मन का
ॐ जय गूगल हरे…

नेट पिता तुम मेरे
शरण गहूं किसकी, स्वामी शरण गहूं किसकी
तुम बिन और न दूजा, तेरे बिन और न दूजा
होप करूं किसकी
ॐ जय गूगल हरे…

तुम पूरन हो खोजक
तुम वेबसाइटयामी, स्वामी तुम वेबसाइटयामी
पार नेट परमेश्वर, पार नेट परमेश्वर
तुम सबके स्वामी
ॐ जय गूगल हरे…

तुम ब्लागर. के फ़ादर
तुम ही इक सर्चा, स्वामी तुम ही इक सर्चा
मैं मूरख हूं सर्चर, मैं मूरख हूं सर्चर
कृपा करो भरता
ॐ जय गूगल हरे…

तुम सर्वर के सर्वर
सबके डाटापति, स्वामी सबके डाटापति
किस विधि एन्टर मारूं, किस विधि एन्टर मारूं
तुममें मैं कुमति
ॐ जय गूगल हरे…

दीनबंधु दु:खहर्ता
खोजक तुम मेरे, स्वामी शोधक तुम मेरे
अपने फ़ण्डे दिखाओ, कुछ तो टिप्पणी दिलाओ
साइट खड़ा तेरे
ॐ जय गूगल हरे…

बोरियत तुम मिटाओ
टेंशन हरो देवा, स्वामी टेंशन हरो देवा
गूगल अकाउण्ट बनाया गूगल अकाउण्ट बनाया
पाया ब्लागिंग मेवा स्वामी पाया ब्लागिंग मेवा
जो नर ब्लागिंग धावैं करैं निजभाखा सेवा
ॐ जय गूगल हरे

go

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15 January 2009

चला बाघ मंत्री बनने !

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सुबह सुबह पंडिताइन ने झकझोर मारा, " एई उट्ठो.. एई उठो न, देखो बाघ लखनऊ तक आगया  !
अरे, मैं तो अपना ही किस्सा लेकर बैठ गया, एक आवश्यक औपचारिकता तो पहले पूरी कर लूँ  !

आपसब ब्लागर भाई व भौजाईयों को  समस्त उत्तरायण पर्वों की हार्दिक शुभकामनायें !
जिनको भौजाई कहलाने में आपत्ति हो, कृपया नोट करें.. वह मेरी पोस्ट भले न पढ़ें, पर, उनका एतराज़ किसी भी दशा में दर्ज़ नहीं किया जायेगा !

tiger एई उट्ठो.. एई उठो न, देखो बाघ लखनऊ तक आगया  ! “  क्या यार, धत्तेरे की जय हो !  तुम भी क्या बच्चों की तरह किलकारी मार रही हो ? बाघ-साँप मंगल-जुपिटर के अलावा तुम्हें कुछ और नहीं सूझता ?” दरअसल यह सब इनको बड़ा रोमांचित करता रहा है । सो, मैं गिड़गिड़ाया, “ बाघ अभी 80 किलोमीटर दूर है, अभी सोने दो.. बेकार शोर मत मचाओ !  बाघ है तो मैं क्या करूँ ? “  और,  मैं दुबारा से रज़ाई में कुनमुनाने लग पड़ा  !
प्रसंगवश बता दूँ, कि इन मैडम जी ने शादी करने के लिये तो मुझ गदहे को चुना, पर मोहतरमा की दिलचस्पी हमेशा से बाघ, शेर, हाथी, साँप, ग्रह.. नक्षत्र और भी न जाने क्या क्या में रहती है ? कुल ज़मा किस्सा यह कि आजकल मुझपर रोब गाँठने के सिवा मुझसे शायद ही इनका कोई नाता हो ? तिस पर भी दिसम्बर माह में मेरा कीबोर्ड आतंक और आतंकवादियों से ही जूझने में खरच होता रहा !  वह नाराज़ी अलग से है.. “ एई सुनो, अब आजकल तुम अपने, क्या कहते हैं कि पोस्ट में.. मेरा ज़िक्र तक नहीं करते हो ! अरी भागवान, तू नादान क्या जाने कि तेरा आतंक उन आतंकियों का पसंगा भी नहीं है !  जो भी हो,  तेरा आतंक तो मैं अकेले झेल ही रहा हूँ, डियर ! उधर सारा देश दाँव पर लगा है !
मैंने तो अब तक एक गुनाह तुमसे ब्याह करने का ही किया है और अब मैं उतना मासूम भी न रहा । पर.. पहले इन आतंकियों पर अपना गुस्सा निकाल लेने दे, जो मासूम, बीमार.. बेगुनाहों में फ़र्क़ करने की तमीज़ भी नहीं रखते.. पता नहीं, किन नामाकूल आकाओं ने इनको ट्रेनिंग देकर भेजा है ?  संसद वसंद पर एक बार और हो आते, एक दो खद्दर-कुर्ता टोपी-अचकन टपका भी देते तो,  देश न सही  मैं तो कृत्तज्ञ  होता ही  और, आप लोग भी अगर बाई-चाँस पकड़ में आ भी जाते, तो कसाब जैसा हाल तो न बनता, और  अफ़ज़लवा की तरह दोनों मुल्क की सरकारों को लटकाये रखते, वो अलग से ? tdots5tdots5tdots5tdots5
ईश्श्श, पोस्टिया तो लगता है, फिर आतंकियों की तरफ़ रेंग चली है ! पीछे मुड़.. कीबोर्ड चला.. सामने देख.. नज़र सामने रख, निगाह बाघ पर.. 80 किलोमीटर दूर है, तो क्या हुआ ?  तेरा कीबोर्ड अटलांटा ज़र्मनी तक का रेंज़ रखता है ! बाघ तो मात्र 80 कि.मी. पर  है !
पूरे दिसम्बर माह बड़ा शोर रहा.. दुधवा का एक बाघ नखलऊ की तरफ़ बढ़ रहा है ! जी हाँ, जगप्रसिद्ध लखनऊ अपने घर में नखलऊ ही कहलाता है ! हाँ तो, बाघ नखलऊ की तरफ़ बढ़ रहा है.. रोज सुबह पंडिताइन अख़बार आते ही, चट से उसकी लोकेशन देखतीं, और मुझे झकझोर देतीं । मैं खीझ जाता, " तो मैं क्या करूँ ? " उनका तुर्रम ज़वाब होता, " मैं क्या करूँ.. अरे भाई बाघ है, कोई मामूली चीज नहीं, कुछ लिखो. !." तुम्हें क्या बताऊँ ऎ अनारकली, कि बाघ की टी०आर०पी० इन दहशतगर्दों के सामने दुई कौड़ी की भी नहीं ! एक मौज़ आयी कि समीर भाई इंडिया पधारे हैं.. इनको ही एन-रूट दुधवा तैनात कर दूँ, यहाँ भी बाघ दुबक जाता । अब छोड़िये.. उनकी पावर तो बांधवगढ़ में ही शेष हो गयी.. बाकी जो बचा था वह शायद कमसन समधन ले गयी ! चुँनाचें, आज फिर बाघ महोदय हेडलाइनों में प्रकट होते भये हैं । यह साला दुधवा से सीधे लखनऊ को ही क्यों चल पड़ता है  ?  पर, सोना क्या था ?  इस प्रयास में, बाघ को लेकर मन में किसिम किसिम की धमाचौकड़ी  मचती रही.. वह निट्ठल्लई  भी बताऊँ क्या ?
अरे, बाघ  तो ज़ंगल का राजा है, भला लखनऊ आकर क्या कर लेगा ? भूखा है.. तो उसे वहीं आस पास के गाँवों में हाड़-मांस के पुतले मिल ही जाते ! पर, उन बेचारे पुतलों में सिर्फ़ हाड़ ही हाड़ बचा हो ?  सो,  किबला मांस की तलाश में राजधानी की तरफ़ चल पड़े  हैं ?  लेकिन, यहाँ के रसीले, गठीले, स्वस्थ, दमकते मांसल पुतले तो सरकारी ख़र्चे  के सुरक्षा-कवच से घिरे रहते हैं.. क्या बाघ महाशय  का  इंटेलीज़ेन्स-डिपार्ट भारतीय सुरक्षा-तंत्र से भी गया बीता है, जो उन तक इतनी मामूली सूचना भी न पहुँचायी होगी ? ज़रूर  मामला  कुछ और ही है.. झपकी आ गई.. सामने अभय की मुद्रा में साक्षात बाघ महाशय दिखते भये । नहीं, डर मत, तू मुझे ब्लागर पर कवरेज़ देता रह, मैं अपनी सरकार  में सूचना सलाहकार बना दूँगा ! आईला, बाघ ज्जिज्जी जी, क्षमा करें.. माननीय बाघ जी, सरकार बनायेंगे ? पर.. दिल की बात रही मेरे मन में, कुछ कह न सका कच्छे की सीलन में
lion3 सरकार, आप तो खुदै ज़ंगल के राजा हो, फिर ? माननीय बाघ जी दहाड़ते दहाड़ते एकदमै संभल गये, लहज़ा बदल कर बोले.. “ भई देख डाक्टर, वहाँ भी सभी मौज़ है, लेकिन यह ज़गमगाती बिज़ली बत्ती, ठंडक देने वाली ए,सी. वगैरह वगैरह कहाँ ? अगर हम्मैं ज़ंगल ही पर  राज करना है, तो  तेरे इस बेहतरीन ज़ंगलराज में करेंगे । भला बता तो,  तेरे नखलऊ से अच्छा ज़ंगलराज और कहाँ मिलेगा, रे ? तू वहाँ घूमने जाता है,हमारे लोग यहाँ घूमने आयेंगे !
पर, माननीय महामहिम दुधवा से सीधे.. हा हा हा, अरे मूर्ख दुधवा क्या उल्टा-प्रदेश से अलग है, क्या ? यहाँ अलीगढ़ के वकील, इटावा के मास्टर, मांडा के राजा, बिज़नौर की बहनजी आ सकती हैं, तो मैं क्यों नहीं ? कड़क्ड़कड़ मेरे दिमाग में जैसे हज़ार पावर की बत्ती जल उठी.. अब्भी अबी माननीय ने मांडा के राजा का नाम उचारा था, पकड़ लो  इनको । “ हुज़ूर, आप तो पैदायशी राजा हैं, सत्ता पर आपका  जन्मजात अधिकार होता है… नहीं मेरा मतबल है, आप तो  आलरेडी डिक्लेयर्ड राजा होते हैं, फिर यहाँ हम इंसानों के बीच…मतबल ? ज़ब्त करते हुये भी बाघ जी गुर्रा पड़े,  और अपनी तो..?
निकल पड़ी ? निकल पड़ी न, तुम्हारी गंदी ज़ुबान से चालबाजी की बातें ? बताओ तुम्हारे कने परिवारवाद.. वंशवाद नहीं है, क्या ? ज़ाल तू ज़लाल तू, आई बला को टाल तू.. सो तो है, सरकार ! फिर, मेरे को क्या समझाता है ?  मुझे तुम इंसानों की पोल पट्टी पता है !
पर, हज़ूर वहाँ...  आपके मतबल राजा के जूठन पर सैकड़ो गीदड़-सियार लोमड़ी पलते हैं । उसकी चिन्ता मत कर, यहाँ भी पहले से बहुत पल रहे हैं, हमारे भी उन्हीं में खप जायेंगे.. बोल आगे बोल ?  डर मत, तेरे बहाने  मेरा प्रेस-कांफ़्रेन्स का प्रैक्टिस हो रैया है ।
यार, इनको यहीं से दफ़ा करो, नहीं तो राजनीति के नाम पर तो, यह हमारे दाद बन जायेंगे ! सो, मैं मानवता की रक्षा के लिये सनद्ध होता भया.। यदा यदा हि लोकतंत्रस्य… पर, सरकार यहाँ तो लोकतांत्रिक बवाल चलता है.. भला आप ? अपने लिये सरकार सुनकर वह नरम पड़े । रहने दे, रहने दे.. वह मीठे स्वर में गुर्राये, " मुँह न खुलवा.. लेकिन सिर्फ़ तेरे को बताता हूँ, लोकतांत्रिक-वांत्रिक के लिये मेरे कने  बंदरों की बहुत बड़ी फ़ौज़ है, सभी बूथ कवर कर लेंगे ।"  तो, यह जनशक्ति की धौंस दे रहें हैं  ?
अब तक मेरी घिघ्घी बँध चुकी थी.. बंदरों की फ़ौज़ से घिरे होने की कल्पना मात्र से, आगे के सैकड़ों प्रश्न उड़न-छू हो चुके थे । ज़्यादा बोलना, अब ऎसे भी उचित न था, इनका महामहिम बनना तय था । क्या पता, यह सूचना सलाहकार के भावी पद से अभी से सस्पेन्ड करके कोई जाँच-वाँच बैठा दें ! पर, भईय्यू वह ठहरे ज़ंगल के राजा सो, फ़ौरन मेरा असमंजस भाँप गये, "लोकतंत्र-पोकतंत्र कि चिन्ता मत किया कर ! नखलऊ में सभी लोकतंत्र की दहाड़ मारते हुये आते हैं । फिर, कोई फ़कीर बन जाता है, कोई मुलायम हो जाता है, कोई माया बन जाती है । मैं बाघ बन कर आऊँगा.. तो आख़िर तक बाघ ही रहूँगा .. राज करने के लिये हाथी नहीं बन जाऊँगा, समझे कि नहीं ? मैं मिनमिनाया, " समझ गया सरकार, हमारी क्रांति का प्रभाव हमसे ज़्यादा ज़ानवरों पर है । लो, चलते चलाते महामहिम का मूड बिगड़ गया.. " फिर तुमने ज़ानवरों को इंसानों की बराबरी में रखा ? छिः, तौबा कर ! "
आभार: डा. अनुराग का, जिन्होंने मुझे यह पोस्ट लिखने को टँगे पर चढ़ा दिया था । आफ़कोर्स पंडिताइन का, जिन्होंने आतंकवाद पर अरण्य-रूदन पर झाड़ पिलायी..और सामने रखी घड़ी का, जिसमें तीन नहीं बजे हैं,एवं सोचताइच नहीं, लिखेला ठेलेला के टैग का Nerd
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13 January 2009

इतना विशाल देश.. क्या अकेले मेरे बस में ?

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हरतरफ़ चर्चा है, कि देश मुसीबत में हैं, आतंकी इसे रौंद रहे हैं, घोटाले इसे लील रहे हैं ! सत्यम भी आख़िरकार असत्यम साबित हो रहा है ।  अब, भला आप ही बताइये, मैं अकेला क्या कर सकता हूँ ?  कल जोड़ने बैठा तो .. देश की आबादी निकली : 100 करोड़
जिसमें 9 करोड़ तो सेवानिवृत हैं, जिनसे शायद ही कोई उम्मीद हो

ATT00001

e2285 नौकरीपेशा वर्ग में केन्द्रीय कर्मचारी ठहरे 17 करोड़ और राज्य कर्मचारी हैं 30 करोड़

इनमें शायद ही कोई काम करता हो ?

और.. हमारे यहाँ हैं 1 करोड़ आई० टी० प्रोफ़ेशनल !ATT00002 

इनमें अपने देश के लिये कौन काम करता है, जी ?

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18 करोड़ तो बेचारे अभी स्कूलों में ही हैं, इनसे क्या होना है ?

 happy_feet इन 8 करोड़ दुधमुँहों को, जो अभी 5 वर्ष भी पार नहीं कर पायें हैं..तो अलग ही रखिये !

यह 15 करोड़ बेरोज़ग़ार अपनी ही चिन्ता में हैं… ATT00005 देश के लिये…  बाद में देखा जायेगा !

ATT00006 और यह 1.2  करोड़ बीमार तो अस्पतालों में कभी  भी  देखे जा सकते हैं, आतंकवादी इन्हें भले न बख़्शें, पर यह बेचारे अभी कुछ करने लायक ही नहीं हैं , सो इनको तो आप फ़िलहाल बख़्श ही दो !

जरा जोड़िये तो... कितने हुये ?  98 करोड़.. ठीक !
अब...हमरी न मानों,तो दिनेशराय द्विवेदी जी से पूछो, funny-animated-gif-004                                                                                      पिछले माह तक 79,99,998  विचाराधीन या सज़ायाफ़्ता ज़ेलों में थे !

बचे केवल दो व्यक्ति.. यानि कि आप और हम !

आप तो इस समय मेरी पोस्ट पर टिप्पणी करने जा रहे हो, और... मैं ? mail (2)

मैं समझ नहीं पा रहा हूँ कि,  चल के आपकी पोस्ट पर टिप्पणी चुकता करूँ avatar247_0                

या देश की चिन्ता करूँ ? यही तो रोना है.. कि, इतना विशाल देश.. क्या अकेले मेरे बस में है ?

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12 January 2009

अथ क़ाफ़िर कथा

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शिवभाई की पोस्ट पर कल देखने को मिला कि, हड़ताली ब्लागरों में मैं भी शहीद हो गया हूँ ! नहीं भाई, मेरा हड़ताल उड़ताल नहीं चल रहा है..तेल वाले हड़ताल पर थे.. या हड़ताल वाले गये तेल लेने ! आप तो दिन तक गिन ले गये…  कि, 16 दिन से गायब हूँ । ‘ काना देखे जिऊ जराये.. काना बिना रहा न जायBatting Eyelashes.. ’ , मैं तो यहीं हूँ, भाई ! हाल में एनिमेटेड इमेज़ बनाने का व्यूह तोड़ा है, सो उसी के संग प्रयोग चल रहा है ! आख़िर कहीं तो टाइम खोटी करना है, न ?  पोस्ट तो दूर,  शुद्ध मन से की टिप्पणी पर ही,  न जाने कौन उखड़ जाये ?  सो, वह भी नाप-तौल कर ही होती है !  स्व. मेज़र उन्नीकृष्णन के एक बहुचर्चित मुद्दे पर मेरा अनुसंधान चल रहा है, पढ़ लेना ! अब इतनी ज़ल्दी नई पोस्ट कहाँ से टीपूँ ? लो एक पुरानी रिसाइकिल की हुई पोस्ट देखो, शायद ठीक लगे ? दरअसल आज कविता जी की चिट्ठाचर्चा पर भाषाओं के बहुआयामी प्रयोग ने मुझसे मलेच्छों की भाषा में टिप्पणी करवा दी ! लाहौल बिला कूवत.. तौबा तौबा जैसी प्रतिटिप्पणी अब तक तो नहीं आयी, पर कुछेक अहं-सहलाऊ प्रशंसकों ने लसंसे भेज कर अपनी जुगुप्सा ज़ाहिर की.. लिहाज़ा आज यही पोस्ट मौज़ूँ लग रही है ! क्यों लसंसे नहीं समझे ?  अरे हिन्दी वालों, अपुन राबचिक हिन्दी  तईय्यार कर रैले हैं  ! लसंसे बोले तो लघु संदेश सेवा यानि एस.एम.एस... अब तो खुश ?  लो पोस्ट बाँचों..
अथ क़ाफ़िर कथा
अपने एम०बी०बी०एस के दौरान हास्टल में मैंने पाया कि बाँग्लादेश की मुक्ति के बाद हमारे चंद मुस्लमीन भाईयों का मिज़ाज़ ही कुछ बदला हुआ है । ज़ल्द ब ज़ल्द नज़रें मिला कर बात तक न करते थे । बड़ी क़ोफ़्त होती थी, क्यों भाई ? समर्पण तो ज़नरल नियाज़ी ने किया है, पाकिस्तान की फ़ौज़ें हारी हैं । भला आपकी नज़रें नीची क्यों ?  मेरे मित्र व रूम पार्टनर अशोक चौहान मुझपर खीझा करते थे, " यार, तुम बलवा करवाओगे ", बेनाझाबर, चुन्नीगंज़ वगैरह ज़्यादा दूर भी नहीं था । फिर अचानक यह दिखने लगा कि उनमें से चंद शख़्शियत दाढ़ी रखने लगी, हैलेट की ड्यूटी से फ़ारिग हो, हास्टल आते ही ऎप्रन वगैरह फेंक फाँक अलीगढ़ी पोशाक पहन कर टहला करते थे, और सिर पर गोल टोपी ! एक-ब-एक कौमी निशानियाँ याद आने का सबब आप  बाद में  समझते रहें, फिर मुझे  भी बतलाइयेगा !  अभी तो मैं आगे बढ़ता हूँ …
मेरे मित्रों में इक़बाल अहमद जैसे भी थे, जो हर मंगलवार को मेरे संग एच०बी०टी०आई के पीछे वाले  नवाबगंज़ हनुमान मंदिर भी जाया करते थे । बाकायदा माथा टेकते थे, हँस कर कहते कि , यार अपने पुरखों ने जो ब्लंडर मिस्टेक किया उसकी माफ़ी माँग लेता हूँ । मेरे व्रत तोड़ते ही एक सिगरेट सुलगा मेरे संग शेयर करते थे, तब 60 पैसे डिब्बी वाली कैप्सटन अकेले अफ़ोर्ड कर पाना कठिन होता था । उसके आधे दाम में चारमीनार आया करती थी, हम लोगों के अध्ययन के घंटों की अनिवार्यता थी, वह तो ! एक एक कश के लिये छीन-झपट का मज़ा ही और है, यह लक्ज़री में शुमार नहीं की जा सकती ।
दूसरी तरफ़ इमरान मोईन जैसे शख़्स भी थे, जो इक़बाल अहमद सरीखों पर लानतें भेजा करते । इमरान मोईनुल यानि कि एक कृशकाय ढाँचें पर टँगा हुआ छिला अंडा, जिससे लटकती हुई एक अदद बिखरे हुये तिनकों सी कूँचीनुमा दाढ़ी , पंखे की हवा में दाँयें बाँयें डोला करती । बातें करते हुये वह बड़े नाज़ से उसे सहलाते रहते । एक दफ़ा किसी बात पर उनकी रज़ामंदी वास्ते मैंने लाड़ से उनकी दाढ़ी सहला दी । ऊई अल्लाह, यह तो लेने के देने पड़ गये । मियाँजी पाज़ामें से बाहर थे, गुस्से से थरथर काँपते हुये बोले, ' अमर , हमसे दोस्ती करो, हमारी दाढ़ी से नहीं । आइंदा यह हरकत की तो निहायत बुरा होगा ।'  एकाएक मैं कुछ समझा ही नहीं, बस इतना समझ में आ रहा था कि इनको पटक दूँ फिर पूछूँ , ' बोल, कहाँ  से निहायत और कहाँ  से बुरा कर लेगा ?  चल, दोनों अलग अलग करके बता कि क्या कर लेगा ? '  लेकिन जैसा कि शरीफ़ आदमी करते हैं, यह सब मैं मन ही मन बोल रहा था । उनसे तो ज़ाहिराना इतना ही पूछा, यार तेरी दाढ़ी की क़लफ़ क्रीज़ तक डिस्टर्ब नहीं हुई, फिर तू क्यों इतना डिस्टर्ब हो रहा है ? ज़नाब चश्मे नूर फिर बिदक गये, 'तुम साले क्या जानो , दाढ़ी का ताल्लुक़ हमारे  ईमान से है ! इस पर हाथ मत लगाया करो, समझे कि नहीं ? अब मुझे भी 100% असली वाला गुस्सा आ गया, " चलो घुस्सो ! अग़र दाढ़ी में ही तेरा ईमान है तो बैठ कर अपना xx सहलाते रहो । " और उनके इनसे-उनसे भविष्य में संभोग कर लेने की कस्में खाता हुआ , मैं वहाँ से पलट लिया । वह पीछे से चिल्ला रहे थे, " सालों तुम भी तो चुटइया रखते हो और अपने धरम को उसमें बाँधे बाँधे तुम्हारे पंडे घूमा करते हैं, जाकर उसको सहलाओ, फिर मेरी सहलाना । "  हमारे इक़बाल भाई , जो  स्वयं ही सफ़ाचट्ट महाराज थे, मेरे इस डायलाग के पब्लिसिटी मॆं जी जान से जुट गये और लगभग सफ़ल रहे । ख़ुदा उनको उम्रदराज़ करे… 
पोस्ट लंबी हो रही है, चलते चलते इसी संदर्भ की एक अन्य घटना का ज़िक्र करने की हाज़त हो रही है । तो, वह भी कर ही लेने दीजिये, कल हो ना हो ! दसेक वर्ष पहले शाम को मेरे क्लिनिक में एक सज्जन आये । लहीम-शहीम कद्दावर शख़्सियत के मालिक , वह बेचैनी से बाहर टहल रहे थे यह तो काँच के पार दिख रहा था, लेकिन बरबस मेरा ध्यान खींच रहे थे । उनसे ज़्यादा मैं उतावला होने लगा कि इनकी बारी ज़ल्द आये, देखूँ तो यह कौन है ? खैर, वह दाख़िल हुये, बड़े अदब से सलाम किया, फिर अपना तआर्रूफ़ दिया कि मुझे नक़वी साहब ने भेजा है और मुझे यह-वह तक़लीफ़ है । मेरे मुआइने के बाद, वह फिर मुख़ातिब हुये , " डाक्टर साहिब, दवाइयाँ कैसे लेनी हैं, यह निशान बना दीजियेगा । "  मैं हिंदी में ही अपने निर्देश लिखता हूँ, इसलिये थोड़े ग़ुमान से बोला अंग्रेज़ी-हिंदी जिसमें चाहें लिख दूँगा । वह फ़ौरन चौंक पड़े, प्रतिवाद में बोले कि उनको हिंदी अंग्रेज़ी नहीं आती लिहाज़ा निशान के ज़रिये ही समझ लेंगे । अब मैं चौंका, क्या चक्कर है ? अच्छा भला पढ़ा लिखा लगता है, सन्निपात के लक्षण भी नहीं दिखते फिर भी कहता है कि पढ़ना नहीं जानता ! अलबत्ता वह मेरे चेहरे को पढ़ ले गये । थोड़ी माफ़ी माँगने के अंदाज़ में बोले, "मैं दरअसल बिब्बो की शादी में कराची से आया हूँ, और सिंधी ( मुल्तानी-पश्तो लिपि का मिश्रण) व उर्दू के अलावा कुछ और नहीं पढ़ पाते । उनकी परेशानी समझ मैंने बड़ी सहज़ता से लिखना शुरु किया ....
 ايک ايک دن ٔم تين بار ک کپسول روذ رات  यानि एक एक दिन में तीन बार, एक कैप्सूल रोज़ रात
लो,जी ! वह फिर चौंके, थोड़े अविश्वास से कुछ पल मुझे देखते रहे । मेरे माथे पर एक छोटा सा लाल टीका, बगल में माँ दुर्गा कि मूर्ति...कुछ संकोच से पूछा, ' आप तो हिन्दू हैं ? ' हाँ भाई, बेशक ! बेचारे हकला पड़े, " तो..तो, फिर यह उर्दू आपके ख़ुशख़त में कैसे ? " अच्छा मौका है, चलो एक सिक्सर ठोक दिया जाये । मैंने कहा , ' मैं क्यों नहीं लिख सकता ? क्या उर्दू आपकी ही मिल्कियत है ? उर्दू भी तो आप इसी मुल्क़ से ले गये हैं ! '  एकदम से खड़बड़ा गये श्रीमान जी," नहीं नहीं हम लोगों को वहाँ कुछ और ही बताया जाता है । "  मैदान फ़ेवर कर रही है, सिक्सर ठोंक दो,  अमर कुमार ! अतः मैंने हँस कर कहा, ' यही न कि क़ाफ़ (    ک  )  से क़ाफ़िर ( کافر     ) , जिसमें धोती कुर्ता में एक आदमी दिखाया गया है, और हे ( ح   ) से हिंदू (    حندو   ) जिसमें एक सिर घुटे चुटियाधारी पंडितजी तिलक लगाये हुये अलिफ़ अव्वल की क़िताबों में बिसूर रहे हैं । ' एकदम से खिसिया गये, चंद मिनट पहले उनका फटता हुआ माथा जैसे फ़िस्स हो गया , " यह तो अब सारी दुनिया जानती है कि हमारे हुक़्मरानों ने पाकिस्तान को क्या दिया और दे रहे हैं । वापस जाने से पहले एक बार आपसे फिर मिलूँगा, अल्लाह हाफ़िज़ ! "  वह मिलने तो नहीं आये, लेकिन कुछ वर्षों तक ख़तों का आना जारी रहा जिसके ज़रिये उन्होंने इत्तिल्ला दी कि मेरा पर्चा उन्होंने फ़्रेम करवा कर अपने होटेल में लगवा रखा है और वह उनके लिये कितना बेशकीमती है । एक पल को हर आने वाला उसके सामने ठिठक कर एक नज़र देखता ज़रूर है । यह किस्सा मैंने कोई आत्मप्रशस्ति में नहीं लिखा है यह तो , केवल एक झलक  देता है कि लोचा कहाँ पर है !  क्या हम यह नहीं जानते कि भाषा का प्रयोग इंसानों को बाँटने का प्राचीनतम ज़रिया  है ?
अब जरा मेरा टाइमखोटी करने का परिणाम भी बताते जाइये
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08 January 2009

अपनी उनके संग सुरक्षित ड्राइविंग … …

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मोबाइल के उपयोग एवं ड्राइविंग के समय टेप से छेड़छाड़ ( डा. अनुराग Dont tell anyone) के बाद आपकी उनकी चटर चटर ही एक्सीडेन्ट का एक और मुख्य कारण है ! अपुन के उल्हासनगर के कारग़ुज़ारों ने अनोखा सीट-बेल्ट इज़ाद किया है, जी हाँ.. ख़ालिस Made in USA ! बगल में बैठी ख़ूबसूरत दुर्घटना से आपका कान औ’ ध्यान सुरक्षित ..  फिर अगली कोई अनहोनी तो अन + होनी ही समझिये !Wink पेटीकोट सरकार मान्यता प्राप्त है यह !

b82इसकी अग्रिम बुकिंग धड़ल्ले से चल रही है, संपर्क करें – अभिषेक ओझा,  अथवा श्री ताऊ रामपुरिया इंदौर वाले

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05 January 2009

भाई साहब, हैप्पी नियू ईयर टू यू !

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पुरानी पोस्ट है, तो क्या हुआ… 3 जनवरी 2008

हैप्पी न्यू ईयर, सर्र. . . . मैं पलटता हूँ, एक किंचित परिचित चेहरा मेरी तरफ़ मुखातिब मुस्कुराता हुआ दृष्टिगोचर होता है । इनको कहाँ देखा है , दिमाग में चल रहा होता है किंतु ज़ुबान से फिसल पड़ता है, " थैंक यू , सेम टू यू ! "
यहाँ ठहरें कि आगे बढ़ जायें ( न जाने किस वेष में आने वाले कल का कोई  महामहिम ही हो ), मेरे इस असमंजस से उबरने के पहले ही उनका हाथ मेरी तरफ़ को उठता दिखता है । अब रूकना तो लाज़िमी है । ठिठक कर सोच रहा हूँ, किस तरह पेश आया जाये । उन सज्जन की दृष्टि तो सामने के फुटपाथ पर जाती हुई किसी महिला को आँखों ही आँखों मे तौलती हुई सी ' वकोध्यानम एकाग्र ' थी, बाँया हाथ कान से सटे मोबाइल को थामे और दाहिना हाथ जैसे कुछ टटोलती हुई मेरी ओर हवा में लहरा रही थी । अच्छा, लगता तो यह हैंड शेक का न्यौता है ? अशिष्टता न झलके, इस मज़बूरी में ' चलो मिलाय लेते हैं ', मैंने भी हाथ बढ़ा ही दिया ।

सिगरेट दबे होने के कारण वह फ़क़त चार ऊँगलियों से मेरी हथेली को उपर नीचे हिलाते हुए मोबाइल अपने मुँह के सामने ' माइक्रोफोन टेस्टिंग 'के अंदाज़ में ला दहाड़ से रहे हैं, "जल्दि आओ भाई, ईंहाँ डिग्री कलैजिया के सामने दुई घंटे से तुम्हरे इंतजरिया में खड़े हँय । " खट्टाक्क, मोबइलिया बंद, हमारी तरफ़ घूमे, " अउर, बाल बच्चे ठीक ? भाभी जी मज़े में ? आप लोग दिखबै नाँहीं करते हैं । इहाँ एक पार्टी का इंतजार कर रहे थे कि आपै दिखायी दइ गये , नया साल मुबारक़ हो ।"  मुझे भी बोलना ही पड़ता है, " आपको भी "।

सहसा दिमाग में बिज़ली सी कौंधती है, " आप बाजपेयी ठेकेदार हैं न ? " आहाहा हा, हाँ, हाँ । चलो धन्न-भाग हमको, जो आप पहचानै लिये सेवक को । लो, इतने में उनका मोबाइल फिर बीच में कूद पड़ा, पैन्ट की बाँयीं ज़ेब से चीखने लग पड़ा, ' हो रे .. राम, होरे राम, हो रे क्रिश्ना, हो रे राऽऽआम...होऽऽऽ ', और वह मेरी तरफ़ पीठ करके बेचारे मोबाइल का टेंटुआ दबाते हुए फौरन कान से चिपका लेते हैं, ' हलऊ हल्लऊ, हाँ..... ' भाग लो अमर कुमार यही मौका है । एक खिसियाहट से बाहर आने की कोशिश करते हुये, मैं आगे बढ़ लेता हूँ, मन में थोड़ा रंज़ भी है, ' भाभी जी, मज़्ज़े में ? स्साला भाभी के मज़े का ठेकेदार …  ..  हरामी कहीं का ? '

और मेरी वह भी तो ,जिसको देखेंगी मीठी-मीठी मुस्की मार निहाल ही कर देंगी, जैसे एसेम्बली इलेक्सन की उम्मीदवारी मिली हो, बेहया ! हूँह, भाभी जी के मज़े की औलाद कहीं का, स्साला हरामी । ' अब अपनी पूरी बिलागर बिरादरी की पंचायत से दरख़्वास्त है कि, मेरे स्वगत कथन को माइनस करके ज़रा ग़ौर करें कि यह कैसा ' हैप्पी नियू ईयर ' है, और ऎसे रस्मी ' थ्रो अवे गुडविशेज़ ' की कितनी अहमियत है ? चलिये इन बीहड़ बाजपेयी जी को फिलहाल अलग बैठाय देते हैं, लेकिन यह ' नववर्ष की बधाईंयाँ, शुभकामनायें वगैरह वगैरह ' तो जिधर नज़र दौड़ाओ, उधर ही हावी है । यह सब काहे को भाई ?

पच्चीस बवालों के बावज़ूद भी लुटते पिटते 2008 निकाल लाये, इसीलिये 2009 की मुबारक़बाद मिल रही है । मानों तिहाड़ से बाहर आ , अब यरवदा में जारहे हों , सुख शान्ति की ओर...बधाई हो । यह सब मेरी संकुचित समझदानी में नहीं आरहा है तो कैसे खीसें निपोर दूँ ? कोई भाव नहीं, कोई सरोकार नहीं, बस हैप्पी नियू इयर उछाले रहो । यह बधाई तो मुझे की बकरे माँ के ख़ैर मनाने जैसा लगता है, कब तक ? भगवान जाने, शायद जब तक ज़िन्दा रहोगे तब तक । यही सब देते दिलाते दम निकल जाये तो भी यह संतोष तो है कि फलाँ साहब हमारे शुभकामनाओं के चलते ही इतने दिन सकुशल काट लाये । वैसे तो इस रिवाज़ में ज़ाहिराना तौर पर कोई खोट नहीं लउकता । वाज़िब बात, दुनिया की रीत है यह सब ।

सभी हमारे जैसे लंठई सोच के पैदा हो जायें , तो हो गया कल्याण ? लेकिन अगर अब्भी भी हमारा पाइंट नहीं पकड़ पाये हों तो बात खुलासा हो ही जाये । इतना लम्बा चौड़ा ख़ाका सिरिफ़ इस लिये खींचा है, कि शायद कोई लाल बुझ्झकड़ सिरे तक पहुँच ही जाये हम अपनी असभ्य लंठई सोच को गठरिया के बगल रख देते हैं, तो आप पंच लोग यह बतायें कि हम भले अंग्रेज़ी में फिस्सड्डी  होंय, लेकिन परंपरा की कसम खाने को अंग्रेज़ियत का बासी गाउन कब तक सूँघते रहेंगे ? क्या गाँधी का स्वदेशी केवल कपड़ों की होली जलाने भर को ही था, या कि हम कभी अपनी भी कोई सुदेशी सोच कायम कर पायेंगे ? यह भारतदेश है मेरा......। अनेकता में एकता की अद्भुत मिसाल ( भरी सभा में सिगार पीते और  भाषा के गठन पर प्रलाप करते राजेन्द्र याद आरहे हैं ) वाह क्या थ्योरेटिकल बात है ? अब जरा देशी नववर्ष की तिथियों की झलक भी देखें ....
उत्तर भारतीय राज्य - चैत्र शुक्लपक्ष प्रथम
गुजरात - दीपावली के दूसरे दिन, ( जिसे हम परेवा कहते हैं, यानि कामधंधा बंद ) पर वहाँ हर्षोल्लास का दिवस !
पंजाब - बैसाखी के पर्व से
बंगाल - पोइला बोईशाख ( वैशाख शुक्लपक्ष प्रथम )
भारतीय मुस्लिम - मोहर्रम की पहली चाँद के दिन से
दक्षिण भारत – पोंगल

 नववर्ष 2009
यदि मेरे अवलोकन में कोई त्रुटि हो, तो नाचीज़ की इल्मअफ़ज़ाई करने की ज़हमत ग़वारा करें एवं यदि कुछ अतिरिक्त जानकारियाँ साझी करने को है, तो क़िबला मेरे सिर आँखों पर नोश फ़रमायें । ग़र मेरी ख़ुज़ली ख़ारिज़ कर भी दें, पर किससे ग़िला ? यह तो आप देख ही रहे हैं कि अंग्रेज़ियत के नकली शिष्टाचार हमारे महान भारतदेश को एक सूत्र में बाँधे हुये हैं तो फिर मैं ही इसको मुद्दा बनाने पर क्यों आमदा हूँ ? ज़वाब तो भाई मेरे पास भी नहीं है, वरना यहाँ क्यों चिचिया रहा होता ?  फिर भी, मेरे प्रलाप के पीछे कुछ तो है ही ...


चलो भाई, मैं दकियानूस खूसट सही.. पर, आदरणीय शास्त्री जी का सूत्रवाक्य ' हिन्दी ही हिन्दुस्तान को एक सूत्र में पिरो सकती है ' यहाँ पर मुझे कन्फ़्युजिया देती है ! इसका समाधान कैसे हो ? यह भी माना कि, आधुनिकता के संदर्भ में इतनी अंग्रेज़ियत तो ज़ायज़ है .. सहमत हूँ श्रीमान ! पर.. यह पर, किन्तु, परन्तु जैसे मेरे पीछे पीछे डोला करते हैं ! अंग्रेजी में बोले तो.. चलेंगा, लेकिन 'लेडीज़ फ़र्स्ट' की परंपरा वाली अंग्रेज़ियत की पैरवी करने वाले आख़िर बुकिंग विन्डो पर महिलाओं को धकियाते हुये देखे जाते हैं.. ताज़्ज़ुब नहीं कि, वहीं से पलट कर हाँक लगा दें.. 'मैंने कहा हैप्पी न्यू ईयर, डाक्टर साहब !' तो... तो, मेरे ऊपर क्या बीतती होगी ? यही कि, ऎसी बकवास लिख मारो... और क्या ? जो मेरे मन आया, यहाँ उड़ेंल दिया, ज़रूरी नहीं कि आप सहमत ही हों ! नमस्कार !

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31 December 2008

तू क्या कर रहा है, बे ?

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अमर-नवम्बर२००८ आतंक आतंक आतंक.. आह, आतंक ! यह ससुरा आतंक शब्द ही इतने गहरे पैठ गया है, कि इसको सुनने मात्र से आतंक उभर आता है । न जाने क्यों, मैं इसके पीछे लट्ठ ( अपना लट्ठ है, भाई ) लेकर पिला पड़ा हूँ ! पर, वज़ह क्या व्यक्तिगत है ? नहीं जी.. भला आहत स्वाभिमान लेकर कौन चैन की नींद सो सकता है ? सच ही सोच रहे हैं आप कि, लगता है स्वाभिमान की ठेकेदारी अमर कुमार को ही मिली है ? सत्य वचन महराज़.. जो चला गया उसे भूल जाओ  ! पर, मेरी मोटी समझ कहती है कि, अक्षुण्ण भारत की इकाई के रूप में अपना स्वाभिमान जगाये रखने से ही देश की अक्षुण्णता बनी रह सकती है । राजनीतिक हितों के लिये हम प्रान्त, धर्म, सम्प्रदाय और जाति तक के स्वाभिमान के नाम पर..".जो हमसे.... चूर चूर हो जायेगा " सरीखे नारे लगाते लगाते दुनिया से खर्च हो जाते हैं, पर देश ? छोड़िये भी, मैं यहाँ कोई युद्ध की पैरवी नहीं करने जारहा ! सभ्य दिखने के लिये इसकी भर्तस्ना की जानी चाहिये.. पर जहाँ समझौतों के तर्क का अंत होता है, वहीं गाली गलौज (hotanim_e0at blogger ) और फिर हाथ-पैर  वाली भाषा की ज़रूरत आन पड़ती है ! समझौते ? राजा हरि सिंह जंक्शन से वाया ताशकंद-शिमला चलते हुये मुशर्रफ़ हाल्ट तक.. समझौतों की ऎसी तैसी का गवाह कौन नहीं हैं ? पर गौर करें कि, क्या सब शांत है ? नहीं जी, हम तो पड़ोसी से ‘सबूत दो..सबूत लो’ सिरीज़ खेल रहे हैं !

             Fighter3airdef8          क्रिकेट से लेकर मैदान-ए-ज़ंग तक के सफ़र की तरह, यह तय है, कि.. यह सिरीज़ भी हमारे हाथ ही लगेगी । पर, वहाँ ड्रेसिंग रूम में किसी अलग तरह की नेट प्रक्टिस चल रही है ! पड़ोसी अपने बाशिन्दों को थपकी देकर शांत कर रहा है, टी.वी. पर अपने ज़ाँबाज़ ? हवाई लड़ाकूओं की तस्वीरें दिखा कर ' खून गर्म रखने के बहाने ' समझा रहा है ! पिछले पखवाड़े से मेरा पड़ोसी आज-टीवी (Aaj TV & ARY) समेत अन्य चैनलों पर यही परोस रहा है ! यह सब दिखलाने के लिये मैं शर्मिन्दा हूँ, पर बगल के घर से सालन की आती महक से आँख भले मूँद लें.. नाक तो बन्द नहीं  किया जा सकता है, न ? वह हैं कि, नहीं सुधरेंगे.. हम ?

                  Fighter12Fighter13

चलिये.. छोड़िये, यह उनका अंदरूनी मामला है, पर यह दिखाना कि भारतीय विमान को निशाना बना लेना पाकीयों के लिये बाँयें हाथ का खेल है ! यह तो भाई, मेरे गले का डिप्थीरिया है! नीचे के दाँयें और बाँयें चित्रों को ध्यान से देखें, वाह रे, प्रोप-अ-गैन्डा !

                  Old%2010Old%2011

पृष्ठभूमि में बजती कई पंचलाइनों में सबसे प्रमुख है " झपटना पलटना..पलट कर झपटना, लहू गर्म रखने का.. है इक बहाना "  क्या समझे.. नहीं समझे ? तो, समझ लीजिये कि, वो निहायत अमनपसंद लोग हैं, जिनको ये नाशुक्रे क़ाफ़िर चैन से जीने नहीं देते, सो यह नाटक लहू को गर्म रखने के लिये किये जा रहे हैं ! बकरे दर बकरे कुर्बान किये जाते हैं, पर लज़्ज़त ही नहीं मिलती!मुंबई में 200 हलाल किये गये हैं, अब देखिये इस मौज़ूदा सबूत-सिरीज़ के बाद अगली कुर्बानी का करबला कहाँ का तय होता है ?

अपुन का ध्यान इस समय स्व० रामप्रसाद 'बिस्मिल' पर लगा हुआ है, सो मैं इन दरिन्दों को उनकी ही एक लाइन से चेताना चाहूँगा .. " वक्त आने दे बता देंगे तुझे ऐ आसमां, हम अभी से क्या बतायें क्या हमारे दिल में है । बिस्मिल’

उनके अपने जन क्या कहते हैं. During the last three days or so, the situation between Pakistan and India has nothing but worsened. The critic - cynical nonetheless - in me reminds me that Pakistan, with her Zardaris, Gillanis and other cronies has actually played their part well. Too well for comfort, but a well-played innings so far. Consider this: India gets her major city Mumbai taken hostage by a handful of terrorists. Why were they there? Terror in the name of what? We are not told clearly. Then India, as the three day saga is unfolding, goes ahead and blames the Pakistani government. Note, there is a difference between blaming someone ‘from’ Pakistan and blaming the Pakistani establishment in itself. India, it seemed, blamed both. Eventually, India names Jamat-ud-Dawa as the main culprit organization that trained and brainwashed the Mumbai attackers. The UN - based on proof - declares the JuD a terrorist outfit. The JuD is closed down by Pakistan, not because India said so, but because UN says so. Pakistan plays the UN card well, reminding the world that Pakistan listens to world elders (Kashmir being the first point in this case). Pakistan asks for the same proof that India has given to UN. None is presented. Now, what is all of this? Pakistan has played the calm, mature ‘uncle’ part well. As in most families, this uncle can be seen as the coward, the one without the ‘heart’ to fight for its right, only later to realize that the uncle was being the most far-sighted. Of course, this uncle can be called the ‘mamoo’ if it turns out that the resolve and calmness was based on cowardice instead of cold logic. Nonetheless, India knows well enough that the nuclear bombs are not for display only, and much more potently, Muslims would love nothing more than a state-declared Jihad. The centuries old “We hold death more dear than you hold dear your life” line holds true today as far as any Muslim is concerned. Jihad is struggle, and in the case of war, it becomes an armed struggle. Armed Jihad is valid, as far as pristine Islam is concerned, in self-defense and has to be on a state level. Pakistan has very clearly, very calmly placed herself in a defensive role. And try as some may to portray it differently, Pakistan is still a state. A Muslim state that the world can see has been pushed into a corner by India. If war does break out, regardless of the result, the world will bear witness to the above perspective being the truth
और इनको भरोसाइच नहीं हैं

kaami on December 6th, 2008 @ 4:14 am

Who is paying for this extravaganza! This country is already under the heavy burden of returning thieves, rampaging terrorists, fleeing money, communal, sectarian and ethnic strife. We have sent packing a competent, honest and straight talking president and invited back mediocres to replace him. We are now reliant on IMF, govt has no control over its citizens, they can do what they want, inside or outside the country. Talent is fleeing, just another day I was introduced to a guy who paid one million rupees for a Canadian Work Permit. Again who is paying for this and why? Only a fool would attempt to attack this country, In 2002 India showed an aggressive posture and was reigned in by Mush, they dare not do it again, unlike us they have too much at stake, things like economy, progress and tourism etc. The whole world is at a loss, as to how to deal with Pakistan. Even Pakistani’s dont know where they are going and where they see this Nation in the next five years.

kaami on December 6th, 2008 @ 4:21 am

The only threat that I see is Mr. Osama Bin Laden taking over via his proxies, which are now super charged and very active. If that happens then we will be attacked by the whole world because nobody wants to see nuclear weapons in the hands of a monkey.

kaami on December 6th, 2008 @ 5:25 am

By monkey I mean Osama

ڈفر (duffer) on December 6th, 2008 @ 11:38 pm

ha ha ha ha …   exercises and pak army what they gonna get with these exercises? how to kill own ppl? how to be a response like a dam s**t when somebody roars on you? یہ صرف نعرے لگا سکتے ہیں کسی قوم کی فوج کہلانے کی انکی اوقات نہیں ____________________ http://www.dufferistan.com

पोस्ट कुछ लम्बी हो गयी न ? आज आपको झेलवा दिया ? आख़िर मेरी दुम भी इन पाकियों से कम ज़ब्बर थोड़े ही है ?

पर बेचारे ज़रदारी की तो सोचिये...क्या हालत है ? उनसे आतंकवादी माँग रहे हो.. और वह इतनी हैसियत भी नहीं रखते कि ऊँचे बोल सकें ! कभी ज़नरल कयानी हड़का देते हैं, आई.एस.आई चीफ़ से डाँट खाये बिना गुसल नहीं होती है, नवाज़ शरीफ़ इनको देख सारी शराफ़त भूल जाते हैं..अमेरिका का तो एक चपरासी भी डाँट दे तो निहाल हो जाते हैं, और तो और, अपुन के इन्डिया का एक फ़र्ज़ी आदमी भी फोन पर इनको लतिया देता है !

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23 December 2008

वो अन्डरस्टैंडिंग थी और ये सियासत है !

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स्थान: सीमा चौकी, इस बार उत्तर-पश्चिम क्षेत्र
बात बात पर उबल पड़ने और भारत माँ की सौगंध लेने की आदत के चलते रामनिहारी जाटव अपने बटालियन में रामबवाली भारती पुकारे जाते थे ! हमारे चरित्रनायक रामबवाली जी अब लांसनायक भारती के नाम से पुकारे जाने लगे हैं । दीपावली मनाने दो वर्ष बाद छुट्टियों में घर आये हैं । सब ठीक ठाक गुज़र रहा था, मात्र चार दिन ही रह गये थे, कि बेस से वारंट आगया.. ... रिपोर्ट इमिडीयेटली ! बीबी ने उनका सामान बाँधा, उन्होंनें कुलदेवी के सम्मुख सिर पर क़फ़न बाँधा और चल पड़े लाम पर ! रिपोर्टिंग की औपचारिकतायें पूरी हुईं, एक संक्षिप्त मीटिंग... और यह तय पाया गया कि जिसको जिस क्षेत्र की अधिक जानकारी है,उन्हें वहीं भेजा जाय !   
आज लगभग दस दिनों बाद कुछ लिखने बैठा हूँ |ये अन्डरस्टैंडिंग है...का दूसरा भाग पूरा करना शेष था । ब्लागर की सीमित दुनिया में सुरक्षा संचेतना सुनामी या कहिये कापी-पेस्ट काँव-काँव के थमने की प्रतीक्षा में स्वामी का यह आम आदमी पाँच दिनों के लिये टीकमगढ़ के बंज़र की खाक छान आया ! बस ऎंवेंई ही... वहाँ की दुरावस्था पर बहुत कुछ सुना था, सो देख भी आया ! वहीं पाकिस्तान के विषय में गाम की एक औरत बमुश्किल बता पाती है, " किस्तान -उस्तान तै हम्मैं नाहीं पतौ ! लड़कन बतावत जे अपँयैं भारत माता  ते जरन वारे लोग गुंडन के भेज के बम्बई मां दंगो धमाकौ कराय रहै अउर जे सरकार हाथै पै हाथ धरै आगि तापि रही !" किंचित हिचकिचाहट के बाद साहस बटोर कर एक झटके में पूछ भी लेती है, " तू कोनि सरकारी जसूस तै नाहीं ? " एक पोस्ट का मैटर है, सो छोड़िये यहीं ! कल शाम साबिहा समर की पाकिस्तानी पंज़ाबी फ़िल्म खामोश पानी देखी जिसमें ज़िया-उल हक़ के ज़माने की किरन खेर अपने लड़के सलीम मलिक को रफ़्ता रफ़्ता इस्लामी कट्टरवाद में डूबते जाते देखती है, असहाय बेबस ! निःसंदेह एक सशक्त फ़िल्म है, यह ! आज की विहंगम चिट्ठाचर्चा पर श्री सत्यनारायण ' कमल ' से परिचय हुआ.. उनकी वयोवृद्ध लेखनी से निकली जोशीली पोस्ट ने जैसे मुझे जगा दिया .. काल करै सो आज कर...  लिख ले जो लिखना है, तुझे ! आपको मेरा सादर धन्यवाद शर्मा जी, Island with a palm tree यह रहा…      वो अन्डरस्टैंडिंग थी और ये सियासत है ! 

  अन्डर्स्टैंडिंग और.....सियासत

अब शुरु हुआ कठोर श्रम और चुहलबाजी का दौर.. ख़तरों के इतने नज़दीक रह कर.. बारूद की गंध में भी यह ज़वान हँसने के मौके तलाश लेते हैं ! जीवट के जीवंत मिसाल हैं हमारे ज़वान ! यम भी इनसे पनाह माँगें, ऎसे हैं

पर, इस बार चुहल में वह बात नहीं थी.. चौकी पर लगे लाउडस्पीकर अपना अलग मक़सद रखते हैं ! पर, इसी के ज़रिये सीमा पार के सैनिकों से नोंक-झोंक भी कर ली जाती थी.. जस्ट फ़ार चेन्ज़ ! टैंक अदल बदल के किस्से तो अब चुटकुलों में भी शामिल हो गये हैं ! एक दूसरे की आवाज़ों के इतने अभ्यस्त..कि नाम भी पहचान लिये जाते हैं..  मसलन पिछली बार मोहायम.. परवेज़ वगैरह की ज़िन्दादिल पर रस्मी ललकार कभी कभी इनको भी मोह लेती थी ! एक बार मैंने पूछा भी था कि, " यह सब कैसे बर्दाश्त करते हैं ?" उन्होंने तन कर कहा फ़ौज़ी की कोई धर्म- जाति नहीं होती.. बस हमारे को एक चीज मालूम होता है, कि हमारा मुल्क सबसे ऊपर .. पीछू को चाहे मज़हब बोलो तो.. चाहे पालिटिक्स बोलो और चाहे.. और चाहे तो क्या और क्या .. करते हुये वह अपनी किसी लक्ष्मणरेखा पर ही  अटक  जाया करते ! मोर्चेपरमैं कायल था उनकी सतर्कता का..चींईं ईंईं ब्रेक लगा लेने का गुण !

हाँ तो, इस बार चुहल में वह बात नहीं थी । उस पार के लाउडस्पीकरों से पाक़ीज़ा, उमरावज़ान सरीखी उर्दू फ़िल्मों के गाने बजते, जो रेगिस्तान में दूर तक गूँजते हुये अज़ब का दिशाभ्रम पैदा करते । स्साले.. हमारा गाना सुने बिना ख़ाना हज़म नहीं होता.. अबे दुपट्टा ओढ़ता ही काहे है.. जो इन्हीं लोगों ने..इन्हीं लोगों ने ले लीना का रट लगाये है.. फिर हा हा हा उहू उहूः हू से बैरक गूँज जाता ! देखीए यूयन्नो में भि इ सार मुसरफ़वा ईहै दोपाट्टा गा गाके बुसवा को खसम बनाय लिहिस है .. सुमेर बलियाटिक ठुसकी मारते.. वह हमेशा यू.एन.ओ. को यूयन्नो ही कहते,   और फिर वही अहाहाहा हा ह्हा ह्हायगे माई.. भाई लोग अगले पल से बेख़बर हँसते हँसते खुद ही दोहरे हो जाते, वाह जीना इसीका नाम है!

पर नहीं, इस बार चुहल में वह बात नहीं थी ! एक ख़ामोशी छायी हुई थी.. उस पार से " यूँ दी हमें आज़ादी कि दुनिया हुई हैरान.. कैयदेअज़म तेरा एहसान तेरा एहसान " जैसा कुछ लगातार सुनाई पड़ रहा था ! लांसनायक अपने ज़वानों से आँखें चुराने लगते.. काहेकि उनके ज़वान ऎसे लम्हों में अपनी प्रश्नवाचक निगाह उनके ऊपर लगातार साधे रहते,“बोलो,हमें क्या बोलते हो नायक ? ” 

क्या करते लांसनायक भारती ? अभी तक ऊपर से एक्शन का कोई आर्डर नहीं आया है.. एक भद्दी गाली मन में दे लेते.. हमारे ज़वानों का मोरल डाउन हो रहा है.. एक बार आर्डर मिल जाये तो इनका रोज का किस्सै ख़ैत्तम कै दें। चबा कर बोलने के चलते उनका ख़तम हमेशा से ख़ैत्तम ही रहा है ! गौरमिन्ट सट्ट साधे है... कुछेक क्षण अपने को संयत कर दायें हाथ से छुक छुक गाड़ी जैसा एक्सन करते हुये बोलते, " पब्लिकिया  भी ये नहीं करती और दुनिया का नाटकबाजी.. हाँय नहीं तो ? " उनकी हताश मुद्रा पर उनके ज़वान भी द्रवित हो उठते, पर.. क्या ?

ख़ैर, अब जल्दी से आगे बढ़ते हैं.. क्योंकि मेरा कुप्रसिद्ध तीन बजने को ही है ! इस रोज रोज की चिक चिक से ऊब कर आपस में यह तय पाया गया कि इस बार गश्त पर हम भी आमने सामने थोड़ा बहुत ज़ुबानी ज़माख़र्च हो लेंगे ! ताकि यह कुछ दिन तो शांत रहें !  अगली गश्त पर देखा तो सामने बाड़ के उस पार परवेज़ मियाँ गश्त पर हैं.. ' चलो, इनसे थोड़ा शिकवा शिकायत हो जाये । मियाँ नम्बरी चीज हैं.. टैंक अदल बदल करने का आइडिया इनका ही था..स्साला फ़रेबी ! बातचीत में इतने सधे और मीठे कि लगेगा अपनी बिटिया का रिश्ता देने आये हैं ! चलो अपना क्या है.. हाल चाल ले लें इनका भी मन बहल जायेगा और इस बदले मिज़ाज़ का रंग भी मिल जायेगा ।' यही सब मन में सोचते आगे बढ़े.. ऒईलो, ये तो स्साला गाली दिये जा रहा है ! एकदम से खौल गये, " ज़नानियों की तरह गाली क्यों देता है, बे ? " ससुरा वह आधी घुटी हुई दाढ़ी और जोर-शोर से गरियाने लग पड़ा.. क्या कहा वह आप न ही पढ़ें तो अच्छा है । भारती दहाड़े, "अबे गाली क्यों देता है.. सिर्फ़ दो हाथ लड़ ले तो जानें !" परवेज़वा जैसे गाँज़ा लगाये था, "किसने क्या कहा बे , सबूत है तेरे पास ?" भारती ऎसी स्थिति के लिये कतई तैयार न थे.. "ऒईलो, खुल्लम-खुल्ला गरिया भी रहा है और उल्टे मुझीसे सबूत भी माँग रहा है, धूर्त ?"

क्या करते लांसनायक भारती ? उन्होंने हनहना कर एक लात उसके पिछवाड़े जड़ दिया । बस, इतना ही था कि, सहसा तड़ तड़.. तड़ तड़ गोलियों की बौछार शुरु कर दिया मरदूद ने ! छिटक कर एक गोली हमारे लांसनायक के बाँयें टखने पर लगी, उन्होंने झटपट आड़ में पोज़िशन ले ली । तनिक झाँक कर चिल्लाये, "दिमाग ख़राब हो गया है... कल तक तो हमारे दम पर ऎश कर रहा था, 15-15 दिनों की दो छुट्टी दिलायी .. सो भूल गया ? " वह मेरी तरफ़ से अन्डरस्टैंडिंग थी.. यह था परवेज़ का ढीठ ज़वाब ! " तो फिर गाली क्यों देता है और कहता है कि सबूत दो, मक्कार ? "  परवेज़ की मशीनगन थमने का नाम ही नहीं ले रही है ! फिर चिल्लाये हमारे नायक, "अबे, वार डिक्लेयर तो होने दे..!!" परवेज़ सचमुच मक्कारी से हँसने लग पड़ा, " किसी गाली वाली का कोई सबूत तो दिया नहीं.. उल्टे हमारे पिछवाड़े लात ठोंक दिया... हमलावर तो तू है, पाज़ी ! वार तो तूने ही डिक्लेयर कर दिया है !"

“ऒईलो, यह क्या कह रहा है, तू ? “ भोले भारती चकराये ! ” मैं कुछ नहीं कह सुन रहा... यह तो दुनिया ने देखा कि पहला वार तूने ही किया है ! जाकर किसी से पूछ..  यह सियासत है !” परवेज़ अबतक हँस रहा है 

अकारण स्पष्टीकरण: जूताखोर भुश्श पर नपुसंक क्रोध के प्रतीक ज़ैदी के जूते पर हमारा ब्लागजगत आह्लादित है, चुहल में व्यस्त है । जहाँ संवेदनाओं के विलाप का बाज़ार नित्य नये तराने ला रहा हो, ऎसे में फिर वही मुंबई धमाके को संदर्भित पोस्ट ? आपके ऎतराज़ की कद्र करते हुये भी न्यू मैरीन लाइन्स के बिटिया के हास्टल की छत से मोबाइल पर आती धमाकों की अस्फुट आवाज़ें, लड़कियों का डर और घबड़ाहट के मारे गश खाकर गिरना, उन सबको एक कमरे में बंद करके रखे जाना फिलहाल मैं भूल नहीं पाया , क्योंकि यह सब एक अलग किसिम की सिहरन देती आ रही है ! क्या करें ?
एक बात और :पोस्ट का ऎसा अंत सामयिक संदर्भों के चलते अपरिहार्य सा प्रतीत होता लगता है.. साथ ही अनिवार्य सा भी लग रहा है ! फिर भी, मुझे इस पोस्ट का ऎसा अंत प्रस्तुत करने का सदैव पश्चाताप रहेगा । पर, यह पश्चाताप अब तक के लाखों उ्जड़े परिवारों के हाहाकार एवं वतन की आज़ादी के राह पर कुर्बान हुये हुतात्माओं के ठगे जाने के शोक से लाख दर्ज़े हल्का बैठ रहा है ! खैर, कूटनीति, सियासत व मज़हब की आड़ में पल रही सत्ता-लिप्सा का कहीं तो अंत होगा ? प्रतीक्षा है, ऎसे स्वर्णिम आशा के फलीभूत होने की... बस, आप भी इस प्रतीक्षारत कतार में लग जायें, और क्या ?
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13 December 2008

ये अन्डरस्टैंडिंग है और वो सियासत थी

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स्थान : सीमा चौकसी चौकी, देश में कहीं भी..
खट्ट्क्क खट्ट्क्क खट्ट्क्क .. हवलदार रामबवाली भारती मेज़र फ़ेरन सिंह के सामने जा खड़े हुये, पंज़ों पर उचक कर एक सैल्यूट मारा, " शौह्हः , मेरा 10 दिन का लीव एप्लिकेशन रिकेमेन्ड एन्ड फ़ारवर्ड कर दीजिये ।" मेज़र उनसे भन्नाये अंदाज़ में पूछते हैं, "क्यों, क्या है ?" हवलदार बगलें झाँकते हुये बोले, "शौह्हः, मेरा ताऊ इलेक्शन में पिल पड़ा है... सो, थोड़ा परचार-उरचार कर आयें, फ़ेमिली की नाक ख़तरे में है, प्लीज़ शौह्हः !"
मेज़र किचकिचा पड़े, "अरे ज़वान, पहले यहाँ तुम अपने देश की नाक की सोचो. " बीस हफ़्ते की कैम्पिंग में सत्तरह हफ़्ते तुमने ऎंवेंई बिता दिये । दस दिन के छुट्टी और चार दिन की मूवमेन्ट के बाद तुम्हारे पास बचा ही क्या ? " हवलदार रामबवाली भारती उतावले हो उठे, " शौह्हः मेरी रेगुलर पेट्रोलिंग चल रही है, आज भी नाइट पेट्रोलिंग पर रिपोर्ट करना है ।" मेज़र भभक पड़े, " तो ? तो, अब तक की ड्यूटी में तुमको एक भी इन्ट्रूडर या घुसपैठ की रिपोर्टिंग का चांस ही नहीं मिला ? जाओ, अपनी ड्यूटी पर.. कोई कारनामा दिखाओ, तभी रिकेमेन्डेशन की सोचेंगे.. मूव नाऔ !" दहाड़ सुन कर, बेचारे भारती हवलदार उल्टे पाँव वापस हो लिये, गिनती परेड होनी  थी ।
अगली सुबह रामबवाल हवलदार फिर मेज़र साहब के सामने हाज़िर, " शौह्हः रामबवाल रिपोर्टिंग सर !" पर, मेज़र जैसे कुछ सुनना ही नहीं चाहते थे, "नो नो, आई सेड नो वेऽऽ.. गो बैक टू योर पोस्ट !" अबकी हवलदार एकदम तड़क कर बोले, " शौह्हः हमने कल रात दुश्मन का एक टैंक अपनी सीमा के अंदर घुसते पकड़ लिया ।  सर, पूरा का पूरा  क्रू तो एस्केप कर गया लेकिन टैंक हमारे क़ब्ज़े में आगया है ! आप गैरिसन में देख लीजिये, सर !"

   nitthalla  binavajah

अब मेज़र फ़ेरन सिंह हैरान.. यह कैसे ? बाहर निकल कर देखा तो सचमुच एक पाकिस्तानी टैंक खड़ा है ! ख़ुशगवार माहौल में अपने कुछ ज़वान उस पर टँगे हुये मग्गों में चाय पी रहे हैं और दो जन एक रज़िस्टर में कुछ औपचारिकतायें दर्ज़ कर रहे हैं । मानना ही पड़ा मेज़र को, उन्होंने आगे बढ़ कर रामबवाल को अपनी बाँहों में दबोच लिया, " वेलडन ज़वान, तुमने अपना वादा पूरा किया, तुम्हारी छुट्टी मंज़ूर हुई समझो.. मैं वायरलेस पर बेस को पूरी इन्फ़ार्मेशन दे देता हूँ, जाओ.. आराम करो !"
शाम को अनौपचारिक गपशप में मेज़र ने हुलस कर कहा, " बधाई हो, ज़वान छुट्टी मंज़ूर हो गयी । पर, यह सब तुमने अकेले कैसे कर लिया ?" रामबवाली ने सिर झुका लिया, "मैं आपका मातहत हूँ, सर.. झूठ नहीं बोल पाऊँगा ! सिपाही का दर्द सिपाही ही जानता है, अन्डरस्टैंडिंग है, सर ! उधर का सिपाही भी जब छुट्टी चाहता है, हमसे टैंक माँग कर ले जाता है ! यही अदला-बदली इसबार भी किया है, सर !"
"यह चीटिंग और जुगाड़ है, यू फ़्राड ?" मेज़र गुस्से जितना गुस्से से काँप रहे थे,                                          उतनी ही शांति से हवलदार ने कहा.. क्या कहा ? वह बाद में .. .. ..

F

चाहे तो इसे आप ..सनक के समावेश पर शिवभाई की व्याख्या की पुष्टि ही समझें, या कुछ और.. 
1995 से 2000 के दौरान अपने वार्षिक अवकाश का गंतव्य मैं सीमा को छूते हुये देश के हर उस भाग को बनाता रहा, जो सड़क मार्ग और कुछेक ट्रैकिंग से नापा जा सकता था । इसी कड़ी में 1996 के शीतावकाश में मेरा जैसलमेर के निकट  लगभग 27 किलोमीटर पर स्थित, सीमावर्ती गाँव सम तक जाना हुआ ! एक यादगार यात्रा, क्योंकि कई औपचारिकताओं से मुक्ति मिल गयी थी !


एक दूरी के बाद फोटो लेना मना है, इसलिये अंतिमबिन्दुके चित्र ही आप देख पा रहे हैं ! सच में बड़ा रोमांचक रहता है, नो मेन्स लैंड पर खड़े होकर विश्व का सर्वथा स्वतंत्र स्वछंद नागरिक होने का अनुभव करना ! कुछेक सुरक्षा नियमों का उल्लंघन करते हुये..( जिसका मुझे खेद है ) और अपने एक नितांत अंधभक्त की सहायता से हम सीमावर्ती बाड़ तक जा सके ! दस कदम आगे और बढ़िये, और.. आपकी नागरिकता बदल गयी ! उधर से भाग कर आती हुयी पाकिस्तानी भेड़, दो छलांग में हिन्दुस्तानी कहलायेगी ! है न, अज़ीब बात ? खैर छोड़िये.. वहाँ रेत पर एक माचिस की खाली डिब्बी पड़ी देखी.. पिंज़रे में बंद बंदर छाप, उसपर कुल क़ैफ़ियत उर्दू में ही थी ! अंकों को छोड़ कर कुछ भी अंगेज़ी में नहीं था ।  मैंने यादव जी ( काल्पनिक नाम ) से पूछा, " पाकिस्तानी माचिस हिन्दुस्तान की ज़मीन पर कैसे ? " उसने बेपरवाही से उत्तर दिया, "हमारे किसी ज़वान ने सिगरेट वगैरह सुलगाने के वास्ते लिया होगा ।" मेरा 12 वर्षीय बेटा अपने जिज्ञासाओं का अनंत कोष यादव के सम्मुख खोल बैठा ! कुल ज़मा निष्कर्ष यह था, कि अपनी अपनी सीमाओं में हम अपनी ड्यूटी कर रहे हैं.. उसमें कोई ढील नहीं.. पर किसी चरवाहे या ज़वान से कुछ माँग लेना या कुछ दे देना एक सामान्य बात थी वहाँ ! लाउडस्पीकर से एक दूसरे के हाल चाल तक पूछ लिये जाते थे ! मुझे अटपटा लगा और मैं सत्ताधारियों के झगड़ों और इन सुरक्षा प्रहरियों में इन झगड़ों के प्रति कोफ़्त को नज़दीक से देख पाया ! कोलकाता से निकलने वाले देश ( দেশ ) के  पूज़ा विशेषांक 2002 में यह प्रकाशित भी हुआ है ! पोस्ट उसी को आधार बना कर थोड़े अलग ढंग से लिखी गयी है, क्योंकि.. हवलदार भारती ने क्या कहा, इसका समावेश तो अभी बाकी है !

हवलदार ने फ़ीकी हँसी के साथ कहा, " अब आप जो भी कह लो साहब पर, जुगाड़ से ही तो दोनों मुल्कें बनी हैं, जुगाड़ से ही उनकी सरकारें चल रही हैं, और उनके इस जुगाड़ को ज़िन्दा रखने और चलाते रहने के लिये हमलोग नाहक आमने सामने खड़े ड्यूटी के नाम पर अपनी ज़िन्दगी खराब कर रहे हैं.." 
यह तो उसने मुझसे कहा था, जिसको मैंने इस पोस्ट में मेज़र के मत्थे मढ़ दिया है, पर आलेख पूर्णरूप से आपबीती पर आधारित है

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09 December 2008

चैट्क्क.. डोन्ट वरी फ़ॅऽर इट, अंकल !

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यह विषय पड़ा तो बहुत दिनों से था... पर वही सनातन रोना, कुछ असलियत का और कुछ फ़ैशन में, बोले तो.. समय का टोटा, वह तो आपके पास भी होगा ! ब्लागिंग और लिखने का विषय ?  अरे, राम भजो... . जिस दिशा में  भी नज़र डालो, विषय  ललकार  रहे हैं ! ब्लागर वही, जो बात  पकड़ बतंगड़ बनाये ! टैग जो मन आये, वही घुसेड़ दो... संस्मरण, संवेदना, हलचल, विविध, व्यंग्य या कुछ भी ? अपुन के समीर भाई जी ने कहीं लिखेला है, " ब्लागिंग की  लत लग भर जाये, फिर तो सोते में, जागते हुये , रास्ते में, श्मशान में, लड़की में, कड़की में.. जित देखो ब्लाग सब्जेक्ट , जैसे मीरा के कान्हा ! उन्होंने तो अपना पक्का इंतज़ाम कर ही लिया है..लोकल ट्रेन के डिब्बों में भी अपना माल ताड़ लेते हैं, और मसाला लाइब्रेरी में मिल जाता है, सेफ़ हैं.. लकी हैं ! पर,  मुझे तो पहले का सोचा हुआ हर एक नुक्ता..  जैसे अब कुरेद रहा हो !

हुआ यह कि चिट्ठाचर्चा  के जिसका जितना आँचल था, उतनी ही सौग़ात मिली  पर मेरी एक टिप्पणी दर्ज़ होगी,
".....  लट्ठ ताऊ का पेटेन्ट है, राज भाटिया छुट्टियों पर निकले हैं, और यहाँ..
बिटिया को उड़ान भरने की लेट हो रही है,
जब तक हमारे सारथी जी, फ़्लाइट का कोई अतिशुद्ध हिन्दी विकल्प नहीं निकालते ,
तब तक आप अपनी बेटियों को उड़ने से कैसे रोक सकते हैं ?
सो, अभी चलता हूँ ! ....."
इसमें यह जिक्र करना आवश्यक न समझा कि मेरी बेटी की एक सहेली भी आयी थी, शिवानी लोढा ! कभी महाराष्ट्र से बाहर न निकली थी, सो वह आई थी यू.पी. का ज़लाल देखने ! जो भी देखा हो, पर  उसका रोज सुबह घूम घूम कर पेड़ पर लटके शरीफ़े, पकते अमरूद और बचे खुचे करौंदों को देख देख रोमांचित होना, मुझे आह्लादित करता था.. " आईला, दीज़ ग्वाआज़.. ओह ईषी, इट इज़ अ लाइफ़टाइम एक्सपेरियेन्स ! सच्ची अंकल, मैंने इत्ती बड़ी ज़िन्दगी में फ़र्स्ट टाइम देखा है.." इत्ती बड़ी पर उसका खास जोर रहता ! तो अपने स्टेट गेस्ट.. शास्त्री जी नाराज़ न हों, भूलसुधार किये लेता हूँ... तो, अपने राजकीय मेहमान को सकुशल विदा करना भी एक उत्तरदायित्व था ! मेरी बेटी ईषिता तो बाय बाय कर गयीं, फ़्लाइट समय पर थी । शिवानी चूँकि बाद में, लालू तत्काल पर आयी थी, सो उसे ट्रेन से ही जाना था, और.. उसे सी आफ़ करने तक लादे-लादे लखनऊ में विचरते रहना और  नान-स्टाप बकर बकर सुनते रहना था ! शाम को पुष्पक है, स्टेशन सात बजे पहुँचना है... तब तक ?

तब तक..' ये खाओगी, अच्छा यह ट्राई करके देखो, जरा शुक्ला के दहीबड़े भी चख कर देखो । ' यही सब चलता रहा । बेचारी पंडिताइन कुढ़ कुढ़ कर मरी जा रहीं थीं.. छिपा कर आँख तरेरा, "मैं कभी इन चीजों के लिये कहती हूँ, तो तुम उन्नीस का पहाड़ा बताने लगते हो, और इसपर बिछे जा रहे हो ? " हाय रब्बा, तूने अपनी रचना में इतना सारा कुड़कुड़त्व क्यों भर रखा है ? बच्ची है, कुछ घंटो के लिये अपनी मेहमान है, शर्म करो ! " अच्छा तो मुझे शेखर के यहाँ छोड़ दो, ट्रेन के बाद आ जाना.."  उनकी ओर से शह दी गयी और मैंने मात स्वीकार कर ली !

लगता है, विषयांतर हो रहा है.. कीबोर्ड हाथ आ जाये तो कंट्रोल ही नहीं होता ! स्वामी-संयम अभी मुझसे दूर है ! कुलज़मा किस्सा यह कि शाम को स्टेशन पहुँचा, जब तक कार पार्किंग में अपना जगह बना पाती, तब तक मिस लोढा दो बैग लेकर नीचे कूद चुकीं थीं, एक बड़ा सूटकेस डिक्की में था ! " इट्स मिनिमम,  अंकल ! आफ़्टर आल यू विल हैव टू कैरी अटलीस्ट फ़ोर सेट्स फ़र सेवेन डेज़, ना ? " यह बेवज़ह सफ़ाई मैं तब तक एक दर्ज़न बार सुन चुका था। खैर.कार से उतरा तो देखा शिवानी बगल में ही खड़ी है, डिकी के पास, सूटकेस निकालने को तत्पर.शिवानी लोढा-ईषिता अमर-बिनावजह निट्ठल्ला उसके बैग कहीं आसपास नहीं दिख रहे थे । " बैग्ज़ ? " मेरी प्रश्नवाचक मुद्रा भाँप, वह तपाक से बोली, "ओह, यू मीन बैग्ज़ ? दे आर एट प्लेटफ़ार्म एन्ट्री गेट !" मैं मन ही मन दहल गया, ' अरे लड़की, यह यूपी है.. बैग तो अब ना मिलता ।' इन लड़कियों की छठी इन्द्रिय बड़ी तेज होती है, भई ! बिना कुछ पूछे ही खट से ज़वाब भी आ गया.. तेज तेज कदमों से सूटकेस घसीटती हुई, उसने दोनों कंधे उछाले, "  चैट्क्क.. डोन्ट वरी फ़ॅऽर इट, अंकल !" तालू से जीभ चटकाते हुये वह बोली, " डोन्ट वरी, नो वन विल टच इट.. दे मस्ट बी सेफ़ देयर । " वह किंचित ढीठायी से हँसती है.. " यू नो, पीपुल आर सो स्केयर्ड, दे वोन्ट इवेन टच द बैग्ज़ !" उसके इस तरह के मुँहजोरपन पर मैं मन मसोस रहा था, पर उसने अपना बकबक जारी रखा, " यू नो, अंकल.. इन दिस एट्मास्फेयर.. नो सेंसिबल परसन डेयर टच एनीवंस लगेज़.. एट नरीमन वी लीव आअर पर्स एंड लव टू वाच द फ़नी  पैनिकी फ़ेसेज़ !

इस लड़की पर क्रोध तो बहुत आ रहा था, लगातार अंग्रेज़ी गिटरपिटर, ऊपर से ऎसी गैरज़िम्मेदार ग़ुस्ताख़ी.. पर ? पर.. वही स्टेट गेस्ट का मसला और यूपी की इमेज़ ! जाओ रे लड़की, बहुत होगया..पंडिताइन भी प्रतीक्षा में होंगी! पोस्ट लम्बी होते जाने के आसार बन रहे हैं, वह अलग से ?  क्या करें, यह लड़की अब ज़ल्दी  जाती  भी तो नहीं !

पुष्पक एक्सप्रेस यार्ड से आकर प्लेटफ़ार्म पर लग चुकी थी, कोच B-2, बीटू.. बीटूबीटू... बीटू हाँ यह रहा बीटू ! बर्थ इसी में है, चाल्ह छे्त्ती टुर लै गड्डी विच्च ! वह ज़ल्दी से अपना बड़ा सा बटुआ खोला, दाँतों से ओंठ भींच कर अपना हाथ उसके अंदर डाल जादूगर कुंडू के गिल्लि-गिली बुब्ब्लाबू स्टाइल में हिलाती है..   खरगोश तो नहीं, हाँ एक अज़ीब सा डिब्बा निकाल कर उसमे जड़े आईने में चेहरा दायें बाँयें घुमा कर ज़ायज़ा लेती है, और तपाक से एक गोल डिब्बी निकाल काम्पेक्ट अपने चेहरे पर फेरने लगती है.. अचानक वह काम्पेक्ट की डिब्बी कब लिपस्टिक में तब्दील हो जाती है, पता ही नहीं चलता और वह तमाम तरह के मुँह बना हौले हौले लिपस्टिक अपने गंतव्य पर इधर उधर दौड़ा रही है । ई लेडीस लोग का यह तामझाम मुझे हमेशा से ही बड़ा रहस्यमय लगता रहा है.. सो आज भी खड़ा खड़ा उसे हैरत से  देखता रहा.. खाना खाकर सोने के लिये इसकी क्या ज़रूरत ?  उसके किसी अदृश्य एंटेना ने सहसा मेरी यह वेव-लेंग्थ पकड़ ली हो जैसे, ऎसे उसने चौंक कर देखा । " ओह सारी, जस्ट अ लाइट टच-अप !" अपनी खिसियाहट छिपाने का प्रयास करते हुये, वह बोली ! फिर बेसाख़्ता हँसने लग पड़ी, " जस्ट अ मेक-ओवर टू टैली माई फ़ेस विद माई आई.डी.कार्ड फोटो.. इन केस द ट्रेन ब्लास्ट्स एंड यू आर काल्ड टू आईडेन्टीफ़ाई मी !" मैंने अपने दाँत पीसे, लगता है आज पिट कर ही जायेगी यह परकाला ?

ख़ैर, एक एक करके दोनों गयीं ! लौटते समय बड़ा सूना लग रहा था. और मैं डा. बशीर की कहीं पढ़ी हुई नज़्म याद करने का प्रयत्न कर रहा था.. ' गुल नहीं, गुलज़ार हैं.. बेटियाँ ख़ुदा का उपहार हैं.. बेटियाँ तो ख़ुशबू का झोंका हैं.. ये खेलती-कूदती, मचलती-महकती ख़ुशबू की बयार हैं.. ' जैसा ही कुछ ! " कहाँ ध्यान है, तुम्हारा.. नींद आरही है, क्या ? " लो, पंडितइनिया ने चौंका दिया । इनका यही है, एक झपकी मार लेंगी.. फिर पुकार पड़ेंगी,जागते रहो..

_________________________________9 दिसम्बर, मंगलवार ____________________________

यह विभाजन रेखा क्यों ? क्योंकि यह घटना 17 नवम्बर की है.. पोस्ट लिखी गई 25 नवम्बर, मंगलवार को.. सोचा कि, फ़ाइनली कोई इमेज़-ऊमेज़ लगाकर शनिवार को पोस्ट करेंगे ! इसीलिये कहा है, " काल करे सो आज कर " क्योंकि 26/27 नवम्बर की रात में जो हुआ, उसके आगे यह पोस्ट अप्रासंगिक हो गया था ! आपही बताइये. कहाँ वह मौत का तांडव, और कहाँ असुरक्षित माहौल को  भी एन्ज़्वाय करती इस मुंबईया लड़की का ये अफ़साना !

विचारों की कड़की का बयार लगता है, पछुआ हो गई है..  कल छुट्टी है, आज कुछ पोस्ट करना है.. कल तो पंचम जी को हलाल कर दिया आज कुछ लिखने को ज़ंग लग गया है । सो इसी को झाड़-पोंछ कर पब्लिश किये देता हूँओह, मुंबई-अमरकेवल कुछ सेकेन्ड और लूँगा : यह ऊपर वाला इमेज़ लेकर एडिट करते समय यह फ़र्क़ कर पाना कठिन हो रहा था, कि यह चारबाग, लखनऊ का प्लेटफ़ार्म है या सी.एस.टी. का ? यह तो आपके शहर का भी हो सकता था ?  पर, ईश्वर न करे (क्योंकि, सरकार तो बेबस है) कि ऎसा हो.. मैं मन को भरोसा देने को ' राम की शक्ति-पूजा ' की लाइनें दिमाग में बरबस लाने का प्रयास करता रहा.. ठीक से याद न आयीं ! मुझे ही क्या, पूरे देश को ही भूल गया होगा...

ईश जानें, देश का लज्जा विषय
तत्व है कोई कि केवल आवरण
उस हलाहल-सी कुटिल द्रोहाग्नि का;
जो कि जलती आ रही चिरकाल से
स्वार्थ-लोलुप सभ्यता के अग्रणी
नायकों के पेट में जठराग्नि-सी !

नहीं.. नहीं, यह तो शायद दिनकर के कुरुक्षेत्र में है.. अब इतनी रात में किताब कहाँ मिले ?                       आप ही देख लीजियेगा ! निराला की लाइनें तो शायद यह हैं :

है अमानिशा, उगलता गगन घन-अंधकार;
खो रहा है दिशा का ज्ञान, स्तब्ध है पवन चार;

या यह ............................................................................ ? 

शत-शुद्धि-बोध-सूक्ष्मतिसूक्ष्म मन का विवेक,
जिनमें है क्षात्र-धर्म का घृत पूर्णाभिषेक,
जो हुये प्रजापतियों से संयम से रक्षित,
वे शर हो गये आज रण में श्रीहत, खण्डित !

मात्र 15 दिनों में एक पोस्ट का पूरा संदर्भ ही बदल गया.. , सिंहासन का सेमीफ़ाइनल चल रहा है, लोग झूम रहे हैं, बम फ़ुटा रहे हैं.. नाच रहे हैं, और हम कह रहे हैं कि विषय का टोटा है..यह भी भला कोई बात हुई,वाह !

इससे आगे
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यह अपना हिन्दी ब्लागजगत, जहाँ थोड़ा बहुत आपसी विवाद चलता ही है, बुद्धिजीवियों का वैचारिक मतभेद !

शुक्र है कि, सैद्धान्तिक सहमति अविष्कृत हो जाते हैं, और यह ज़्यादा नहीं टिकता, छोड़िये यह सब, आगे बढ़ते रहिये !

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