जो इन्सानों पर गुज़रती है ज़िन्दगी के इन्तिख़ाबों में / पढ़ पाने की कोशिश जो नहीं लिक्खा चँद किताबों में / दर्ज़ हुआ करें अल्फ़ाज़ इन पन्नों पर खौफ़नाक सही / इन शातिर फ़रेब के रवायतों का  बोलबाला सही / आओ, चले चलो जहाँ तक रोशनी मालूम होती है ! चलो, चले चलो जहाँ तक..

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16 August 2009

ज़ाकिर भाई.. ओ ज़ाकिर भाई !

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ज़ाकिर भाई, आपकी पोस्ट देर से देख पाया । सटीक प्रश्न उठाया है, आपने । और मैं आपकी बेबाक दृष्टि का कायल भी हूँ ।  पहले तो मैं स्पष्ट कर दूँ कि, मैं आस्थावान सनातनी हिन्दू हूँ । बहुत सारे वितँडता और प्रत्यक्ष , अप्रत्यक्ष अनुभवों के बाद मैंने पूजा करना छोड़ दिया है । इस पर एक पोस्ट लिखने की इच्छा भी है, पर समय और विषयवस्तु में सँतुलन नहीं बन पा रहा है ।

1 आपकी पोस्ट में गायत्री मँत्र का जो अर्थ दिया है, वह वास्तव में इसका अनर्थ है ।
प्रचोदयात वैदिक सँस्कृत की धातु है, जिसका तात्पर्य " हमें अग्रसर करें.. हमें उत्प्रेरित करें " से समझा जा सकता है ।
बहुत सारे पौराणिक मँत्रों में " भविष्यति न सँशयः " लगा रहता है । यह भी एक प्रकार की साँत्वना या स्व-आश्वस्ति है 

 2 किसी भी पूजा या इबादत की पहली शर्त है, अपने को समर्पित कर दो.. जो भी उपास्य है उसमें लीन हो जाओ ।
यह आपको सेमी-हिप्नोसिस या सम्मोहन की स्थिति में ले जाती है तत्पश्चात निरँतर एक ही मँत्र का जाप अपने आपमें आटो सज़ेशन है । ऎसा होगा .. ऎसा होगा.. ऎसा ही हो ऎसा ही हो.. आख़िर क्या है ? इन मँत्रों का एक निश्चित सँख्या में दोहराये जाना आपके एकाग्रता और लगन और धैय की परीक्षा है । ऎसी प्रक्रियाओं को एक निश्चित समय पर ही किये जाने का तात्पर्य दिनचर्या को अनुशासित करने से अधिक कुछ और नहीं !
इन प्रक्रियाओं को नियम सँयम और निषेध से बाँधना भी यही दर्शाता है ।

3 प्रारँभिक वैदिक मँत्र पूर्णतया प्राकृतिक तत्वों में निहित अतुल शक्तियों को समर्पित हैं । ऋग्वेद इसका उदाहरण है । मानवीय विस्मय से उपजा आज भी अपने अर्थ में उतना ही सार्थक है, जितना  पहली  बार  उच्चरित  होने  पर  रहा होगा । इस्लाम में भी اَلم  अलिफ़ लाम मीम को कोई समझा नहीं पाता ।

4 मनुष्य जब भी हारा है, प्रकृति से ही हारा है । चाहे वह रोग आपदा महामारी बाढ़ सूखा भूकम्प चक्रवात ही क्यों न हो ? प्रकृति अपने नियमों की अवहेलना सहन नहीं करती । आदिम सभ्यता ने  प्रकृति के ऎसे प्रकोप को शैतानी शक्तियों में मूर्त कर लिया । यही कारण है कि, हर धर्म में एक नकारात्मक तत्व शैतान राक्षस और भी न जाने क्या क्या हैं । हर्ष विषाद विस्मय जैसी मूल मानवीय भावनाओं में आत्म रक्षात्मक डर सदैव भारी पड़ा है । एक नवजात शिशु को थप्पड़ दिखाइये, यह प्रत्यक्ष हो जायेगा ।

5  मँत्रों की शक्ति पर  किसी को निर्भर बना देना, डर की भावना का दोहन है, साथ ही मनुष्य की महत्वाकाँक्षाओं का पोषण भी ! इनको पालन करनें में एक आम आदमी अपने असमर्थ पाता है, तो ज़ाहिर है बिचौलिये पनपेंगे और डरा डरा कर पैसा वसूलेंगे । यही हो भी रहा है । तक़लीफ़ यह है कि, ऎसे तत्व सत्ता के ड्योढ़ी के चौकीदार बहुत पहले ही बन गये थे । चाहे वह सम्राट अशोक के अश्वमेध यज्ञ के घोड़े हों, या अडवानी के रथ में जलने वाला डीज़ल !  ख़ून तो आम आदमी का ही जाया होता आया है ।

6 एक बात जो रही जा रही थी, वह यह कि वैदिक मँत्रों के उच्चारण में आरोह अवरोह और शब्दों का बिलँबित लोप का उपयोग, ध्वनिविज्ञान के नियमों द्वारा आपकी मनोस्थिति को प्रभावित करती है, सकारात्मक प्रेरणा देती है, यह सर्वमान्य सत्य है । इसमें कोई सँशय नहीं !

7 अँतिम बिन्दु पर मैं यह कहूँगा कि, जिस तरह मुल्लाओं का इस्लाम अल्लाह के इस्लाम पर भारी पड़ने लगा । उसी तरह कर्मकाँडी सँस्कारों ने निःष्कलुष सनातनी हिन्दू मान्यताओं को दूषित कर दिया है । हम प्रतीकों के प्रति उन्मादी हो गये हैं, और मूल्यों के प्रति उदासीन ! आस्था में तर्क का स्थान नहीं है, यह डिस्क्लेमर भी तभी लागू हो पाया । शुक्र है, कि मनुष्य के विवेक को उन्होंने नहीं लपेटा, वह तो हम इस्तेमाल कर ही सकते हैं । आइये इन बहसों को छोड़ कर हम वही करें, जो सहअस्तित्व का विवेक कहता है  । इसका मज़हब याकि किसी ख़ास धर्म से क्या लेना देना ?

चूँकि आपका टिप्पणी बक्सा ज़ियोटूलबार कि वज़ह से दगा दे रहा है, यह स्वतःस्फ़ूर्त असँदर्भित त्वरित टिप्पणी यहीं दे दे रहा हूँ । यदि चाहेंगे तो सँदर्भ भी प्रस्तुत किये जा सकते हैं । अन्यथा न लें , अल्लाह हाफ़िज़ ! 

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22 July 2009

पता नहीं क्यों ?

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लगता है, आजकल मैं निष्क्रीय हूँ... पूरी तौर पर तो नहीं, कम ब कम ब्लागर पर निष्क्रीय तो हूँ ही.. पता नहीं क्यों ? इस पता नहीं क्यों का ज़वाब तलब करियेगा, तो टके भाव वह भी यही होगा कि, " पता नहीं क्यों ? " यह पता नहीं क्यों हमेशा एक नामालूम सी कशिश भी लिये रहता है, लगता है कि कहीं कोई जड़ता मुझे जकड़ रही है, जकड़ती जा रही है.. पर आप हैं कि, अपने पर हज़ार लानतें भेजते हुये भी, खामोशी से इस निष्क्रियता को समर्पित रहते हैं, पता नहीं क्यों ? मुआ पता नहीं क्यों न हुआ कि इब्तिदा ए इश्क हो गया । है न अनुराग ?

Letter-
अबे पहले तय कर ले, ब्लाग लिखने आया है कि साहित्य रचने ? " यह कोई और नहीं, अपने निट्ठल्ले सनम जी हैं, अँतर से ललकार रहे हैं । कनपुरिया प्रवास के बाद साढ़े तीन दशक से साथ लगे हैं । जब तब मुझे ललकार कर चुप बैठ जाते हैं, गोया पँगे करवाना और उसमें मौज़ लेना ही इनका शगल हो । इनको डपट देता हूँ, ऒऎ खोत्या वेखदा नीं कि असीं लिख रैयाँ, बस्स ।

माफ़ करना मित्रों, यह इसी टाइप की भाषा समझते हैं, आप तो जानते ही हैं कि, फ़ैशन की तरह ही ब्लागिंग और ब्लागर की तरह फ़ैशन कितनी तेजी से बढ़ रहे हैं ? नित नये प्रयोग !

सो ब्लागिंग के इस दौर में साहित्य की गारँटी ना बाबा ना ! मौज़ूदा दौर तो जैसे गुज़रे ज़माने का बेल बाटम है.. कल यह रहे ना रहे.. पर हम तो रहेंगे, और.. जब रहेंगे तो कुछ ओढ़ेंगे बिछायेंगे भी ! आने वाला कल साहित्य का कोई धोबी जिसकी भी तकिया चादर गिन ले, उसकी मर्ज़ी ! जैसे यहाँ लाबीइँग में वक्त जाया कर रहे हैं, समय आने पर वहाँ सार्थक कर लेंगे ।

अभी से लाइन में लगने की भगदड़ काहे ? चोट-फाट लग जाये तो इससे भी जाते रहोगे । लाइन में लगने की क्या जल्दी थी.. जवाब मिलेगा, " पता नहीं क्यों ? इधर कोई ग्राहक नहीं आ रहा था, तो सोचा खाली बैठने से अच्छा कि अपना ही बँटखरा तौलवा लें, कहीं बाँट में ही तो बट्टा नहीं ?.. ससुर उहाँ भी लाइन लगी थी, घुसे नहीं पाये इत्ती भीड़ रही, पता नहीं क्यों ? “

निट्ठल्ला उवाच : कोई यह न कह दे, " पता नहीं क्यों, ई उलूकावतार इत्ती रतिया में का अलाय बलाय बकवाद टिपटिपाय गये ? याकि ससुर छायावाद की मवाद ठेल गये .. सीधे सुर्रा मूड़े के उप्पर से निकर गवा ! "

तो भईया ई डिस्क्लेमर-वाद है, अर्थ और ही और ! चित्त गिरो या पट्ट.. बाई आर्डर दुईनों एलाउड !

निट्ठल्ला उवाच : इसका भेद हम बताता हूँ, यह कँट्रोल पैनल के पुराने पोस्ट खँगाल रहा था.. इतने दिमागदार नहीं हैं, सो एक घँटे बाद से ही इनका सिर भारी होने लगा और एक घँटा पच्चीस मिनट बाद समझदानी के आउटर पर इँज़नवाँ फ़ेल ! " फिर भेजा इनको कि जायके आज की चिट्ठाचर्चा पढ़ा, सो गये बिचरऊ । बढ़िया है.. विवेक बाबू, बढ़िया है.. बोलि के लौट आये । टिप्पणी न दी, ज़रूरी भी न रहा होगा । कल बछड़ों के दाँत गिनना है, यही सब बतियाते भये खाना खाइन । "

आम खाओगे ? " पँडिताइन जी पूछिन.. " नहीं ! " मुला मुँह से बोले नहीं, मूड़ हिलाय दिहिन, बड़बड़ लगाय रहे आम खाऊँगा तो गुठलियाँ भी देखनी पड़ेंगी । पेड़ कौन गिनेगा, पर गुठली ?

मेरा प्रतिवाद : " चुप्पबे, खुद मेरा ही मन न था... आम जो है.. वह एक मीठा फल होता है ! "

अब ? कुछ ही पन्ने बच रहे थे.. सो, नँदीग्राम डायरी लेकर बैठा और दो सफ़े बाद ही कुछ लाइनें ऎसी मिली कि, अपने आपसे घृणा के प्रयोग करने लग पड़ा । आपको भी बताऊँ ?

लेकिन पहले श्री पुष्पराज जी से क्षमा माँग लूँ । क्योंकि मैं उनकी लिखी कुछ ही लाइनें शब्दालोप के साथ उद्धरित कर रहा हूँ .. " हमें नई बात समझ में आयी कि, जो (............) कहलाने के प्रचार से घृणा नहीं करते थे, वे ही (........ ) होने के प्रचार से आपसे घृणा कर रहे हैं । घृणा की यह चेतना जब ख़त्म हो जायेगी कौन किसके क्या होने से दुःखी होगा ? हम उनके कृत्तज्ञ हैं, जो हमारी चूकों पर नज़र रखते हैं और तत्काल घृणा करना भी जानते हैं । आपकी घृणा ने ही हमें शनैः शनैः इंसानियत की तमीज़ सिखायी है ! "

निट्ठल्ला : आप ई सब काहे लिख रहे हैं, जी ?

भईय्या, भाई जी, मेरे दद्दू.. अपनी सुविधानुसार, आप ही रिक्त स्थानों में ब्लागर और साहित्यकार भर कर देखो न । जो निष्कर्ष निकासो, तनि हमहूँ का बताओ । इतने दिमागदार नहीं हैं, सो इत्ती टिपटिपाई में ही मूड़ भारी हुई रहा है । तो अपुन चलें ? घृणा के साथ मेरे प्रयोग अभी कुछ बाकी रह गये है, फ़िलवक्त तो आप हमें निष्क्रीय ही समझो ।
" पावस देखि ’रहीम’ मन कोयल साधे मौन ।
जित दादुर वक्ता भये इनको पूछत कौन ॥ "

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08 July 2009

जिन्दगी की रेल कोई पास कोई फेल

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आज अभी चँद मिनटों पहले एक पोस्ट पढ़ी.. निठल्ले , सठेल्ले और ............ठल्ले :)

उब दिनों एक गाना सुना करता था, उसे अपने हिसाब से तोड़ मरोड़ भी लिया ( अभी  ईस्वामी  की टिप्पणी के बाद यह अँश जोड़ा है.. धन्यवाद स्वामी ! )

तो एक गाना सुना करता था.. " जिन्दगी की रेल कोई पास फेल.. अनाड़ी है कोई खिलाड़ी है कोई " बस इसी को पकड़ लिया, " रेल जब हुईहै, तौनि डब्बवा भी हुईबे करि... डब्बवा मा जब हुईहैं जगह तो सवारिन केरि लदबे करी… , सवारिन केरि लदबे करीऽऽ भईया सवारिन केरि लदबे करीऽऽ "

बस इसी को पकड़ लिया, इसके दर्शन को आत्मसात कर लिया.. लगे हुये डिब्बों को परखा, फ़र्स्ट किलास.. सेकेन्ड किलास, जनता, पैसेन्ज़र,  बाटिकट सवारी, बेटिकट सवारी, इस भीड़ में धँसे ज़ेबकतरे, डिब्बे के हाकिम भ्रष्ट टी. टी. वगैरह वगैरह !

बस हर डिब्बे के माहौल को बारी बारी से अपने जीवन का हिस्सा देता हूँ, अउर कौन ससुर ईहाँ से कछु ले जाय का है, यहीं जियो और यहीं छोड़ जाओ ।
आज तक कोई सवारी अपनी यात्रा खत्म होने के बाद… .. डिब्बवा खींच के अपने साथ न ले जा सका है । जउन लेय गवा होय तो बताओ !

तो पार्टनर अपनी चाट में अकड़ लचक बकैत विनम्र भदेस अभिजात्य सबै मसाला की गुँज़ाइश रहती है ! फ़ारसी पढ़वावा चाहोगे तो पढ़ देंगे.. और तेल बिकवाना चाहोगे तो वहू बेच देंगे ।anibl

लेकिन ये न होगा कि अमर कुमार जब डाक्टर साहब बन कर जियें तो ब्लागर प्रेमी अमर कुमार  उनका सतावै और जब डाक्टर जी को जीना न चाहें, तो डाक्टर साहब ज़बरई अमर कुमार में प्रविष्ट हो जायें ! इसी तरह अमर कुमार अपने को जीवित रख पायेंगे ! कुछ लोगों को देखता हूँ, वह अपने पद या अफ़सरी को इस तरह आत्मसात कर लेते हैं, कि  यही  अफ़सरी  उनके  अपने ही स्व  को  उभरने  ही नहीं देती , फिर  वह  दूसरों को  मस्त  देख  बिलबिलाते  हैं ।

जीवन में वेदाँत और वेद प्रकाश कम्बोज दोनों आवश्यक है, कुछ भी त्याज्य नहीं है ! ज़रूरत उसके एक निश्चित मिकदार को समाहित करने भर की हुआ करती है । अउर आपन पोस्ट हम निट्ठल्लन को डेडिकेट न किया करो, ग़र दिमाग ख़राब हो जाय तो फिर न कहना कि... बईला गवा है, बईलान है !

लेकिन आपौ जउन है कि तौन एकु राबचिक फँडे का अँडा लाके इहाँ  झक्कास राखि दिहौ …वा वा वाऽ वाह ! बड़ा सक्रिय चिंतन बड़े निष्क्रीय निर्विकार भाव से प्रस्तुत किया भाई !
मुला हँइच के दिहौ ब्लागरन का !
मेरी यह पोस्ट एक तरह से आपकी पोस्ट पर टिप्पणी है !

अगर अबहूँ समझ मा नाहिं आवा तो, ई सुनि लेयो..

 

 

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05 July 2009

हाँ, बात डाक्टर्स डे की हो रही है

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यह है जुलाई का महीना, और  इस महीने की पहली तारीख़ हम डाक्टरों के लिये एक ख़ास मायने  रखती है । इन  पँक्तियों के लेखक को  विश्वास है कि, आप में से  अधिकाँश  कुछ कुछ  ठीक पकड़ रहे हैं । यदि ऎसा है तो, आप इन्टेलिज़ेन्ट कहे जा सकते हैं । हाँ, बात डाक्टर्स डे की हो रही है ।

यदि इस सेवा को जनता मानवतासेवा के रूप में देखना प्रारँभ करती है, तो  इस  दिवस  पर  डाक्टरों द्वारा निःशुल्क जनसेवा का विचार सराहनीय ही नहीं बल्कि अपेक्षित है । मेरे गृहनगर रायबरेली  में यह  प्रतीक्षित  दिवस  त्रयदिवसीय  स्वास्थ्य  मेले  के  उपराँत  आज  की  सुविधाजनक  तिथि  पर  ( यानि 4 जुलाई को ) मनाया  जा रहा है । हाँ, बात डाक्टर्स डे की हो रही है ।

’ इण्डिया दैट इज़  भारत ’ में इसे डाक्टर स्व० बिधानचन्द्र राय जन्मदिवस पर एक जुलाई को मनाया जाता है । सँयोगवश यह तिथि उनकी निर्वाण-दिवस भी है । सो,  इस  दिन  डाक्टर्स डे  मनाया जाता है । मनाया क्या जाता है, हम  स्वयँ  ही  मना मुनू  लेते हैं । हर वर्ष स्थानीय स्तर पर आई० एम० ए० की शाखा एक वरिष्ठ चिकित्सक को खड़ा कर सम्मानित भी कर देता है । भाषण देने वाले माइक पकड़ लेते हैं, और बाकीजन अपने मित्रों द्वारा उनकी स्वयँ की प्रशस्ति सुनते हुये भोज खाने में व्यस्त हो जाते हैं,  फिर गुडनाइट वगैरह भी होता है । हाँ, बात डाक्टर्स डे की हो रही है ।

तत्पश्चात सब अपने अपने घर चले जाते हैं । कुछ लोग गुडनाइट से पहले ही वुडनाइट हो जाते हैं, इतने  जड़ और मदहोश  कि  उनको अपने घर  भिजवाना  पड़ता  है । एक दो दिन  तक सम्मानित होने वाले की ईर्ष्यात्मक प्रसँशा की जाती है, उनकी  अनुसँशा  करने  वाले  की भर्त्सना की जाती है, फिर  अगले  वर्ष  तक  के  लिये  सब  ठीक ठाक हो जाता है । हाँ, बात डाक्टर्स डे की हो रही है ।

सबके  सब  डाक्टर  एक  दूसरे  से  बेख़बर  अपने  अपने  काम  में  लग  जाते  हैं, एकता  की  यह अनोखी मिसाल अन्यन्त्र कहीं देखने  में  कम  ही आती है । हाँ, बात डाक्टर्स डे की हो रही है ।

उल्लेखनीय है कि,अपने उत्सव मनाने में हम कितने स्वालम्बी हैं, इस तथ्य की अनदेखी कर मोहल्ला सभासद, अपने भारतविख़्यात शायर ’ बेहिसाब कस्बाई जी,’ और उभार  लेती  हुई  इन्डियन  आइडल प्रतियोगी वगैरह अपना सम्मान वा अभिनँदन समारोह मनाने के लिये नाहक ही प्रचार पाते रहे है ।

सामान्य जन द्वारा ऎसी डाक्टरी घटनाओं ( पढ़ें, महत्वपूर्ण अवसरों ) के  प्रति  उदासीनता  निश्चय  ही निन्दनीय है । अवश्य ही हम शर्म करो दिवस या हाहाकार दिवस जैसा कोई आयोजन नहीं कर पाते, पर इस उदासीनता की निन्दा की जानी चाहिये । हम  मानवतासेवी  तो  अभी  तक  ठीक  से  निन्दा  भी  नहीं  कर  पाते । हाँ, बात डाक्टर्स डे की हो रही है ।

हर व्यावसायिक सेवा में किन्हीं प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष कारणों से एक ख़ास वर्ग असँतुष्ट रहा करता है, यह लघु प्रतिशत यहाँ भी उपस्थित है । वैसे मैंने तो लगा रखा है "प्रवेश पूर्व कृपया यह सुनिश्चित कर लें  कि, आप रोगी  हैं  या  जनता का हक  मारने वाले समाजसेवी, लोभी पत्रकार या दँभी अफ़सर ? " पर मीडिया द्वारा केवल इन्हीं को इस तरह प्रचारित किया जाता है, जैसे मानव सेवा के नाम पर चल रहे इस पेशे में चहुँ ओर दानव ही व्याप्त हों ! सच तो यह है कि, जीवन अमूल्य है का मानवीय मूल्य केवल यहीं जीवित है ।

बहुतेरे सुधी पाठक न जानते होंगे कि, यह दिन अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर डाक्टर्स डे के रूप में नहीं जाना जाता है । यह भारतीय डाक्टरों के लिये चुना गया एक अखिल भारतीय दिवस है । ई० सन 1933 में डा० चा अलमान्ड की विधवा यूडोरा ब्राउन अलमान्ड को ख्याल आया कि 30 मार्च 1842 को ही उनके स्वर्गीय पति ने जनरल एनेस्थेसिया के रूप में ईथर का प्रयोग करके विश्व की पहली शल्य चिकित्सा की थी ।

सर्वप्रथम यह 30 मार्च 1933 को उनके पैतृक निवास बैरो काउँटी, अमेरिका में स्थानीय स्तर पर मनाया गया । 30 मार्च 1958 को अमेरिकी काँग्रेस ने इसे राष्ट्रीय दिवस के रूप में स्थापित करने का प्रस्ताव पास किया :

Whereas society owes a debt of gratitude to physicians for their contributions in enlarging the reservoir of scientific knowledge, increasing the number of scientific tools, and expanding the ability of professionals to use the knowledge and tools effectively in the never ending fight against disease and death.
जी हाँ, बात डाक्टर्स डे की हो रही है ।

ई०  सन 1 जुलाई 1962  को  डा०  बिधानचन्द्र राय  के  देहावसान  और  चीन से  मोहभँग के  बाद, अमेरिका  की  तर्ज़ पर  प्रधानमँत्री  ज़वाहरलाल नेहरू  ने 1963 जुलाई से इसे डाक्टर्स डे के रूप में मनाये जाने की घोषणा की थी । सँभवतः यह तत्कालीन महामनाओं को उनके व्यक्तित्व के अनुरूप सम्मान न दे पाने के असँतोष को शमन करने की उनकी नीति रही हो । यह मेरे व्यक्तिगत गवेषणा का विषय है कि,पँ० ज़वाहरलाल नेहरू किस सोच के अन्तर्गत व्यक्ति विशेष के जन्मतिथियों को राष्ट्रीय पर्व घोषित कर दिया करते थे । जी हाँ, आप ठीक पढ़ रहे हैं, बात डाक्टर्स डे की हो रही है ।

अमेरिकी सीनेट और राष्ट्रपति जार्ज़ बुश ने 1990 में  डाक्टर्स डे  को  कानूनी  ज़ामा  पहनाया  और इसे  अनिवार्य  राष्ट्रीय दिवस  की  मान्यता दे दी ।

Whereas society owes a debt of gratitude to physicians for the sympathy and compassion of physicians in administering the sick and alleviating human suffering. Now, therefore, be it resolved by the Senate and House of Representatives of the United States of America in Congress as follows:
1. March 30 is designated as National Doctors Day.
2. The President is authorised and requested to issue a proclamation calling on the people of the United States of America to celebrate the day with appropriate programmes, ceremonies and activities.
The enactment of this law enables the citizens of the United States to publicly show their appreciation to the role of physicians in caring for the sick, advancing medical knowledge and promoting health.

जी हाँ, बात डाक्टर्स डे की हो रही है ।

docday2बस यहीं पर मेरा असँतोष मुखर होता है, क्योंकि डाक्टरों में कोई राजनैतिक भविष्य हो, या ना हो पर, डाक्टर्स डे को लेकर जनसमाज में निरँतर बसी उदासीनता मन में एक क्षोभ या अलगाव पैदा करती है । चलो फिर भी, कम से कम यह कहने को तो है कि, इवन अ डॉक हैज़ हिज ओन डे ! 
जी हाँ, अब तक बात डाक्टर्स डे की ही हो रही थी ।

DrBC Roy -composed by Amar

tn_docचलते चलते :

जरा इन डाक्टर साहबान से भी मिलना न भूलियेगा.. सीरियसली भई, एक बार मिल तो लें, पछताना न पड़ेगा !

 

 

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14 June 2009

विस्मृत बिस्मिल और ब्लागर च तनवीर

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पहले तो यह बता दूँ कि,यह पोस्ट भँग की तरँग में नहीं लिखी जा रही है । मानता हूँ कि शीर्षक बड़ा अटपटा बन पड़ा है, बल्कि यदि मुझे स्वयँ ही टिप्पणी देनी होती, तो उसे फ़कत एक लाईन में समॆट देता, " तेली के सिर पर कोल्हू ! " पर इस शीर्षक के पीछे एक मज़बूरी भी है , कृपया इसे सारथीय टोटका न मानें । मँगलवार 9 जून को सायँ चँद सतरें मरहूम हबीब तनवीर साहब पर पोस्ट करने का इरादा था कि, अचानक एक पारिवारिक आपदा आन पड़ी । मेरे बहनोई देवाशीष नहीं रहे,अब वह स्वर्गीय देवाशीष के नाम से याद किये जाते रहेंगे । अस्तु, यह रह ही गया ।

कल वृहस्पतिवार 11 जून को हुतात्मा बिस्मिल जी की जयँती थी । पूरे दिन उन पर दो शब्द सुमन अर्पित न कर पाने का मलाल बना रहा । रात में कुछ समय चुरा कर ब्लागर पर आया, तो आते ही बहक गया । शिव-भाई की पोस्ट ऎसी न थी कि, देख कर टहल लिया जाय ।
आज लिखते वक़्त यह भान भी न हुआ कि, इनको एक मँच देखना कितना कठिन है ? इस तरह द्राविड़, उत्कल, बँगा-नुमा इस पोस्ट को एक पँक्ति का यह शीर्षक देना पड़ा, मानों जाट और तेली की तकरार हो रही हो.. सो, बन  गया  " तेली के सिर पर कोल्हू ! " इनमें तुक मिलाना आपका काम है, पर लगता है कि, शीर्षक मे वज़न है

اَلہمدُلِّاہ ربدِلآلمین اَلرہمانے رہیم
مالِک یومیتّدین ایدنت پھِراتل مُتّکیم 

अलहमदुल्लिाह रबदिलआलमीन अलरहमाने रहीम
मालिक योमेत्तदीन एदनत फिरातल मुत्तकीम

हबीब तनवीर साहब को यूँ इन लफ़्ज़ों से रुख़सत कर देना मौज़ूँ रहेगा ? नहीं, क्योंकि अब तक उनकी शख़्सियत पर तकरीरें लिख कर कई कालमिस्ट चेक की रकम ज़ेब के हवाले कर चुके होंगे । मेरी उनसे कोई ऎसी मुलाकात भी न थी कि, उसका दम भरा जाय । एक इन्सान के तज़ुबों में दस मिनट कम नहीं होते । बहुत कुछ हासिल किया और खोया जा सकता है, उनसे  मेरी  मुलाकात  दस  मिनटों  की  ही  रही है । पर उन मिनटों ने साफ़गोई के मेरे  ऊसूल में  बेइख़्तियार इज़ाफ़ा किया , बल्कि  समझिये  कुछ  और पुख़्ता  ही हुआ । आमीन !

उन दिनों मुझे मुगालता बना रहता , कि मैं ही एक तन्हा साफ़गो हूँ । यह एक ज़िद थी, जो बढ़ती ही जा रही थी, तभी तनवीर साहब से मुलाकात का एक सबब बन गया । सुना कि, वह लखनऊ में हैं, और हम निकल पड़े

हम यानि कि मेरे बालसखा सँतोष डे और मै । इन्होंने मेरे रुझान को देखते हुये इप्टा में शामिल कर लिया । और मेरी निष्क्रियता से आज़िज़ होकर मुझे स्थानीय यूनिट के सँरक्षक होने का प्रस्ताव भी पारित करा लिया, आजकल वह इप्टा के प्रान्तीय यूनिट के कार्यकारी उपाध्यक्ष हैं, अविवाहित भी हैं, लिहाज़ा  खुल कर सक्रिय हैं ।

तो.. हम पहुँचे लखनऊ । सँतोष आगे चलते और मैं कार्यकर्तानुमा एक चमचे सरीखा उनके पीछे लगा रहता । अल्ला अल्ला ख़ैर सल्लाह, मुलाकात हुई । वह बैठे थे, सोफ़े पर इस कदर पसरे हुये कि आपको एकबारगी यह इहलाम हो कि उस पर देवदार की एक शहतीर टिकी हुई हिल सी रही है । उन्होंने अपने को सीधा किया, और पाइप का धुँआ खिड़की की तरफ़ मुँह करके बाहर को उगला । सलाम के उत्तर में सँतोष डे के लिये होठों पर एक स्मित रेख, और मेरे लिये आँखों में  जैसे " जी कहिये ? " अपनी प्रश्नवाचक भँगिमा और मुस्कुराते होंठों को इस बखूबी बाँट रखा था, कि साफ़ ज़ाहिर होता, कौन किसके लिये है । मेरे मित्र ने मेरा तवार्रुफ़ उनके पेश ए नज़र की, " यह डाक्टर... " ताकि आइँदा मैं परिचय का मोहताज़ न रहूँ । ज़वाब में सिर की एक ज़ुँबिश.. और वह फिर खिड़की से बाहर देखने लग पड़े, पाइप के क़श के साथ । दो सेकेन्ड भी न बीते होंगे कि, मैं बेहाल सा होगया, मेरे चेहरे ने घूम कर सँतोष का चेहरा देखा " यह कुछ बोलते क्यों नहीं ? " शायद रँगमँच को लेकर व्याप्त उदासीनता ने उनको तल्ख़ बना दिया होगा, " तो.. कुमार साहब आपकी हम नौटँकी वालों में दिलचस्पी कैसे हुई ? " मैं भला क्या कहता, बस एक ठहरे हुये इँज़िन की तरह ढेर सा स्टीम बटोर कर कुछ अटक फटक ही कर सका । और  उसी तरह ठिठक कर रुक भी गया ।

  इससे आगे  बढ़ता हूँ, तो आपका पढ़ने का टेम्पो जाता रहेगा । इसलिये यह मुलाका्ती ब्यौरा यहीं पर छोड़ें,  किस्सा कोताह यह कि उस दिन से मैं उनकी साफ़गोई और पारेषण क्षमता का आशिक व शागिर्द  हूँ । 

श्रद्धेय श्री रामप्रसाद ’ बिस्मिल ’ को भला कौन नहीं जानता ? पर यह भी सच है कि, बहुत से जन उन्हें नहीं जानते । क्योंकि उन्हें जानने का मौका ही न दिया गया । अचपन के एक मुख्य पात्र तन्मय जी, जो आजकल रायबरेली आये हुये हैं ।  मैं बिस्मिल जी का जन्मदिन उनसे पूछ बैठा, ऎसे  कठिन  क्षणों  में  भी  मेरे  मन  में उनका  जन्मदिन  घुमड़  रहा  था । वह तो बिस्मिल नाम से ही अनभिज्ञ  थे, लेकिन " सरफ़रोशी की तमन्ना " में निहित रुमानियत के दीवाने हैं । उनका तर्क है, " जब कोर्स में ही नहीं है, तो मेरी चिन्ता नाज़ायज़ है । "

इस कड़ी में, यही प्रश्न मैं कई किशोरों से पूछता रहा, वह सिर खुज़ला कर प्रतिप्रश्न दाग बैठे कि, “ अग़र मह्त्वपूर्ण जयँती होती , तो आज छुट्टी क्यों नहीं है ? “ तभी निरुत्तर हो, मैं यह पोस्ट लिखने को बैचैन हो उठा

हर वर्ष छुट्टीट्यूड से ग्रसित देश के लिये एक नये जयँती की घोषणा हो जाती है । व्यक्तिगत  और  राजनैतिक हितों को जनजागृति से ऊपर रखने की शुरुआत तो बहुत पहले ही हो गयी थी । ओह,यह क्या कह रहा है ?

The three appellants Ram Prasad, Rajendra Nath Lahiri and Raushan Singh, who were sentenced to death and subject to confirmation by this Court, became entitled, under a practice  of the local Government which has been in force for some years, to legal assistance at the expense of the Crown. The appellants, who had not been sentenced to death, were not entitled to legal assistance at the expense of the Crown. But as a special case the Crown had allowed them legal assistance & paid for it. Ram Prasad in his petition of appeal, demanded as of right to select his own counsel. He stated that he would only be satisfied if he was represented by a Gentleman called Mr Gobind Ballabh Panth ….. The Crown approached Mr Gobind Ballabh Pant and offered him the brief. He refused to accept it on the fee that the Crown was ready to pay.”  Gobind Ballabh Pant, who had refused to defend the great freedom fighter only because of less money went on to become the Home Minister of India & the longest serving Chief Minister of Uttar Pradesh.

परसों यानि कि 11 जून को बिस्मिल जयँती थी । कहीं कोई हलचल नहीं, कहीं कोई उल्लास नहीं, उनके गाँव वाले घर ( जो अब बिक गया है ) उत्सव के माहौल में भी आक्रोश का स्वर था । शायद ज़ायज़ भी है, मँचासीन होकर “ भगत सिंह, बिस्मिल, अशफ़ाक जैसे सपूतों की धरती “ की दहाड़ लगाना अलग बात है । मैं नहीं समझता कि झलकारी, लोहिया, या पँत ने इन सिरफ़िरों से अधिक त्याग किया होगा कि स्मारक के हकदार हों

ऎसे सिरफ़िरों को श्रद्धाँजलि देने के लिये, मेरे पास शब्दों का भँडार है । पर, यह मेरी पहुँच से बाहर है । क्योंकि इनके ज़ज़्बों के सम्मुख हर भारतवासी बौना है , मैं उनको बस स्मरण ही कर सकता हूँ ।

मृत्यु पूर्व होशो हवास में लिखे हुये इन ज़ज़्बों को भला कौन छू सकता है, एक्स-वाई-ज़ेड सेक्यूरिटी पाने वाले ?

Pandit_Ram_Prasad_Bismil

19 तारीख को जो कुछ होगा मैं उसके लिए सहर्ष तैयार हूँ।
आत्मा अमर है जो मनुष्य की तरह वस्त्र धारण किया करती है। 

यदि देश के हित मरना पड़े, मुझको सहस्रो बार भी ।
तो भी न मैं इस कष्ट को, निज ध्यान में लाऊं कभी ।।
हे ईश! भारतवर्ष में, शतवार मेरा जन्म हो ।
कारण सदा ही मृत्यु का, देशीय कारक कर्म हो ।।

मरते हैं बिस्मिल, रोशन, लाहिड़ी, अशफाक अत्याचार से ।
होंगे पैदा सैंकड़ों, उनके रूधिर की धार से ।।
उनके प्रबल उद्योग से, उद्धार होगा देश का ।
तब नाश होगा सर्वदा, दुख शोक के लव लेश का ।।

सब से मेरा नमस्कार कहिए,  तुम्हारा- बिस्मिल" ( यह एक पुर्ज़े पर लिखा हुआ पत्राँश है.. )

पर उन्हें यही सँतोष रहा किया कि,
शहीदों की चिता पर लगेंगे, हर बरस मेले । वतन पर मिटने वालों का यही आख़िरी निशाँ होगा..

  AADDEEFFHHHH

यूँ ही निट्ठल्ले के सँग कुछ न कुछ तो है.. कि जाते थे जापान पहुँच गये चीन समझ लेना ! यान्नि यान्नि यानि .. इतने झँझावात के बावज़ूद भी, मैं मौका पाते ही नेटायस्थ होता भया, कि चलों मेला वेला देखि आयें, ऎसे किसी मेले का ब्लागर पर निशाँ तो क्या, नामो-निशाँ भी न था । दिख गया शिवभाई का एक टटका पोस्ट !

समय निकाल आया तो था,  बिस्मिल जी को उनकी जयँती पर याद करने.. लेकिन  शिवभाई की पोस्टिया ने जैसे लपक कर रास्ता छेंक लिया । उसे  पढ़ा, फिर गौर से पढ़ा और  यही  समझा  कि, यहाँ पर भी स्वतँत्रता जैसा  कुछ  कुछ  हो गया  था  और वह  गुज़र  चुका  है  ।  लाओ हम तनिक लकीरै पीटि देंय
तब का बुद्धिजीवी अँग्रेज़ों के भ्रुकुटि का गुलाम था, आज का बुद्धिजीवी अँग्रेज़ी सोच की मानसिकता का ताबेदार है, पिछले छः दशक से भारतीयता और देसी सँदर्भों पर यह कैटरपिलर अवस्था से बाहर आना ही नहीं चाहता ।

सशँकित भी है,  न जाने कौन सी चिड़िया उसे चुग जाये ? उस पर तुर्रा यह कि इस कैटरपिलर केंचुवे को खुल्ले में आने की, चर्चित होने की ललक भी है ।  नोटिस किये जाने व टी.पी.आर. की दुश्चिन्ता को वह छिपाये भी रखना चाहता है, यह बाद की बात है । फ़िलहाल दिखलाता यही है कि,वह रचनाधर्मिता की बग्घी को सँवेदनाओं की सँटी से हाँकने को अभिशप्त है । ऎसी बग्घियाँ आपको हर सर्वहारा टाँगा स्टैन्ड पर सस्ते में मिल जायेंगी ।

देखो अपुन का फ़ँडाइच अलग बैठेगा, शिवभाई ! डर कर लिखना.. दबाव में लिखना.. समझौतों पर लिखना.. पाठकों की पसँद के हिसाब से लिखना.. यानि कि अपने ही विचारों और शब्दों का गला घोंटना, एक तरह की हाराकिरी है । यह अपने अँदर के एक लेखक बटा ब्लागर की आत्महत्या है ।  क्या यह मौलिक कहलायेगा ?
बेहतर है कि,अभिव्यक्ति के स्वतन्त्रता की मानसिक नौटकीं की स्क्रिप्ट राइटिंग करते रहना !  यही पर एक गड़बड़  भी है, कि ब्लागरीय ठुमके हिट और फ़िट हैं, लेकिन वह फिर कभी.. वरना अपुन के हलके के भाई लोग इसे जलेली-कुड़ेली कुँठित पोस्ट कह कर सरक लेंगे ।

इदर ब्लागर का लफ़ड़ाइच डिफ़रेन्ट है, सच्ची  लिकेगा तन कौव्वा काटेगा ! अईसा किस माफ़िक चलेंगा ? जब लिखेला, सच्ची बात लिखेला तण डरने का लोचाइच क्या ? अपुन तो फ़ुल्ल टाइम राइटर बी नईं है, पण अपना लिखा कब्भी से कब्भी भी नहीं हटाया । एडीटर नईं छापता, कोई वाँदा नईं.. अपुन को रोकड़े का चेक नईं मिलेंगा, तो चलेंगा । पण, चित्रगुप्त साहब के खानदानी को कुच लिक के हटाने का प्रेंसिपल बनताइच नईं, जी !

पँडित दिनेशराय द्विवेदी जी मेरे टाप टेन मित्रों में हैं,मैं उन्हें खोना भी नहीं चाहता । वह चाहते तो टिप्पणी बक्से में ही पर्याप्त ऊधम मचा सकते थे, जो उन्होंने नहीं किया । पर मिस्टर डिलीट जी, मित्रवत राय देना एक अलग बात है.. उस पर विचार करके अमल में लाना उससे ज़्यादा अहम बात है ।  आपसे पूछ कर कौन पँगा लेगा कि आप ब्लागर को  महत्व दे रहे हैं, या उसके पेशे को ? अपनी सोच को या मित्रवत राय की पसँद को ?

अपने डाक्टर साहब जब दूभर मचाते हैं, तो सबसे पहले  मैं  उनको  ही खूँटी  पर  टाँग  कर कीबोर्ड  के  सम्मुख   “ प्रथम  वन्दहूँ  बरहा..  लाइवराइटर ,   पुनि ब्लागर  सुमिरैं  गूगलदेव “  गायन के बाद ही ब्लागियाना आरँभ करता हूँ ।  वरना  तो  जीना  ही  मुहाल  हो जाता,  इतनी बार इतनी जगह इतनी पोस्टों पर डाक्टर कि डकैत की गुहार सुन चुका हूँ , कि खिड़की के बाहर देख कर  खुद तस्दीक करनी पड़ती है कि, कहीं  मैं ही तो किसी मन्त्री आवास में नहीं घुस आया ?  पण श्शाब जी, अईसा है ना कि, जब हम बोलेगा तो बोलेंगे कि चोलता है !

वईसे अँदर की बात है कि, एक बार “ बेचारा सफ़ेद एप्रन काले कोट से बहुत डरता है, “ से काला कोट मैंनें भी हटा दिया था, क्योंकि तब हिन्दी ब्लागरीय तहज़ीब ( ? ) से इतना परिचित न था कि तू ये हटा, मै वो हटाता हूँ

वईसे पँडित जी खुद्दै कहिन है,कि, " कोई भी सिरफिरा वकील मीडिया में सुर्खियाँ प्राप्त करने के चक्कर में.. " यानि कि उसकी सँवैधानिक पात्रता और मोटिव दोनों ही उनके इस अदने से ज़ुमले रेखाँकित होते हैं । अगर सिरफ़िरे का साट्टिफ़ीकिट चाही, हमरे लगे पठाओ । हम सबको जब इसी समाज में एक साथ ही जीना है तो, वह भी मुहैय्या करवाया जायेगा । सिरफ़िरेज़ आर द हैपेनिंग थिंग । बँदरबाँट वालों को उनकी ज़रूरत रहती है

एक बार तरकश पर मेरे आलेख को किसी ने भद्दी से भद्दी टिप्पणियों से नवाज़ा था, दो दिन तक उसे माडरेट न होते देख सज्जन कुँठित हो उठे । रोमन में प्रारँभ हुये, इससे पहले कि, वह ग्रीक तक पहुँचते, मैंनें उन्हें ललकार दिया कि, मानहानि का दावा ठोंकि दे यार.. चाहे मैं जीतूँ या तू हारे.. वकील सहित तेरा हिस्सा पक्का ! ज़नाब मुकर गये यानि कि चुप मार गये । तब से मैं उनके पीछे लगा हूँ, बहुत अनुयय भी किया, " भाई साहब, प्लीज़ ... प्लीज़ मान भी जाओ, एक केस डाल दो..। " प्यारे मिरचीलाल जी, आप जहाँ कहीं भी हों, यदि यह पोस्ट पढ़ रहें हों, तो एक बार पुनः निवेदन है कि, कृपया एक मिसाल कायम करने में  मेरी सहायता करें ।

यदि अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता के नाम पर कुछ यथार्थ लिखा है, तो कुठाराघात को तैयार रहिये । अच्छी बुरी खरी खोटी पसँद नापसँद ही सही आपकी पोस्ट आपका मानसपुत्र है (  चलिये, कविताओं  को भी मानसपुत्रियाँ  मान लीजिये ) । थोड़ी आहट क्या हुई, इसे, अपने सृजित को, कुरूप  ही  सही, पर   अपने  ही  हाथों ( एक अदने से चूहे की मदद से ) ज़िबह कर दो । पोस्ट हटा लो, पुनर्लारवाचः भव,   पुनः लारवे के खोल में लौट जाओ,  यह क्या  है ?  फिर तो,  हिन्दी ब्लागिंग पँख पसार चुकी ? कर जोरि हम मिलि बैठि लारवा कैटरपिलर में विचरते रहें

यह परस्पर सौहार्द व आदर का  दोहन है, जो हर एक ईमानदार ब्लागर की मँशा पर प्रश्न उठाता है । अभी तो, यहाँ पर समय और श्रम के व्यर्थ ही दुरुपयोग की बात ही नहीं की जा रही है । नतीज़ा यह कि, हम जहाँ हैं वहीं पर घूमते रह जाते हैं.. मातृभाषा के आगे न बढ़ पाने में यह अस्वस्थता कितनी बाधक है, यह  तो अभी नहीं लिखूँगा । आप तो जानते ही हैं कि, अभी टैम नहीं है, शिवभाई !

ऊड़ी बाबा ! mouse_quiet_shh_sm_nwm

मात्र 8095 शब्दों की पोस्ट ? कुछ पता ही न चला । भँग की तरँग तो गुज़रे ज़माने की यादें हैं, यह ब्लागर की तरँग थी । कोई ज़रूरी नहीं कि, आप नेट पर उपलब्ध हर आम और ख़ास को पढ़ें, मुझे तो यह लिखना ही था । सो,यहाँ दर्ज़ कर दिया । बाकी आप जानो ।  वैसे दर्ज़ तो यह भी  होना  चाहिये   कि  परस्पर यह क्यों  याद  दिलाया  जाय  कि,

हममें  से  कोई  भी  इतना  शक्तिशाली  नहीं  है, जितना  कि  हमसब  एक  होकर  होंगे । हमारे सँसाधनों, सोच, व्यय  किये  गये  समय  एवँ  श्रम  की  पहचान  होनी  अभी  बाकी  है, तभी  आप हम  सुने  और  स्वीकारे  जायेंगे । नमस्ते भले ही आप हम निट्ठल्लों को कुछ नहीं समझते

इससे आगे

27 May 2009

नँगे सच में नहायी बहना

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देख भाया, मेरी गलती नहीं हैं । आजकल हाल है कि, ’ जाते थे जापान .. पहुँच गये चीन समझ लेना ’ तो पढ़ा ही होगा । अपनी प्रतिष्ठा के प्रतिकूल एक मिन्नी सी,  सौम्य.. लजायी हुई पोस्ट देकर अपने जीवित होने की गवाही देनी पड़ी । बताइये भला.. मेरी एक चिरसँचित इच्छा पूरी हुई,  दादा विनायक सेन रिहा हुये,  और  मैं  ब्लागर होकर  भी  अपनी खुशी की चीख-पुकार खुल कर न मचा सका । बिजली की आवाज़ाही, अफ़सरों का विदाई और स्वागत समारोह एटसेट्रा करीने से एक पोस्ट भी न लिखने दे रहा है !कुश जी,  अब तुम न कह देना, कि पहले ही कौन सा करीने से लिखा करते थे । मुझे यूँ छेड़ा ना करो, मैं ठहरा  रिटायर्ड नम्बर !

भूमिका इस करके बन रही है कि, आज बड़ी जोर की ठेलास लगी है.. और बुढ़ाई हुई बिजली नयी माशूका की तरियों कब दगा दे जाये कि अपुन कोई रिक्स लेने का नहीं ! लिहाज़ा, आज अपनी एक पुरानी वाली को ही ठेल-ठाल कर सँतोष किये लेते हैं,का करें ?

अप्रैल 2008, एक नया राष्ट्रीय मुद्दा उठा रहा, कि युवराज राहुल विदेशी साबुन से नहाते हैं : और समय का फेर देखो कि पट्ठा खुदै धूल फ़ाँक के सबैका धूल चटाय दिहिस । हमरी हिरोईन तिलक तलवार तराज़ू के तिपहिये पर दिल्ली कूच करते करते रह गयीं !

पहले तो यह बतायें कि इस पोस्ट का उचित शीर्षक क्या होना चाहिये था , नंगे सच की माया या  माया का नंगा सच ? जो भी हो, आपके दिये शीर्षक में एकठो नंगा अवश्य होना चाहिये, वरना आपको भी मज़ा नहीं आयेगा ! वैसे राजनीति पर कुछ कहने से मैं बचता हूँ । एक बार संविद वाले चौधरी के बहकावे में, मै ' अंग्रेज़ी हटाओ ' में कूद पड़ा था, अज़ब थ्रिल था, काले से साइनबोर्ड पोतने का ! लेकिन इस बात पर, मेरे बाबा ने अपने  इस चहेते पोते को धुन दिया था, पूरे समय उनके मुँह से इतना ही निकलता था, "भले खानदान के लड़के का बेट्चो ( किसी विशेष संबोधन का संक्षिप्त उच्चारण, जो तब मुझे मालूम भी न था ) पालिटिक्स  से  क्या मतलब ? " यह दूसरी बार पिटने का सौभाग्य था, पहली बार तो अपने नाम के पीछे लगे श्रीवास्तव जी  से पिंड छुड़ाने पर ( वह कहानी, फिर कभी ) तोड़ा गया था । खैर....

आज़ तो सुबह से माथा सनसना रहा है, लगा कि बिना एक पोस्ट  ठेले काम नहीं चलेगा, सो ज़ल्दी से फ़ारिग हो कर ( अपने काम से ) यहाँ पहुँच गया.. पोस्ट लिखने । पीछा करते हुये पंडिताइन  भी  आ  धमकीं, हाथ में छाछ का एक बड़ा गिलास ( मेरी दोपहर की खोराकी का लँच ! ) ,तनिक व्यंग से मुस्कुराईं, " फिर यहाँऽ ऽ , जहाँ कोई आता जाता नहीं ? " इनका मतबल शायद पाठक सँख्या  से  ही  रहा होगा । बेइज़्ज़त कर लो भाई, अब क्या ज़वाब दूँ मैं तुम्हारे सवाल का ? अब थोड़ी थोड़ी ब्लागर बेशर्मी मुझमें भी आती जारही है, पाठकों का अकाल है, तो हुआ करे ! ज़ब भगवान ने ब्लागर पैदा किया है, तो पाठक भी वही देगा , तुमसे मतलब ?  आज़ तो लिख ही लेने दो कि..

सुश्री मायावती, नेहरू गाँधी के बाथरूम में साबुन निहारती मिलीं, किस हाल में मिली होंगी  यह न पूछो ! कभी कभी यह पंडिताइन बहुत तल्ख़ हो जाती हैं,' जूता खाओगे, पागल आदमी !' और यहाँ से टल लीं । मुझको राहुल बेटवा या मायावती बहन से क्या लेना देना, लेकिन यह लोकतंत्र का तीसरा खंबा मायावती की मायावी माया में टेढ़ा हुआ जा रहा है, इसको थोड़ा अपनी औकात भर टेक तो लूँ, तुम जाओ अपना काम करो ।

मुझसे यानि एक आम आदमी से क्या मतलब, कि राहुल अपने घर में इंपीरियल लेदर से नहाते हैं या रेहू मट्टी से ? चलो हटाओ, बात ख़त्म करो, हमको इसी से क्या मतलब कि वह नहाते भी हैं या नहीं ? हुँह, खुशबूदार साबुन बनाम लोकतंत्र ! लोकतंत्र ? मुझे तो लोकतंत्र का मुरब्बा देख , वैसे भी मितली आती है, किंन्तु ... !

सुश्री मायावती का सार्वज़निक बयान कि " यह राजकुमार, दिल्ली लौटकर ख़सबूदार ( मायावती उच्चारण !! ) साबुन  से नहाता है ।" मेरी सहज़ बुद्धि तो यही कहती है, बिना राहुल के बाथरूम तक गये , ई सबुनवा की ख़सबू उनको कहाँ नसीब होय गयी ? अच्छा चलो, कम से कम उहौ तो राहुल से सीख लें कि दिन भर राजनीति के कीचड़ में लोटने के बाद, कउनो मनई खसबू से मन ताज़ा करत है, तो पब्लिकिया का ई सब बतावे से फ़ायदा  ? दलितन का तुमहू पटियाये लिहो, तो वहू कोसिस कर रहें हैं ! दलित कउन अहिं, हम तो आज़ तलक नही जाना । अगर उई इनके खोज मा घरै-घर डोल रहे है, तौ का बेज़ा है ?

माफ़ करना बहिन जी, चुनाव के बूचड़खाने में दलित तो वह खँस्सीं है, वह पाठा है, कि जो मौके पर गिरा ले जाय, उसी की चाँदी ! दोनों लोग बराबर से पत्ती, घास दिखाये रहो । जिसका ज़्यादा सब्ज़ होगा, ई दलित कैटेगरी का वोट तो उधर ही लपकेगा । ई साबुन-तेल तो आप अपने लिये सहेज कर रखो, आगे काम आयेगा । अब आप जानो कि  न जानि काहे..   चुनाव पर्व  के  नहान  के फलादेश पर बज्रपात कईसे हुई गवा .. रामा रामा ग़ज़ब हुई गवा .. चोप्प, मैं कहता कहती हूँ चौप्प ! चुप हो जाओ, चुप्पै से !

लो भाई, चुपाये गये.. अब तो राम का नाम लेना भी गुनाह हो गया । लोग  सँदिग्ध निगाह से  घूरते हैं, कि  अडवाणी  से अब भी सबक  नहीं ले रहे.. राम  का  नाम  बदनाम  करके  ऊहौ  कुँकुँआत  फिर  रहे  हैं,  फिर  तो  कोई  रावणै  इनका  भला  करी..  
करै दो यार,  भलाई  के  नाम  पर  कोई  तो कुछ  करे, भले  ही  वह प्रजापालक रावण होय ! सीताहरण तो अबहूँ होबै करी ..          जस नेता रहियें तौ सीताहरण होबै करी.. चुनविया का हुईहै अगन परिच्छा तौ धमक हुईबे करी…
एक कुँवारी-एक कुँवारा ! बेकार में, काहे को खुल्लमखुल्ला तकरार करती हो ? भले मोस्ट हैंडसम के गालों के गड्ढे में आप डूब उतरा रही हो, लेकिन पब्लिकिया को बख़्स दो । सीधे मतलब की बात पर आओ, हम यानि पब्लिक मदद को हाज़िर हैं ।  अब दुनिया  भर  का  ई साबुन - तौलिया वाला…  टिराँस्फ़र पोस्टिंग की नँगी माया .. काहे ?
सोनिया बुआ, उधर अलग बड़बड़ा रही हैं, " मेरा लउँडा होआ बैडनेम, नैस्सीबन तिरे लीये...ऽ ..ऽ

 

इससे आगे

18 May 2009

जीवनदास को कड़ी से कड़ी सजा दी जाये

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बड़े दिनों से यह “ चलता रहे.. चलता रहे.. “ देख व सुन रहा हूँ । यूँ तो मैं ’ निट्ठल्ला इफ़ेक्ट ’ से इतना पका हुआ हूँ कि, टेलीविज़न बहुत ही कम देखता हूँ । एक म्यान में दो तलवारें वैसे भी कहाँ रह पाती हैं ? अरे, निगोड़ी ब्लागिंग को शामिल न भी करें, तो भी आप यही समझ लीजिये कि “ बुद्धू को कहाँ बुद्धू बक्सो सों काम ? “ फिर भी.. कुछ तो है,  कि आज  एक बेकार सा मुद्दा पकड़ कर बैठा हूँ, कि  न्याय मिले 
                                                       पहले तो आप इन जीवनदास से मिलिये
         
मिल भये… क्या समझे ? अभी फ़िलवक़्त मुझे प्लाई-व्लाई तो लेनी नहीं है, सो मैं तो यही समझ रहा हूँ, कि भारतीय न्याय-वयवस्था इतनी धीमी और लचर है कि, “ चलता रहे… चलता रहे…. ! “ है कि, नहीं ?

इस मख़ौल की पराकाष्ठा तो यह है कि, ’ बैल से दँगा करवाने के ज़ुर्म में .. ’ जैसा आरोप और बैल को अदालत में तलब किये जाने की माँग, जैसा अदालत का बेहूदा कैरीकेचर खींचा गया है, सो तो अलग !

आदरणीय दिनेशराय द्विवेदी जी से आग्रह है कि, या तो वह जीवनदास को न सही, पर उसके आरोपी बैल को ही कड़ी से कड़ी सज़ा दिलवायें, और इस नाटक का पट्टाक्षेप करवाने का प्रयास तो कर ही लें !

मुआ ग्रीनवुड प्लाई न हो गया, राम-मँदिर का मुद्दा हो गया ! मुझे तो इसमें आख़िरी बार बोले जाने वाला ’ चलता रहे.. चलता रहे ’ में पिटे हुये अडवाणी की आवाज़ सुनायी दे रही है.. या यह  मेरा भ्रम है ?

इससे आगे

12 May 2009

अक्षरश:

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कई दिनों से ब्लागर पर सक्रिय नहीं हूं। इधर-उधर एक इक्का-दुक्का टिप्पणी ठोकी व " धन्यवाद  देने की आवश्यकता नहीं है " की औपचारिकता निभाते हुए नन्हा मन का टेम्पलेट तैयार कर दिया ।  अब क्या  करें ?   नये-नये इन्सटाल किये विन्डो – 7  के नयनाभिराम विशिष्टतायें व नयी सहूलियते संगाल रहा हूं । इधर दो दिनों से पूरी तैय्यारी से आ बैठता, कि 1857 के ग़दर की सालगिरह ( 10 और 11 मई )  पर पोस्ट लिखूँ  । पर ऎसा है न कि,  अभी हम अपने  शैशव को भरपूर जी तो लें..  फिर क्राँति व्राँति की बातें बाद में देखी  जायेगी । सो कोई भी पोस्ट लिखना ही टाल गया, क्या पता यह भी ’ बिस्मिल ’ की तरह उपेक्षित हो जायें, और कोई इन्हें भी " पीछा करो Follow Me का सँदेश डाल जाय, सो नहीं लिखा ।

1857-amar

आज की चिटठा चर्या देखी । अनूप जी की चर्चा अधिक सामयिक होती है । ग़ुँज़ाइश होने के बावज़ूद भी आज की चर्चा पर मैंने कोई टिप्पणी न दी, क्योंकि आज मेरे पास कोई अनूकूल लिंक ही न था । मुझमें साहित्यिक समझ हो न हो, ब्लागरीय समझ बिल्कुल नहीं है । लगातार एक के बाद एक फ़्लाप पोस्ट देने के बाद लगता है कि ज्ञान स्कूल आफ ब्लागर्स में प्रवेश लेना ही पड़ेगा । यदि ताउ फैकल्टी  के दिग्गज़ या प्रोफेसर  फुरसतिया  पढ़ाय देंय, तो बेड़ा पार समझो ! तब  शायद उपकुलपति  समीर लाल जी का दिया एक सार्टिफिकेट  इहां साइडबार में  चिपकाने को मिल सकेगा । यदि उसके बाद,  बात बन जाये तो कुलपति के रिक्त पद पर मैं स्वयं ही काबिज़ हो लूंगा । मेरे फतवे ब्लागर पर वेद वाक्य माने जायेंगे । तब मेरी लिखाई के अजदकायमान होने पर भी  लोगबाग अश अश कर उठेंगे । अप्रासंगिक स्वगत कथन में से तब हट जाया करेगा । अंग्रेजियत के नियमों के प्रति आदर भाव व हिन्दी वाले के आग्रह मात्र पर तू-तू   मैं-मै  होने की  व चर्चा पर लिंक देने के सुझाव पर कोई विचार कर सकेगा ।

mother-thr potrait poem चुनाँचें, माता पर एक पोस्ट लिखने का मन बना कर बैठा हूं । तो.. कम्प्यूटर जी पर अपनी निगाहें लाक किये हुए, मेरा मनन चल रहा है, कि मातृ, माता, मां, अम्मा जैसे किसी विषय पर एक पोस्ट लिखना है, जो मेरे मातृप्रेम की सनद रहेगा । पर,  कैसे लिखूंगा ? हम्म, क्या लिखा जाय... मेरा यह कलम सप्रयास  तो कविता की गहराई तक उतरने से रहा,   ठठेरी,  चितेरी, लुटेरी  जैसे काफिये भिड़ाये जाने  तक ही  बात नहीं है  । क्योंकि  मुझे तो भाई, यह ग्राह्य न हुआ कि समाज के एक नकारात्मक खल तत्व,  लुटेरे  से माता जी को नवाजने  की  नौबत तक कोई रचना दी जाय,  समीर जी क्षमा करें । फिर ?  फिर, एक लेख तैयार करें " मातृ दिवस पर समकालीन भारत के युवावर्ग का उफनता ज्वार ", शायद  यह ठीक रहेगा ? नहीं, यह ठीक न होगा, कोई अकेली डा0 वाचक्नवी  मेरी  पाठक थोड़े ही हैं ? फिर...बचपने के दिनों में घूम फिर कर माँ को ही गोहरा लिया  जाय ? लेकिन मेरा बचपन तो अभी गया ही नहीं है । फिर., एक मारात्मक प्रभाव वाली एक तिकड़मी इमेज लगा कर और माँ तुझे नमन का कैप्शन लगा कर ही इतिश्री कर ली जाय ? लेकिन यह स्वयं मुझे ही गवारा नहीं, तो भला आप क्यों बर्दाश्त करें ? की बोर्ड पर मेरी उंगली घिसाई जाया हो जाय, वह अलग !   इसी असमँजस में डूब  और उतरा रहा हूँ,   कि ?

 

amma-bachcha सहसा  आना... एक आवाज का, " ऎई तुम कुछ कर रहे हो क्याऽऽ ? "
मैं चुप रहा । भला  इन्हें क्या जवाब दें, यह तो पहले से ही पंडिताइन हैं ।
चुप रहने में भलाई हो या न हो, इस समय मुंह में बाबा श्री 120, कुमारी रजनी के संग कल्लोल  कर रहे हैं,   और   इनके एकाकार होते  जाने  का रस जैसे मन में घुलता सा  जा रहा है । यह  तुम क्या जानो..
इतने में दुबारा, “  ऐईऽऽ , ऎई तुम कुछ कर रहे हो क्याऽऽ ? " 
इस बार का संबोधन पंचम स्वर में आरोह के साथ सम पर स्थिर है !
इन्हें क्या जवाब दें ? प्लास्टर बंधे हाथ को देख कर भी कोई पूछे कि फ्रैक्चर हो गया क्या ? आप क्या कहेंगे....शौकिया बाँध रखा है, या घर में बासन मांजने से छुट्टी पाने का यही बेहतर जरिया बचा है, या ऐसा ही कुछ न ?    ऎंवेंईं जिज्ञासाओं के ऎंवेंईं समाधान.. का करियेगा ई अपुन का इन्डिया है !
सुनो तो.. तुमसे एक बात कहनी थी ! लो जी, बिना पूछे तो दस बातें सुना डालती है, आज अनुमति मांगने का कारण ? मन मेरा आशँकित हो गया । यदि हाँ बोलू, तो पंडितइनिया मारेगी, ना बोलूं तो भी पंडितइनिया ही मारेगी । बीच का रास्ता यदि कुछ है, तो क्या है ?
सो, कुछ न बोल अपनी गरदन एक विशेष कोण पर आगे पीछे कर अपनी मजबूर सहमति दे दी ।

वह बोलीं, " न हो तो, अम्मा को आगरा न छोड़ आओ ? " सदके जावाँ व्याकरणाचार्य, न पश्यन्ति प्रश्नम तदोपि न जानामि कथोपकथन ! यह प्रश्न है, या व्यक्तव्य है, याकि अपरोक्ष सुझाव है ? अहो, तो यह है, फ़्यूचर इनडिफ़ेनिट इन्ट्रोगेटिव सेन्टेन्स !    बहुत छकाये रहे हमका  पी सी रेन साहब के गिरामर ने । मैं  सचेत  होता हूँ, किन्तु  बाबा-रजनी  युगल को  मुख  से बहिस्खलन  करवाना ही पड़ेगा । उनके असमय बहिर्गमन से थोड़ी कोफ़्त होती है,  मुखारविन्द खाली करके उन्मुख होता हूँ, " क्यों भला ? "
इस बार निराधार चिन्ता की एक ज़ायज़ आतुरता थी
" ऎसे ही.. उनका, तुम्हारा, हम सबका कुछ बदलाव हो जाता । "
" छोड़ आओ बोले तो,आगरा छोड़ आओ, जँगल में छोड़ आओ, यानि कि कहीं भी, बस इन्हें छोड़ आओ
  रूँआसी हो उठीं, " बेकार बातें मत करो । मैंनें जँगल कब कहा, आगरा में चुन्नु भैय्या रहते हैं, उनके पास तीन चार महीने रह आतीं ।"
मैं असँयतली भी सँयत बना रहा, " यानि कि, मैं माता श्री को नगरी नगरी द्वारे द्वारे बाँटता फिरूँ ? "
" बात मत बढ़ाओ, नगरी नगरी द्वारे द्वारे बाँटने की क्या बात है ? वहाँ आगरा में तुम्महारा भाई रहता है । "
   इस बार खाँटी झनझनौआ अँदाज रहा, मैं भाँप गया, अब ऎसी तैसी होने वाली है ।
सो वन स्टेप बैकवार्ड होता भया । " अरे यार, मैंनें मना कब किया है, वह सहर्ष आकर ले जाये न ! "
" उनको तो फ़ुरसत ही नहीं है, एक फोन तक तो करते नहीं, कि अम्मा कैसी हैं ! "
उछल पड़ा  मैं, " बस यही तो बात है, माँ तो आग्रह से या हक़ जता कर, लड़ झगड़ कर हासिल की जाती है, और उन्हें समय नहीं है ! " एक असहज चुप्पी... मात्र सत्रह सेकेन्ड काटना असह्य हो गया,
मैंने निर्णय दिया, " अमर कुमार अम्मा को कहीं छोड़ने नहीं जा रहे ! "
वह कातर हो उठीं, " मैं तो तुम्हारे लिये कह रही हूँ । अभी मार्च में तो उनकी लैट्रीन तक तुमको साफ़ करनी पड़ी,  तुमको यह सब करते मुझसे नहीं देखा जाता । "
मैं अब बोर हो रहा हूँ, " क्यों,  क्यों नहीं देखा जाता ?
कभी उन्होंनें भी तो खाना पीना छोड़ कर मुझे साफ किया होगा, तब आपने क्यों नहीं देखा ? " 
अब शायद अश्रुप्रपात होने वाला है, क्योंकि इसके पहले का उनका रौद्र गर्जन आरँभ हो चुका है,
" ज्यादा बनो मत ! आख़िर कब तक यूँ रात रात भर जागते रहोगे,  कुछ अपनी भी सोचो ?   एक नर्स ही रख लो । " आह, यह तो स्वयँ ही मुझे कोमल स्थल पर ले आयीं, " अच्छा जी.. मैं अपनी सोचूँ ? तुमने अपनी सोचा था जब जाड़ों की रात में उठ कर बाबू और मुनमुन को दूध गर्म करके देती थीं ।
उनका गीला बिस्तर बदलती थीं ! तब क्यों न कहा कि एक दाई रख दो । "  Amma-11.5.09 तीर निशाने पर पड़ा, क्योंकि अब किंचित इतराहट थी, " वह तो मेरा कर्तव्य था । " 
अब लगे हाथ एक और पातालभेदी बाण चला तो दे, अमर बाबू !
" तो यह भी तो मेरा कर्तव्य है । इन्होंने भी तो माघ पूस में मेरे लिये यही सब तो किया होगा ! तब तो बिजली भी न थी,  कि फट्ट रोशनी हो गयी, और बुरादे की चिमनी खास तौर पर गर्म  रखना  पड़ता था वह  अलग । " सुबह छः बजे उठ कर कोयलें की धुँआती अँगीठी भरना तो  सोच भी न सकतीं हैं ।

न तुम मानो ना हम.. ई लेयो, चलो कुट्टी हो गयी ! अपनी तो दो तीन दिनाँ की छुट्टी हो गयी । लेकिन ना, वह ज़नानी ही क्या, जो अपने मियाँ को चैन के चार दिन नसीब होने दे ? इस समय रात्रि के ग्यारह बज कर छियानबे मिनट हुये हैं,  यानि  कि घड़ी में  तीन का  समकोण बनने  में अभी  दो घँटे  से  कुछ ज्यादा ही मिनट शेष है । यह बिस्तरा-कक्ष से प्रकटती हैं, झाँकने की नौबत ही नहीं, अम्मा की तस्वीर दूर से ही चमक रही  है । " यह क्या…  मदर्स डे पर अब लिख रहे हो, बुद्धू कहीं के ? समीर लाला ठीक ही कहते हैं, रहे तुम वही के वही ..
अमाँ यार, यह सब लटका मैं नहीं जानता । सबै भूमि गोपाल की.. हमरे लिये तो सभी दिन हेन तेन लालटेन डे है । वह कौतुक से हँस पड़ती हैं, "  वाह,  लालटेन डे ! " मुझे आगे बढ़ने का हौसला मिलता है, " और क्या ? जरा तुम ही बताओ, आज बरसात हुयी है, मौसम बड़ा अच्छा हो रहा है । कम्प्यूटर स्क्रीन से छन कर आती रोशनी में तुम भी अच्छी लग रही हो.. अब कहो तो, अमर कुमार बईठ के फ़रवरी वाले वैलेन्टाइन बाबा की राह जोहें ? इसपर इनकी सारी विद्वता धरी रह गयी, कुछ कन्फ़्यूज़ हो गयीं, " हाँ, बात तो तुम सही कह रहे हो.. " और..   और..   और क्या ?   और हममें फिर से मिल्ली हो गयी ।

सब ठीक ठाक हो गया, हम सुख से रहने लगे ।
अम्मा भी जी रही हैं, बस जिये जा रहीं हैं,   कुछ  अनमनी सी !

 

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07 May 2009

अप्रासँगिक स्वगत कथन

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सुबह सुबह अख़बार पढ़ दिन ख़राब करने से बेहतर लत है, चिट्ठाचर्चा !
आदत के मुताबिक आज भी पलटाया तो .. 

" उपस्थित श्रीमान /  मैडम  साथ एक बेहतरीन लिंक लेकर अनूप जी को पाता हूँ, ”

जो कि स्वयँ में चर्चाकार का ही टैगलाइन है, और बहुत अच्छा है 

बड़ा भला लग रहा है, चुहल सूझ रही है..कि
एक पोस्ट लिखूँ, " आओ सखि, लिंक मिलि बाँटैं "
कौन जानता है, कब समय मिल पाय...
अभी ही लिख लेता.. लेकिन सिंह साहब की पत्नी नीरू किसी काम से पँडिताइन से मिलने आयीं हैं,
और जम कर बैठ गयीं, क्योंकि उनके पास टैम नहीं है  (यदि  होता.. तो शायद एक अदद बिस्तर और डोलची के संग पधारतीं ! ) अपना प्रिय विषय ’ रिशि का अँग्रेज़ी स्कूल ’ पर सराहना भरे अँदाज में बिसूर रहीं हैं .." देखिये न भाभी .. इत्ती गर्मी में सभी स्कूल बंद हैं, इनलोगों ने बँद न किया,
और तो और, ज़ूते साफ़ नहीं थे, तो आज स्कूल से लौटा भी दिया ! "
पँडिताइन की टिप्पणी भी सुन लीजिये, " सही बात है..
डिसिप्लिन तो होना चाहिये, न ?  भला कब तक  बच्चे बने रहेंगे ?
अँग्रेज़ी स्कूल है, कोई मज़ाक बात थोड़े है ? "
मेरा मन कर रहा, मैं इन ज़नानियों के बीच टपक पड़ूँ..
मुझे भी तो मऊ नाथ भँजन वाले स्कूल में बैठने के लिये अपने संग टाट-पट्टी ले जानी होती थी ! "
पर, दोपहर के बारह बजने को हैं । मुझे भी क्लिनिक जाने की देर हो रही है,
अपने मरीज़ों की मैंने इसी समय की आदत डाल रखी है ! "

 

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03 May 2009

एक एक्कनम एक, दो दूनी चार, तीन तियाँ नौ.. ..

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ई लेयो, दुनिया चैन से रहने भी न दे.. और पूछे ’ बेचैन क्यों रहते हो ? "
हम पहले ही ब्लागर से मोहोबत करके सनम.. रोते भी रहे.. हँसते भी रहे गुनगुनाय रहे थे, कि आजु एकु मोहतरमा हमसे पूछि बैठीं, " क्षमा करें डाक्साब, आप काहे के डाक्टर हैं ? "

अब जानवरों के डाक्टर होते तो अपने प्रिय ब्लागर भाईयों के लिये क्यों लिखते ? हम भी किसी चुनावी जनसभा में भाड़े की जुटी भीड़ में शामिल मिमिया रहे पब्लिक से मुख़ातिब होते, या अपनी पढ़ाई-लिखाई का भरपूर दुरुपयोग करते हुये कहीं चैनल-नवीसी कर रहे होते ! और कुछ नहीं तो.. ’ नखलऊ लायब्रेरी  में लोकसाहित्य की अनुपब्धता ’ पर एक्ठो शोध का जुगाड़ करके मेहता अँकल के गाइडेन्स में एक दूसरे किसिम की डाक्टरी का जुगाड़ बना लेते ! और..  अब तक हिन्दी जी के बीमार दिल में कई प्राकृत , अपभ्रँश इत्यादि के शब्दों का प्रत्यारोपण भी कर चुके होते ?   पर,  हाय री फूटी किस्मत.. इतनी घिसाई के बाद एक अदद ’ पब्लिक प्रापर्टी डाक्टर ’ बनना ही नसीब में रहा, सो होय गये !

इत्तेफ़ाक़ से.. चढ़ती उमिर में एक बुरी सँगत होय गयी । पँडिताइन के शासनकाल के बहुत पहले की बात है,  लेकिन वुई भी एक ठँई ज़नानिये रहीं.. यानि कि वह कोमल भावनायें  अउर मैं फूटी कौड़ी  भी नहीं !
फिर भी रँग था, कि जम ही गया ! तब यह ’ खूब जमेगा रँग ’ वाला विज्ञापन नहीं चला था.. सो हम साहित्य-वर्चा  करके ही मदहोश हो लिया करते थे ! ग़र मदहोश हो बैठे, तो कुछ लिखने-ऊखने का गुनाह भी त होबे करेगा, एक किताब मयखाना नाम से पढ़ा तो था .. पर, मयखाना होता कहाँ है, यही न जानता था  ! थोड़ा बहुत सुलेखा रोशनाई खरच करके हल्के हो लेते थे । मत याद दिलाओ, वह सब !

दिन भर की मगज़मारी के बाद ज़ीमेल खोला, . 384 अनपढ़े मेल ( ये अपुण का इनबाक्स है, भिडु ! अक्खा यूनिवर्स अपुण का भेज़ाफ़्राई करनाइच माँगता ) साहस ज़वाब दे इससे पहले ही देवनागरी फ़ान्ट वाले सभी मेल खोलकर अपने कच्चे-पक्के ढंग से बाँच मारे, कुछ का उत्तर भी दे दिया । आगे एक मेल और देखा , बड़े नाज़ुक अँदाज से पूछा गया है, " आप काहे के डाक्टर हैं ? "

उनके शब्दों की सौजन्यता, मानों कह रहीं हों, "  ग़ुस्ताख़ी माफ़ ! चेहरे पर झुकी ज़ुल्फ़ें हटा दूँ तो...... "
मैडम जी, बहुत देर हो चुकी है, अब वोह चेहरा.. वोह ज़ुल्फ़ें.. सब बीते लम्हों में कैद हैं !
अब क्या ज़वाब दूँ, मैं तुम्हारे सवाल का ?

एक दफ़ा यही सवाल , यही सवाल ’ चिट्ठाकार ’ से भी फेंका गया था । मैंने किसी तरह इसको गली में सेफ़ ड्राइव करके, अपने को आउट होने से बचाया ! जी हाँ, मैडम जी.. हमरा दिमाग हर बेतुकेपन पर  आउट होने वाला लाइलाज़ ट्यूमर पाले है ! हालाँकि, समीर भाई आश्वासन दे गये हैं, कि वह कनाडा जाते ही जल्द ब जल्द मुझे इलाज़ के लिये बुलावेंगे ! अब देखो, उनके आश्वासन का क्या होता है ? सुना है, वह राजनीति में भी कभी सक्रिय रहे हैं । यह और बात है, कि तब  उनके घाघ साथियों ने आपके टँकी चढ़ते ही सीढ़ी गायब कर दी ! उतरने के प्रयास में लेखन की डाल पर अटक कर रह गये ।

पर्याप्त मनोरँजन हो चुका हो, तो फिर अपने पुराने पहाड़े पर आया जाय , या टाला जाय । अब तो मैं भी वरिष्ठ में घुस सकता हूँ । सो, चुप मार लिया जाय ? अब क्या ज़वाब दूँ, मैं तुम्हारे सवाल का ?

या फिर, मेहरबान कद्रदानों की तरफ़ टिप्पणी बक्से की चौकोर टोपी घुमा कर, क्रमशः लिख, इसे कभी न पूरा करने को यहाँ से सरक लिया जाय ?  वैसे भी आजकल मेरा ’वृहद-पोस्ट लेखन कलँकोद्धार व्रत ’  चल रहा है !  अपना सेहरा स्वयं ही पढ़ना तो शोभा न देगा, सो सकल प्रोटोकाल,  शिष्टाचार तज एक पोस्ट में मामला आज लगे हाथ यहीं सलटा दिया जाय ?

उत्सुकता एकदम ज़ेनुईन है, बहुतेरे डाक्टर घूम रहे हैं । ज़रूरी नहीं कि शोध करके ही Ph.D. शोधा हो, मानद भी तो बाँटी जा रही है । कई रंगबाज तो अपने को ऎसे ही डाक्टर लगाते हैं और लगभग ज़बरन आपसे मनवाते भी हैं । कच्छे से लेकर लंगोटावस्था तक आपने उनको गर्ल्स कालेज़ के इर्द गिर्द ही पाया होगा , फिर अचानक ही उनके नेमप्लेट पर एक अदद डाक्टर साहब नाम बन के टँगे दिखने लग पड़ते हैं,  डा.  हुक्का, ए. ट. पो. री. ( हि. ब्ला.)  ,  क्या करियेगा ? ये अपुण का इंडिया है, भिडु ! आपका मेरे ' कुछ ' होने पर संदेह नाज़ायज़ नहीं है । होना भी नहीं चाहिये,  माहौल ही ऎसा है !

एक एक्कनम एक
reply-to  dramar21071@yahoo.com
to Chithakar@googlegroups.com
date 6 Feb 2008 01:02
subject  Re: [Chitthakar] Re: याहू पर माईक्रोसॉफ्ट की बोली
mailed-by gmail.com

प्रिय बंधु,
ब्लागीर अभिवादन
विदित हो कि मैं डाक्टर अमर कुमार एततद्वारा घोषित करता हूँ कि मैं
पेशे से कायचिकित्सक बोले तो फ़िज़िशीयन हूँ
,अतः मेरी भाषा या लेखन की
त्रुटियों पर कत्तई ध्यान न दिया जाय । ईश्वर प्रदत्त आयू में से 55 बसंत को
पतझड़ में बदलने के पश्चात अनायास ही हिंदी माता के सेवा के बहाने से
कुछेक टुटपुँजिया ब्लागिंग कर रहा हूँ । वैसे युवावस्था की हरियाली में ही
हिंदी, अंग्रेज़ी,बाँगला साहित्य के खर पतवार चरने की लत लग गयी थी ,
और अब तो लतिहरों में पंजीकरण भी हो गया है ।
गुस्ताख़ी माफ़ हो तो अर्ज़ करूँ... इन उत्सुक्ताओं को देख मुझे दर-उत्सुक्ता
हो रही है कि आपकी उत्सुक्ता के पीछे कौन सी उत्सुक्ता है ? मेरी हाज़त
का खुलासा हो जाय, वरना कायम चूर्ण जैसी किसी उत्पाद के शरणागत
होना पड़ेगा । आगे जैसी आपकी मर्ज़ी..
सादर - अमर

ज़ाहिर है कि उपरोक्त रिप्रोडक्शन से व्यक्तिगत प्राइवेसी का हनन हो रहा है ,तो विवाद भी उठेंगे । उचित अनुचित पर सिर धुने जायेंगे । पर सनद तो सनद ही रहेगा ... यह इंटरनेट भी झक्कास चीज है भिडु , जो लिख दिया सो लिख दिया, दीमक के चाटने का लोचाईच नहीं इधर को !  बड़े बड़े को फँसायला है, बाप.. सोच के लिखने का इधुर को !
दो में लगा भागा
तो सज्जन और ….?, ( सज्जन का स्त्रीलिंग ? मेरे को नईं मालूम, नाहर साहब से पूछो ! )    
अमिं जी०एस०वी०एम० मेडिकल कालेज, कानपुर से चिकित्सा स्नातक इत्यादि इत्यादि हूँ, और सम्प्रति राहू सरीखा हिंदी ब्लागिंग से बरसने वाला अमृत चखने आप देव व देवियों की पंगत में चुपके से  आय  के ठँस गया हूँ । महादशा का अँदेशा तज दें, और इससे ज्यादा और कुछ भी तो नहीं
चोर निकल के भागा
अब यहाँ से फूट रहा हूँ,  आप इस राहू के शान्ति का आयोजन करें । नमस्कार !
us-thy outline
पर, सुराग क्या मिला भला ?
सुराग़ पुख़्ता या ख़स्ता जो भी मिला हो, पँडिताइन जाँच समिति ने 24 वर्षों बाद आज रिपोर्ट दी है.
कि मैं कड़वी दवाई-दारू वाला घिसा हुआ असली टाइटलर  हूँ ।
ओह,  लगता है सारथी जी  से स्लिप आफ़ माँइड , स्लिप होकर यहाँ  भी हिन्दी की निगरानी करने  आ पहुँचा है ! हाँ तो , मैं  अँग्रेज़ी  दवाई  वाला असली डाक्टर हूँ ! अँग्रेज़ी में दवाई लिखता हूँ, फिर  मुई  इसी  अँग्रेज़ी से गद्दारी  कर  के हिन्दी में बिलाग लिखता हूँ !
अलबत्ता कोई दलबदलू नेता नहीं हूँ !
अपने डाक्टर होने का हवाला देने में,  व्यक्तिगत मेल बिना इज़ाज़त सार्वजनिक कर दिये, तो क्षमा किया जाय । वैसे भी मैं आप सब की दया का पात्र हूँ । बड़ी बदतर हालत है मेरी,   न घर का - न घाट का ! मेरे मरीज़ भी सहज कहाँ विश्वास करते हैं कि मैं नुस्ख़े के अलावा कुछ और भी लिखने की अक्लियत रख सकता  हूँ !   जय हिन्द !

अनूप भाई पूछिन हैं,  कि पिछली पोस्ट कित्ते बजे लिखी गयी है !  वहू वतावेंगे गुरु, जरा  टैम तो मिले ? ब्लागजगत का फ़ुरसत तो आप हथियाये बैठे हो । ’ अथ तीन बजे रहस्यकम ’ जो केवल कुश जानते हैं, आप सब पब्लिक को कब लीक किया जाय ?  डेढ़ – दो  सौ  ग्राम  फ़ुरसत  कभी  इधर  भी  वाया  उन्नाव ट्राँस्फ़र करो न ? वहू बतावेंगे !  दुबारा से, जय हिन्द !

 

इससे आगे
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यह अपना हिन्दी ब्लागजगत, जहाँ थोड़ा बहुत आपसी विवाद चलता ही है, बुद्धिजीवियों का वैचारिक मतभेद !

शुक्र है कि, सैद्धान्तिक सहमति अविष्कृत हो जाते हैं, और यह ज़्यादा नहीं टिकता, छोड़िये यह सब, आगे बढ़ते रहिये !

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