जो इन्सानों पर गुज़रती है ज़िन्दगी के इन्तिख़ाबों में / पढ़ पाने की कोशिश जो नहीं लिक्खा चँद किताबों में / दर्ज़ हुआ करें अल्फ़ाज़ इन पन्नों पर खौफ़नाक सही / इन शातिर फ़रेब के रवायतों का  बोलबाला सही / आओ, चले चलो जहाँ तक रोशनी मालूम होती है ! चलो, चले चलो जहाँ तक..

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22 July 2009

पता नहीं क्यों ?

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लगता है, आजकल मैं निष्क्रीय हूँ... पूरी तौर पर तो नहीं, कम ब कम ब्लागर पर निष्क्रीय तो हूँ ही.. पता नहीं क्यों ? इस पता नहीं क्यों का ज़वाब तलब करियेगा, तो टके भाव वह भी यही होगा कि, " पता नहीं क्यों ? " यह पता नहीं क्यों हमेशा एक नामालूम सी कशिश भी लिये रहता है, लगता है कि कहीं कोई जड़ता मुझे जकड़ रही है, जकड़ती जा रही है.. पर आप हैं कि, अपने पर हज़ार लानतें भेजते हुये भी, खामोशी से इस निष्क्रियता को समर्पित रहते हैं, पता नहीं क्यों ? मुआ पता नहीं क्यों न हुआ कि इब्तिदा ए इश्क हो गया । है न अनुराग ?

Letter-
अबे पहले तय कर ले, ब्लाग लिखने आया है कि साहित्य रचने ? " यह कोई और नहीं, अपने निट्ठल्ले सनम जी हैं, अँतर से ललकार रहे हैं । कनपुरिया प्रवास के बाद साढ़े तीन दशक से साथ लगे हैं । जब तब मुझे ललकार कर चुप बैठ जाते हैं, गोया पँगे करवाना और उसमें मौज़ लेना ही इनका शगल हो । इनको डपट देता हूँ, ऒऎ खोत्या वेखदा नीं कि असीं लिख रैयाँ, बस्स ।

माफ़ करना मित्रों, यह इसी टाइप की भाषा समझते हैं, आप तो जानते ही हैं कि, फ़ैशन की तरह ही ब्लागिंग और ब्लागर की तरह फ़ैशन कितनी तेजी से बढ़ रहे हैं ? नित नये प्रयोग !

सो ब्लागिंग के इस दौर में साहित्य की गारँटी ना बाबा ना ! मौज़ूदा दौर तो जैसे गुज़रे ज़माने का बेल बाटम है.. कल यह रहे ना रहे.. पर हम तो रहेंगे, और.. जब रहेंगे तो कुछ ओढ़ेंगे बिछायेंगे भी ! आने वाला कल साहित्य का कोई धोबी जिसकी भी तकिया चादर गिन ले, उसकी मर्ज़ी ! जैसे यहाँ लाबीइँग में वक्त जाया कर रहे हैं, समय आने पर वहाँ सार्थक कर लेंगे ।

अभी से लाइन में लगने की भगदड़ काहे ? चोट-फाट लग जाये तो इससे भी जाते रहोगे । लाइन में लगने की क्या जल्दी थी.. जवाब मिलेगा, " पता नहीं क्यों ? इधर कोई ग्राहक नहीं आ रहा था, तो सोचा खाली बैठने से अच्छा कि अपना ही बँटखरा तौलवा लें, कहीं बाँट में ही तो बट्टा नहीं ?.. ससुर उहाँ भी लाइन लगी थी, घुसे नहीं पाये इत्ती भीड़ रही, पता नहीं क्यों ? “

निट्ठल्ला उवाच : कोई यह न कह दे, " पता नहीं क्यों, ई उलूकावतार इत्ती रतिया में का अलाय बलाय बकवाद टिपटिपाय गये ? याकि ससुर छायावाद की मवाद ठेल गये .. सीधे सुर्रा मूड़े के उप्पर से निकर गवा ! "

तो भईया ई डिस्क्लेमर-वाद है, अर्थ और ही और ! चित्त गिरो या पट्ट.. बाई आर्डर दुईनों एलाउड !

निट्ठल्ला उवाच : इसका भेद हम बताता हूँ, यह कँट्रोल पैनल के पुराने पोस्ट खँगाल रहा था.. इतने दिमागदार नहीं हैं, सो एक घँटे बाद से ही इनका सिर भारी होने लगा और एक घँटा पच्चीस मिनट बाद समझदानी के आउटर पर इँज़नवाँ फ़ेल ! " फिर भेजा इनको कि जायके आज की चिट्ठाचर्चा पढ़ा, सो गये बिचरऊ । बढ़िया है.. विवेक बाबू, बढ़िया है.. बोलि के लौट आये । टिप्पणी न दी, ज़रूरी भी न रहा होगा । कल बछड़ों के दाँत गिनना है, यही सब बतियाते भये खाना खाइन । "

आम खाओगे ? " पँडिताइन जी पूछिन.. " नहीं ! " मुला मुँह से बोले नहीं, मूड़ हिलाय दिहिन, बड़बड़ लगाय रहे आम खाऊँगा तो गुठलियाँ भी देखनी पड़ेंगी । पेड़ कौन गिनेगा, पर गुठली ?

मेरा प्रतिवाद : " चुप्पबे, खुद मेरा ही मन न था... आम जो है.. वह एक मीठा फल होता है ! "

अब ? कुछ ही पन्ने बच रहे थे.. सो, नँदीग्राम डायरी लेकर बैठा और दो सफ़े बाद ही कुछ लाइनें ऎसी मिली कि, अपने आपसे घृणा के प्रयोग करने लग पड़ा । आपको भी बताऊँ ?

लेकिन पहले श्री पुष्पराज जी से क्षमा माँग लूँ । क्योंकि मैं उनकी लिखी कुछ ही लाइनें शब्दालोप के साथ उद्धरित कर रहा हूँ .. " हमें नई बात समझ में आयी कि, जो (............) कहलाने के प्रचार से घृणा नहीं करते थे, वे ही (........ ) होने के प्रचार से आपसे घृणा कर रहे हैं । घृणा की यह चेतना जब ख़त्म हो जायेगी कौन किसके क्या होने से दुःखी होगा ? हम उनके कृत्तज्ञ हैं, जो हमारी चूकों पर नज़र रखते हैं और तत्काल घृणा करना भी जानते हैं । आपकी घृणा ने ही हमें शनैः शनैः इंसानियत की तमीज़ सिखायी है ! "

निट्ठल्ला : आप ई सब काहे लिख रहे हैं, जी ?

भईय्या, भाई जी, मेरे दद्दू.. अपनी सुविधानुसार, आप ही रिक्त स्थानों में ब्लागर और साहित्यकार भर कर देखो न । जो निष्कर्ष निकासो, तनि हमहूँ का बताओ । इतने दिमागदार नहीं हैं, सो इत्ती टिपटिपाई में ही मूड़ भारी हुई रहा है । तो अपुन चलें ? घृणा के साथ मेरे प्रयोग अभी कुछ बाकी रह गये है, फ़िलवक्त तो आप हमें निष्क्रीय ही समझो ।
" पावस देखि ’रहीम’ मन कोयल साधे मौन ।
जित दादुर वक्ता भये इनको पूछत कौन ॥ "

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08 July 2009

जिन्दगी की रेल कोई पास कोई फेल

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आज अभी चँद मिनटों पहले एक पोस्ट पढ़ी.. निठल्ले , सठेल्ले और ............ठल्ले :)

उब दिनों एक गाना सुना करता था, उसे अपने हिसाब से तोड़ मरोड़ भी लिया ( अभी  ईस्वामी  की टिप्पणी के बाद यह अँश जोड़ा है.. धन्यवाद स्वामी ! )

तो एक गाना सुना करता था.. " जिन्दगी की रेल कोई पास फेल.. अनाड़ी है कोई खिलाड़ी है कोई " बस इसी को पकड़ लिया, " रेल जब हुईहै, तौनि डब्बवा भी हुईबे करि... डब्बवा मा जब हुईहैं जगह तो सवारिन केरि लदबे करी… , सवारिन केरि लदबे करीऽऽ भईया सवारिन केरि लदबे करीऽऽ "

बस इसी को पकड़ लिया, इसके दर्शन को आत्मसात कर लिया.. लगे हुये डिब्बों को परखा, फ़र्स्ट किलास.. सेकेन्ड किलास, जनता, पैसेन्ज़र,  बाटिकट सवारी, बेटिकट सवारी, इस भीड़ में धँसे ज़ेबकतरे, डिब्बे के हाकिम भ्रष्ट टी. टी. वगैरह वगैरह !

बस हर डिब्बे के माहौल को बारी बारी से अपने जीवन का हिस्सा देता हूँ, अउर कौन ससुर ईहाँ से कछु ले जाय का है, यहीं जियो और यहीं छोड़ जाओ ।
आज तक कोई सवारी अपनी यात्रा खत्म होने के बाद… .. डिब्बवा खींच के अपने साथ न ले जा सका है । जउन लेय गवा होय तो बताओ !

तो पार्टनर अपनी चाट में अकड़ लचक बकैत विनम्र भदेस अभिजात्य सबै मसाला की गुँज़ाइश रहती है ! फ़ारसी पढ़वावा चाहोगे तो पढ़ देंगे.. और तेल बिकवाना चाहोगे तो वहू बेच देंगे ।anibl

लेकिन ये न होगा कि अमर कुमार जब डाक्टर साहब बन कर जियें तो ब्लागर प्रेमी अमर कुमार  उनका सतावै और जब डाक्टर जी को जीना न चाहें, तो डाक्टर साहब ज़बरई अमर कुमार में प्रविष्ट हो जायें ! इसी तरह अमर कुमार अपने को जीवित रख पायेंगे ! कुछ लोगों को देखता हूँ, वह अपने पद या अफ़सरी को इस तरह आत्मसात कर लेते हैं, कि  यही  अफ़सरी  उनके  अपने ही स्व  को  उभरने  ही नहीं देती , फिर  वह  दूसरों को  मस्त  देख  बिलबिलाते  हैं ।

जीवन में वेदाँत और वेद प्रकाश कम्बोज दोनों आवश्यक है, कुछ भी त्याज्य नहीं है ! ज़रूरत उसके एक निश्चित मिकदार को समाहित करने भर की हुआ करती है । अउर आपन पोस्ट हम निट्ठल्लन को डेडिकेट न किया करो, ग़र दिमाग ख़राब हो जाय तो फिर न कहना कि... बईला गवा है, बईलान है !

लेकिन आपौ जउन है कि तौन एकु राबचिक फँडे का अँडा लाके इहाँ  झक्कास राखि दिहौ …वा वा वाऽ वाह ! बड़ा सक्रिय चिंतन बड़े निष्क्रीय निर्विकार भाव से प्रस्तुत किया भाई !
मुला हँइच के दिहौ ब्लागरन का !
मेरी यह पोस्ट एक तरह से आपकी पोस्ट पर टिप्पणी है !

अगर अबहूँ समझ मा नाहिं आवा तो, ई सुनि लेयो..

 

 

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05 July 2009

हाँ, बात डाक्टर्स डे की हो रही है

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यह है जुलाई का महीना, और  इस महीने की पहली तारीख़ हम डाक्टरों के लिये एक ख़ास मायने  रखती है । इन  पँक्तियों के लेखक को  विश्वास है कि, आप में से  अधिकाँश  कुछ कुछ  ठीक पकड़ रहे हैं । यदि ऎसा है तो, आप इन्टेलिज़ेन्ट कहे जा सकते हैं । हाँ, बात डाक्टर्स डे की हो रही है ।

यदि इस सेवा को जनता मानवतासेवा के रूप में देखना प्रारँभ करती है, तो  इस  दिवस  पर  डाक्टरों द्वारा निःशुल्क जनसेवा का विचार सराहनीय ही नहीं बल्कि अपेक्षित है । मेरे गृहनगर रायबरेली  में यह  प्रतीक्षित  दिवस  त्रयदिवसीय  स्वास्थ्य  मेले  के  उपराँत  आज  की  सुविधाजनक  तिथि  पर  ( यानि 4 जुलाई को ) मनाया  जा रहा है । हाँ, बात डाक्टर्स डे की हो रही है ।

’ इण्डिया दैट इज़  भारत ’ में इसे डाक्टर स्व० बिधानचन्द्र राय जन्मदिवस पर एक जुलाई को मनाया जाता है । सँयोगवश यह तिथि उनकी निर्वाण-दिवस भी है । सो,  इस  दिन  डाक्टर्स डे  मनाया जाता है । मनाया क्या जाता है, हम  स्वयँ  ही  मना मुनू  लेते हैं । हर वर्ष स्थानीय स्तर पर आई० एम० ए० की शाखा एक वरिष्ठ चिकित्सक को खड़ा कर सम्मानित भी कर देता है । भाषण देने वाले माइक पकड़ लेते हैं, और बाकीजन अपने मित्रों द्वारा उनकी स्वयँ की प्रशस्ति सुनते हुये भोज खाने में व्यस्त हो जाते हैं,  फिर गुडनाइट वगैरह भी होता है । हाँ, बात डाक्टर्स डे की हो रही है ।

तत्पश्चात सब अपने अपने घर चले जाते हैं । कुछ लोग गुडनाइट से पहले ही वुडनाइट हो जाते हैं, इतने  जड़ और मदहोश  कि  उनको अपने घर  भिजवाना  पड़ता  है । एक दो दिन  तक सम्मानित होने वाले की ईर्ष्यात्मक प्रसँशा की जाती है, उनकी  अनुसँशा  करने  वाले  की भर्त्सना की जाती है, फिर  अगले  वर्ष  तक  के  लिये  सब  ठीक ठाक हो जाता है । हाँ, बात डाक्टर्स डे की हो रही है ।

सबके  सब  डाक्टर  एक  दूसरे  से  बेख़बर  अपने  अपने  काम  में  लग  जाते  हैं, एकता  की  यह अनोखी मिसाल अन्यन्त्र कहीं देखने  में  कम  ही आती है । हाँ, बात डाक्टर्स डे की हो रही है ।

उल्लेखनीय है कि,अपने उत्सव मनाने में हम कितने स्वालम्बी हैं, इस तथ्य की अनदेखी कर मोहल्ला सभासद, अपने भारतविख़्यात शायर ’ बेहिसाब कस्बाई जी,’ और उभार  लेती  हुई  इन्डियन  आइडल प्रतियोगी वगैरह अपना सम्मान वा अभिनँदन समारोह मनाने के लिये नाहक ही प्रचार पाते रहे है ।

सामान्य जन द्वारा ऎसी डाक्टरी घटनाओं ( पढ़ें, महत्वपूर्ण अवसरों ) के  प्रति  उदासीनता  निश्चय  ही निन्दनीय है । अवश्य ही हम शर्म करो दिवस या हाहाकार दिवस जैसा कोई आयोजन नहीं कर पाते, पर इस उदासीनता की निन्दा की जानी चाहिये । हम  मानवतासेवी  तो  अभी  तक  ठीक  से  निन्दा  भी  नहीं  कर  पाते । हाँ, बात डाक्टर्स डे की हो रही है ।

हर व्यावसायिक सेवा में किन्हीं प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष कारणों से एक ख़ास वर्ग असँतुष्ट रहा करता है, यह लघु प्रतिशत यहाँ भी उपस्थित है । वैसे मैंने तो लगा रखा है "प्रवेश पूर्व कृपया यह सुनिश्चित कर लें  कि, आप रोगी  हैं  या  जनता का हक  मारने वाले समाजसेवी, लोभी पत्रकार या दँभी अफ़सर ? " पर मीडिया द्वारा केवल इन्हीं को इस तरह प्रचारित किया जाता है, जैसे मानव सेवा के नाम पर चल रहे इस पेशे में चहुँ ओर दानव ही व्याप्त हों ! सच तो यह है कि, जीवन अमूल्य है का मानवीय मूल्य केवल यहीं जीवित है ।

बहुतेरे सुधी पाठक न जानते होंगे कि, यह दिन अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर डाक्टर्स डे के रूप में नहीं जाना जाता है । यह भारतीय डाक्टरों के लिये चुना गया एक अखिल भारतीय दिवस है । ई० सन 1933 में डा० चा अलमान्ड की विधवा यूडोरा ब्राउन अलमान्ड को ख्याल आया कि 30 मार्च 1842 को ही उनके स्वर्गीय पति ने जनरल एनेस्थेसिया के रूप में ईथर का प्रयोग करके विश्व की पहली शल्य चिकित्सा की थी ।

सर्वप्रथम यह 30 मार्च 1933 को उनके पैतृक निवास बैरो काउँटी, अमेरिका में स्थानीय स्तर पर मनाया गया । 30 मार्च 1958 को अमेरिकी काँग्रेस ने इसे राष्ट्रीय दिवस के रूप में स्थापित करने का प्रस्ताव पास किया :

Whereas society owes a debt of gratitude to physicians for their contributions in enlarging the reservoir of scientific knowledge, increasing the number of scientific tools, and expanding the ability of professionals to use the knowledge and tools effectively in the never ending fight against disease and death.
जी हाँ, बात डाक्टर्स डे की हो रही है ।

ई०  सन 1 जुलाई 1962  को  डा०  बिधानचन्द्र राय  के  देहावसान  और  चीन से  मोहभँग के  बाद, अमेरिका  की  तर्ज़ पर  प्रधानमँत्री  ज़वाहरलाल नेहरू  ने 1963 जुलाई से इसे डाक्टर्स डे के रूप में मनाये जाने की घोषणा की थी । सँभवतः यह तत्कालीन महामनाओं को उनके व्यक्तित्व के अनुरूप सम्मान न दे पाने के असँतोष को शमन करने की उनकी नीति रही हो । यह मेरे व्यक्तिगत गवेषणा का विषय है कि,पँ० ज़वाहरलाल नेहरू किस सोच के अन्तर्गत व्यक्ति विशेष के जन्मतिथियों को राष्ट्रीय पर्व घोषित कर दिया करते थे । जी हाँ, आप ठीक पढ़ रहे हैं, बात डाक्टर्स डे की हो रही है ।

अमेरिकी सीनेट और राष्ट्रपति जार्ज़ बुश ने 1990 में  डाक्टर्स डे  को  कानूनी  ज़ामा  पहनाया  और इसे  अनिवार्य  राष्ट्रीय दिवस  की  मान्यता दे दी ।

Whereas society owes a debt of gratitude to physicians for the sympathy and compassion of physicians in administering the sick and alleviating human suffering. Now, therefore, be it resolved by the Senate and House of Representatives of the United States of America in Congress as follows:
1. March 30 is designated as National Doctors Day.
2. The President is authorised and requested to issue a proclamation calling on the people of the United States of America to celebrate the day with appropriate programmes, ceremonies and activities.
The enactment of this law enables the citizens of the United States to publicly show their appreciation to the role of physicians in caring for the sick, advancing medical knowledge and promoting health.

जी हाँ, बात डाक्टर्स डे की हो रही है ।

docday2बस यहीं पर मेरा असँतोष मुखर होता है, क्योंकि डाक्टरों में कोई राजनैतिक भविष्य हो, या ना हो पर, डाक्टर्स डे को लेकर जनसमाज में निरँतर बसी उदासीनता मन में एक क्षोभ या अलगाव पैदा करती है । चलो फिर भी, कम से कम यह कहने को तो है कि, इवन अ डॉक हैज़ हिज ओन डे ! 
जी हाँ, अब तक बात डाक्टर्स डे की ही हो रही थी ।

DrBC Roy -composed by Amar

tn_docचलते चलते :

जरा इन डाक्टर साहबान से भी मिलना न भूलियेगा.. सीरियसली भई, एक बार मिल तो लें, पछताना न पड़ेगा !

 

 

इससे आगे
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यह अपना हिन्दी ब्लागजगत, जहाँ थोड़ा बहुत आपसी विवाद चलता ही है, बुद्धिजीवियों का वैचारिक मतभेद !

शुक्र है कि, सैद्धान्तिक सहमति अविष्कृत हो जाते हैं, और यह ज़्यादा नहीं टिकता, छोड़िये यह सब, आगे बढ़ते रहिये !

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