जो इन्सानों पर गुज़रती है ज़िन्दगी के इन्तिख़ाबों में / पढ़ पाने की कोशिश जो नहीं लिक्खा चँद किताबों में / दर्ज़ हुआ करें अल्फ़ाज़ इन पन्नों पर खौफ़नाक सही / इन शातिर फ़रेब के रवायतों का  बोलबाला सही / आओ, चले चलो जहाँ तक रोशनी मालूम होती है ! चलो, चले चलो जहाँ तक..

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31 March 2008

अमर मूँछ संग्रहालय

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पब्लिक इंटरनेट एक्सप्लोरर से एक नामालूम परहेज़ करती है, डा०द्विवेदी ने मित्रवत सलाह दी है, कि लोगों को फ़ायरफ़ाक्स ज़्यादा रास आता है और वहाँ फ़ोन्ट्स ठीक से न पढ़ पाने की वज़ह से लोग मेरे पोस्ट के टुकड़े टुकड़े करके... मुँह बिचकाये और चल दिये 

मैंने तत्काल यानि फ़ौरन से पेश्तर फ़ायरफ़ाक्स ज़ी का आवाह्नन किया और स्थापित कर दिया, वाकई ज़नाब फ़ोन्ट्स में खड़बड़ाये घबड़ाये से लग रहे थे , IE 7 में आपकी दुआ से सब ठीकठाक है

मोज़िल्ला से मदद की गुहार की तो उन्होंने विस्ता अल्टिमेट में इसके बौरा जाने की पुष्टि की एवं फ़ायरफ़ाक्स बीटा 3.0? प्रयोग करके देखें, ऎसी पेशकश की एवं लाइवराइटर से बचने की सलाह दी । क्या सही है, यह तो मेरे को मालूम नहीं किंतु बीटा 3.0? महोदय मेरे सिस्टम में लैंड करते ही क्रैश कर गये सो, फिर छिड़ी यार...बात ऽ ऽ मूँछों की..ऽ  ..ऽ  की अगली कड़ी यहाँ एक फोटोब्लाग के रूप में दे रहा हूँ

 बड़े आये मूँ वाले-अमरअमर मूँछ संग्रहालय-अमरअज़ब ये ग़ज़्ज़ब - अमर साला पागल-अमर

क्या मूँछ है-अमरतेरी मूँछों के सिवा दुनिया में रखा क्या है-अमर  हाय हाय यह मूँछें-अमर

लेकिन आप अज़ूबे लग रहे हैं-अमरहलब्बी मूँछें जो तेरी देखी-अमर मूँछ वाले तेरा जवाब नही-अमर

यह सभी चित्र अंतर्राष्ट्रीय मुँच्छड़ सम्मेलन 2006, म्युनिख़ से लिये गये हैं । प्रतापगढ़, उ०प्र० एवं सांगानेर, राज० के दो जन भी इसमें सांत्वना पुरस्कार एवं प्रशस्तिपत्र से नवाज़े गये थे । उनके चित्र प्राप्त करने का प्रयास जारी है । आख़िर भारत महान के मूँछों की भी कोई प्रतिष्ठा तो है ही । इतनी हल्की पोस्ट में ये भारी भरकम मूँछें.... है न अज़ीब बात !

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30 March 2008

फिर छिड़ी यार...बात ऽ ऽ मूँछों की ..ऽ ...ऽ

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इनको क्या हो गया है, डाक्टर हैं कि जोकर ? लगता है, चुक गये ।इनकी दिखावे की संवेदनायें संत्रास,जैसे संडास में घुसी पड़ी है, बाहर की दुनिया से बेख़बर । हाज़त ठीक नहीं तो फुरसतिया चूरन आज़माओ । पंडित शिवकुमार से एक बार मिल तो लो, अच्छों अच्छों की निकाल कर धो देते हैं । ऊपर नारा असहमत मौन को स्वर देने का, और अब अपनी औकात पर आख़िर आ ही गये ।
हुआ यह कि आज एक मेडिकल रिप्रेज़ेन्टेटिव महोदय तशरीफ़ लाये, मैं कुछ चटा हुआ बैठा था । प्रोफ़ेशनल काल यानि इस नामुराद पेशे की एक थैंकलेस कर्ट्सी ! अपराह्न के चार बज़े इनका समय होता है । पहला बालर दाख़िल हुआ, आर बी सिंह, घुटा घाघ ! उन्होंने मुझे आँखों में तौला, फिर मूड भाँप कर मुझे थोड़ा बहटियाने की ज़द्दोज़हत में मशगूल होते हुये बोले, 'क्या बात है, आज़ अपने बास बदले बदले से नज़र आ रहें हैं ? ' मैं थोड़ा सहज़ होने का प्रयत्न करते हुये सतर्क हुआ, ' क्या बदला है, बाहर से अंदर तक सबकुछ वही है और यथास्थान है, हाँ बोलो ? ' सेल्समैन इतनी आसानी से नो बाल स्वीकार कर ले, असंभव ! उन्होंने एक्सन रिप्ले के भाव से मुझे निरखना शुरु किया । 1मिनट..2मिनट,अब असह्य होने लगा, मतलब की बात पर आओ और यहाँ से टल भी लो,यार ! अचानक ज़नाब उछल ही तो पड़े, ' अरे सर , आपकी मूँछें ! यही मिस कर रहा था । अच्छा लग रहा है, स्मार्ट लग रहे हैं । ' तो ? पहले बेवकूफ़ लगता था, क्या ? ( स्वगतः-अब टल भी लो, चारण ! विरुदावली रचने की ट्रेनिंग ली है, क्या ? ) अरे नहीं , हमारे सर के कहने का मतलब है कि अब आप कुछ ज़्यादा , मतलब पहले से स्मार्ट लग रहे हैं । यह रितु शुक्ला थीं,उनकी सहायिका, बोले तो शहनाई की पों ! आर० बी० ठहरे इटावा के ठाकुर, चतुर सुजान ! सांत्वना की एक बर्फ़ी मेरी ओर फेंकी, बिरादरी में शामिल होने के प्रस्ताव के साथ, ' सोचता हूँ कि मैं भी क्लीन शेव कर लूँ । ’ येल्लो, हमारे सुख दुख में साझी होने का नया शग़ूफ़ा ! मैं जला भुना तो था ही, बोलना ही पड़ा, 'तो सफ़ाचट कर लो, क्या दिक्कत है ? 'जी आज़ मिसेज़ से पूछूँगा, परमिसन मिली तो अगली बार इनको आप नहीं देखेंगे । उन्होंने मूछों को सहलाया, गोया उनके मौज़ूद होने की तस्दीक कर रहे हों ( मैं मन मसोस रहा था कि इसको आख़िर एक घूँसा क्यों नहीं मार सकता ।) किंतु प्रत्यक्ष कथन - ' बहुत शुक्रिया आर०बी०, लेकिन मूँछें तो तेरी अपनी हैं, फिर अणिमा ( श्रीमान जी की पत्नी ) के NOC का क्या काम, कोई उसके पास मोर्टेज़ ( गिरवी ) थोड़े ही है ? 'अरे सर, मूँछ तो क्या, आदमी की पसंद-नापसंद भी , उसकी अपनी कहाँ रह जाती है, अब भाभी जी की बात और है ( मौका अच्छा है,सर की जोरू को भी सान लेयो ,कमसे कम इनके उखड़े मूड पर वाल-पुट्टी तो लगा ही दो ) !
मुझे जैसे ज्ञानोदय हो गया हो, उसके प्रकाशपुंज से कुछ पल तो चौंधियाया रहा । फिर चेतनावस्था में आते ही कराह गया, ' हे भगवान, पुरुष क्यों बनाया रे..ऽ ऽ , बिगाड़ा रे..ऽ नसीबाँ ? जब हमारा स्व, हमारी पहचान सब इन अबलाओं के पास ही गिरवी है । तो पुरुष होने का मतलब ही क्या रह गया ? इस भरी दुनिया में यह मूँछ भी हमारा न हुआ.. इस भरी दुनिया में ऽ ऽ ! घर पहुँचा, पंडिताइन से अपनी व्यथा शेयर कर हल्का होना चाहा, तो उल्टे वह इतरा कर बोलीं , " और क्या ? जब तुम मेरे हो, मेरे लिये बन कर आये हो, तो मूँछ उससे अलग थोड़े ही है ? " अपनी किस्मत ही ऎसी है, मित्रो ! हमने तो जब जब गुड़ चाहा, मिर्चों का अचार मिला ! लो भई, अपने ही घर में सेंध लगी पड़ी है, अब किसको रोने जायें। शायद, आई एम टेकिंग द मैटर सीरियसली , दे मे बी राइट ! नारी के पास नर के मूँछ व पूँछ का रिमोट कंट्रोल सनातन से है । नारी के अस्मिता की बात करें तो... .. जब जब होइ अस्मिता की हानि , बूझो, मरदा केर मोंछ मुरझानी । घूम फिर कर पूँछ मर्दों की ही मरोड़ी जानी है । चित भी इनकी और पट्ट ? ..वह तो हमेशा से इनके ही कब्ज़े में रहा है, वरना पुरुष आज़ इतना असहाय न होता !
साला...लल्लू ! नयी बीबी ने प्यार से कहा, छोड़ो ना.. ..मूँछ गड़ रही है । नऊव्वे के उस्तरे के नीचे आगयी आपकी मूँछ ! और.. पुरानी बीबी ने झम्मक कर कहा, हमारे साथ बाहर निकलने लायक बनो, फिर चलना, खिचड़ी मूँछ क्या अच्छी लगती है ? छिः ! मेरी सहेलियाँ क्या सोचेंगी..देखो बुढ़उना! और, मैडम की जिन सहलियों को नज़र भर कर आप देख भी ना सकें, उनसे कनखियायें जाने के लोभ में, अपनी स्थूल घरैतिन की स्टेटस वल्यू की ख़ातिर आप मूँछ वियोग झेलने को तत्पर ! ग़र कभी आपने प्रेम करने की लक्ज़री की हो, तब तो आपसे बात ही क्या करना । भला कोई क्यों कबूलेगा कि उन्होंने हौले से आपके नाक के नीचे की खेती पर हाथ फिरा कर कहा, धत्त्त ! और उस एक धत्त्त पर मूँछवा की धत्त्तेरे की हुई गयी । मूँछ की ख़ातिर ज़ान देने वाले कोई और नस्ल के पुरुष रहे होंगे । समझदार नस्ल के व्यक्ति, ज़ान की ख़ातिर मूँछ दे दिया करते हैं ! कवि घाघ , आख़िर कितने घाघ रहे होंगे कि बोल ही तो पड़े, " बिन मूँछ का मरदा, औ' बिन पूँछ का बरदा.. " *सत्य वचन महाराज़, हरहा जोते का होय तो पूँछ अँइठ देयो, और मनई लुहावे का होय तो मूँछन पर वार करो। धन्य है..धन्य है, तू भगवान ! पशु योनि के पूँछ का ट्रांसफ़ार्मेशन मनुष्य योनि के मूँछ में ! तेरी लीला अपरम्पार है । नारी रची, अपनी सत्ता बचाने को.. और हमें ? बस एक अदद मूँछ पकड़ा दिया, नारी से नुचवाने को ! हुँह...इछपे मेरा अद्धिकार है । चलो, यह असहमत मौन, यहाँ मुखर करूँगा । यहाँ कोई तो समझेगा, यह दर्द ... कुछ तो है.... !

इन्हीं विचारों में उलझा, मैं उबल रहा था कि मोहतरमा पंडिताइन फिर से प्रकट होती भयीं । मेरा उतरा चेहरा देख, उनकी धवल बत्तीसी खिल पड़ी ( शायद, आंतरिक ख़ुशी ? देवो न जानति, किं मनुष्यम ! ), आँखें मटका कर जैसे मेरे मन को सहलाया, ऎई..ऽ, बुरा मान गये क्या ? ( माया महाठगिनी हम जानि, बुरा मान गये क्या ? अरे,बुरा मान कर भी मैं किसी का क्या उखाड़ लूँगा, उखड़वाने वाली वस्तुयें भी तो, ईश्वरप्रदत्त हमारे ही पास रक्खी है ! ) उई रामाः, मेरे को इन मटकती आँखें से तो, अंतर्मन में एक दूसरी किसिम का ज्ञानोदय अंकुरित होता दिक्खै । मेरी लुगाई ऎसी तो न थी , कहीं चोखेरवालियों की कोई पोस्ट तो पढ़ने को पागयी, पट्ठी ? तभी बदले बदले से सरकार नज़र आते हैं...औ' तभी उनको यह बेसुरे अधिकार नज़र आते हैं । क्यों भड़कती हो भाई ? उनकी बात कुछ और है, तुमतो कुटुंब के प्रति समर्पित गृहस्थन हो । उनके सुर में सुर ना मिलाओ । चलो, मानते हैं या कहो कि मान ही लेते हैं, कि मैं भी तेरा और यह मूँछ भी तेरी ! लेकिन......अब क्या कहूँ ? कम से कम Amphibological शब्दावली में तो मत जियो, यार ! व्यवस्था से लड़ो, कौन मना करता है ? यह तो इस शताब्दी की मोस्ट हैपेनिंग थिंग है, सब किसी न किसी मुद्दे की टाँग पकड़ कर इस भवसागर में डूब-उतरा रहे हैं । कोई कोई तो इमर्ज़ेंन्सी लैंडिंग मानिंन्द इन बेपर मुद्दों की पैराशूट बना अधर में लटके शनैः शनैः लैन्ड कर रहे हैं, एक छटपटाहट है, एक संशय, पता नहीं ताड़ में अटकेंगे कि ख़ज़ूर में ? किंतु दुनिया की निगाह तो उन पर टिकी ही है ! सम्प्रति इतना बहुत है, किसी के फ़ानी ज़िन्दगानी में, सबकी निगाह खींच लेना आसान थोड़े ही है ? सिर की टोपी, ज़रा पैर में पहन कर तो देखो । दुनिया, चैनल व मीडिया फोटू उतारने दौड़ी आती है कि नहीं ? सो, प्रियतमा ! व्यवस्था से लड़ने में कोई बुराई नहीं है, लेकिन ? फिर, वही लेकिन !

लेकिन, एंथ्रोपोलोज़िकल फ़ैक्ट्स को नकार कर, बायलाज़िकल संरचना एवं आवश्यकताओं पर लानत मत भेजो, प्रिये ! तुम तुम हो, मैं तो ख़ैर.. मैं हूँ ही । अब अपने शोषण और अधिकार की सीमारेखा निर्धारित कर लो, और चैन से जियो- हमें भी जीने दो ! ग़र महज़ चिल्लाने के लिये ही यह बवाल है ? ते छड्डयार , हुण देणा तैणूँ इन्ने सारे मुद्दे ! असीं मरदा दियाँ मुच्छाँ नूँ बक्स देओ, भैण ! भौत गल्लाँ हो गयीं, इब साड्डे मुच्छाँ पै हक्क ना जतायीं । ऎनूँ  अमर मूँछ संग्रहालय विच जावेगा !

जनानियों की इस सोच के लिये संज्ञाओं की कमी नहीं हैं, इतनी संगीन धारायें कि द्विवेदी जी अपना तीसरा खंबा भी नोच लें, मसलन.. मूँछ अतिक्रमण, गैरकानूनी अधिग्रहण इत्यादि इत्यादि

पोस्ट कुछ ज़्यादा ही लंबी होती जा रही है, अब कैसे समेटूँ ? मूँछ की महिमा मूँछ वाले ही जानें । जिनको मूँछ माहात्म्य की थोड़ी भी जानकारी है, वह तो कृतसंकल्पित हैं कि अइसे मुँहजरे जमाने मा कइसहू बिपति आये एक रेख मूँछ की राखिबे तो राखिबे....

इन मूँछों ने कई बार इन मोहतरमाओं की ऎसी पोल खोली कि अब तलक बयान-ए-लफ़्ज़ों की मोहताज़ी झेल रही है । फिर भी कोशिश करता हूँ..

भाईजान बातों बातों में कहीं इन्हीं नामुराद मुद्दों पर शर्त लगा बैठे, बेचारे हार गये और मूँछ गँवा बैठे ! बड़ी शोहरत थी ज़माने में उनकी हलब्बी मूँछों की, बड़ी मुश्किल आन पड़ी, घर जाऊँ कैसे ? अपनी निज़ी ज़नानी को मुँह दिखाऊँ कैसे ? चुनाँचे अपने सफ़ाचट मैदान को हाथों से ढाँपे, छुपते छुपाते, रात के अंधेरे में, पिछले दरवाज़े से किसी तरह घर में दाखिल हुये । चोरों की तरह आहिस्ते आहिस्ते अपने बिस्तर में सरक लिये , बगल में लेटी बेग़म उनके ग़म से बेख़बर खर्राटे भर रही थीं । भाईजान को तसल्ली हुयी, चलो शोर न हुआ, इनको सोने दो, सुबह संभाल लेंगे । बेग़म ने खर्राटों को टापगियर में डालने की ग़रज़ से करवट बदली । कुनमुनाते हुये पूरे बिस्तर पर हाथ फिरा कर ज़ायज़ा लिया । हाथ जा पड़ा, भाईजान के ऎन सफ़ाचट मैदान पर ! यह क्या हो सकता है, इसकी उनींदे मिज़ाज़ से तस्दीक़ करनी चाही । भाईजान ने घबड़ा कर उनका हाथ झटक दिया , लाहौल बिला कूव्वत, यहीं ग़लती हो गयी । मोहतरमा एक ब एक हड़बड़ा कर उठ बैठीं, चिल्लाने लग पड़ीं, अब तक मुये यहीं पड़ा है ? चल फूट ले यहाँ से, फ़ौरन दफ़ा हो जा, वह मुच्छड़ बस आता ही होगा ...

तो मैं भी फूटता हूँ...क्योंकि यहाँ भी कोई मुच्छड़ आता ही होगा !

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25 March 2008

होली तो होय गयी .........तो ?

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मुला , किसी के जाने के बाद भी उसकी भीनी भीनी खुशबू साँसों में बसाये रखने में आपको एतराज़ हो तो हो, किंतु यह अपुन का बैटरी रिचार्ज का नुस्ख़ा है, जरा अपनी आँखें बन्द करके बर्षों पहले मिली किसी कन्या का ध्यान लगाओ ( बशर्ते कि वह आपकी बीबी न बन चुकी हो, दिमाग पर जोर दो । और भी कई होंगी...  ख़्यालों में ! )      तो हम आज यहाँ 22 मार्च 2008 के कुछ तस्वीरें गुनगुना रहे हैं, चाहो तो आप भी तनिक झाँक लो ।

होली के रंग-अमर होली के रंग-२-अमर होली के रंग-२-अमर.jpg३  होली-अमर

होली के रंग-२-अमर.jpg४होली के रंग-अमर.jpg६ होली के रंग-२-अमर.jpg५

ओये होश में आ-अमर मेरी तस्वीर ले लो-अमर

यहाँ कोई रोकटोक तो है नहीं, जउन मर्ज़ी वहिका ठेलि दियो । लेकिन हमारा इरादा इतना गंदा नहीं, * हम तो सिर्फ़ इन लम्हों को महफ़ूज़ बनाये रहने को यहाँ पर सहेज़ रहे हैं । टेक केयर &गिव योर कमेन्ट

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23 March 2008

अथ श्री काकचरितम - 2

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काकवचनम - प्रथम प्रश्नः

                                            कागा हमरे मँडेरे-अमर

यथा प्रथमदण्डे पूर्वपार्श्वे ' अय   अय शब्दम

रटति काकस्तदा पौरुषलाभवार्ता कथयति ॥ १ ॥

प्रातःकाल एक घड़ी दिन चढ़ने पर यदि कौव्वा पूर्वापार्श्व भाग में ' अय अय ' शब्द करे तो उस रोज़ घर में सुख होगा ।                   

जारी है .. ..

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चलो, इसी बहाने .. ..

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( आदरणीय बहनों एवं एकाध भाभियों , यह पोस्ट आप भी पढ़ सकती हैं । आज कोई ज़ेन्डर डिस्क्रिमिनेशन जैसी बात नहीं की जायेगी, और.. सुनिये ! आपलोग भी ज़ेन्डर कांशस न रहा करें । भगवान ने इतना कुछ दे दिया है, फिर भी पता नहीं क्यों, आप अपना असंतोष  खुज़लाती ही रहती हैं  ? आज के दिन..नहिं नहीं, आज शाम बाबा भी देवर का चार्ज़ लिये बैठे हैं , और आपलोग भी ना, आई.. उई करती हुई , बायें दायें छिपती छिपाती फिर रही हैं  ! मैं कुछ करूँगा नहीं, सच्ची ! कसम खिलवा लो, कूच्छ बी नईं करूँगा ... एक बार कह दिया ना, कि कुछ नहीं करूँगा, तो समझ लो कुछ  नहीं करूँगा । अरे रुको तो, जाओ नहीं, मौका अच्छा है.. अगल बगल कोई है भी नहीं , मेरी बधाईयाँ तो लेती जाओ । रुकिये , देखिये तो .. कोई आ जायेगा, ज़ल्दी से मेरी बधाई ले लीजिये, वरना नाहक आप भी डाँट खा जायेंगी, ' यह अमर कुमार की पोस्ट क्यों पढ़ी जा रही थी ? कौन है यह ? ' अगर डाँटने वाला कोई पुरुष ही हुआ, मसलन  आपके अपने पापा या चलो, ' ये मेरे फ़्रेन्ड हैं ' से विभूषित कोई  सड़ियल सा शख़्सियत ?  फिर  क्या करेंगी आप ?  कोई मोर्चा खोलने का विकल्प  नहीं है, यहाँ ! इस मोर्चे पर अगर दूसरा मोर्चा खोला तो कसम होलिकामाई की, इसी अष्टमी तक आपसे समर्पण करवा लूँगा, जैसे  अपने मानेकशा ने ज़रनल निय़ाज़ी से करवाया था ! हाँ तो, यह पोस्ट पढ़ते हुये आप पकड़ी गयीं तो दूसरे विकल्प के रूप में , आप क्या करेंगी ? क्या कहेंगी कि यह डा०अमर कुमार कौन है, और वह ' कुछ तो है... कुछ तो है.. .. ' क्या कर रहा था ? तो, भला क्या बोलेंगी आप मेरे बारे में । बोलो न, मेरे विषय में क्या बताओगी.. ... जरा मैं भी तो सुनूँ ! यही न कि, कुछ ख़ास नहीं जानती या कि एक अद्धी उमर का डाक्टर हैं,सोचा देखूँ कि,कुछ नहीं, मैं तो थोड़ा देख रही थी... "                                                            

ठहरिये ज़रा मैं भी देख लूँ, मेरा एयरटेल बज रहा है ।हाँ हल्लोः, हल्लोह ..आप भी इसी बहाने मोबाइल हो लीजिये, दर्द हो रहा होगा ! बहुत देर से बैठे हैं, कुर्सी में ।

कुर्सी  तो आपकी अपनी ही है, फिर तो थोड़ी देर को छोड़ने में कोनो  रिस्क नहिं है, इहाँ !

लेकिन.... इस फोन ने अपने पोस्टिया का तख़्तै पलट दिया ।

क्या यार !  मूड ही ख़राब कर दिया मेरा तो, साला कुत्ता कमीना ( शायद धर्मेन्द्र वाला ही तो नहीं था, खैर..) ! अब देखिये...

"कौन? " उधर से सवाल हुआ । उल्टा डिस्टर्बकर्ता डाक्टर को डाँटे !                                        

" अरे भाई आप कहाँ से बोल रहे हैं ? " पहले का ज़वाब सुना नहीं और दूसरा भी दाग   दिया ! 

अब क्या ज़वाब दूँ, मैं तुम्हारे सवाल की ऽ  ..ऽ " अपने मुँह से बोल रहे हैं, बोलिये क्या बात है ? "                                                                                              

वह आज़िज़ी से चिल्ला रहा था, " वह तो ठीक है, लेकिन बताइये आप बोल कहाँ से रहें हैं ? "                          

फिर वही ढाक के तीन पात !मैं  क्या बोलता " बोला न, अपने मुँह से ! और आप ? "                                                                                                                                

उधर उन सज़्ज़न का धैर्य जैसे चुक सा रहा था , " अरे भाई , यह कौन सा नम्बर है ? "

" वही, जो आपने दबाया होगा ! "  मैंने  स्वर को यथासंभव ठंडा कर लिया ।

वह थोड़ा नरम पड़ा , " अरे भइया , यही बता दो कि फोनवा लगा कहाँ है ? "

मैं कुछ मूड में आगया, " फोनवा तो हम अपने कनवा में लगायें हैं, आप कहाँ लगाये पड़े हो ? "

जो भी सज्जन थे, हँस ही तो पड़े, " अच्छा छोड़ा , बंद करा ई सब, हमहीं माफ़ी माँग लेईतऽ हाइ भाय  ! "

येल्लो ! उनका तो मनोरंजन हो गया और  यहाँ मेरा मूड उखड़ गया । 

एक अलग किसिम का होली संदेश देना चाहता था, टँच राबचिक्क ! बोले तो माइलस्टोन !  

और ?  और माइलस्टोन के पहले ही यह पत्थर आगया, मेरे पोस्ट को पंक्चर करने ।

बहनों और भाभियों का बैरियर  सकुशल पार हो  जाये यह सोच,  शब्द संभाल संभाल कर लपेट रहा था कि यह अपशगुन हो गया !

पता नहीं लगा कि इतनी ही देर में पंडिताइन भी, यहाँ के लिखे-टाँचे पर नज़र मार के जा चुकी हैं । मेरी आवाज़ बंद होते ही, कमरे में ग़ुलज़ार हुईं ।

एक फ़िक़रा उछला, " चिट्ठी पढ़ा पढ़ा कर तो, तुमने  हमको फुसला लिया, अब चिट्ठा   किनको पढ़वाया जा रहा है ? उनको तो छोड़े ही रहो !

अई ल्लो ! तुम्हरी तो अदा ठहरी अउर इहाँ हम बिलबिला रहे हैं, वाहव्वाः अपुन  तुमको फुसला लिये अउर तुम फुसली हुई 25 साल से जमी बैठी हो  यहीं पर ! मेरा मंतर नहीं उतरा, अब तक ?

रुकिये पहले अपना घर संभाल लूँ, आप लोग मेरी शुभकामनायें अपने घर तो लेते ही जाइये ! 

क्या पता , ऎसी शुरुआत में.. .. .. .. .. ..  कल हो ना हो !

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ताड़ से गिरा, खज़ूर पर अटका एक पोस्ट ( बड़ा कैचिंग शीर्षक निकल आया, अनायास ! )

खैर पोस्ट अब समेटी जाती है ।

क्योंकि यह  22/ 23 की रात है

दिन भर डोलता ही रहा, शाम लोगों से मिलने और खीसें निपोरते रहने में ही ग़ुज़र गयी |

गले मिलने में तरह तरह के परफ़्यूम की महक और किसी किसी के मुँह से आती हुई शराब की भभक, दोनों ही नाक में घुसी पड़ी है, एक अद्भुत काकटेल, नहीं माकटेल, नहीं यह भी नहीं.. सुँघ्घाटेल है यह !

अबके बरस-अमरहोये देयो भाई-अमर

मेरी बधाई, शुभकामनायें धरी की धरी रह गयीं, और अपनी  होली तो .... होय ली !

हिन्दी ब्लागरी लाइफ़ की पहली होली... ऎसे व्यर्थ जायेगी ! इसी को कहते हैं,बैडलक ख़राब होना । पहले बहनों व भाभियों के लिये शब्दों का टोटा (पता नहीं किस शब्द में नारी स्वातंत्र्य को डसने वाला साँप छिपा बैठा हो ) 

फिर मोबाइल वाले भाई साहब, "  कहाँ से बोलत अहा ? " अब उनको रास्ता दिखाया ही था कि..  पंडिताइन सवार हो गयीं । जब मेरी चिट्ठी ने  ही उनको फुसला लिया, फिर.. मेरा चिट्ठा तो पता नहीं कितनों को लुढ़का देगा ! एक डिस्क्लेमर  न पेस्ट कर दूँ , यहाँ ?

मिला मिलाई.. हूहु हूहु, हूहु हूहु,  मिला मिलाई ..  हूहु हूहु, हूहु हूहु..... हूहु हूहु, हूहु हूहु

शाम की मिला मिलाई और खीसनिपोर क़वायद से कल्ले अलग दर्द कर रहे हैं , सो...

सब रँग यहीं भोगे सीखे

सब रँग यहीं देखे जी के

तबियत के आगे सब रँग ज़माने के फ़ीक़े

सखि, आज ऎसी होली खेली जी भरके

आज  आप की भी ऎसी ही ग़ुज़री है ... है ना ?

होली बधाई हो !

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आवश्यक सूचना : होली से संबन्धित कुछ संवेदनशील सामग्री कुछेक संकलक के पास एप्रूवल हेतु लम्बित है, सूचित किया गया है कि अस्मिता बहन, श्लील भाई, नैतिकता बुआ एवं शालीन चच्चा द्वारा NOC प्राप्त होते ही प्रेषित किया जायेगा । कृपया निट्ठल्ले पर   पर ऩज़र रखें ! 

 

 

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20 March 2008

जाके गंदे नाले में तू मुँह धोके आ

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जा जा रे....ऽ  ..ऽ , जा रे जारे
जा रे, जा रे कारे कागा
का का का क्यों शोर मचाये
काला रे जा रे जा रे
अरे नाले में जाके तू मुँह धोके आ
काला रे....ऽ  ..ऽ , जा रे जारे 
ये गड़बड़ जी
ओ गागा रे गा रे...ऽ ..ऽ , गा रे
अईयो ये गालि दिया
अईयो ये सुर बदला
ओ जा रे जा रे
ये सुर किधर है जी, ये सुर... ये..., एन्नाया इधु
ओ जा रे जा रे...ऽ , ओ जा रे जा रे
अम च्छोड़ेगा नहीं जी.,  .., .., .., .., अम पक्कड़के रखेगा जी
 

कागा रे जारे जारे_ अमर झाके गंदे नाले में- बाई अमरलो यह बन गया मेरा ब्लाग - अमर

अमको सुर पक्कड़ने में त्थोड़ा हेल्प करो जी ! पड़ोसन को याद मत करिये शिरिमान जी, होली है तो क्या हुआ ? इतनी थकेली बुझेली  ब्लागसाइट पर होली का रंग घुसेड़ना  है, और आप पड़ोसन में रम गये ! चलो हम अकेले ही सुर संभालने की कोशिश करते हैं । यह कौव्वा बेचारा ही क्यों पकड़ गया , इस रंगीले मौसम में ? पिरेसिडेन्ट बुश को कौव्वे का स्वाद लेते देख शायद ट्रेन्ड बदल रहा है । अब गर्दभराज रिटायर होने की उम्र में बची खुची लीव अवेल कर रहे होंगे, धकापेल सेवा करकर के अघा गये  या फिर लोडिंग अनलोडिंग में फँसा लिये गये होंगे । इसीलिये कौव्वे आजकल हैपेनिंग थिंग हो गये हैं, वरना उनकी क्या बिसात ? जो बंधु केवल इतना ही पढ़ कर , अपने को कौव्वे में शुमार किये जाने से ख़फ़ा हो रहे हों, थोड़ा धैर्य रखें । शीघ्र आ रहा है.. अथ कौव्वा माहात्म्य ! आज़कल छत पर कचरी-पापड़ सुखाया जा रहा है, और दिन भर कौव्वों को उड़ाते रहने में छोटी ( मेरी काकर स्पैनियल गर्लफ़्रेन्ड ! ) और पंडिताइन व्यस्त रहा करती हैं, सो हठात मन में आया कि क्या इन पर लिखा जा सकता है ? किससे पूछूँ ? चलिये आप ही बताइये कि लिखूँ  तो कोई पढ़ेगा भी ? खैर,  अब तो मेरी यह झुल्ल तो शांत होकर ही रहेगी !

दो दिनों से मेरे दिमाग़ में कौव्वारौर चल रहा है,लिखूँ या न लिखूँ ? लोग क्या कहेंगे, इनको कुछ और मिला ही नहीं लिखने को ? अरे करीना कितनी हाट हैपेनिंग थिंग है, आजकल ! करीना और कौव्वे में भेद कर नहीं सकते , और कुछ तो है..  कुछ तो है , चिल्लाते रहते हैं ।  ज़ाहिराना तौर पर हम कोई लौंडे लफ़ाड़ी भी नहीं हैं ( अपनी सीटी सरक कर अब अंदर हो गयी है, सो मन में ही बजा-वजा लेते हैं, मौज़ तो आप भी लेते हो, भाई ! गदरायी अँमिया देखकर बूढ़ा बंदर डाल पर लटकना कैसे भूल सकता है, भला ? ) अपनी ओरिज़िनल वाली पंडिताइन  भी आज़कल करीना पर फ़िदा हैं, दिन भर पूरे घर में   हो.ऽ राम्मा-हो..ऽ राम्मा करती डोलती फिरती हैं । अग़रचे चांस कम है फिर भी कभी किसी हसीं शा़म को इधर कोई कन्या ही भटक कर आ जाये, और पढ़ते ही एकदम घुघूआ कर मेरे प्रोफ़ाइल पर जाये तो वहाँ मेरा प्रेमनाथ सरीखा चेहरा देख कर चोखेर बाली पर टिप्पणी ही जड़ दे, लो अब एक और नया मोर्चा ! कौव्वे को शह देता हूँ तो काकेश जी ही क्यों , नाराज़ होने वाले बहुतेरे हैं, एक ढ़ूँढो-हज़ार मिलेंगे । ख़ैर हुआ करें, मैं कोई डरता थोड़े ही हूँ ? हमारा लिंक पकड़ कर तो कोई यहाँ तक आने से रहा, अपनी मुँडेर से चाहे जितना गरिया ले ।  मैं तो देबू दा से भी नहीं डरता ! ई ब्लागिंग भी तो पढ़े लिखों का एक टेक्निकल किसिम का काँव काँव है, और वह तो काकभुशुण्डि हैं, ब्लागिंग के आदिमानवों में से एक ! आपसे यह अनर्गल प्रलाप नहीं झेला जा रहा है, तो जरा देर को चिट्ठाजगत की तरफ़ टहल आयें, समाज हो या सेहत, मस्ती हो या तकनीक, काँव-काँव की भरमार देख मन प्रसन्न हो जाता है । लगता है कि यहाँ जीवन है और सबकी दुआ से सभी ठीकठाक है । नारदजी अक्षरग्राम में बसते हैं और सबकी ख़बर रखते हैं किंतु माहौल चित्रगुप्त महाराज की पाठशाला सरीखा है, वहाँ से उनके द्वारा परिभाषित कौव्वे तुरंत उड़ा दिये जाते हैं । अब उनको यह कौन बताये कि जहाँ जीवन है, वहीं कौव्वे भी हैं । आसमान में उड़ते कौव्वे देख कर अग़र कोलम्बस अपना ज़हाज़ उधर को न मोड़ लेता, तो पूरा विश्व आज अमेरीकी कौव्वों को तरस रहा होता ।

 गंदे नाले में कागा रे- बाई अमर

तो बंधु आप इस कौव्वा पुराण से बिदक क्यों गये ? यह कोई गरूड़पुराण की मेड-ईज़ी थोड़े ही है ? क्या समझ रखा है, कौव्वों को ? आपका तीन वर्ष का बेटा कभी आपके सामने कुछ देख-गुन कर सटीक निष्कर्ष निकाल लेता था तो आप झूम पड़ते थे, ' एकदम कौव्वा है !' यानि चतुर-चालाक ! कुछेक जन तो हम कायस्थों को जन्मजात कौव्वा मानते हैं, यानि परोक्ष रूप से अपने कौव्वा न होने की स्वीकारोक्ति ! इनके कौव्वा न होने में गलती किसकी है ? क्या नहीं सुना था कि रामचन्द्र जी सिया से कह गये थे कि हँस दाना-दुनका चुगेगा और कौव्वा मोती खायेगा । रामचन्द्र जी की बात झूठी कैसे हो सकती है भला, वह तो आप देख ही रहे हैं कि कौन माल काट रहा है और कौन छाछ में पानी मिला कर पेट भर रहा है ! अब इसे कलयुग कह लो या कौव्वायुग , आपकी मर्ज़ी । त्रिकालदर्शी रामचन्द्र जी कौव्वे में कुछ देखे होंगे तभी तो इतने एडवांस में यह सब डिक्लेयर कर दिये थे । हम आप भला वह तो चखेंगे भी नहीं, जो कौव्वा महराज जीमते हैं, फिर क्या खाकर उनके गुणों से ईर्ष्या करना चाहते हैं ? सुबह सुबह कौव्वे की काँव-काँव अपने मुँडेर पर हुई नहीं कि दिल मचल उठता है, रोमांच हो आता है, ज़रूर आज कोई चिट्ठी या समाचार आयेगा । इसी बहाने हम शुभ-अशुभ की परिकल्पना में अपने नातेदार-रिश्तेदारों को याद तो कर लेते हैं, वरना इहाँ फ़ुरसतिया हर कोउ नाहिं ! अब यह आप जानो कि कौव्वे जैसा आत्मज्ञान कहाँ से लाओगे कि मौत-खुशी, संकट-उत्सव सबका ज्ञान वह आपको बिना किसी पोथी या गणना के करा देता है । निर्विकार इतना कि विष्ठा हो या मांस , उसके लिये समान भाव से ग्राह्य है, अपने तुलसी बाबा ( तमाखू नहीं यार, इहाँ संतन की बात हुई रहि है ) यह देख कितने कुंठित हुये होंगे कि बोल पड़े, " कबहूँ निरामिष होंई कि कागा " । मेरा तो यह मानना है कि समदर्शी होने से ही वह सर्वभक्षी हो पाया होगा । धन्य है.. धन्य है..  ! धन्यभाग कागा के , कि मनई उनको देख अपनी यात्रा सफ़ल मानते हैं, गोया कौव्वा दिखना कोई दलित वोट बैंक हाथ लग जाने जैसा हो । हमारी यात्रा सफल करके भी वह घृणा में जीने को मज़बूर ! इस मुँडेर से उस मुँडेर पर हँकाये जाते रहेंगे । वह शताब्दियों से कोयल के अंडे ही सेंते रहे हैं और कोयल उनको ठेंगा दिखाती  रही है । इनके ऊपर कोई रंग नहीं चढ़ता, ना काहू से दोस्ती, ना काहू से बैर ! तो, इस होली पर कौव्वे को अपना ही लिया जाये, क्या ? जैसी राय हो सबकी, सूचित करियेगा !!

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19 March 2008

अथ् श्री काकचरितम् - 1

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काकचरितम- बाई अमर                                                                             कव्वे बेचारे को लोग अपनी छत की मुंडेर पर बैठने तक नहीं देते और यहाँ उनके चरित का बखान किया जा रहा है । भई, क्या बात है ? डाक्टर सनक गया है ! हो सकता है आप ठीक समझ रहें हों । फ़ुरसतिया,ठेलुआ,पखेरू जैसी अनवरत श्रेणियों में इस निट्ठल्ले का क्या काम ? अब आये हो तो झेल लो ।

काकस्य चरितं वक्ष्ये यथोक्तं मुनिभाषितम । यस्य विज्ञानमात्रेण सर्वतत्वं लभेन्नरः ॥

अर्थात - किसी समय नागराज ने अर्जुन से पूछा कि, महाराज ! काकभाषा से शुभ और अशुभ फल किस रीति से जान पड़ता है ? तब सर्पराज का प्रश्न सुन, अर्जुन बोले कि, हे सर्पराज ! काक का चरित्र विस्तार पूर्वक कहते हैं, सुनिये । दिन के घड़ी के प्रमाण से ही काक की बोली सुनी जाती है, एवं उसी से शुभाशुभ फल का विचार जाना जाता है । जिसका विचार मुनियों ने किया है, वह विस्तारपूर्वक कहते हैं । जारी....

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16 March 2008

आज कंमेंटियाने की ज़िद ना करो...

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भला यह भी को बात हुई ? सोचा अब तीन चार दिन कोई पोस्ट नहीं लिखुँगा, थोड़ा न्य कामों पर भी ध्यान दिया जाये । वैसे भी दोस्त मुसाहिबों की नज़र में यह ब्लागिंग-स्लागिंग फ़ालतू फ़ंड का काम है, न लेना न देना दो... बेकार में समय की बरबादी ! एक दुनियादार को जिसमें दो पैसे न मिलें, भला वह भी कोई काम है ? मेरे मित्र ख़ान मियाँ प्रसंशा भरी निगाहों से हर पोस्ट पढ़ते तो हैं, फिर एक उबासी मिश्रित लंबी साँस छोड़ कर कुछ बेचारगी से कंमेंट देते हैं," अँमें डाक्टर, तुम इस लाइन में कहाँ आ गये ?" हमारे ब्लागर बुज़ुर्गवार ख़ास तौर पर ज्ञानदत्त जी कृपया स्पष्ट करें यह ब्लागर किस लाइन में शुमार किये जायेंगे । कभी कभी ख़ान लगभ ऱिज़ाइन भी कर जाते हैं, " पता नहीं तुमको इतना टाइम कहाँ से मिल जाता है ! " डाक्टर भटनागर ( मेरे अग्रज ) फ़सोस ज़ाहिर करते हैं,' झक्की है, इतना समय अगर अपने प्रोफ़ेसन में गाता तो कुछ बात होती ।" झक्की इसलिये कि जब भी मैं कुछ भी हाथ में लेता हूँ , पूरी ईमानदारी से समर्पि हो कर आकंठ डूब जाता हूँ । बाग़वानी हो ,जानवर पालने का शौक हो, छायाचित्रण हो, रोगनिदान की पेंचीदीगियाँ हों या फिर रोमांस ही हो ( अब तक केवल दो अदद , इससे पहले कि द्विवेदी जी पूछें, मैं स्वयं ही बता देता हूँ।)

पंडिताइन इस रोमांस के शिद्द्तग़ी का वास्ता दे कर, अब भी जबतब अपनी गोटी लाल करने का मौका हाथ से जाने नहीं देती हैं। ऎसा आज ही हुआ , आज शनिवार है यानि मेरी छुट्टी का दिन । पूरा समय घर व घरैतिन को मर्पितप्ताह भर के इक्कट्ठे किये गये पत्रिकायें व अख़बारों के महत्वपूर्ण पन्नों का अवलोकन यानि की अपने इस दुनिया में मौज़ूद होने का एहसास ! आज मेरी स्लिमलाइन (मेरे डेस्कटाप का प्यारभरा निकनेम ) के साथ भी कुछ खुशनुमा घंटे बीतते हैं । सो, आज इसी दिनचर्या को निभाते हुए दोपहर में अपनी स्लिमलाइन से रूबरू होने मन बना रहा था कि झक्क से पंडिताइन प्रगट हुईं ।" ये क्या ? तुम हाँ आकर बैठ गये, जाकर राम कर लो, कल रात भी 4 बजे तक जागते रहे ।" मैंने झाँसा देना चाहा," कुछ नहीं, बस एक दो कमें करके उठ जाऊँगा। पोस्ट-वोस्ट का कोई पुख़्ता मैटर अभी है ही नहीं, बस एक दो मेंट ही कर लूँ तो उठता हूँ । " अब उनका दूसरा पैंतरा, मनुहार के स्वर में अवतरित होता है, " उठ भी जाओ, बात माना करो, अब बेकार में इस समय कमेंटियाने की ज़िद न करो।" पति एक पालतू जीव हुआ करता है, सो पंगा क्या लेना? अनमना सा थोड़ी देर को उठ तो गया,किंतु मन में गुंजायमान था, आज कमेंटियाने की ज़िद न करो..


लो जी लो, यह तो एक भरपूर गदराये पोस्ट का जुगाड़ हो गया । सो, मन बना लिया कि आज इसी को टान दिया जाय ( টেনে দি - मूल शब्द बांग्ला टेनॆ दे बोले तो खींच लो ) !! मौका व माहौल सही है !

कमेंट की बड़ी महिमा है, मित्रों । मानो या न मानो, एक पोस्ट ठेलते ही प्रतीक्षा शुरु हो जाती है , कमेंट्स की ! अरे ठीक है भाई, आगे से टिप्पणी बोलेंगे । घड़ी घड़ी मेरा दिल धड़के... हाँ धड़के, आज कमेंट के विन्डो में ! यह हिट और पिट का मामला हो जाता है , दोस्तों ! ऎसा नहीं है कि जो दे उसका भला, जो न दे उसका भी भला । स्वांतः सुखाय का दम भले भरा जाय किंतु परांतः दुःखाय श्रेणी के लोगों की बहुतायत देख रंज़ न होता हो तो आप यहाँ क्या कर रहे हैं, यह विचारणीय प्रश्न है । अन्यथा न लें, यदि एकाध टिप्पणी रेंग कर आपके हाते में आती हैं, तो सवा इंच मुस्का आपके चेहरे पर न आती हो ऎसा घोर असंभव हो ही नहीं सकता । नहीं आयी तो ? यह तो चलता ही है..अभी हिन्दी ब्लागर उतने परिपक्व नहीं हैं.. बड़ी गुटबाजी है, यार.. इत्यादि त्यादि सांत्वनायें आपका मन बहलाती हैं । आप कम से कम अपनी पत्नी के सामने तो शर्मसार होते ही रहते हैं । यह तो आपकी चतुरता पर निर्भर है कि आप उन्हें क्या समझाते हैं..मसलन, 1. सबके पा ब्राडबैन्ड थोड़े ही न है, पेज़ ही नहीं खुला होगा 2. हमने एच०टी०एम०एल० कुछ ज़्यादा ही डाल दिया है, सबके बस का नहीं है ( अब अगले को एच०टी०एम०एल० में गोते लगाने को छोड़ आप आगे सरक लीजिये ) 3. पाण्डे जी का दूसरे विभाग में तबादला हो गया (गोया वह अबतक रेलवे ब्लागिंग एंड अपलोडिंग डिपार्टमेंट की शोभा बढ़ा रहे थे ) गैरह.. .. सुनने में तो यह भी आया है कि जल्द ही किताब भी आने वाली है... हाऊ टू एब्सटेन फ़्राम पोस्टिंग कमॆंट्स - 100 रीज़न्स मेड ईज़ी बाई शास्त्री एंड रतलामी बुरा मानो होली है

अपनी अपनी व्याख्यायें हैं, मेरी वाली तो नितांत भोंड़े किसिम की है । यह मेरा नहीं बल्कि मेरे एक महकमे विशेष में होने का दोष है, इसलिये बताने में हर्ज़ नहीं दिखता कि कमेंट देने से परहेज़ एक प्रकार से हिन्दी ब्लारों की इंटरनेटी नसबंदी है, इनकी आबादी तेजी से बढ़ने से रोकना होगा । भला चंद एग्रीगेटर कैसे संभा पायेंगे इनको , शायद सेग्रीगेटर की पोस्ट क्रियेट करने की नौबत आ जाय । 2010 तक विज्ञापनों की सुनामी आने वाली है, हिंदी ब्लागिंग में । सबका पेट कहाँ से भरेंगे, गूगल बाबा ? समय रहते चिंता करना शुरु कर देने में ही भलाई है ।

दिशाप्रदर्शक टार्चों की बैटरी चुक गयी होगी तभी तो प्रकाश डालने में राशनिंग चल रही है । अपना रास्ता टटोल अँदाज़ के स्वयं चुनो भईया, गड्ढा खाई यहाँ कोई बताने नहीं आयेगा । कोई डाक्टर तो बोला नहीं था कि जाओ आँख फोड़ो और अपना जीवन सार्थक कर लेयो । उल्टे डाक्टर खुद्दै इस बीमारी से ग्रस्त दिख रहा है यहाँ, तो तुम काहे को अपने मन में मैला ढो रहे हो। लिक्खो..लिक्खो या मत लिक्खो लेकिन कमेंटियाने की ज़िद न करो । बुढ़ऊ जाग जायेंगे !!























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14 March 2008

जात न पूछ साधो की

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भईय्या, यह इंसानी फ़ितरत कहाँ से ले आये                                                                            " यह इंसान कहलाने वाले चोंचले उन तक ही रहने दे, यार ! "

अभी तो मेरी पोस्ट शुरु भी नहीं हुई और यह अनपढ़ बंदर कमेंटियाने लगे । शायद ज़ाहिल हैं इसीलिये इस ज़ाहिली पोस्ट पर बेवज़ह उछलने लगे। अरे भाई, पढ़े-लिखों की शालीनता इसी में रह्ती है कि चुप रहो और तेल देखो, तेल की धार देखो, बोलोगे तो लिखे पढ़े होने का भेद खुल जायेगा ।

बंद करो, यह बेतुकी बंदर पुराण, अपने मतलब पर आओ । वही तो ! फिर बता कर ही जाइये कि यह ब्लागर बिरादरी अपनी भारतीय वर्ण-व्यवस्था में किस वर्ग में रखा जायेगा ? हमको तो जन्म से यही बताया गया है कि जो जीव ऊपर से डिस्पैच किया जाता है, बाकायदा अपने बैच नम्बर और एक्सपाइरी डेट के साथ अपना चालान साथ लेकर चलता है,बोले तो कर्मों का फल! इस हद तक कि तोते को विप्र वर्ण नसीब है तो कव्वे को शूद्रवर्ण । नारायण .. .. नारायण !

क्षमा करें, असावधानीवश यह निट्ठल्ली पोस्ट गलत रास्ते से ठेल दिया गया है । चलने दीजिये। आज सुबह सुबह एक प्रतिष्ठित समाचारपत्र में छपी एक छोटी सी ख़बर ने मुझे भरभरा दिया ।

अनियंत्रित बस ने सोते हुये दलित युवक को रौंदा

 घट्नास्थल पर ही दर्दनाक मौत  

बिल्कुल सही है, बस दुर्घटना में एक युवक की घटनास्थल पर मृत्यु होगी तो दर्द तो हमें भी होगा, और हुआ भी । किंतु इस दर्द में एक तीक्ष्ण वितृष्णा समाहित थी, इस हद तक कि मेरी पंडिताइन बोल पड़ीं, ' सुबह सुबह गाली क्यों फूट रही है मुँह से ? ' सत्यवचन प्रिये, इस शुभ प्रभात में गालियों का अनायास प्रस्फुटन क्योंकर हो रहा है, यह ज्ञानी पुरुष ही बता सकेगा !   मेरी तो रिपोर्टर महोदय से पूछने की इच्छा हो रही थी , यह क्या समाचार दिया है, भाई ? क्यों दलित को इतना महत्व दे रहे हो, उसे इंसान के रूप में ही कालकलवित होने दोगे तो समाचार संकलक के चश्मे से यह नहीं लउकेगा कि एकठो आदमिये मरा है कउनो चींट-मकोड़ा नहीं , कटिंग डस्टबिन के लायक नहीं, कवरेज़ एरिया का सर्कुलेशन ऎफ़ेक्टेड हो सकता है !  तो शिरिमान जी यह किस ख़बीसनवीसी स्कूल के पाठ्यक्रम में ख़बरनवीसी सीखी है, आपने ? कल को यह छापोगे कि टेम्पो पलटा तीन सरदार मरे, दो आदमी गंभीर रूप से घायल एवं दलित टेम्पोचालक मामूली हताहत । मौके पर एक संदिग्ध पत्थर की मौज़ूदगी का अनुमान। अरे भाई, मुँह क्यों खुलवाते हो, भूले भटके कबीर उबीर तो पढ़बे किये होगे, अपने स्कूल में    

जाति न पूछौ साधु की, जो पूछौ तो ज्ञान।
मोल करो तलवार का, परा रहन दो म्यान।।

जाति न पोछौ साधु कि

दलित को सवर्णों ने ज़रूर पैदा किया है, लेकिन आप तो इसको सींच सींच कर लहालोट हुये जा रहे हो । अब ऎसी हालत है कि भाई लोग काव्यकुंज में भी यदि होता किन्नर नरेश तुल्य कविता रच रहे हैं मुझे दलित मानो । सो बेचारा दलित अब बहुतों की रोज़ी रोटी चला रहा है, और आप चभड़ चभड़ जुगाली कर रहे हो।  भैंस  मनोवैज्ञानिक कृपया जुगाली करते भैंस की मनोदशा पर प्रकाश डालें और इनके ज्ञानचक्षु खोलें ।  यह लोकतंत्र तीसरा खंभा, किसी फ़िस्सड्डी ग्रामपंचायत के सूखा बंबा सरीखा खड़खड़ाय रहा है, भाई ! 

हम तो मानते हैं, ज़ुर्म का इक़बाल भी करते हैं कि बहुत जुलुम ढाया है, हमारे पुरुखों ने इनकेऊपर।   मैं स्वयं प्रत्यक्षदर्शी हूँ, मेरे बड़े बाबा (बाबा के बड़े भाई) जो किसी ज़माने में इंकलाबी भी थे, गाँव  आकर इनमें अनुशासन बनाये रखने के हिमायती हो जाया करते थे । मुसहर, कोयरी, चमार चाहे 70 वर्ष का वृद्ध ही क्यों न हो, हम बच्चों के पाँयलागी करना नहीं भूलता था । आखिर हम बड़का लोग जो थे । अगर चूक गया तो बड़े बाबा से बच नहीं सकता था । पकड़ कर हाज़िर किया जाता, बाबा सीधे उसकी बेटी से नाता जोड़ कर उसे एक दो बेंत जड़ देते, यदि प्रतिरोध या अवज्ञा जैसी कोई बू आ रही होती, तो जेठ की तपती धूप में मुश्कें ( ढाई फीट लम्बी गाँठदार रस्सी ) कसवा कर लुढ़का देते । उस गेंद रूपी मानवकाया से गोहार गूँजा करती,' दोहाई मालिक, दोहाई हज़ूर कनको न देखलियइ बाबू सबके , न त बाप किरिया अइसन ऊदूली कब्बो न  भेल कि आहाँ के शान में बट्टा लगायेब । दोहाई दोहाई बाबू, इस्कूल में पास हो जायेब, छोड़ा दू हमरा, घर भर असिरबाद देत रउआ के । होली में खँस्सी खियाऎब, दोहाई दोहाई देवता जवार के ।' जैसे जैसे उसका आर्तनाद ऊँचा होता जाता, मेरे बड़े बाबा का संबन्ध उसकी बेटी से प्रगाढ़ होता जाता । क्या लीला थी, क्या दिन थे ! शायद उसी समय मेरे मन में एंटी तत्व का अंकुर पड़ा होगा फिर भी स्कूल पास होना ज़्यादा ज़रूरी था सो इस लालसा से बाबा के पास सहमते हाँफते जा खड़े होते कि छोड़ दें, लेकिन उसके पहले छुलछुल छुलछुल अपनी ही पेशाब छूट जाती । वह सन 56-57 का जमाना था । लाल टोपी यानि प्रजा सोशलिस्ट पार्टी उठान पर थी । यह मुद्दा वह लोग भुनाते इससे पहले ही आरक्षण इत्यादि का प्रहसन आरंभ हो गया, चुनाव भी था, प्रहसन इसलिये कि इसका पटाक्षेप होता तो दिख नहीं रहा कांग्रेस देगी देश को दलित प्रधानमंत्री ! और तीसरा खंभा खड़े खड़े नित्य नयी शब्दावली गढ़ रहा है , अपने अपने टी आर पी के आधार पर, आख़िर यह दलित पत्रकार की खोज क्या बला है ? किसी भी योजना या जनोत्थान कार्यक्रम की एक नीतिगत डेडलाइन होती होगी, पुरुषार्थी पाँच दशकों तक प्रश्रय के मोहताज़ नहीं रहा करते,वह भी तब जबकि पूरा अमला आपको बबुआ सरीखा हर सर्द-गर्म में सहेज़े लपेटे रहता है, तो यह चल्ल दल्लित्त्तदल्लित दल्लीत दल्लित दल्ल दल्लित्त दलित..दालित्त्त  की कबड्डी का अंत करो, यारों ! जगहँसाई होय रही है, लोग समझने लगे हैं , चुनाव के बाद पूछते हैं कि क्या दलित भी जीता है ? यह धुरंधर भाटभटेकर तो एकदम मौलिक निकले दलित बन कर 33 वर्ष तक अफ़सरी का सुख (?) भोग तो लिये ही, बिहार में। मेरा दिमाग तो इस दलित जुगाली में ही उलझ गया, अब ख़बर ली जाये ख़बरनवीस की ..

तो मेरे ख़बरिया मित्र, ऎसे खड़बड़िया ख़बर की व्याख्या हो जाये तो हम तुच्छ ब्लागीरों के    अ-छपास क्षोभ को थोड़ी शान्ति मिले । टाँग खिंचायी नहीं,सरकार ! द मैटर इज़ सीरियस । जरा स्पष्ट कई दिया जाय कि बस एक यंत्रचालित परिवहन उपक्रम है, फिर भला उसमें दलित भेद करने का प्रगामी साफ़्टवेयर भी नहीं है तो वह एक चैन से सोये युवक को दलित जान कर कैसे अनियंत्रित हो गयी ? यदि वह यंत्रजनित त्रुटिवश अनियंत्रित थी तो युवक दलित हो, ब्राह्मण हो, ढोर ढंगर हो यानि जो भी सामने हो सबको बाइस पसेरी के भाव से ही तौल देती । फिर युवक के आगे दलित चस्पा करने का मंतव्य ? यदि उसमें अहिंसा परमोःधर्म का ब्रेक आयल नहीं था तो वह आप को भी बख़्सने वाली नहीं ,सामने कइसहू सयानो होय,एक ठोकर लागिहे तौ लागिहे । ठीक ? ज़वाब सार्वज़निक न करना चाहो तो मेरे मेल आई०डी० पर भेज दो।

यह रौंदा कौन सी क्रिया है, ज़नाब ? शिवाजी की सेना ने मुग़लों को रौंदा,ऎसा इतिहास में पढ़ा था । अधुनातन रौंदा-रौंदी WWF में भी दृष्टिगोचर होती है, यानि की एक सोद्देश्य सक्रिय क्रूरता ! रौंदा बोले तो युवक ( दलित सही ) अपनी प्राण रक्षा के लिये संघर्षरत था और बस उसे रौंदने में व्यस्त थी । शायद आप सुन न पाये हों किंतु सुनने वालों ने बताया कि युवक रौंदते बस को लक्ष्य कर बोल भी रहा था, तू क्या रौंदे मोय..एक दिन ऎसा आयेगा..गच्च ख़ल्लास !  दुर्घटना के इतने सक्रिय हिंसात्मकता का चित्रण शायद आप अंग्रेज़िन चाची के क्रश्ड(crushed) से सेंतमेंत में माँग कर सके । हेडलाइन से पाठक दहले तभी तो आगे की बात पढ़ेगा । सो, न्यूज़ वैल्यू बढ़ाने के लिये इतने क्रूर न बनो, भाई । चैन से अख़बार पढ़ लेने दो, या यह भी बंद कर दूँ ? किसी दुर्घटना को ग्लैमराइज़ करके क्या सुख मिला, भाई ? रहम करो,रहम करो।

अपने रिपोर्ट की सस्पेंस वैल्यू के प्रति भी तुम सचेत हो क्योंकि अंतिम पंक्ति में उपसंहार स्वरूप दर्ज कर रहे हो कि ' उल्लेखनीय है कि बस ड्राइवर परागप्रसाद स्वयं भी पिछड़ी जाति से संबन्ध रखता है ' बड़ी खंभा उखाड़ जानकारी परोसी है, तुमने ! पब्लिक गदगदागद गदगद !!

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दर्दनाक मौत, खुशनुमा मौत, शर्मनाक मौत में तुमको बेमौत नहीं मार रहा हूँ, इसलिये तुम्हारा और तुम्हारे भोंपू दैनिक का नाम नहीं दे रहा हूँ । रंज़ न करना कि इंटरनेट पर नाम नहीं आया

 

इससे आगे

13 March 2008

माई HTML तज़ुर्बे

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भइया बड़ी कुत्ती चीज है, यह एच०टी०एम०एल० का खेला, यह तो पूरी हाकी है , इसमें क्रिकेट बाई चांस एंड विन बाई लक की कोई ग़ुंज़ाइश नहीं लहा सकते, भाय ! यह हाकी नहीं,कि पदो भी अउर जीतो भी ! दरअसल हुआ यह कि कुछ जलने वाले विद्ध्वंसकारी तत्व हमारे कुछ तो है...जो कि ! को अपहृत करने में कामयाब हो गये , गूगल बाबा खौखिया कर दौड़े ' यू हैव नो एडमिनिस्ट्रेटिव राइट्स ! ' हेल्प  में गये तो उनको लगा कि बहुत दिन बाद कोई फंसा है, रात भर हमको रगड़ते रहे, कभी इहाँ- कभी उहाँ ! चंद्रकांता संतति की तरह एक लिंक से दूसरे फिर तीसरे फिर अनगिनत लिंक पर दौड़ाते रहे, बार बार रुक कर पूछ भी लेते 'आर यू सैटिस्फाइड ?' फिलहाल हमरे ब्लागिंग को रोटी कपड़ा वही देते रहे हैं सो कसमसा कर झेलते रहे उनकी पिंगल ! करइ बिचार करौं का भाई की तर्ज़ पर मेरा सोच विचार दो तीन दिन चलता रहा फिर तय किया कि अपना स्वयं का डोमेन होना चाहिये। सो, पड़ताल में लग गया लेकिन कोई पट्ठा 15-1600 रुपये साल से कम में राज़ी होके न दिया । दूसरे यह भी डर था कि पंडिताइन ने कहीं  आडिट में पकड़ लिया तो यह कम्प्यूटरवा भी सीज़ हो जायेगा । लिहाज़ा तय किया चलो एक गुहार मदद की लगायी जाय ताकि सनद रहे, ई ल्लेयो ! एकदम चुप्पी छा गयी जइसे हमने गब्बर दिखाय दिया ब्लागरन को , पंद्रह कोस में पसरा सन्नाटा ! और भी भकुए हैं ब्लागरन में-हमारे सिवा गुनता गुनगुनाता बरहा पर टाइमपास कर रहा था कि हम होंगे कामयाब दिख गये, बस ठान लिया खुद्दै बनायेंगे हैकरसेफ अपने 'जो कुछ' को , कोसिस करने से का नहिं होता ! ई एचटीएमएल सरवा कौनो हौव्वा थोड़े है ? बिगड़ेगा तो बिगड़ जाय,  कुछ दिन नहीं लिखेंगे अउर का ! अइसे भी तुमको पढ़बे कौन करता है ?       ई स्साला कुछ तो है..., इतनी बड़ी मानसिक हलचल थोड़े ही है, कि भाईलोग आँख खुलते ही जंभुआते हुए मेरा हलचल टटोलने लगेंगे । उनको संडास जाने, मंजन कुल्ला करने की मोहलत तो दो, तुम तब तक चटपट एचटिमिया लो, दुकान का शो चौंचक होना चाहिये ताकि भौंचक कमेन्ट बटोरो । शुरु हो जाओ ..

अमर3  अमर-2

यहाँ तो सिर मुड़ाते ही ओलों की बरसात होय रही, अपना बैडलक ही खराब है । चलें आगे देखें का है?

चूतियापा ही चूतियापा बाई अमर  नइया पार लगा मारुतिनंदन

क्या करियेगा ? जब इतना ब्लागर शिरोमणि बनने को लहटिया रहे हैं तो विंडोज़ के चूतियापे भी झेलिये ।

झेलो अमर-5  तुम्हारे हवाले वतन साथियों-अमर

अब तो संतोष हो गया कि हम कुछ नहीं कर पायेंगे, तो हम तो शुरु हैं,कुछ तो है... जो कि ! * यहाँ देखें

भागो अमर-3 बस भी करो , अमर

तो अब चलने दीजिये, यहाँ बहुत बेइज़्ज़ती हो रहा है, और वहाँ भी काम पड़ा है । सर्वव्यापी चूतियापों में यह निट्ठल्ली पोस्ट शामिल करके डिसमिस मत करियेगा । पढ़ें हैं तो बोलने में क्या हर्ज़ है ? नमस्कार !

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07 March 2008

ठहरिये, कार्य प्रगति पर है

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मैं अपने अनुभवों से एक किताब लिख सकता हूँ , कभी ऎसा हुआ तो उसका नाम होगा
माई एक्सपेरिमेन्ट्स विथ एच०टी०एम०एल० !
अच्छा भला, गाहे बगाहे, मन की मौज में कागज कलम लेकर बैठ जाता था । अब यह नया चस्का अनंत गलतियों एवं पुनर्प्रयास ( Trial & Error ) से थकाने वाला है । स्वाध्याय के भी अपने नुकसान और फ़ायदेहैं, पूरी तौर पर धैर्य की परीक्षा ! देखना है कितना जोर बाज़ुये क़ातिब में है







सो मेरा काम ज़ारी है, त्रुटियों पर आपकी ऊंगली उठे एवं सुधार की ग़ुंज़ाइश बतायी जाए, ऎसी इच्छा है
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02 March 2008

यह कैसा रिवाज़

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नेशनल ज़ियोग्राफिक से टाँचे गये यह चित्र किस तरह के रिवाज़ को दर्शाता है, यह मेरी समझ से बाहर है । शायद आप कुछ बता सकें ! मैं तो निढाल होकर इसे अपलोड कर रहा हूँ, यह कोई फ़िलर नहीं है ।

सजना है मुझे.. सजना के लिये पिया मिलन को जाना

कामधंधा भी इसी तरह चलें वापस घर को मेरी तो उम्र बीत गई, बेटा

मेरे गाँव की दिनचर्या इस रिवाज़ की उपादेयता का ज़वाब है आपके पास

ऎसे रिवाज़ों के उदगम की आवश्यकता कैसे पड़ी होगी ? यदि कोई अटकलबाज़ जानता हो तो अवश्य यहाँ साझी करे, हम अज्ञानियों का कुछ भला हो जायेगा । इसे निट्ठल्ले की खुरपेंच समझ कर ख़ारिज़ न करें !

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यह अपना हिन्दी ब्लागजगत, जहाँ थोड़ा बहुत आपसी विवाद चलता ही है, बुद्धिजीवियों का वैचारिक मतभेद !

शुक्र है कि, सैद्धान्तिक सहमति अविष्कृत हो जाते हैं, और यह ज़्यादा नहीं टिकता, छोड़िये यह सब, आगे बढ़ते रहिये !

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