जो इन्सानों पर गुज़रती है ज़िन्दगी के इन्तिख़ाबों में / पढ़ पाने की कोशिश जो नहीं लिक्खा चँद किताबों में / दर्ज़ हुआ करें अल्फ़ाज़ इन पन्नों पर खौफ़नाक सही / इन शातिर फ़रेब के रवायतों का  बोलबाला सही / आओ, चले चलो जहाँ तक रोशनी मालूम होती है ! चलो, चले चलो जहाँ तक..

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20 February 2008

केवल मस्केबाजों के लिये

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मित्रों, मैं यानि कि अमर कुमार आपकी ज़रूरत और मज़बूरी समझता हूँ । पापी पेट के लिये, बाल-बच्चों के लिये, प्रमोशन के लिये और सच पूछो तो अपने अस्तित्व एवं अस्मिता के लिये मस्का अनिवार्य है । पता नहीं क्यों, मस्केबाजों को एक अलग नज़रिये से देखा जाता है ? आपसे ईर्ष्या करने वाले  अपनी  खीझ एवं  नाकामी के लिये मस्का न मारने का दम भले भर लें, वस्तुस्थिति इससे भिन्न है ! लीजिये ..  

अमर-एकअमर-ग्यारह

गया ज़माना पोल्सन का ! अपना अमूल है ना, पूर्ण स्वदेशी एवं निहायत से निहायत देशी जनों के लिये !

अमर-दसअमर-छः

देखा आपने मनमोहिनी की इज़ी-च्वायस प्रतिभा ! माया मेम साब की पार्टी प्राथमिकता, और क्या चाहिये ?

 अमर-आठअमर-नौ

इतनी रच बस गयी है हमारे बीच फिर क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड की चयन नीति पर ही शर्म क्यों ?

अमर-चारअमर-सात

कोई वांदा नहीं, अमूल के लिये परेशान न हों ! अपना लोकल ब्रांड भी चलेगा, मस्का तो मस्का ही है ।

अमर-तीनअमर-दो

मीडिया नाहक बच्चन के पीछे पड़ी थी, उनके यहाँ कोई कोटा भी नहीं था । सरकार की तो..  छोड़िये भी !

अमर-पाँचअमर-बारह

तो भइय्या, लाज शरम तजि के मस्का के शरणागत होय लेयो, इसी में भलाई है ! ज़माने का पानी मर गया है तो क्या ? मस्का तो अब अपने भारत महान को चलाय रहा है ! फिर क्या ग़म ? शुरु हो जाओ !  

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औरत .. .. .. मसालेदार !

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दौड़ आये यहाँ तक , भला इससे ज़्यादा मसालेदार औरत कहीं और देखा है ?

अमर का फोटोब्लाग निट्ठल्ले पर

तो अब इस फोटोब्लाग पर देख लेयो और कृतार्थ करो ! आपको कैसा लगा यह आइडिया ?

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15 February 2008

हमार वैलेन्टाइन उर्फ हमरी पंडिताइन

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सच में हम बुढ़ाय रहें हैं, क्या ? दोस्तों की राय में मुझ सा ज़ँवादिल और गैर प्रोफ़ेशनल ठिठोलीबाज तो शायद प्रलुप्त प्रजाति में शुमार किये जाने लायक है । फिर हम कल भैलेन्टाईन डे कइसे भुलाय बइठे ?

गृहस्थों की-अमर  pe02270_अमर                                      दरअसल हुआ यह कि आज अल्ल्सुबह भोर में रजाई में उनींदा सा गुनगुनाहट की मौज में लेटा लेटा बाहर सड़क पर से आती खटर-पटर पर मार्निंग वाक के उत्साहियों पर लानत भेज रहा था कि एक चिरपरिचित आवाज़ ने तंद्रा तोड़ दी , " गुड मार्निंग सर, हैप्पी वैलेंटाइन डे ! "  यह कोई ' वह ' नहीं, बल्कि हमारी श्रीमतीजी ( निकनेम - पंडिताइन ) सामने चाय की प्याली के साथ नमूदार थीं, चमकती हुई धवल दंतपंक्तियाँ जैसे चिढ़ा रहीं हों- ' ... .आँप क्लोँज़प कियूँ नहीं करते हँय ? ' मैं एकबारगी हकबका गया, तनिक खिसिया कर बोला , ' अरे वैलेंन्टाइन डे तो कल था 14 फरवरी, फिर .. आज कैसे ? '

क्या वाकई ऎसा महत्वपूर्ण दिन  मैं भूल गया था.. Nah, वस्तुतः भूले रहने का भ्रम बनाये रखा । अपने उम्र के तक़ाज़े से ? ना जी ना, बची खुची अक़्ल के तक़ाज़े से ! वरना..' कभी हम पर भी थी ज़वानी..., कोई हमसे भी करता था प्यार, हाय मेरे दिलदार .. . कभी अपना भी ज़माना था | यह रहस्य आज़ खोल रहा हूँ कि अभी भी बाथरूम में हनुमान चालिसा के बाद बचे खुचे पानी के मग्घों को मैं यही गुनगुना कर उलीचता हूँ कि..' अभी तो मँय ज़वाँन हूँ, अभी तो अंअँ उंऊँ अँअः अँ...हैँ अँहीँ हों हैँ हुँआनँ हूँ '  यह बात दीगर है कि शीशे के सामने कँघी पकड़ते ही यह गुनगुनाहट क़ाफ़ूर हो जाती है। खैर छोड़िये,आपको क्या ! सो मेरे मुँह से यही निकला आज तो 15 है, वैलेंटाइन डे कैसे ? ज़वाब का कोई अकाल थोड़े ही है, इन लेडीज़ के पास, लिहाज़ा..

प्रौढ़ावस्था में गुज़रे ज़माने का रिटेक देना जरा मुश्किल होता है किंतु वह बिना किसी अतिरिक्त प्रयास के शरारत से आँखें नचा कर बोलीं, " अरे कल तो संतों की थी, आज गृहस्थों की है ! "  चाय की प्याली साइडटेबुल पर रखी और पलट कर स्टाइल देती हुयी बगल के कमरे के अँधेरे में फ़ेड-आउट हो गयीं ।   भई वाह, कितना मौलिक भारतीयकरण किया है, इस संत भैलेंन्टईनवा का, हमरी पंडिताइन नें !       ससुर   घुसे चले आ रहे हैं हमरे भारत महान में और अब इस कदर हावी होगये हैं कि उपहास के तौर पर कही गयी ई पंडिताइन की बात कहीं भविष्य में फलीभूत ही न हो जाय । वैलेंटाइन डे महाकुंभ - व्रत की 14 फरवरी, स्नानदान की 15 फरवरी, 14 स्मार्तों की-15 गृहस्थों की, ऎसा कुछ असली ठाकुरद्वारे पंचाग में दर्ज़ रहा करेगा । ओह, यह चाय की गुलामी भी बड़ा बेहूदा रोग है, अब यह न ठंडे हों जायें इसलिये हमको ही ठंड में अपना हाथ गर्म रज़ाई से बाहर निकालना पड़ा । चाय की एक चुस्की अपने होंठों को सतर्क करके ली और अपने सोच को सप्रयास आगे बढ़ाने का उपक्रम किया तो पाया कि.. 

यह उपभोक्तावाद का युग है मित्रों, कोई आश्चर्य न होगा कि हालमार्क वाले कोई धर्मसंसद उज्जैन-काशी में प्रायोजित ही कर दें और संत वैलेंन्टाइन दिवस हमारे पत्रा-पंचांग में अपनी जगह बना लें । पश्चिम में तो यह बिलियन डालर इवेन्ट कब का बन चुका है, हमारा भारत महान इस मामले में अभी पिछड़ा ही रह गया, इस दिशा में प्रगति की रफ़्तार बहुत धीमी है, और कम से कम मेरे लिये चिंता का विषय है ।

In Great Britain, Valentine's Day began to be popularly celebrated around the seventeenth century. By the middle of the eighteenth century, it was common for friends and lovers in all social classes to exchange small tokens of affection or handwritten notes. By the end of the century, printed cards began to replace written letters due to improvements in printing technology. Ready-made cards were an easy way for people to express their emotions in a time when direct expression of one's feelings was discouraged. Cheaper postage rates also contributed to an increase in the popularity of sending Valentine's Day greetings. Americans probably began exchanging hand-made valentines in the early 1700s. In the 1840s, Esther A. Howland began to sell the first mass-produced valentines in America.According to the Greeting Card Association, an estimated one billion valentine cards are sent each year, making Valentine's Day the second largest card-sending holiday of the year. (An estimated 2.6 billion cards are sent for Christmas.)

अब आप मान भी लो आप पिछड़ गये हो इस प्यार के व्यापार में, दकियानूसी बजरंगदल सरीखे कूढ़मगज़ कौव्वारौर मचाये पड़े हैं । उनसे तनिक पूछ लिया जाय न्यूटन के पहले कभी सेब पेड़ से गिरा ही न था, क्या ? तो फिर उनकी काहे चल रही है, अब तक ! ज़वाब न दे पायेंगे, अगर उनसे पूछ लियो कि , जरा बताओ तो ......     

कहाँ रहें उनके कामदेव...जब छायै लाग बेलेन्तीनदेव ! अपने देश में रोज़ एक त्यौहार ! भला कामदेव के नाम पर एक्कौ दिन फालतू नहीं बचा अपने धुरंधरन के पास ? लो भुगतो..मौका पाय विदेशी घुस आवा !

There are varying opinions as to the origin of Valentine's Day. Some experts state that it originated from St. Valentine, a Roman who was martyred for refusing to give up Christianity. He died on February 14, 269 A.D., the same day that had been devoted to love lotteries. Legend also says that St. Valentine left a farewell note for the jailer's daughter, who had become his friend, and signed it "From Your Valentine". Other aspects of the story say that Saint Valentine served as a priest at the temple during the reign of Emperor Claudius. Claudius then had Valentine jailed for defying him. In 496 A.D. Pope Gelasius set aside February 14 to honour St. Valentine.Gradually, February 14 became the date for exchanging love messages and St. Valentine became the patron saint of lovers. The date was marked by sending poems and simple gifts such as flowers.

अब बेचारे कामदेव के नाम पर आफ़िसीयली एक दिन तो एलाट करना ही चाहिये था, न कोई त्यौहार, न कोई व्रत माहात्म्य, न कोई पूजा विधान ! जब कि भक्तों की कमी नहीं है, बहुसंख्य भक्तों में हर कोई चोरी छिपे-उल्टा सीधा पूज तो रहा ही है ! शंकरजी भस्म कर दिहिन, तौन  वोहि का कउनो काम रुक गवा ? लेयो, दूसर पासपोर्ट पर आ गवा ! अब फालतू चिल्ला रहे हो, तो चिल्लाओ ।                       जब पंडिताइन बोल दिहिन तो आगे चल के पंडितौ बोल देहैं, एक दिन संतों का, अगला दिन गृहस्थन का ! वह भले मज़ाक में बोलीं, पंडित तो पोथी में प्रसंग व तिथि निकाल ही लेंगे । फ़तवेबाज़ी सिर्फ़ कुछ टोपीधारियों का कापीराइट थोड़े ही है ! आप अभी से घर में राय कर लो, अगले वर्ष संतों में रहोगे कि गृहस्थों में !  विस्तृत विधि-विधान यहीं  इसी पृष्ठ पर प्रकाशित किया जायेगा ।

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12 February 2008

य़े कैसा दीवानापन है....

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या फिर दिवालियापन है ?
मैं
समझूँ .. ना समझूँ , तू समझ ले ज़रूर....... .. यह कैसा दिवालियापन है...ऽ...ऽ ?सच्चि मा हमरे इलेक्ट्रानिक मीडिया को ई हुई का गवा है ? चलत रहे चलत रहे 24 घंटे चलत रहे, ई चलावै की मज़बूरी कउनौ ब्रह्मा तो लिक्खिस नहिं न , तौ घड़ि दुई घड़ि रेस्ट ले लियो ! ई कचरा काहे पड़ोसत हो भाई , अँय ? हिंदुस्तान भरे मा हर घड़ि, हज़्ज़ारन मनई गुजर जात है , अउर सैकड़न बिरेकिंग नियूज़ मिलिहें , तनिक आपन नज़र तो दउड़ाओ ! अइसा ब्रेकिंग न्यूज़ दइ दिहो के, अब हमरी मेहरिया खानौ न बनाई अउर हम खाब का ?
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11 February 2008

सरस्वतिः महाभाग्ये विद्यकमले्लोचिनि विश्वरूपे विशालाक्षी विद्य्ंदेहि नम्ःस्तुते ।। जयं देहि जयं देहि चराचरे . . . . . . .

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आदिशक्ति के विद्यास्वरूप को नवबसंत की संध्या पर बारंबार नमस्कार है । ' जय हो जय हो '
इस आवाह्नन मंत्र के साथ आप सब ब्लागरवृंद को बसंतोत्सव का हार्दिक अभिनंदन !

बसंत का पूर्ण उत्कर्ष आज हम सब के टूलटिप पर भी छाया है, सरस्वति स्तुति पर कर्सर फिरा कर इसका साक्ष्य ले लें और संकल्पित हों कि हिंदी ब्लागिंग को भी इसी शिखर पर, इसी खिले खिले रूप में निखारना है । हम आप, लेखक पाठक सभी के समवेत प्रयास इसको अवश्य ही संभव कर सकेंगे । अमर
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09 February 2008

ग़ुस्ताख़ी माफ़ ....Ph.D. मेरे नसीब में कहाँ

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अब पूछ ही लिया है तो फिर , चेहरे पर झुकी ज़ुल्फ़ें हटा दूँ तो......ग़ुस्ताख़ी माफ़
बेचारा डा० अमर ब्लागर डा० अमर
दरअसल चिट्ठाकार समूह से एक मेल प्राप्त हुआ, जिसमें कुछ भी ग़ैर वाज़िब नहीं कहा जा सकता, ही ऎसा कुछ ख़ास है कि यहाँ रखा जायमैंने अपनी समझदानी के मुताबिक उसका यथोचित उत्तर भी दे दिया किंतु लग रहा है कि आपके सम्मुख भी अपनी दो बातें इसी बहाने रख ही दूँकल रात ही अपने गाँव नरकटियागंज, बिहार से अपनी चाची का श्राद्धकर्म निपटा कर लौटा हूँदिन भर की मगज़मारी के बाद ज़ीमेल खोला, 6384 अनपढ़े मेल ( ये अपुण का इनबाक्स है, भिडु ! अक्खा यूनिवर्स अपुण का भेज़ाफ़्राई करनाइच माँगता ) साहस ज़वाब दे इससे पहले ही देवनागरी फ़ान्ट वाले सभी मेल खोलकर अपने कच्चे-पक्के ढंग से बाँच मारे, कुछ का उत्तर भी दे दियाएक विचार आया और प्रोटोकाल, शिष्टाचार तज एक पोस्ट की भरपाई मे जुट गया

एक एक्कनम एक
reply-to
dramar21071@yahoo.com
to
Chithakar@googlegroups.com
date
6 Feb 2008 01:02
subject
Re: [Chitthakar] Re: याहू पर माईक्रोसॉफ्ट की बोली
mailed-by
gmail.com

प्रिय बंधु,
ब्लागीर अभिवादन
विदित हो कि मैं डाक्टर अमर कुमार एततद्वारा घोषित करता हूँ कि मैं
पेशे से कायचिकित्सक बोले तो फ़िज़िशीयन हूँ ,अतः मेरी भाषा या लेखन की
त्रुटियों पर कत्तई ध्यान दिया जायईश्वर प्रदत्त आयू में से 55 बसंत को
पतझड़ में बदलने के पश्चात अनायास ही हिंदी माता के सेवा के बहाने से
कुछेक टुटपुँजिया ब्लागिंग कर रहा हूँवैसे युवावस्था की हरियाली में ही
हिंदी, अंग्रेज़ी,बाँगला साहित्य के खर पतवार चरने की लत लग गयी थी ,
और अब तो लतिहरों में पंजीकरण भी हो गया है
गुस्ताख़ी माफ़ हो तो अर्ज़ करूँ... इन उत्सुक्ताओं को देख मुझे दर-उत्सुक्ता
हो रही है कि आपकी उत्सुक्ता के पीछे कौन सी उत्सुक्ता है ? मेरी हाज़त
का खुलासा हो जाय, वरना कायम चूर्ण जैसी किसी उत्पाद के शरणागत
होना पड़ेगाआगे जैसी आपकी मर्ज़ी..
सादर - अमर

On 05/02/2008, Amit Gupta wrote:
On 2/5/08, Dr Amar Kumar wrote:
श्रीमन गणमान्य मूर्धन्यों,
बीच बहस में हम बच्चों का बोलना ठीक नहीं,
किंतु माइक्रोसाफ़्ट के इरादे नेक नहीं लगते
अपनी हर सेवा के बदले एक एक दमड़ी वसूलने
में चमड़ी तक खरोंच लेता हैउसकी कारपोरेट
सोच के हैरतअंगेज़ कारनामे एक अलग विषय है
खैर छोडिये, हमें क्या


डॉ साहब, एक उत्सुक्ता हैआप पेशे से डॉक्टर हैं कि PhD वाले डॉक्टर हैं? यदि पेशे से डॉक्टर हैं तो किस तरह के हैं? मतलब दांतों के हैं या हड्डियों के हैं या जनरल फिजीशियन हैं? :)

--
Courage is not the towering oak that sees storms come and go;
it is the fragile blossom that opens in the snow. -- Alice Mackenzie Swaim
http://me.amitgupta.in/

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उत्सुकता एकदम ज़ेनुईन है, बहुतेरे डाक्टर घूम रहे हैंज़रूरी नहीं कि शोध करके ही Ph.D. शोधा हो, मानद भी तो बाँटी जा रही हैकई रंगबाज तो अपने को ऎसे ही डाक्टर लगाते हैं और लगभग ज़बरन आपसे मनवाते भी हैंकच्छे से लेकर लंगोटावस्था तक आपने उनको गर्ल्स कालेज़ के इर्द गिर्द ही पाया होगा , फिर अचानक ही उनके नेमप्लेट पर एक अदद डाक्टर टँगे दिखने लग पड़ते हैंक्या करियेगा ? ये अपुण का इंडिया है, भिडु ! आपका मेरे ' कुछ ' होने पर संदेह नाज़ायज़ नहीं हैहोना भी नहीं चाहिये, माहौल ही ऎसा है !
एक दूनी दो
यह है, श्रीज्ञानदत्त जी से हुआ पत्राचार एक अदद मेरी टिप्पणी
और ज्ञ के लिये बरहा में j~j का प्रयोग करें.
On 9/26/07, Gyan Pandey <> wrote:
डा. अमर कुमार जी,
मुझे लगा था कि हमने शायद कुछ अण्ट शण्ट लिख दिया था कि आप फिर दिखे नही!
मैं पुन: कहूंगा कि इतना बढ़िया लिखते हैं तो अपने ब्लॉग को जीवंत करें.
और थोड़ी बहुत गुट बाजी - यहां तो मार-काट चल रही है नॉन इश्यूज पर!
पर अपने अन्दाज में चलने के लिये ब्लॉग का प्रयोग करना चाहिये - और कोई कम्पल्शन नहीं होना चाहिये - यह मेरा मानना है. बाकी गुटबाजी ठेंगे पर.
आपका मेल मिलना बहुत अच्छा लगा. बंगला भाषा के बारे में आपको लिखा था क्योंकि आपने अपनी पत्नी के बंगाली होने का जिक्र किया था. बंगला की समझ की हसरत बहुत है!
अच्छा, नमस्कार. श्रीमती अमर कुमार जी को भी नमस्कार.
On 9/26/07, Dr Amar Kumar <> wrote:
आदरणीय दत्त जी ,
सादर अभिवादन.
अभी आपका मेल देखा , अच्छा लगा कि आप बहुत बारीकी से देखते हैं. सहज ही चीजों को खारिज़ नही कर देते. दरअसल अतिशयोक्ति होगी कि एक सुखद संयोग से भटक कर मेरा पन्ना पर पहुंचा
और बहुत सारे लिंक में मानसिक हलचल को टटोलने की कोशिश की तो पता चला यह तो अभिव्यक्ति की अनोखी दुनिया है. इससे पहले ब्लाग के विषय में मेरी कुछ अलग ही धारणा थी. उस पर फिर कभी !
इन्टरनेट पर लगभग - घंटे रोज़ बीतते हैं अपने व्यवसायिक ग्यान को सामयिक बनाये रखने को .थोड़ी इच्छा हुई कि जो कुछ हम देख कर तटस्थ रह जाते हैं यहां शेयर किया जाय. समस्या देवनागरी लिपि की आपके पेज़ पर ही दिये कड़ी से हल हो गयी,बराहा आई०एम०ई की मदद से.
एकलव्य की भांति लग गया ,गुरु जी. अभी भी ' ग्य' और अन्य वर्तनियों में त्रुटि होती है.
रही आपके बांग्ला सीखने की बात, तो आपका स्वागत है किंतु यहां स्पष्ट करना चाहुंगा कि मैं उत्तर बिहार के कायस्थ परिवार से हूं, १९६४ में पिता जी के तबादले के साथ अन्य असबाबों की भांति मैं भी रायबरेली पहुंचा और यहीं टिक गया.
मूल भाषा में साहित्य पढ़्ने की ललक ने मुझे बांग्ला, उर्दू, पंजाबी इत्यादि मेरे इन्टरमीडियट तक पहुंचते पहुंचते १९६९ तक सिखला दिया. मैं खुराफ़ाती सही लेकिन इसकेलिये शरत, इब्ने सफ़ी और अन्य लेखक ही जिम्मेदार हैं, क्यों वह अच्छा लिखते थे इसमें मेरा दोष नहीं है.
घरवालों के लिये तो भटका हुआ लड़का था, पिताजी ने इंजीनियर के रूप में अवतरित होने की इच्छाज़ाहिर की तो मैं मेडिकल में चला गया, बाबा से कायस्थकुल की गाथायें सुनते सुनते इतना प्रभावित हुआ कि अपना सरनेम ही उड़ा दिया. मार भी खायी किंतु आज भी संतोष है कि मैं लकीर पर नहीं चला. यह कबीरपंथी सोच कहां से पैठ गयी, स्वयं ही नही जानता. बंगभाषी प्रवासी कन्या से विवाह करना भी जैसे एक क्रांति की तरह मेरे समाज में ली गयी. लिया करें, हू केयर्स ? जैसे मेरा मोटो है .
तो पंडित जी आपका मेल मेरे लिये एक लाइटहाउस है और मैं प्रयास करूंगा कि अपनी उलट्बांसियो के साथ दिखता रहूं, बेशक कान मरोड़ने का पहला अधिकार आपने ही झटक लिया है. यह शिरोधार्य रहेगा, आचार्य !
थोड़ी बहुत गुट्बाजी ,मुझको किंचित यहां भी परिलक्षित हो रही है यानि ब्लागशेयरिंग में . खेद है कि यह दीमक मुद्रित हिंदी साहित्य को तो खा ही रही है, अब यहां भी पैर पसार रही है. आशा है मेरी यह आशंका निर्मूल हो .
इति शुभ
आपका अमर

On 17/09/2007, Gyan Pandey wrote:
धन्यवाद डा. अमर कुमार जी, आपकी टिप्पणी पढ़ कर आपके प्रोफाइल और ब्लॉग पर गया. पर देखा कि आप रेगुलर लिख नहीं रहे हैं. इतना बढ़िया लिखते हैं तो कम से कम हफ्ते में एक पोस्ट का नियम तो बना ही लें!
चलिये आप रायबरेली में हैं - इलाहाबाद के पास है; सो हम पड़ोसी हुये. और बंगला भाषा का विराट साहित्य देख कर बंगला सीखने का मन दशकों से है. शायद आपके स्नेह से वह सम्भव हो सके!
पुन: धन्यवाद.
---------- Forwarded message ----------
From: ??? ?? ??.....?? ?? !
Date: Sep 17, 2007 5:10 AM
Subject: [ज्ञानदत्त पाण्डेय की मानसिक हलचल]
New comment on वाह, अजय शंकर पाण्डे!.
To: gyandutt@gmail.com
कुछ तो है.....जो कि ! has left a new comment on your post " वाह, अजय शंकर पाण्डे! ":

माफ़ करियेगा बीच मे कूद रहा हू.
का करियेगा बीच मे कूदना तो हम लोगन का नेशनल शगल है.
अजय जी की दूरदर्शिता समझिये या बेबसी कि उनको यह तथ्य अकाट्य लगा कि सब रोक पायेगे तो इसको घुमा के
मान्यता दे दिये. वाहवाही बटोरने की क्या बात है ? लालू जी भी तो इस अन्डरहैन्ड खेल का मर्म समझ के घुमा के पब्लिक के जेब से पइसा निकाल रहे है अउर मैनेजमेन्ट गुरु का तमगा जीत रहे है. पब्लिक के जे्ब से धन तो निकल ही रहा है, बस खजाना गैरसरकारी से सरकारी हो गया. हम लोग भी दे-दिवा के काम निकलवाने के थ्रिल के आदी पहले ही से थे अब रसीद मिल जाता है,इतना ही अन्तर है .
गलत करिये ,दे कर छूट जाइये,यही चातुर्य या कहिये कि दुनियादारी कहलाता है.
गाजियाबाद का खेला तो हमारी मानसिकता को परोक्ष मान्यता देता है, और सुविधा कितना है, अब दस सीट पर अलग अलग चढावा का टेन्शन नही, फ़ारम भरिये १५ % के हिसाब से भर कर काउन्टर पर जमा कर दीजिये . रसीद ले लीजिये . खतम बात !
दत्त जी क्षमा करेगे, ब्लागगीरी की दुनिया मे आपकी हलचल खीच ही लाती है ,
एक आपबीती बयान करना चाहुगा, जब पहले पहले शयनयान चला था, बडी अफ़रातफ़री थी नियम कायदा स्पष्ट नही था ( वैसे अभी भी कहा है,अपनी अपनी व्याख्याये है ) तो शिमला से एक अधिवेशन से एम०बी०बी०एस० लौट रहा था , अम्बाला से इस शयनयान मे शयन करता हुआ सफ़र कर रहा था बीबी बच्चे आरक्षण दर्प से यात्रा सुख ले रहे थे, कभी नीचे कभी ऊपर .लखनऊ तक का टिकट था जाना रायबरेली ! बुकिग की गलती, ठीक है भाई , लखनऊ मे टिकट बढवा लेगे परेशान मत करो का रोब मारते हुये लखनऊ तक गये, लखनऊ मे बाहर तक लपक कर एक करिया कोट वाले से टिकट अगले स्टापेज़ तक एक्सटेंड करने की पेशकश की । महकमा का काला कोट लोग चा-पानी मे इतना बिजी था कि एक लताड सुनना पडा अपनी सीट पर जाइये क्यो पीछे पीछे नाच रहे है. चलो भाई ठीके तो कह रहे है ड्युटी डिब्बवा के भीतर है , घर तक दौडाइयेगा ? बगल से कोनो बोला .
चले आये ,मन नही माना बाहर जा कर चार ठो जनरल टिकट ले आये, प्रूफ़ है लखनऊवे से बैठे है, मेहरारु को अपनी समझदारी का कायल कर दिया.
रायबरेली बीस किलोमीटर रह गया तो काले कोट महोदय अवतरित हुये. टिखट.. कहते हुये हाथ बढाये , टिकट देखते ही भडक गये, स्लीपर है अउर रिजर्भ क्लास है,जनरल पर चल रहे है ?             
सर..ये  देखिये अम्बाला से बैठे है, लखनऊ से टिकट नही बढा तो ये ले लिया. नाही बढा मतलब, इसमे बढाने का प्रोभिजन नही है जानते नही है का ?
जानते तो शायद वह भी नही थे, असमन्जस उनके चेहरे से बोल रहा था. अपने को सम्भाल कर बोले लिखे पढे होकर गलत काम करते है, टिकटवा जेब के हवाले करते हुए आगे बढ गये. मेरी बीबी का बन्गाली खून एकदम सर्द हो गया ,मेरी बाह थाम कर फुसफुसाइ- कैसे उतरेगे ? देखा जायेगा -मै आश्वस्त दिखना चाहते हुये बोला.
करिया कोट महोदय टट्टी के पास कुछ लोगो से पता नही क्या फरिया रहे थे . अचानक हमारी तरफ़ टिकट लहरा कर आवाज़ दिये- मिस्टर इधर आइये...मेरे निश्चिन्त दिखने से असहज हो रहे थे. पास गया ,सिर झुकाये झुकाये बोले लाइये पचास रूपये ! काहे के ? बबूला हो गये- एक तो गलत काम करते है, फिर काहे के ? बुलाऊ आर पी एफ़ ?
बीबी अब तक शायद कल्पना मे मुझे ज़ेल मे देख रही थी, यथार्थ होता जान लपक कर आयी. हमको ये-वो करने लगी. मै शान्ति से बोला सर चलिये गलत ही सही लेकिन इसका अर्थद्न्ड भी तो होगा, वही बता दीजिये. एक दम फुस्स हो गये आजिजी से हमको और अगल बगल की पब्लिक को देखा, जैसे मेरे सनकी होने की गवाहो को तौल रहे हो. धमकाया- राय बरेली आने वाला है पैसा भरेगे ? स्वर मे कुछ कुछ होश मे आने के आग्रह का ममत्व भी था. नही साहब हम तो पैसा ही देगे, रसीद काटिये रेलवे को पैसा जायेगा.
सिर खुजलाते हुये और शायद मेरे अविवेक पर खीजते हुये टिकट वापस जेबायमान करते हुये बोले- ठीक है स्टेशन पर टिकट ले लीजियेगा. उम्मीद रही होगी वहा़ कोइ घाघ सीनियर हमको डील कर लेगा.. आगे क्या हुआ वह यहा पर अप्रासन्गिक है.
तो मै देने के लिये अड गया और गाजियाबाद के अजय जी सरकार के लिये लेने पर अड गये ..तो इस पर चर्चा क्यो ?
यह सनक ही सही लेकिन आज इसकी जरूरत है...चलता है...चलने दीजिये की सुरती बहुत ठोकी जा चुकी, कडवाने लगे तो थूकना ही तो चाहिये सर !
प्रसन्गवश रेलवे का जिक्र गया वरना हर विभाग के, हर क्षेत्र के अनगिनत उदाहरण है..फिर कभी

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Posted by कुछ तो है.....जो कि ! to ज्ञानदत्त पाण्डेय की मानसिक हलचल at September 17, 2007 5:10 AM

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With Best Regards,
Gyan Dutt Pandey
Allahabad (U.P.)
India - 211004

ज़ाहिर है कि उपरोक्त रिप्रोडक्शन से व्यक्तिगत प्राइवेसी का हनन हो रहा है , तो विवाद भी उठेंगेउचित अनुचित पर सिर धुने जायेंगेपर सनद तो सनद ही रहेगा ... यह इंटरनेट भी झक्कास चीज है भिडु , जो लिख दिया सो लिख दिया, दीमक के चाटने का लोचा नहीं इध्धर को !

दो में लगा भागा

तो देव और देवियों, ( सज्जन का स्त्रीलिंग ? मेरे को नईं मालूम ! ) अमिं जी०एस०वी०एम० मेडिकल कालेज, कानपुर से स्नातक इत्यादि इत्यादि हूँ, और सम्प्रति राहू सरीखा हिंदी ब्लागिंग का अमृत चखने आपकी पंगत में चुपके से ठँसा पड़ा हूँ इससे ज्यादा ओर कुछ भी तो नहीं

चोर निकल के भागा

अब यहाँ से फूट रहा हूँ, आप राहू शान्ति को पुरोहित ढूँढेंनमस्कार !

और सुराग क्या मिला भला ?

1 . मैं दवाई-दारू वाला असली डाक्टर ही हूँ।                                                                      2 . रही बात माइक्रोसाफ़्ट की, तो उसका खेला अज़ीब है दद्दू , बिलियन और मिलियन  के सौदे रुपये अट्ठन्नी की तरह करने वालों के बीच हम त्रिशंकुओं का क्या काम ?                            काम  तो विन्डोज़ पर कर रहे हैं ,और सेवा गूगल की ले रहे हैं , यानि गुरु-गोविंद की जोड़ी !     तो फिर काके लागूँ पाँय, बंधुवर आपै दियो बताय ।                                                                3 . वइसे बिलगेटवा जब अपने मैसेन्ज़र का याहू मैसेन्ज़र से मिलाय दिहिस, तबै हम अटकल लगावा कि यू सार ईस्ट इंडिया कम्पनी बन के घुसि आवा, याहू मा । अउर अब देखि लेयो ।       4. 2005 में बिल गेट्स बंगलौर मे भाषण ठोक गये,' India is graveyard of our innovations ' हमारा मीडिया मुँह बाये जंभुआने लगा, पीछे काकटेल पार्टी में शोर मच रहा था, और गेट साहब का प्रवचन खिंचता ही जा रहा था । वैसे हमारे मीडियाकर्मियों ने बोतलहरामी न करके अपनी ईमानदारी का परिचय दिया , और हम भी शर्मा कर ज़ेनुईन विंडोज़ खरीद ही लाये ।                     यह बात अलग है कि कई बार  तो एक्टिवेशन के लिये गिड़गिड़ाने तक की नौबत आ गयी, खैर यह कोई ख़ास मुद्दा नहीं, इस ज़माने में शरीफों को ही अपने शरीफ होने का हवाला देना पड़ता है !

अपने डाक्टर होने का हवाला देने में, हमने कुछेक व्यक्तिगत मेल बिना इज़ाज़त सार्वजनिक कर दिये, तो क्षमा किया जाय । मैं तो आलरेडी न घर का - न घाट का हूँ । मेरे मरीज़ ही सहज कहाँ विश्वास करते हैं कि मैं नुस्ख़े के अलावा कुछ और भी लिखने की अक्लियत रखता हूँ !            


इससे आगे
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यह अपना हिन्दी ब्लागजगत, जहाँ थोड़ा बहुत आपसी विवाद चलता ही है, बुद्धिजीवियों का वैचारिक मतभेद !

शुक्र है कि, सैद्धान्तिक सहमति अविष्कृत हो जाते हैं, और यह ज़्यादा नहीं टिकता, छोड़िये यह सब, आगे बढ़ते रहिये !

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