जो इन्सानों पर गुज़रती है ज़िन्दगी के इन्तिख़ाबों में / पढ़ पाने की कोशिश जो नहीं लिक्खा चँद किताबों में / दर्ज़ हुआ करें अल्फ़ाज़ इन पन्नों पर खौफ़नाक सही / इन शातिर फ़रेब के रवायतों का  बोलबाला सही / आओ, चले चलो जहाँ तक रोशनी मालूम होती है ! चलो, चले चलो जहाँ तक..

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29 May 2008

अबे , तुम खुश तो हुये नऊये ?

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कैसा लगा बंम्बक नाऊ का किस्सा, कुछ  ख़ास नहीं, बचकाना, मज़ेदार या कुछ  और  ? 

वैसे भी यह  पोस्ट गलत टाइम पर  रिलीज़ हो गयी । हमरे बिलागपुरा में टेंशन हुयी गयी, कुछ जन बौरिया के गाली गुफ़्ता पर उतर आये, मरद  मेहरिया सबै चिल्लाहट मचा दिये, सवा सोलह आने अराजकता के लेबल लायक । सब डिस्टर्ब होय गया । अभी तो ग़मी छायी है, बड़के मूड़ी जोड़ कर मंत्रणा कर रहे हैं, तमाशबीन मूड़ी पटक रहे हैं । पता नहीं इनको इस नऊये से का दुश्मनी रही ?  हमको लगता है कि यह सुनियोजित दंगा, हमरे पोस्ट को फ़्लाप करने के लिये ही किया गवा है ।  खैर, जितना भी कोशिश करो.. नऊआ अमर है, मरेगा नहीं !

वैसे सच बताऊँ तो, मुझको भी लग रहा था कि यह कुछ जमेगा नहीं , निहायत गैर बुद्धिजीवी किसिम का किस्सा ! आपने कहा और मैंने आपके कहे का पालन ही तो किया । लेकिन.... ?  आपमें से किसी को पिछले किस्से में ऎसा तो नहीं लगा  कि नऊआ यह साबित कर रहा हो कि शासक के निरंकुशता  के  धमक को कितना भी दबा लिया जाय, किंतु इसकी गूँज किसी न किसी रूप में सुनायी ही देती है ?  न भी लगा हो तो  आश्चर्य नहीं, दुनिया की रीत  एक ऎसा ज़ुमला है, जो  हर ज़्यादती को अपने में समा लेता है, ए ब्लैक होल !

खैर, छोड़िये भी, अगर ब्लागर ज़्यादा दिमाग लगायेगा तो हो चुकी ब्लागिंग !                                                                                                लगे हाथ दूसरा नया वाला किस्सा   भी झेल लीजिये, फिर न कहुँगा कि आओ मेरी लंतरानी पढ़ो ।

एक रहें राजा... रियासत लोकेशन जिला नांदेड़, मौजा- मज़रे  दू टीशन आगे, थाना लगता था- हमरी भैंस !                                               उनका एक निजी नाऊ था । ई राजा लोगन का तो हर चीजे परसनल होता है । नाऊ, पुरोहित.. बहुत लंबी लिस्ट है भाई । बस, इतना ही जान लीजिये कि किसी की भी बहू-बेटी,को समझते अपनी ही ज़ागीर । पसंद आयी, उठवा लिया । अब आपतो सब जानते ही हैं, ज़्यादा क्या बतायें  ? खैर.. छोड़िये, हमलोग भले आदमी हैं, किसी के चरित्र से क्या लेना देना ?  वैसे भी ब्लागर आज कल इसी सब  चलित्तर  से गुलज़ार है ।

सो, नाऊ राजा का अपना खास निजी था । रोज सुबह पहुँच जाता और राजा की दाढ़ी छीलछाल के, चम्पी वम्पी करके उनका चेहरा चमका देता था । नाऊ भला चुप रह सकता है, पूरे समय बकर बकर...बकर बकर । राजा को भी मौज आती थी, उनकी ऎंठू फारमल जिन्दगानी में एक यही था, जिससे वह रामायण से लेकर रमेसरिया राँड़ तक की बातें खुल कर किया करते । रमेसरिया के गदरायेपन का रस राजा के कानों में टपकाते हुये , उसकी आँखें इधर उधर नाचा करतीं । शायद राजकुमारी की एक झलक दिख जाये ?  वह मन को समझाया करता, औकात में रह ! लेकिन उसका दिल डपट देता, काहे की औकात ?  राजा साहेब रमेसरिया पर उतर सकते हैं, तो हम काहे नहीं राजकुमारी  तक चढ़ सकते ?  जिसका दिल जहाँ आजाये, कोई रोक है ? इसमें तो,  मुला  अपने ब्रह्मा विष्णु महेश भी रपट चुके हैं । और मेरी नियत में कौनो खोट थोड़े है, हम तो राजकुमारी को सिरिफ़ एक बार नज़दीक से छू छा कर, उनकी खसबू लेकर देखना चाहते हैं कि आखिर काहे की बनी है, उनकी उज्जर झकाझक्क काया ?  बेचारा इसी उधेड़ बुन में लगा रहता, मन ही मन उसको  दिन में कई बार निर्वस्त्र करके  देखा करता । अरे चलो, आगे बढ़ो आगे बढ़ते रहो !smile_omg

ख़ामोश नऊआ ( नाम गुप्त रखने की शर्त है, उसकी ), तो नऊआ ख़ामोशी से अपना काम कर रहा था ।                                                            राजा ने तिरछे होकर गैस निकाली और  गरदन पर खुज़ली करते हुये बोले, "आज  क्यों बड़ा चुप चुप है, कुछ बोल नहीं रहा ?"    नाऊ एकदम से अपने फार्म में आ गया, " कुछ नहीं सरकार, हमरे तो गँवारू मन में यही चल रहा था कि देखो भगवान भी कितनी नाइंसाफ़ी किये है । हमसे फँसती सब की है, हमरे बिना कुछ शुभ हो ही नहीं सकता , फिर भी दुत्तकारे जाते हैं ।"  राजा ने हुँकारी भरी, तो नऊये का हौसला बढ़ा, "अब देखिये हुज़ूर, कि दुनिया आपके आगे सिर उठाये तो सिर कलम कर दिया जाये, लेकिन आप हमरे सामने रोज़ ही मूड़ी झुकाते हैं । जिनको देख के लोगन की हवा गुम हो जाती है, अकड़ ढीली हो जाती है, उनके गरदन पर हमारा उस्तरा चला करता है । है कि नहीं हुज़ूर ?  आपके मोंछ की एक बाल के लिये सिपाही अपनी जान दे दें, अब भला मोंछ और मोंछन की लढ़ाई में  आपसे कोऊ आज तलक जीत सका है ? " सो तो है," राजा मगन हुये ।

"लेकिन हुज़ूर, अब इहाँ कौन देख रहा है कि ई साला नऊआ आपके मोंछन के एक एक बाल को खींच खींच, उनपर कैंची चला रहा है ? इहाँ मोंछन को लेकर जंग छिड़ी है, और हम आपके मोंछ रोज़ ही कतरा करते हैं !" अब राजा असहज हुये, यह बेलगाम नाऊ आगे  कुछ  और न बोल दे । उन्होंने उसके बकबक पर ब्रेक लगायी, "हाँ हाँ ठीक है, मेरा मन खुश होता भया,  बोल क्या ईनाम चाहिये ? " अब नाऊ जी सतर्क हुये, सही मौका है।

लहरा कर प्रतिवाद किया, "अरे नहीं हुज़ूर, ईनाम ऊनाम की कोई बात ही नहीं है, हम तो ऎसे ही कह दिये मन की बात ।" साले का मुँह तो बन्द करना ही पड़ेगा, गरज़े राजा "बोल क्या ईनाम चाहिये, अपने मुँह से बोल लेकिन जो जो यहाँ अभी बोला है, ख़बरदार जो बाहर जाकर किसी से बोला ।"  रंग में आगये नाऊ महाराज, " माई बाप, हमने ईनाम ऊनाम लायक तो कोनो काम नहीं किया, हम तो एकही बात बोले कि आपकी मोंछ पर हमारी कैंची...." राजा दहाड़ने लगे, ( बताया था न कि इन बड़कन के मिज़ाज़ का कोई भरोसा नहीं होता ) , " तू अपना बख़्सीश ले और चलता बन ।" नाऊ सयाने तो मन में झूम उठे, थोड़ा और गरम हों लें तो हम चोट करें । राजकुमारी से एक रात अकेले रहने की इज़ाज़त तो लेकर रहेंगे ।" राजा अब रंभाने लगे, "अरे बोल दे भाई, हाथी लेगा, घोड़ा लेगा, गाँव ज़ागीर चाहिये तो वह भी बोल, लेकिन अपना मुँह बन्द रखना ।" श्रीमान नाऊ ने अब अपना बैटिंग आर्डर बदल दिया,"हुज़ूर ई सब तो बड़े मनई को शोभा देता है, हाथी...ज़ागीर हमसे कहाँ संभलेगा ? "

हुज़्ज़त बढ़ती गयी, अंत में नाऊ श्री ने भूमिका बनायी, "सरकार चीज बस्त लेकर क्या करेंगे ? हम गरीब के बात से आपका मन खुश हुआ तो आप भी हमारा मन खुश कर दीजिये । हमको खुश करके अगर आपको खुश होना ही है तो बस हमको खुश कर दीजिये, चाहे जैसे... हम आगे कुछ नहीं बोलेंगे । हमको तो सिरिफ़ खुश होने से मतलब है ।"  राजा किचकिचा गये, "अबे  खुशखुश् खुशखुश किये जा रहा है, कुछ मुँह भी खोलेगा कि लगाऊँ दो जूते ?" नाऊ अब मन ही मन मुस्काया, थोड़ा और पगला जायें, तब तो हम कबूलवा ही लेंगे...जो हम चाहते हैं । मज़बूरी सब मंज़ूर करा देती है । वह मिमिया कर बोला, "हज़ूर चाहे दो जूते लगायें चाहे दो लाख ? हम उज़ुर ( उज़्र ) नहीं करेंगे । हमको तो बस खुश होने से मतलब है, ताकि हम भी कह सकें कि हम जिस मोंछ को जी जान से इतना तराशे भये हैं, उस मोंछ की शान में हुज़ूर ने बट्टा नहीं लगने दिया ।"

"यह तो बज़्ज़र हरामी है । मुँह भी नहीं खोल रहा है और इतने देर से मेरा मोंछ  खींचे जा रहा है कि बस, खुश्श कर दो .. कुछ लेंगे नहीं !"  राजा को अब गश आने लगा , हताशा में जो कुछ उनके मुखारबिन्द से झर रहा था, वह यहाँ ब्लागित किया जाना संभव नहीं है ( यहाँ से दो पेज़ बाँयें जा कर धाक गली 47 के क्रम संख्या 1857 पर इन का ज़ायज़ा लिया जा सकता है, कुत्तों से सावधान का बोर्ड घुँधला गया है, अपना ख्याल रखें )

चमगोईंयाँ की आहट पाकर मंत्री जी भी आगये, तुरंत माज़रा समझ गये । मंत्री जी ने आन बिहाफ़ आफ़ राजा साहब   नऊये से  एक दिन की मोहलत माँग कर उसे विदा किया । समेट रहा हूँ..   दो घड़ी बाद लौट कर, गुप्तचरों से प्राप्त जानकारी का निष्कर्ष राजा को रटवा दिया कि बस आप यही बोलना । फिर देखियेगा कि नाऊश्री कैसे नहीं खुश होते हैं ? राजा को संशय तो था किंतु लाचार थे , एक बार यही सही !

अगले दिन सज वज के नाऊश्री पधारे, सबको मात दे देने की अदा से सलाम किया । राजा ने देखते ही उनको एक ज़रूरी बात कहने को अपने पास बुलाया, और उसके कान में कुछ कहा । नाऊ एकदम से उछल पड़ा, हर्ष से नाच ही तो पड़ा," हज़ूर, आपने तो तबियत खुश कर दी । अरे सरकार आप नहीं समझेंगे कि हमने इसमें कितना दिमाग लगाया था । सरकार अगर हम कुछ देने लायक होते तो हम आप ही को कुछ इकराम दे देते । अब चलने दीजिये हज़ूर, एक बार हम अपनी आँख से जी भर के तो देख लें । तबियत खुश हो गयी , सरकार !"

राजा ने डपट कर पूछा,"अबे इतने कशीदे मत पढ़, सीधे सीधे बता कि तू खुश तो हुआ नऊये ?"                                                                 

नऊआ वहीं कलाबाजी खा गया, "अरे माई बाप, भला कौन नहीं खुश होगा । यह तो ऎसी चीज़ है की इस दुनिया का कौन नहीं खुश होगा ?               हम बहुत खुश हैं सरकार, बहुतै खुश !"

अब बारी राजा साहब की थी । वह चारों ओर गरदन घुमा कर दरबार का ज़ायज़ा लेते हुये , सगर्व बोले, " तो नऊये, तू खुश हुआ यानि कि हमारा देना पावना बरोबर !" नऊआ अब सहमा, फँस गये गुरु, " जी ऎसा ही समझा जाये, सरकार ।" और चलने को हुआ, कि राजा ने चुटकी ली," मतलब  तुम्हें ऎसे ही खुशी मिला करे तो किसी की मूँछ पर लपकोगे तो नहीं ? " नऊये ने पीछा छुड़ाया, "किसी की मूँछ क्या, अपनी मूँछ का भी ख़्याल मन से निकाल देंगे ।" उसने पूरे दरबार को जै राम जी की बोली, और सरपट चलता बना !

हमसे भूल हो गयी ;  वह क्या कि नऊआ की ख़ुशी में मैं भी बह गया । आप सब भी सोच रहे होंगे कि यह कोई आर्ट फ़िल्म की स्क्रिप्ट जैसे बीच में ही दि ऎन्ड कैसे हो गया ? गुप्तचरों ने सूचना क्या दी थी ? नउआ हर्षाया क्यों ?

दरअसल गुप्तचरों के अनुसार नाऊश्री एक ब्लाग लिखते थे ' तेरी कहानी - मेरे कैंचीं उस्तरे की ज़ुबानी' ' यह ब्लाग उनके दुश्मनों से निपटने के काम आता था । उनके उस्तरे के धार की बड़ी धाक थी । कैंचीं उस्तरे के बीच प्रतीकात्मक लड़ाई भी हुआ करती थी । लिहाज़ा यहाँ कोई आता जाता नहीं था । नाऊश्री यहाँ स्वयं स्खलित होकर संतुष्ट हो लेते थे, बस ! वह नोटिस न लिये जाने से भी परेशान रहा करते थे कि राजा ने उनके कान में भर दिया कि वहाँ टिप्पणी आयी है, व रातोंरात हिट संख्या ढाईगुनी हो गयी है । समझा तो यह भी जाता है कि इतनी सघन आवाजाही से स्टैटकाउंटर भी पनाह माँग गया । अब इससे कौन खुश नहीं होगा ? क्या आप खुश न होते ? नऊआ खुश हो रहा है, तो क्या बेज़ा है ?                                       मुस्कुराइये और आप भी इनकी खुशी में बह लीजिये । चलता हूँ, नमस्कार !

इससे आगे

26 May 2008

लो सुनो भाई, राजा और नउआ का किस्सा

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कहानियाँ बहुत समय पहले ही होती थीं, आज़ का सच कौन सुनना चाहता है ? तो, बहुत समय पहले की बात है , एक राजा थे  और एक उनका मुँहलगा नाई ! नाई उस्तरे का धनी किंतु बुद्धि का भोथड़ा था , पर बनता होशियार था । हर जगह अपनी टाँग घुसेरने को तत्पर ! उसके मन में आया कि यह काजू मेवे खाने वाला राजा भला हगता क्या होगा ?  जरा किसी दिन देखा जाये , कैसे भला ?  मुश्किल है । कोई मुश्किल नहीं, नाऊन ने सुझाया । उनको सुबह टहलाने व खुली हवा में मालिश करने ले ही जाते हो, एक दिन ज़ुलाब दे दो । इसमें तो अच्छे अच्छे ढीले हो जाते हैं, क्या राजा क्या प्रजा ?  बस असलियत देख लेना, और सुना है कि उनके दो सींग भी हैं, कनज़ेनिटल एनामेली ! पगड़ी में छुपाये रहते हैं, लगे हाथ यह भी देख लेना तो मैं रानी जी से कुछ ईनाम वगैरह झटक लाऊँगी । बहुत अपने को  बनती हैं ।

सो अगली सुबह उनको नसवार में मिला कर ज़ुलाब सुँघा दिया । फेंट नहीं रहा हूँ  हलचल यह तो अपने देश के प्राचीन फार्मा वालों के स्वर्णकाल का कमाल था । मुश्किल से दो मील गये होंगे कि गुड़गुड़ गुड़गुड़ होने लगी । राजा असहज हो चलने लगे, बोले बम्बक आज वापस हो लिया जाये । बम्बक नाम था नाई का, मगन हो गया कि लगता है तीर सही निशाने पर जा रहा है । वह उनको बहटियाने लगा, हज़ूर ये..तो हज़ूर वो । कोयल का संगीत, शीतल बयार, झरझर झरना, मनोरम लालिमा जैसी कवियों की भाषा बोलने लगा । राजा हो गये बेचैन । अंदर से गुड़गुड़ गुड़गुड़ जोर मारने लगा, यह गुड़गुड़ तो समदर्शी है, उसके लिये सब बराबर, क्या राजा और क्या प्रजा ?

गुड़गुड़ की आवाज़ भला कभी दबायी जा सकी है ? आश्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्शश्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्शश्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्श्द्फ़ फ़  स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स़्अ़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़व्व्व्व्व्व्व्व्व्व्व्व्वद्द्व्च्च्च्च्च्च्व०००                                                                               नहीं पढ़ पा रहे हैं ? कोई बात नहीं ! ऎसा पढ़े लिखों के साथ अक्सर हो जाता है । अनायास छोटी, मेरी काकर स्पेनियल बिच आकर लाड़ से इस कीबोर्ड पर बैठ गयी, और यह अनोखी स्वरलिपि तैयार हो गयी । चलिये, आप भी इसके साक्षी बन कृतार्थ हो लें, दि फ़र्स्ट कंट्रिब्यूशन आफ़ ए बीस्ट इन हिंदी ब्लागिंग ! एक और शोध प्रबंध का मसाला, क्या यह वाईकिपीडिया को भेज दूँ ? चौपाल पर चल रहे  किस्से कहानियों में तो ऎसे इंटरवल आते ही रहते हैं, यह शायद पहला है, ब्लागर पर ! नाहर जी, क्या बोलते आप ? है ना !

तो, गुड़गुड़ गुड़गुड़ की गुड़गुड़ी पेट में बजाते हुये राजा साहब तिलमिला कर खेतों की तरफ़ भागे, और झट एक पेड़ की आड़ में बैठ गये चूड़ीदार उतारते उतारते भी खराब हो ही गयी । निवृत्त हो चैन की साँस लेते हुये कमर में अपनी पगड़ी लपेटे हुये लौटे । बम्बक नाऊ को जो देखना था वह, और जो न देखना था वह भी, यानि सब कुछ  दिख गया । अब नउये के हाज़में की दवा तो हकीम लुकमान के पास भी नहीं थी । सो, बात इधर उधर फैलने लगी, गुप्तचरों ने आकर सूचना दी कि राज्य की प्रजा हज़ूर माई बाप की खिल्ली उड़ा रही है । क्या कहती है, प्रजा ?  राजा ने व्यग्र हो कर पूछा । क्या बोलते वह, गुप्तचर मुँह छिपा कर  हँसी रोकने  में असमर्थ हो रो पड़े । क्या है ?

क्या है भाई, बोलोगे भी ? अनिष्ट की आशंका से यह राजा लोग बहुत जल्दी सहम जाते हैं । हज़ूर जान बख़्स दी जाये, प्रजा में फुसफुसाहट है कि आपके कपड़े खराब हो गये थे, और यह भी कि आपने अपनी पगड़ी में दो सींग छिपा रखे हैं । यह आकृति दोष राज्य की खुशहाली को ग्रहण लगा सकती है । तेल, आटा, अनाज़ों का भाव पहले ही आसमान छू रहा है । बहुत असंतोष पनप रहा है, उनमें । कुछ कीजिये हज़ूर ।

यह बात , बमक उठे राजा ! बम्बक को तुरंत पकड़ लाओ और फौरन खाल खींच कर उसकी स्त्री के पास भिजवा दो । मेरा इतना घोर अपमान,... हाँफने लगे, " और इसके बाद पीटते हुये उसके स्त्री को राज्य से बाहर खदेड़ दो, मतलब LOC के उस पार, फौरन से पेश्तर ! "    यही कहा है कि बड़कन की दोस्ती, जी का जंजाल ! न जाने कितने जन ऎसी दोस्ती में जान गँवा चुके हैं, ख़ल्लास ! नउआ जो कि सयाना माना जाता है, पंडित की लूट में भी अपना हक रखवा लेने की हैसियत बना ली है, सत्ता के नज़दीक आकर गच्चा खा ही गया । बेचारा बम्बट, खाल खींची गयी । नाऊन खदेड़ी गयी । किसी अवसरवादी ने खाल का सौदा कर एक ढोलकिये को बेच दिया । फिर ?

फिर उस खाल को तबले पर मढ़ कर ऊँचे दामो पर बेच दिया गया । इस तबले से बड़े ही खरे बोल फूटते थे । तबले की शोहरत होगयी। राजा को भी सुनने की तलब लगी । महफ़िल सजी, तबले कसे गये, धुँधू ध्धा, धुँधू ध्धा, धँमक्क धिन ध्धा, धँऊह.. हँउ धँऊह, धुँधू ध्धा ।

और फिर तबले ने अपना रंग दिखाना शुरु किया ।                                                                        

एक बोला,  राजा के दो सिंग दो सिंग..हग्ग दिहिन दो सिंग दो सिंग                                                           

दूसरे ने संगत दी,   किंम्म कहाआ किंम्म क्कहा हुँन्न क्कहा किंम्म कहा                                                       

पहले से ज़वाब आयाबंम्बक्क हज़्ज़ाम्म बंम्बक्क हज़्ज़ाम्म  हुँअः बंम्बक्क हज़्ज़ाम्म                           

इतने में दूसरे का ताल बहक गया,   ऊँहुँ ब्लागर तम्माम  ब्लागर तम्माम
पहले ने आगाह किया,   हुँऎंअ हुँः,   त्ताल्ल संभाल्ल दो सिंग दो सिंग
दूसरा जिदिया गया हाँअः ब्ल्लाग्गर त्तम्माम  क्कहाः ब्ल्लाग्गर त्तम्माम  

 

भाई कोई बुरा मत मानना, भले ही खाल खींच ली जाये, बात तो हमारे पेट में भी कहाँ पचती है ?70903

दूसरा किस्सा कल देखना, मित्रों । और भी काम हैं दुनिया में....ब्लागिंग के सिवा

इससे आगे

25 May 2008

राजा और नऊआ का किस्सा

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समीर भाई की फ़रमाइश हुई है कि यह किस्सा क्यों दबा गये ? समीर भाई मेरे  बचपन  के साथी एवं सहयोगी भी हैं । सो आपके आगे आना  पड़ा । मौज का मसाला तो मौज में ही लिखेंगे न, दद्दू ? आप तो हेलिकाप्टर पर उड़ रहे हो और मुझ पर  धुर देहाती किस्से का सवाल ठोक दिया । मेरे लड़कईं की यहसब  बातें अब कौन पढ़ेगा , सैलून पार्लर के ज़माने में राजा अउर नउआ ? देख लो भाई, अगर चार ठईं पाठक भी न जुटे तो मुझको क्लेष पहुँचाने के भागीदार बनोगे । अपने को व्यक्त करते रहने की अपनी आदत तो है, किंतु इतना भी ठेलास नहीं सताता कि जुटे रहें, कंम्प्यूटरवा भी कल्ला कर बोले , '' भईय्या, अब अपना रिस्टार्ट ले लो !  ''  वैसे कुछ खलबली तो मेरे अंदर भी मचनी शुरु हो गयी है, पाठक न आवें तो क्या लिखना छोड़ दें ?  जब फ़ुरसतिया हमार कोउ  का करिहे का ताल ठोक हिट हो रहे हैं । पाठक संख्या तराज़ू पर तौले जा रहे हैं, तो मुझ जैसे पसंगे  को ऎसी टुच्ची परवाह नहीं करनी चाहिये, इन पाठकों की ! कोशिश करते हैं।

आज करे सो काल्ह कर

काल्ह करे सो परसों

सब ब्लागर आगे जाय रहें

तुम बोवत रह गये सरसों

तो समीर भाई ने ताव दिलाया कि राजा नउआ का किस्सा भी सुना डालो।  यह उनके फ़रमाइश  करने का निराला अंदाज़ है, उकसा कर कुछ भी ले लेने की अदा । वारी जाऊँ समीर भईया , मेरी अंटी में दबा माल निकलवाय ले रहे हो । नमक से नमक खाय चाहत हो !

आप सब पढ़ रहे हो ना ! तो आप गवाह हो वरना मुझे इतनी जल्दी नहीं थी । अब बताइये कि इतनी उदार हृदय  विशाल काया एक क्षुद्र प्राणी से कुछ माँग रहा है, वह भी एक पोस्ट ! फिर कोई टाल कैसे सकता है ? मैं दानी राजा उशीनर तो नहीं, न ही हर्षवर्धन हूँ । अलबत्ता दधिची में मुझे  गिना जा सकता हैं । माँस नहीं तो हड्डियाँ दे ही सकता हूँ, हड्डी  लटकाये  फिरना भी कोई बुद्धिमानी है ? बाई दि वे,  प्रिय  विज्ञजनों , मेरा यह कौतूहल शांत करें कि उनको अपने जाँघ का माँस क्यों देना पड़ा, क्या तब गोश्त नहीं बिका करता था ?

शोधार्थी जरा इस विषय पर ध्यान दें । हाँ तो, समीर भाई कौन सी कहानी सुनेंगे, नई वाली या फिर पुरानी वाली, या कि दोनों ? यह टंटा आज ही ख़त्म हो जाये, दोनों ही सुनाये देता हूँ ।हुँकारी भले  न भेजो लेकिन कोई सोयेगा तो नहीं ? अगर नींद आये तो .....  ....  ....  प्रमोद,  प्रत्यक्षा, बोधित्सव, यशवंत वगैरह के ब्लाग पर घूमफिर आओ, शायद आँखें खुल जायें । और  यह भी सुनते आना कि  दीपकबाबू का कहिन ?

लो फिर सुनो, पुराना वाला किस्सा..

 भाई माफ़ करना, पंडिताइन पंगा कर रही हैं, अब उठ् भी लो । जाकर चार पैसे कमा कर लाओ, शाम के सात बज रहे हैं ! बस अभी लौट कर सुनाता हूँ, बाकी का हवाल !  इसको लटकाऊँगा नहीं, बदनसीब शाह हनुमानुद्दीन की तरह...यह वादा रहा । नमस्कार !

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24 May 2008

पर मैं यह सब लिख क्यों रहा हूँ ?

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उफ़्फ़ कितनी गर्मी थी, यह अमेरिका, कनाडा व आयरलैंड में बैठे लोग क्या जानें ? वह तो सर्दियों में साइबेरियन प्रवासी पक्षियों की तरह अपने इंडिया आते हैं, और गर्मियों की शुरुआत होते ही फिर फ़ुर्र हो जाते हैं । पर इन बातों का यहाँ क्या लेना देना, फिर मैं यह सब लिख क्यों रहा हूँ ? अब निट्ठल्ला तो बकवास  ही करेगा, न ? सो कर रहा हूँ ! अब आप पढ़ने पर आमदा ही हैं, तो मैं क्या करूँ ?

हाँ, तो इस बार की गर्मी ग्लोबल वार्मिंग और बुश्श के भेज़े के तड़के के साथ आयी है, सो ज़ाहिर है कि कुछ ज़्यादा ही गर्म थी ।  यह कहा जाता है कि गर्मियों में हम डाक्टरों की ज़ेबें भी गर्म हुआ करती हैं, तो भाई मेरे, डाक्टर को खटना भी तो पड़ता है ! और एक आम हिंदुस्तानी को दूसरे की ज़ेब  और अपनी बीबी हमेशा से मोटी लगती आयी है, सो यह एक सार्वभौमिक हिंदुस्तानी वहम है । इसको छोड़ ही दो,   तभी तुम्हें सुख नसीब होगा । मैं सीज़नल प्रैक्टिस नहीं करता हूँ, उल्टी-दस्त के मरीज़ से अपने स्टाइल  में हिस्ट्री लेने लगूँगा तो मेरा चैम्बर ही गँधा जायेगा । लिहाज़ा मन को समझाने को यह ख़्याल अच्छा है कि मैं सीज़नल प्रैक्टिस नहीं करता । फिर भी व्यस्तता कुछ बढ़ ही जाती है, रेफ़रल केसेज़ की वज़ह से । वृश्चिक राशि है ( यह तो गुणीजन अब तक समझ ही गये होंगे ) सो गर्मियों में शिथिल हो फ़ुरसत के लम्हों में कहीं कोने कुचरे में पड़ा रहता हूँ । फिर वही बात यानि ढाक के तीन पात ? मेरी वृश्चिक राशि, मीन लग्न, मेष बुद्धि इत्यादि से अगले को क्या, कोई लग्नपत्रिका तो निकलवानी नहीं है ?  फिर, मैं यह सब लिख क्यों रहा हूँ ?  यह तो आप सोचें कि  आप पढ़ क्यों रहे हैं ?  निट्ठल्ले की साइट है, बल्कि ऊपर डिस्क्लेमर भी  है तो सोच कर संतोष कर लें कि पढ़ तो रहे हैं, यूँ ही निट्ठल्ला ...

मुझे स्वयं ही लगता है कि गलत बयाना ले लिया । यह सइटिया तो यह सोचकर बनायी थी कि अपने निट्ठल्ले क्षणों का कुछ चिंतन यहाँ उकेरूँगा । लोग कविता उविता लिखते हैं, चलो मैं एक नयी विधा  के सृजन में ही थोड़ा हाथ बँटा दूँ । सो, वह तो होता नहीं दिख रहा ।  आपाधापी  में जीने वालों को चिंतन की लक्ज़री कहाँ नसीब है । यदि कोई भदेस विचार मन में कौंध भी गया तो यहाँ तक  आते  आते  और  उन सब को शब्दों में संतुलित करने के प्रयास में ही सब धड़ाम हो जाता है । इस पेज़ के थीम की इज़्ज़त तो जैसे तैसे बची हुयी है।

रुकावट के लिये खेद है..., मूसलचंद खरदूषनचंद की वारिस पंडिताइन यहाँ ताकझाँक कर हँसते हुये चली गयीं । जाते जाते एक बोली कस गयीं वह अलग से, "यह क्या अलाय बलाय लिख रहे हो ?  न कोई सिर पैर है, न कोई विषय ! अगर किसी की टिप्पणी आयेगी भी तो यही होगी कि आप जैसे चुगद को लिखने उखने की कोई तमीज़ भी है ? " उनका हँसना फिर शुरु हो गया । हँस लो भई, हँस लो.., आपकी इसी हँसी में तो मेरी ज़िन्दगी फँसी है ! गृहस्थी के समरांगन में रोज़ ही तो शहीद किया जाता हूँ, तमीज़ से कुछ होता भी है ?

अब कौन बताये कि मानव विकास की श्रृंखला तो अभी कंप्यूटर के कीबोर्ड पर ही आकर थमी हुयी है, ब्लागिंग जिंदाबाद, जय ब्लागर !

                                                            ब्लागर का भविष्य - अमर

बड़े अरमान से रखा है मैंने यहाँ कदम..होओओ... यहाँ कदम,  कि ब्लागर की दुनिया में नहीं कोई खसम...होओओ नहीं कोई खसम,  हौ !  ऎसी आज़ादी और कहाँ ?  देखो अब तक का इतना बेसिर पैर,  मैंने इतने लोगों से पढ़वा लिया कि नहीं ? चाहें, तो भी नहीं छोड़ सकते ।

माईस्पेस व ब्लागर के अंग्रेज़न आंटी की गिरफ़्त से निकलने के बाद  मुझे बड़ा अज़ीब अज़ीब सा लगा यहाँ ! एक तो गुलामी की आदत ऎसी होगयी है कि अपनी हिंदी माता का साफ़ सीधा संवाद यदा कदा भारी लगता है । खैर, जब पूरा देश 60 साल से इसी में जी रहा है, तो सोचता था अपुन अकेला चना क्या करेगा ?  दूसरे यहाँ आकर पाया कि मैं तो जैसे चने की बोरी ही में आ गया हूँ, चलो भाड़ फोड़ने की गुंज़ायश बन रही है,  सब अपने अपने से लग रहे हैं । सब एक दूसरे को अभिवादन कर रहे हैं, ' लगे रहो..जमाये रहिये..क्या बात है! ' यानि कि यहाँ मेट्रोपोलिटन बू आने में अभी क़ाफ़ी समय लगेगा, तब तक तो हम भी जमा ले जायेंगे । अभी तो किसीके बिना कहे हुये भी लगे हुये हैं । हिंदी का अनौपचारिक मिज़ाज़ रास आने लगा । यह बाद में बताऊँगा कि आख़िर मैं यह सब लिख क्यों रहा हूँ ? लगे रहिये

मेरी तो शुरुआत ही चौधरी के पन्ने को पकड़ कर हुई । वह मेरा मेरा कहते रहे और मैं फूँद फाँद कर हलचल पर टँग गया । हलचल जी का  लिंक पकड़  नित्य रात्रि में उड़न खटोले पर उड़ने लगा । लेकिन उड़न तश्तरी के आगे भला खटोले की क्या औकात ?   सो उनको देख धरातल पर आगया । तेरे बस का नहीं है, बंधु ! यह बिरादरी ही दूसरे  किसिम के ज़ीनियसों की है । तू कड़के की तरह ज़ेब में हाथ डाल कर घूम । पहले मंडी का ज़ायज़ा ले , फिर लैस होकर आना । इसी फ़ुरसत में  फ़ुरसतिया दिखे जो धौंस से ज़बरिया लिख रहे हैं । इनका कोउ कुछ कर भी नहीं सकता, ब्रह्महत्या करके कुंभीपाक का वेटिंग टिकट कौन लेगा ?  लेकिन ज़बरिया लिखने का हौसला देख, सोचा, कि जूतों की परवाह मत कर, तमाशा घुस्स के देख । अलबत्ता  नभमार्ग छोड़ दे  बेटा, जलमार्ग पकड़ !  तो उल्टी गंगा बहाने में जुट गया । हिंदी कैसे लिखें ? चुप्पे से ज्ञानदत्त जी के  इंडिक ट्रांसलिटेरशन   विंडो में घुस घुस कर दो पोस्टें  लिख डालीं । लेखन में बहुत सारी चोरियाँ होतीं हैं, सो यही सही ! पर यह सब मैं लिख क्यों रहा हूँ ? 

शायद यहाँ पर अपने  होने को जस्टिफ़ाई  करने के लिये !                                                 

अब तो खुश हो लेयो !  कि राजा अउर नऊआ वाला किस्सा भी आजै सुनाय देई ?

कुछ शेष रहा जा रहा था
उल्टी गंगा पर पहली टिप्पणी उन्मुक्त जी की आयी, एक मीठी झाड़, कुछ आगे भी लिखो टाइप ! 
सारथी से बहुत प्रोत्साहन मिला । हिंदी चिट्ठाजगत के एक आदिपुरुष बंगबंधु का मिज़ाज़  आज
तक नहीं मिला सो नहीं मिला । ज्ञानदत्त जी की प्रेरणा एवं  बरहा के टिप्स भुलाये नहीं जा सकेंगे
इतना सब होने के बावज़ूद भी मेरे मन में यही चल रहा है कि...
मैं यह सब क्यों लिख रहा हूँ ?  Puppy dog eyes

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16 May 2008

जरा सामने तो आओ छलिये .. ..

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अब इन्हें छलिया न कहूँ तो आप ही कोई नाम सुझायें । वैसे तो इनका परिचय  शाह हनुमानुद्दीन के रूप में दिया जा चुका है, पर ये मौके पर हाथ से फिसल जाते हैं नतीज़न इनके इंटरव्यू की तारीख़ दिवानी के मुकदमें की तरह आगे बढ़ती जाती है । ज़ालिम, तुम क्या ब्लागिंग से मेरे उखड़ जाने बाद ही आओगे ? इस माथमंथन की नौबत ही न आती, ग़र मैं इनकी ज़ुस्तज़ू छोड़ किसी हिट होते आदमी को आईना दिखा देता ।smile_embaressed

कल रात की ही बात है, मेरे मित्र मुन्ने उर्फ़ अज़हर खान का एकाएक फोन आया, " अरे यार डाक्टर, अब तुम जम्पिंग ब्लागिंग पर उतर आये हो, आख़िर कौन ज़ल्दी पड़ी है, तुम्हें ? "मैं अचकचा गया, " अमें क्या हो गया मियाँ, और यह जम्पिंग ब्लागिंग क्या बला है ? इसको किस डिक्शनरी से खोद लाये हो, बताओगे ? " वह प्रतिवाद पर उतर आये, "बेट्टा मैं तुमको रेगुलरली वाच कर रहा हूँ, तुम कुछ ज़्यादा ही कूद-फाँद रहे हो ? अरे यार कोई काम का सलीका भी होता होगा कि जब मर्ज़ी जो पकड़ में आ गया, उसीको लेकर ठेल दिया यहाँ ! अब मैं कमेन्ट नहीं कर पाता हूँ तो क्या? " ( मेरा स्वगत कथन - छोड़ो, यह सौजन्य तो अधिकांश ब्लागर बंधु में भी नहीं है, तुम तो महज़ पाठक हो ) मैं-" अब बोलोगे भी मियाँ, क्यों उखड़ रहे हो ? " उनकी आलोचना में मुझे रस आ रहा था, वह भाँप गये । स्वर मद्धिम हुआ, " ट्रैक न छोड़ा करो, एक अच्छी खासी चल रही थीम का कबाड़ा हो जाता है ।"  मसलन ?  मैंने दागा । "अमें मसलन वसलन क्या ? एक दिलचस्प किरदार हनुमानुद्दीन को तुमने अलग टाँग के रख दिया । अब किस भकुये की दिलचस्पी रह गयी होगी कि इन ज़नाब का हश्र क्या हुआ ?"  ( स्वगत- यह किरदार नहीं, बल्कि हक़ीक़त हैं और हस्बे मामूल राँची में कहीं रिक्शा चला रहे होंगे, इनके हश्र को रोने वाला ही कौन है ? ) उधर भाईज़ान चढ़े ही जा रहे  थे, " हिट होने की उतावलनेपन में, आजकल जो भी सामने दिखता है, तुम उसी को पकड़ कर पिल पड़ते हो । ट्रैक न छोड़ो डाक्टर, किसको फ़ुरसत है कि रोज़ रोज़ तुम्हारी एक नयी लंतरानी पढ़े ?smile_nerd

बात में कुछ दम तो है, सब एक दूसरे की पढ़ने में मगन हैं, फ़ुरसत तो शायद  फ़ुरसतिया का पेटेन्ट हुआ चाहता है । ख़ान ठीक कह रहा है, इसको मैं दख़लअंदाज़ी नहीं कहूँगा । मैंने उनको डिसमिस किया, " चलो यार , आज ही निपटाये देते हैं इनको, अब तो ख़ुश ?" और फोन रख के साँस ली Smiley Kiss

पलटा तो देखा कि सामने मेरी ज़िन्दगी का एक शाश्वत दख़लअंदाज़ मौज़ूद है ! पैचान कउन ?  बट नेचुरल पंडिताइन ही हैं, यह इम्यूनिटी उनको ही हासिल है । वह शायद हमारी बातचीत सुन चुकी थीं, सो डिफ़र कर रही थीं । डिफ़र बोले तो डिफ़ेरेंस आफ ओपिनियन ! भले ही एक दो सूत बाँयें दाँयें किसी भी रिलेवेंस को ख़िसका दें, पर डिफ़र करना..असहमत होना, हर ज़ुमला मेरे ख़्याल से के सम्पुट से बोलना इन चोखेरबालियों का जैसे जन्मसिद्ध है ! और यही हुआ, " जब टाइम नहीं है, तो इतना क्यों फैलते जारहे हो ? अचपन पचपन का क्या होगा ? कुछतो उस पर डालो, आज । तुम्हीं बता रहे थे कि अभी टेस्ट पोस्ट है, फिर भी 6 विज़िटर आ चुके हैं, अब तक । न हो तो किसी 8-9 साल पुरानी मैगज़ीन से ही कुछ उठा कर पचपन में डाल दो,ऎसे अच्छा नहीं लग रहा । अब इन दाल-रोटी-चावल ब्राँड को इस हवाई दुनिया के दाँव-पेंच क्या बताऊँ कि यह विज़िटर कोई मेरे पंख नहीं, बल्कि टोही-टटोलू हैं । हमारी इंटरनेट की दुनिया में, बहुतेरे ऎसे धूर्त भी हैं, जिनका काम केवल यहाँ वहाँ टटोलना ही हुआ करता है। Chatterbox

तिरिया से हार मानने का सुख व फ़ायदे कुछ अलग ही हैं, सालिड टर्म डिपाज़िट माफ़िक़ । एक दो बार टेन-लव पर गेम छोड़ दो फिर बाकी उम्र चैन से वाकओवर लेते रहो । चलो आज फिर इन्हीं की मान लो, पचपन के बचपन में ही झाँक लो । ख़ान का क्या बिगड़ जायेगा, भाड़ में जाये ।Praying

वैसे मेरा बहुत मन कर रहा है कि आज रात सुश्री मायावटि को लपेटा जाये । समेट लो अमर बाबू आज इन्हीं को, इनको तुम ही समेट पाओगे । ( यदि दूसरे बंधु भी कतार में हैं, तो अपनी दावेदारी पेश करने के लिये  यहाँ चटका लगायें  ) आजकल सुश्री बहुत चहक चहक कर बहक सी  रहीं हैंBatting Eyelashes

सुना करता हूँ कि कोई मोहतरमा क्लियोपेट्रा हुआ करती थीं, जो गधी के दूध से नहाती थीं, उड़ती उड़ती चर्चा उनके सौंदर्य की भी मेरी जानकारी में आयी है । झूठ नहीं बोलूँगा, मैंने तो उन्हें देखा नहीं । जो देखा नहीं तो मान कैसे लूँ, मैं तो आब्ज़ेक्टिव सांइस का छात्र हूँ । जो देखता हूँ, वही मानूँगा । वैसे देख तो माया जी को भी रहा हूँ, सत्तासुख का निखार चेहरे से फ़ोकसिया सर्चलैट मार रहा है । तबियत खुसकैट हो जाती है, चंदा को देख कर । ऎसा नूर बरकरार रहे, बड़े भाग्य से मिलता है । किसी ज़माने में फोटो स्टुडियो वाले पैसा लेकर भी फोटो खींचने में बत्तीस कोने का मुँह बनाते थे ( अपुष्ट सूत्रों से ) वहीं अब कुमारी श्री के फोटो लेने के लिये बड्डे  बड्डे फोटूबाज़ों में  भी धक्कमधुक्का हुआ करती है । कौन कहता है कि ज़माना नहीं बदला ?  या हमारी नज़रों का ही कसूर हो, कहा नहीं जा सकता ! ऎसे में भला हूर भी कोई चीज़ है ?   लगता है मैं  ही बहक गया । I dont know

लेकिन शायद नहीं, अब देखिये इन्होंने हाथी को पसंद किया । तो अब सभी हाथी देख देख ललचाये जा रहे हैं, तृषित दृष्टि से निहार रहे हैं । इशारा मिलते ही हाथी के पाँव के नीचे भी आने को सन्नद्ध !  कुछेक तो नाँवा लेकर टहल रहे हैं, पता नहीं कब सुश्री का मन बदल जाये । ( बाई द वे, यह हाथी भी तो किसी वर्ण में आता ही होगा, कोई सज्जन जानकारी देंगे ? वाईकेपेडिया में तो नहीं है, नाहर साहब ध्यान दें । खैर, वर्ण वगैरह की बात छोड़िये, अलबत्ता पिछड़ा तो नहीं लगता । देखो, कैसे मदांध डोल रहा है । अभी अभी सूचना मिली है कि हाथी क्रीमी लेयर में रखा गया है, मोटे क्रीमी लेयर में ! महावत गुज़र गया तो क्या, हाथी  भी गया गुज़रा नहीं है । ) माफ़ करियेगा, कुछ ज़्यादा विभोर हो रहा हूँ, बात ही ऎसी है ।

सुश्री जी ने अभी हाल में बीते कल परसों नरसों में अपनी सरकार के जन्मदिन पर करोड़ो लुटा डाले । उसी दिन से सुश्री ने इस पोस्ट की सुरसुरी पैदा कर दी । तीन दिन तक तो पंडिताइन ने दबोच कर रखा, " रानी हैं भाई, वह कुछ भी करें ।" घणी खम्मा अन्नदाता, मैं लम्बी साँस लेकर रह गया । पूरे जोर शोर से समारोह मना, पूछा क्या है भाई ?  फल का ठेला वाला सेब सजाते हुये बगल मुँह करके पिच्च से थूक कर बोला," कुच्छौ नहिं, गौरमिंन्टिया हिट्ट होय गई, वही चिल्लाहट मचाये हैं । बाबूजी सेब तौल दें ?" इतना पूछने के एवज़ में 80 रुपिये किलो का सेब, आरे नाहीं ! ज़शन अपने टशन पर है, बन्देमातरम कहना होगा वाले अंछल-कंछल बिरझ गये वरना उस दिन प्रदेश में सबकुछ मुफ़्त में मुहैया किया जाना था ।Chow time!

ज़िन्दे रह कुड़ी, लक्ख लक्ख पद्धाईयाँ । तेरी और तेरे चमचों की उमर हज़ार बरस होवे । हर वर्ष यदि 85-90 करोड़ रूपिये लुटाती रहीं तो हज़ार छोड़, दहाई बरस में ही शहद की नदियाँ बहेंगी और हर खरा खोटा शुद्ध दूध से कुल्ला करते पाया जायेगा । ठीक कैंदा तुस्सी, ज़िन्दे रह पुत्तर !Birthday Cake

मेरे अंदर बैठे सतत आलोचना ने कुलबुला कर आगाह किया, ' फिर बहक रहे हो, डाक्टर । आख़िर उसने लुटाये तो, तुम्हीं पर ही तो लुटाये । तुम थाली में छेद करने वाली बातें बंद करो । ' मैं अपनी आत्मा कुचल कर बैठ गया । लेकिन कितने देर तक कुचल कर रखोगे ?  ज़्यादा कुचलोगे तो हम भी अपनी सरकार बना कर बैठ जायेंगे । मियाँ की जूती और दुनिया का सिर ! पैसा हमारा और ख़ज़ाना खोल दिया आपने, जन्मदिन के नाम पर, कैसे ? भाई, बड़े बड़े अख़बार तो यही कह रहे हैं कि ख़ज़ाना लुटाया । हमीं पर लुटाया और हमारा ही लुटाया, तो ढिंढ़ोरचियों को क्या तक़लीफ़ ?Tongue

मन रे तू काहे न धीर धरे ?  फिर अंदर से एक चिकोटी आयी, खुल के बोलता क्यों नहीं, कि क्या राजकीय कोष किसी ख़ास दिन ही खोले जाने का प्राविधान है ?  हाँ बहना, ज़वाब दो कि चाहे जितनी भी कल्याणकारी योजना हो, किस प्रोटोकाल से एक विशिष्ट मंच से जतलायी गयीं ? पइसा हमारा और राजनीति तुम्हारी, अंगीठी पब्लिकिया की, और  रोटी तुम सेंको ! और घोषणा करने का सबब ? अच्छा काम चुपचाप भी किया जा सकता है ।Thinking

जनता ? उसकी छोड़ो, यहाँ तो मनचले लौंडे भी बूँदी चाटते हुये  गाते जा रहे हैं, " कसमें वादे, आसुवासन सब घोषणा हैं, घोषणा का क्या.... कोई किसी का नहीं राजाआआअनीति में...सब घोषणा है.. घोषणा से चौंधियाना क्याऽ ..ऽ बड़े शरारती हैं यह लड़के ? हँसी ठठ्ठा में भी सच बोल रहें हैं। मेरा मन हो रहा है, पीछे से पुकार कर कहूँ, " अरे लड़कों, यह चौंध नहीं, औंध है । तुम्हरे बप्पा चिरकाल से औंधे पड़े थे, तो औंधे पड़े रहें ! तुम भी जब पहाड़ के नीचे आओगे तो औंधे हो जाओगे । जो कर रहे हो, मन लगा कर करो, बूँदी मिली है..तो बूँदी खाओ ! इन योजनाओं के ब्लूप्रिंट बनने में ही कितना इधर से उधर हो जायेगा, ख़बरदार सूँघने की कोशिश भी न करना । बूँदी मिली है.. .. बूँदी खाओ Dancing

इस बार अंतर्मन चिल्ला पड़ा, " अमें हद्द कर दिया, बहकने की भी कोई लिमिट होती है, नहीं लिखते तो लिखते ही नहीं ! लिखने लगते हो तो बेलगाम हो जाते हो । क्या सफ़ाई दोगे पाठकों को, तुम्हारा हनुमानुद्दीन आज फिर कहाँ रह गया ? हरिभजन छोड़ के डेढ़ घंटे से कपास ओट रहे हो, यूज़लेसली ! " चिल्ला लो भाई, मैंने तो ईमानदारी से जो मन में आया सो लिख दिया । ब्लगियाना इसी को तो कहते हैं, फिर चिल्लाये क्यों ?Lighting

रहा सवाल हनुमानुद्दीन का ?  तो चिल्लाओ उल्लाओ मत भाई, उसको तो रह ही जाना था । बड़े लोगों के बीच, इस आम आदमी को घुसेड़ोगे तो मुँह की खाओगे । आगे कोशिश भी न करना । हनुमानुद्दीन क्यों नहीं मिलेगा ? सामने ज़रूर आयेगा एक दिन ! पोलिंग वाले दिन लोग उसको पकड़ कर बाहर निकाल ही लेंगे , लगे हाथ तुम भी अपना इंटरव्यू ले लेना । उन दिनों उसकी टी०आर०पी० भी हाई रहती है, लोग पैसे देकर तुम्हारा ब्लाग पढ़ेंगे । माफ़ करना अज़हर भाई, आज तो न ख़ुदा ही मिला न विसाले सनम , एक मौका और दो । नमस्कार ! Wave

इससे आगे

14 May 2008

आओ सखि जरा निन्दिया लें

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दूर कहीं किसीके रेडियो से गाने की आवाज़ सन्नाटे से संघर्ष करके आती प्रतीत हो रही है । नहीं जी, मैं बहरा नहीं हूँ,गाने का प्रतीत होना एक अलग तरह का एहसास है । गाना गाया जारहा है, यह निर्विवादित होता है, धुन भी चिरपरिचित लग रही है, किंतु स्पष्टता के अभाव में, आप गाने के बोल नहीं पकड़ पा रहें हैं, तो इसे क्या कहेंगे ? मन को अशांत कर देने वाली छटपटाहट ! साइडरूम से कुछ खाना खा कर लौटा, तो अनमने ढंग से टी०वी० खोल कर बैठ गया, जरा देखा जाये कि बाहर की दुनिया में क्या चल रहा है ? वैसे टी०वी० में मेरी आस्था न के बराबर रह गयी है, पर कोई और चारा भी नहीं है । ब्लगियाऊँगा तो शायद रात ही न बीत जाये । छोड़ो, सुबह लौटना भी है, अपनी  प्रैक्टिस के  दिहाड़ी  पर !

कल रात से हम तोता-मैना यहाँ प्रवास कर रहे हैं , रायबरेली से तीस किलोमीटर पर  डलमऊ स्थित नहर विभाग के अतिथिगृह  में । गंगा के ठीक किनारे एक ऊँचे टीले पर टिका यह गेस्टहाउस बड़ी शांति देता है, किंतु यह गाना मुझे क्यों अशांत कर रहा है ? दरअसल इसकी धुन व लयबद्धता से यह तो पक्का है कि लता जी का स्वर है, किंतु मुझे उनका कोई ऎसा गाना याद नहीं आता, " Note हम हिंदूस्तान में रहने वालों को..ओऽ ..ऽ, चैन कहाँऽ हाये ए एऽ आराम कहाँ, हम.. हिंन्दस्ताँ में रहने वालों को ओ ओ ओऽ Crying ^"

मैं शर्त लगा सकता हूँ कि ऎसा कोई गाना ही नहीं है, लेकिन इसके धुन से मेरे दिमाग में तो यही बज रहा है, क्या करें ? मेरी बालीवुड एनसाइक्लोपेडिया पंडिताइन मेरी मदद अवश्य करती किंतु वह तो खाना खाकर लौटते ही ध्यानस्थ हो गयी । इस समय वह निद्रायोग में परमब्रह्म से एकाकार होती सी लग रहीं हैं, चलो यह वरदान तो बिरलों को ही नसीब है । मैं  यहाँ  आ गया था कि एक दिन में लगकर अपने सभी ब्लाग्स को रिस्ट्रक्चर कर लूँगा, पंडिताइन का एक शनिवार चुरा लिया था, वह भी उनको लौटा दूँगा । आज सोनिया गाँधी रायबरेली आ रहीं हैं, सो शहर में बड़ी अफ़रा तफ़री रहेगी । यहाँ तो अर्ज़ुन सिंहों की भरमार है, एक ढूँढो तो दस हज़ार मिलेंगे । हर उम्र जाति वर्ण और ओहदे के अर्ज़ुन सिंह, हर गली गली में देखो । वैसे भी फ़िज़िक्स के नियम के अनुसार सोनियाजी के आने पर मैं निष्क्रिय होकर अवक्षेपित हो जाता हूँ, एक किनारे को !

हाँ, याद आया कि दिमाग में 'चैन कहाँ-आराम कहाँ Sad ' क्यों हो रहा है । टी०वी० पर बाहरी दुनिया का हाल देखने की नौबत ही नहीं आयी । यहाँ तो अपने ही घर में धूम-धड़ाम चल रहा है, जयपुर में धमाकों को लेकर । चैनलों की सक्रियता एवं धाक के मुताबिक इनकी गिनती 6 से 8 के दरम्यान डोलती फिर रही थी । एक ज़नाब तो रस्सी पकड़े पकड़े इतनी देर से साँप साँप चिल्ला रहे थे कि साला टीवीए बंद कर देना पड़ा । एकठो निष्क्रिय किया हुआ बम पा गये थे । उसी को उधेड़ उधेड़ पूरे देश को दिखा रहे थे , 65 उजड़े परिवारों की बाइट से आह्लादित एवं बिछोह की वेदना से बिलखती महिला को कैमरेCamera में कैद कर लेने की सफलता से परम उत्साहित । ऎसा अवसर दुबारा नहीं आयेगा, न तो उनके लिये और न उस बेचारी महिला के लिये । कुछ बरबादियाँ अपने को कभी रिपीट नहीं करतीं, न ही मौत दुबारा दस्तक देने आती है । दे आर जस्ट वन टाइम डील !

                            जाने वाले लौट के आ-अमर ्जैअपुर जयपुर-अमर जैयपुर धमाके-अमर

हटाओ यार, अपना मन ख़राब मत करो । यह असहमति की स्थिति मेरे आसपास ही निरंतर क्यों मँडराया करती है ? यह क्या वस्तुस्थिति का अस्वीकार नहीं कहलायगा ? संभालो अपने को, यही सब अपने मन को समझाता मैं गंगा पर बनते पुल को नीम अँधेरे में अनमना निहारता रहा। लौटा कि टीवी बंद न करूँ तो आवाज़ ही कम कर दूँ ,वरना पंडिताइन अपने खर्राटा तप में विघ्न पड़ने से जग गयीं तो इस निशाचर की ख़ैर नहीं

लेटा लेटा चलते हुये कैप्शन देखता हुआ निन्दियाने का प्रयास कर रहा था कि ज़बरन मेरे दिमाग के साथ एक हादसा होगया । सामने स्क्रीन पर स्क्राल कर रहा है, " राष्ट्रपति ने धमाकों की निन्दा की...प्रधानमंत्री ने घटना की निन्दा की... सोनिया ने भी निन्दा की... वामपक्ष ने निन्दा की... विपक्ष ने निन्दा की... इसने निन्दा की.. उसने निन्दा की.. सबने निन्दा की.. बिन्दा ने निन्दा की.. स्वयं निन्दा ने निन्दा की !" हद है भाई !

अब इतनी निन्दा भी ठीक नहीं कि बेचारे हूज़ी फ़ूज़ी के लड़के शर्म से पानी पानी हो जायें । चलिये मान लेते हैं कि बाहर से आये हैं, देन दे मस्ट बी ट्रीटेट लाइक ' देवो भवः '। भर्त्सना करते तो भी गनीमत, उनको छोड़ अपनी ही आधी जनसंख्या इसके मानी न समझ पाती । और यहाँ हर छोटा बड़ा निन्दा पर उतारू ! अब इतनी निन्दा अच्छी बात नहीं है, ' ज़ंग तो नहीं छेड़ाऽ..आऽऽ, दस्तक ही तो दी हैऽऽ ..ऽ, हंगामा है क्यूँ बरपाऽ.. आऽऽ  ऽ , बम ही तो फोड़ी है ' इन्हीं उल्टे पुल्टे विचारों के साथ निन्दिया से बोझिल होती आँखों से यह पोस्ट लिख रहा हूँ कि बाहर के सन्नाटे को भंग करती आवाज़ें आने लगीं.., ' हुँआ हों हों हुँआ हुँआ..हुँआहुँआहुँआ हुँआ हुँआ होंहुँआ ' फिर सहस्त्रों हुँआ हुँआ से रात थर्राने लगी । बहुत दिनों के बाद असली सियार या फिर गीदड़ की आवाज़ सुनी है । शायद वह भी निन्दा कर रहे हैं, या मुझे ललकार रहे हैं, ललकारेंगे क्या भला ? इनकी तो गीदड़भभकी ही सुहाती है । रात के सन्नाटे में या समझो इस समय पूरे देश  में पसरे सन्नाटे में यह इनका समवेत क्रंदन है ।  कहीं मुझे तो नहीं न्योत रहे हैं कि भाई बिरादर तुमने तो निन्दा की ही नहीं सो ' आओ सखे जरा निन्दिया लें ' । उन उजड़े सुहागों और घायलों के तीमारदारों को छोड़ सभी सो चुके हैं । मैं भी जा रहा हूँ लंबी तानने, तुम धिक्कारते रहो या निन्दियाते रहो, नो वन केयर्स यू ब्लडी इंडियन गीदड़्स !        आप सब को भी नाचीज़ की शुभ    जैसी तैसी रात्रि !

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10 May 2008

मैं मोटा क्यों हूँ...मैं मोटा क्यूँ हूँ ?

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अरे भाई बिरादर, जब ऋतिक रोशन जैसी फ़िगर न रही, तो खिसियाहट मिटाने को यही पैरोडी बाथरूम में घुसते हुये, लोगों को जोर से सुनाते हुए, गुनगुना कर काम चलाना पड़ता है । हँसिये मत भाई, सही में इसे मैं काम चलाना ही कहूँगा, मज़बूरी है । अपने चाणक्य बाबा मलेच्छ भाषा में कह गये हैं, ( मलेच्छों का प्रवेश वर्जित तो नहीं ? ) Offence is the best Defence सो उनका अनुसरण  करते हुये, दूसरों के हँसने से पहले मैं स्वयं ही गाने लगता हूँ । अगला भला क्या खाकर कोई किसी छिनरो का भतार छीनेगा ? जरा नमूना देख लीजिये, यह मैं नहीं, मैन्यूल  है, बोले तो मेरा फिज़िशियन  सैम्पल!

अड़सठ तो नहींहो-अमर       बेचारा मैनुअल - अमर    साला हमसे बराबरी करेगा - अमर      

अरे, कोई पूछ भी लो कि मैं यह सब क्यों लिख रहा हूँ ? छोड़ो, मैं स्वयं ही बेशर्म नेताओं की तरह अपना स्पष्टीकरण दिये देता हूँ । दरअसल पिछले महीनों से मेरा वज़न अचानक बढ़्ने लगा । 68 किलो के सदाबहार देवानंद, शनैः शनैः उत्सव  के अमज़द खान की तरह होने लगा, कोई कहता कि आप पचपन के नहीं लगते तो मैं लक्का कबूतर सा गरदन नचा कर कहता, " अभी तो पचपन का बचपन है, यार ! " किंतु पता नहीं कौन सी टेलीपैथी हुयी कि जिस दिन मेरी   पंडिताइन ने  श्री ज्ञानदत्त जी का फोटू देख कर कहा, "अरे, यह तो तुम्हारे उम्र के ही लगते हैं, लेकिन खासे मोटे हैं ! " बस्स यारों, समझो उसी दिन मेरी फ़ुरसत हो गयी ।  ज्ञानदत्त जी का बोलबाला था उन दिनों हमारी गृहस्थी में, वह मेरी पोस्टों के सोलो शोमैन यानि टिप्पणीकार थे । आख़िर यह ज़नानियाँ दूसरों के पति से अपने की तुलना ही क्यों किया करती हैं ? उसके वो हमारे इनसे मोटे हैं, हमारे ये उ्सके आदमी से तो लाखगुना अच्छे हैं, गोया आदमी न हो गया हैंगर से उतारा कपड़ा होगया । इतराती हुई बलखाती हुई, बोलीं बहुत जतन किये हैं, इन हाथों नें ! ममता जी, आप यह पोस्ट पढ़ रही हैं, ठीक ठाक लग रहा है, यहाँ ? हाँ तो, जरा हमारे पाठकों को यह बतायेंगी कि ऎसा क्यों सोचा जाता है ? और यह कि महिलाओं की गोष्ठियों में पतियों का तुलनात्मक अध्ययन/ परिचर्चा क्यों अनिवार्य हुआ करती है ? हाँ तो ....

मैं चिढ़ जाता हूँ, ऎसी तुलनाओं से ! अरे, तुम तो दिन में दस बार, जब मर्ज़ी आया पति को धोकर टाँग देती हो । चलो, इसे मुहब्बत करने का सितम मान लेते हैं ( और चारा भी क्या है ? चारा डिपार्टमेन्ट भी तो इन्हीं का है ), सो सब सिर आँखों मंज़ूर ! लेकिन क्या ज़रूरी है, गैरपुरुषों पर टीका टिप्पणी करना ? क्यों जताया जाता हैं, कि सर्फ़ से सहेज़ा गया है, या घड़ी डिटरज़ेन्ट से रगड़ा जाता है,यह चोखेरवालियों का पोस्ट कांटेन्ट ?

सो, श्रीमान गुरु जी के मोटा कहे जाने पर मेरा क्लेश क्रोध बन कर, कलहप्रिया पर फूटा । उसी पल, जैसे किसी टेलीपैथी से मैं शापग्रस्त हो गया । वैशाख के गदहे की तरह मैं दिनोंदिन मोटा होने लगा । मित्रों की भ्रुकुटियाँ व्यंगात्मक तंज़ में चौड़ी होने लगीं । मैं बेचारा क्या कहता, दस वर्षों से तो मेन्टेन कर रहा हूँ । दही, मट्ठा, छाछ, सत्तू का शरबत, ढेरों फल व ब्लैक काफ़ी पर दिन गुज़रता है, रात में भोजन के नाम पर चिड़िया का चुग्गा व सवासेर सब्ज़ी ! बीच में यदि कभी ज़रूरत हुयी तो गुड़-चूड़ा या लाई-चना से तृप्त हो लेता हूँ, अब मोटा हो रहा हूँ तो क्या प्राण तज दूँ ?

सलाहें आने लगीं, नियति मुस्कुराने लगी, पंडिताइन गुर्राने लगीं, " मार्निंग वाक पर जाओ, कल से ! " मैं जनम जनम का निशाचर, एकदम काँप गया । 'हाय भगवान, मैंने कितनों को अब तक टहला दिया, अब तुम मुझे टहला रहे हो ?'  फ़ीस ज़ेब के हवाले कर, मरीज़ों को टहलाना तो मेरे पेशे की ज़रूरत है । न टहलाऊँ तो बाबा रामदेव उनको हँका ले जायेंगे । अब तुम मुझे तो न टहलाओ, दीनबंधु दीनानाथ ! यह भला क्यों सुनें ? वैसे भी हाइटेक बाबाओं ने उनको फ़ुसला लिया है, वह वहीं सुगंधित वातावरण में डोलते हैं । लिहाज़ा टहलने की सज़ा की तारीख़ तक तय हो गयी।

पहली सुबह, एलार्म बज पड़ा । माई कसम, अग़र घड़ी विदेशी न होती, तो उठा कर बाहर फेंक देता । नहीं फेंक पाया और वह मेरे कानों में किर्राती रही । किर्राओ, जितना किर्राना है, हम न उठेंगे । पंडिताइन का प्रवेश....," उठो यार, पहले दिन ही मक्कारी कर रहे हो ।" तुम भी चलो, मैंने शो करवाना चाहा ।" नहीं नहीं तुम जाओ, मुझे कितना काम है, वह कौन करेगा ? बच्चे अभी पढ़ रहे हैं, तुम्हें ज़्यादा ज़रूरी है । कहीं कुछ हो गया, तो मैं क्या करूँगी ?" लो, मेरे स्वास्थ्य में भी एक अर्थशास्त्र छिपा है । मज़बूरी का दूसरा नाम मिडिल क्लास आदमी है, देख लीजिये यहाँ !चल्लो..उट्ठो, दिन भर बैठे रहते हो । क्लिनिक, कार, कम्प्यूटर भला खड़े होकर भी चलाई जा सकती है ? इस नादान को कौन समझाये ? इतने में फाइनल वर्डिक्ट आ गया," जाओ कम से कम ओवरब्रिज़ तक तो हो आओ ।" मैं पड़ा पड़ा दार्शनिक होने लगा, ' नारी तेरे रूप अनेक ' रात में तो प्राणप्यारी लग रही थीं, अब इस समय प्राणहत्यारी का जलवा बिखेर रही हो । कसम देकर एक कटोरी खीर दी थी, अब पद्दी पदाने पर आमदा !smile_angry खैर, जो न होना चाहिये था, वह होकर रहा । मुझे घर से निकलना ही पड़ा । धकियाया गया, पैर घसीटते हुये चल पड़े, जायें तो जायें कहाँ ?Sleepy

अज़ब गज़ब नज़ारा, लगता था पूरे शहर के बेडौल डील डौल वालों की कोई रैली चल रही हो । उचकते, भचकते सभी भागे जा रहे हैं, उत्तर को ! नज़रें चुराते हुये हम भी शामिल हो लिये, इस अनोखे कारवाँ में । कुछ शिकारी निगाहों ने मुझे ताड़ लिया, पीछे लग लिये, " डाक्टर साहब, इस डायबिटीज़ में बेल का शरबत लेना चाहिये , और हरा कद्दू ? अबे कद्दू तो तू खुद ही लग रहा है, अब तू किस कद्दू को खायेगा ?Eye-rolling क़ोफ़्त होने लगी ।

सुबह की अपनी अच्छी खासी तरो-ताज़ा खोपड़ी कई जगह चटवाते, नुचवाते, सरकारें बनवाते गिरवाते , अंत में मंत्रिमंडल में फेरबदल करवा कर ही घर लौटा । पंडिताइन के आशा के विपरीत, मैं चहकते हुये घर में दाखिल हुआ । पंडिताइन भौंचक, फिर सहसा पैंतरा बदल, वह भी राग हर्षित में संगत देने लगीं, "देखा, एक ही दिन में कितना फ़र्क़ पड़ गया ।" हुँह, कीतना फरक पर गिआ ? बोला कुछ नहीं, कुछ न बोलो तो बीबी की परेशानी का कोई ओर-छोर नहीं मिलता ( आप भी यह मंतर आज मुझसे मोफ़त में लेलो ), मैं तो अपनी अन्य उपलब्धियों पर झूम रहा था, शहर के बहुत सारे सहतोंदू एक साथ, इस अवसर पर मिले । किबला तोंदू तो मैं भी हूँ, तभी तो इन गणमान्यों को सहतोंदू कह रहा हूँ । इन सहतोंदुओं में, अपनी पकड़ में आने वाले कई को चिन्हित किया, और उनसे अतिप्रेम से मिला । अब यह समझो कि प्रैक्टिस में, कुछ नहीं तो 15% का इज़ाफ़ा तो कहीं गया नहीं है ।Wink 

मुझसे कोई उचित रिस्पांस न पाकर पंडिताइन अपने में व्यस्त हो गयीं । अंदर शायद किसी से फोन पर बात हो रही थी, " हाँ हाँ, हाँ हाँ हैं ! हाँ घर में ही हैं, अभी अभी वाक कर के लौटे हैं, थोड़ा (?) रिलैक्स हो रहे हैं । मैं बता दूँगी, वह 8 बजे तक ख़ुद ही बात कर लेंगे । जी अच्छा, जी अच्छा, नमस्कार !" अरे ! यह तो एक दूसरे तरह की उपलब्धि हाथ में आ गयी, ' अभी अभी वाक कर के लौटे हैं ' में उनका दर्प इस कदर टपक रहा था कि मानो मेरे जैसी शूरता शायद ही किसी मर्द के बच्चे ने दिखायी हो । अब तो शाम तक मेरा पूरा समाज़, मेरी इस मर्दानगी से वाक़िफ़ हो जायेगा, बड़ा तेज चैनल है इनका। सीना चौड़ा कर के चाय के इंतज़ार में बैठ गया । लेकिन,यह तो जीत रही हैं । क्या किया जाये, भला ?Nerd

आगमन पंडिताइन का,"और सुनाओ, कैसी रही आज की वाक ?" मेरा प्रत्युत्तर; ’ अरे एकदम मूड फ़्रेश होगया । अंबेदकर वाले मोड़ पर ही मिसेज़  खन्ना मिल गयीं, ज्यों की त्यों रक्खी हैं, पिछले दस साल से ! एकदम छोकरी लगती है,यह मंजुला ! बहुत देर तक बातें हुईं, कहने लगीं कि वह अपने फ़िगर के लिये कुछ भी कर सकती हैं, बुरा न मानो तुम तो उसकी ताई लगने लगी हो । लौटते में वह गर्ग साहब की वाइफ़, आईटीआईवाले,  जो मंटू की शादी में झूम झूम कर नाच रही थी, हाँ वही मिली । उस दिन तो मैं भी चक्कर खा गया कि इस उम्र में भी यह  लचक,Bananaभाई कमाल की चीज है, उसकी कमर....कभी उसको चूड़ीदार में देखा है ?

मेरी बात पूरी ही कहाँ होने पायी, पंडिताइन के चेहरे से धुँआ उड़ता दिखायी देने लगा, कुछ बारूद की गंध भी हवा में थी । अचानक फट ही तो पड़ीं, " कब बंद होगी तुम्हारी लम्पटई ? बेटी जवान हो रही है, और तुम सुबह सुबह औरतबाजी  के  कारनामे मुझे सुना सुना कर रस ले रहे हो । हद हो गयी बेशर्मी की ! " हाँफते हुये आगे बढ़ते बढ़ते, पलट कर फिर एक वार किया, " आख़िर कब सुधरोगे ? सुधरोगे भी कि नहीं ? कोई ज़रूरत नहीं है, कल से कहीं जाने की ! जो करना हो घर में करो ।" चलो अमर कुमार, अपना काम तो बन गया । अब इनसे पूछूँगा,' घर में  करना क्या है, एक्सरसाइज़ या औरतबाजी ? " काँटे से काँटा तो निकल गया, लेकिन मेरा बहत्तर किलो किस घाट लगेगा ? खैर, निदान मिल गया । बची खुची पढ़ाई ही काम आयी ।

संभावित कारणों की पड़ताल में, थायरायड महाशय दोषी पाये गये । टेस्ट में रंगेहाथों कामचोरी करते पकड़े गये । यानि हाइपोथायराडिज़्म ! बस एक गोली का सवाल था, वह ले रहा हूँ । जैसे मेरे दिन बहुरे, वैसे ही आप सब भी राजी खुशी रहें । इन्हीं सद्कामनाओं के साथ, मेरा नमस्कार !

 

 

 

 

 

 

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दुल्हन वही जो ....

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यहाँ तक तो आगये, अब खीज हो रही होगी । फ़ोकस बहुत बनाये पड़े हैं, और घिसे पिटे शीर्षक देकर लोगों को बेवक़ूफ़ बना रहे हैं ।          सीधी सी बात है, दुनिया मानती है कि दुल्हन वही जो पिया मन भाये

एकदम बरोबर सोच रहे हैं, आप । फिर आपकी इस ज़ायज़ सोच में मेरा असहमत मौन क्यों कुलबुला रहा है ? यह तो मैं भी मानता हूँ कि   बरदे की खुर सींग दाँत देखने की ही तरह, अभी भी कन्या यानि कि भावी दुल्हन के रूप गुण की कई कई बार बड़ी तगड़ी स्क्रूटिनी की जाती है ।  आज लड़के की बुआ देख कर गयीं हैं, तो कल मामीजी पधार रहीं हैं । अगले हफ़्ते सुना है कि लड़के के जीजा अपनी होने वाली सरहज को टटोलने आ रहे हैं, उनकी भी पसंद का ख़्याल रखा जा रहा है । आखिर घर के दामाद हैं । पाहुन रूठ गये तो शादी की किरकिरी हो जायेगी ।

चलो भाई, मान लेते हैं यह चोंचले । आख़िर बेटी जो ब्याहनी है । किंतु इस पूरे परिदृश्य में लड़का आख़िर कहाँ है ? शायद आता ही नहीं है ।    हाँ यदि तगड़ा कमाऊ है, मल्टीनेशनल का नौकर है, घूस वाली पोस्ट पर काबिज़ होनहार सरकारी अफ़सर, बाबू वगैरह है, तो उसे भी आख़िर में एक मौका मिलता है, जाओ भाई तुम भी देख आओ तो बात आगे बढ़े, बल्कि फ़ाइनल ही कर देना । फिर कुछ एडवांस-उडवांस लिया जाये ।     का कहते हैं सुकुल जी, जो जग का रीत है, ऊ तो निबाहना पड़ेगा न ? और छोटे नबाब अपनी कालेज के दिनों की सहपाठिनियों के चेहरे याद करते हुये चल पड़ते हैं, अपने लिये दो टाँग की गईया एप्रूव करने । चोखेरवालियों, आप कुछ कहेंगी, नहीं ? यह शोर क्यों मचा करता है या मान लीजिये कि मच रहा है, दुल्हन वही जो पिया मन भाये Love Struck

साइलेंस !Time out

छोड़िये, जब सुकुल जी मान रहे हैं कि जग की रीत के हिसाब से ई सब कस्टम कोनो बेज़ा नहीं है, तो पांडेय जी भला मुँह खोलेंगे , धुत्त ?   फिर ? फिर मैं यहाँ क्या कर रहा हूँ ? आज ही मेरे बढ़ते वज़न का क्लू मिला है, आज तो चैन से लंबी तानी जाये । पंडिताइन यानि कि मेरे   हर सुख आराम की सौतन, टपक पड़ीं," ये क्या करने जा रहे हो ? इतने लोगों को दुल्हन का टाइटिल दिखा कर न्यौत लिया है, अब भाग रहे हो । अच्छा जाओ, तुम्हारे बेबी का फोन आया है, जल्दी बात करके आओ । आज फिर न चिपक जाना, उसकी आधी बात तो मेरे पल्ले ही नहीं पड़ती है "

बेबी यानि कि डाक्टर देवेन्द्र श्रीवास्तव, ओरई (जालौन) में अपनी स्वयं की क्लिनिक धूम से चला रहे हैं, झाँसी रोड पर नर्सिंग होम भी है । उनका फोन अक्सर आधी रात में ही आता है । मेरे कनपुरिया बैचमेट व अभिन्न सखा । बेबी और बाबी की जोड़ी मेडिकल कालेज़ में हर अच्छे बुरे कामों  के लिये प्रसिद्ध हुआ करती थी । बाबी यानि कि मैं ! बैच में हम दोनों ही सबसे कमसिन थे, अनायास जोड़ी बन गयी, और खूब बनी । अक्सर ही वह रात में गहरे सुरूर में पाये जाते हैं, और तभी शायद बीते दिनों के संदर्भ में मेरी याद आती होगी । आधे घंटे से कम बात नहीं होती ।Kiss

फोन उठाते हुये मेरे मन में चल रहा था,' आज एक पोस्ट लिखने की ठानी थी, और यहाँ दुल्हनिया के चक्रव्यूह में फँसा था, बेड़ागर्क करने अब ये आगये । ' हेल्लो बेबी...मैं उनसे और वह मुझसे उलझ गये । क्या कर रहे थे ? पोस्ट ? इतनी रात में किसको पोस्ट कर रहे हो, बात करूँ भाभी से..?...सँभल जाओ किसी चीजके ! साले सुधरोगे नहीं, खखेड़ करने की आदत नहीं गयी, अब तक ? बेचारा बेबी मेरी मुहब्बत में हर इतवार को मेरे साथ परेड जाया करता था, और मैं उसको छोड़ के रविवार को लगने वाले मार्केट परेड बजार में गुम हो जाता था, पुरानी किताबों की तलाश में । समय का अंदाजा न लग पाता और अक्सर निरमा वाशिंग पाउडर निरमा के वक़्त या उससे भी बाद में हम पिक्चर हाल में घुसते थे । लिहाज़ा वह झींकता झगड़ता हुआ थक कर गहरी नींद में सो जाता था, सिनेमा ख़त्म होने पर फिर वही मुझको, मेरे होने को, मेरे सेल्फ़िशपने को कोसने का सिलसिला चालू हो जाता, जो डिनर के बाद मेरे बिल अदा करने पर ही शांत होता । हम चुपचाप कैप्सटन फूँकते हुये लौटा करते ।

चलो, आज बेबी के सितम झेल ही लूँ, उफ़्फ़ न करूँगा चाहे जितनी भी देर तक बलबलाये । उसने पोस्ट का पोस्टमार्टम फिर शुरू कर दिया, क्या पेल रहा है, पोस्ट में ? क्या कहा, दुल्हन ?  पिया मन भाये ? हा हा हा.. उसके ठहाकों से मेरा खून जल रहा था, लेकिन उसकी उधार देने की उदारता को याद कर, मैं  एक खिसियायी संगत की तर्ज़ पर अँए अँए करता रहा । वह थमा, "अबे ज़मीन पर आजा राजश्री के भँड़वे, किस दुनिय में रहता है ?" और कुछ बताने लगा..... आपको भी बताऊँ कि क्या बताया ? Peace Sign

अपने भारत महान के बृहत्तर प्रदेश, उत्तर प्रदेश में बुंदेलखंड हुआ करता है, कल कौनखंड होगा, इसका नाम क्या होगा , हमें क्या लेना देना ! इस समय पिछले कई वर्षों से, बल्कि दशकों से, पानी की किल्लत से बुरी तरह जूझ रहा है । यह किल्लत इस कदर यहाँ के वासियों की नसों में रच गयी है कि अब रोटी बेटी के संबन्ध पानी की उपलब्धता से संचालित होते हैं । एक गाँव से बेटी का बाप, दूसरे गाँव रिश्ता करने जाता है, तो यह तसल्ली कर लेता है कि बावड़ी, पोखर या नदी जमाई के घर से ज़्यादा दूर तो नहीं है ? दिखा दिखाई पर अब तक तो कोई जोर नहीं रहता था, किंतु अब आंशिक रूप से अनिवार्य हो गया है । अनिवार्य..वह भी आंशिक, जम नहीं रहा ! अनिवार्य बोले तो लड़के वाले बिना लड़की देखे, रिश्ते के लिये हाँ  तो करते ही नहीं, औ..र आंशिक बोले तो वह पूरी लड़की नहीं बल्कि उसकी गठन और ख़ास तौर पर बाँहें देखते हैं । चेहरे का क्या करना ? घर में पानी कोई खूबसूरत चेहरे के जोर से तो आने से रहा, जैसा भी हो ! पानी भर कर लाने के लिये मज़बूत बाँहें और दमदार शरीर की आवश्यकता होती है, वह है तो ठीक वरना अपनी कोमलांगी को बैठाये रहो घर में, इन्ने तौ राज्जा के मैअल जाणा है  के ताने सुना करो । यह तो बड़ा गड़बड़ हो गया मित्रों, मुझे अपनी पोस्ट के क्लाइमेक्स का फ़ज़ीता होता दिख रहा है, किंतु सच को कैसे नकार दूँ ? चलो, ठीक भी है......

दुल्हन वही, जो पानी भर लाये 

                           पनघट-अमर पनघट_अमर

अब आप मग़ज़मारी करो कि भारत सरकार 2010 से 2012 तक महाशक्ति के रूप में दुनिया के तमाम देशों को पानी पिला देने का स्वप्न देख रही है, वह किस मुरव्वत में अपने देशवासियों को पानी नहीं पिला पा रही है ? मेरी पोस्ट का लालित्य जाता रहा वो अलग....चलते हैं, हुक़्म ?

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08 May 2008

खौंखिया रहा ललमुँहा बानर, भला काहे ?

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बड़कन के बीच में बोलना न चाहिये । बोले बिन रहा भी नहीं जा रहा है । ई ससुरा ललमुँहा बानर पूरे भारत महान पर खौंखिया रहा है, किसी को कोई चिन्ता फ़िकिर ही नहीं । मंत्री ताल ठोक रहे हैं, संतरी सुरती ठोक रहे हैं । और हम पता नहीं पूरे संसार के अंदेशे में दुबले हुये जा रहे हैं । थोड़ा लताड़ दें, ई बनरवे को तो, आज चैन की नींद आये । होगा पाताल नरेश, तो हम भी ब्लागर भदेश हैं !  जिसकी कहो तो धो के, उसीको पिला दें ।  अइसा ब्लागिंग सुख बड़ी तपस्या के बाद, पूर्वजों के करमों से मिलता है । पूरा का पूरा हठयोग है, पंडिताइन अभी रिझा के गयीं हैं, हमने कहा, 'तुम चलो हम आते हैं । बताओ ऎसा नियम संयम इस कलिकाल में किसको नसीब है  ? बड़ा संतोष मिलता है, एक सेफ डिस्टेंस से घर बैठे, जो चाहो, जितना चाहो , जइसे चाहो, जिसको चाहो ठेल देयो, तबियत से । अपने फ़ुरसतिया सुकुल कउनो ऎसे ही ठुमका थोड़े मार रहे हैं, 'हमार कोऊ का करिहे ! ' एकदम बरोबर बात, गुरु , जब अपने कीबोर्डवा में ही बड़े से बड़ा IBM  मिसाइल वगैरह के रिमोट कंट्रोल की ताकत है, तो फिर कौन का करिहे, भाई ?  भड़ास पदास हगास संडास जउन चाहो, सब मिली इहाँ । भले कोई खुल कर न बोले, बदबू तो सबको आती होगी । नहीं आती तो अवधिया जी से अपना केस रेफ़र कराके हमारे पास आओ । लेकिन मुझको भी, यह कौन डिस्टर्ब रहा है, बीच में ? हटो लिखने दो ।
                                                            पिछलग्गू-अमर
यह डिस्टर्बिंग एलिमेंट तो अपनी ही आत्मा निकली । चलो किसीके पास कुछ बची खुची आत्मा मिली तो सही । भले दिन भर मरी पड़ी थी, और इस समय बेमौके जाग गयी । ( द्विवेदी जी, अब डिस्टर्बिंग धातु पर एक पोस्ट हो जाये, जब तक आपकी चाय की बंद  दुकनिया नहीं खुलती, यही करो ) तो अपने आत्माराम की आवाज़ आरही है, "  अरे रुको, सुनो सुनो, सुनिहो तो ? सुन तो लो, ई बड़कन को छोड़, अपने ही बिरादरी पर कहाँ पिल पड़े ? ठीक है कि ब्लागिंग में महाभारत घमासान पर है, लेकिन तुमको अर्ज़ुन का एपांइटमेंट लेटर किसने दे दिया ? चुप्पे अपना काम करो और सो जाओ। हनुमानुद्दीन को तो लटकाये पड़े हो, अब क्या ललमुँहे को भी लटकाने का इरादा है ? "  सत्यवचन प्रिये,  ललमुँहा तो लटकाने ही लायक है ! यह ससुरा आजकल अलाप रहा है, " खा गये गल्ला...,पी गये तेल,   यह देखो इंडिया का खेल "
                                                       ललमुंहा-अमर११३४५ ललमुँहा बंदर-अमर ललमुंहा-अमर१
अब बताओ अपने शस्य श्यामला मातरम की खोज में, कोलंबस की भयंकर भूल का खमियाज़ा हमको भरना पड़ रहा है ? बाँस तो उसीने पैदा किया, और बेसुरी बाँसुरी हमीं को सुननी पड़ रही है ! ऎहसान फ़रामोश ललमुँहा कह रहा है कि पूरे विश्व का गल्ला भारतीय भुक्खड़ खा गये ।  अब कह रहा है कि यही लोग तेल भी पी गये, तभी इतनी त्राहि त्राहि है । ये चुनाव के समय भी क्या उधार के इंडियन दिमाग से बोल रहा है। यह सब अलाय बलाय बयान तो हमारे नेता लोगों के लिये छोड़ दो, ललमुँहें । अभी हल्दी पर लपक रहे थे, और पेटेंट इनके दिमाग का लेलिया ?
                 बुश के तेवर-अमर साले बुश का क्लोन-अमर बुश के तेवर-अमर४४५५
अब इनको ज़वाब देने का साहस यहाँ किसी के पास नहीं है । इस ललमुँहे से पूछो कि इसी वर्ष जनवरी में तो तू शेखी बघार रहा था कि अमेरिका में प्रति व्यक्ति प्रोटीन की खपत, अविकसित देशों की तुलना में साढ़े बारह गुने ज़्यादा है । यानि कि हम आदिम युग के कंदमूल पर पलने वाले कुपोषित आदिवासी हैं, उनकी बराबरी तक आने में हमें 30 वर्ष तक लग सकता है । तो ज़िल्ले कायनात, यह अचानक तेरे देश समेत पूरे संसार में अनाज़ का टोटा भारतीयों के मत्थे क्यों मढ़ रहा है । अब खंभा इतना भी न नोचों कि हाथ ही में आ जाये । भारत और चीन इतना तेल जला डाले, इतना तेल जला डाले कि अब तेरे यहाँ की लंबी लंबी लाइमोस्यूनें कबाड़ी भी नहीं ख़रीद रहा है । ओए ललमुँहें, इसी फ़रवरी में तो पूरे संसार को अपना बड़प्पन दिख रहा था कि अमेरिका में एनर्ज़ी बोले तो उर्ज़ा की खपत यूरोप से भी तीनगुना ज़्यादा है । भारत में तो इतने बेकार  हैं कि वह  लखटकिया पर टकटकी लगाये हैं, चीन भी उर्ज़ा संरक्षण में इतना चौकस है कि 20 वर्ष से कम आयु के लड़कों को दोपहिया बाइक चलाने की अनुमति नहीं देता । एक परिवार में केवल एक ही कार रखी जा सकती है, और प्राइवेट कार से यदि केवल एक व्यक्ति चल रहा है, तो उसे अर्थदंड भरना पड़ता है कि शेयर करके पेट्रोल बचाने के प्रति उदासीन क्यों है । पिछले शनिवार तक वहाँ पेट्रोल मात्र 19.87 रूपये लीटर थी । फिर तुम रोज़ एक नया चूतियापा उछाल कर किसको डराना चाहता है ?  काँकड़ पाथर जोड़ के अमेरिका लियो  बनाय, औ खु़दा से भी न रह्यो डेराय ,  भला ई कउन भलमंशी  आय ?  दंभ तो रावण का भी नहीं रहा है, और तू किस खेत की मूली है, यह तो शायद तू भी न जानता होगा ?
              तोते उड़ाओ बुश-अमर   खबीस बुश-अमर  बंदर बुश-अमर
तुझमें खैर इतनी अक्ल तो है कि तू समझ गया है कि आने वाला समय भारत का है । चीन भी भारत के इर्द गिर्द ही बना रहेगा । यूरोप अमेरिका पर एशिया भारी पड़ता जा रहा है । फिर इतना घबड़ा क्यों रहा है ? इसको स्वीकार करके इज़्ज़त से रह, तेरे यहाँ तो बाप भी अपने लौंडे से इज़्ज़त को तरसते हैं । और हम दे भी रहे हैं, तो तुझको पहले से ही डकारें आने लगी । देख तेरे अपने देश में तेरी कितनी कदर है, देख ज़रा !
                                                                          जिंदा या मुर्दा-अमर
ख़बरदार जो हमारे ऊपर ऊँगली उठाया तो ! समीर भैय्या, इसको आपका लिहाज़ भी नहीं है, कि आप पड़ोस में अंगोछा पहने बैठे हो, और यह रोज़ कुछ न कुछ बके जा रहा है । कुछ कहते क्यों नहीं ?  एक बार देख भर ले, खुद ही चुप हो जायेगा । फिर भी न माने तो अपनी उड़नतश्तरी सीधे व्हाइट हाउसिया पर लैंड करा दो । सारा जग आपका ऎहसान मानेगा ।
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यह अपना हिन्दी ब्लागजगत, जहाँ थोड़ा बहुत आपसी विवाद चलता ही है, बुद्धिजीवियों का वैचारिक मतभेद !

शुक्र है कि, सैद्धान्तिक सहमति अविष्कृत हो जाते हैं, और यह ज़्यादा नहीं टिकता, छोड़िये यह सब, आगे बढ़ते रहिये !

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