जो इन्सानों पर गुज़रती है ज़िन्दगी के इन्तिख़ाबों में / पढ़ पाने की कोशिश जो नहीं लिक्खा चँद किताबों में / दर्ज़ हुआ करें अल्फ़ाज़ इन पन्नों पर खौफ़नाक सही / इन शातिर फ़रेब के रवायतों का  बोलबाला सही / आओ, चले चलो जहाँ तक रोशनी मालूम होती है ! चलो, चले चलो जहाँ तक..

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31 October 2008

फ़ौरी तौर पर….

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यह या कोई अन्य पोस्ट लिखना तो नहीं चाह रहा था । Aaj ka background श्री परसाई  जी,  ज़नाब कन्फ़्यूसियस साहब, महादेवी जी इत्यादि के उत्तराधिकारियों के मध्य मुझ  जैसे लावारिस बेलौस ब्लागर का क्या काम ? प्रतिक्रियाहीन असम्पृक्त समाज का यह सदस्य कुछ भी लिखेगा, तो..  ख़ैर जाने दीजिये ! वैसे ही यहाँ साहित्यिक हिन्दी, आंचलिक हिन्दी, प्रचलित हिन्दी, खड़ी हिन्दी, पड़ी हिन्दी etc. को उठाने वाले बहुजनों की बहुतायत है | ब्लागिंग के  पेशेवर, गैरपेशेवर, तक्नीकी, भड़ासी, फ़ँतासी इत्यादि किसी वर्ग में फ़िट हूँ ? शायद नहीं,  तो ?
आज सुबह उठने के बाद गैलरी में ज़मीन पर पड़े अख़बार से आँखें चुराता हुआ, मैं टायलेट की ओर बढ़ लेता हूँ । इससे तो आप भी सहमत होंगे कि मुद्दों से ज़्यादा संडास ज़रूरी है, बड़े बुज़ुर्ग यह कहते पाये गये थे कि, “ पेट भारी तो सिर भारी !“ अब उनके ज़माने में यह ब्लागिंग नामक पंछी तो सोचा भी न गया होगा, वरना  वह  ब्लागिंग को अपवाद स्वरूप अवश्य ही शामिल कर लेते ! शायद कहते “ पेट भारी तो सिर खाली “, यह शिव का यह ज्ञान मुझ पर भी लागू होता होगा ! हाँ तो, मैं अख़बार से नज़रें चुराता गया, जाने क्या संदेशा लाया हो, मुख्यपृष्ठ पर अच्छी ख़बरों का टोटा तो बना ही रहता है, वैसे भी । अक्खा इंडिया में कुझबी तो मस्त नहीं दिखेला है, भिड्डू !
अब गिरे हुये को तो उठाना ही पड़ता है न, भाई ? देहरी पर पड़े की कब तक अवहेलना करोगे, जब इनका बहुमत हो जायेगा, तब ? सो, मैंने अख़बार उठा ही तो लिया.. और जिसका डर था बेदर्दी … वही बात हो गयी ! सामने शिवम सुंदरम से अटा पन्ना !
  असहमत मौन
किंचित अफ़सोस है, यह पहले ही देख लेता तो संडास के लिये काँखना तक न पड़ता ! सरकारें आती हैं.. खुद को बचाती हैं, संभल तो जाओगे.. कभी तो संभल ही जाओगे… खुद को बेखुदी से बचाओगे… संभल तो जाओगे.. . कि तुम बिन सूना सूना है ! छोड़िये जी, आपको कोई इसी लिये पसंद नहीं करता, सदा कंधे पर सवार पंडिताइन लानत मलानत करती हैं,” क्या ज़रूरत है, सब काम छोड़कर यह कार्टून गढ़ने की… और यह पैरोडी बनाने की ? आराम से चाय पियो, ठंडी हो जायेगी तो क्या मज़ा देगी ?”
हिन्दी मत बोलो, मारे जाओगे
सत्यवचन पंडिताइन, मैं ख़्वामख़ाह ही अली-रज़ा पर लानतें भेजता रहता हूँ, मज़ा तो यहीं रखा है.. बिल्कुल सामने ही, इस गरम चाय की प्याली में ! वह तो हमारे लोकतंत्र की संप्रभुता सार्थक कर रहे हैं.. पंज़ाब सिंधु गुजरात मराठा.. अब द्राविड़ उत्कल बंगा !
amar2
“ फिर भी तुम यह पोस्ट ठेले जा रहे हो, बेशर्म कहीं के ! जाओ, क्लिनिक जाओ.. बारह यहीं बजा रहे हो !” बट नेचुरल, इट इज़ माई एनिमी नंबर वन, पंडिताइन ! सो, मैं चलता हूँ मित्रों ( कहने में क्या जाता है ? ), यदि आपमें से कोई टिप्पणी बक्से की ओर जाये, तो जरा यह ज़रूर बताये कि बारह किसके बज रहें हैं ?  बाकी लिखा सुना माफ़ करना.. आप सब को मेरा सुप्रभात !


इससे आगे

20 October 2008

अभी टैम नहीं है, शिव भाई !

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अभी टैम नहीं है, शिव भाई ! अभी अभी मेलबाक्स खोला, देखा शिव भाई का मेल ! आनन्दम, भाई की नयी पोस्ट होगी, मेल से सब्सक्राइब कर रखा है । हौले से नज़ाकत से खोला, हाय रब्बा.. यहाँ तो शिवभाई बड़े उखड़े मूड में किन्तु तनिक लिहाज़ से कहाँ का गुबार यहाँ निकाल रहे हैं । आद्योपांत बाँच गया, फिर धैर्य की चटनी से चाट चाट कर पढ़ा । वाह आपका यह अंदाज पसंद आया, भ्राता !


देखिये न, नकवा लक्ष्मण ने काटी, भुगत बेचरऊ राम गये, सीता हरवा बैठे, रीछ बानरों तक से समर्थन लेने को विवश हुये । सो, ईहाँ भि.. लीखे अमर कुमार अउर भीड़े सिव कुमार !
पर इस घोर कलयुग में यह भातृप्रेम... आनन्दम आनन्दम !

 
इसका उत्तर तो दूँगा, बरोबर दूँगा... पर जानते हैं न शिव भाई, कि हर आम ओ खास ब्लागर की तरह मेरे पास भी टईमिया का टोटा रहता है । सो अभी तो टैम नहीं है, शिव भाई ... का करियेगा, सब्र करिये । सब्र पर तो हिन्दुस्तान कायम है सो संप्रति आप भी कायम रहें ।

अब देखिये न, कितना बड़ा बड़ा मुद्दा सब बुला रहा है, ओबामा जीतेगा कि हारेगा...जीतेगा तो का होगा, वइसे त जितबे करेगा, हनुमान जी उसके ज़ेब में पड़ा कम्पेन में घूम रहा है, कोनो बीभिषन खोज के ले ही आवेगा । लेकिन ओबामा के नाम के अगल बगल में हम भी खड़ा हो जायेंगे तो कोनो SEO हमको खोजिये लेगा । आज पंडिताइन कूड़ी का आधा पसेरी आलू लायी हैं, जरा देखें कि पछला साल 8 रूपिये मे पसेरी भर आलू बिका गया, सो किस फ़ैक्टर से ? ई फ़ैक्टरवा पकड़ा जाय त जानिये अर्थ के अनर्थशास्त्र पर ब्लागर की नोबल प्राइज़ पक्का !

ऎतना मुद्दा सब हमको घेर के हो-हल्ला मचाये है के पहले घर का देखें के बाहर का ईहे में कन्फ़्यूजिया के गलत शलत हो जाता है । ई टिप्पणिवाला सब भी शलत पकड़ लेता है, अउर गलत बतईबे नहीं करता है ।

 
आजै चिट्ठाचर्चावाला एक्ठो लड़का बताइस कि..
ज्ञान दत्त पाण्डेय जी ने फिर नया शिगूफा छोडा ।
हिन्दी ब्लॉगिंग की कथा-व्यथा को टॉल्स्टॉय से जोडा

 
अब बताइये कि हमको एक्को आदमी नहीं बताया के टाल्स्टाय इतिहास का चीज हैं, और सर इससे आपको एलर्जी है, दूर रहिये... या 2008 में उनको समझने के लीये हमको 1828-1921 के टाइमकैप्सूल में बइठ के उस देशकाल परिवेश का दौरा करना चाहिये । उनके कहे का संदर्भ पर एक जाँचकमेटी बैठाने का दायित्व निभाना चाहिये । सो हमहूँ ई टालस्टयवा पर लपके लेकिन रस्तवे में ठंडाय गये ! अब मनन करके टाइम खोटी करने वाले ब्लागर तो हम हैं नहीं, टईमिया का केतना टोटा रहता है, अब आपसे ज़ादा कौन जानता होगा ? टाइम बड़ा है कि मुद्दा, कमेन्ट बड़ा है कि कमिटमेन्ट ? ई तो मुर्गी और अंडा वाला रिलेशन है, सो मनन करना छोड़  दिया !amar1  
ई घर- बाहर के जिकिर में हमको याद आया के ठाकरे आजकल बहुत ठक ठक मचाये है, पहिले उसी को ठोकि के आते हैं । ससुरा मुंबई से यूपी-बिहार लूटने वाला गाना सब भेज देता है, हम लोग दिल खोलके घर का एक एक चवन्नी न्यौछावर कर देते हैं,  अउर हमरे ईश्टुडेन्ट सबको मारता है शालाबेटा ! लौट के आते हैं, अभी टैम नहीं है, शिव भाई !
एक्ठो फोटो उसके बाउंडरिया पर साट कर चले आयें हैं, समझना होगा तो समझिये जायेगा । ऎतना पढ़ालिखा आदमी जब ज़ाहिल होने का स्वांग करके सपोर्टर बटोर लेता है, तो उसको समझाने बुझाने में कोनो फायदा नहीं, फोटू साट दिया है, हमारा काम खत्तम । त आपके टिप्पणी पर आया जाय ? अभी टैम तो नहीं है, शिव भाई.. लेकिन गलतफ़ेमीलि दूर होना न चाहिये, ऊ काहे रहे ईहाँ.. देखिए न हम अपना टिप्पणी बक्सवे का स्टींग कर दिये हैं । सबूतवा त जनता को साबूत चाहिये न, किसके पास टैम है ? कुछ लोग परहेजी बक्सा ही देखते हैं !

amar7 अक्षरवा साफ कर देते हैं, सबके पास बड़का वाला इन्टरनेट ब्राडबैन्ड त नहीं न होगा । ईहाँ पढ़ लेगा तबहिं न ?

आत्ममुग्धता किसी भी शक्ल में दिखाई दे सकती है.
कोई पाई चार्ट, काई चार्ट वगैरह बनाकर फीड अग्रीगेटर और ब्लॉग ट्रैफिक के ऊपर

पोस्ट लिखता है तब भी और कोई इस बात का ढिढोरा पीटता है कि तीस साल

पहले उसने बिना दहेज़ लिए शादी कर के एक कीर्तिमान बनाया था तब भी.
कोई अगर अपना तथाकथित आत्मचिंतन ठेलता है तो भी और कोई अपनी

तथाकथित सधुक्कड़ी भाषा में किसी वृद्ध महिला की चुचकी छाती के बारे में

लिखता है तब भी.
कोई अगर रोज-रोज सुबह पोस्ट ठेलता है तब भी और कोई अगर पिछली पाँच

पोस्ट में से पाँचों में किसी के पीछे पड़ते हुए केवल उसे चिढ़ाने के लिए पोस्ट

लिखता है, तब भी.
कोई अगर किसी के लेख पर बिना कोई प्रतिक्रिया दिए हुए निकल लेता है, तब

भी और कोई अगर किसी को प्रोवोक करने के लिए ही ब्लागिंग करता है, तब भी.

इसलिए मेरा यही सुझाव है कि दूसरों की आत्ममुग्धता के बारे में सवाल उठाने

से पहले अपनी आत्ममुग्धता को भी निहार लेना चाहिए.
मेरी ब्लागिंग मेरी आत्ममुग्धता का परिणाम हो सकती है. मैं इस बात को

बीच-बीच में स्वीकार भी करता हूँ. लेकिन आपकी ब्लागिंग ? मैं अगर आत्ममुग्ध

हूँ तो इसमें आपको कौन सा नुकशान पहुँचा रहा हूँ साहब ? मेरी आत्ममुग्धता से

आपको कोई नुकशान हो, तो आप ज़रूर बताईये. हम आपसे क्षमा मांग लेंगे.

ऎसे करार ना आया तो, फिर पलट के आये, ई बताने कि.. अब ई कौन बताने का बात है, भला ? सोचियेगा तनि..

और हाँ, इस टिप्पणी पर मुझे कोई खेद नहीं है
खेदवा होता त हमको जनाने आते ? ईहै बात है न, शिव भाई, कि आपको कोनो खेद नहीं है, त बतियै खतम है !

हम तो आजके पोस्ट को छ्त्तीसगढ़ी भाषा के गेट अप में लाने वाले थे, बड़ी मिठास है ! रसगुल्ला हिन्दी के साथ साथ गुड़ की ज़लेबी का अपना अलग ही मज़ा है । फिर सुबुद्धि आ गयी, सहसा भान हुआ, ’हे विधाता यह क्या लिखवा रहे हो ? अगर इस पोटली में ३६ की झलक मात्र भी दिख गयी, तो सुदामा भेज दिये जायेंगे तेल लेने और तुमको पड़ जायेंगे लेने के देने ! सो जल्दी जल्दी अदला बदली किया, कुछ यहाँ गिरा कुछ वहाँ गिरा ! बच गयी यह खिचड़ी ? सो इसको झेल लें पाठकों, बड़े.. विद्वान.. आचार्य.. धुरंधराचार्य वगैरह सादा जीवन-उच्च विचार के अचार संग यही खिचड़ी पसंद करते हैं । यदि आप भी बेनाइन निरीह सज्जनों में हों तो यह खिचड़ी विचार पसंद करेंगे । शिव भाई, आप पढ़ रहे हैं न ? तो  सीधा सीधा अंगेज़ी कुछ में सवाल ज़वाब हो जाये, शिव भाई ?

तो जरा F0F8FF वाले हिस्से पर गौर किया जाये ( हाँ, वही हल्का नीला वाला ! )

आत्ममुग्धता किसी भी शक्ल में दिखाई दे सकती है.यस सहमत हूँ मित्र !वह पाईचार्ट, काईचार्ट, दोहावली, कवितावली, चिट्ठी, डायरी किसी भी रूप में दिख सकती है ! यह तो माया है..  और माया महा ठगिनी हम जानि

उसने बिना दहेज़ लिए शादी कर के.. सत्य वचन, आप बारात नहीं गये थे किन्तु त्रिकालदर्शी दिव्यदृष्टि से सबकी ख़बर रखते हैं ! फ़ज़ीहत से मुँह छिपाने को कुछ तो होना चाहिये.. दहेज़ हमने लिया नहीं क्योंकि उसने दिया ही नहीं.. दरअसल पिताजी ने माँगा नहीं और मैं घोड़े पर बैठा गधा सरीखा मुँह पर रूमाल रखे शादी होने का क्लोरोफ़ार्म सूँघता रहा … सो समझिये फिसल के गिर गये, तो हर गंगा ! यही ईमानदारी का मूलमंत्र है, भाई !

तथाकथित सधुक्कड़ी भाषा में… यह भाषा की बात तो कीजो मति, शिव भाई ! अपनी मौज़ है, जो माहौल होगा वही लिखेंगे, बोलेंगे ! इतनी फ़ारसी पढ़ी होती, तो क्या ब्लागिंग में टाइमखोटीकार के अस्थाई पद पर पोस्ट लिखते होते ? सो, मैं पोस्ट लिखता हूँ जी, गढ़ता तो कभी नहीं ।  पारिश्रमिक का चेक दिखाओ तो पोस्ट भी गढ़ूँगा, भाई. यह तो हुई भाषा, सधुक्कड़ी के विशेषण पर तो यह कहूँगा कि अपना मेल बक्सा टटोलें, मेरा प्रथम मेल देखें, जिसमें मैंने अपने जीवन की एकमात्र अपूर्ण इच्छा व्यक्त की है, अब बाकी के वर्ष आदिवासियों के मध्य रहने का. अब मेरे इतने दिनों के रंग-ढंग देख कर भी आप मुझे आदिवासियों से भी कम करके आँकतें हों, तो मेरा दोष ?

वृद्ध महिला की चुचकी छाती.. जो देखा वही तो लिखा, और क्या लिखता.. सूखे स्तन, सपाट छाती, तो झूलना किसका दिख रहा था ? बदहवासी के आलम में, कपड़ों की ओर से बेसुध स्त्री का क्या दिख सकता है  ? आयु चाहे जो हो पुरुष की नज़र पहले वहीं जाती है, बंधु ! इसका दूसरा पहलू भी उकेरूँ ? मैं अपनी बेटी को देखता हूँ, तो आँखों से उसका इतिहास दिखाई देता है, वात्सल्य उमड़ता है.. इसके उलट कोई अन्य पुरुष देखता है, तो वह उसका भूगोल पढ़ता है और उसकी आँखें चुस्की भरती हुई सी लगती हैं । अश्लीलता कहाँ है, नज़रों में, लड़की में या मन में? मुकेश जी ‘ये न समझो तो है,तेरी नज़रों का कुसूर..’गा बजा के सटक गये, और मैं हकला रहा हूँ, क्यों ?

पाँचों में किसी के पीछे पड़ते हुए केवल उसे चिढ़ाने के लिए.. हाँ, यह मैं स्वीकार करता हूँ, कि ऎसा मुझसे हुआ होगा ! किसी को भी चेताने के लिये वन, टू. थ्री बोलने के बाद फ़ोर.. फ़ाइव नहीं बोलना चाहिये था, यदि वह आपके इशारे की अनदेखी कर रहा हो तो ! आपका धन्यवाद, वरना मैं तो सिक्स,सेवेन,एट,नाइन, टेन तक जाता

लेकिन आपकी ब्लागिंग ? मेरी ब्लागिंग पर यह ज़ायज़ प्रश्नचिन्ह है ! जरा सोचिये, मैंने दिया ही क्या है.. भाई लोग वाह वाह कविता लिखते हैं, कुछेक हाय हाय कहानियाँ लिख रहे हैं, किसी किनारे पर झाँय झाँय बहस चल रही है, इस आँय बाँय शाँय में भटकते हुये ब्लागिंग को हेरता हूँ, फिर डुबकी मार जाता हूँ ! पुकार मचती है, नियमित लिखिये.. यह तो बताओ भाई, कि नियमित लिखूँ तो, पर लिखूँ क्या ? उत्तर मिलता है, ‘कुछ भी !’ सो एकदम स्पान्टेनियस तौर पर मैं कुछ भी लिख देता हूँ, पर गैरजिम्मेदाराना तरीके से कभी नहीं ! यह जरा विचित्र लगेगा, शिव भाई… आपको ही नहीं, लगभग सभी को, कि अपने लिखे हुये पोस्ट के शीर्षक तो दूर, मैं सहसा यह भी नहीं बता सकता कि मैंने अब तक हिन्दी में कितनी पोस्ट लिखी हैं ! चार ब्लाग तो डिलीट कर चुका हूँ, जिसमें एक थी उल्टी गंगा, जोकि लगभग बह निकली थी । खुद से ही खुद को सहलाने में, कौन सी मौज़ है, जी ?

आपको कौन सा नुकशान पहुँचा रहा हूँ साहब ? कोई भी नुकसान नहीं कर रहे हैं आप, मेरा या किसी का ! आपकी बकरी है, आप झटका कर दें.. हलाल करें.. कसाई को बेच दें ! है तो आपकी ही.. सो वह दूसरों के वाह वाह की पत्ती पर … खैर, जाने दीजिये । लब्बोलुआब यह है, कि जहाँ लगाव होता है, वहीं आदमी दखल देता है !

आपने उस तथाकथित पोस्ट की अंतिम लाइनें शायद नहीं पढ़ी, या सुविधापूर्वक भूल गये । जहाँ यह स्पष्ट किया है

यह पोस्ट लिखने का मंतव्य ? अपने गुरुवर के प्रति आशंकित मन ! यह उनका दग्ध भाव मुझे नहीं रास आ रहा है, टिप्पणीयों की प्रचुरता पौष्टिकता कितनी होती है, यह वह जानते हैं । विषयवस्तु में वह क्या पकड़ें, क्या छोड़ें, उनकी सोच है

क्षमा करना मित्रों, खाया पिया कुछ नहीं.. गिलास टूटने का हर्ज़ाना दिया छैः आने ! बात की बेबात में यह पोस्ट हो गयी 6521 शब्दों की ! चलो लोग जब फ़ुरसतिया को सराहेंगे, तो जिक्र मेरी निट्ठल्लई का भी  होगा ही ! अपना गंगू तेली भी तो ऎसे ही अमर हो गया । आज तो मुझे भी जैसे एक झपकी सी आ गयी, पर वहाँ भी चैन नहीं !

                  amar4amar3

                  amar5  amar6

अब आपही बताओ, यह सब क्या है ? कल शायद किसी ब्लाग पर,ब्लागिंग से बेहतर विकल्प के रूप में बैंगन भाँटा वगैरह बेचने की बात हो रही थी, यह किंवा उसीका परिणाम है । ठीक से चैन की एक झपकी भी नसीब नहीं

अब कोई चाहे कुछ भी कहे, शिव भाई को माइनस करके पोस्टिया जाये भाड़ में,मैं तो चला सोने! सबको शुभ रात्रि

 amar2

इससे आगे

19 October 2008

फ़ुटकर सोच की गुरुअई

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यह शीर्षक कलेज़े पर स्काईस्क्रेपर रख कर दे रहा हूँ । हाँ,मैं अमर कुमार IPfe80::9dbb:aa5e:63db:1c9b/ 192.168.1.100 से इस बेला रात्रि के तृतीय प्रहर मानों किसी प्रेत के वशीभूत होकर यह पोस्ट चेंपने बैठा हूँ । इधर कुछेक वर्षों से रात्रि की इस बेला सुंदरियों के ख़्याल कम आते हैं । टाइम इज़ अप की घंटी कब बज जाये, कहा नहीं जा सकता सो जीवन के प्रश्नपत्र में बाद के लिये छोड़ कर रखे गये मुश्किल सवालात को निपटाने की हौल मची रहती है, संगिनी द्वारा दिया जा रहा ख़र्राटों का अनोखा पार्श्वसंगीत न चल रहा हो तो मेरा ‘अटको मत चलते चलो ‘  प्रेरित मन बेचैन होने लगता है । आज ही श्री मकरंद जी ने हैप्पी वीकएंड जैसा कुछ कहा था । पर, मकरंद तुम शायद रस्मी तौर पर बोल गये होगे, dasaejhnvdf क्योंकि हुआ इसका उल्टा । सोने जाते समय लगा कि महबूबा को एक झप्पी दे दिया जाये सो, अपने सिस्टम पर आया, और फिर उसे खाली पा कर बेसुध सा हो गया, बेसुध नहीं बल्कि बेखुदी कहो इसे ! सो इस बेखुदी में हम चिट्ठाजगत खोले चले गये । नहीं यार, यह गलत है, छोड़ दो इसे.. यह ठीक टाइम नहीं हैं, यह मेरे दिमाग का डायलाग है । पर दिल ? दिल है कि मानता नहीं ! अरे खोल ही लिया तो जरा टटोल भी लो, यह दिल की ललकार है ! बस यहीं पर गड़बड़ेशन की शुरुआत हो गयी!

टटोलने के चक्कर में पूरे पेज़ को स्कैन करके,  धड़ाधड़ टिप्पणियों की सूची में अपने आज की पोस्ट का नाम  खोजने लगा । पर वहीं अटक गया । भली चंगी 8  टिप्पणियों को निहार निहार कर तो रात की क़ाफ़ी पी थी, और यहाँ पर जिक्र तक नहीं । सूची से गायब ? चलो हो जाता है, कहीं होगा भी तो ग्रेसमार्क्स वाले कल की लिस्ट में दिख ही जायेगा । इतने में कोई बोला ‘ अटको मत.. चलते चलो ‘  यह कोई होमगार्ड या ट्रैफ़िक वाला है, क्या ?  नहीं तो, ध्यान से देखा तो यह   किसी ब्लाग पर यातायात के फ़ुटकर सोच की आवाज़  थी, एकदम शीर्ष पर से बाँग देती हुई सी । आओ जरा उधर टहल लें,  dsa दिल तो पागल है, वाला दिल उकसाता है। दिमाग तो चुप रह गया, और दिल की सुन ली गयी । यह पोस्ट मेरे गुरुवर ‘अब  क्या कहें जी ’ की निकली । अजी छोड़िये भी, इन बातों में क्या रखा है… पर उनका दावा है कि अब सर्च इंज़न उनका थोक व्यापार करते हैं, और एग्रीगेटर तो फ़ुटकर में केवल एक चौथाई के हिस्सेदार हैं । ठीक तो है, यही सत्य होगा, इसमें मेरा क्या ?

किन्तु पता नहीं क्यों मुझे यह वहम बना रहता है, कि यह पाई चार्ट, बार डायग्राम,  ग्राफ़ वगैरह ने देश का बेड़ा गर्क कर रखा है । अब कोई आपको समझाये कि देखो हमारे बार डायग्राम के हिसाब से तुमने पिछले वर्ष के मुकाबले इस वर्ष 263 ग्राम कार्बोहाइड्रेट व 39.87 ग्राम अधिक प्रोटीन पायी है, तो आप सहम कर अपने पेट पर एक बार तो हाथ फेर ही लेंगे ! जब यह रहस्योद्घाटन होगा कि इसी दर से प्रति व्यक्ति प्रति दस हज़ार की आबादी पर प्रति जिले अगले दस वर्ष तक खपत जारी रही तो आपका वज़न  89 किलोग्राम तक जा सकता है, जिसकी वज़ह से औसत आबादी में हृदयरोगियों की संख्या 12.06 % की दर से बढ़ जायेगी ! अब आप ऎसे किसी पाईचार्ट को ले जाकर अपने पारिवारिक चिकित्सक का भेजा नहीं चाटते, तो इसके दो ही विकल्प दिखते हैं । या तो आप अपनी ज़िन्दगी से तक़ल्लुफ़ बरत रहे हैं, या फिर निहायत चुगद आदमी हैं, हे अवधबिहारी, हे रघुकुल नंदन, हे श्रीराम.. इस भोले आदमी का भला करना !

अब अटको मत, चलते चलो एक सम्मानित बिटियायुत ग्रेज़ुएट हैं ( यानि बिट्स पास आउट ) सो उनकी आँकड़ों में जान बसती है । पर मेरी जान सूखती है, क्योंकि वह गुरुवर हैं, और मैं धुरगोबर ! किन्तु आगे उन्होंने जो भी लिखा बिल्कुल ही ज़ायज़ लिखा होगा, मगर मुझ जैसे धुरगोबरई बुद्धि में इतनी देर तक बज़बज़ाता रहा कि यह पोस्ट लिखने को बैठना ही पड़ा.. मसलन

…. .. लिहाजा जैसे ठेला जा रहा है – वैसे चलेगा। फुरसतिया की एंगुलर (angular) चिठ्ठाचर्चा के बावजूद हिन्दी भाषा की सेवा में तन-मन (धन नहीं) लगाना जारी रखना होगा! और वह अपने को अभिव्यक्त करने की इच्छा और आप सब की टिप्पणियों की प्रचुरता-पौष्टिकता के बल पर होगा।

या फिर….

ओइसे, एक जन्नाटेदार आइडिया मालुम भवाबा। ब्लॉग ट्राफिक बढ़ावइ बदे, हमरे जइसा “उदात्त हिन्दूवादी” रोज भिगोइ क पनही चार दाईं बिना नागा हिन्दू धरम के मारइ त चार दिना में बलाग हिटियाइ जाइ! (वैसे एक जन्नाटेदार आइडिया पता चला है ब्लॉग पर यातायत बढ़ाने के लिये। हमारे जैसा "उदात्त हिन्दूवादी" रोज जूता भिगा कर चार बार बिना नागा हिन्दू धर्म को मारे तो ब्लॉग हिट हो जाये!

नतीज़ा यह हुआ कि मुझे यह पोस्ट पढ़ने के एवज़ में टिप्पणी करनी ही पड़ गयी । आपको दिखे ना दिखे, कोई भरोसा नहीं सो वह यहाँ पर दे देना अप्रासंगिक न होगा । ब्लागर संहिता की प्रति न उपलब्ध होने से व मोडरेशन में एन्काउंटर न हो…

इसलिये.. यह रही मेरी खेदजनक टिप्पणी

ऎ गुरु जी, आप इतने आत्ममुग्ध क्यों रहा करते हो ?
यह तो यह इंगित कर रहा है, " चिट्ठालेखक रूग्णो वा शरीरेन वा मनसा वा "
इस तरह की यातायात विश्लेषण से आख़िर सिद्ध ही क्या हो रहा है,
मुझ मूढ़मति को इतने सुजान टिप्पणीकर्ताओं के मध्य प्रतिवाद न करना चाहिये क्या ?
एक ब्लागिये को उलझाये रखने के लिये यह अमेरीकन लालीपाप है, क्या फ़र्क पड़ता है
कितने आये, किधर से आये, कितनी देर टिके, दुबारा आये, यूनिक ( ? ) आगंतुक कितने रहे ?
रही हिन्दूविरोधी बीन बजाने पर ज़्यादा भीड़ खड़ी हो जायेगी..
तो यह सूचना सविताभाभी डाट काम के लिये अधिक उपयोगी हो सकती है,                                                   यदि एक्टिव व पैसिव सब्जेक्ट्स की अदला बदली दोनों धर्मों के चरित्रों से करती रहें..
पर, आप उनके यहाँ की ट्रैफ़िक को इस जन्म में छू भी नहीं सकते
तो क्या ट्रैफ़िक मोह में हमें भी ऎसा कु्छ अपनाना चाहिये , यदि हाँ तो जुगाड़ भिड़ाइये !
हम आपके साथ हैं, दिनेश जी बिल्कुल काँटे की बात कह गये हों तो क्या..
हम उनको मना लेंगे, आप यह टिप्पणी भी माडरेट कर जाओ तो भी कोई वांदा नहीं,
अब वैसे भी यहाँ आने का मन नहीं करता ! बाई द वे, आज एक एग्रीगेटर ही फ़ुसला कर ले आया है,
' चलो चलो, वहाँ कोई बड़ा तमाशा चल रहा है, दो ढाई दर्ज़न आदमी जुटे झख लड़ा रहे हैं ।'
देखो भाई लोगों, यदि पोस्ट पढ़ा है तो टीपियाऊँगा अवश्य,
यह अनर्गल ही सही किन्तु अनर्गल होने का  कोई कारण भी तो होता होगा, न्यूटन की मानें तो ?


यह पोस्ट लिखने का मंतव्य ? अपने गुरुवर के प्रति आशंकित मन ! यह उनका दग्ध भाव मुझे नहीं रास आ रहा है, टिप्पणीयों की प्रचुरता पौष्टिकता कितनी होती है, यह वह जानते हैं । विषयवस्तु में वह क्या पकड़ें, क्या छोड़ें, उनकी सोच है

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18 October 2008

PD की एक ताज़ा पोस्ट पर …

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आज शनिवार है, मेरे साप्ताहिक अवकाश का दिन ! मेरी छुट्टियाँ मुझे कोई उलाहना नहीं देतीं, क्योंकि मैं चालाक हो गया हूँ । छुट्टियों के दस्तक देने से पहले ही उनकी सारी माँग पूरी कर देता हूँ । ख़ुदा का इनायत किया हुआ, यह दिन मैं पूरी तौर पर अपने नाम बुक किये रहता हूँ । आह्हः जीवन में यदि कोई सुख नसीब होता है, तो बस इसी एक दिन ! आनन्दम आनन्द

नींद से जाग कर, बिस्तर में पड़े पड़े बाहर की दुनिया से छन कर आती हुई आवाज़ों की टोह लेते हुये, ठंडी होती हुई चाय को देखते हुये, पंडिताइन का चिल्लाना इस कान से उस कान को निकालने का सुख ! आह्हः अनिर्वचनीय होता है, यह सब कुछ ! जाड़ों की सुबह रज़ाई में दुबके हों तो क्या कहना, इसमें यदा कदा व्यवधान डालती हुई छोटी ( अपनी काकर स्पेनियल पेट बिच ) को भी समेट कर उसके गुलगुले एहसास को सहलाते हुये, व उसको भी छुट्टियों के पल का दोहन करने की साज़िश में हिस्सा देने का सुख, भला अपने इन्द्र महाराज तो सोच ही नहीं सकते । वह बेचारे तो अपना डोलता हुआ सिंहासन संभालने को युगों युगों से जैसे अभिशप्त हैं । आज भी कुछ ऎसे ही क्षण जी रहा था कि,यह तपस्या भंग करने को मेरी बची खुची मेनका का स्थूल अवशेष  फिर अवतरित हुआ और इसमें व्यवधान तो नहीं कहूँगा, बल्कि भूचाल कहना अधिक उचित लग रहा है… सो भूचाल आता है, कमरे की घड़ियों को सीधा करके, मेरी बेशर्मियों पर लानतें भेजने का सिलसिला शुरु होता है, तब जाकर मेरा भूमि अवरोहण हो पाता है । पीछे से चिल्लाती बीबी,आगे आगे सिर खुजलाते हम,आनन्दम आनन्दम !

तत्काल ही इन्टरनेट से राम जुहार करने की मौज़ और ज़बरन धकेल तक नहाने भेजे जाने तक बेशर्मी का दूसरा चरण आरंभ होता है । आह्हः, ढीठ व बेशर्म बने रह कर निकम्मे व फ़ालतू करार दिये जाने का सुख भला किस पुण्यात्मा को नसीब होता होगा ? इन्टरनेट जिसको आपलोग अंतर्जाल भी कहते हैं, हाँ सबसे पहले इस अंतरनेट पर प्रशांत की पोस्ट के दर्शन हुये, पढ़ा

वहाँ पुछरू को पाकर मेरे भीतर का मरा हुआ टुन्नु भी जैसे किलकने लगा, जिदियाने लगा, हम भी.. हम भी.. डाक्टर अमर हम भी ! मैं टुन्नु बन कर आपको लिखना पढ़ना सिखाता रहा, सो आप तो डाक्टर बन गये हैं, अब हमको भी डालिये न अपने इस अंतर्जाल पर ! मैंने उसको टरकाया,” रुक पहले  इस पोस्ट पर टिप्पणी तो कर लेने दे, तू तो जानता है कि अगर मैं पोस्ट पढूँगा तो टिप्पणी ज़रूर दूँगा, सो ठहर जरा !” पीछे से पंडिताइन झाँकने लगीं, एक स्त्रियोचित स्वभाववश ही..

पर आज प्रयोजन कुछ और ही था, मेरी कल की पोस्ट पर कितनी टिप्पणी आयी, यह जानने को उत्सुक रही होंगी । मुझसे कहीं अधिक उनको कमेन्ट्स की चिन्ता रहती है । मुझको भी बुरा नहीं लगता, यह तो स्वाभाविक है । एक नारी को 14 वर्ष की आयु से ही जो कमेन्ट मिलने का सिलसिला  शुरु होता है, वह अपने रखरखाव के हिसाब से 40-45 की आयु तक जारी रहता है । यह इतना स्वाभाविक है, कि कभी कभी कमेन्ट न मिलने पर या कमेन्ट में गिरावट आने पर अवसाद ग्रसित भी हो जाया करती हैं । मैं बुरा नहीं मानता ‘ अपनी अपनी बीबी पर सबको गुरूर है ‘, कमेन्ट तो भाई चाहिये ही, एक आवश्यक टानिक.. शब्दों में न सही तो नज़रों से ही सही ! वह भी नहीं, तो ’मैं कैसी लग रही हूँ’ का सवाल दाग कर ही कबूलवा लेती हैं । इसका ज़वाब देने में बेईमानी करने का भी मैं बुरा नहीं मानता, और शायद स्वयं औरत भी इसको स्वीकार करती होगी !

ओफ़्फ़ोह, फिर बहक रहा हूँ क्या ? कोई वांदा नहीं, ब्लागिंग ही तो है, अपुन कौन सा यहाँ हिस्ट्री बनाने बइठा है ? फिर भी..

सो, उनकी ताका-झाँकी में,  मैं टिप्पणी पढ़ता हुआ नहीं, बल्कि टिप्पणी करता हुआ रंगे हाथ पकड़ा  गया । एक नाज़ायज़ से असंतोष से बोलीं, “ यह तुम टिप्पणी कर रहे हो कि कोई कविता लिख रहे हो ? अरे जैसे सब दो लाइन में निपटाते हैं, तुम भी निपट लो, तुम्हारे ताम-झाम में अगर यह सब इतना ज़रूरी है तो ? बताना भाई, पोस्टिया आपके औकात से लंबी तो नहीं हो रही है ?  वरना आगे केवल 6 कैरेक्टर से क्रमशः लिख कर सरक लूँ….  आपको भी अभी बहुत सारों को निपटाना होगा !

खैर.. मैनें कहा, भली मानस यह तुमको कविता दिख रही है ? गद्य  का फ़ारमेटिंग ही तो किया है, लगता है कि  लखनऊ विश्वविद्यालय ने कोदों लेकर एम.ए. हिन्दी तो नहीं दे दिया ? विवेकी मापदंड से वह एक भदेश किन्तु आत्मीय सा लगने वाला संबोधन की दुहाई देती हैं, यह कविता के तौर पर घुसेड़ा जा सकता है । अब तुम यहाँ किस किसकी तक़लीफ़ देखते फिरोगे ?

नहीं जानता कि वर्तमान ब्लागर संहिता के आचार्य इसको किस रूप में लेंगे , किसी को दी हुई टिप्पणी अपनी पोस्ट पर प्रकाशित की जा सकती है, या नहीं ?  कृपया आगे आकर निराकरण करें ..

आह पुछरू

Amar1

आहः पुछरू, निमिष मात्र में
तुमने मुझे कहाँ से कहाँ पहुँचा दिया,
सीतामढ़ी के आगे का स्टेशन रीगा,
उसके बगल ही में सुगर फ़ैक्टरी,
आहः पुछरू,जीते रहो

ठीक उसके पीछे एक गाँव उफ़रौलिया,
जिसकी पगडंडियों पर ऊँगली पकड़ कर चलते हुये,
अपने बाबा से मिलती संस्कार शिक्षा...
सबकुछ अब जैसे बिखरा हुआ है, वहाँ
आहः पुछरू,जीते रहो

आधा गाँव तो कलकत्ता कमाने जा पहुँचा 
बाकी को पटना मुज़फ़्फ़रपुर राँची ने निगल लिया 
बचे फ़ुटकर जन जो  छिटपुट शहरों में हैं,
एक नाम उफ़रौलिया को जीते हुये ...
आहः पुछरू,जीते रहो

कसमसाते हुये, लाल टोपी को कोसते हुये
उफ़रौलिया की गलियों में विचर रहें हैं
उम्र की इस ठहरी दहलीज़ पर
उस माटी में लोटते हुये
आहः पुछरू,जीते रहो

पर मैं भी कितना स्वार्थी हूँ कि
यह सब याद करते करते जाने कहाँ खो गया
और तुम्हारे पोस्ट की गदहिया पर
कोई प्रतिक्रिया भी नहीं दी ..
आहः पुछरू,जीते रहो !

Amar2

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16 October 2008

आज एक माइक्रो चमरई हो जाय

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का हरज़ है.. भाई, आज थोड़ा सा माइक्रो हो लिया जाय, तो ? माइक्रो और वह भी थोड़ा सा.. क्या केने क्या केने !

तो, मेरे बाबा जी रजनी के संग कल रात कहीं गायब हो गये, शरद मेला की भीड़भाड़ में फिसल के निकल गये होंगे । आज सुबह 9 के दरमियान पान के दुकान तक जाकर, पनवरिया को दूर से इशारा किया, कि मुझ तक इन दोनों को पहुँचा जाओ । वहाँ एक पंडितजी और उनके मित्र बेचारे पान वाले के दम किये हुये थे, जरा 132 तेज रखना और  किवाम डाला ?  तो ठीक, अब यह भी डाल दो.. और सुनो जरा वह भी,  इत्यादि इत्यादि..

ई सब निरख अउर तदोपरांत ऊ सब देखत हमरे दिमाग में कुछ कुछ होता है वाला कुछ नहीं, बल्कि सबकुछ हो गया वाला कुछ कुछ हो गया । यदि आप भी दिल वाले हो तो, एसी कार के बंद शीशों के उसपार देखो.. तो पता चलता है कि कुछ कुछ नहीं, बल्कि बहुत कुछ होता है, इस भरी दुनिया में.. भला यह बात डाक्टर अनुराग और मुझ नाचीज़ के सिवा, दूसरा और कौन असंवेदनशील हृदय समझ सकता है ? अलबत्ता नेता-ऊता की बात अलग है, वह तो संवेदना के सताये हुये हुये वर्ग को बिलांग करते ही हैं । जनता के सीने का मामूली दर्द भी वह इन्टेंसिव केयर की निष्ठा से जीते हैं, छोड़िये उनको…. वह ससुरे हमारे माइक्रो के योग्य नहीं .. …

अब ओमपरकास पनवारी ने क्या डाला, क्या नहीं… वह बाद की बात है । अभी तो पंडित जी बातों बातों में मेरे मानसिक बवंडर में किवाम की पूरी शीशिये उलट के चल दिहिन, अउर एकठो माइक्रो पोस्ट प्रसव करने की प्रेरणा पकड़ा गये, अलग से ! ज़माने के हिसाब से तो ठीकै बात है, जनता के ज़ेब में पइसा नहीं, तो कैरीपैक, इज़ीपैक व सैशे वगैरह पकड़ा दो… कुछ तो उसके ज़ेब से निकसेगा ! ब्लागर के पास टैम नहीं, पाठक के पास दिमाग नहीं, वह तो मँहगाई की मार से पहले से ही फ़ुक्कस हुई पड़ी है… सो एक माइक्रोपोस्ट थमा देयो । ताक-झाँक की तक़ल्लुफ़ में भी कुछ तो बाँच ही लेगा ! सो, बचत ही बचत.. अपने दिमाग की, पाठक के नेटसमय की, और ज़्यादा लिख जाने पर बाँयें दाँये बगलें झाँकने की नौबत आने की.. डबलमज़ा नहीं बल्कि मल्टिपल मज़ा है, जी । आज ही माइक्रो अपनाइये, पोस्ट शेड्यूल करके चैन की नींद सोइये…  मैंने तो अपना लिया.. हाहः हाः हाः हः ह !

अमाँ, यह शॊशा तो बड़ा टेढ़ा है, हाईस्कूल से माइक्रो महाशय ने ऎसा पकड़ रखा है.. कि अब तलक माइक्रोस्कोप से जूझ रहा हूँ । छुटकारा पाने को अहंम ब्लागिंग शरणम आगच्छष्याम, तदं विधनास्य षड़यंत्रकारी यहाँ भी माइक्रो पोस्ट, माइक्रोब्लागर का भेष धर के किच्चपिच मचायतिष्यामि । मैं ठहरा फुलस्केपिया ब्लागर, कहाँ फँस गया ? लेकिन यह आधुनिकता ओढ़ने का मोह बड़ा अँधा बना देता है, सो आज ‘ चरैवति चरैवति ‘ भावना से एक्ठो माइक्रो ठेलने की इच्छा होती सी प्रतीत हो रही है । तो, हो जाने दो… धारा 144 पता नहीं कब नसीब हो ?

भईया, परिशान मत होवा.. जब माइक्रो बोला है तो माइक्रो ही लिखबे,  यह लाला का कौल है ! जब पेन से मसिस्राव हो ही रहा है, तो माइक्रो पोस्ट की एक मिडी प्रस्तावना तो लिखी ही जा सकती है ! कवि आँसू बहाता है, लेखक स्याही बहाते है, बड़कऊ लोग थोड़ा बहुत पसीना बहा लेते हैं, महीने डेढ़  महीने के लिये, छोटकऊ जन बाद के 58-59 महीने खून के आँसू बहाते रहते हैं, और, गंगा भी निर्विकार बहती रहती है ! बहते रहने में ही जीवन है.. देखो जनता अपना जाने क्या क्या बहा कर जनसंख़्या को कहाँ से कहाँ बहाये लिये जा रही है, कि बेचारे प्राइमरी के मास्टर बटोरते बटोरते हलाकान हुई रहे हैं । अब वह बेचारे किसको रोयें..

ग़ालिब फ़रमा भये हैं, “रोने से अउर इश्क में बेबाक हुई गैए”, कितना दारू बहा कर बेचरऊ यह इल्म हासिल किये होंगे, इल्म बोले.. तो ज्ञान ! कहीं ज्ञानजी भड़क न जायें, सो इसे इल्म ही पढ़ें  और इल्म ही समझें । ज्ञान को दारू के संग संदर्भित करने का हमको साहस नेहीं न हो रहा है, हमारे श्री गुरुवर जी का नाम धँसा पड़ा है, इस इलिमवा में ! और कहीं ताऊ के घरारी से वह प्लेबियन लट्ठ  उधार लईकै ( उल्लेखनीय है, कि ज्ञानजी का लट्ठ अभिजात्य वर्ग के मालखाने में जमा है ) तो, वह प्लेबियन लट्ठ लईकै माइक्रो के इन्वर्सली प्रोपोशनल इक्वीवैलेन्ट फोर्स से हमार  म्यू स्कवायर सिग्मा कर दें , तो टिप्पणी सिरमौर श्रीसमीरलाल अपना माइक और मंच प्रेम तज के तो आने से रहे ! ख़ुदा करे, वह अभी तो न ही आयें, वरना ‘ अतिसुंदर एवं उत्साहप्रद.. लगे रहिये.. जमायें रहें… आपका आभार ’ वगैरह वगैरह जैसा कुछ कह कर आगे बढ़ लेंगे ! आने दो उनको नवम्बर में, इंडिया आये तो ठीक, वरना यदि दैट्स भारत में मिल गये तो ऊप्पर निच्चै सबै देखि लेहा जाई !

ऎ भाई लोगों, मैं बहक तो नहीं रहा ? यदि ऎसा है, तो सुझाव व शिकायतें डिब्बा नीचे उपलब्ध है, उसका प्रयोग करें । ब्लागिंग ग़र नशा है, तो मेरे बहकने पर किसी की नज़रें टेढ़ी क्यों ? अउर अगर टेढ़ी होय तो सबजनै आँख मूँदिकै पढ़ लियो, टेढ़न का हम डेराइत नहिं न ! तौन आजु तो पेशल टाइगर भदौरिया का अद्धा चढ़ावा है, ऊपर से  हमरे मेल बकसिया में एकु दुई तीन नहीं, चार चार भड़ासी न्यौता पहिले से पड़ा भवा है, ऊई अलग । अब हमका हृदयपरिवर्तन करे का मज़बूर न किहौ ! टेढ़ी मत करो बंधु, बस हुई गवा… आजु एक ठईं हमार माइक्रो जाय देयो ! दुबारा हम न लिखबे, अउर लिख दिहा तो तुम पलट के आवै वाले नहीं… सो आजु तौ पढ़ि लियो भाय

बात रोने पर जा टिकी थी, तो भला बताइये… अगर रोयेंगे नहीं तो लोकतंत्र झेलने को बेबाक कैसे होंगे ?  ग़ालिब ख़ासे क़ाफ़िर किसिम की सोच रखते होंगे, तभी तो उनको कभी से भी, कुछ भी ख़तरे में पड़ा कभी दिखा ही नहीं ? सही बात है यार, तभी बेचारे ग़ालिब मरते दम तक ‘ख़ाक मुसलमाँ’ होने की आस लिये जीने को अभिशप्त रहे । माँग के लाये हुये चार दिनों में दो तो इसी इंतेज़ार में कट गये कि कौम का ग़म उन्हें अब सताये कि तब सताये ! तबके इमाम भी उसूलों पर नहीं, बल्कि अपने सरकारी वज़ीफ़े पर ही कुर्बान होने में खर्च हो गये । उनके ढाँपे हुये ग़म के मलबे अब कुरेदे जा रहे हैं । हम इस बेसिरे नाइत्तेफ़ाक़ी के मलबे का नतीज़ा भी झेल ही रहे हैं …

ऎई सीधे चलते चलो.. बात तो रोने की हो रही थी, सो, मिर्ज़ा जी की बात से मुख़ातिब हुआ जाये । हाँ तो, बच्चा रोयेगा नहीं तो बेबाक कैसे होगा, दूध कैसे मिलेगा, मईय्या की छाती में दुद्धू कैसे उतरेगा ? दूध देने के लिये अच्छी खुराक भी तो चाहिये, सो वह अभी अपने खाने-पीने के इंतज़ाम में लगी हुयी है, तो बेजा क्या है ? इधर हमारे भी फेफड़े मज़बूत हो रहें हैं ! हाँ तो, बात… रोने पर ही टिकी थी न ? ठीक है, फिर… रोने को तो हमारे  आपके  जैसे बीच के आदमी छोटकऊ लोगन का रोना यदा कदा देख भी लेते हैं, बल्कि कभी कभी साथ में रो भी लेते हैं, निहित स्वार्थ हो तो पछाडें भी खा लेते हैं । फिर छठा पे कमीशन मिलते ही हँस भी देते हैं, रिलीज़ होने के पहले ही ज़श्न भी मन जाता है, रोने दो इन सालों को.. कर्महीन हैं.. कामचोर हैं सब के सब ! चुपाय मारिकै अपना लेमनजूस चूसो ! अब इनका क्या है ? आज रो रहे हैं, कल दिहाड़ी पर किसी के भी ज़िन्दाबाद ज़िन्दाबाद रैली में शामिल हो जायेंगे, ससुरे ! लेकिन कल तो कुछ और ही देखा, बंधु एवं बाँधवियों...सो लिखबे की इच्छा है

एक जर्जर वृद्धा सोनिया गाँधी के आने वाले निर्धारित रास्ते पर लेटी हुई है, दहाड़ें मार रही है, छाती कूट रही है,  बटन टूटे अधखुली  ब्लाउज़ से बाहर झूलती हुई चुसकी छातियों से बेख़बर, बदहवास सी सड़क पर लोट लगा रही है, कुछ ज़वान पुलिसिये उसकी छातियों में दिलचस्पी न लेकर भीड़ लगायी पब्लिक में कोई दिलचस्प आइटम टटोल रहे हैं । वृद्धा का प्रलाप जारी है, “ आज हम इनका जाय न देब… हमका फैकटरी दियावें… हमार डेढ़ बिगहा ऊसर जात मुला ई बुढ़ापा तौ हरिया जात … हम कौनो माया-ऊया का नहिं जानित… इनके कहे पर वोटु ढीला है ( डाला है ) तौन इनहिन से आजु पूछिकै जाब … … एकु लउंडवा सूरत में कमात है… आपन मेहरियो राखे है… हम ईहाँ कउनो तेना ( तरह ) पेट जियाइत है… छोटकवा लुधियाना में मज़ूरी करत रहा… तौन ऊहौ लउट आवा कि अब हिंयईन नउकरी चाकरी मज़ूरी पाई जाबै…  नास होय ई चमरीनिया का… щПηψЙЫ⺶⺗⺗⺄♀♀⺈मरि जाय तौन डलमऊ निहाय आई… ऊँगली का इशारा अपने लड़के पर,और फेना छोड़ते मुखारबिन्द से फूल झड़ रहे हैं… कुल तीनै दिन की मज़ूरी में चार टनऊका ( सौ रूपये ) गिरा लिहिस… हमका फैकटरी दियावैं.. जाय न देब हम आजु इनका… “ भीड़  में लड़का हाथ बाँधें दो-तीन उभरते आइटमों से घिरा खड़ा था । मज़ू्री से बार बार अपने को संदर्भित किये जाने पर असहज होते होते अचानक फट पड़ा… हम कहित हय चुपाय रहौ… तब तै मज़ू्री… मज़ू्री लगाये पड़ी हो ! माता-पुत्र संवाद सुनने को मैं नहीं रुका । जिले में धारा 144 लगी है, शहर में तो सन्नाटा है, पर ?

पर, यहाँ ऎसा कुछ नहीं है, क्यों ? जानते हैं, श्री अनाम जी से..जरा मौज़ लिया जाय !“काहे भाई 144 लगी है, और आप बेखौफ़ घूम रहे हो ?”उसने पलट कर एक मिनट को मुझे गौर से तौला,फिर अपनी मुंडी को एक लघु अभिवादन झटका दिया, बगल को गरदन घुमा कर अपने मुँह में दबाये आशिकी ( गुटका ) की सिट्ठी को पक्क से थूका, एक सहज ज़वाब.. “ चउआलिस नहिं तौ कुतिया की ..ँटें, हिंया हम पंचन के घरै मा आगु लगाय दिहिस,  अउर हम बइठ के ई चमारिन केर चउवालिस का पकड़ि कै चाटी ? “ अब इस पतिप्रश्न का उत्तर तो तुम देकर भी नहीं दे सकते, सो यहाँ से खिसक लेयो अमर कुमार ! पंडिताइन मेरे बाँयें कोख में अपनी तर्ज़नी का तमंचा गड़ाये पड़ीं हैं

पर, वह नौबत नहीं आयी, गाड़ी बैक करने का जुगाड़ तलाश रहा था कि… शोर मचा,”बदल दिहिन… बदल दिहिन, अब सताँव ( दूसरे मार्ग ) से पास होइहैं । डीएम मना किहिस है कि जिम्मेवारी न लेब !” न्यूज़रिपोर्टर लड़की बदहवास सी दौड़ रही है.. यह सताँव किधर है, गायज़ ? लोग उसे घेर कर अपने अपने तरीके से रास्ता बता रहे हैं, समझो कि आधा घंटा से ज़ेदा लगि जायेगा मैडम… एक रंगबाज उसके सीने को ‘देख लो आज इसको जी भर के’ वाले अंदाज़ में घूरता हुआ समझा रहा है,” आपकी भारी बाडी है न ? सो हिचकोला गज़ब का लेगी !“ कहता हुआ वह सांकेतिक रूप से उनके वैन की ओर हाथ बढ़ा देता है, पर नज़रें बचा के उपस्थित जनसमुदाय को अपना मंतव्य भी आँख दबा  कर  और अपने होंठ  काट कर समझा देता है । पब्लिक उसके श्लेष पर मुदित हुई जाती है !

कविवर बिहारी की इस औलाद पर अपने माइक्रो µ पोस्ट की नेपथ्य कथा को समेट ही रहा था, कि उस रिपोर्टर लड़की पर नज़र गयी, बल्कि स्वयं पंडिताइन ने ही दिखायी… वह लौकीनुमा माइक लिये बूढ़ा को ही चेंटे पड़ी थी ! गरदन बार बार पीछे मुड़ कर बताती जा रही थी कि ‘हम अपने दर्शकों को बता दें कि…’ मैं झल्ला रहा था, क्योंकि यह मेरे च्वाय्स का मामला नहीं था ।  कवरेज़ देखने की यह पंडिताइन की चाह थी, सो मानना ही पड़ा।

 अरे, साफ़ साफ़ बोलना सीख ले लड़की..खुल के बोल कि ‘अपने ड्राइंगरूम व लाबी में बैठे तमाशबीनों को हम यह बता दें कि…एटसेट्रा एटसेट्रा..’ उधर बुढ़ियारानी, अब बेचारी बुढ़िया से चरित्र अभिनेत्री बुढ़िया में तब्दील हो चुकी थी.. दो रिटेक सहर्ष दे चुकी थी । वह मुड़ी,” हम अपने…? “ कैमरामैन महोदय को भीड़ में शामिल किसी फोटोजेनिक चेहरे पर उलझे देख, उसका चिल्लाना लाज़िमी था, भला कौन सा न्यूज़चैनल कवरेज़ में खूबसूरती को शामिल करने की इज़ाज़त देता है, यदि यह रैम्प पर न चल रहा हो तो बात भई अलग है ? वह मुल्क की प्रगतिशीलता का प्रायोजित कवरेज़ होता है । सो, वह चिल्लायी, “हे गाय, अपना कैमरा इधर को पैन करके जरा ठीक से ज़ूम करो”..फिर अपने अगल बगल से दबाती हुयी सी पब्लिक को बड़े संयत स्वर में संबोधित किया, “प्लीज़ थोड़ा स्पेस दीजिये न गायज़ !” अब मैं मगन होता भया, क्या बात है, यार.. विहिप बेचारा अपने गोमाता प्रेम को लेकर नाहक बदनाम है, और कान्वेन्ट से अवतरित हुयी यह लड़की गाँव गाँव बतर्ज़ ‘हे खग मृग हे मधुकर श्रेनी’ में ..गायज़.. गायज़ गोहराती हुई गोधन को हेरती घूम रही है । इसको कहते हैं ’ जिन खोजा तिन पाँईया’  वाह रज्जा, वाह वाह ! यह वाहवाहियाने की बात तो है न, गायज़ ? अरे ब्लागियों, यह मैं आपसे पूछ रहा हूँ

मेरा माइक्रो पोस्ट ? हाँ अभी वह भी तो रहा जा रहा है.. हे राम, कहीं  इस मज़में में फुसला तो नहीं लिया गया, मेरा टिनी-मिनी ? जाने मेरा माइक्रो किधर गया जी… अभी अभी इधर था किधर गया जी । वह दूर से मुस्कुरा रहा है, इन्नोवेटिव दिखने का मौका खिसक जाय तो गुस्सा तो आयेगा न, जी । “ चल इधर आ… पेश हो यहाँ “

अथ आरंभ निजस्य माइक्रो पोस्ट

ऊपर की बकवास तो इसकी नेपथ्य कथा थी, जड़ मज़बूत होगी, तभी समझोगे न,भाई ? इसके जन्म लेने का घर दुआर, महतारी बाप से परिचय करवाना ज़ायज़ लगा, सो कर दिया, लेकिन पोस्टवा माइक्रो ही है !

तोमैं गाड़ी में बैठा इंतज़ार करता रहा, वह ओमप्रकास को उलझाये रहे, फिर आराम से पान का

बीड़ा अपने अपने श्रीमुख के कल्लों में स्थापित कर, एक आवश्यक कार्य से फ़ारिग हो लेने जैसा संतुष्ट दिखने लगे । वापस होने की प्रक्रिया में मेरी कार का रास्ता काट गये सो अलग ! आपस में जो भी बतिया रहे थे, वह इतने धीमें स्वर में था कि लोग सहसा पलट कर देखने लगते, यह सदा ( आवाज़ ) कहाँ से आई ? उनमें एक तथाकथित उपाधीयाऎ जी भी रहे होंगे अवश्य, क्योंकि वही परस्पर संबोधन में प्रयुक्त हो रहे थे ।

“ तो, अइसा है न.. उपाधीयाऎजी कि ई कोनो राजनीति नहिं है, ज़मीन दिया कोच फ़ैक्टरी को.. पइसा लिया बकैदा रेलवे वालों से … दाख़िल-ख़ारिज़ भी सुपुर्द कै दिये उनको । अब मुकर रहि हो.. कि  ई ज़मिनिया वापस देयो । अब भाई उपाधीयाऎजी हमरे हिसाब से तौ यहिमाँ न कोनो सिद्धांत है.. अउर सुनि लेयो ई कोनो राजनीति भी नहिं है, ई तो भाई, टोटल चमरई है..हन्डेड वन परसेन्ट चमरई, पाल्टी कै औकात गिरा दिहिन !“

हमारे ओमपरकास जी ने आवाज़ दिया, “ भईया ?” बाबाश्री व रजनी हवाले किया, हम इनके बिना  कुछ  भी  नहीं  लिख पाते.. सो यह पोस्ट लिख कर अपलोड कर रहे हैं, ताकि सनद रहे व वक़्त-ए-ज़रूरत काम आये

सामने देखा तो दोनों एक मारुति 800 में धँसे, खिड़की से मुँह निकाल पुच्च पुच्च करके गंदी सी भंगिमा बना कर ओमपरकास पर चिल्ला रहे हैं, “अबे कलुये, कितना चूना लगायेगा बे ? अपनी दुकान चलानी है, तो पहले ठीक से चूना लगाना तो सीख ले, स्साले मा..ढर.ओद ! गाँड़ तक कल्लाय रही है, इन ससुरों के मारे

आक्कथू, मारुति सरकी.. मैं भी सरक रहा हूँ पर यह तो बताना भूल ही गया कि उनकी कार के बोनट के बगल लगे डंडे पर एक हाथी महाराज नीले रंग के कपड़े पर टँगे हुये निर्विकार भाव से मूड़ झुकाये हुये थे !

मैं अपना सिर झुकाये बाबा 120 व रजनीगंधा का मिश्रण बना रहा था, यही खाँटी बचा है. मेरा अंतिम सत्य !

जौन मनई, सीधे स्क्राल करके ऊपर से नीचे उतर आये हों.. पोस्ट की लम्बाई गहराई नापने को, वह आगे को सरक लें । यदि आप नेता के कौल पर भरोसा कर लेते हो, तो इस बेचारे लाला के कौल पर क्यों नहीं ?  अपने इर्द गिर्द चल रहे प्रहसन पर, मात्र  8927 शब्दों में समेटी कथा माइक्रो ही कहलायेगी न भाई ?

 

 

इससे आगे

10 October 2008

साहब तनि ई फरमवा भरवा दिजीए

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सुबह सबेरे दरवाज़े पर खड़खड़ … खड़खड़, यह कौन है भाई ? पीछे से अम्मा चिल्लायीं, ‘अरे रुको, पक्का गँवार है का, घंटी नहीं देखाता है ?’ “घंटिया तो देख रहें हैं, माई.. बीजलियो होगा के नहीं, ई नहीं बूझे थे । बाबू साहेब से तनिका काम था, भोरे में भेंटाइये जायेंगे, तब्बे न आयें हैं । बोले थे कि कोनो काम होगा त मदत-ऊदत कर देंगे ।”  यह उसका प्रत्युत्तर था ! अब मैं चैतन्य हुआ, कोई पैसा उधार माँगने तो नहीं आया है ? इस समय राँची में हूँ, और यह आम बात है, सो यही होगा ! मैं किचकिचा कर निकला, देखा हनुमानुद्दीन खड़े हैं, चेहरे से याचना टपक रही है । ‘का है रे ?’ मेरा प्रश्न.. कुच्छौ न सरकार तनि ई फरमवा भरवा देंतीं न, बिहार राज्य  के डेलाइभर के पोस्ट निकलल बा, अब लाइसेन्सैया नईखे त अपलाई करे के बा ।

लाओ देखें, सरसरी तौर पर देख कर ही माथा चकराने को हुआ, अंग्रेज़ी में- था । इसको तुम कइसे भरेगा,रे ? हिन्दी का लेके आओ । ऊहे त संकट है बाबू, हिन्दिया त खतम हो गया सो.. बाबू इहे दिया है । बड़ा मारामारी है, बाबू साहेब । बड़ा मोश्कील में आये हैं । बोला कि कोनो से भरवा लो, लेकिन दसख़त आँगूठा अपना ही रखना । अब फँसे, बच्चा अमर कुमार !

Monkey20

Driving License Form for bihari drivers
Here is for those who would want to apply for driving licence in Bihar-
No offence intended - its the new user friendly form
BIHAR DRIVING LICENSE APPLIKASON PHAROM
NOTE : If you dont know the answers,
please copy from another applikason phorom and submit.
For further instructions, see bottom applikason.
Please do not shoot the person at the applikason kounter.
He will give you the lisence immediately.


Last name: (Yadav/Sinha/Pandey/Mishra/do not know)
First name: (_) ramprasad (_) Lakhan (_) Sivaprasad (_) Jamnaprasad (_) Dont know (Check appropriate box)
Age: (_) Less than zero (_) Zero (_) Greater than zero (_) Don't know
Sex: ____ M _____ F _____ not sure _____ not applicable
Chappal Size: ____ Left ____ Right
Occupation: (_) Farmer (_) Mechanic (_) Pehelwaan (_) House wife (_) Un-employed Spouse's Name: __________________________ Relationship with spouse : (_) Sister (_) Brother (_) Aunt (_) Uncle (_) Cousin (_) Mother (_) Father (_) Son (_) Daughter (_) Pet Number of children living in household: ___
Number that are yours: ___
Mother's Name: _______________________
Father's Name: _______________________ (If not sure, leave blank)
Education: 1 2 3 4 (Circle highest grade completed)                                                                                              If FAIL then give Duplicate Pass Cartifikat
Do you (_)own or (_)rent your home? (Check appropriate box) ___
Total number of vehicles you own ___
Number of vehicles that still crank ___
Number of vehicles in front yard ___
Number of vehicles in back yard ___ Number of vehicles on cement blocks
Firearms you own and where you keep them: ____ truck ____ bedroom ____ bathroom ____ kitchen ____ shed
Do you have a gun rack? (_)Yes (_) No; If no,please explain:
Newspapers/magazines you subscribe to: (_) Champak (_) Indrajal (_) Star and style (_) Blank sheets ___
Number of times you've SHOT any one ___
Number of times you've SHOT another person exactly like you ___ 
Do you bathe? (_) Yes (_) No (_) Not applicable
If yes, how often do you bathe? (_) Weekly (_) Monthly (_) Yearly
Color of teeth: (_) Yellow (_) Brownish-Yellow (_) Brown (_) Black (_) Others -
Give exact color
(call nearest Asian Paints dealer if you don't know the color of your teeth) :______________ (_) Not applicable
How far is your home from a paved road? (_)1 mile (_)2 miles (_)don't know
Your thumb impresson (


If you are copying from another applikason pharom,please do not copy thumb impression also.             Please  provide your own thumb impression.
PLEASE DO NOT USE FINGERS ON YOUR EVERY HANDS. Use thumb on your left hand only.
If you dont have left hand, use your thumb on right hand.
If you do not have right hand, use thumb on left hand.
NOTE : IF YOU DONT HAVE BOTH HANDS, YOU CANNOT DRIVE.
For instructions to fill this applikason pharom, see beginning of applikason phorom


बंधुओं, मैं सही दिमागी हालत में रायबरेली लौटने के मूड में हूँ, सो मैंने उसको टरकाया..”अच्छा एक काम करो, मैं इसको हिन्दी में कर देता हूँ, तुम देख देख कर अपने आप इसको भर लेना ।”  तब त भरिये लेंगे, हाज़ूर । हम बिहान आयेंगे ? हाँ वह तो खुश होगया पर लगता है कि मैं और गहरे फँस गया । इसका हिन्दीकरण तो लगता है, मेरे पुरखे भी न कर पायेंगे।  अपने ब्लागसंसार की याद आयी, हमारे सारथी शास्त्री जी अवश्य ही  इस  भाषादरित्र ( गौर करें, एक नया शब्द  ) की सहायता करेंगे । यदि वह मुकरते हों, तो कृपया यह प्रारूप रतलाम वाया भोपाल भेज सकते हैं । एक गरीब की रोज़ी का सवाल है ! वह बेचारा तो अपना रिक्शा बेच कर 6000. रुपये भी इस मद में एडवांस कर चुका है,कृपया उसकी सहायता करें ।

 

 

इससे आगे

07 October 2008

नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः मीमांसा

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डिस्क्लेमर:  यदि आप लम्बी पोस्ट पढ़ने का धैर्य रखते हों, तभी यह पोस्ट पढ़ें   !  अधूरी पोस्ट पढ़कर इसमें दी जारही महत्वपूर्ण जानकारियों की अवहेलना करके, देवी का कोपभाजन न बनें। इसे तत्वबोधीय पोस्ट समझने का यह मित्रवत आग्रह है ! कृपया अपनी टिप्पणी यहाँ रखे टिप्पणी बक्से में ही डालें । ई-मेल या अन्य इलेक्ट्रानिक माध्यम से प्रेषित टिप्पणियाँ स्वीकार नहीं की जायेंगी। अपने दिमाग की सुरक्षा स्वयं करें ।

वस्तुतः मेरी पिछली पोस्ट पर श्री अनूप जी की टिप्पणी आयी, कि महाराज इस पोस्ट में वर्णित श्लोकों का अर्थ तो दे देते । सतीश बोले कि गागर में सागर.. ! इस प्रकार अपने ही हाथों यह धर्मसंकट उत्पन्न किया, सो प्रायश्चित स्वरूप यह पोस्ट ठेलने का साहस किया गया है । गवारा तो नहीं था, पर जैसा कि होता आया है… इस पोस्ट को ठेलने के सुझाव के पीछे पंडिताइन का हाथ है.. सो यह जन्म जन्मांतर के पाप की कड़ी मात्र है । मेरे ख़्याल से तो हर गृहस्थी में एक अदद सोनिया गाँधी अवश्य होती होंगी ! मूल रूप में 7 अक्टूबर 2007 को लिखे गये पोस्ट का यह संशोधित एवं संवर्धित स्वरूप है । मैं इसको रिठेल कहने को बाध्य भी नहीं हूँ, क्योंकि रिठेलने का मेरा कद नहीं है । बल्कि कोई कद ही नहीं है,…. चिट्ठाकारी का कद से क्या संबन्ध ?  वरिष्ठता का सदैव आदर किया जायेगा और टिप्पणियों की बाढ़ को प्रत्यक्षतः तो सराहा जायेगा  किन्तु परोक्षतः ईर्ष्या की जायेगी, ऎसा मेरा निश्चय है । इसको टिप्पणी की प्रतिटिप्पणी के रूप में भी कृपया न लें, यह मेरी विधा नहीं है । इतनी लम्बी पोस्ट के मायने ? कुछ तो यह लम्बी ही  पैदा हुई थी… बाकी रहा सहा मैंने और खींच दिया । वज़ह ?  वर्तमान हालात व मेरी समझ के समीकरण से, निकट भविष्य में मेरा हृदयपरिवर्तन हुआ ही चाहता है, बस घोषणा ही बाकी है । सो, इस पोस्ट को फ़ुरसतिया घराने में शुमार किये जाने की संभावनायें टटोलना  आरंभ किया जायें । प्रशंसक टिक जायेंगे   और  मुँहदेखी  वाले भग जायेंगे ।


अथ आरंभः या देवि सर्वभूतेषु ब्लागररूपेण संस्थिता lgupdated_e0

यह शीर्षक, क्यों ? आज षष्ठी है....' सप्तमं कालरात्री च महागौरीति अष्टकम', और इस दुर्लभ संधिबेला में , ऎसे पोस्ट  से कहीं अनर्थ तो न हो जाये , कुछ तो माँ से डरो, यह कोई और नहीं, पंडिताइन की भयातुर शंका है…. वाह री अनारकली, कबूतर कैसे उड़ा ?  तो,  ऎसे… नित्यप्रति अनर्थ देख रही हो । इस पावन नवरात्रि की महिमा, आजकल तो घर घर गायी जा रही है, और तुम ? तुम ऎसा करोगे, मैं सोच भी नहीं सकती, छिःह !!  ई जो है न, अपना लेडीज़ लोग !  ऊ काहे मौका-बेमौका अपना टिप्पणी  देता रहता  है ?  अउर.. लिजिऎ न, साथ में मीमांसा.. .. फ़्री  !  कहिन कि रिठेल आज़माओ,  और अब अनर्थ को डेराय रहीं हैं !  उकसा के पिटवाओ.. फिर फूँक फूँक मरहम लगाओ । मेरी पोस्ट तो वैसे  भी पिटती रहती हैं, सो हम काहे डेरायँ ? 
सोच तो मैं भी रहा हूँ ! जो बंदा सन 1968-69 के दौर से ही माँ का आँचल पकड़े हुये हो, श्री दुर्गा सप्तशती पर सन 1980-81  तक अधिकार प्राप्त कर चुका हो (  लोग ऎसा मानते हैं ) , वह अनायास ऎसी पोस्ट क्यों लिखने बैठ गया ? मन को दो दिन समझाने में लगे, ' मत लिखो, भाईलोग  इसको किंवा पब्लिसिटी हथकंडा ही मान लें तो ?  पर ज्ञानू गुरु का हलचलजड़ित पोस्ट देखकर बल मिलता है  कि अपने को व्यक्त कर ही देना चाहिये ।  हरज़ नहीं, जो सामने दिखे.. तड़ाक फोटो खींचो फड़ाक ठेल दो ! पीछे से सुकुल महाराज ( चिट्ठाचर्चा फ़ेम वाले ) भी कान में गूँज रहे थे , लिखो यार , तुम्हार कोऊ का करिहे ! संशय से उबरा तो फिर, यह डर सताने लगा कि कहीं मैं ही माँ की चोखेर बाली ( চোখের বালি - means - आँख की किरकिरी ) ही न बन जाऊँ ?

                                                          

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इतने वर्षों की सेवा साधना के बाद , पिछले दो वर्ष से व्रत-पाठ इत्यादि छोड़े बैठा हूँ । यहाँ तक तो ठीक था, क्योंकि मेरे आस्था-विश्वास में लेशमात्र भी कमी नहीं आयी है, बस केवल कलश स्थापन, भाँति भाँति के नियम विधानों से उपवास एवं ' हों-हों ' करते हुये सप्तशतीपाठ करना छोड़ रखा है । जबकि यही सब नवरात्रि के दिनों का स्टेटस सिम्बल है ! कई वर्षों तक दशमी को तड़के उठ अपने घर की पूजा से तृप्त हो, पूर्णाहुति के लिये 120 कि०मी० कार भगाता हुआ, गोविन्दपुरी, इलाहाबाद पहुँचा करता था । अकेले मैं ही नहीं, बल्कि राजा नहीं फ़कीर के बेटे अजयप्रताप सिंह, तरुण तेजपाल इत्यादि का तहलका भी वहाँ नियमपूर्वक उपस्थित रहा करता था, तिवारी जी के विशेष हवन में । तो, अब क्या मैं असंतुष्ट धड़े में चला गया.. ?  नहीं, कदापि नहीं ! फिर,यह प्रश्नचिह्न क्यों ?
यह प्रश्नचिह्न तो  मैं अपने सम्मुख रख रहा हूँ । वस्तुतः ' देवि के सर्वभूतेषू ' होने पर संशय करने की विद्यता, मेरे पास है ही नहीं, और न तो मैं चार्वाक का चेला ही हूँ । मार्कण्डेय महाराज भी उवाचते रहे हैं, ' भविष्यति न संशय : '   बल्कि इसी सम्पुट के साथ वह ऊँघते श्रोता को जगाते भी रहे हैं, जैसे इस युग में राहत कोष  जैसी घोषणा करके उखड़ती हुई पब्लिक को जगाया जा रहा हो… ऎई उठो, जागो और सुनो… सर्वाबाधाविनिर्मुक्तो धनधान्यसुतान्वितः । मनुष्यो मत्प्रसादेन भविष्यति न संशयः ॥

फिर ?  लफ़ड़ा कहाँ है, संशय क्या है ?  मेरी आहत आत्मा जैसे कचोट रही हो… आस्था में तर्क का स्थान तो निर्दिष्ट भी नहीं है, फिर बवाल क्यों काट रहे हो ?  बिल्कुल वाज़िब बात  बोले हैं, आप ! तो, सुनिये ... जितना अध्याय सुन सकते हों, उतना ही सुनिये, , फिर बोलियेगा !  पूरे नवरात्रि में ऎसा अफ़रातफ़री लोग मचाये रहते हैं कि मेरी भैंस बुद्धि जहाँ भी पानी देखती है, वहीं गोते खाने लगती है, भले ही वह कितना गंदा हो ।

यह एक ख़ास सीज़न है, जब कलंकित माथों पर भी लाल टीके चमचमाने लग पड़ते हैं, इतना लाल.. कि एकबारगी तय कर पाना कठिन होता है कि यह कोई सिद्ध पुरुष है या कोई 11000 वोल्टीय डैंज़र आदमी, जो सीधे माँ के पास से ही महिषासुर का रक्त  उड़ा कर चला आरहा हो । आप इस सकते से उबर गये हों और ख़ुदा न ख़्वास्ता वह महापुरुष आपके परिचित हुये तो वह सार्वभौमिक श्वानपरिचय ( कूकुर पिछाड़ा सुँघायी )  के अंदाज़ में आपको सूँघते हैं, ' सर, आप तो व्रत होंगे ? ' अब यह तो सीधे आपके ठसके पर प्रहार है, या तो आप खिसिया लीज़िये, ' नहीं, थोड़ी तबियत खराब थी, शरबत वरबत पीना पड़ता सो मिसेज़ ने मना कर दिया । ' अब यहाँ एक दूसरे किस्म का सामंजस्य दृष्टिगोचर होता है । आपका मातहत है,या आपके पास कोई फँसी गोट नवरात्रि में ही सुलटा लेने के संकल्प से टीकायमान हो घर से कूच किया है, तो वह चेहरे से कनस्तर भर सहानुभूति ढरकाता हुआ दोनों हाथ आसमान की तरफ़ उठा देता है, ' सब माँ की इच्छा, भला करें माई ' , यदि आपके चेहरे पर फूँक न मार दे तो आप अपने को हतभागी  समझें । वह पैंतरा बदल कर आपका मूड टटोलता है, “चलो साहब प्रोग्राम बनाओ, विंध्यांचल घूम आवा जाय… मयडमों का लेयि लियें” ।

स्थिति एक :

अब आप तय करो कि क्या माना जाय ? अच्छा चलो, मान लेते हैं कि आपमें कुछ VIP  होने का ठसका ठुँसा पड़ा है, यानि की आप अपने आप में तो वेरी इम्पार्टेन्ट परसन हैं, पर अन्य भक्तजनों  के लिये वेरी इन्कन्विनियेन्ट परसन,  फिर भला क्या कहना ? अष्टमी भले नवमी में बदल जाये, VIP जी देवी के गोड़ पकड़े निहोरा कर रहे हैं । अभयदान दो माँ, यह लात मेरे ऊपर न रख देना, कभी ! हर नवरात्र के नवरात्र आपका हिसाब कर दिया करेंगे, मेरा ध्यान रखना माई…

स्थिति दो :


आप फ़ौरन तमक कर, मत चूके चौहान, अपुन को जमा ही लो, आन बिहाफ़ आफ़ होल फ़ेमिली के, अंदाज में कहते हैं, ' नहीं यार, व्रत है । '  , ' हमारे यहाँ पूरा परिवार, बल्कि बच्चे भी व्रत रखते हैं, दसियों साल से ! ' थोड़ा ज़्यादा हो गया, दो कदम पीछे हट लो, गुरु । आप संशोधन पेश करते हैं, ' बशर्ते बच्चा घुटनों के बल न चल रहा हो, हमारी तो कुलदेवी ठहरीं, दद्दू ! ' कह कर माँ की परमानेंन्ट पोस्टिंग अपने यहाँ होने की तस्दीक़ कर ही दीजिये । अगला भगत यदि बगुला भगत हुआ तो स्वयं ही चुप हो जायेगा ।
लेकिन क्यों चुप हो जाये ? भगवान ने जब फाड़ने को मुँह दिया है, तो क्यों चुप हो जाये ? गाल बजाना हमारी राष्ट्रीय अस्मिता है । केन्द्र से आरंभ हो कर, यह महामारी राज्य तक ही नहीं थमती बल्कि अपुन के घर-परिवार तक को संक्रमित किये हुये है

यह विषय, फिर कभी !  क्योंकि मैं भी तो यहाँ गाल ही बजा हूँ । तो ज़नाब, डिफ़ेंस को तैयार रहें । उनकी भेदभरी निग़ाह अभी भी आप पर ही टिकी हुई है, " पूरा कि सिर्फ़ अगला-पिछला ? "  पूरा नवरात्रि स्पेशल बुक करवाये हो कि सिर्फ़ इंज़न औ' गार्ड के डिब्बे से काम चलाय रहे हो ? खैर छोड़ो, अब शुरु होता है... पाँचवी पास वाला सवाल, " एक टाइम खाते होंगे, फलाहारी नमक वाला ? " कलश भी बैठाते हैं कि केवल रात में छान-फूँक कर  इतिश्री कर लेते हैं ? " आप तन जाते हैं,' नहीं भाई, स्साला पंडित आता है हमारे ईहाँ, दुबे..छज़लापुर वाला !' यह आपका बड़प्पन हैं कि आपने स्वीकार तो किया कि ' माताजी ' को रिझाने में आप स्वावलंबी नहीं अपितु छज़लापुर वाली पार्टी को ठेका दिये पड़े हैं । पार्टी  इसलिये कह रहा हूँ,क्योंकि पंडित महाराज की एक पूरी टीम है, सीज़नल मस्टर रोल वाले से लेकर मेट-सुपरवाइज़र लेवल तक के बाम्हन ! बाकी मैनेज़ वह स्वयं ही करते हैं, यजमान के स्टेटस के हिसाब से किसको कहाँ फ़िट करना है, यही उनकी विद्यता है, यानि कि यजमान मैनेजमेन्ट ! फ़कत 700 श्लोक तो यजमानरूपी कोई भी ग्राहक बाँच लेगा।

या देवि सर्वभूतेषू  वृत्तिरूपेण संस्थिता । नमस्तस्यै । नमस्तस्यै । नमस्तस्यै नमो नमः ॥                    
तो पंडित महाराज वृत्तिनुसार ही आचरण कर रहें हैं। चलिये कोई बात नहीं, इसमें कोई त्रुटि नहीं है, जग की रीत है , लेकिन सरजी, जरा ख़ुद से, स्वयं, परसनली देख लीजियेगा कि कलश सही दिशा में स्थापित करवाया है कि नहीं ? हम भी कुछ तो जानते ही हैं, माताजी की दया से..,एक संक्षिप्त चुप्पी ( रहस्य का आवरण उत्पन्न करने के लिये वार्तालाप का अनिवार्य तत्व ! )  इसीलिये अपना समझ कर कह रहे हैं। अउर झेलौ, ई लेयो एकठईं स्लो पेस बाल ! अब आपका भविष्यति न संशयः तिरोहित हो जाता है, आफ़िस में  झूठा बहाना मार कर, या नज़रें बचा कर आप फूट लेते हैं । स्वगृहम गच्छामि, मन दोहराता है, ..कि हे वत्स धर्म के किया गया अधर्म निन्दनीय नहीं होता ! 

और एक नयी दुविधा के साथ आप घर में प्रविष्ट होते हैं, पहले दिसा कन्फ़र्म कर लो यार, सब साले प्रुफ़ेसनल होय गये हैं,  वर मरे या कन्या इनको द्क्षिना से मतलब, यही घोर कलयुग है । इससे पहले कि, अपना संशय आप श्रीमती जी को पकड़ायें, वह स्वयं ही लपक पड़ती हैं । पल भर आपको निरख कर बिलख पड़ती हैं," अब कुछ करो, गुड्डी के पापा, हमरी तो तपिस्या भंग हुई जा रही है । अबकी बार एकठईं बेटवा का माने हुये हैं, अउर देखो ई परेसानी खड़ी होय गई । सोनम की मम्मी आयीं रहीं,  बताइन कि अबकी मोहल्ले में पाँचें-छेः कन्या रह गयीं हैं। एक्कै दिन बचा है, अउर उई दुष्टा अब जाके बताइन, बताओ हम्म का करें ? हमतो नौ कन्या खिलावे का माने बइठे हैं, जनात है, मईया हमार परिच्छा लेय रहीं हैं। कुछौ करो नाहिं तो वंश नाश हुई जायी !


या देवि सर्वभूतेषू क्षुधारूपेण संस्थिता । नमस्तस्यै । नमस्तस्यै । नमस्तस्यै नमो नमः ॥                   
आप क्या करेंगे, भला ? एक दिन में बच्चा तो बना नहीं सकते, वह भी बिटिया ?  सो खीझ जाते हैं, दोस्तों को फोन वोन करके देखते हैं, कुछ व्यवस्था बनानी पड़ेगी । लेकिन साले मज़ाक उड़ायेंगे, किसको दोस्त समझें इस कलयुग में । साले मौज़ लेंगे कि दुई बिटिया तो तुम अपनी निजी मेहरिया की गिरवा चुके हो, अउर अब बाहर बिटिया हेर रहे हो ?   ससुरी में कुछ देवित्व बचा है, शायद… तभी तो गुड्डी की मम्मी ने मन पढ़ लिया, रास्ता दिखाया, "उपाध्याय से बात करो, ऊ तो नया आया है और अभी ई सब नहीं जानता होगा । उसके तो दुई बिटिया हैं, चलो मईय्या रस्ता निकाल दिहिन ।" अपार संतोष से ठुमक कर वह पलट पड़ती हैं । आप इस बेला एकदम कनफ़्यूज़ियाये हैं, " अरे, दो कहाँ है ? एक ही तो है, दो-तीन साल की लड़की,और दूसरी?" गुड्डी की मम्मी तो अब पूरे मौज़ में हैं, समिस्या हल होती जान मस्त हुई जाती हैं । "भूल गये, वह बड़ी वाली भी तो है, छैः कि सात वाली, अरे जिसका डांस जेसी मेले में हुआ था ।" और वह लहकते हुये घूम कर, अपनी स्थूल कमर को मटकाने का प्रयास कर, याद दिलाने की चेष्टा करती हैं,"छोटी सी उमर में लग गया रोग.., लग गया रोऽग..म्मईं मर जाऊँगी...ओऽ ओऽ म्मईं मर जाऊँगी, …..  ले आओ उसी को, हलुआ पूरी खिलायेंगे तो लगे हाथ एक्ठो नाच वाच भी देख लेंगे । एक एक कटोरी भी तो देय रहें हैं, सबको "


या देवि सर्वभूतेषू भ्रान्तिरूपेण संस्थिता । नमस्तस्यै । नमस्तस्यै । नमस्तस्यै नमो नमः ॥                  
अरे नहीं, फोन वोन करना ठीक नहीं, इस समय सीज़न है, साला लड़कियों की शार्टेज़ चल रही है, फोन पर टरका न दे। आमने सामने बात करना ठीक रहेगा, अभी आता हूँ " कह कर आप कलशा-वलशा भूल फ़ौरन पलट पड़ते हैं ।  " इत्ती धूप में ? कल चले जाना। या छोड़ो आज रात में चले जाना, आफ़िस से निकल आये हो, तो थोड़ा आराम कर लो…. व्रत किया है " ससुरी अपनी चलायेगी ज़रूर,.. .. कुलक्षनी ! पर आप ज़ब़्त करके बोलने हैं, ' ठीक है, पक्खफेना जी के यहाँ भी हो लेंगे, रास्ते में ही पड़ेंगे.. आज देवी जागरण रक्खा है ।' ," देवी जागरण… कियूँ  ?"  उनसे  स्कूप आफ़ द नौरात्रों छूटा जा रहा है, गुड्डी की मम्मी के स्वर से अधीरता चिंघाड़े मार रही है । यह कमबख़्त टोकेगी ज़रूर, लौट कर तो इसी घर में आना है, पंगा टाल जाओ,  देवीचरन !  पिछली नवरात्रि में ही तो छोटी सी बात का इतना बतंगड़ हो गया था, कि इनको पीटना पड़ गया, तब जाकर इनकी तरफ़ से सीज़फ़ायर हुआ था । हे माँ, इस बार ऎसा न हो, यह हिडिम्बा पिटने का कोई मौका न खड़ा कर दे ।

हमरी पोस्ट वाटर आफ़ इंडिया हुई रही है, का ? चलो चलो, आगे पढ़ो, बस खतमै समझॊ


या देवि सर्वभूतेषू बुद्धिरूपेण संस्थिता । नमस्तस्यै । नमस्तस्यै । नमस्तस्यै नमो नमः ॥                      
बुद्धि से काम लो, देवीचरन । काल बताये सो आज बताय, आज बताय सो अब्ब, नहीं तो बहुरिया पल में प्रलय  दिखाय देहै ! आप दरवाजे पर ही ठिठक कर खुलासा करते हैं, 'अरे, वो माया वाला केस नहीं था, उनकी मँझली बहू ?  मारत पीटत रहें सो केस करवा दिहिस था, अपने मयके में ? बाप पेशकार हैं सो पइसा कउड़ी तो खरच नहीं होना था । पक्खफेनवा जमानत तो पाय गये लेकिन तीन साल से बँधें बँधें घूमत रहे, वही मईय्या से माने रहें सो माँ की कृपा होय गयी, अचानक आउट आफ़ कोर्ट सेटल हुई गया, मामला ।  बेचारे सोफ़ै अल्मारी लौटा के संतोष कई ले गये । बिन्धाचल-उचल माने रहें, बदले में जागरण करवाय रहे हैं । मईय्या ने नहीं बुलाया होगा ।


या देवि सर्वभूतेषू विष्णुमायेति शब्दिता । नमस्तस्यै । नमस्तस्यै । नमस्तस्यै नमो नमः ॥                             
उपाध्याय के मकान से चार मकान पहले ही पक्खफेनाजी विराजते हैं, पहले वहीं चलें । उपाध्ययवा तो जूनियर है, उसका बाप भी दरवाज़ा खोलेगा या फिर माँ ने चाहा तो यहीं मिल जायेगा, पहले यहीं चलें । जागरण पूरे शबाब पर है, कानपुर की पार्टी है,  लेकिन सस्ते में पाय गये । लौंडे मस्त हो कर हाथ पैर फेंकते हुये, पसीने पसीने हुये जा रहे हैं । स्टेज़ से उनको लगातार ललकारा जा रहा है, 'ऊँ ऊँ ऊँ..दरँस दिख्ला जा दरँस दिख्ला जा, एक्क बार आज्जा आज्जा.. आज्जा आज्जा ऽ माताऽ ..ऽ ..ऽ , ओ मात्ता मात्ता मात्ता मात्ता.. मात्ताऽ ..ऽ ..ऽ मात्ता मात्ता मात्ता मात्ता.. मात्ताऽ ..ऽ ..ऽ कूल्हे टकराये जा रहे हैं, वह अपने भक्ति  को उछालने की प्रतियोगिता में  हारना नहीं चाहते !

या देवि सर्वभूतेषू  भी मगन हैं, क्या ? जरा देखूँ । देखा तो, हमारी माँ  हैलोज़न से आकर्षित हुये भुनगे पतंगों से आच्छादित हैं, कोई भी हाथ खाली नहीं कि वह कुछ प्रतिरोध भी  कर सकें ।  मैं उन पर टकटकी लगाये स्तुति कर रहा था , श्रीदुर्गेस्मृताहरषि  भीतिमशेषजन्तोः स्वस्थैः स्मृता मतिमतीव शुभांददासि .. सहसा लगा कि इस माँ भी इसी आर्केस्ट्रा के साथ विलाप कर उठेंगी,  इन्हीं लोगों ने..इन्हीं लोगों ने ले लीना सर्वभूतेषु मेराऽ
यदि आप मेरी बकवास पर अब तक टिके हुयें हैं ,तो धन्यवाद ! यह थी मेरे कर्मकांडी आडंबर से विमुख होने की कथा  देवि की महत्ता का बखान या इस महत्ता का आदर, दोनों में आप किसको कितना महत्व देते हैं, यह मेरा विषय नहीं है

लगे रहें, जमाये रहें... माँ भला करेंगी । पर घर में जरा अपनी बूढ़ी अम्मा का भी ख़्याल रखा करें ! क्यों वह अपनी वेटिंग सीट कन्फ़र्म करने की गुहार रामजी से लगाया करतीं हैं ? यह केवल मेरे निट्ठल्ले क्षणों के असहमत मौन का स्वर था, सो मूँहवा फाड़ दिया.. नारायण नारायण ! तो चलें ? नमस्कार.... 
या देवि सर्वभूतेषू ब्लागररूपेण संस्थिता ।  नमस्तस्यै । नमस्तस्यै । नमस्तस्यै नमो नमः ॥ 

इससे आगे

04 October 2008

तू चल... मैं जन्मजन्मांतर का पाप काट कर आता हूँ,

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‘स्कन्दमाता श्रीमती शिवेसर्वार्थसाधिके  आज प्रातः से ही अनमनी सी थीं । कई बार शिवशंकर भोलेनाथ भूतभावन ने प्रश्नवाचक दृष्टि डाली, नज़रें बचा गयीं ! गणेश तो सुबह से ही सजने बजने में भागदौड़ मचाये हैं । कल अम्मा के साथ मृत्यलोक की तीन दिन की पिकनिक पर जाना है, कार्तिकेय को तो कोई चिन्ता ही नहीं है । रिद्धि- सिद्धि गणपति से उदासीन हो गयीं हैं, अब इनके सूँड़ कौन लगे.. अभी अभी विदायी लेकर आये हैं, चिल्ला चिल्ला कर प्राणियों ने कहा अगले बरस तू जल्दी आ, फिर भी ये है कि.. ऊँह कौन समझाये ?  विनायक माज़रा भाँप ही तो गये, सफाई पेश की "अरे भागवानों, तब मैं जम्बूद्वीपे  भारतखंडे कहाँ गया था ?  वह तो दुष्ट ठाकरे का आमची महाराष्ट्र था, पगलियों ! पिताश्री के सेना के सेनानी हैं, सो संकोचवश चला जाता हूँ । पिताश्री के सखा निर्वासित अयोध्यानरेश राम की गुहार पर अम्मा ने साथ चलने को कहा, तभी तो जाता हूँ वरना मिलावटी मोदक का मुझे कोई लोभ नहीं ।   भला बताओ 25-30 हाथ की प्रतिमाओं के सम्मुख स्वयं कितना अपमान लगता होगा ?

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उधर दुष्टदमिनी अपने शस्त्र वगैरह बेमन से चमका रहीं थीं !  व्यस्त सी दिखने को , वह भूतभावन ब्रह्मवेदस्वरूपं  के सामने इधर से उधर को डोल रहीं थीं । गिरिजापति से दृष्टि-विनिमय होते ही, अनायास ठुनक पड़ीं, " मन नहीं कर रहा जाने का, फिर भी जाऊँ क्या  तुम क्या कहते हो ?" महादेव ठठा कर हँस पड़े, " क्यों अनमनी हो रही हो, त्रिपुरसुंदरी ? जाओ अपने क्षेत्र का एक बार तो दौड़ा कर ही आओ, इतना तो मान रखो ।" अरे बाप रे, करुणामयी तो एकदम से बिफ़र पड़ीं, " ऎ महाराज, यह आशुतोषवृत्ति अपने ही तक सीमित रखो । देखो, देवों के बीच ही तुम्हारी चतुराई शोभा देती होगी, जो तुमसे घड़ी घड़ी समर्थन माँगा करते हैं ! मैं अर्धांगिनी तुम्हारी, क्या पूछ सकती हूँ कि संहार के अधिष्ठाता तुम हो, और तुम ही नहीं जानते कि वहाँ संहार ही नहीं नरसंहार चल रहा है, और  मैं वहाँ अपने को पुजवाने जाऊँ ? "  भँग की तरंग में शिवदूती अरूपा ने जैसे कंकड़ फेंक दिया हो, किंचित तिलमिलाये फिर सहसा ही संभल कर ईश्वरोचित गरिमा से बोले, " जा भक्तों का मन रख ले, थोड़ा पूजपाज लेंगे तो तेरा क्या ?  उन आर्तजनों में किंचित साहस   व सांत्वना  की लौ जलाती आना ।"  घृणा से नारायणी एकदम काली पड़ गयीं, बोलीं "  स्वामी मेरे पास  आपके जैसा हलाहल रोक लेने वाला नीलकंठ नहीं है, सो जो देखती हूँ वह पीना ही पड़ता है । मुझे स्वयं ही आग्नेयास्त्रों की सुरक्षा में प्रवास करना पड़ता है । माटी बाँस का एक महिषासुर मेरे चरणों में डाल कर, सहस्त्रों महिष अपने मनोकामना फलप्राप्ति निमित्त हाथ जोड़ कर वंदना करने  लगते हैं । माँ माँ.. चहुँओर     माँ माँ .. का ऎसा कोहराम मचाते हैं, कि अपनी सदार्तर्चित्ता की छवि बचाना कठिन हो जाता है ।

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" क्या करें, यह आदिशक्ति  नामी आदिमाता ?  जब सभी कपूत हो जायें, तो कोई माँ उनका क्या भला कर लेगी  ? यह मूढ़ तो बस '  कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि ' गा गा कर दुर्गा-सप्तशती का ऎसा पाठ सुनाते हैं, कि खिन्नता व्यापने लगती है ।"  दुर्गतिशमनी का भुनभुनाना जारी था, कल षष्टी है ! त्रयंबकम की तरंग तो तिरोहित हो चुकी थी, सो मौज़ लेने लगे, स्वांग करते हुये उवाचे, " रूपं देहि, जयं देहि, यशो देहि, द्विषो जहि " ... थमक गये ।

" क्या इतने मात्र से, तुम यह सब प्रदान कर देती हो..  विजय भी कहीं भीख में मिलती है ?  देहि देहि की रट  लगवाये जाओ, भला न होगा कभी .. स्वयमेव मृगेन्द्रा  !  विजयश्री तो पराक्रमी का वरण करेगी या आसन पर पलथा लगाये ' रूपं देहि, जयं देहि, यशो देहि द्विषो जहि' का ? सहसा क्रुद्ध हो गये, " कब तक इस भिक्षुक मनोवृत्ति का वरण कर अपने जम्बूद्वीपे भारतखंडे  को अकर्मण्य बनाये रहोगी ?  पाताललोक वासी मलेच्छपति से भी माँगने पहुँच गये, ये लोग ।"  भोलेनाथ थरथर काँपने लगे... हाय बप्पा,  ई औघड़नाथ आजु तांडवै देखाय दिहें का ?   मेरी सरक गयी ! smile_angry

मैं  स्वयं ही जैसे भँग की तरंग में आ गया । इतने वर्षों से पाठ वगैरह करता आया, वह सब लग रहा कि उड़न छू .... ? आस्था में तर्क को स्थान न मिलता हो, किन्तु इस तर्क में तो आस्था ही आस्था है ।lightbulb मनमोदक खाते रहना छोड़ कर बुद्धिबल व बाहुबल पर भरोसा क्यों न रहा ? 

जकारो जन्मविच्छेदः पकार पापनाशकः

जन्मपापहरो यस्मात जप इत्यभिधीयते

यह तो हुई जप की महत्ता ! चंड-मुंड मारे गये, शुंभ-निशुंभ भी खेत रहे, रक्तबीज का अंत हुआ और महिषासुर का वध हुआ । 700 श्लोकों में समेटी गयी इस कथा का सार वही अनादि सत्य है, कि बुराई का अंत व अच्छाई की विजय ... यही ना, सहमत ? तो फिर मित्र जरा यह तो बताओ कि इनको हज़ार बार, लाख बार एक जगह बैठ कर जपते रहने से समाज का, और आपके स्वयं का क्या भला होगा ?  यस्स, इनमें निहित बीजमंत्रों की उपादेयता से इन्कार नहीं किया जा सकता, बशर्ते  हम यह बघारना छोड़ दें कि असली वाले मंत्र तो ज़र्मनी चले गये व एक भारतीय राज भाटिया की देखरेख में हैं, इसीलिये इन बचखुच लाइना में अब दम न रहा । जन्म लेना क्या इतना बड़ा पाप है, कि हम इससे उबरने की कोशिश में पूरा जीवन ही होम कर दें ।  उस पर भी यह विलासिता कि नारीस्वरूप को पूज्या बनाने में इतनी रसिकता का आश्रय लिया गया है, कि आश्चर्य होता है कि ऋषिगण ने नारीदेह सौष्ठव  को कितना नज़र गड़ा कर, बारीकी से देखा होगा । मैं कहीं बहक रहा हूँ क्या ? बता देना भाई, समेट लूँगा !  अच्छा, चलो जल्दी से निपटा ही दिया जाय...  वैसे ही फ़र्ज़ी तौर पर, या कि सोदाहरण ? सोच लो, इसमें संस्कृत है ।

पत्नी मनोरमां देहि मनोवृत्तानुसारिणीम । तारिणीं दुर्गसंसारसागर्स्य कुलोद्भवाम । जपत तो एहिका हो, अउर करत का हौ ? आपै देखि लेयो हम न बोलब !smile_zipit    ततो वव्रे नृपः राज्यमिति मंत्रस्य जपे स्वराज-लाभः । गाँधी एहिका पढ़बे नहिं भे, लाठी-डंडा खा लिहिन, जेलु गये सेंत में ! एहिकै जपि लेत, छुट्टी हुई जात अंग्रेज़न की !smile_wink    बलिप्रदाने पूजायामग्निकार्यै महोत्सवे । सर्वं ममैतच्चरित मुच्चार्यं श्राव्यमेव ॥ अब आप ही बताओ भाय, कि सर्वोपकारकरणाय सदार्द्रचित्ता बकरा-भैंसा से काहे बैर ठाने हैं ?blacksheep     वह तो शायद पशुत्व की बलि माँग रहीं, अउर ई मनई काटि रहे बकरा ! बकरे का पशुत्व भी इतना निरीह कि गाँधी जी प्रायश्चित में एहिका दूध पियत पियत मर गये !Devil                                   कामदा कामिनी कामा कांता कामांगदायनी । अब एहिका देखि लेयो, साफ़ै साफ़ बतावत हैं कि देवी का अंश नवयौवनाओं में ही है, तबहिन हम सोचित रहा कि कुमारीतंत्र तो है,smile_embaressed  किंतु वृद्धातंत्र कब्बौ नहिं सुना भवा है ! सही है, भाय सही है... चढ़ी- चढ़ै का सबहिन पूजत है । तबै ई नकलची ललमुँहें भी तो मरियम गढ़ि लिहिन रहा । हमरे ईहाँ तो हद खतम कर दिहिन, भाय । एहिका देखो..                                                  नव तरूणशरीरा मुक्तकेशी सुहारा । शवहृदि पृथुतुंगस्तन्ययुग्मा मनोज्ञा ॥ अरूणकमल्संस्था रक्तपद्मासनस्था । शिशुरविसमवस्त्रा सिद्ध कामेश्वरी सा ॥ एहिका मतलब माता बहिनन का सोचि कै नाहिं बतावा चाहित है, यहि से मन नाहिं भरा तो.. स्तनौ रक्षेत महादेवी मनःशोक विनाशिनी । नाभौ च कामिनी रक्षेत गुह्यं गुह्येश्वरी तथा ॥ रोमकूपेषु कौमारी त्वचं वागीश्वरी तथा । शुक्रं भगवती रक्षेत जानुनी विंध्यवासिनी ॥ गिनवा गिनवा कर अंग प्रत्यंग की रक्षा का भार देवी के मत्थे दे दिया, यहाँ तक कि शुक्र भी ! आख़िर तो हम उन्हीं की वंशज ठहरे, ना ?  अब डोलते रहिये, इधर-उधर... क्योंकि इधर पहले ही बहुत कुछ सुपुर्द किया जा चुका है ! शूलिनी वज्रिणी घोरा गदिनी चक्रिणी तथा । शंखिनी चापिनी वाणा भुशुंडी परिघायुधा ॥ शूलेन पाहि नो देवि पाहि खड्गेन चांबिके । घंटास्वनेन नः पाहि चापज्यानिखनेन च ॥ मतलब साफ़ है, कि एक भी आयुध अपने लिये नहीं रखा.. तौन अब देखि लेयो कि देश देश घूम रहें हैं, हथियार के जुगाड़ में ! तब हमरे मनई इंद्र-वरूण इत्यादि से सहायता माँगा करते थे, अब अमेरिका रूस चीन से ! फ़र्क़ इतना ही है, बस !

तो अब चला जाय, कि अबहिन कछु  और खला जाय ?

या देवी सर्वभूतेषु लज्जारूपेणसंस्थिता

नमःतस्यै नमःतस्यै  नमःतस्यै  नमो नमः

 

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यह अपना हिन्दी ब्लागजगत, जहाँ थोड़ा बहुत आपसी विवाद चलता ही है, बुद्धिजीवियों का वैचारिक मतभेद !

शुक्र है कि, सैद्धान्तिक सहमति अविष्कृत हो जाते हैं, और यह ज़्यादा नहीं टिकता, छोड़िये यह सब, आगे बढ़ते रहिये !

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