जो इन्सानों पर गुज़रती है ज़िन्दगी के इन्तिख़ाबों में / पढ़ पाने की कोशिश जो नहीं लिक्खा चँद किताबों में / दर्ज़ हुआ करें अल्फ़ाज़ इन पन्नों पर खौफ़नाक सही / इन शातिर फ़रेब के रवायतों का  बोलबाला सही / आओ, चले चलो जहाँ तक रोशनी मालूम होती है ! चलो, चले चलो जहाँ तक..

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25 January 2008

ऎ मेरे दिल कहीं और चल...

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अमर का संग्रह -अएक अनाम किसिम की निस्पृहता सी मन में घर करती जा रही है, इन दिनों...   सोचा चलो कागज़-कलम से छुट्टी मिली , दिन भर की नुस्खाघसीटी के बाद कीबोर्ड ( कुंजीपटल  ) पर थोड़ी हाथों की वर्ज़िश हो जायेगी, साथ ही दिमाग को कुछ ताज़गी !

आप जिस मंच को भी अपनाते हैं, भला उसके मिज़ाज़ से अपने को अछूते कैसे रख पायेंगे ? ' एक रेख काज़ल को लागिहे, तो लागिहे ', फ़िर मैं तो सयाना भी नहीं ,निपट अनाड़ी हूँ । अभी लिंक लगाना तक तो आया नहीं, फिर कहीं टिपिकल भारतीय अंदाज़ का परिचय देते हुए टिप्प से टपक पडू़ँ और बतंगड़ न्यौत लूँ , तो मेरे अभिमानी मन का रहा सहा चैन भी जाता रहेगा ।

हिंदी ब्लागरी उभर ही रही है, इसकी मूँछ की रेख भी आने में देर है ( जबकि तमिल ,मलयालम एवं अन्य दक्षिण भारतीय भाषाओं में वह परिपक्व भले न हो किंतु प्रौढ़ अवश्य हो रहा है )। इसके लालन पालन में मेरी हिस्सेदारी कितनी और कैसी हो, यही तय नहीं कर पा रहा हूँ और देख रहा हूँ कि सभी अपनी अपनी तरह से इस अनउगी मूँछ को तराशने की प्रतिस्पर्धा में लगे हैं । अपनी अपनी परिभाषायें, अपना अपना राग ! मूँछों पर घी भी चुपड़ा जाने लगा है । स्वस्थ क्या है, मित्रों ?

हिंदी को आगे बढ़ाने की कवायद में ब्लागधर्म को नित्यकर्म में शामिल कर , उसी भाँति निपटाना याकि कुछ स्तरीय लेखन , विविधायें , सामयिक सोच, मुद्रित साहित्य की समीक्षात्मक विवेचना या इन सबसे इतर और कुछ ? समानान्तर रूप से ब्लाग विधा के तकनीकी पक्ष को प्रासंगिक बनाये रखना भी वरिष्ठ ब्लागीरों का दायित्व बनता है । इन सबके बिना हम आधे अधूरे प्रगति के दंभ से भी वंचित रह जायेंगे।

अधिकांश हिंदी पेज़ ऎसे लगते हैं कि किसी आत्ममुग्ध व्यक्तित्व ने उन्हें महज़ अपने को  विज्ञापित करने के लिये रचे हैं । कुछेक उपभोक्तावाद के निहित स्वार्थ के शिकार हो स्पैमिंग के कलंक से विभूषित हो रहे हैं । ऎसे में .... ग़म की दुनिया से दिल भर गया ' गुनगाने से बेहतर होगा कि फिलहाल हल्के फ़ुल्के  टाइमपास का सहारा ले उपसंहार का निर्वाह किया जाय । अमर का संग्रह-ब (2)अमर का संग्रह-स अमर का संग्रह -ई                  अमर का संग्रह-ब    अमर का संग्रह- फ़  अमर का संग्रह-द                              

आप क्या कहते हैं ? 
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17 January 2008

लगी लखटकिया पर मेरी टकटकी

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बस यहाँ फोटू देखो, और देखना कम, समझना ज़्यादा
बहुत लुभा रही हैं, आने वाले कल की तस्वीरें, कंजर कब तक बने रहोगे ?

ऊँची सोच रखोगे, तभी तो महान देश के नागरिक बनने की औकात बनेगी । फ़्राँस की क्राँति का प्रसिद्ध ज़ुमला कोई अकेले उन्हीं का पेटेन्ट थोड़े ही न है ? अरे वाह, रोटी के लिये शोर मचाने से क्राँति कहीं आयी है,भला ? केक देखो , केक सोचो और ख़्याली सही लेकिन केक ही खाओ । रोटी की चिन्ता छोड़ रे मूरख, क्राँति की भ्राँति मे मत पड़ा रह । तेरा कितना अपग्रेडेशन हो रहा है, मनन कर ओ प्राणी । तू दो कौड़ी का आदमी, अपनी दो ट्कियाँ दी नौकरी में कब तक जीता रहेगा ?

यह लखट्किया देख और अपना सुनहरा भविष्य देख । बल्कि देख कम, समझ ज़्यादा !

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आलू प्याज़ भूल रे प्राणी, लखट्किया की सोच । बड़ी सोच का बड़ा ज़ादू की झलक भर दिखला कर श्वार्ट्ज़ ( David J. Schwartz ) साहब बिलियनपति हो गये, तू तो अभी लाखों में ही झूल रहा है !

चिट्ठाजगत संकलक का आधिकारिक चिट्ठा: चजइ - चिट्ठाजगत सर्वोत्तम पोस्ट इनाम हेतु घुसेड़ित, हें हें..हें

जाते थे जापान, पहुँच गये चीन समझ लेना ____________________________________

मूल रूप से लखटकिया .... शीर्षक अपने दूसरे वेबलाग कुछ तो है...जो कि के लिये चुना था किंतु संग्रहित चित्र एवं भाषा में अनायास उतर आया व्यंगात्मक तंज़ जैसे वहाँ फिट नहीं बैठ रहा था, अस्तु यहाँ ठेल कर संतोष करना पड़ा । वस्तुतः देश के उद्धमी अपनी प्राथमिकता तय करने में लकदक से सम्मोहित हो भटक से रहें हैं , तो मेरा भटक जाना भी क्षम्य माना जाये । इस प्रकार के उपक्रम यदि मुझे मानसिक दिवालियापन लगते हैं, तो मुझे असमान्य मानसिकता वाले ठेलू मे शुमार किये जाना सहज स्वीकार्य है । पीठ पीछे खड़ी मेरी बीबी भी मुझे ठेल रही है कि क्लिनिक से काल आ रही है, और तुम यहाँ बैठे हो । अतः जल्दी से स्पष्ट कर दूँ कि आप निर्धारित करें कि सस्ती कार , सस्ता पेट्रोल, सस्ता सरसों का तेल, सस्ता गेहूँ, और सस्ता सस्ता सब कुछ जो एक आम इंसान की ज़रूरत में शुमार है, ऎसी प्राथमिकतायें स्वागत योग्य हैं या इस प्रकार के प्रहसन ? लो फिर अचानक एक गाना याद आ ही गया, ' अंधेरे में जो बैठे हैं, नज़र उन पे भी कुछ डालो..., अरे ओ रोशनी वालों '

रही बात चजइ की तो, वह तो किस रौ में डाल दिया, बता नहीं सकता क्योंकि हिंदी वेबलागिंग में मैं तो अभी लौंडा हूँ । इस दावेदारी को गंभीरता से कतई न लिया जाये । बदहालीबयानी भला कोई पुरस्कार योग्य विषय हो सकता है, यह चिट्ठाजगत तय करे, मेरा सिरदर्द तो आपके सामने है !

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09 January 2008

लोलल्लाँगूलपातेन मारुतः ममराऽतीन निपातय

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' कुछ तो है..जो कि ' के पालनहार में बजरंगबली का संदर्भ अनायास ही नहीं है, असमंजस की असुविधा में, मैं उनको स्मरण कर , अपने सोचे हुये पर कूद पड़ता हूँ । वह भला करता ही रहा है, आगे भी करता रहेगा । क्यों, यह बाद में !

इनसे मेरा परिचय भी अज़ीबोगरीब तरीके से कुछ बाद में हुआ । हमारे घर के पूजास्थल पर माँ दुर्गा की छवि मुझे निरंतर बाँधे रहती थी । तबके निपट छुटपन से ही उनकी मेगाइमेज़ बहुत प्रभावित करती रही है, ' छॆल पर बइठी अउरत, आराम से पैर पर पैर रखे, चार-चार हाथ, छेल का मूँ तो खुला है, इनको खाता नईं है, खा जायेगा, फिर हमको भी खायेगा, कियॊँ नही खायगा जैसे अने्कानेक सवालों का ज़वाब बस यही होता था, जय कर लो - हाथ जोड़ के जय कर लो, और जय्य '।
लेकिन
बड़ों की नज़रों में शैतानी की परिभाषा तो नित बदला ही करती थी । उनमें यदि कुछ उनके हिसाब से शैतानी में शुमार हो जाता , और वह हमसे अगर हो गयी हो, तो एक पक्का अल्टीमेटम तैयार रहता था , " आने दो छोटका को, पड़ेगा एक महावीरी थप्पड़ तो सब भूल जाओगे । " यद्यपि अब तक थप्पड़ से मेरा परिचय हो चुका था किंतु यह महावीरी थप्पड़ क्या होता है ? दिमाग लगाने लायक दिमाग ही नहीं था, सो रोहू-झींगा जैसा ही कोई अंतर होता होगा ।
और एक दिन छोटका ( बोलेतो- छोटे चाचा ) के हत्थे मैं चढ़ ही गया, महावीरी थप्पड़ से मुलाहिज़ा हुआ, आँखों के आगे अंधेरा छा गया, दिन में अमावस की रात में छिटके तारे टिमटिमाने लगे । मैं मदद के लिये ,बुक्का फाड़कर अपना वार्निंग एलार्म बज़ाता ,इससे पहले ही नीचे से पेशाब की धार बह निकली और मैं बेहोश हो गया । तब तक आठ दस बार थप्पड़ खाने का अनुभव हो चुका था, लेकिन भइय्या, ये कइसा थप्पड़ ? रे बपई, रे बपई !
कई दिनों बाद दादी ने खुलासा किया कि इस कोटि के जानदार प्रहार को ही महावीरी थप्पड़ कहते हैं,
बाप रे ! उन दिनों उत्तर बिहार के प्रायः हर गाँव में एक महाबीरस्थान होता था, दूर से ही अपनी ' धज्ज़ा ' से लोकेट किया जाता था । धज्ज़ा याने ध्वजा, हरे बाँस की फुनगी पर झीना सा तिकोना लाल कपड़ा । एक दिन महाबीरस्थान जाना हुआ, बाबा के साथ । तो देखा महाबीर जी को , लिपे पुते एक टाँग पर खड़े, मुँह में आटे की लोई सरीखा कुछ ठुँसा हुआ, और शायद उसी वज़ह से उनकी आँखें बाहर को उबली पड़ रही थीं, एवं वह दीवार से चिपक से गये थे । इतना सब होने के बावज़ूद भी उनके एक हाथ में भारी भरकम मुगदर और दूसरा हाथ तश्तरी में खाँचेदार पहाड़-घर वगैरह से लैस । तो यह हैं महाबीर जी ? मन में एक संतोष सा हुआ, उनकी दुर्दशा देख कर । ताक झाँक कर देखा, थप्पड़ के लिये कोई स्पेयर हाथ होगा, वह तो था ही नहीं ! फिर एक हमदर्दी सी जग आयी और मैं उनका कुछ-कुछ मुरीद हो गया ।
फिर उनसे परिचय और प्रगाढ़ होता गया । हर अष्ट्याम में वह अनिवार्य रूप से मौज़ूद रहते और हमलोग उनके चक्कर लगाते लगाते ' हरे राम, हरे कृष्ण, हरे राम..हरे हरे ' गाया करते । उत्तरी बिहार में अखंड रामायण या जागरण की तर्ज़ पर अठजाम ( बोले तो-अष्टयाम ) का प्रचलन है,एक हरा बाँस घर के सामने या आयोजन स्थल पर गाड़ दिया जाता हैं, मँड़ई छा दी जाती है, बाँस के सहारे, उसके चारों ओर देवी देवताओं की तस्वीरें प्रतिमा लोग अपने अपने घरों से लाकर सजा देते हैं , फिर ढोल मज़ीरे झाँझ बजाते हुए ग्रामवासी 24 घंटे तक अनवरत परिक्रमा करते हुये , हरे राम , हरे हरे का उद्घोष् लयपूर्वक लगाया करते हैं । लाज़िमी है, ऎसे आयोजन में हनुमान का होना ।
सन 1965 के बाद के काल में देश के स्वाभिमानी प्रधानमंत्री ने अभूतपूर्व अन्नसंकट से आवाहन किया कि संपूर्ण देश एक दिन उपवास रखे, अतः हर सोमवार को हमारे यहाँ भी उपवास रखा जाने लगा । मैं कुछ ज्यादा ही सयाना था, सोमवार के बदले मंगलवार को व्रत करके देश के प्रति अपना कर्तव्य निभाने लगा, वह सिलसिला आज तक चल रहा है । पावरफ़ुल हैं, इन्हीं को अगोर लेयो, भाई !
बेचारे श्री रामचंद्र भी उन्हीं के सहारे पार लगे थे । जैसे पुकार उठे, ' सुनु कपि तोहि समान उपकारी, नहिं कोउ सुर नर मुनि तनुधारी । ' और देखिये उनकी बुद्धि भी चकरा गयी , ' प्रति उपकार करौं का तोरा, सन्मुख होइ न सकत मन मोरा ' । बेचारे अब तक उनका ऋण ढो रहे हैं, ' सुनु सुत तोहिं उरिन मैं नाहीं '।
जब से देख रहा हूँ कि इस युग में केवल बाबू, बकैत और अर्दली की ही चलती है, तब से मेरी निष्ठा और भी बढ़ती ही जा रही है ।
' होत न आज्ञा बिनु पैसारे ', अब बताईये ' साहब सों सब होत है, बंदे से किछु नाहिं ' । और साहब तक बात पहुँचानी हो तो इस सप्तचिरंजीवी बंदे से तो मिलना ही पड़ेगा । चिरंजीवी हैं, तो यहीं कहीं होंगे, साहब तो रघुबरपुर में बैठे हैं । आपकी अरज़ी तो फारवर्ड इनसे ही होगी, तभी तो ' और देवता चित न धरई, हनुमत सेइ सर्व सुख करई '

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उपर दर्शायी गयी विग्रह की छवि यहाँ श्री भवानी पेपर मिल्स में स्थापित श्री अभयदाता जी का है, कसौटी पत्थर की बनी यह मूर्ति शायद उत्तर भारत में अनोखी है, और बहुत ही जागृत । यहाँ पूजा की परपंरा विशुद्ध रूप से दक्षिण भारतीय कर्नाटक शैली की है, उपमा, छोले का भी भोग यहाँ लगाया जाता है।



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06 January 2008

जाने कहाँ हैं , अपने लालू ?

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क्या आपको अपने लौहपथ मंत्रीजी की याद तो नहीं आरही है ?
बड़े
हौसले से एक टी०वी० शो वालों ने न्यौत तो लिया, किंतु होशियार लालू अपनी स्टार वैल्यू का मर्म टटोलने में कामयाब रहे ।
साफ़-फट्टाका बोल दिये,"हम्को अगर जोकरई के लीए बोलाएं हँय तो अब हम जोकरई नहिं करूँगा, हमको सन्करजी दरसन देकर बोलेंहँय मुर्गी अँडा सब छोड़ो, मान्स-मच्छी मीडीया से परहेज़ करो । चक्करबर्ती समराट का माफिक भागऽ हय तोम्हारा ।"
तो
अपने साणे लालू बिलागींन्ग मे ऊन्मूख हुए और सीधै माईक्रोसाफ़्ट से बोले हमरे लिये यकठो कम्पूटर हीन्दिये मे बनाईये सो आजकल ऊहे ऊहाँ बनवा रहे हँय । बानगी देखियेगाऽ..ऽऽ, तो इहाँ देखीये लिजिए



ईसको
मजाक बूझते हँय, फारेन तक में हम कुल्हड़ बेकवा दिया हूँ तो आपलोग का भी टुट्पुंजिया इस्टेटस अपग्रेड करूँगा, बेचारा हीन्दिवाला सब कउन कउन टाईपींग टूल से काम चला रहा हय ।जब से हमरे संग्यान में आया हय।
हमारा ग्रासरूट लेबिल का मन बहुतै दूखी हय ।




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02 January 2008

तो आज यही सही - दो

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amar ki murgee Murgi aur Anda-amar

हमारे कैफ़ भाई व्यापार करने उतरे ,

सबको पछाड़ बाज़ार पर कब्ज़ा करने की ग़रज़ से अंडों के बिजिनेस में एक अनोखा प्रयोग किया । वह दो रुपये के भाव से अंडे ख़रीदते और पौने दो रुपये के भाव बेचते । व्यापार चल निकला, सभी उनके मुरीद ! देखते ही देखते वह एक साल में ही वह लखपति हो गये !

भला कैसे ? और उन्होंने बिजिनेस लाईन से तोबा भी कर ली , यह क्यों ?

प्रयास करें, ज़वाब एकदम साफ़ है ।

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यह अपना हिन्दी ब्लागजगत, जहाँ थोड़ा बहुत आपसी विवाद चलता ही है, बुद्धिजीवियों का वैचारिक मतभेद !

शुक्र है कि, सैद्धान्तिक सहमति अविष्कृत हो जाते हैं, और यह ज़्यादा नहीं टिकता, छोड़िये यह सब, आगे बढ़ते रहिये !

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