जो इन्सानों पर गुज़रती है ज़िन्दगी के इन्तिख़ाबों में / पढ़ पाने की कोशिश जो नहीं लिक्खा चँद किताबों में / दर्ज़ हुआ करें अल्फ़ाज़ इन पन्नों पर खौफ़नाक सही / इन शातिर फ़रेब के रवायतों का  बोलबाला सही / आओ, चले चलो जहाँ तक रोशनी मालूम होती है ! चलो, चले चलो जहाँ तक..

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28 September 2009

क़न्फ़्यूज़ियाई पोस्ट - हमका न देहौ, तऽ थरिया उल्टाइन देब

Technorati icon
मसल है...
खाय न देब तऽ थरिया उल्टाइन देब

अर्थात, हे पाठकों
यदि मुझे अपनी मर्ज़ी अनुसार पसँद नहीं मिलेगी,
तो मैं परसी हुई पूरी थाली उल्टा तो सकता ही हूँ !

खेद तो यह है कि, यह सब देखते देखते हो गया, जब  मैं  ब्लागवाणी  खोल  कर टिप्पणी के लिये पोस्ट चुन रहा था ।
रात्रि के 11.37 पर पेज़ रिफ़्रेश करने को F5 दबाया और आईला ’ रुकावट के लिये खेद है ’ जैसा ब्लागवाणी का पन्ना चमकने लगा । अफ़सोस दिल गड्ढे में जा गिरा । कीबोर्डवा से फौरन F5 नोंच कर फेंक दिया, ससुरी यही है, झगड़े की जड़ !  Freedom at Midnight पढ़ने में मन लगाना चाहा, देसी रियासत रज़वाड़ों की खुदगर्ज़ी के किस्से पढ़ कर अपनी कौम पर गर्व हो आया, लगा कि हम उनसे किसी मायने में अलग नहीं हैं । आख़िर अपने ब्लाग का मालिकाना हक़ है, हमरे पास..  जुगाड़ से चार ठो चारण भी जुटा लिये हैं । अयहय, अब कोई यह तो कहेगा कि ’ अलि कली सों बिन्ध्यौं, अब आगे कौन हवाल ! “ अउर हवाल यह कि अपने हाथन कली नोंच कर फेंक दिया । पाठकों के पसँद नापसँद को लेकर ऎसी सजगता, और कहाँ ? आख़िर कीबोर्ड के वाज़िद अली शाह हैं हम !

blogvani 
सिरफिरा था भगत सिंह जो कल अपने जन्म दिन पर अपने वतन में याद तक न किया गया । वयम पोस्ट लिखित्वा ब्लाग वाः साहित्यवाः के फेर में चिन्तामग्न साहित्यलॉग कर्मी दुष्यँत  कुमार की बरसी पर किसीको याद भी न आये | या तो स्मृति समारोह में जाने को पहनने को कमीज़ उठायी होगी, और लेयो थमक गये, “  हँय मेरी कमीज़ उसकी कमीज़ से मैली क्यों ? मेरे अद्वितीय पोस्ट की पसँद उसके सड़े पोस्ट से निचली क्यों ? “ लिहाज़ा  धप्प से बईठ गये, उनके शून्य विचार में बस यही आया होगा कि, " चलो आज एक धत्त तेरी की – हत्त तेरी की पोस्ट लिखी जाय, यह नूतन विधा है, मैथिली बाज़ार बड़े शवाब पर है ,थोड़ी भगदड़ सही !  ऎसे कुविचार ब्लागलेखन के अनिवार्य तत्व हैं, यह सब अनाप शनाप सोच नींद को अपने पैर जमाने से रोक रही थीं । एम.पी.थ्री प्लेयर का हेडफोन कान से लगा लिया,  धीरे से आजा री निंदिया अँखिंयों में निंदिया आजा री आजा !

अयईयो ये किया गडबड जे.. श्रीधर सुनिधि की जोड़ी हेडफोन में घुस कर चिढ़ाने लगीं । इनको कैसे पता चला कि, ब्लागवाणी ने रुसवाई चुन ली है ? चाहें तो आप ही लपक लें, वाह क्या स्क्रिप्ट बन पड़ी है, " ब्लाग आज कल ! "

चोर बाजारी दो नैनों की,
पहले थी आदत जो हट गयी,
प्यार की जो तेरी मेरी,
उम्र आई थी वो कट गयी,
दुनिया की तो फ़िक्र कहाँ थी,
तेरी भी अब चिंता मिट गयी...

तू भी तू है मैं भी मैं हूँ
दुनिया सारी देख उलट गयी,
तू न जाने मैं न जानूं,
कैसे सारी बात पलट गयी,
घटनी ही थी ये भी घटना,
घटते घटते ये भी घट गयी...

चोर बाजारी...
तारीफ तेरी करना, तुझे खोने से डरना ,
हाँ भूल गया अब तुझपे दिन में चार दफा मरना...
प्यार खुमारी उतारी सारी,
बातों की बदली भी छट गयी,
हम से मैं पे आये ऐसे,
मुझको तो मैं ही मैं जच गयी...
एक हुए थे दो से दोनों,
दोनों की अब राहें पट गयी...

अब कोई फ़िक्र नहीं, गम का भी जिक्र नहीं,
हाँ होता हूँ मैं जिस रस्ते पे आये ख़ुशी वहीँ...
आज़ाद हूँ मैं तुझसे, अज़स्द है तू मुझसे,
हाँ जो जी चाहे जैसे चाहे करले आज यहीं...
लाज शर्म की छोटी मोटी,
जो थी डोरी वो भी कट गयी
,
चौक चौबारे, गली मौहल्ले,
खोल के मैं सारे घूंघट गयी...
तू न बदली मैं न बदला ,
दिल्ली सारी देख बदल गयी...
एक घूँट में दुनिया सारी,
की भी सारी समझ निकल गयी,
रंग बिरंगा पानी पीके,
सीधी साधी कुडी बिगड़ गयी...
देख के मुझको हँसता गाता,
जल गयी ये दुनिया जल गयी....

वईसे विजयादशमी शुभकामनाओं की तो होती ही है, इसे चाहे जिस रूप में ग्रहण करें, मर्ज़ी आपकी

vvvvvv

ताज़ा अपडेट

ब्लागवाणी का यह निर्णय किन्हीं निहित तत्वों के मँसूबों को फलीभूत कर रहा है,
बल्कि होना तो यह चाहिये था कि, इनकी अवहेलना कर इस पर तुषारापात किया जाये,
ऎसा तभी सँभव है, यदि यह टीम अपने फैसले पर पुनर्विचार कर कुछ कड़े तेवर के साथ प्रकट हो ।

बल्कि होना तो यह चाहिये कि अभी कुछ दिनों तक त्राहि त्राहि मचने दें,
जिसके लेखन में दम हो वह अपनी पोस्ट अपने कलम और सम्पर्क के बूते औरों को पढ़वा ले ।

एक मज़ेदार तथ्य यह कि, मैं मूरख से ज्ञानी जी की पोस्ट पर ब्लागवाणी के जरिये ही पहुँचा,
उत्सुकता केवल इतनी थी कि, कल सर्वाधिक पसँद प्राप्त पोस्ट में आख़िर क्या है
!

मज़बूरी में, चलिये यही गाते हैं

तारीफ तेरी करना, तुझे खोने से डरना ,
हाँ भूल गया अब तुझपे दिन में चार दफा मरना...
प्यार खुमारी उतारी सारी,
बातों की बदली भी छट गयी,
 

इससे आगे

09 September 2009

नो.. नो.. नो.. दर्पण दर्शन क्यों ?

Technorati icon

आज सुबह सोकर उठा..वह तो देर सबेर सभी उठते ही हैं, ख़ास बात क्या है ? लेकिन आज मेरा मन कुछ भारी था, अनमना सा बाहर पड़ी कुर्सी पर बैठा शरीफ़े में आते हुये फूलों की कलियाँ गिन रहा था । वह बगल में खड़ी हो जैसे आर्डर ले रही हों, “ ब्लैक टी या नींबू पानी ? ” कुछ ज़वाब दूँ कि उससे पहले ही वह पत्नी-अवतार में दरस दे दिहिन, “ जो बोलना है, जल्दी बोलो.. अभी बहुत काम है । अभी नहाया भी नहीं हैं, तुम मैक्सी में घूमते देख चिल्लाने लगोगे !

सुघड़ पत्नियाँ पति का ज़वाब सुनने का इंतेज़ार नहीं किया करतीं, सो एक फ़रमान जारी करते हुये पलट गयीं, “ चाय बना देती हूँ !” मुझे तुमसे कुछ भी न चाहिये.. मुझे मेरे हाल पर छोड़ दो.. वाले अँदाज़ में मैं घिघियाया, “ बना दे यार, जो बनाना है, बना दे !” लो जी, यह तो लेने के देने पड़ गये, यहाँ तो उल्टे मेरी ही चाय बनने लगी । उनका  पलटवार, “ कल रात देर तक खटर पटर करते रहे,किसी की अच्छी पोस्ट पढ़ कर डिप्रेशन मे तो नहीं चले गये, या तो फिर किसी से पँगा हुआ होगा ?” मैंने शाँति-प्रस्ताव का सफेद झँडा फहरा दिया, “ काहे का पँगा.. नैतिकता के तक़ाज़े को  पँगा क्यों कहती हो..जबकि तुम तो जानती हो कि.. “ पति की बात पूरी होने के मँसूबों पर पानी फेरने का उनका पत्नीधर्म उबाल खा गया, “ मै सब जानती हूँ, मुझको न बताओ । चैन कहाँ रे..,” पर आख़िर हुआ क्या ? अभी आती हूँ तब ठीक से सुनूँगी, रुको जरा चाय तो ले आऊँ ।”  पेंचपँगादि कथाप्रेम  की स्त्रीसुलभ कोमलता उन पर छा गयी । annoyed with charchaचुनाँचे, मुझे टुकड़े टुकड़े कल का वह सब बताना पड़ा, जो मैं नहीं चाहता था । लेकिन सामने बईठ के मेरी नारको सब उगलवा लिहिन, अउर फौरन रिपोर्ट लगा दिहिन,“ ई फ़ुरसतिया तुमको.. बल्कि तुम सब को कौन सी लकड़ी सुँघाये हैं, भाई ? जब देखो तब छुट्टा बछड़े की तरह भिड़ते रहते हो ? “ लेयो, ई सामने ही एक्ठो अउर बियास जी बईठी हैं ? शाह जी एक फैसला और ठोंकती भयीं कि अब दर्पण जी से कोई बैर मत लेना । मानों सामने वाली लुगाई दर्पण से बैर होने की कल्पना से  ही सिहर गयीं हो ! अब इनको क्या कहें, भाई  यह भी एक तरह का बायस्डियत ही तो ठहरा ?

दर्पण साह "दर्शन" ने आपकी पोस्ट "सफर में ख़ो गई मंज़िल,उसे तलाश करो" पर एक नई टिप्पणी छोड़ी है:

Still i would say....
again in English (@अविनाश वाचस्पति ..हमें अंग्रेजी नहीं आती है)

Biased blog and biased posting should not be appreciated anyways even if it is for any specific blog(शब्दों का सफ़र ब्लाग की चर्चा वाली पोस्ट पर कोई biased कहता है तो मुझे अच्छा ही लगेगा), infact that's what the biasedness is...

दर्पण साह "दर्शन" द्वारा चिट्ठा चर्चा के लिए September 08, 2009 11:50 PM को पोस्ट किया गया

डा. अमर कुमार ने आपकी पोस्ट "सफर में ख़ो गई मंज़िल,उसे तलाश करो" पर एक नई टिप्पणी छोड़ी है:

@ 'Darshan'

I am not a spokeperson of anyone.
But, don't you think that its we only, who can protect the Sanctity of our common platform ?
No reservations whatsover, so Let it be like that way only, nothing more or less.
It is intrigueing to see someone appearing at the last bench, just to put a comment full of annoyance.

I honour your affection for being Biased.
BIAS has two meanings.. albeit both are cousines
1. Prejudiced : as your comment reflects.
2. Inclined : as charcha convener's Choice presents.

Who are we to challenge his inclination or choice ?
Someone uses Cow excreta for treating multiple ailments, alright !
Other one likes to get examined, investigated and treated by some other way of his choice & belief, Its pretty okay !

Furthermore, why the hell mention of Ajit ji's Safar has made you sick ?
He is a admired Blogger, loved one by his atleast 500 regular readers. Any sanity in the world would agree that such dignity can never be acheived on a biased basis.

Ofcourse, after your narrow angle obsevation, We realized it and feel delighted over ourselve being biased for Him .

डा. अमर कुमार द्वारा चिट्ठा चर्चा के लिए September 09, 2009 1:00 AM को पोस्ट किया गया

दर्पण साह "दर्शन" ने आपकी पोस्ट "सफर में ख़ो गई मंज़िल,उसे तलाश करो" पर एक नई टिप्पणी छोड़ी है:

Aapki baat ka uttar dene se pehle ye batana avayashak samajhta hoon ki, shabdon ka safar mera bhi priya(if not, then one of the favourite) blog hai,aur is post pe tippani karne se pehle maine wahan pe tippini ki thi.
aapki baat se poorntya sehmat hoon ki aadmi ke apne vichar ho sakte hain kisi bhi blog, post ya koi bhi vastu hetu.
main ye bhi manta hoon ki us specific blog(shabdon ka safar) ke liye wo comment katai uchit nahi tha.Aur na hi maine us specific post ke liye wo comment kiya tha, ye to aap bhi samajh gaye honge. Wo Blog bura tha ye anya blog(jinki charcha ki gayi thi) bure the, ya unki post buri thi ya wo bura likhte hain....
ye mainie katai nahi kaha.Aur na hi mera arth tha, biased ka arth prakshit blogs se na liya jaiye, biased ka arth aprakashit bolgs ki backlink se liya jaiye
is mamle main mujhe chittha charcha blog biased lagta hai aur ye main tab tak kehte rahoonga jab tak mujhe iske ulat koi praman nahi mil jaata. And again i want to justify my words with ur quotation
Who are we to challenge his inclination or choice ?. Sir aap bahut padhe likhe hai aur har ek baat ke do pehlu dekte hain...
main kisi vivad ko janm nahi dena chahta, aur main koi vivad nahi chahta, piche 9 mahino se blogging main hoon kabhi kisi baat ko tool bhi nahi diya. Aur na hi kisi ek vyakti ke uppar koi akeshep kiya hainbas main chahta hoon vivaad na ho atmmanthan ho ki kya ye blog biased nahi hai. Agar aap thoda sa sochne ke baat dil se keh dein ki hum (ya ye blog) biased nahi hain Main maan loonga.
No Personal Grudeges.

It is intrigueing to see someone appearing at the last bench, just to put a comment full of annoyance.

Meri baat nahi hai par generally "History tells Great Brains came from last banches"
Sir ek baat aur kisi ke vichar acche ye tuchcha nahi hote bus hote hain.
Main aapko apni baat nahi manwaaonga, balki ho sakta hai ki main galat houon.
chittha charcha ek general blog hai, jismein kum se kum kuch naye aur undiscovered blog ke bhi charche hone chahiye, moreover kuch blog aise hain jinke har post ka (note: har post ka) back link diya jaat hai. kya koi blogger itna consistence ho sakta hai? Tell me logically (no emotions please).
Kehna bahut kuch chahta hoon, examples bhi bahut de sakta hoon par mera maksad na koi controversy khada karna hai na hi kisi ko dosharopan, bus chahta hun ki sacchai ko log sweekar karein.
yahan blog jagat main(aisa US UK ke english blogs main bhi dekha hai aur india main bhi) ek link, back link, comment, followers ki hod hai....
theek hai honi chahiye .But these should be secondary things. And you know what should be the primary concerned. Sir mujhe meri baaton ka koi uttar nahi chahiye , Bus aap itna keh dijiye ki chittha charha as in whole biased nahi hai main maan loonga.

Who are we to challenge his inclination or choice ?

Sir this blog, as far as i know, is for general reader, not for a group of pelple. (i can't see any moderatorfor specific group)
अँतर के ऊदल का कूदल-करतब शुरु हो,
इससे पहले ही अपना आल्हा इसी आलाप पर रोक देता हूँ..

Sir maine to kisi bhi individual ke uppar aur uski ability ke uppar koi shque nahi kiya, to fir meri annoyance se aapka kya matlab hai? maine to ye baat tab bhi kahi jab aaj mera backlink aapki post main hai, aur pehle bhi 3-4 links meri post ke chittha charcha ne diye hain. maine to chota sa comment kiya tha taki aap log aatm manthan kar sakein agar aap kehte hain ki aap biased nahi hain ya biased hona accha hai to main maan leta hoon.

No reservations whatsover, so Let it be like that way only, nothing more or less.

jaldi main office likh raha hoon isliye baaton ki 'continiuty' ke liye kshama karein.

खुशदीप सहगल ने कहा… ग़ैरों पे करम, अपनों पे सितम
ए जाने वफ़ा, ये ज़ु्ल्म न कर...
(अनूपजी, कभी हौसला बढ़ाने के लिए नौसिखियों पर भी नज़रें-इनायत कर दिया कीजिए...

दर्पण साह "दर्शन" द्वारा चिट्ठा चर्चा के लिए September 09, 2009 10:09 AM को पोस्ट किया गया

Shiv Kumar Mishra ने आपकी पोस्ट "सफर में ख़ो गई मंज़िल,उसे तलाश करो" पर एक नई टिप्पणी छोड़ी है:
Blog, chitthacharcha is biased.

Because I am from the far most corner of the last bench, I carry the greatest brain ever. And this greatest brain on the planet earth wants me to announce that the blog chitthacharcha is biased. Greatness of a brain is not proved till it announces someone somewhere biased.

So, from now onwards, do remember that if I hold someone as biased, its unquestionable since I not only have the greatest brain, I am also from the far most corner of the last bench.

Unhappy blogging.

Shiv Kumar Mishra द्वारा चिट्ठा चर्चा के लिए September 09, 2009 10:54 AM को पोस्ट किया गया

cmpershad ने आपकी पोस्ट "सफर में ख़ो गई मंज़िल,उसे तलाश करो" पर एक नई टिप्पणी छोड़ी है:

"History tells Great Brains came from last banches"

Three Cheers for Saha jI from the back bench. He has now donned the mantle of GREAT BRAIN.... so no more argument please:)

cmpershad द्वारा चिट्ठा चर्चा के लिए September 09, 2009 11:06 AM को पोस्ट किया गया

मन एकदम्मैं किचकिचा गया, ससुरी अँग्रेज़ी का एक शब्द इतना बवाल मचाये है ?  इसका तो है, अर्थ और ही और ! लाओ तो जरा मुई की बाल की खाल खींची जाये….

बायस्ड बोले तो पूर्वाग्रह और अनुग्रह दोनों ही
पूर्वाग्रह बोले तो भाँति भाँति के बिरादरी वाले हैं
मसलन : शिवकुमार मिश्र या चलिये मैं ही सही, बड़े लड़ाका हैं ।  हर कथन में लड़ाकात्मकता खोजा जायेगा ।
इसके उलट यदि परसाई जी की कोई किताब दिख गयी, तो खरीदी ही जायेगी । परसाई जी हैं तो अच्छा ही होगा ! जबकि दोनों में से कोई भी ज़रूरी नहीं कि, सदैव अपेक्षित ही मिले । अब आप अपने पूर्वग्रसित होने का दँश बाद में भले सहलाते रहिये ।
अब अनुग्रह जी को नहीं छेड़ूँगा, यह तो इतनी जगह पर इतने किसिम के भेष बदले हुये परिलक्षित होते हैं कि, जब तक आप सँभले सँभले और लो जी, अनुग्रह हो गया । आपकी टकटकी को ताड़ कर उन्होंने एक मुस्की मार दी, अनुग्रह होय गवा रब्बा रब्बा.. गुनगुनाते हुये आप बायस्ड हो गये कि हो न हो, पक्का है कि, आपका गेट-अप गुटर गूँ खान को मात दे रहा है । मायने कि उनका अनुग्रह आप तक कैच होते होते पूर्वाग्रह बन गया कि नहीं ?  मामला सफा क्लीन बोल्ड !

असहमत रहना तो जैसे नारी का ईश्वर प्रदत्त अधिकार है, यदि सहमत हों भी जायें तो, “ भाई तुम जानो “ का डिस्क्लेमर तो पक्का ही लगा मिलेगा । सो, मेरा केस यह कह कर ख़ारिज़ हुआ कि, “ बस तुम हर जगह बीच में कूदने की आदत छोड़ दो ।” जब से समीर भाई ने कचोट में, यह बोल क्या  दिया कि, “ भाई  थोड़ी  बनावट लाओ ” इनका हौसला बुलँद है । गलत का हौसला तोड़ना मेरा मैन्यूफ़ैक्चरिंग डिफ़ेक्ट है, कानजेनिटल एनामली ! का  करें ?  हिन्दी ब्लागिंग से जब पहला पहला प्यार हुआ था, तब ज्ञानदत्त जी ने नवभारत टाइम्स के एक कवरेज  गाजियाबाद में रिश्वत को मिली सरकारी मान्यता  पर अपना आलेख दिया था, वाह, अजय शंकर पाण्डे ! तब न जानता था कि, सँक्षिप्त टिप्पणी देना या एकदम्मैं टिप्पणी देना ब्लागरीय शिष्टता है, सो मैनें ताव में एक लम्बी टिप्पणी दे डाली । यह इसलिये बता रहा हूँ  कि गलतफ़हमी  न  रहे कि, मैं शुरु  से ऎसा न था । यह ऎब तो कफ़न दफ़न तक रहेगा,  जी

कुछ तो है.....जो कि ! said...
माफ़ करियेगा बीच मे कूद रहा हू.
का करियेगा बीच मे कूदना तो हम लोगन का नेशनल शगल है.
ई अजय जी की दूरदर्शिता समझिये या बेबसी कि उनको यह तथ्य अकाट्य लगा कि ई सब रोक पायेगे तो इसको घुमा के मान्यता दे दिये. वाहवाही बटोरने की क्या बात है ? लालू जी भी तो इस अन्डरहैन्ड खेल का मर्म समझ के घुमा के पब्लिक के जेब से पइसा निकाल रहे है अउर मैनेजमेन्ट गुरु का तमगा जीत रहे है. पब्लिक के जे्ब से धन तो निकल ही रहा है,  बस खजाना गैरसरकारी से सरकारी हो गया

.हम लोग भी दे-दिवा के काम निकलवाने के थ्रिल के आदी पहले ही से थे अब रसीद मिल जाता है,इतना ही अन्तर है . गलत करिये ,दे कर छूट जाइये,यही चातुर्य या कहिये कि दुनियादारी कहलाता है.  गाजियाबाद का खेला तो हमारी मानसिकता को परोक्ष मान्यता देता है, और सुविधा कितना है, अब दस सीट पर अलग अलग चढावा का टेन्शन नही, फ़ारम भरिये १५ % के हिसाब से भर कर काउन्टर पर जमा कर दीजिये . रसीद ले लीजिये . खतम बात ! दत्त जी क्षमा करेगे, ब्लागगीरी की दुनिया मे आपकी हलचल खीच ही लाती है ,

एक आपबीती बयान करना चाहुगा, जब पहले पहले शयनयान चला था, बडी अफ़रातफ़री थी नियम कायदा स्पष्ट नही था ( वैसे अभी भी कहा है,अपनी अपनी व्याख्याये है ) तो शिमला से एक अधिवेशन से एम०बी०बी०एस० लौट रहा था , अम्बाला से इस शयनयान मे शयन करता हुआ सफ़र कर रहा था बीबी बच्चे आरक्षण दर्प से यात्रा सुख ले रहे थे, कभी नीचे कभी ऊपर .लखनऊ तक का टिकट था जाना रायबरेली ! बुकिग की गलती, ठीक है भाई.. लखनऊ मे टिकट बढवा लेगे परेशान मत करो का रोब मारते हुये लखनऊ तक आ गये, लखनऊ मे महकमा का काला कोट लोग चा-पानी मे इतना बिजी था कि एक लताड  सुनना पडा अपनी सीट पर जाइये न क्यो पीछे पीछे नाच रहे है

.चलो भाई ठीके तो कह रहे है ड्युटी डिब्बवा के भीतर है न, घर तक दौडाइयेगा ? बगल से कोनो बोला .चले आये ,मन नही माना बाहर जा कर चार ठो जनरल टिकट ले आये, प्रूफ़ है लखनऊवे से बैठे है, मेहरारु को अपनी समझदारी का कायल कर दिया. रायबरेली बीस किलोमीटर रह गया तो काले कोट महोदय अवतरित हुये. टिखट.. कहते हुये हाथ बढाये , टिकट देखते ही भडक गये, इ स्लीपर है अउर रिजर्भ क्लास है.. जनरल पर चल रहे है, सर..ये देखिये अम्बाला से बैठे है, लखनऊ से टिकट नही बढा तो ये ले लिया. नाही बढा मतलब, इसमे बढाने का प्रोभिजन नही है जानते नही है का ? जानते तो शायद वह भी नही थे,

असमन्जस उनके चेहरे से बोल रहा था. अपने को सम्भाल कर बोले लिखे पढे होकर गलत काम करते है, टिकटवा जेब के हवाले करते हुए आगे बढ गये. मेरी बीबी का बन्गाली खून एकदम सर्द हो गया ,मेरी बाह थाम कर फुसफुसाइ- ऎ कैसे उतरेगे ? देखा जायेगा -मै आश्वस्त दिखना चाहते हुये बोला. करिया कोट महोदय टट्टी के पास कुछ लोगो से पता नही क्या फरिया रहे थे . अचानक हमारी तरफ़ टिकट लहरा कर आवाज़ दिये- मिस्टर इधर आइये...मेरे निश्चिन्त दिखने से  असहज हो रहे थे. पास गया ,सिर झुकाये झुकाये बोले लाइये पचास रूपये !  काहे के ? बबूला हो गये- एक तो गलत काम करते है, फिर काहे के ? बुलाऊ आर पी एफ़ ?

बीबी अब तक शायद कल्पना मे मुझे ज़ेल मे देख रही थी, यथार्थ होता जान लपक कर आयी. हमको ये-वो करने लगी. मै शान्ति से बोला सर चलिये गलत ही सही लेकिन इसका अर्थद्न्ड भी तो होगा, वही बता दीजिये. एक दम फुस्स हो गये आजिजी से हमको और अगल बगल की पब्लिक को देखा, जैसे मेरे सनकी होने की गवाहो को तौल रहे हो. धमकाया- राय बरेली आने वाला है पैसा भरेगे ? स्वर मे कुछ कुछ होश मे आने के आग्रह का ममत्व भी था. नही साहब हम तो पैसा ही देगे, रसीद काटिये रेलवे को पैसा जायेगा. सिर खुजलाते हुये और शायद मेरे अविवेक पर खीजते हुये टिकट वापस जेबायमान करते हुये बोले- ठीक है स्टेशन पर टिकट ले लीजियेगा. उम्मीद रही होगी वहा़ कोइ घाघ सीनियर इनको डील कर लेगा.. आगे क्या हुआ वह यहा पर अप्रासन्गिक है. तो मै देने के लिये अड गया और गाजियाबाद के अजय जी सरकार के लिये लेने पर अड गये ..तो इस पर चर्चा क्यो ?  यह सनक ही सही लेकिन आज इसकी जरूरत है...चलता है...चलने दीजिये की सुरती बहुत ठोकी जा चुकी, कडवाने लगे तो थूकना ही तो चाहिये न सर !

तो नो.. नो.. नो.. कर ही लिया न, तुमने ?
उनका गर्व भाव एकदम से टूट जाता है, जब मैं बेशर्मी से हँस कर कहता हूँ ,
" वह तो आज सारी दुनिया कर रही होगी, आज 9 सितम्बर 09 है ना, मेरी ज़ान ! "
मेरा बेशर्मी से हँसना जारी है, ब्लागर जो हूँ ? भले अपने को हिन्दी का सेवक कहता फिरूँ, इससे क्या  !

इससे आगे
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यह अपना हिन्दी ब्लागजगत, जहाँ थोड़ा बहुत आपसी विवाद चलता ही है, बुद्धिजीवियों का वैचारिक मतभेद !

शुक्र है कि, सैद्धान्तिक सहमति अविष्कृत हो जाते हैं, और यह ज़्यादा नहीं टिकता, छोड़िये यह सब, आगे बढ़ते रहिये !

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