जो इन्सानों पर गुज़रती है ज़िन्दगी के इन्तिख़ाबों में / पढ़ पाने की कोशिश जो नहीं लिक्खा चँद किताबों में / दर्ज़ हुआ करें अल्फ़ाज़ इन पन्नों पर खौफ़नाक सही / इन शातिर फ़रेब के रवायतों का  बोलबाला सही / आओ, चले चलो जहाँ तक रोशनी मालूम होती है ! चलो, चले चलो जहाँ तक..

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27 August 2008

अहो… तो आज टिप्पणिये बंद है !

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वाह भाई, क्या नज़ारा है….. तू रूठा रहे, मैं मनाता रहूँ…  तो मज़ा जीने का और भी आता है ! अय हय, अरविन्द भाई.. एकदम्मै से भभक पड़े.. अभी क्लिनिक से लौटा तो देखा, कि एक सार्थक ’ क्वचिदन्यतोअपि...’ चल रही है । देखा तो ज़ाकिर भाई भी कतार में खड़े गा रहे हैं..’आपने याद दिलायाऽ ऽ..तो मुझे याद आया ’ आनन्दम आनन्दम, जय हो भोलेनाथ त्रिपुरारी.. बोल बम्म

                                                   binavajah3

इधर स्साला मँईं बी बिज़्ज़ी रहा और.. अरॆऽऽ हः ,ऊ क्या बोलता कि लीखने ऊखने का जइसे मनइच नॆंईं करता ! लीखने का नॆंईं तो पढ़ने का.. कुच्छ तो करेंगा न बाबा… खाली पीली अक्खा टाइम का क्या करेंगा, मैन ? सो हम लेरका - लेरकी लोग का बिलाग पढता, जब्बी कोई बिलाग बेलाग किसिम का होता तो टीपता ज़रूर से.. ई तौ अमारा डियूटी है, के नॆंईं ? मँईं तो जिस बी का कुच्छ बी करेगा, जब्बी करेगा तो हार्ट से करेगा, के नेंईं ?  अब्बी हानेस्टी मैनेज़मेन्ट का ऎडमिशन कानपुर में ई लेंगा, के नॆंईं ?

हुआ क्या कि मई महीने में पंडिताइन को विस्फ़ोट पढ़ने को मिल गया, और काउंटर विस्फ़ोट मुझ पर हो गया । ऎई सुनो.. अब तुम मुझे कंम्प्यूटर पर दिखना नहीं, कब अकल आयेगी तुमको ? हाँ नहीं तो.. एक से एक चीज़ बना बना के खिलाती हूँ, इसलिये नहीं कि रात रात भर जग कर गूगल की गुलामी करो । विस्फ़ोट नहीं पढ़ा होगा ना, तुमको हर जगह चँगू मँगू ही मिलते हैं, हुँह.. लगे रहिये.. जमाये रहिये, मुझी से सुन लिया करो, हुँह..फिर सड़क के एक कुत्ते को देख न जाने क्यों शरमा गयीं, यह तो चोखेरवालियाँ ही बता सकती हैं… या आपकी गैर-जागरूक घरैतिन । पूछ सके तो पूछ । अब, आगे बढ़ें ?

रात मॆं, थोड़ा नरम पड़ी.. ज़्वालामुखी कुछ कुछ सूरजमुखी फ़ेज़ में एन्टर हो रहा है..क्वेरी,  वो क्या कहते हैं, जिस पर तुमलोग लिखते हो ? पता नहीं.. । ऊँउँहुँ बोलो तो सही, एक बात है । डोमेन.. चिहुँक कर देखा, अविश्वास से बोलीं.. डोमेन क्या नाम हुआ भला ? एक संशय.. जैसे उठता सा दिखा, कि मैं पहले ही  हँस पड़ा.. हा हा हा, रात भर डोमिन के साथ ही तो बिताता हूँ ! मज़ाक छोड़ो..कहाँ मिलता है ? सहारागंज़ में ढाई-तीन हज़ार लगेंगे । बऽस्स, निराश हुईं, इससे भी कहीं स्टेट्स बनेगा ? बेचारी सोच रही हों कि 20-25 हज़ार की चीज हो, तो ठसके से अपनी किटी पार्टी में बतायें, कि मेरे हस्सबैंड का वेबसाइट है..

तीन-चार दिन से पूछा जा रहा था कि यह बरात की घोड़ी जैसे क्यों कर रहे हो ? कुछ लिखते क्यों नहीं, कब तक बेचारे फ़ुरसतिया तुमको हुर्र्पेटते रहेंगे ? डोमेन तो रिलीज होने दो । अभी भादों है, नयी चीज नहीं लेते हैं । वाह रे पंडिताइन.. पहले न समझ में आया था कि मुआ यह करमकल्ला भी भादों की फसल है, और मैं कोई सेकेन्ड हैंड भी नहीं हूँ..

सुबह पहुँचा चिट्ठाजगत पर.. देखा लेट चल रही है.. क्या पता कब आये ? किसी लिंक से सुराग मिला, चलो बतकही में शामिल हो लें.. बाप रे, चुहिया सी पोस्ट और लंगूरी लंबाई की टिप्पणी कतार, भाभी-देवर और गुजरात मालवा दर्शन कर के लौटा तो मिल लिये ’ क्वचिदन्यतोअपि...’ पढ़के एक टिप्पणी भी टपका दी, मालूम न था कि पोस्टिया में इतनी आग है । सो, डाक्टर आज तो तुम एक बिखरे मित्र को मान देने गये थे और फँसा पड़े अपना ही टेंटुआ । अरविन्द साहब से कुछ मुद्दों पर पंखा कूलर लगाना पड़ा था.. किंतु मेरे मतभेद विचारों और एकांगी निष्कर्षों पर ही टिके होते हैं । क्या लेना देना इन बातों से कि अगला नाटा है, मोटा है, खरा है, खोटा है, कंज़ा है, गंज़ा है, धोती है, कुर्ता है । लेकिन दूसरी फेरा में लोगों की प्रतिक्रियायों को देख कर मन व्यथित च पीड़ित होता भया । आज हम भी टिप्पणी तो नहियें देंगे, और पढ़ेंगे भी नहीं..

                                                     splash

बैठे छाती पीटेंगे, क्योंकि मेरा मयख़ाना ही बंद है, आज टिपियाने लायक पोस्ट भी एक से बढ़ एक हैं, ऒऎ रब्बा हुण की कराँ

अरविन्द भाई, मेरा खली एकदम गुस्से में है,किसके ऊपर छोड़ना है..जरा बताओ तो ? ये सब रस निचुड़े रसिक हैं,समझो कि टें ! बड्डे बड्डे लेवेल की बातें हो रही हैं, मेरे को तो लगे कि आभिजात्य तो हावी है, किंतु ख़ानदानी आभिजात्य का नितांत टोटा है, यहाँ । भाई, मेरे बाबा परबाबा अपनी ज़मीनी सच को चरितार्थ करते हुये तश्तरी में उड़ेल उड़ेल सुर्र सुर्र – सुड़ुक सुड़ुक  चाह पीते रहे , जबकि क्या ज़ुबान थी और ग्रंथों पर क्या पकड़ थी, सो मैं ज्ञान की सरलता और विनम्रता से अपरिचित भी नहीं हूँ । अब क्या कहें ज्ञानजी को, जो उछल उछल कर झाड़ पिला गये कि “ अभिजात्य अभिजात्य रहेंगे और प्लेबियन (plebeian) प्लेबियन। “ अब क्या कहें, गुरु हैं तो इनकी गुरुडम भी झेल ही लेंगे, यदि इनका पांडित्य मुझे हिंदुस्तान में इनका मूल सोदाहरण समझा दे । ई ससुर प्लेबियन के समधियाने का पता अब गुरु भी न बतायें तो क्या गोविन्द बतावेंगे ? हम तो पूरे चिट्ठाजगत को ज्ञानजी का जजमान समझते हैं, मुकर जायें, ई और बात है । क्या साबित करना चाहते हैं लोग अपने को ?

                         binavajah2 binavajah1

 

टिप्पणियों पर, या उसके आदान प्रदान से तो मेरा कोई विशेष सरोकार नहीं ही रहता । पोस्ट है.. खेत की, टिप्पणी आयी खलिहान की ! तेरा मर्म न जाने कोय ! एनिमल क्रुयलिटी की बात की जा रही है, टप्प.. तन्मय शीघ्र स्वस्थ हों । भारतीय किशोरों में मीडिया फ़्रेंज़ी से उपज रही राजनैतिक सोच की कट्टरता अनुपम को इन्सेक्टिसायड पिलवा देती है.. चार ठईं मूड़ हिल गये ’ क्या कहा जाये.. बड़ा ख़राब ज़माना है । ’ वकील साहब बिलबिला दिये कि काला कोट को सिरे से उड़ा दिया जाय । मित्र होने का दम भरते हैं, सो आप कहो तो, कालाकोट क्या, अपना मूड़ ही सिरे से उड़ा  देंगे । अउर हमारा मूड़ पिराने लगा, ’ ये कहाँ आ गये हम.. सरे राह चलते चलते.. ! ’ घंटे भर बाद देखता हूँ, कि वह अपनी टिप्पणी ही ज़ेब में समेट कर ले गये । इस तरियों कुछ भी डिलीट करने या करवाने से ही लेखक को शायद इलीट का दर्ज़ा मिला करता होगा । हमें तो कोई इलीट कह दे, तो मुझे ज़मीन से ऊपर उठ जाने की आत्मग्लानि तो कहीं का न रखेगी । मुझे जन व ज़मीन ही भाते हैं । तभी मैं विदेश से भाग आया.. भात दाल हाथ से सान कर न खाया, तो क्या जिया । फिर पान के लिये भटकना..

                                                 kilroy_boy_e0

फ़ुरसतिया गुरु परेशान हो रहे होंगे, लंबी पोस्ट का रिकार्ड न तोड़ दे यह डाक्टर बकलोला, सो स्वामी-चरित्र पर फिर कभी !

सूचना – आज दिनांक 28/8 को विशेष माँग पर फोटूओं को लिंकित कर दिया है । जिन बहन और भाईयों को देखना हो, वह अपनी पसंद के फोटू पर माउस ले जा कर किल्कित करें अउर बड़का फोटू देखें । व इसे बंदरवे को सबसे ज़्यादा हिट मिला है

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18 August 2008

मुझे इतना ज़लील भी न करो.. बेटों

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अरे यह शीर्षक कैसे चला गया ? यह तो मैंने सहेज़ कर किसी और पोस्ट के लिये रख छोड़ा था । चलिये.. भगवान की मर्ज़ी या मेरे अवचेतन का चोर ! बचपन से घुट्टी पिलायी गयी है.. जो होता है, अच्छे के लिये ही होता है । सो, इसी को चलने देते हैं !

लोगों के मेल आ रहे हैं, सक्रिय नहीं हूँ । तो, भाई क्या करें ? मुलुक की सक्रियता तो दूसरे पाले में बैठी ठेंगा दिखा रही है । तो हम उसके अपने पाले में आने का इंतज़ार ही तो कर सकते हैं ? सो विकास के प्लेटफ़ार्म पर टहलते हुये देख कर भी, यदि मैं आपको निष्क्रिय लगता हूँ, तो लगा करे ! अरे कुछ नहीं तो, इस वेबपेज़ को ही निरख लीजिये, भाई..कितने ईंट रोड़े बटोरे हैं !

                                                                  mail (4)

सोचा कि पन्दरहा अगस्त पर कुछ लिखूँ, अच्छा अवसर है.. देश के लिये, भारत माता की लुटती अस्मिता पर चिन्ता जताने वालों में अपना भी नाम दर्ज़ करा लूँ, लेकिन… ? यही तो मेरी तक़लीफ़ है कि सोचता ही सोचता हूँ, करता कुछ भी नहीं । चाय पी कर चायवाले को पैसे देने में जितना भी समय लगता है, उसका सदुपयोग सोचने में ही करता हूँ ! यह कोई कम है, क्या ? सोच लेता हूँ.. वह भी आलू, टमाटर, बैंगन, करेले के भाव पर नहीं, बल्कि देस-मुलुक के हालत पर.. यही क्या कम है ? वरना यहाँ तो 88 फ़ीसदी पब्लिक तो सोचने लायक भी न रही । अपने को ज़िन्दा रखने की, होः तूऽऽ तू.. चल्हः कबड्डी कबड्डी कबडी कबडी कबडि कबडि बडि बडि बड्डिः बड्डिहः हः हः …में हाँफ कर जैसे तैसे साँझ ढले अपने पाले में लौट गुईंया संग लेट लेते हैं । सो, सोचने का चारज़ आजकल हमईं लोगन के पास है, उनके बिहाफ़ पर सोच लेते हैं, चिन्तित हो लेते हैं । और क्या चाहिये ?

पंडिताइन थोड़ी चिन्तित भाव से पूछती हैं, “ ऎई, कुछ लिखोगे नहीं.. देखना सबलोग पंद्रह अगस्त पर कितना लेख-ऊख लिखेंगे, और तुम रोज़ खटर पटर करते रहते हो.. यह नहीं कि कुछ लिख ही डालो । अब नाटकीय हुये बगैर, मेरी गुज़र नहीं.. सो, जो आज्ञा, चोखेरवाली-सखी ! फिर भी मैं अपना झोला-पिटारी टटोलता हूँ, कि शायद कुछ आफ़-बीट हाथ ही लग जाये ? देखते हैं !

jhar111

वह चीख उठी, “ पवित्र-पावन पर्व पर.. मुर्दाबाद ? हे भगवान, इस आदमी को हो क्या गया है ? “ क्या बवाल है, भाई.. मेहरिया से दोस्ती, समझो जी का ज़ंज़ाल ! ऎ भाई, बोलना मत बीच में, पूरा नहीं हुआ है, दूसर के लुगाई से दोस्ती, समझो आँधी भूचाल ! सोचा, थोड़ा खीझने की होती है, “बोला था न कि, हमरे बिलागींग को न भड़काओ.. अरे मनगढ़ंत फोटू थोड़े ही है, यह ? न ही ‘पाकिस्तान से आयी है’ का डिस्क्लेमर लगाया है । यह तो ख़ालिस अपने देश की छाती चीर कर चलती हुयी भारत की जीवनरेखा जी.टी. रोड पर ली गयी है ।  अरे यार.. वही जी.टी.रोड जो शेरशाह सूरी बनवा कर, हमारी गौरमिन्ट के लिये सिरदर्द छोड़ गया, जो इसके रखरखाव में ही काँख रही है । यह हमारे मुलुक की अर्थव्यवस्था का अनर्थ करने का अंतर्राष्ट्रीय षड़यंत्र करार दिया जाता, अंग्रेज़ इस रास्ते से सोना ढो कर ले गये, वो अलग ! उस ज़माने में सी.आई.ए. या आई.एस.आई. न होने का अफ़सोस भला किस पार्टी को न होगा । ई बिलागींग बड़ी बेलाग चीज़ होती है, यारों.. बेलाग = बेलागिंग = बेलगाम ~~.आगिंग !

सो हम बेलगाम हुई गये थे । तोऽ.. फोटो खींचा गया, मुनमुन  ( मेरी बेटी ) के कोडक हाटशाट से । ना, ना.. हाटशाट की वजह से यह हाट नहीं है, न ही कोडरमा के पास के गाँव के मंदिर की दीवार पर उकेरे जाने से, और ई मुर्दाबाद – ज़िन्दाबाद तो भाई गाँधी-ज़िन्ना की विरासत है, सो हमलोग इसको आगे नहीं बढ़ायेंगे, तो क्या हमारी आईपाड  पीढ़ी इसको संभालेगी ? उसने तो एक आसान रास्ता खोज निकाला है, जो अच्छा न लगे.. असहमत हो.. ज़्यादती हो गयी…  पेरेन्ट आउटडेटेड हैं…  बस, शिटशिटा के विरोध कर दो..ओहः शिट यार ! इतिश्री, और  सुनाओ ! सुनायें क्या, कद्दू ? आज तो जैसे इस कीबोर्ड से शिट ही निकल रहा है !

तो, मित्रों.. मैंने जानबूझ कर इस भित्तिलेख के मज़मून को धुँधला कर दिया है, क्योंकि यह हमारी व्यवस्था के शिट को दिखाय रहा है, सामाजिक न्याय माँग रहा है, माल पेलते नेतृत्व से ज़वाब तलब कर रहा है..काहे भाई, ई तो पन्द्राह अगस्त का 61वाँ है !

ई तो राधिका परसाद मास्साब रटा गये थे कि 14 के बाद 15 ही आता है । अब देखिये, कि 14 को एक देश आज़ाद हुआ, पता नहीं, अंगेज़ से कि हिन्दुस्तान से ? लेकिन ऊहाँ राजगद्दी हुई गयी, सो बाकी बचा भी स्वतंत्र घोषित किया गया.. औ’ विश्व में देखा गया एक अद्भुत व्यायाम.. नायक बोला – प्रसन्नचित्त… जनता झूमी – अहा हा हा हा , प्रसन्नचित्त…  अहा हा हा हा ! तिस पर भी आप सब 15 अगस्त पर ईहाँ अच्छा ख़ासा रो गा गये ! जाओ.. देखो जाके, अगड़म-बगड़म पुराण में लिक्खा भया है.. मौत औ’ मार्केटिंग से कोई सयाना भी नहीं बच सकता, तो हम ही काहे को इससे बचने का कलंक लें ? तब के गद्दीनशी़नी की मार्केटिंग  आज तलक चल रही है, सत्ता  एक ऎसा ही अनोखा ब्रांड है, यारों ! 15 अगस्त.. अहा हा हा हा, स्वतंत्र हो..अहा हा हा हा

दोस्त लोग इस मुबारक मौके पर बिसूर रहे हैं, यह उनकी सोच और किस्मत । मैं तो अपने ‘ अहा हा हा हा ‘ के साथ रात के अँधेरे में, चुपके से सुतंत्र भारत माई के पास पहुँचा कि जन्मदिन की बधाई दे आऊँ । हे राम, यह क्या ? वहाँ सचिवालय पर तो जगमग रोशनी और यहाँ टिमटिमाते ढिबरी का अतिमंद प्रकाश ! माई पड़ी कराह रही थीं.. चौंका..”माई क्या हो गया ? “ माई ने मुँह ढके ढके उत्तर दिया, “ पता नहीं, बेटा.. बहुत दर्द  हो रहा है । “ अरे कहाँ दर्द हो रहा है, यह तो बताओ ? माई तो उल्टे तैश खा गयीं, खीझ कर बोलीं “ कहाँ कहाँ बताऊँ ? सिर से पैर.. कश्मीर से कन्याकुमारी तक की रग रग दुख रही है । “ फिर अचानक उनके अंदर की माँ चैतन्य हो गयीं, संभल कर उठने का प्रयास करते हुये प्रतिप्रश्न किया “ और बता.. लड्डू वड्डू खाये कि नहीं ? अरे पगले मेरी सुध काहे ले रहा है ? जब से बहाल हुयी हूँ, सब मेरा डिमोशन दर डिमोशन ही तो करते आ रहे हैं । चलो, अपने ही बच्चे तो हैं.. मेरा क्या ? मेरी तो बहाली के 61 पूरे हो गये.. बीमार भी चल रही हूँ…  मुझ बीमार को अब और इतना ज़लील भी न करो, बस  62 में मेरी बची खुची इज़्ज़त के साथ मुझे रिटायर करवा दो ,और अब नूतन माई लाने की जुगत करो,मेरे बेटों ! उनको मुझ लाचार को एक्सटेंसन में मत घसीटने देना । जाओ.. मेरी तरफ़ से  सबको बोलना जय हिन्द !

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ladywinks कहीं कुछ गलत तो नहीं लिख गया ? ढेर सारे स्वर उठे हैं कि मैं तंज़ में लिखता हूँ । क्या ऎसा है ? तो, होने दीजिये कौन मैं रोज़ रोज़ लिख ही पाता हूँ ? आज यथार्थ और व्यंग दोनों इस कदर घुलमिल गये हैं कि उनको अलग करके लिख पाने की विद्वता मुझमें तो नहीं है । ज़बरन आप सब के बीच में घुस जाने से ही क्या होता है ? आप सहनशील देश के नागरिक हैं, सो मुझे भी सह लीजिये । रख़्शंदा को इस तंज़ से तंज़ीदगी है.. तो रख़्शंदा, तुम्हें मालूम हो कि मैं तंज़ानिया के पासपोर्ट पर इस मुलुक में रह रहा हूँ । अब मेरा पासपोर्ट तो बदलने से रहा, भले ही किसी दिन एक्सपायर हो जाये.. वह अलग बात है, देखेंगे ! 

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09 August 2008

नारी – नितम्बों तक की अंतर्यात्रा

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कल अनूप भाई का  उलाहना पढ़ा चिट्ठाचर्चा पर, सक्रिय रहने की सलाह भी नत्थी थी । अनूप भाई का मैं आदर करता हूँ, वैसे तो अनादर भी किसी का नहीं किया करता । यह तो अपने विनम्र होने की परंपरा में कहा जाता है, सो कह रहा हूँ । वैसे आप इसको अपने लिये सीरियसली भी ले सकते हैं । उन्होंने दो कदम आगे बढ़ कर मेरे सहज और चुटीले होने की सूचना भी दे दी । अनूप भाई को मैं ब्लागिंग में आदर्श मानता हूँ, सो मैं गौरवान्वित होता भया, आभार !

सहज तो समझ में आता है, क्योंकि मैं साहित्य मेरा विषय नहीं रहा।साहित्य व्यसनी होना अलग बात है, साहित्यकार होना अलग..वैसे ही जैसे कि शराबी और डिस्टलरी का होता होगा । दशहरे पर एक लेख लिखा था, आठवी कक्षा में... और यह लेख जैसे मेरा काल बन गया । मेरे हिंदी आचार्य जी, जिनको हमलोग अचार-जी भी पुकारते थे, पंडित सुंदरलाल शुक्ला ( यहाँ भी एक शुक्ला ! ) ने मुझमें साहित्यकार का कीड़ा होने की संभावनायें देख कर, इतना रगड़ना इतना रगड़ना आरंभ कर दिया कि आज तक इंगला-पिंगला, मात्रा-पाई, साठिका-बत्तीसा के इर्द गिर्द जाने से भी भय होता है । निराला की ' अबे सुन बे गुलाब 'जैसी अतुकांत में भी वह ऎसा तुक ढु़ढ़वाते कि मुझे धूप में मुर्गा बन कर पीठ पर दो दो गुम्मे वहन करना कुछ अधिक सहल लगता । बाद में तो खूब जली हुई, झावाँ बनी तीन चार ईंटें मैं स्वयं ही चुन कर, क्लास के छप्पर के पीछे एक गुप्त कोने में रखता था । ये ईंटें हल्की हुआ करती हैं, और घर पर गृहकार्य करने में समय खराब न कर उतने समय तक मुर्गा बने रहने का अभ्यास मैं पर्याप्त रूप से कर चुका था, सो कोई वांदाइच नहीं के भाव से नाम पुकारे जाने पर लपक कर दोनों हाथ में गुम्मे लेकर उपस्थित हो जाता । ज़ेब में साप्ताहिक हिन्दुस्तान का एक बड़ा पन्ना मोड़कर रखता, जिसे बिछा कर कोनों को पैर के अंगूठे से दबाकर मुर्गा बन जाता, और झुका हुआ पढ़ता रहता । अब बताइये ब्लागर पर ऎसी साहित्यसाधना कितने जनों ने की होगी ? खैर..मैंने तो शपथ ली कि अब से नकल नहीं टीपूँगा। लोगों की अपेक्षायें बढ़ जाती हैं...और आप फिस्स हो जाते हैं । मैंने वह लेख साप्ताहिक हिंदुस्तान के विज़यादशमी विशेषांक से टीपा था और बिना कुल्लु की भौगोलिक स्थिति जाने, मेले का आँखों देखा पूरा वर्णन कर दिया । गुरुजी ताड़ गये और मुझ गरीब को पकड़ लिया, बाद की रगड़ाई-आख्यान तो आप फ़्लैश बैक में देख ही चुके हैं ! फिर भी मैं उनका हृदय से आभारी रहूँगा, शब्दों के चयन की सीख वह मेरे मिडिल पास होने के बाद भी देते रहे ।
 

फिस्स के हिस्स्श में पिन और गुब्बारे की बातें होने लगती हैं और जैसा कि होता आया है... लंबी रेस का मरीज़ फिर मरीज़ नहीं रह जाता । वह तीन चार डाक्टरों के कान काट कर अपनी ज़ेब में रखा करता है । तो पाठक ही क्यों अपवाद रहे ? खास तौर पर जब वह यह तीसरी किताब में पाता है कि ' भईय्या पूरी किताबिया पढ़ लेना ' की याचना में लेखक विज्ञ पाठक, विज्ञ पाठक घिघियाये जा रहा है, तो मेरे जैसे टुच्चे पाठक को यह गुमान होना स्वाभाविक ही होगा कि जब पाठक ही विज्ञ है, तो वह लेखक अविज्ञ को क्यों पढ़े ? तो तय कर लिया कि हम स्वालंबी बनेंगे... कम से कम अपने पढ़ने के लिये तो, स्वयं ही लिखा करेंगे और... चरखा-तकली, ओहहो.. पेन पैड ढूँढ़ा जाने लगा । कहानी... ऊँहुः भाई, देख अंकल को लैटर डाल दूँगा ! मेरे कक्षभागी ( मतलब रूम पार्टनर मित्रों... देखो मैंने एक दूसरा शब्द भी गढ़ लिया, श्रेय आपै लोग बाँट-खूँट लो ), हाँ तो मेरे कक्षभागी महोदय धमकाते, बल्कि किचकिचा उठते साले.. डाक्टर बनने आया है कि गुलशन नंदा बनने ? उनकी दृष्टि में गुलशन नंदा एक महान लेखक थे.. जो बिकता है, समझो वही लिखता है ! बात दीगर है, कि वह स्वयं भी तीन चार ' मस्तराम '  लिख कर चुपचाप रामनारायण बाज़ार में देकर छपवा-वपवा कर दो-ढाई सौ रूपये भी ला चुके थे, लीक होते ही मैंने पकड़ा, ' अब बोल अशोक, तू लेटर लिखता है..कि मैं चाचा जी को लिखूँ ? ' बेचारे ढीले पड़ गये..देखो मैं तो एक घंटे में लिख लेता हूँ, और तुम एक कहानी में एक महीने लगाओगे, दस बार लिखोगे, पाँच बार काटोगे और फिर कोई भरोसा नहीं कि फाड़ ही दो, यह तुम्हारा बड़ा ही टाइम-कन्ज़्यूमिंग चोंचला है ! फिर होना क्या था.. तू-तू , मैं-मैं और सीज़फ़ायर, बोलचाल बंद, एक चुप हज़ार चुप !

इतने में अचानक मेस बंद हो गया.. महीने का आख़िर, गुट्टैय्या के ढाबे कब तक उधार खिलाते ? सो, मैं कमरे में ही कुछ बना बुनू लेता था, फल और दूध तो मुझे इतना प्रिय है कि हफ़्तों उसी पर खुशी खुशी काट दूँ । बेचारे अशोक जी थे रोटी-चावल प्रेमी, तीन चवन्नी उछाल कर ढाबे पर चार या पाँच रोटी मिल जाया करती थी, सब्जी चावल
कमरे में, सो अशोक जी झुक गये । तय हुआ कि मैं कविता लिख सकता हूँ और वह तब तक बरतन साफ़ किया करेंगे, बेचारे मस्तराम ! एक-दो बार जबलपुर हो आया था, और वहाँ एक विचित्रता पायी कि नर्मदा झील के मल्लाह तुकबंदी में बातें किया करते थे । बाज़ार में भी कई ऎसे ही महानुभाव दिखे । सोचा कि चलो, कविता ही लिख लेते हैं ।

लेकिन हिंदी में कविता लिखने से अधिक आसान मुझे बरतन साफ़ करना लगता था । एक तो ‘टहनी पर टँगा चाँद ‘ मेरे समझ में तो नहीं आता.. भाई साहब, जरा अपनी पोज़ीशन और एंगल बदल लो, चाँद तो बादस्तूर आसमान में ही बरामद होगा ।  दूसरे कि दो तीन लाइन लिखते ही पंडित सुंदरलाल की हृष्ट-पुष्ट काया आँखों के सामने खड़ी हो जाती थी, लाल लाल आँखें लिये, मैं सहम कर मात्राओं के अंकगणित को समेट कर अलग रख दिया करता था । अंग्रेज़ी में Oh, kanpur.. I love you..Still I hate you  और yes, I am a fab...I crack a joke or two.. But knows the few सरीखी बचकानी कवितायें छपी भी.. अरे बाप रे, मैं तो यहाँ जैसे आत्मकथा ही लिखने लग पड़ा। कहाँ की बातें कहाँ ?

                                                                                                                                                          होरे राम होरे राम, होरे राम... हरे हरे ..
अनूप भाई की दूसरी बात पर.. तो, भईय्यू, एक चुटीला दूसरे को चुटीला कहे, तो इससे चुटीली बात और क्या हो सकती है ? और, देखिये तो अनूप जी को, कि कितने महीन तरीके से उन्होंने चिट्ठाचर्चा-पंचायत के मंच पर लाकर मुझको पटका है, कुछ लोग उल्टी गिनती गिन भी रहे होंगे कि लिखूँगा कि नहीं लिखूँगा । बालाओं ने फूल की पंखुड़ियाँ तो न ही तोड़ी होंगी, लिक्खेगा, विल ही राइट...नहीं लिक्खेगा,विल ही नाट राइट, क्योंकि मैंने छाँट कर प्रोफ़ाइल में अपनी एक भद्दी फोटो लगा रखी है, दरअसल मैं तो इससे भी ज़्यादा भद्दा हूँ । डर जाओगे, आप लोग !

सो, अनूप भाई मेरे मन में चल रहा था कि यदि सभी लिखने ही लग पड़ेंगे, तो पढ़ेगा कौन ? नतीज़न आपस ही में पढ़- पढ़ा कर हाँज्जी हाँज्जी होता रहेगा, फिर तो भविष्य चौपट ही समझो । एग्रीगेटर ने सूचना दी..इन्होंने यह लिक्खा - हाँज्जी, लपक पड़ो - हाँज्जी, शीर्षक यह है - हाँज्जी, कैची है यह -  हाँज्जी, रुतबे वाला -  हाँज्जी, दरियादिल है - हाँज्जी, टिप्पणी देगा - हाँज्जी.. सो, यहाँ पर हाँज्जी महोदय हमको बरजने लगे । यह हाँज्जी गण मुलुक को किस दिशा में हँका रहे हैं, यह तो यहाँ तक भूला भटका आया हर पाठक जानता ही है । इस हाँज्जी में मुझे असहमत होने की गुंज़ाइश तो दिखती ही नहीं ? यह निश्चित रूप से अस्वस्थता का संकेत है । मित्रों के सुझाव और  अन्य पाठकों की असहमति आपको आगे बढ़ने का बल देती है, बशर्ते अगला अपने अहं को परे रख इसे स्वीकार करे या तो अपना दृष्टिकोण स्पष्ट करे, ताकि दूसरा भी अपने अंधेरे से बाहर निकल तो सके । तभी हिंदी माता स्वस्थ होंगी, अन्यथा…

उनको चरपईय्या पर लिटाये के करो कुछ और जयकारा लगाते रहो हिंदी माई की, ताकि दुनिया यही समझे कि हिंदी के सपूत अपनी महतारी के हाथ-गोड़ मींज रहे हैं । अब महतरिया इत्ते सालन मा भी उठ के खड़ी नहीं हो पा रही हैं, तो ई सपूतवे कोनो कपूत थोड़े हुईगे ? सट्टीफ़िक्केट ईश्य्यूड, डिराइंग-रूम की शोभा में इज़ाफ़ा, अउर छुट्टी राम छुट्टी ! रेडियो सीलोन कभी बहुत सुनाया करता था.." मस्तराम बन के ज़िंदगी के दिन गुज़ार दे... । अब का करें, ब्लागर पर आकर हमको वही याद आरहा है..मस्तराम बन के ब्लागिंग के दिन गुज़ार दे...

महबूबा की गली से रूसवा होने पर भी उसकी गली किसको न याद आती होगी ? भई मुझे तो याद आती है..सो, यहाँ बैठ कर HTML कोड्स से खिलवाड़ किया करता हूँ, बिगड़ता है, तो बनता भी है औ’ इस तरह मेरे ब्लाग्स अपना रूप बदलते जा रहे हैं । मन को और पंडिताइन को समझा लेता हूँ कि यह भी एक तरह की सृजनात्मक विधा है, भाई ।

श्री अनूप शुक्ल ' फ़ुरसतिया ' रही बात  ज्ञानदत्त जी की… रुकिये, पहले आब्ज़ेशन ओवर-रूल करा लूँ !  श्री ज्ञानदत्त पाँडेय ' हलचल  'भाई लोग भड़क तो  नहीं रहे कि  नारी नितम्बों का साइनबोर्ड लगा कर बटोर तो लाया.. अब अलाय बलाय पढ़ा रहा है , तब से ! डाक्टर पता नहीं यहाँ असली नितम्ब-शो कब शुरु करेगा ? करेगा भी कि नहीं ? या मँजे मदारी की तरह काला जादू देखने वालों की भीड़ बटोर बतकही करता रहेगा ? अउर अब ज्ञानदत्त जैसे रीताव्रता को कहाँ नितम्बों में घुसेड़े दे रहा है ? बस दो मिनट, कद्रदान..यहीं से तो अनूप जी की भूमिका शुरु हुयी थी.. तो, एलर्ज़ी जैसी कोई बात नहीं है । ज्ञानदत्त जी से तो मेरी कभी मुलाकात तो क्या बोलचाल भी नहीं हुई है । लेकिन गुरु-गोविंद दोऊ खड़े..तो पहले किधर जाओगे ? हर कोई शिवकुमारिया सुदामा तो नहीं है कि गुरुवे को ठेंगा दिखा दे । शुरुआती दिनों में, मेरी परेशानी भाँप उन्होंने ही मुझे बरहा का लिंक पकड़ाया था, बाद में आपको पढ़ा तो लगा कि अपनी भाषा के ब्लागिंग में भी उत्कृष्टता की संभावनायें हैं । अब गुरु और गुरुवर में किसको पहले देखें  ? हम डिक्लेयर करता हूँ कि ज्ञानदत्त इज़ प्रोटेक्टेड नाऊ !

और ज्ञानदत्त जी तो मूलतः बहुत ही निरीह चीज हैं, जिसमें सहज हास्यबोध न हो उसे मैं निरीह ही कहूँगा । बुद्धिमता और जागरूकता दर्शाने के अतिरेक में वह फँस ही गये थे, बाकी कसर ई ससुरी हाँज्जी हाँज्जी पूरी करती रही ।लेकिन खिचड़ीभोजी बेनाइन ( निस्पृह ) मनुष्य हैं,...उनका न सही पर खिचड़ी का तो लिहाज़ करिये । हारी बीमारी कड़की उधारी में एक वही काम आती है । सो, ज्ञानदत्त जी को न गुदगुदाइये जाकि छूछी हास । सो, मुझे लग रहा था कि वह यदि गुदगुदाहट फ़ील ही नहीं कर रहे, तो क्यों गुदगुदाया जा रहा है, ऎसे में तो किसी के भी आँसू निकल आयेंगे। एक बात और..मौका है, मुहाल है, सो बोल ही दूँ .. 
अरविन्द जी, नारी के सौन्दर्य सौष्ठव से इतने चमत्कृत हैं कि उन्होंने उसके नितम्बों को भी नहीं बख़्सा । ईमानदारी से कहूँ  तो, न मुझे उस पोस्ट में सौन्दर्य दिखा और न ही विज्ञान ! तो क्यों न बोलता ? पब्लिक प्लेस है, भाई... मूतते पकड़े जाओगे तो ज़ुर्माना तो कोई नहीं कर सकता किंतु थुड़ीथुड़ी को भी मत न्यौतो, या फिर अपनी मंशा ही स्पष्ट कर दो । मुझे तो रुनझुन चलत रामचंद्र बाजे पैजनिया के राम के नितम्ब ज़्यादा आकर्षित करते हैं, किंतु उसका वर्णन करने की शक्ति मेरे कीबोर्ड कम लेखनी में नहीं है, सो चुप रह जाने में ही भलायी है, आप भी अपना गुड़ दाब के चुप रहो।

तो.. अरविन्द जी, आप स्वयंभू नितम्ब विज्ञानी हो, जरा अब बताओ 

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थिरकते नित्म्बों का जादू तो मैं विज़ुअल में भी दिखा सकता हूँ, किंतु यहाँ नहीं इस फोटू *** पर क्लिक करके आपही देख लो । भाषा की रवानगी के लिये भदेसपन की ज़रूरत मुझे भी पड़ती है..किंतु गुप्तांगों का उल्लेख ना बाबा ना । नैसर्गिक होते हुये भी उनका वर्णन अश्लील लगता है, तो कोई समझे या न समझे....यह है मेरी नज़रों का कसूर । दकियानूस ही सही !


आख़्रिर मैं भी लगता है कि दीवाना ही हूँ । है ना बंधुगण, क्या आपको अब तक ऎसा नहीं लगा ? फिर छोड़िये चलिये, मैं अपनी बीन अपने थैले में रख लेता हूँ, अनूप भाई ! आप सब को भी नमस्कार !

इससे आगे
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यह अपना हिन्दी ब्लागजगत, जहाँ थोड़ा बहुत आपसी विवाद चलता ही है, बुद्धिजीवियों का वैचारिक मतभेद !

शुक्र है कि, सैद्धान्तिक सहमति अविष्कृत हो जाते हैं, और यह ज़्यादा नहीं टिकता, छोड़िये यह सब, आगे बढ़ते रहिये !

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