जो इन्सानों पर गुज़रती है ज़िन्दगी के इन्तिख़ाबों में / पढ़ पाने की कोशिश जो नहीं लिक्खा चँद किताबों में / दर्ज़ हुआ करें अल्फ़ाज़ इन पन्नों पर खौफ़नाक सही / इन शातिर फ़रेब के रवायतों का  बोलबाला सही / आओ, चले चलो जहाँ तक रोशनी मालूम होती है ! चलो, चले चलो जहाँ तक..

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13 April 2008

ई है बंबई नगरिया, तू देख बबुआ .. ..

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आपणाची मुंबई शंघाई बनने जा रहा है, कब तक ? मैं वापसी के ट्रेन में था, और दो जनों के बीच शायद टाइमपास बातचीत चल रही थी , क्योंकि दोनोंजन एक साथ ही अपने बोलने लग पड़े थे । पीछे की बर्थ से किसी ने चुटकी ली, जब भईय्ये लोग बाहर हो जायेंगे और गौरमिंट आरक्षण वगैरह के विकराल कब़्ज़ियत से फ़ारिग हो लेगी तब ?  पण कवायद चालू आहे

 जरा हटके जरा बचके ये है बांबे मेरी जान - अमर

कुछ फोटू शोटू देख कर आप भी तसल्ली कर लो ।

कचड़ा नहीं-अमरखिलायी नहीं-अमरमान जाओ वरना - अमर

इनको गौर से देखें, व ज़ुर्माने की रकम पर नज़र डालें, अपने ब्राउज़र पेज़ को 150%  पर सेट करेंगे तो सुविधा होगी ।

गदंगी नहीं-अमरधुलाई नहीं-अमर

ज़रा मुस्कुरा दीजिये, शंघाई ज़ल्द आपके द्वारे आ रहा है । ठीक वैसे ही, जैसे सामाजिक समानता आ रही है । प्रतीक्षा करें ।

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जरा साथ तो दीजिये । हम सब के लिये ही तो लिखा गया..
मैं एक क़तरा ही सही, मेरा वज़ूद तो है ।
हुआ करे ग़र, समुंदर मेरी तलाश में है ॥

Comment in any Indian Language even in English..
इन पोस्ट को चाक करती धारदार नुक़्तों का भी ख़ैरम कदम !!

Please avoid Roman Hindi, it hurts !
मातृभाषा की वाज़िब पोशाक देवनागरी है

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यह अपना हिन्दी ब्लागजगत, जहाँ थोड़ा बहुत आपसी विवाद चलता ही है, बुद्धिजीवियों का वैचारिक मतभेद !

शुक्र है कि, सैद्धान्तिक सहमति अविष्कृत हो जाते हैं, और यह ज़्यादा नहीं टिकता, छोड़िये यह सब, आगे बढ़ते रहिये !

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