जो इन्सानों पर गुज़रती है ज़िन्दगी के इन्तिख़ाबों में / पढ़ पाने की कोशिश जो नहीं लिक्खा चँद किताबों में / दर्ज़ हुआ करें अल्फ़ाज़ इन पन्नों पर खौफ़नाक सही / इन शातिर फ़रेब के रवायतों का  बोलबाला सही / आओ, चले चलो जहाँ तक रोशनी मालूम होती है ! चलो, चले चलो जहाँ तक..

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20 October 2008

अभी टैम नहीं है, शिव भाई !

Technorati icon

अभी टैम नहीं है, शिव भाई ! अभी अभी मेलबाक्स खोला, देखा शिव भाई का मेल ! आनन्दम, भाई की नयी पोस्ट होगी, मेल से सब्सक्राइब कर रखा है । हौले से नज़ाकत से खोला, हाय रब्बा.. यहाँ तो शिवभाई बड़े उखड़े मूड में किन्तु तनिक लिहाज़ से कहाँ का गुबार यहाँ निकाल रहे हैं । आद्योपांत बाँच गया, फिर धैर्य की चटनी से चाट चाट कर पढ़ा । वाह आपका यह अंदाज पसंद आया, भ्राता !


देखिये न, नकवा लक्ष्मण ने काटी, भुगत बेचरऊ राम गये, सीता हरवा बैठे, रीछ बानरों तक से समर्थन लेने को विवश हुये । सो, ईहाँ भि.. लीखे अमर कुमार अउर भीड़े सिव कुमार !
पर इस घोर कलयुग में यह भातृप्रेम... आनन्दम आनन्दम !

 
इसका उत्तर तो दूँगा, बरोबर दूँगा... पर जानते हैं न शिव भाई, कि हर आम ओ खास ब्लागर की तरह मेरे पास भी टईमिया का टोटा रहता है । सो अभी तो टैम नहीं है, शिव भाई ... का करियेगा, सब्र करिये । सब्र पर तो हिन्दुस्तान कायम है सो संप्रति आप भी कायम रहें ।

अब देखिये न, कितना बड़ा बड़ा मुद्दा सब बुला रहा है, ओबामा जीतेगा कि हारेगा...जीतेगा तो का होगा, वइसे त जितबे करेगा, हनुमान जी उसके ज़ेब में पड़ा कम्पेन में घूम रहा है, कोनो बीभिषन खोज के ले ही आवेगा । लेकिन ओबामा के नाम के अगल बगल में हम भी खड़ा हो जायेंगे तो कोनो SEO हमको खोजिये लेगा । आज पंडिताइन कूड़ी का आधा पसेरी आलू लायी हैं, जरा देखें कि पछला साल 8 रूपिये मे पसेरी भर आलू बिका गया, सो किस फ़ैक्टर से ? ई फ़ैक्टरवा पकड़ा जाय त जानिये अर्थ के अनर्थशास्त्र पर ब्लागर की नोबल प्राइज़ पक्का !

ऎतना मुद्दा सब हमको घेर के हो-हल्ला मचाये है के पहले घर का देखें के बाहर का ईहे में कन्फ़्यूजिया के गलत शलत हो जाता है । ई टिप्पणिवाला सब भी शलत पकड़ लेता है, अउर गलत बतईबे नहीं करता है ।

 
आजै चिट्ठाचर्चावाला एक्ठो लड़का बताइस कि..
ज्ञान दत्त पाण्डेय जी ने फिर नया शिगूफा छोडा ।
हिन्दी ब्लॉगिंग की कथा-व्यथा को टॉल्स्टॉय से जोडा

 
अब बताइये कि हमको एक्को आदमी नहीं बताया के टाल्स्टाय इतिहास का चीज हैं, और सर इससे आपको एलर्जी है, दूर रहिये... या 2008 में उनको समझने के लीये हमको 1828-1921 के टाइमकैप्सूल में बइठ के उस देशकाल परिवेश का दौरा करना चाहिये । उनके कहे का संदर्भ पर एक जाँचकमेटी बैठाने का दायित्व निभाना चाहिये । सो हमहूँ ई टालस्टयवा पर लपके लेकिन रस्तवे में ठंडाय गये ! अब मनन करके टाइम खोटी करने वाले ब्लागर तो हम हैं नहीं, टईमिया का केतना टोटा रहता है, अब आपसे ज़ादा कौन जानता होगा ? टाइम बड़ा है कि मुद्दा, कमेन्ट बड़ा है कि कमिटमेन्ट ? ई तो मुर्गी और अंडा वाला रिलेशन है, सो मनन करना छोड़  दिया !amar1  
ई घर- बाहर के जिकिर में हमको याद आया के ठाकरे आजकल बहुत ठक ठक मचाये है, पहिले उसी को ठोकि के आते हैं । ससुरा मुंबई से यूपी-बिहार लूटने वाला गाना सब भेज देता है, हम लोग दिल खोलके घर का एक एक चवन्नी न्यौछावर कर देते हैं,  अउर हमरे ईश्टुडेन्ट सबको मारता है शालाबेटा ! लौट के आते हैं, अभी टैम नहीं है, शिव भाई !
एक्ठो फोटो उसके बाउंडरिया पर साट कर चले आयें हैं, समझना होगा तो समझिये जायेगा । ऎतना पढ़ालिखा आदमी जब ज़ाहिल होने का स्वांग करके सपोर्टर बटोर लेता है, तो उसको समझाने बुझाने में कोनो फायदा नहीं, फोटू साट दिया है, हमारा काम खत्तम । त आपके टिप्पणी पर आया जाय ? अभी टैम तो नहीं है, शिव भाई.. लेकिन गलतफ़ेमीलि दूर होना न चाहिये, ऊ काहे रहे ईहाँ.. देखिए न हम अपना टिप्पणी बक्सवे का स्टींग कर दिये हैं । सबूतवा त जनता को साबूत चाहिये न, किसके पास टैम है ? कुछ लोग परहेजी बक्सा ही देखते हैं !

amar7 अक्षरवा साफ कर देते हैं, सबके पास बड़का वाला इन्टरनेट ब्राडबैन्ड त नहीं न होगा । ईहाँ पढ़ लेगा तबहिं न ?

आत्ममुग्धता किसी भी शक्ल में दिखाई दे सकती है.
कोई पाई चार्ट, काई चार्ट वगैरह बनाकर फीड अग्रीगेटर और ब्लॉग ट्रैफिक के ऊपर

पोस्ट लिखता है तब भी और कोई इस बात का ढिढोरा पीटता है कि तीस साल

पहले उसने बिना दहेज़ लिए शादी कर के एक कीर्तिमान बनाया था तब भी.
कोई अगर अपना तथाकथित आत्मचिंतन ठेलता है तो भी और कोई अपनी

तथाकथित सधुक्कड़ी भाषा में किसी वृद्ध महिला की चुचकी छाती के बारे में

लिखता है तब भी.
कोई अगर रोज-रोज सुबह पोस्ट ठेलता है तब भी और कोई अगर पिछली पाँच

पोस्ट में से पाँचों में किसी के पीछे पड़ते हुए केवल उसे चिढ़ाने के लिए पोस्ट

लिखता है, तब भी.
कोई अगर किसी के लेख पर बिना कोई प्रतिक्रिया दिए हुए निकल लेता है, तब

भी और कोई अगर किसी को प्रोवोक करने के लिए ही ब्लागिंग करता है, तब भी.

इसलिए मेरा यही सुझाव है कि दूसरों की आत्ममुग्धता के बारे में सवाल उठाने

से पहले अपनी आत्ममुग्धता को भी निहार लेना चाहिए.
मेरी ब्लागिंग मेरी आत्ममुग्धता का परिणाम हो सकती है. मैं इस बात को

बीच-बीच में स्वीकार भी करता हूँ. लेकिन आपकी ब्लागिंग ? मैं अगर आत्ममुग्ध

हूँ तो इसमें आपको कौन सा नुकशान पहुँचा रहा हूँ साहब ? मेरी आत्ममुग्धता से

आपको कोई नुकशान हो, तो आप ज़रूर बताईये. हम आपसे क्षमा मांग लेंगे.

ऎसे करार ना आया तो, फिर पलट के आये, ई बताने कि.. अब ई कौन बताने का बात है, भला ? सोचियेगा तनि..

और हाँ, इस टिप्पणी पर मुझे कोई खेद नहीं है
खेदवा होता त हमको जनाने आते ? ईहै बात है न, शिव भाई, कि आपको कोनो खेद नहीं है, त बतियै खतम है !

हम तो आजके पोस्ट को छ्त्तीसगढ़ी भाषा के गेट अप में लाने वाले थे, बड़ी मिठास है ! रसगुल्ला हिन्दी के साथ साथ गुड़ की ज़लेबी का अपना अलग ही मज़ा है । फिर सुबुद्धि आ गयी, सहसा भान हुआ, ’हे विधाता यह क्या लिखवा रहे हो ? अगर इस पोटली में ३६ की झलक मात्र भी दिख गयी, तो सुदामा भेज दिये जायेंगे तेल लेने और तुमको पड़ जायेंगे लेने के देने ! सो जल्दी जल्दी अदला बदली किया, कुछ यहाँ गिरा कुछ वहाँ गिरा ! बच गयी यह खिचड़ी ? सो इसको झेल लें पाठकों, बड़े.. विद्वान.. आचार्य.. धुरंधराचार्य वगैरह सादा जीवन-उच्च विचार के अचार संग यही खिचड़ी पसंद करते हैं । यदि आप भी बेनाइन निरीह सज्जनों में हों तो यह खिचड़ी विचार पसंद करेंगे । शिव भाई, आप पढ़ रहे हैं न ? तो  सीधा सीधा अंगेज़ी कुछ में सवाल ज़वाब हो जाये, शिव भाई ?

तो जरा F0F8FF वाले हिस्से पर गौर किया जाये ( हाँ, वही हल्का नीला वाला ! )

आत्ममुग्धता किसी भी शक्ल में दिखाई दे सकती है.यस सहमत हूँ मित्र !वह पाईचार्ट, काईचार्ट, दोहावली, कवितावली, चिट्ठी, डायरी किसी भी रूप में दिख सकती है ! यह तो माया है..  और माया महा ठगिनी हम जानि

उसने बिना दहेज़ लिए शादी कर के.. सत्य वचन, आप बारात नहीं गये थे किन्तु त्रिकालदर्शी दिव्यदृष्टि से सबकी ख़बर रखते हैं ! फ़ज़ीहत से मुँह छिपाने को कुछ तो होना चाहिये.. दहेज़ हमने लिया नहीं क्योंकि उसने दिया ही नहीं.. दरअसल पिताजी ने माँगा नहीं और मैं घोड़े पर बैठा गधा सरीखा मुँह पर रूमाल रखे शादी होने का क्लोरोफ़ार्म सूँघता रहा … सो समझिये फिसल के गिर गये, तो हर गंगा ! यही ईमानदारी का मूलमंत्र है, भाई !

तथाकथित सधुक्कड़ी भाषा में… यह भाषा की बात तो कीजो मति, शिव भाई ! अपनी मौज़ है, जो माहौल होगा वही लिखेंगे, बोलेंगे ! इतनी फ़ारसी पढ़ी होती, तो क्या ब्लागिंग में टाइमखोटीकार के अस्थाई पद पर पोस्ट लिखते होते ? सो, मैं पोस्ट लिखता हूँ जी, गढ़ता तो कभी नहीं ।  पारिश्रमिक का चेक दिखाओ तो पोस्ट भी गढ़ूँगा, भाई. यह तो हुई भाषा, सधुक्कड़ी के विशेषण पर तो यह कहूँगा कि अपना मेल बक्सा टटोलें, मेरा प्रथम मेल देखें, जिसमें मैंने अपने जीवन की एकमात्र अपूर्ण इच्छा व्यक्त की है, अब बाकी के वर्ष आदिवासियों के मध्य रहने का. अब मेरे इतने दिनों के रंग-ढंग देख कर भी आप मुझे आदिवासियों से भी कम करके आँकतें हों, तो मेरा दोष ?

वृद्ध महिला की चुचकी छाती.. जो देखा वही तो लिखा, और क्या लिखता.. सूखे स्तन, सपाट छाती, तो झूलना किसका दिख रहा था ? बदहवासी के आलम में, कपड़ों की ओर से बेसुध स्त्री का क्या दिख सकता है  ? आयु चाहे जो हो पुरुष की नज़र पहले वहीं जाती है, बंधु ! इसका दूसरा पहलू भी उकेरूँ ? मैं अपनी बेटी को देखता हूँ, तो आँखों से उसका इतिहास दिखाई देता है, वात्सल्य उमड़ता है.. इसके उलट कोई अन्य पुरुष देखता है, तो वह उसका भूगोल पढ़ता है और उसकी आँखें चुस्की भरती हुई सी लगती हैं । अश्लीलता कहाँ है, नज़रों में, लड़की में या मन में? मुकेश जी ‘ये न समझो तो है,तेरी नज़रों का कुसूर..’गा बजा के सटक गये, और मैं हकला रहा हूँ, क्यों ?

पाँचों में किसी के पीछे पड़ते हुए केवल उसे चिढ़ाने के लिए.. हाँ, यह मैं स्वीकार करता हूँ, कि ऎसा मुझसे हुआ होगा ! किसी को भी चेताने के लिये वन, टू. थ्री बोलने के बाद फ़ोर.. फ़ाइव नहीं बोलना चाहिये था, यदि वह आपके इशारे की अनदेखी कर रहा हो तो ! आपका धन्यवाद, वरना मैं तो सिक्स,सेवेन,एट,नाइन, टेन तक जाता

लेकिन आपकी ब्लागिंग ? मेरी ब्लागिंग पर यह ज़ायज़ प्रश्नचिन्ह है ! जरा सोचिये, मैंने दिया ही क्या है.. भाई लोग वाह वाह कविता लिखते हैं, कुछेक हाय हाय कहानियाँ लिख रहे हैं, किसी किनारे पर झाँय झाँय बहस चल रही है, इस आँय बाँय शाँय में भटकते हुये ब्लागिंग को हेरता हूँ, फिर डुबकी मार जाता हूँ ! पुकार मचती है, नियमित लिखिये.. यह तो बताओ भाई, कि नियमित लिखूँ तो, पर लिखूँ क्या ? उत्तर मिलता है, ‘कुछ भी !’ सो एकदम स्पान्टेनियस तौर पर मैं कुछ भी लिख देता हूँ, पर गैरजिम्मेदाराना तरीके से कभी नहीं ! यह जरा विचित्र लगेगा, शिव भाई… आपको ही नहीं, लगभग सभी को, कि अपने लिखे हुये पोस्ट के शीर्षक तो दूर, मैं सहसा यह भी नहीं बता सकता कि मैंने अब तक हिन्दी में कितनी पोस्ट लिखी हैं ! चार ब्लाग तो डिलीट कर चुका हूँ, जिसमें एक थी उल्टी गंगा, जोकि लगभग बह निकली थी । खुद से ही खुद को सहलाने में, कौन सी मौज़ है, जी ?

आपको कौन सा नुकशान पहुँचा रहा हूँ साहब ? कोई भी नुकसान नहीं कर रहे हैं आप, मेरा या किसी का ! आपकी बकरी है, आप झटका कर दें.. हलाल करें.. कसाई को बेच दें ! है तो आपकी ही.. सो वह दूसरों के वाह वाह की पत्ती पर … खैर, जाने दीजिये । लब्बोलुआब यह है, कि जहाँ लगाव होता है, वहीं आदमी दखल देता है !

आपने उस तथाकथित पोस्ट की अंतिम लाइनें शायद नहीं पढ़ी, या सुविधापूर्वक भूल गये । जहाँ यह स्पष्ट किया है

यह पोस्ट लिखने का मंतव्य ? अपने गुरुवर के प्रति आशंकित मन ! यह उनका दग्ध भाव मुझे नहीं रास आ रहा है, टिप्पणीयों की प्रचुरता पौष्टिकता कितनी होती है, यह वह जानते हैं । विषयवस्तु में वह क्या पकड़ें, क्या छोड़ें, उनकी सोच है

क्षमा करना मित्रों, खाया पिया कुछ नहीं.. गिलास टूटने का हर्ज़ाना दिया छैः आने ! बात की बेबात में यह पोस्ट हो गयी 6521 शब्दों की ! चलो लोग जब फ़ुरसतिया को सराहेंगे, तो जिक्र मेरी निट्ठल्लई का भी  होगा ही ! अपना गंगू तेली भी तो ऎसे ही अमर हो गया । आज तो मुझे भी जैसे एक झपकी सी आ गयी, पर वहाँ भी चैन नहीं !

                  amar4amar3

                  amar5  amar6

अब आपही बताओ, यह सब क्या है ? कल शायद किसी ब्लाग पर,ब्लागिंग से बेहतर विकल्प के रूप में बैंगन भाँटा वगैरह बेचने की बात हो रही थी, यह किंवा उसीका परिणाम है । ठीक से चैन की एक झपकी भी नसीब नहीं

अब कोई चाहे कुछ भी कहे, शिव भाई को माइनस करके पोस्टिया जाये भाड़ में,मैं तो चला सोने! सबको शुभ रात्रि

 amar2

10 टिप्पणी:

अनूप शुक्ल का कहना है

ज्ञानजी जो न करायें! आपने ज्ञानजी से पिछली पोस्ट में घणी मौज ली। शिवबाबू को जमा नहीं सो उन्होंने जम के टिपियाया। आपके पास टैम नहीं था इसलिये ये ’माइक्रो जबाब’ (?) ठेल दिया। हमारा भी पढ़कर मौज लेने का मन कर रहा है लेकिन का करें टाइम नहीं है। ज्ञानजी को आप गुरु मानते हैं शिवबाबू के भैया हैं। ज्ञानजी से बातों को इग्नोर करने का हुनर सीखे होते तो दोनों लोग चैन की नींद सोते। रात में तीन-तीन बजे की बोर्ड न ठुकठुकाते। बहरहाल हमारी तो मौज का है। मजे का मसाला मिल रहा है। ई फ़ोटो बढ़िया बनाये। फ़ुरसतिया लहसुन देखकर मन मुदित हुआ जाता है। व्यस्त रहिये, मस्त रहिये!

Shiv Kumar Mishra का कहना है

अरे डागडर बाबू, आप भी कलउग में प्रेम देखकर निराश होई गए! तकलीफ होइ गवा? अरे बाह! आप त हमको रीछ बानर कहत है. कौनौ बात नहीं है. ऐसा होता है. ऊ का है कि कभी-कभी दृष्टि जो है न, डागडर बाबू, साथ नहीं देता है.

अरे ऊ लिख रहे हैं ओबमवा के बारे में त आपके कौन तकलीफ है? ऊ आलू, पियाज के बारे में लिख रहे हैं, त आप को काहे बुरा लगता है? मति पढिये. पढ़ लिए त हुआं टिप्पणी लिखि दिए..मन नहीं भरा त पोस्ट लिख दिए. एक पोस्ट से मन नहीं भरा त दुई ठो लिख दिए. ईसा करते-करते छ-सात ठो लिख दिए. काहे भाई? काहे किसी का पीछे हाथ धोकर पड़े हैं आप? ऊ मनई कुछ नहीं बोलेगा त जे इच्छा उही लिखेंगे? काहे लिखेंगे? कोई बात का कौनौ लिमिट होता है कि नाही?

शादी का दहेज़ के सम्बन्ध में हमको त त्रिकालदर्शी बता दिए. त ई भी सुन लीजिये. हम कौनो त्रिकालदर्शी नाहीं हैं. ई बात आपे बड़े गरब के साथ लिखे रहे. देखना चाहते हैं का? देखना चाहेंगे? त खोजकर ला देंगे ऊका भी.

अऊर ई आपका पोस्ट का अन्तिम लाइन हम पढ़े..बहुत बार पढ़े. आपही त लिखें है कि "विषयवस्तु में वह क्या पकडें, क्या छोडें, उनकी सोच है."

ई का है? आप कौनौ दारू का कंपनी का विज्ञापन लिख रहे थे का? ब्रांडवा का बड़ा-बड़ा फोटो छापकर नीचे लिख दिए कैसिट. ई का है? अरे हम कहत हैं, जब विषयवस्तु का विषय में उनका ही सोच चलेगा त ई इतना लंबा पोस्ट विषयवस्तु को लेकर ही तो टांक गए आप. ई कैसा सफाई है भाई?

अऊर ई जो लिखे हैं; "जहाँ लगाव होता है, वहीँ आदमी दखल देता है"..इसका का मतलब है डागडर साहेब? हाँ..ई सब आप रुई का तरह पन्द्रह दिन से किसी को पीट रहे हैं, अऊर कह रहे हैं, लगाव का वजह से है...अरे ई कीसा लगाव है भाई?

ई चिढाने का काम को लगाव कहा जाता है आपके इलाके में? ई कौनो समाजशास्त्र का सिद्धांत है या मानव मनोविज्ञान? का है ई, जरा हमके भी बताईये...आ सुनिए, ई 'सेंस आफ हाईनेश' जो टाँगे घूमते हैं, उसका ऊंचाई का आपके लिए महत्व होता होगा, दूसरों के बास्ते नाहीं... हमरे बास्ते त एक दम्मे नाहीं.

डा० अमर कुमार का कहना है

@ श्रीयुत शिव कुमार मिश्र जी
अपनी ऎसी वैसी-जैसी तैसी 200 ठेलक बनने का
ज़श्न ठीक से मना लीजिये, बचा खुचा मिठईया हमको भी पठा
दीजिये, हम भिनसारे आपके दुआरे जा कर तकादा करि आयें हैं..


पहले ऊ फ़रमाइशिया पूरी करिये.. तब तक आप जो हवाई
ज़हाज़ उड़ाये हैं, उसमें सैर करके हम भी आते हैं । हाँ,अगर कोलकाता तक का तेल पानी भरवा दिये हों, तो ई सेंस आफ़ हाईनेस आपै के ईहाँ टाँग आते है.. ससुरा बड़ा तकलीफ़ देता
है.. आप भी कुछ प्रेरणा पाय जायेंगे ।
लौट के आराम से बात करेंगे, एक हँसोड़ दिखने वाले मानुष
का योद्धा रूप ज़ाहिर हुआ.. हमरे लिये कोनो नया बात नहीं है ।
हम तो रोज रोज डबल पर्सानिलिटी.. स्पिल्ट बूझते हैं, त ऊ वाला
स्पिल्ट पर्सानेलिटी देखबे करते हैं.. त हमरे लिये कोनो नया बात नहीं न है, ई सब !

बड़का बड़का हिन्दुस्तान पाकिस्तान लोग को काम्पोज़ का सूई लगा
के पेड़ के फ़ुनगी से उतारे हैं, रामजी कसम !
बड़का भईया सोचे कि छोटका को आगे करके हमको पिटा देंगे । सो त नहिंये पासिबिल है हो, काहे कि हम पिटाने वाले जीव नहीं हैं । ब्लागर पर आके त आउरो थेत्थर हो गये हैं, थेथरई का मज़ा
घुमा-फिरा के बड़का भईया लेईये लेते हैं, त अब हमहूँ लेंगे ।

पहले हमारा मिठईया भेजिये फिर आपका 'ऎंग ऊदें.. बैंग ऊदें..
खोलशे बोले आमियों ऊदि 'भी देखेंगे ।
काहे परीसान हो, शिव भाई, हम तो येंहिं हैं !

Shiv Kumar Mishra का कहना है

का डागडर साहेब...आपको हमेशा सबके भीत्तर एस्पीलिट पर्सनाल्टी काहे दिखाई देता है भाई? हंसोड़ आदमी अगर गुस्सा करे त ऊको एस्पीलिट पर्सनाल्टी कहते हैं! बड़ा गंभीर अऊर नया बात बताये आप तो..धन्नि हुई गए हम तो...कऊन पढाई में अईसा इंटरपिरटेशन पढ़े हैं डागडर साहेब?

अऊर ई काहे सोचते हैं कि बडका भइया हमको आगे किए हैं? दुनियाँ भर को खीचने का ठेका आप ही लिए हैं का? ...अभी पिछला महिना आप भी भी त कौनौ ब्लॉगर का वास्ते लड़े रहे..उहाँ कोई आपको आगे किया था का? ...ई त देखिये ग़लत बात है भाई. अपना सुबिधा के हिसाब से सबकुछ कहेंगे?

कम्पोज का सुई लगाए होंगे...इका मतलब नाहीं है कि सुई लेकर सबके पीछे घुमते रहेंगे और सब ही लगवाता रहेगा...कोई-कोई सुइया छीन के फेंक भी देता है....शायद अभी तक कोई मिला नहीं आपको एही बास्ते अईसा कह रहे हैं.

आ जहाँ तक थेथरई का बात है, त हमहूँ उतर आए हैं उही पर...अब त थेथरई का टेस्ट हो ही रहा है....ऊ का है कि थेथरई का नया-नया आयाम बनेगा ही अब.

मिठईया त हम आपको अब कईसे खिलाएं...आप त हैं उहाँ...इटैलिक्स वाला जिला में...अऊर हम हैं हियाँ...पोस्टल ऐड्रेश भी होता त ज़रूर कुरिएर कर देते....लेकिन एक बात का औरउ शंका है...अब आप हमारा मिठाई खाएँगे भी या नहीं.

डॉ .अनुराग का कहना है

.... काहे इतना गुस्सा हो रहे है.? अपनी फोटो देखने के बाद हमने तो तीन चार ओर स्केन करा ली थी की पता नही कब किसको जरुरत पड़ जाये ....जिसे चाहिए ...दो एक्स्ट्रा लो ......मौज लीजिये ....ब्लोगिंग को इतना सीरियसली काहे लेते है ?क्या फर्क पड़ता है इन सब बातो से ? फ़िर जब दो अच्छे लोग इस तरह रात रात भर उठकर पोस्ट पलते है तो दुःख होता है....
वैसे फोटो लाजावाब है.....ओर इस बहाने रोज आपकी एक नई पोस्ट पढने को मिल रही है. पर अब ये सब छोडिये ओर मौज में लिखिये..वैसे भी इंडिया ने आज टेस्ट मैच जीत लिया है......वो भी पोंटिंग की टीम से....

कुश का कहना है

घर के बडो को लड़ता देखकर बच्चो पे क्या बीतती होगी? बस इसी उधेड़बुन में लगा हुआ हू कल से.. कोई जवाब नही मिल रहा... किसी के पास हो तो मुझे भी बताइए...

anitakumar का कहना है

as usual technical knowledge kamaal ki hai, all photos are excellent, please humein bhi sikhaiye na kaise banaate hain itne appropriate cartoons aur kaise lagaate hain blog par....:)

लवली कुमारी / Lovely kumari का कहना है

लड़ - लड़ के जी भर जाए आप दोनों का तो बाकियों की भी सुध ले लें ..वैसे कुश की बात ध्यान देने वाली है.

डा० अमर कुमार का कहना है

@ anita ji,
Thanks again for your compliment, anita Ji.
Really there is nothing of that sort like technical expertise at this page, I am as amateur computer literate as a toddler at racing track, not having a formal training even. What you call as expetise, is a passion for perfection.. Perfection is a perpetual journey, which never ends.
If you are not comfortable with Photoshop CS3 or Corel suite X14, then just download Paint Net 3.0 a free software, based on MS Net framework 2.0, it works excellently. You must be having MS Office Picture Manager2007 and Windows default software MS Paint. Use these all three generously, and you have done it.
Now grill your time with some naughty ideas, let it simmer at any one of these 3, preferably Paint Net, with patience of trial and error, Serve hot at proper moment, garnish it with some jest. Its simple as that, isn't it ?

N.B. I lost your communiqué for Institution of Ishita, please correct it, It is Nirmala Niketan, 39, New Marine Lines, Church Gate, Just locate the KHAU GALI behind Azad Maidan, and find yourself there, adjacent to SNDT !

डा० अमर कुमार का कहना है

@ शिवभाई दोसैकड़ापोस्ट ठेलकवाला
चुपाय गये भईय्या, लगे रहो यार.. जुझाड़ू बीर लड़ैय्या
अभी सीज़फ़ायर डिक्लेयरेशन करोगे, तो मारेगा भईय्या
ममता की छाँव में, थेठरई की ठाँव में, यह तो बहुत ज़ल्दी है
न ये नैनो, न मैं टाटा, अभी तो ये अँगड़ाई है, आगे बहुत लड़ाई है
मिठाई खायेंगे यार, काहे नहीं खायेंगे, अब तो डबल खायेंगे
हम उस देश के वासी हैं, जहाँ सार्वज़निक अपमान के लिये मुआवज़ा
लेना गर्व का विषय हुआ करता है .. अभी तक कोनों केस भेंटाया
नहिं का.. जो तुमको फ़ी घाव चेक गिनवाइस हो ? का भेजोगे ?
जो भी भेजो, पर अपना भेज़ा मत भेजना.. बहुत दोहावली अभी
बकाया है, वह सब अदा करना है.. हम शाकाहारी मानुष हैं, सो
भेज (veg.)मिठाई भेजना ..

@ भाई कुश एक्ठो खूबसूरत खेयाल
परीशान नहिं न हो.. कुश भाई, बड़कन की लड़ाई में एक्ठो
बड़का यानि कि हम छँटा हुआ बाकें है, भगवतीचरण की गुलामी से
आज़ाद हुई के ईहाँ गदहालोट लगाय रहे हैं.. होना जाना कुछ नहीं है
सब अपनी अपनी सहलाय के बईठ जईहें, यह निट्ठल्ले का रियलीटी
शो है जानी, टिप्पणी बक्सवा के ऊपरे तो लिक्खा है, निट्ठल्ले की
चक्कलस !

हमरा ऎतराज़ तो इतनै है कि बड़का भईय्या अपने ज्ञान का उपयोग
इनके मेल आई.डी. से किहिन, अँग्रेज़ी छाँटे से हमहू अघाय भये हैं
लेकिन अँग्रेज़न की लड़वावै वाली बुद्धि उन्हीं को मुबारक करि आय हैं
21 October, 2008 9:50 PM

लगे हाथ टिप्पणी भी मिल जाती, तो...

आपकी टिप्पणी ?

जरा साथ तो दीजिये । हम सब के लिये ही तो लिखा गया..
मैं एक क़तरा ही सही, मेरा वज़ूद तो है ।
हुआ करे ग़र, समुंदर मेरी तलाश में है ॥

Comment in any Indian Language even in English..
इन पोस्ट को चाक करती धारदार नुक़्तों का भी ख़ैरम कदम !!

Please avoid Roman Hindi, it hurts !
मातृभाषा की वाज़िब पोशाक देवनागरी है

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यह अपना हिन्दी ब्लागजगत, जहाँ थोड़ा बहुत आपसी विवाद चलता ही है, बुद्धिजीवियों का वैचारिक मतभेद !

शुक्र है कि, सैद्धान्तिक सहमति अविष्कृत हो जाते हैं, और यह ज़्यादा नहीं टिकता, छोड़िये यह सब, आगे बढ़ते रहिये !

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