जो इन्सानों पर गुज़रती है ज़िन्दगी के इन्तिख़ाबों में / पढ़ पाने की कोशिश जो नहीं लिक्खा चँद किताबों में / दर्ज़ हुआ करें अल्फ़ाज़ इन पन्नों पर खौफ़नाक सही / इन शातिर फ़रेब के रवायतों का  बोलबाला सही / आओ, चले चलो जहाँ तक रोशनी मालूम होती है ! चलो, चले चलो जहाँ तक..

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01 February 2009

ऎसी आज़ादी और कहाँ, आज़ाद ख़्याल विवेचन

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विवेक भाई आग लगा कर अगले हफ़्ते के लिये बाई कर गये । गोया, चर्चाकार न हुये ज़मालो हो गये । यह तीसरी बार है, जब मैं इन चिट्ठाचर्चा वालों के उकसावे में पोस्ट लिखने को मज़बूर हो रहा हूँ । भुस्स मे आग लगा कर बी ज़मालो दूर खड़ी ।

मेरी पिछली कई पोस्ट से तो अंदाज़ ही लिया होगा, कि ई डाक्टर धँधे में जैसा भी  ठस्स हो, लेकिन यहाँ दिमाग का निख़ालिस भुस्स डम्प करने आता है । भगवान ठस्स भेजा देता, तो ई आग लगबे काहे करती  ? सो भगवान दुश्मन के दिमाग में  भी ऎसा भूसे का ढेर भर कर न भेजे । इन  चर्चाकार ने गणतंत्र-दिवस पर पोस्ट लिखने वालों की पूरी क्लास ले ली । पाखंडम शरणम गच्छामि संस्कृति में  हम  भी  पाखंड-देव से रक्षा की भीख माँगते हुये,  बरामद हुये, ऊ हमरा बेकूफ़ी पर हँस दीये,  और का हो ?ऎसी आज़ादी और कहाँ-अमर

26 जनवरी मैं क्लिनिक कर्मचारियों की छुट्टी रखता हूँ, सो आते जाते दिन भर नेट-ब्राउज़र को हँकाता रहा । ससुरा ब्राउज़र इधर भागे उधर भागे, और.. जाकर टिक जाये गणतंत्रीय पोस्ट पर ! मैंनें भी सोचा.. चलो 26 जनवरी 2009  वन टाइम इन इंडिया इवेन्ट है, सो  गूगल वाले  भारत  का अपना  नमक- टाटा नमक अदा कर रहे हैं । लिहाज़ा ज़्यादा माइंड-उंड भी नहीं किया । कोई पोस्ट हमसे ज़बरिया कमेन्टियाने का तकादा नहीं करता रहा,सो हमहूँ कुछ कुछ टूँग टाँग के आगे बढ़ते रहे । बधाई  हो, मेरा भारत महान, जीसका हर नेता बेईमान लीखने का मन था, लीखे नहीं, ब्लगिंगिया में पदमशिरी डीक्लेयर कर दीये, तो ? 

ऊप्पर देखे हैं कि नहीं ? पहले ही बोल दिया हूँ, ई फा्स्ट-ब्लागिंग का ड्राफ़्टिया पोस्ट है.. सो बाई मिस्टेक कोई गलती हुआ हो, और दीखाए तो निचका डिब्बवा में लीख दीजीयेगा । हम भी गुरुवर का सिलो-बिलागिंग का संदेश देखे हैं, अउर ड्राफ़्टिया लीखने पर आपलोगों के ई-स्वमिया हम्मैं डाँटिस भी है, लेकिन हम तो पहले से ही बिन्दास डीक्लेअर कीये हैं, सो भाई ज़्यादा लटर-सटर नहीं जानते ! बस एतना सुन लीजीये, "हम नहीं सूधरुँगा ।"  तनि सोचिये.. हम हूँ आज़ाद भारत के आज़ाद ब्लागर,  ऊ भि हीन्दी के, जिसको कहीये कि... ईश्श !  अरे डा. अरविन्द जी, लगता है, कि हम अज़दकीय मोड में प्रवेश कर रहें हैं ? चलिये, आपके लिये ई पोस्ट पूरा होने तक सुधर जाते हैं ! जाइयेगा नहीं, पोस्ट जारी है

शिवभाई इस ब्रेक में तनी खोजीए तो,कि भासा कहाँ से ऊठा के ईहाँ पटकाया है

हाँ, तो अब ज़्यादा न लपेसते हुये  परदा उठाने देंगे ?  त,  हमलोग हूँ, आज़ाद भारत के आज़ाद ब्लागर.. बाताइये ऎसी आज़ादी और कहाँ ? बोलीए जय हिन्द !

विवेक जी,  ई सब पोस्ट पढ़ते तो अपने गान्हीं महतमा एकदमैं गुलाम अलिये गुनगुनाते,
" स्यापा है क्यों बरपाऽ..♫ आज़ादी ही तो दी है..♩♬" 
अब कोई यह लिखे तो लिखता रहे, कि ' मुल्क ही है.. तो बाँटाऽऽ..♩♬♪,रियासतें ही तो दीं हैऽऽ..♫'
पिताश्री हैं, तो गरियाने दुलराने और बरसी पर फूल-माला पहनाने का सिलसिला तो लगा रहेगा..
वह दुखित मन से सोच रहे होंगे.. कि रिज़र्व कोटा के गोली खाने का यही सिला है,
कि आज़ाद भारत के लोग अबतक यह क्यों नहीं फील कर पा रहे हैं, ऎसी आज़ादी और कहाँ ?

अब अपनी ही एक बात बताता हूँ । छोड़िये, जगह का नाम जान कर भी क्या करियेगा..
पहले का एडविन क्रास, पिछले साल तक शास्त्री चौक कहलाते कहलाते अब झलकारी चौराहा होगया है
लेकिन परसों मुलायम संदेश यात्रा वाले कह गये हैं,
सन 1958 में इस चौमुहानी से गुज़र कर लोहिया जी की मोटर ने इसे ऎतिहासिक महत्व का दर्ज़ा दिया है,
लिहाज़ा इस शहर के लिये उनकी पहली प्राथमिकता यहाँ पर उनकी मूर्ति स्थापित करने की रहेगी.. ऎसी आज़ादी और कहाँ
इले्क्शन शान्तिपूर्ण निपटने के बाद पार्टी मेनिफ़ेस्टो में तय होगा कि,
मूर्ति मोटर की लगेगी या उन मोटरारूढ़ महापुरुष की.
जो भी हो, हमारे शहर में तो होगा स्टैच्यू आफ़ लिबर्टी.. ऎसी आज़ादी और कहाँ
हम भी कहते हैं, नाम में क्या रखा है ?
सो, हर क्रासिंग का नाम शेक्सपियर ग्रैंडपा को सुपुर्द कर देना चाहिये,
काहे से कि ऎसी आज़ादी और कहाँ

यार, तुम अटकते बहुत हो, आगे बढ़ो.. हाँ, बस आने ही वाला है..
इस व्यस्त चौराहे पर जहाँ गुंज़ाइश मिला दिवार पर पोत-पात कर रख दिया है,
बड़ा बड़ा लिखा है, महबूबा को मुट्ठी में कैसे करें.. मिलें या लिखें.
इसके ऎवज़ में मालिक-दीवार ख़ान लखीमपुर खीरवी साहब ने पेंटर से सेंत-मेंत में यह भी लिखवा लिया,
यहाँ पेशाब करना सख़्त मना है, पकड़े जाने पर 50 रूपये ज़ुर्माना
मेरा हाथ ऎटौमेटिक पैंन्ट की ज़िप पर चला जाता है, बताइये ऎसी आज़ादी और कहाँ
हल्के होकर सोचता हूँ, कि नीम का पेड़ तो दिख नहीं रहा,
किस भले मानुष से उन्नाव वाले नूर अहमद " गारंटीड कामाख्या तांत्रिक "  का ठियाँ पूछूँ
हम खुद ही पंडिताइन की चँगुल से आज़ाद कैसे हों.. वाले को तलाश रहे हैं
लगे हाथ अपनी उनसे भी आज़ाद हो लें.. फिर तो मौज़ा ही मौज़ा, क्योंकि ऎसी आज़ादी और कहाँ

बड़ी भीड़ है, आज, क्यों ? अच्छा अच्छा.. बगल के पटेल मार्ग पर पब्लिक ने जाम लगा रखा है,
हाथ कंगन को आरसी क्या.. लीजिये आप ही देखिये.. ऎसी आज़ादी और कहाँ
अब हमारे पास कोई चारा नहीं, घुसेड़ दो कार नो-पार्किंग में,
ऎई लड़के ! कोई पूछे तो बता देना हाथीपार्क वाले डाक्टर साहब की गाड़ी है..
सब स्साला तो मिसमैनेज़्ड है, पर पोस्ट लिखेंगे.. ऎसी आज़ादी और कहाँ
पढ़े लिखे होकर भी, नो पार्किंग में ज़बरिया पार्किंग ?
ऒऎ छ्ड्डयार, यह तो आज़ादी एन्ज़्वाय करने एक छोटा सा आप्शन है, ऎसी आज़ादी और कहाँ
मैं कोई गलत काम जानबूझ कर थोड़ेई करता हूँ, जी !
मेरी मज़बूरी समझिये,  आज सैटरडे है, एक हफ़्ते के लिये टल जायेगा ।

उधर अपने षड़यंत्र की अगली कड़ी भी देनी है, कल भी छूट गई थी
यह न हो कि, शहीद आकर पकड़ लें कि, हम तो बेट्टा तेरे लिये चने खा कर तख़्ते पर टँग लिये थे,
और तू मुझे छोड़ कर यहाँ नो-पार्किंग में विलाप करता फिर रहा है..और क्या चाहिये तुझे, ऎसी आज़ादी और कहाँ
फिर तो मेरी घिघ्घी बँध जायेगी, इतना भी न कह पाऊँगा..कि,
हम अपने ही घर में आज़ाद नहीं हैं, सर 
आज सैटरडे है सर, एक हफ़्ते के लिये टल जायेगा, सर.. प्लीज़ मेरी मज़बूरी समझिये सर,
सो, नूर अहमक " गारंटीड कामाख्या तांत्रिक " को पकड़ना भी ज़रूरी है न, सर

ऒऎ कोई नीं, जितने टैम तक चाहे, जो पकड़ना है.. जिसको पकड़ना है..
जा छॆत्ती पकड़ लै.. पण छड्डणा नीं, जा अपनी पूरी आज़ादी ले लै !
जबसे मेरे कान में यह पड़ा है,  कि
" डैडी सीरियस हो रहे हैं.. भईया ज़ल्दी से एक डाक्टर पकड़ लाओ "
आई रियली लव दिस पकड़ लाओ
हे हे हे, बैठे बैठे फ़ालतू टाइमखोटी करते रहते हो...बेशरम कहीं के !
कौन है ? यह पंडिताइन हैं जी, दूजा न कोई, हे हे हे !

11 टिप्पणी:

डा. अमर कुमार का कहना है


लीजिये, पहली टिप्पणी स्वयं ही दे लेता हूँ,
प्रकाशित होने के उपरांत ध्यान आया कि निट्ठल्ले की पोस्ट को, न जाने क्यों
यह असहमत मौन अपने बगल में दबा कर यहाँ चला आया है,
( चित्र में )
अब जो है, सो है । क्षमा करें :)


समयचक्र - महेद्र मिश्रा का कहना है

मै एक कतरा सही पर मेरा वजूद तो है.....
अमर जी
नमस्ते
बहुत बढ़िया आलेख आभार

Udan Tashtari का कहना है

हे हे हे, बैठे बैठे फालतू टैमखोटी करते रह्ते हो...बे॒॒॒॒॒॒॒॒॒॒॒!

:)

खैर, अब जो है, सो है.

Arvind Mishra का कहना है

बेफालतू पूरी पोस्टवा पढ़वा डाली निकला धेला भी नही, खाली पीली रविवारी सुबह बराबाद हुई ! अब आगे से हमरा नाम लेकर कौनो गुजारिश नइखे किहे हो डाग्डर साहब ! सिफारिश भले मंजूर होई जाए !

हिमांशु का कहना है

शब्दों की अनियंत्रित भीड़ से घबरा गया.

ताऊ रामपुरिया का कहना है

शुरु से अंत तक पढ कर पता लगा की आजादी का क्या मतलब होता है?

रामराम.

डा. अमर कुमार का कहना है


@ घणी राम राम ताऊ, चलो, आज दिन अच्छा गुज़रेगा..

@ डा, अरविन्द जी नमस्कार, आपका नाम क्यों न घसीटें ?
ट्रेन में सहयात्री बीड़ी या कुछ भी का धुँआ मुँह पर डालेगा,
तो एतराज़ करियो मति, बोलेंगे, यह पब्लिक की गाड़ी है, कोई तेरा घर है ?
तक़लीफ़ है तो दरवाज़े पर चला जा । हे हे हे, ऎसी आज़ादी और कहाँ ?
भाई कुश, लिख गये हैं,'' कार वाले ने गुटखा ज़मीन पर थूक कर साइकिल वाले को न थूकने के लिये हड़का देता है ", ऎसी आज़ादी और कहाँ ?
जब पढ़ा-लिखा तबका ही 60 वर्षों में परिपक्व न हुआ,
तो गड़रिये देश चलायेंगे, और हम बेफ़ालतू पोस्ट लिखेंगे, झेल सके तो झेल !
टिप्पणी खींचने के लिये आपका नाम ही काफ़ी है,
यह टोटका है, वैसे मेरे एक अभिन्न मित्र डा. अरविन्द सिंह, ( मो. 9415741514)
मेरे नियमित पाठक हैं, जो केवल नेट खोलना ही जानते हैं,
लिखने-ऊखने जैसा ग़ुनाह-बेलज़्ज़त में अभी नहीं पड़े हैं ! :)

अनूप शुक्ल का कहना है

क्या केने,क्या केने। अभी इतवार को ठीक दस बजकर सत्ताइस मिनट पर टिपियाना शुरू किया। ऐसी आजादी और कहां! धांसू च फ़ांसू!

Anil Pusadkar का कहना है

वाह ऐसी आज़ादी और कहां,सही है डाक्साब दुसरे देशों मे भेज दो तो आज़ाद नही जेल मे ही मिलेंगे।बस अब निकलेंगे आज़ाद होने का पूरा-पूरा मज़ा लेने के लिये।

डॉ .अनुराग का कहना है

लो कल लो बात .हम तो ये सोचके आए थे की डागदर साहब कुछ गम हल्का करेगे .इस इतवारी सुबह....यहाँ आए तो पता लगा श्री-राम सेना के अत्याचारी युग से पीड़ित समाज में जहाँ मीडिया भी किसी को लिखने पे कोर्ट का नोटिस भेज रहा है.....हवा इत्ती तेज चल रही है की बच्चे बार बार पतंग टूटने को लेकर हलकान हो रहे है......आप खालीपीली नेट ब्रोव्सर को इधर उधर पार्क कर रहे हो......वैसे गुरुवर आज़ादी का मतलब मोबाइल उठाना भी होता है ....जय रविवारी .......आज अभिषेक ने धांसू पोस्ट लिखी है.....मन खुस हुआ .जरा आप भी पढ़ डालो ....

COMMON MAN का कहना है

मैं यह सोच रहा था कि यदि पद्मश्री की तरह ब्लागश्री, ब्लागभूषण दिया जाने लगे तो किसे मिलेगा. फिर खरदिमाग में यह बात आयी कि हमारे प्रतिभाशाली छात्रों ने यदि ब्लागश्री को थोड़ा देसी ढंग में रंगा और डाइलेक्टिया दिया तो क्या होगा. ब्लागश्री से ...., ब्लाग भूषण से ....... और ब्लाग विभूषण से ........... . बहरहाल यह तो रही थोड़ी सी हंसी की बात, लेकिन चमचागिरी की परम्परा को आगे बढ़ाते हुए यह कहना चाहूंगा कि यदि ब्लागिंग के लिये कुछ पुरुस्कार दिये गये तो एक के हकदार तो आप भी होंगे.

लगे हाथ टिप्पणी भी मिल जाती, तो...

आपकी टिप्पणी ?

जरा साथ तो दीजिये । हम सब के लिये ही तो लिखा गया..
मैं एक क़तरा ही सही, मेरा वज़ूद तो है ।
हुआ करे ग़र, समुंदर मेरी तलाश में है ॥

Comment in any Indian Language even in English..
इन पोस्ट को चाक करती धारदार नुक़्तों का भी ख़ैरम कदम !!

Please avoid Roman Hindi, it hurts !
मातृभाषा की वाज़िब पोशाक देवनागरी है

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यह अपना हिन्दी ब्लागजगत, जहाँ थोड़ा बहुत आपसी विवाद चलता ही है, बुद्धिजीवियों का वैचारिक मतभेद !

शुक्र है कि, सैद्धान्तिक सहमति अविष्कृत हो जाते हैं, और यह ज़्यादा नहीं टिकता, छोड़िये यह सब, आगे बढ़ते रहिये !

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