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05 July 2009

हाँ, बात डाक्टर्स डे की हो रही है

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यह है जुलाई का महीना, और  इस महीने की पहली तारीख़ हम डाक्टरों के लिये एक ख़ास मायने  रखती है । इन  पँक्तियों के लेखक को  विश्वास है कि, आप में से  अधिकाँश  कुछ कुछ  ठीक पकड़ रहे हैं । यदि ऎसा है तो, आप इन्टेलिज़ेन्ट कहे जा सकते हैं । हाँ, बात डाक्टर्स डे की हो रही है ।

यदि इस सेवा को जनता मानवतासेवा के रूप में देखना प्रारँभ करती है, तो  इस  दिवस  पर  डाक्टरों द्वारा निःशुल्क जनसेवा का विचार सराहनीय ही नहीं बल्कि अपेक्षित है । मेरे गृहनगर रायबरेली  में यह  प्रतीक्षित  दिवस  त्रयदिवसीय  स्वास्थ्य  मेले  के  उपराँत  आज  की  सुविधाजनक  तिथि  पर  ( यानि 4 जुलाई को ) मनाया  जा रहा है । हाँ, बात डाक्टर्स डे की हो रही है ।

’ इण्डिया दैट इज़  भारत ’ में इसे डाक्टर स्व० बिधानचन्द्र राय जन्मदिवस पर एक जुलाई को मनाया जाता है । सँयोगवश यह तिथि उनकी निर्वाण-दिवस भी है । सो,  इस  दिन  डाक्टर्स डे  मनाया जाता है । मनाया क्या जाता है, हम  स्वयँ  ही  मना मुनू  लेते हैं । हर वर्ष स्थानीय स्तर पर आई० एम० ए० की शाखा एक वरिष्ठ चिकित्सक को खड़ा कर सम्मानित भी कर देता है । भाषण देने वाले माइक पकड़ लेते हैं, और बाकीजन अपने मित्रों द्वारा उनकी स्वयँ की प्रशस्ति सुनते हुये भोज खाने में व्यस्त हो जाते हैं,  फिर गुडनाइट वगैरह भी होता है । हाँ, बात डाक्टर्स डे की हो रही है ।

तत्पश्चात सब अपने अपने घर चले जाते हैं । कुछ लोग गुडनाइट से पहले ही वुडनाइट हो जाते हैं, इतने  जड़ और मदहोश  कि  उनको अपने घर  भिजवाना  पड़ता  है । एक दो दिन  तक सम्मानित होने वाले की ईर्ष्यात्मक प्रसँशा की जाती है, उनकी  अनुसँशा  करने  वाले  की भर्त्सना की जाती है, फिर  अगले  वर्ष  तक  के  लिये  सब  ठीक ठाक हो जाता है । हाँ, बात डाक्टर्स डे की हो रही है ।

सबके  सब  डाक्टर  एक  दूसरे  से  बेख़बर  अपने  अपने  काम  में  लग  जाते  हैं, एकता  की  यह अनोखी मिसाल अन्यन्त्र कहीं देखने  में  कम  ही आती है । हाँ, बात डाक्टर्स डे की हो रही है ।

उल्लेखनीय है कि,अपने उत्सव मनाने में हम कितने स्वालम्बी हैं, इस तथ्य की अनदेखी कर मोहल्ला सभासद, अपने भारतविख़्यात शायर ’ बेहिसाब कस्बाई जी,’ और उभार  लेती  हुई  इन्डियन  आइडल प्रतियोगी वगैरह अपना सम्मान वा अभिनँदन समारोह मनाने के लिये नाहक ही प्रचार पाते रहे है ।

सामान्य जन द्वारा ऎसी डाक्टरी घटनाओं ( पढ़ें, महत्वपूर्ण अवसरों ) के  प्रति  उदासीनता  निश्चय  ही निन्दनीय है । अवश्य ही हम शर्म करो दिवस या हाहाकार दिवस जैसा कोई आयोजन नहीं कर पाते, पर इस उदासीनता की निन्दा की जानी चाहिये । हम  मानवतासेवी  तो  अभी  तक  ठीक  से  निन्दा  भी  नहीं  कर  पाते । हाँ, बात डाक्टर्स डे की हो रही है ।

हर व्यावसायिक सेवा में किन्हीं प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष कारणों से एक ख़ास वर्ग असँतुष्ट रहा करता है, यह लघु प्रतिशत यहाँ भी उपस्थित है । वैसे मैंने तो लगा रखा है "प्रवेश पूर्व कृपया यह सुनिश्चित कर लें  कि, आप रोगी  हैं  या  जनता का हक  मारने वाले समाजसेवी, लोभी पत्रकार या दँभी अफ़सर ? " पर मीडिया द्वारा केवल इन्हीं को इस तरह प्रचारित किया जाता है, जैसे मानव सेवा के नाम पर चल रहे इस पेशे में चहुँ ओर दानव ही व्याप्त हों ! सच तो यह है कि, जीवन अमूल्य है का मानवीय मूल्य केवल यहीं जीवित है ।

बहुतेरे सुधी पाठक न जानते होंगे कि, यह दिन अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर डाक्टर्स डे के रूप में नहीं जाना जाता है । यह भारतीय डाक्टरों के लिये चुना गया एक अखिल भारतीय दिवस है । ई० सन 1933 में डा० चा अलमान्ड की विधवा यूडोरा ब्राउन अलमान्ड को ख्याल आया कि 30 मार्च 1842 को ही उनके स्वर्गीय पति ने जनरल एनेस्थेसिया के रूप में ईथर का प्रयोग करके विश्व की पहली शल्य चिकित्सा की थी ।

सर्वप्रथम यह 30 मार्च 1933 को उनके पैतृक निवास बैरो काउँटी, अमेरिका में स्थानीय स्तर पर मनाया गया । 30 मार्च 1958 को अमेरिकी काँग्रेस ने इसे राष्ट्रीय दिवस के रूप में स्थापित करने का प्रस्ताव पास किया :

Whereas society owes a debt of gratitude to physicians for their contributions in enlarging the reservoir of scientific knowledge, increasing the number of scientific tools, and expanding the ability of professionals to use the knowledge and tools effectively in the never ending fight against disease and death.
जी हाँ, बात डाक्टर्स डे की हो रही है ।

ई०  सन 1 जुलाई 1962  को  डा०  बिधानचन्द्र राय  के  देहावसान  और  चीन से  मोहभँग के  बाद, अमेरिका  की  तर्ज़ पर  प्रधानमँत्री  ज़वाहरलाल नेहरू  ने 1963 जुलाई से इसे डाक्टर्स डे के रूप में मनाये जाने की घोषणा की थी । सँभवतः यह तत्कालीन महामनाओं को उनके व्यक्तित्व के अनुरूप सम्मान न दे पाने के असँतोष को शमन करने की उनकी नीति रही हो । यह मेरे व्यक्तिगत गवेषणा का विषय है कि,पँ० ज़वाहरलाल नेहरू किस सोच के अन्तर्गत व्यक्ति विशेष के जन्मतिथियों को राष्ट्रीय पर्व घोषित कर दिया करते थे । जी हाँ, आप ठीक पढ़ रहे हैं, बात डाक्टर्स डे की हो रही है ।

अमेरिकी सीनेट और राष्ट्रपति जार्ज़ बुश ने 1990 में  डाक्टर्स डे  को  कानूनी  ज़ामा  पहनाया  और इसे  अनिवार्य  राष्ट्रीय दिवस  की  मान्यता दे दी ।

Whereas society owes a debt of gratitude to physicians for the sympathy and compassion of physicians in administering the sick and alleviating human suffering. Now, therefore, be it resolved by the Senate and House of Representatives of the United States of America in Congress as follows:
1. March 30 is designated as National Doctors Day.
2. The President is authorised and requested to issue a proclamation calling on the people of the United States of America to celebrate the day with appropriate programmes, ceremonies and activities.
The enactment of this law enables the citizens of the United States to publicly show their appreciation to the role of physicians in caring for the sick, advancing medical knowledge and promoting health.

जी हाँ, बात डाक्टर्स डे की हो रही है ।

docday2बस यहीं पर मेरा असँतोष मुखर होता है, क्योंकि डाक्टरों में कोई राजनैतिक भविष्य हो, या ना हो पर, डाक्टर्स डे को लेकर जनसमाज में निरँतर बसी उदासीनता मन में एक क्षोभ या अलगाव पैदा करती है । चलो फिर भी, कम से कम यह कहने को तो है कि, इवन अ डॉक हैज़ हिज ओन डे ! 
जी हाँ, अब तक बात डाक्टर्स डे की ही हो रही थी ।

DrBC Roy -composed by Amar

tn_docचलते चलते :

जरा इन डाक्टर साहबान से भी मिलना न भूलियेगा.. सीरियसली भई, एक बार मिल तो लें, पछताना न पड़ेगा !

 

 

12 टिप्पणी:

Arvind Mishra का कहना है

हाँ ,इस दिवस पर जन सहभागिता का टोटा मन को सालता है पर इसका जिम्मेदार कौन है ?डाक्टर नहीं ,यह व्यवस्था !
मैं तो इस अवसर पर अपने मित्र ,होस्ट्लर,और चिकित्सक इन महानुभावों को एक पेशेंट की हैसियत से विश करता हूँ -
डॉ .आर ऐ वर्मा ,सुल्तानपुर
डॉ ए के सिंह सर्जन सुल्तानपुर
डॉ ऐ के सिंह अर्थोपेदिक्स सर्जन ऐलाहाबाद
डॉ अरविन्द दुबे लखनऊ
डॉ प्रदीप सिंह अमेरिका
बाकी और सहपाठी मित्रों से कभी कोई चिकत्सा नहीं कराई या चिकित्सीय परामर्श नहीं लिया इसलिए वे मिस भी हो जाते हैं !
इस बार आपको विश करने को सोचा पर नंबर ही नहीं था ...फिर जीवन की आपा धापी में बात आयी गयी होगी
सचमुच यह ब्लागजगत भी कितना नाशुक्रा है की अपने विशिष्ट चिकित्सक ब्लागरों को भी इस अवसर पर शुभकामनायें न दे सका -बात डाक्टर्स दे की हो रही है --सचमुच दुखद और अशोभ्नीय !

समय का कहना है

एक अनोखे अंदाज़ में कई गंभीर बातें कर गये हैं आप।

डा. अमर कुमार का कहना है


@ धन्यवाद डा० अरविन्द जी, यह मुद्दा किसी के नाशुक्रेपन या ब्लागर पर अनदेखा कर जाने का नहीं है ।
मैं आपसे सहमत हूँ कि, इस व्यवस्था के चलते ही हमें हर वर्ष यह ’ अँधे और रेवड़ी ’ का नाटक खेलना पड़ता है ।
फिछले 25-26 वर्षों तक में बेहिसाब सक्रिय रहने के बाद मैंनें स्व-निर्वासन ले लिया है, क्योंकि व्यवस्थायें जस की तस हैं.. बल्कि बद से बदतर होती जा रही है । कड़वी सच्चाई यही है कि, " दिल को मुग़ालते में रखने को ग़ालिबन डाक्टर्स डे का ख़्याल अच्छा है ! "

जहाँ 100 दिन सास की तर्ज़ पर जनचेतना जगाने ( ? ) को, पूरे पृष्ठ के विज्ञापनों पर तकरीबन से लाख झोंक दिये जाते हों, और उसमें भी अपनी सरकार की काग़ज़ी उपलब्धियों का बखान किया जाता हो | वहाँ जीवन की मुख्यधारा से अपने को अलग पाने में जनता कितनी दोषी हो सकती है, निर्णय " इन्टेलिज़ेन्ट " पाठको के हाथ है । निरीह को मानवता के नाम पर चुप तो सदैव से करवाया जाता रहा है । लेकिन अब तो अपना राजनैतिक भविष्य जहाँ दिखता है, वहाँ एक नया डे खड़ा हो जाता है ।
तबके युगदृष्टा प्रधानमँत्री जी को जिन्हें नेपथ्य में ढकेलना होता था, उसके जन्मदिवस को एक राष्ट्रीय डे घोषित कर दिया करते थे, विद्वान सर्वपल्ली राधाकृष्णन भी इसके अपवाद न रह पाये !

जानना चाहेंगे आप कि स्व० बिधानचन्द्र राय को लेकर दिये जाने वाले राष्ट्रीय पुरस्कार के मापदण्ड क्या हैं ? तो देखिये :
The Medical Council of India instituted Dr. B.C. Roy National Award Fund in 1962 to perpetuate his memory. "The Fund" is registered under Societies Registration Act, 1860. "The Fund" invites nominations under the following categories as provided under the Memorandum of Association of the Society. The Award is of the value of Rs.1,00,000/- and a Silver Salver in each of the following categories.
1. Statesmanship of the Highest Order in our country
2. Medical man-cum-Statesman.
3. Eminent Medical Person.
4. Eminent person in Philosophy
5. Eminent person in Arts.
Nominations forwarded through the respective Chief Minister, Chancellor or Vice Chancellor of Universities, Chairman of the University Grants Commission, Directors, viz. I.C.M.R.,C.S.I.R., I.C.A.R., Deans of the Faculty of Medicine, National Organisations of the Profession, Recognised Engineering Institutes, Indian Science Congress, Member of the Medical Council of India etc., alongwith brief reasons for making such recommendations should be set out by the person concerned. Special priority in making the Award shall be accorded to the objectives of granting an award to a Medical man-cum-Statesman, a person of nationwide eminence and popularity and who has contributed a great deal of service to the nation in different spheres of activity. The award may be made to individual or to an institution. The nomination should be supported by the following: -
a. 30 copies of curriculum vitae of the candidate and full address of communication.
b. A statement of the work, achievement, accomplishment or performance on which the claim to the award is based.
c. One set of publications.
d. A reasoned justification for the nomination.
e. Consent of nominee.

सँदर्भ:. http://www.mciindia.org/awards/award_bc_roy.htm

अविनाश वाचस्पति का कहना है

डॉक्‍टर्स डे की बात
डॉक्‍टर्स डे के बाद

Udan Tashtari का कहना है

पहले तो देर से ही सही, आप डॉक्टर्स डे की बधाई ले लो जी.

दूसरे, इतनी बढ़िया बात बताने का यह निराला अंदाज बहुत भाया. ये ही तो बात है.

Arvind Mishra का कहना है

देखा ,शुक्रिया !

राज भाटिय़ा का कहना है

हम सब डॉक्टर को सब से उंचा समझते थे, है नही, अब कसाई को मै एक डॉक्टर से ऊपर समझता हुं, क्योकि पता है इस कसाई ने तो सिर्फ़ जान लेनी है, क्योकि इस का यह काम है, इस ने कोई क्सम नही खाई, लेकिन एक डांक्टर जिस से हम कुछ नई छुपाते, ओर जो वो कहता है उस पर पुर्ण विशवास करते है, आज वो ही पेसो के लिये अपने मरिज को तडपते हुये मरने के लिये छोड देता है, सरकारी नोकरी मै अच्छी वेतन से उस का पेट तो भरता है लेकिन ऎश करने के लिये, होस्पिटल के बजाये लोगो को घर मै देखता है, ओर मोटी रकम लेता है. ओर काम कसाई के करता है, मेरे पास लम्बी लिस्ट है, चलिये आप को हम आप के इस दिवस की बधाई देते है, क्योकि आज तक आप के लेखो मे आप की छवि बहुत अच्छी बनी है, ओर लगता है यह मेरी सोच नही ८०% लोगो की सोच है.
राम राम जी की
यह टिपण्णी मेने अपने भाव को सामने रख कर की है कोई निजी दुशमनी की वजह मत बना ले, क्योकि आज के समय मै ओर मेने यह सब अपनी आंखो से देखा है इस लिये लिखा है.

भारतीय नागरिक - Indian Citizen का कहना है

आपकी पोस्ट में कड़वी सच्चाई है. लेकिन बात यही है कि अधिकांश चिकित्सकों ने ही अपने व्यवसाय की गरिमा को ठेस पहुंचाने का काम किया है.

डॉ .अनुराग का कहना है

इस इश्तेहारी जमाने में ...जित्ता बड़ा इश्तेहार .उत्ता बड़ा सच...न अब वो डॉ रहे जो साइकिल पे गाँव गाँव सेवा का संकल्प लिए फिरते थे .ओर न अब वो मरीज जो डॉ में अटूट श्रधा रखते थे....वैसे भी इतने डोनेशन बिरादर है की अब जो चाहे वो बन जायो .सब पैसो का खेल है ......जितना डालोगे उतना मिलेगा..गुरुवर वक़्त हमें भी सिखा रहा है ...

कुश का कहना है

इस से तो बचपन का डॉक्टर डॉक्टर अच्छा था..

महामंत्री - तस्लीम का कहना है

आगंतुकों के लिए आपकी चेतावनी पढ कर अच्छा लगा।
-Zakir Ali ‘Rajnish’
{ Secretary-TSALIIM & SBAI }

अभिषेक ओझा का कहना है

बैकग्राउंड और फॉरग्राउंड का कलर सेम हो गया है जी तिपानी के लिए. कुछ पढने में नहीं आ रहा सीधे सीधे. बाकी बात तो डॉक्टर्स डे की हो रही थी. इतना तो समझ ही गए :)

लगे हाथ टिप्पणी भी मिल जाती, तो...

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जरा साथ तो दीजिये । हम सब के लिये ही तो लिखा गया..
मैं एक क़तरा ही सही, मेरा वज़ूद तो है ।
हुआ करे ग़र, समुंदर मेरी तलाश में है ॥

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