जो इन्सानों पर गुज़रती है ज़िन्दगी के इन्तिख़ाबों में / पढ़ पाने की कोशिश जो नहीं लिक्खा चँद किताबों में / दर्ज़ हुआ करें अल्फ़ाज़ इन पन्नों पर खौफ़नाक सही / इन शातिर फ़रेब के रवायतों का  बोलबाला सही / आओ, चले चलो जहाँ तक रोशनी मालूम होती है ! चलो, चले चलो जहाँ तक..

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28 September 2009

क़न्फ़्यूज़ियाई पोस्ट - हमका न देहौ, तऽ थरिया उल्टाइन देब

Technorati icon
मसल है...
खाय न देब तऽ थरिया उल्टाइन देब

अर्थात, हे पाठकों
यदि मुझे अपनी मर्ज़ी अनुसार पसँद नहीं मिलेगी,
तो मैं परसी हुई पूरी थाली उल्टा तो सकता ही हूँ !

खेद तो यह है कि, यह सब देखते देखते हो गया, जब  मैं  ब्लागवाणी  खोल  कर टिप्पणी के लिये पोस्ट चुन रहा था ।
रात्रि के 11.37 पर पेज़ रिफ़्रेश करने को F5 दबाया और आईला ’ रुकावट के लिये खेद है ’ जैसा ब्लागवाणी का पन्ना चमकने लगा । अफ़सोस दिल गड्ढे में जा गिरा । कीबोर्डवा से फौरन F5 नोंच कर फेंक दिया, ससुरी यही है, झगड़े की जड़ !  Freedom at Midnight पढ़ने में मन लगाना चाहा, देसी रियासत रज़वाड़ों की खुदगर्ज़ी के किस्से पढ़ कर अपनी कौम पर गर्व हो आया, लगा कि हम उनसे किसी मायने में अलग नहीं हैं । आख़िर अपने ब्लाग का मालिकाना हक़ है, हमरे पास..  जुगाड़ से चार ठो चारण भी जुटा लिये हैं । अयहय, अब कोई यह तो कहेगा कि ’ अलि कली सों बिन्ध्यौं, अब आगे कौन हवाल ! “ अउर हवाल यह कि अपने हाथन कली नोंच कर फेंक दिया । पाठकों के पसँद नापसँद को लेकर ऎसी सजगता, और कहाँ ? आख़िर कीबोर्ड के वाज़िद अली शाह हैं हम !

blogvani 
सिरफिरा था भगत सिंह जो कल अपने जन्म दिन पर अपने वतन में याद तक न किया गया । वयम पोस्ट लिखित्वा ब्लाग वाः साहित्यवाः के फेर में चिन्तामग्न साहित्यलॉग कर्मी दुष्यँत  कुमार की बरसी पर किसीको याद भी न आये | या तो स्मृति समारोह में जाने को पहनने को कमीज़ उठायी होगी, और लेयो थमक गये, “  हँय मेरी कमीज़ उसकी कमीज़ से मैली क्यों ? मेरे अद्वितीय पोस्ट की पसँद उसके सड़े पोस्ट से निचली क्यों ? “ लिहाज़ा  धप्प से बईठ गये, उनके शून्य विचार में बस यही आया होगा कि, " चलो आज एक धत्त तेरी की – हत्त तेरी की पोस्ट लिखी जाय, यह नूतन विधा है, मैथिली बाज़ार बड़े शवाब पर है ,थोड़ी भगदड़ सही !  ऎसे कुविचार ब्लागलेखन के अनिवार्य तत्व हैं, यह सब अनाप शनाप सोच नींद को अपने पैर जमाने से रोक रही थीं । एम.पी.थ्री प्लेयर का हेडफोन कान से लगा लिया,  धीरे से आजा री निंदिया अँखिंयों में निंदिया आजा री आजा !

अयईयो ये किया गडबड जे.. श्रीधर सुनिधि की जोड़ी हेडफोन में घुस कर चिढ़ाने लगीं । इनको कैसे पता चला कि, ब्लागवाणी ने रुसवाई चुन ली है ? चाहें तो आप ही लपक लें, वाह क्या स्क्रिप्ट बन पड़ी है, " ब्लाग आज कल ! "

चोर बाजारी दो नैनों की,
पहले थी आदत जो हट गयी,
प्यार की जो तेरी मेरी,
उम्र आई थी वो कट गयी,
दुनिया की तो फ़िक्र कहाँ थी,
तेरी भी अब चिंता मिट गयी...

तू भी तू है मैं भी मैं हूँ
दुनिया सारी देख उलट गयी,
तू न जाने मैं न जानूं,
कैसे सारी बात पलट गयी,
घटनी ही थी ये भी घटना,
घटते घटते ये भी घट गयी...

चोर बाजारी...
तारीफ तेरी करना, तुझे खोने से डरना ,
हाँ भूल गया अब तुझपे दिन में चार दफा मरना...
प्यार खुमारी उतारी सारी,
बातों की बदली भी छट गयी,
हम से मैं पे आये ऐसे,
मुझको तो मैं ही मैं जच गयी...
एक हुए थे दो से दोनों,
दोनों की अब राहें पट गयी...

अब कोई फ़िक्र नहीं, गम का भी जिक्र नहीं,
हाँ होता हूँ मैं जिस रस्ते पे आये ख़ुशी वहीँ...
आज़ाद हूँ मैं तुझसे, अज़स्द है तू मुझसे,
हाँ जो जी चाहे जैसे चाहे करले आज यहीं...
लाज शर्म की छोटी मोटी,
जो थी डोरी वो भी कट गयी
,
चौक चौबारे, गली मौहल्ले,
खोल के मैं सारे घूंघट गयी...
तू न बदली मैं न बदला ,
दिल्ली सारी देख बदल गयी...
एक घूँट में दुनिया सारी,
की भी सारी समझ निकल गयी,
रंग बिरंगा पानी पीके,
सीधी साधी कुडी बिगड़ गयी...
देख के मुझको हँसता गाता,
जल गयी ये दुनिया जल गयी....

वईसे विजयादशमी शुभकामनाओं की तो होती ही है, इसे चाहे जिस रूप में ग्रहण करें, मर्ज़ी आपकी

vvvvvv

ताज़ा अपडेट

ब्लागवाणी का यह निर्णय किन्हीं निहित तत्वों के मँसूबों को फलीभूत कर रहा है,
बल्कि होना तो यह चाहिये था कि, इनकी अवहेलना कर इस पर तुषारापात किया जाये,
ऎसा तभी सँभव है, यदि यह टीम अपने फैसले पर पुनर्विचार कर कुछ कड़े तेवर के साथ प्रकट हो ।

बल्कि होना तो यह चाहिये कि अभी कुछ दिनों तक त्राहि त्राहि मचने दें,
जिसके लेखन में दम हो वह अपनी पोस्ट अपने कलम और सम्पर्क के बूते औरों को पढ़वा ले ।

एक मज़ेदार तथ्य यह कि, मैं मूरख से ज्ञानी जी की पोस्ट पर ब्लागवाणी के जरिये ही पहुँचा,
उत्सुकता केवल इतनी थी कि, कल सर्वाधिक पसँद प्राप्त पोस्ट में आख़िर क्या है
!

मज़बूरी में, चलिये यही गाते हैं

तारीफ तेरी करना, तुझे खोने से डरना ,
हाँ भूल गया अब तुझपे दिन में चार दफा मरना...
प्यार खुमारी उतारी सारी,
बातों की बदली भी छट गयी,
 

13 टिप्पणी:

Arvind Mishra का कहना है

न खेलब न खेलई देब बस खेलावई बिगाड़ब -चरितार्थ कर दिखाया लोगों ने ! किसी कीव कूवत हो तो दूसरा अग्रीगेटर लाये !

मीनू खरे का कहना है

कल शाम मैने ब्लॉगवाणी खोलना चाहा अपनी नई पोस्ट देखने को तो यही ऊपर वाला सन्देश दिखा कि कुछ लोगों ने गलत आइपी का इस्तेमाल किया है. हम सकते में आ गए कि शायद यह ग़लती मुझसे हो गई है इसी से ब्लॉगवाणी मुझसे विदा ले रहा है. अपनी अन्जानी गल्ती पर बहुत घबरा रही थी.सोचा कल सुबह किसी जानकार से उपाय पूछूँगी पर सुबह होते ही यह खबर सब तरफ से आने लगी. मुझे बहुत दुख हो रहा है आप सभी की तरह. ब्लॉगवाणी से इतना अपनापन कब हो गया पता ही नही चल पाया. इसका जाना वैसे ही लगता है जैसे कोई अपना रूठ कर जाता हो. प्लीज़ ब्लॉगवाणी हो सके तो हम सबके लिए वापस आ जाइए.

कुश का कहना है

सभी जगत ये पूछे था, जब इतना सब कुछ हो रियो तो
तो शहर हमारा काहे भाईसाब आँख मूंद के सो रियो थो
तो शहर ये बोलियो नींद गजब की ऐसी आई रे
जिस रात गगन से खून की बारिश आई रे

हिमांशु । Himanshu का कहना है

कुश की चौपाई सटीक है न !

ताऊ रामपुरिया का कहना है

अब का किया जाये?

रामराम.

डॉ .अनुराग का कहना है

कुश सही ठेले है गुरुवर .बाकी इस मुद्दे पे हम कई जगह कह चुके है रहे भगत सिंह ओर दुष्यंत कुमार वे सब पीछे छूट गए है .आजकल लोग इंडियन आइडल जैसी जगह एस एम एस करने में व्यस्त है ...

गिरीश बिल्लोरे 'मुकुल' का कहना है

यह सभ्य-संस्कृति की कोई सही मिसाल नहीं है "कोई" भी किसी के अवदान का इतना अपमान करने का अधिकारी नहीं हो सकता जिनने ऐसा किया है कि ब्लागवाणी-टीम हताश हुई दु:खद

अभिषेक ओझा का कहना है

'जैसी बची है वैसे की वैसी बचा लो री दुनिया'... ये भी सटीक बैठता है !

शरद कोकास का कहना है

शरद ऋतु के आगमन पर शुभकामनायें । बाकी तो सब ठीक हो ही चुका है .. ।

महामंत्री - तस्लीम का कहना है

सब कुछ तो कहा जा चुका है।
-Zakir Ali ‘Rajnish’
{ Secretary-TSALIIM & SBAI }

दर्पण साह "दर्शन" का कहना है

Respect Dr. Amar Kumar,
Greetings.


Us 'Biased' Prakaran ke karan hi sahi, aapki rachnaayien padhne gaahe bagahe aa hi jaata hoon...

...and trust me your 'Sense of humour' is awesome. And an intelluctual mind can create such sense of humour that's what i think.

Vivad khade karna mujhe bhi pasand nahi hain. Aur shayad us din bhi wo meri pehli talkh tippani thi. Wo bhi BAVZOOD iske ki mera link us din ki chittha charcha main diya gaya tha...
Aur phir uske baad isi karan maine use hata bhi diya tha.

...Aur ye comment bhi isliye ki hum dono ke beech koi poorvagrah na ho. kam se kaum vyaktigat star par to na hi....
Trust me this comment is not the rise of 'Give & take relation' between us. As the time passes by You will se that inspite of the fact you, not responding in my post will never lead to me not commenting in your blog.

The best part of that incident is discovery of 'you' (When i say i mean it).

Your Quotes and your references are 'Here to stay'

Your blog is now in my blogroll.

One request: Please refrain yourself commenting in my blog, so that, i can prove that this indeed is not an excercise to get a comment.
Second request: You can be (infact are) good(infact awesome) writer so also refrain yourself writing about only and only blogging.
These are contemprarory (& very short living) issues that too having impact with few people.(as i can see that your previous 3 post are regarding blog...)

However,aapke blog main jo rachnaaiyen vishesh taur par acchi lagi....

"Aksarsah:"
"Nange such se nahai behna"

PS:1) forgive me for my 'khcidi language'.
;)
'Coz thoughts are always raw.

दर्पण साह "दर्शन" का कहना है
This comment has been removed by the author.
दर्पण साह "दर्शन" का कहना है

Pre comment she'r bhi bahdiya tha...

...bus ek wqut ka khanzar meri taalash main hai !!

लगे हाथ टिप्पणी भी मिल जाती, तो...

आपकी टिप्पणी ?

जरा साथ तो दीजिये । हम सब के लिये ही तो लिखा गया..
मैं एक क़तरा ही सही, मेरा वज़ूद तो है ।
हुआ करे ग़र, समुंदर मेरी तलाश में है ॥

Comment in any Indian Language even in English..
इन पोस्ट को चाक करती धारदार नुक़्तों का भी ख़ैरम कदम !!

Please avoid Roman Hindi, it hurts !
मातृभाषा की वाज़िब पोशाक देवनागरी है

Note: only a member of this blog may post a comment.

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शुक्र है कि, सैद्धान्तिक सहमति अविष्कृत हो जाते हैं, और यह ज़्यादा नहीं टिकता, छोड़िये यह सब, आगे बढ़ते रहिये !

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