जो इन्सानों पर गुज़रती है ज़िन्दगी के इन्तिख़ाबों में / पढ़ पाने की कोशिश जो नहीं लिक्खा चँद किताबों में / दर्ज़ हुआ करें अल्फ़ाज़ इन पन्नों पर खौफ़नाक सही / इन शातिर फ़रेब के रवायतों का  बोलबाला सही / आओ, चले चलो जहाँ तक रोशनी मालूम होती है ! चलो, चले चलो जहाँ तक..

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24 November 2007

कभी कभी मेरे दिल में यह ख्याल आता है....

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यह बलम, सजन, सैंया वगैरह वगैरह किस ग्रह के प्राणी हैं ?
बचपन में यह शब्द सहज लगते थे या कि मैं ही चुगद था कि ज़्यादा दिमाग लगाने से परहेज़ करता था,अरे होगा जैसा भाव मुझे दबोचे रहता था ।
ठूंस
के खाओ और मस्त रहो
नर और नारी अलग अलग जीव होते हैं ,यह एहसास हुआ तो कुछेक वर्ष तो विस्मय में ही कट गये , समाधान करने वाला कोई विश्वस्त सुपात्र इर्द गिर्द मिलने में नहीं आ रहा था । फिर भी मादा का महत्व कुछ कुछ समझ में आने लगा था, पर विषद रूप से जानने की चाह निगाहें इधर उधर दौड़ाने पर मज़बूर करने लगी, छुप छुप के....छुप छुप के...चोरी हो चोरी ...और कैसे ?
अल्ला अल्लाह खै़रसल्ला्ह , इसी दौर में एक नयी नवेली चाची का आगमन परिवार में हुआ । मुझ निरीह पर विशेष बेबाक तरह की कृपा रहती थी, उनकी । चाची एक अदद रेडियो भी साथ लेकर आयी थीं ,9 के अंक में फंसे लाल बैटरी वाले सहबोला समेत, बात दीगर है कि कहलाता वह हमारा रेडियो था । इन सद्यब्याहता चाची का रेडियो प्रेम हम सब के लिये कौतुक का विषय था । हां तो, बज़रिये रेडियो बहुत सारे गाने सीधे सीलोन से उड़ते हुये उनके कंठ में ही अवतरित हुआ करते थे । अच्छे गीत और स्वर की तमीज़ मुझे तो थी नहीं लेकिन उनका मौके बेमौके गुनगुनाते हुये इधर उधर डोलते रहना बहुत भाता था । जब वह नाक व भ्रुकुटी सिकोड़ कर मेरे गाल गुनगुनाते हुये खींच देती थीं तो मानों मेरा मनमयूर गुलाटी खाने लगता था । बाप रे बाप !
तो इन्हीं दिनों मेरा परिचय इन ’ बलम, सजन, पिया, सैंया , गुईंया, राज्जा, रजउ ’ बिरादरी से होता भया ।
जैसा कि आपने जाना वह मेरे चुगदावतार का युग था, लिहाज़ा बस इतना ही निष्कर्ष निकाल सका कि यह जनजातियां इन गीतों के अनिवार्य अंग हैं । क्यों ? यह भला कौन बताता ?
किंतु इनका एक दूसरा पक्ष भी मुंह बाये खड़ा रहता था । आख़िर यह बलम रूपी जीव, परदेशी, बैरी, बेदर्दी और कभी कभार बांके ही क्यों हुआ करते हैं ? इस गूढ़ रहस्य को उधेड़ने के प्रयास में मेरा भी जियरा धक-धक करने लग पड़ता था । और तो और, इस पिया रूपी किरदार को जिया न लगने का उलाहना देकर चोरी-चोरी ही आने की दावत क्यों दे जाती है ( क्या सामने के दालान को पार करके नहीं आ सकता, बुढ्ढा बेचारा तो पिछवाड़े खांस रहा है ) तथा यह पियाजी इस मनुहार के एवज़ में बांहें क्यों मरोड़ दिया करते हैं, क्या फ़्रीस्टाईल के चैम्पियन हैं ? यह बहुत सारे सवाल पहेली बन मन को अशांत किये रहा करती थी । किताब में सामने साइबेरिया का मैदान खुला पड़ा है और मन में सैंया डोल रहे हैं ! कोई आश्चर्य नहीं कि बहुधा सैंया जी साइबेरिया में सैर करने लग पड़ते हों , वहां के झीलों में....
’ मेरे सैंयाजी उतरेंगे पार हो , नदिया... धीरे बहो ’ ।
वह दिन और आज़ का दिन, यह रूमानी प्रजातियां, विक्रम के बेताल की तरह कुछ पल साथ चल कर उथल पुथल पैदा करते हुए अपनी पहेली मेरे पास छोड़ कहीं अदृश्य में टंग जाया करते हैं, अब टंगे रहिये आप भी ।
बहरहाल समय के चक्र के साथ मैं भी रस्मी रोमांस के लूपलाईन से दुनियादारी ट्रंकलाईन के शादी जंक्शन पर गृहस्थी फास्ट पैसेंजर से जुड़ उसको खींचखांच यहां तक भले ले आया होऊं और अब अधेड़बुज़ुर्ग टर्मि्नल यार्ड में भेजे जाने को तैयार खड़ा हूं । किंतु अभी तो मैं जवान हूं का नारा लगाता बेचारा इंजन इन अधुनातन शब्दों के तिलिस्म में अक्सर डिरेल हो पटरी के बगल अधलेटा, पूरे जिस्म में झुरझुरी पैदा किया करता है । यह बलम परदेशिया को न जान पाने का दंश कब मुझे छोड़ेगा ?
अपनी ब्लागर बिरादरी में कोई गुदड़ी का लाल तो अवश्य छिपा बैठा होगा, जो इनके तिलिस्म में पैठ रखता हो या इसका नक्शा हथियाये बैठा हो । उनसे निवेदन है कि
जरा सामने तो आओ छलिये....मेरी आत्मा की ये आवाज़ है
दिस मैटर नीड्स टू बी टेकेन सीरियसली !










2 टिप्पणी:

ज्ञानदत्त । GD Pandey का कहना है

बहुत मेहनत से ब्लॉग बनाया और उतनी ही मेहनत से बहुत बढ़िया लिखा। यह अधेड़पन की निशानी तो कतई नहीं। किसी और से बनवाया-लिखवाया है क्या? अगर नहीं तो मस्त रहिये। आपको सिर्फ ब्लॉगरी का रोग है। कोई खास बात नहीं! :-)

डा० अमर कुमार का कहना है

अरे नहीं, पंडित जी,
आपने तो एकदम धोकर रख दिया, जैसे अच्छा काम देख मिडिलक्लास में पंडित सुंदरलाल, हमारे
हिंदी टीचर बिना पूछे एक रहपट घसीट देते थे, फिर गरजते थे, सचसच बता लाला किससे करवा कर लाया है ? लगता है अपनी किस्मत ही ऎसी है ! प्रयास करूंगा कि त्रुटीहीन न लिखा करूं ।
आशीर्वाद दें ।

लगे हाथ टिप्पणी भी मिल जाती, तो...

आपकी टिप्पणी ?

जरा साथ तो दीजिये । हम सब के लिये ही तो लिखा गया..
मैं एक क़तरा ही सही, मेरा वज़ूद तो है ।
हुआ करे ग़र, समुंदर मेरी तलाश में है ॥

Comment in any Indian Language even in English..
इन पोस्ट को चाक करती धारदार नुक़्तों का भी ख़ैरम कदम !!

Please avoid Roman Hindi, it hurts !
मातृभाषा की वाज़िब पोशाक देवनागरी है

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यह अपना हिन्दी ब्लागजगत, जहाँ थोड़ा बहुत आपसी विवाद चलता ही है, बुद्धिजीवियों का वैचारिक मतभेद !

शुक्र है कि, सैद्धान्तिक सहमति अविष्कृत हो जाते हैं, और यह ज़्यादा नहीं टिकता, छोड़िये यह सब, आगे बढ़ते रहिये !

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