जो इन्सानों पर गुज़रती है ज़िन्दगी के इन्तिख़ाबों में / पढ़ पाने की कोशिश जो नहीं लिक्खा चँद किताबों में / दर्ज़ हुआ करें अल्फ़ाज़ इन पन्नों पर खौफ़नाक सही / इन शातिर फ़रेब के रवायतों का  बोलबाला सही / आओ, चले चलो जहाँ तक रोशनी मालूम होती है ! चलो, चले चलो जहाँ तक..

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02 December 2007

अथ मनुष्य योनिः

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आज तेरी याद आ रही है, विंध्याचल । ist2_1078710_penguin_cartoons_000

हाईस्कूल में मेरे एक सहपाठी हुआ करते थे,विंध्याचल सिंह । महा के मुरहे और खखेड़ी जीव थे, यमदूत से भी पंगा ले लें, कोई ताज्जुब नहीं । अनजाने में ही उन्होंने एक जिज्ञासा मन में छोड़ दी, जो यदा-कदा सुलग उठती है । कोई खास नहीं किंतु निट्ठल्ले चिंतन में दिमाग की वर्जिस हो जाती है ।

हिंदी तृतीय प्रश्न्पत्र की तैयारी चल रही थी, छप्पर में कक्षायें लगती थीं । हमारे हिंदी अध्यापक पंडित पूर्णेंद्र मिश्र बड़े मनोयोग से व्याख्यायें लिखवा रहे थे । झुके हुये 45-50 अदद सिर धड़ाधड़ अपनी कापियों पर नोट टांचे जा रहे थे । उनकी किंचित अटपटाती, गुलगुलाती आवाज़ गूंज रही थी, " मः ..नुष्य यो .. निः में .. बड़े भाग्य ..से जनः .. म होता है, जनम हो .. ता है । थूक सुड़कने की दीर्घ आवाज, तत्पश्चात आगे बढ़ने का वाक्य शायद मन ही मन बनाने लगे । इसकी नौबत ही नहीं आयी ।

kakaपीछे से एक आवाज़ आयी, " गुरु जी !" आगे के लिखने में व्यस्त सिर पीछे मुड़ पड़े,देखा विंध्याचल सिंह खड़े हैं । आवाज़ उन्ही की थी, सदा की तरह कोई शरारती शंका लिये खड़े हैं, लेकिन उस दिन तो हद ही हो गयी । उन्होंने अपनी शंका समाधान हेतु प्रस्तुत की, " गुरु जी, ई योनि का होत है ?" हम हंसें या नहीं, इस असमंजस के बाद पूरे क्लास में फिस्स फिस्स, ही ही, खी खी होने लगी ।

- बइठ जावो बिंधाचल, बाद में बता दिया जायी ।

- नहीं गुरु जी, बइठबे तो न, अबै बताओ ।

पंडिज्जी आजिजी से उसको घूरते तिरछे हो खड़े थे । प्रश्न दोहराया गया ।

- बताओ गुरु जी, ई योनि का होत है ? जब समझबै न करबे, तौ ई सिक्छा का मतलब ? वइसे तो आप रटवाय रटवाय इंतन्हनियां पास करवाइन देहौ, हमहूं जानित है ।

पंडिज्जी की गोलमटोल काया, खसखसी सफेद दाढ़ी, टखने तक की धोती समेत किंचित कंपकंपा रही थी बेबस उतावलेपन के भाव से विंध्याचल को तौल रहे थे । कुर्ते की असीमित लंबी आस्तीनों में अदृश्य हाथों को लहरा कर बैठने का इशारा किया गया ।
किंतु
वह ढीठ मांग इस बार लगभग पुकारने के स्वर में फिर से दोहरायी गयी

- बताओ गुरु जी, ई योनि का होत है ? किलसिया मा बतेइहो तो अउरन का फायदा हुई जायी
अब पंडिज्जी क्या बतायें ? शब्दार्थ कि भावार्थ ! यह दोनों आज तलक अभिव्यक्ति की मोहताजी झेल रहे हैं तो उनके ऊपर तो यह प्रश्न भारी पड़ना ही था ।

योनि की संरचना समझाने का मंच नहीं था और ये मुरहा योनि में घुसा पड़ा है । अमूर्त निराकार योनि की व्याख्या का पर्याप्त ज्ञान उनको था या नहीं, या हम ही इस ज्ञान के लिये अपात्र थे, बता नहीं सकता । किंतु एक बात स्पष्ट थी, यह योनि हमारे कोर्स में तो नहीं है। अतः हम सब भी घंटा न बजने को कोस रहे थे। इस पर टिप्पणी भी शायद ही आये।

यह तब तो टल गया ( कैसे ? धैर्य रखिये ) किंतु अनाड़ीपन से निकल जब अगाड़ी पिछाड़ी देखने की अक्ल हुयी तो योनि की गूढ़ता और रहस्यमयता की झलक कुछ वैदिक साहित्य में और तंत्रयामल में देखने को मिली । वैदिक पुरुष तो जैसे योनि से निरंतर अभिभूत ही रहे हों । माहात्म्य और प्रशस्ति से एक तिहायी साहित्य तो भरा ही होगा । मैंने पूरा कहां पढ़ा होगा । आधे अधूरे में ही तबियत भिन्ना गयी । गुठली कहां गिनने बैठें ?

लेकिन कुछ टला नहीं था, ललकारती आवाज़, " गुरु जी, बाद मा धुन देहौ, इहईं बताओ "?

गुरु जी का अथाह सा तोंद उत्तेजना से थिरकने लगा, आस्तीन में छुपे हाथों से दिल थामने जैसे ही तोंद थामे खड़े, अपने नयनों से अगिया बरसा रहे थे ।
विंध्याचल तो ठहरे विंध्याचल, इहां कुम्हड़बतिया कोऊ नाहीं

और सहसा वह लुढ़कते पत्थर सरीखे गतिशील हुए यानि पंडिज्जी । क्या होने वाला है, यह कोई सोच पाता इससे पहले वह विंध्याचल को दबोच पीठ पर धाँय धाँय दुहथ्थड़ बरसा रहे थे। मुंह से दोहरे या खैनी का जूस टपकाते हुए जैसे मंत्रजाप कर रहे थे, " घरै जायकै आज आपन महतारी से पूछ्यौ, जहां से निकारे गये हन ऊई हमका देखाओ, ससुर नहिंतन योनि केर दरसन हुई जाई । यहिमा गुरुजी का बतावैं ?" धम्म धम्म धाँयधाँय एकबारगी शांत हो गया और पंडिज्जी छ्प्पर से छिटक अंतर्ध्यान हो गये ।

फिर तो वह रार मची क्लास में, बताओ इहां पढ़ै आयें हन कि महतारी केर गारी सुनै ? खासी हनक थी, बिल्कुल आज के मुशर्रफ़ की तरह ! वह फुलपैंट भी पहना करते थे, जिनके आगे हम हाफ़पैंट वालों की क्या बिसात,लिहाज़ा असहमत होते हुए भी सहमत होने को बाध्य थे । फिर अंग्रेज़ी हटाओ की तर्ज़ पर पंडित जी के विरुद्ध हस्ताक्षर अभियान की रूपरेखा तैयार होने लगी, मैं लाला आदमी ( ? ) चुपचाप फूट लिया । तीन दिन स्कूल की तरफ़ गया ही नहीं । जानेपर पता चला पंडित पूर्णेंद्र जी सस्पेंड हो गये हैं, जाँच चल रही है।

योनि उनको ले डूबी, यही मेरा इससे तात्कालिक परिचय था । किंतु इसके व्याख्या को जानने की हुड़क जब तब सताती है । खोया-पाया की तरह यहाँ प्रकाशित है, जिन सज्जन को पता हो, बताने की कृपा करें ।
पारिश्रमिक तो नहीं, किंतु पूर्णेंदु सम्मान से नवाज़ा जायेगा । नाम व पता गुप्त रखने की गारंटी !

06087212 और हमारे हीरो, विंध्याचल ? संप्रति यहीं रायबरेली कोर्ट में स्टैम्प वेंडर हैं । कमर दोहरी हो गयी है, जाने क्यों । उनसे अब पूछो तो किंचित गर्व से हल्का मुस्कुरा कर फीका सा हँस देते हैं, "अमाँ डाक्टर तूमहूं.. उई तो लौंडियई रही । अउर सुनाओ का हाल है ?"


इति ब्लागस्पाटे निट्ठल्लेखंडे अमरकुमार विरचित द्वितीयठेलमठेल अपूर्ण योनिरह्स्यकम समर्पणायमि ॥

2 टिप्पणी:

Sanjeet Tripathi का कहना है

मजा आ गया!!
शानदार लिखा है भाई!!

आते रहने पड़ेगा अब आपके ब्लॉग में!!

वैसे ये टिप्पणी करने की जगह से वर्ड वेरीफ़िकेशन हटा दें तो सहूलियत रहेगी!!

अभय तिवारी का कहना है

हम आप के फ़ैन हो चुके हैं.. ज़बरदस्त अन्दाज़ है आप का..

लगे हाथ टिप्पणी भी मिल जाती, तो...

आपकी टिप्पणी ?

जरा साथ तो दीजिये । हम सब के लिये ही तो लिखा गया..
मैं एक क़तरा ही सही, मेरा वज़ूद तो है ।
हुआ करे ग़र, समुंदर मेरी तलाश में है ॥

Comment in any Indian Language even in English..
इन पोस्ट को चाक करती धारदार नुक़्तों का भी ख़ैरम कदम !!

Please avoid Roman Hindi, it hurts !
मातृभाषा की वाज़िब पोशाक देवनागरी है

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शुक्र है कि, सैद्धान्तिक सहमति अविष्कृत हो जाते हैं, और यह ज़्यादा नहीं टिकता, छोड़िये यह सब, आगे बढ़ते रहिये !

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