जो इन्सानों पर गुज़रती है ज़िन्दगी के इन्तिख़ाबों में / पढ़ पाने की कोशिश जो नहीं लिक्खा चँद किताबों में / दर्ज़ हुआ करें अल्फ़ाज़ इन पन्नों पर खौफ़नाक सही / इन शातिर फ़रेब के रवायतों का  बोलबाला सही / आओ, चले चलो जहाँ तक रोशनी मालूम होती है ! चलो, चले चलो जहाँ तक..

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31 December 2007

तो आज यही सही - एक

Technorati icon

Calvin_and_Hobbes_comics_cartoons_freecomputer_desktopwallpaper_1024 Nitthalle ki soch
तलाश है , एक साफ़ सुथरे दिमाग की

इस श्रृंखला की पहली कड़ी में, एक प्रसंग और एक प्रश्न उपस्थित है । निराकरण आप करें ।

एक रेलवे टिकट कलेक्टर महोदय 3rd वातानुकूलित कूपे में दाखिल हुए । 6 लड़कियों का जत्था विराजमान था । " टिकट ? ", अपना प्रश्न दागा । आँखें नीची पर कनखियाँ सक्रिय, देखा एक तो झीनी नाइटी में, दूसरी टू पीस नाइट सूट में, तीसरी शार्ट स्कर्ट में, चौथी हाट पैन्ट में सामने खड़ी हैं । टिकट किसी के पास भी नहीं ! अपने विवेकानुसार फ़ाईन ठोंका ।

शार्ट स्कर्ट - 200 रुपये

हाट पैन्ट - 150 रुपये

टू पीस नाइट सूट - 100 रुपये

अंग-प्रत्यंग झलकाती झीनी नाइटी - 50 रुपये मात्र

तभी बाकी बची दो लड़कियाँ टायलेट से लौटती नज़र आयीं । " टिकट ? ", उन दोनों ने उनको जो भी दिखाया हो वह यहाँ बताना न्यायसंगत न होगा । बहरहाल, दोनों ही बिना किसी अर्थदंड लिये छोड़ दी गयीं । क्यों ? यह तो आप बतायें ।

1 टिप्पणी:

प्रयास का कहना है

महाशय, उन दोनों लडकियों के पास टिकट था!!!

लगे हाथ टिप्पणी भी मिल जाती, तो...

आपकी टिप्पणी ?

जरा साथ तो दीजिये । हम सब के लिये ही तो लिखा गया..
मैं एक क़तरा ही सही, मेरा वज़ूद तो है ।
हुआ करे ग़र, समुंदर मेरी तलाश में है ॥

Comment in any Indian Language even in English..
इन पोस्ट को चाक करती धारदार नुक़्तों का भी ख़ैरम कदम !!

Please avoid Roman Hindi, it hurts !
मातृभाषा की वाज़िब पोशाक देवनागरी है

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यह अपना हिन्दी ब्लागजगत, जहाँ थोड़ा बहुत आपसी विवाद चलता ही है, बुद्धिजीवियों का वैचारिक मतभेद !

शुक्र है कि, सैद्धान्तिक सहमति अविष्कृत हो जाते हैं, और यह ज़्यादा नहीं टिकता, छोड़िये यह सब, आगे बढ़ते रहिये !

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