जो इन्सानों पर गुज़रती है ज़िन्दगी के इन्तिख़ाबों में / पढ़ पाने की कोशिश जो नहीं लिक्खा चँद किताबों में / दर्ज़ हुआ करें अल्फ़ाज़ इन पन्नों पर खौफ़नाक सही / इन शातिर फ़रेब के रवायतों का  बोलबाला सही / आओ, चले चलो जहाँ तक रोशनी मालूम होती है ! चलो, चले चलो जहाँ तक..

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02 January 2008

तो आज यही सही - दो

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amar ki murgee Murgi aur Anda-amar

हमारे कैफ़ भाई व्यापार करने उतरे ,

सबको पछाड़ बाज़ार पर कब्ज़ा करने की ग़रज़ से अंडों के बिजिनेस में एक अनोखा प्रयोग किया । वह दो रुपये के भाव से अंडे ख़रीदते और पौने दो रुपये के भाव बेचते । व्यापार चल निकला, सभी उनके मुरीद ! देखते ही देखते वह एक साल में ही वह लखपति हो गये !

भला कैसे ? और उन्होंने बिजिनेस लाईन से तोबा भी कर ली , यह क्यों ?

प्रयास करें, ज़वाब एकदम साफ़ है ।

2 टिप्पणी:

अनुराग का कहना है

डागदर बाबू, इन कैफ साब की दूकान कहां है?
कुछ अप्पन भी ले आयेंगे

गुलशन खट्टर का कहना है

बिचारे केफ़ साहब पहले करोड्पति थे अन्डे बेच कर एक साल मे लखपति हो गे

लगे हाथ टिप्पणी भी मिल जाती, तो...

आपकी टिप्पणी ?

जरा साथ तो दीजिये । हम सब के लिये ही तो लिखा गया..
मैं एक क़तरा ही सही, मेरा वज़ूद तो है ।
हुआ करे ग़र, समुंदर मेरी तलाश में है ॥

Comment in any Indian Language even in English..
इन पोस्ट को चाक करती धारदार नुक़्तों का भी ख़ैरम कदम !!

Please avoid Roman Hindi, it hurts !
मातृभाषा की वाज़िब पोशाक देवनागरी है

Note: only a member of this blog may post a comment.

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यह अपना हिन्दी ब्लागजगत, जहाँ थोड़ा बहुत आपसी विवाद चलता ही है, बुद्धिजीवियों का वैचारिक मतभेद !

शुक्र है कि, सैद्धान्तिक सहमति अविष्कृत हो जाते हैं, और यह ज़्यादा नहीं टिकता, छोड़िये यह सब, आगे बढ़ते रहिये !

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