जो इन्सानों पर गुज़रती है ज़िन्दगी के इन्तिख़ाबों में / पढ़ पाने की कोशिश जो नहीं लिक्खा चँद किताबों में / दर्ज़ हुआ करें अल्फ़ाज़ इन पन्नों पर खौफ़नाक सही / इन शातिर फ़रेब के रवायतों का  बोलबाला सही / आओ, चले चलो जहाँ तक रोशनी मालूम होती है ! चलो, चले चलो जहाँ तक..

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17 January 2008

लगी लखटकिया पर मेरी टकटकी

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बस यहाँ फोटू देखो, और देखना कम, समझना ज़्यादा
बहुत लुभा रही हैं, आने वाले कल की तस्वीरें, कंजर कब तक बने रहोगे ?

ऊँची सोच रखोगे, तभी तो महान देश के नागरिक बनने की औकात बनेगी । फ़्राँस की क्राँति का प्रसिद्ध ज़ुमला कोई अकेले उन्हीं का पेटेन्ट थोड़े ही न है ? अरे वाह, रोटी के लिये शोर मचाने से क्राँति कहीं आयी है,भला ? केक देखो , केक सोचो और ख़्याली सही लेकिन केक ही खाओ । रोटी की चिन्ता छोड़ रे मूरख, क्राँति की भ्राँति मे मत पड़ा रह । तेरा कितना अपग्रेडेशन हो रहा है, मनन कर ओ प्राणी । तू दो कौड़ी का आदमी, अपनी दो ट्कियाँ दी नौकरी में कब तक जीता रहेगा ?

यह लखट्किया देख और अपना सुनहरा भविष्य देख । बल्कि देख कम, समझ ज़्यादा !

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आलू प्याज़ भूल रे प्राणी, लखट्किया की सोच । बड़ी सोच का बड़ा ज़ादू की झलक भर दिखला कर श्वार्ट्ज़ ( David J. Schwartz ) साहब बिलियनपति हो गये, तू तो अभी लाखों में ही झूल रहा है !

चिट्ठाजगत संकलक का आधिकारिक चिट्ठा: चजइ - चिट्ठाजगत सर्वोत्तम पोस्ट इनाम हेतु घुसेड़ित, हें हें..हें

जाते थे जापान, पहुँच गये चीन समझ लेना ____________________________________

मूल रूप से लखटकिया .... शीर्षक अपने दूसरे वेबलाग कुछ तो है...जो कि के लिये चुना था किंतु संग्रहित चित्र एवं भाषा में अनायास उतर आया व्यंगात्मक तंज़ जैसे वहाँ फिट नहीं बैठ रहा था, अस्तु यहाँ ठेल कर संतोष करना पड़ा । वस्तुतः देश के उद्धमी अपनी प्राथमिकता तय करने में लकदक से सम्मोहित हो भटक से रहें हैं , तो मेरा भटक जाना भी क्षम्य माना जाये । इस प्रकार के उपक्रम यदि मुझे मानसिक दिवालियापन लगते हैं, तो मुझे असमान्य मानसिकता वाले ठेलू मे शुमार किये जाना सहज स्वीकार्य है । पीठ पीछे खड़ी मेरी बीबी भी मुझे ठेल रही है कि क्लिनिक से काल आ रही है, और तुम यहाँ बैठे हो । अतः जल्दी से स्पष्ट कर दूँ कि आप निर्धारित करें कि सस्ती कार , सस्ता पेट्रोल, सस्ता सरसों का तेल, सस्ता गेहूँ, और सस्ता सस्ता सब कुछ जो एक आम इंसान की ज़रूरत में शुमार है, ऎसी प्राथमिकतायें स्वागत योग्य हैं या इस प्रकार के प्रहसन ? लो फिर अचानक एक गाना याद आ ही गया, ' अंधेरे में जो बैठे हैं, नज़र उन पे भी कुछ डालो..., अरे ओ रोशनी वालों '

रही बात चजइ की तो, वह तो किस रौ में डाल दिया, बता नहीं सकता क्योंकि हिंदी वेबलागिंग में मैं तो अभी लौंडा हूँ । इस दावेदारी को गंभीरता से कतई न लिया जाये । बदहालीबयानी भला कोई पुरस्कार योग्य विषय हो सकता है, यह चिट्ठाजगत तय करे, मेरा सिरदर्द तो आपके सामने है !

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जरा साथ तो दीजिये । हम सब के लिये ही तो लिखा गया..
मैं एक क़तरा ही सही, मेरा वज़ूद तो है ।
हुआ करे ग़र, समुंदर मेरी तलाश में है ॥

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इन पोस्ट को चाक करती धारदार नुक़्तों का भी ख़ैरम कदम !!

Please avoid Roman Hindi, it hurts !
मातृभाषा की वाज़िब पोशाक देवनागरी है

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