जो इन्सानों पर गुज़रती है ज़िन्दगी के इन्तिख़ाबों में / पढ़ पाने की कोशिश जो नहीं लिक्खा चँद किताबों में / दर्ज़ हुआ करें अल्फ़ाज़ इन पन्नों पर खौफ़नाक सही / इन शातिर फ़रेब के रवायतों का  बोलबाला सही / आओ, चले चलो जहाँ तक रोशनी मालूम होती है ! चलो, चले चलो जहाँ तक..

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09 January 2008

लोलल्लाँगूलपातेन मारुतः ममराऽतीन निपातय

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' कुछ तो है..जो कि ' के पालनहार में बजरंगबली का संदर्भ अनायास ही नहीं है, असमंजस की असुविधा में, मैं उनको स्मरण कर , अपने सोचे हुये पर कूद पड़ता हूँ । वह भला करता ही रहा है, आगे भी करता रहेगा । क्यों, यह बाद में !

इनसे मेरा परिचय भी अज़ीबोगरीब तरीके से कुछ बाद में हुआ । हमारे घर के पूजास्थल पर माँ दुर्गा की छवि मुझे निरंतर बाँधे रहती थी । तबके निपट छुटपन से ही उनकी मेगाइमेज़ बहुत प्रभावित करती रही है, ' छॆल पर बइठी अउरत, आराम से पैर पर पैर रखे, चार-चार हाथ, छेल का मूँ तो खुला है, इनको खाता नईं है, खा जायेगा, फिर हमको भी खायेगा, कियॊँ नही खायगा जैसे अने्कानेक सवालों का ज़वाब बस यही होता था, जय कर लो - हाथ जोड़ के जय कर लो, और जय्य '।
लेकिन
बड़ों की नज़रों में शैतानी की परिभाषा तो नित बदला ही करती थी । उनमें यदि कुछ उनके हिसाब से शैतानी में शुमार हो जाता , और वह हमसे अगर हो गयी हो, तो एक पक्का अल्टीमेटम तैयार रहता था , " आने दो छोटका को, पड़ेगा एक महावीरी थप्पड़ तो सब भूल जाओगे । " यद्यपि अब तक थप्पड़ से मेरा परिचय हो चुका था किंतु यह महावीरी थप्पड़ क्या होता है ? दिमाग लगाने लायक दिमाग ही नहीं था, सो रोहू-झींगा जैसा ही कोई अंतर होता होगा ।
और एक दिन छोटका ( बोलेतो- छोटे चाचा ) के हत्थे मैं चढ़ ही गया, महावीरी थप्पड़ से मुलाहिज़ा हुआ, आँखों के आगे अंधेरा छा गया, दिन में अमावस की रात में छिटके तारे टिमटिमाने लगे । मैं मदद के लिये ,बुक्का फाड़कर अपना वार्निंग एलार्म बज़ाता ,इससे पहले ही नीचे से पेशाब की धार बह निकली और मैं बेहोश हो गया । तब तक आठ दस बार थप्पड़ खाने का अनुभव हो चुका था, लेकिन भइय्या, ये कइसा थप्पड़ ? रे बपई, रे बपई !
कई दिनों बाद दादी ने खुलासा किया कि इस कोटि के जानदार प्रहार को ही महावीरी थप्पड़ कहते हैं,
बाप रे ! उन दिनों उत्तर बिहार के प्रायः हर गाँव में एक महाबीरस्थान होता था, दूर से ही अपनी ' धज्ज़ा ' से लोकेट किया जाता था । धज्ज़ा याने ध्वजा, हरे बाँस की फुनगी पर झीना सा तिकोना लाल कपड़ा । एक दिन महाबीरस्थान जाना हुआ, बाबा के साथ । तो देखा महाबीर जी को , लिपे पुते एक टाँग पर खड़े, मुँह में आटे की लोई सरीखा कुछ ठुँसा हुआ, और शायद उसी वज़ह से उनकी आँखें बाहर को उबली पड़ रही थीं, एवं वह दीवार से चिपक से गये थे । इतना सब होने के बावज़ूद भी उनके एक हाथ में भारी भरकम मुगदर और दूसरा हाथ तश्तरी में खाँचेदार पहाड़-घर वगैरह से लैस । तो यह हैं महाबीर जी ? मन में एक संतोष सा हुआ, उनकी दुर्दशा देख कर । ताक झाँक कर देखा, थप्पड़ के लिये कोई स्पेयर हाथ होगा, वह तो था ही नहीं ! फिर एक हमदर्दी सी जग आयी और मैं उनका कुछ-कुछ मुरीद हो गया ।
फिर उनसे परिचय और प्रगाढ़ होता गया । हर अष्ट्याम में वह अनिवार्य रूप से मौज़ूद रहते और हमलोग उनके चक्कर लगाते लगाते ' हरे राम, हरे कृष्ण, हरे राम..हरे हरे ' गाया करते । उत्तरी बिहार में अखंड रामायण या जागरण की तर्ज़ पर अठजाम ( बोले तो-अष्टयाम ) का प्रचलन है,एक हरा बाँस घर के सामने या आयोजन स्थल पर गाड़ दिया जाता हैं, मँड़ई छा दी जाती है, बाँस के सहारे, उसके चारों ओर देवी देवताओं की तस्वीरें प्रतिमा लोग अपने अपने घरों से लाकर सजा देते हैं , फिर ढोल मज़ीरे झाँझ बजाते हुए ग्रामवासी 24 घंटे तक अनवरत परिक्रमा करते हुये , हरे राम , हरे हरे का उद्घोष् लयपूर्वक लगाया करते हैं । लाज़िमी है, ऎसे आयोजन में हनुमान का होना ।
सन 1965 के बाद के काल में देश के स्वाभिमानी प्रधानमंत्री ने अभूतपूर्व अन्नसंकट से आवाहन किया कि संपूर्ण देश एक दिन उपवास रखे, अतः हर सोमवार को हमारे यहाँ भी उपवास रखा जाने लगा । मैं कुछ ज्यादा ही सयाना था, सोमवार के बदले मंगलवार को व्रत करके देश के प्रति अपना कर्तव्य निभाने लगा, वह सिलसिला आज तक चल रहा है । पावरफ़ुल हैं, इन्हीं को अगोर लेयो, भाई !
बेचारे श्री रामचंद्र भी उन्हीं के सहारे पार लगे थे । जैसे पुकार उठे, ' सुनु कपि तोहि समान उपकारी, नहिं कोउ सुर नर मुनि तनुधारी । ' और देखिये उनकी बुद्धि भी चकरा गयी , ' प्रति उपकार करौं का तोरा, सन्मुख होइ न सकत मन मोरा ' । बेचारे अब तक उनका ऋण ढो रहे हैं, ' सुनु सुत तोहिं उरिन मैं नाहीं '।
जब से देख रहा हूँ कि इस युग में केवल बाबू, बकैत और अर्दली की ही चलती है, तब से मेरी निष्ठा और भी बढ़ती ही जा रही है ।
' होत न आज्ञा बिनु पैसारे ', अब बताईये ' साहब सों सब होत है, बंदे से किछु नाहिं ' । और साहब तक बात पहुँचानी हो तो इस सप्तचिरंजीवी बंदे से तो मिलना ही पड़ेगा । चिरंजीवी हैं, तो यहीं कहीं होंगे, साहब तो रघुबरपुर में बैठे हैं । आपकी अरज़ी तो फारवर्ड इनसे ही होगी, तभी तो ' और देवता चित न धरई, हनुमत सेइ सर्व सुख करई '

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उपर दर्शायी गयी विग्रह की छवि यहाँ श्री भवानी पेपर मिल्स में स्थापित श्री अभयदाता जी का है, कसौटी पत्थर की बनी यह मूर्ति शायद उत्तर भारत में अनोखी है, और बहुत ही जागृत । यहाँ पूजा की परपंरा विशुद्ध रूप से दक्षिण भारतीय कर्नाटक शैली की है, उपमा, छोले का भी भोग यहाँ लगाया जाता है।



1 टिप्पणी:

रवीन्द्र प्रभात का कहना है

क्या बात है भाई , बहुत सुन्दर और तार्किक बातों से रू बी रू करा दिया , पढ़कर बहुत अच्छा लगा !

लगे हाथ टिप्पणी भी मिल जाती, तो...

आपकी टिप्पणी ?

जरा साथ तो दीजिये । हम सब के लिये ही तो लिखा गया..
मैं एक क़तरा ही सही, मेरा वज़ूद तो है ।
हुआ करे ग़र, समुंदर मेरी तलाश में है ॥

Comment in any Indian Language even in English..
इन पोस्ट को चाक करती धारदार नुक़्तों का भी ख़ैरम कदम !!

Please avoid Roman Hindi, it hurts !
मातृभाषा की वाज़िब पोशाक देवनागरी है

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शुक्र है कि, सैद्धान्तिक सहमति अविष्कृत हो जाते हैं, और यह ज़्यादा नहीं टिकता, छोड़िये यह सब, आगे बढ़ते रहिये !

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