पेज़ लोड होने तक यह चालू रहेंगे
आइये, सच को अपना स्वर दें - मानस प्रदूषित कर रहा हमसब का असहमत मौन !
सर्वप्रथम नमन सर्वदा चहूँ ओर व्यापित, समाज एवं संस्कृति को चाटते, कालजयी तिलचट्टों को
जो मूलतः मेरे प्रेरणा स्रोत रहे हैं
कुछ तो है...जो कि ! *द्वितीय आवृति
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सुस्वागतम
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अदब की हद में हूँ, मैं बेअदब नहीं होता । ग़र हर तरफ़ पोली ज़मीं का ही ग़ुमाँ हो ... .. तो, मेरा बहकना भी अज़ब नहीं होता
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16.3.08

आज कंमेंटियाने की ज़िद ना करो...






भला यह भी को बात हुई ? सोचा अब तीन चार दिन कोई पोस्ट नहीं लिखुँगा, थोड़ा न्य कामों पर भी ध्यान दिया जाये । वैसे भी दोस्त मुसाहिबों की नज़र में यह ब्लागिंग-स्लागिंग फ़ालतू फ़ंड का काम है, न लेना न देना दो... बेकार में समय की बरबादी ! एक दुनियादार को जिसमें दो पैसे न मिलें, भला वह भी कोई काम है ? मेरे मित्र ख़ान मियाँ प्रसंशा भरी निगाहों से हर पोस्ट पढ़ते तो हैं, फिर एक उबासी मिश्रित लंबी साँस छोड़ कर कुछ बेचारगी से कंमेंट देते हैं," अँमें डाक्टर, तुम इस लाइन में कहाँ आ गये ?" हमारे ब्लागर बुज़ुर्गवार ख़ास तौर पर ज्ञानदत्त जी कृपया स्पष्ट करें यह ब्लागर किस लाइन में शुमार किये जायेंगे । कभी कभी ख़ान लगभ ऱिज़ाइन भी कर जाते हैं, " पता नहीं तुमको इतना टाइम कहाँ से मिल जाता है ! " डाक्टर भटनागर ( मेरे अग्रज ) फ़सोस ज़ाहिर करते हैं,' झक्की है, इतना समय अगर अपने प्रोफ़ेसन में गाता तो कुछ बात होती ।" झक्की इसलिये कि जब भी मैं कुछ भी हाथ में लेता हूँ , पूरी ईमानदारी से समर्पि हो कर आकंठ डूब जाता हूँ । बाग़वानी हो ,जानवर पालने का शौक हो, छायाचित्रण हो, रोगनिदान की पेंचीदीगियाँ हों या फिर रोमांस ही हो ( अब तक केवल दो अदद , इससे पहले कि द्विवेदी जी पूछें, मैं स्वयं ही बता देता हूँ।)

पंडिताइन इस रोमांस के शिद्द्तग़ी का वास्ता दे कर, अब भी जबतब अपनी गोटी लाल करने का मौका हाथ से जाने नहीं देती हैं। ऎसा आज ही हुआ , आज शनिवार है यानि मेरी छुट्टी का दिन । पूरा समय घर व घरैतिन को मर्पितप्ताह भर के इक्कट्ठे किये गये पत्रिकायें व अख़बारों के महत्वपूर्ण पन्नों का अवलोकन यानि की अपने इस दुनिया में मौज़ूद होने का एहसास ! आज मेरी स्लिमलाइन (मेरे डेस्कटाप का प्यारभरा निकनेम ) के साथ भी कुछ खुशनुमा घंटे बीतते हैं । सो, आज इसी दिनचर्या को निभाते हुए दोपहर में अपनी स्लिमलाइन से रूबरू होने मन बना रहा था कि झक्क से पंडिताइन प्रगट हुईं ।" ये क्या ? तुम हाँ आकर बैठ गये, जाकर राम कर लो, कल रात भी 4 बजे तक जागते रहे ।" मैंने झाँसा देना चाहा," कुछ नहीं, बस एक दो कमें करके उठ जाऊँगा। पोस्ट-वोस्ट का कोई पुख़्ता मैटर अभी है ही नहीं, बस एक दो मेंट ही कर लूँ तो उठता हूँ । " अब उनका दूसरा पैंतरा, मनुहार के स्वर में अवतरित होता है, " उठ भी जाओ, बात माना करो, अब बेकार में इस समय कमेंटियाने की ज़िद न करो।" पति एक पालतू जीव हुआ करता है, सो पंगा क्या लेना? अनमना सा थोड़ी देर को उठ तो गया,किंतु मन में गुंजायमान था, आज कमेंटियाने की ज़िद न करो..


लो जी लो, यह तो एक भरपूर गदराये पोस्ट का जुगाड़ हो गया । सो, मन बना लिया कि आज इसी को टान दिया जाय ( টেনে দি - मूल शब्द बांग्ला टेनॆ दे बोले तो खींच लो ) !! मौका व माहौल सही है !

कमेंट की बड़ी महिमा है, मित्रों । मानो या न मानो, एक पोस्ट ठेलते ही प्रतीक्षा शुरु हो जाती है , कमेंट्स की ! अरे ठीक है भाई, आगे से टिप्पणी बोलेंगे । घड़ी घड़ी मेरा दिल धड़के... हाँ धड़के, आज कमेंट के विन्डो में ! यह हिट और पिट का मामला हो जाता है , दोस्तों ! ऎसा नहीं है कि जो दे उसका भला, जो न दे उसका भी भला । स्वांतः सुखाय का दम भले भरा जाय किंतु परांतः दुःखाय श्रेणी के लोगों की बहुतायत देख रंज़ न होता हो तो आप यहाँ क्या कर रहे हैं, यह विचारणीय प्रश्न है । अन्यथा न लें, यदि एकाध टिप्पणी रेंग कर आपके हाते में आती हैं, तो सवा इंच मुस्का आपके चेहरे पर न आती हो ऎसा घोर असंभव हो ही नहीं सकता । नहीं आयी तो ? यह तो चलता ही है..अभी हिन्दी ब्लागर उतने परिपक्व नहीं हैं.. बड़ी गुटबाजी है, यार.. इत्यादि त्यादि सांत्वनायें आपका मन बहलाती हैं । आप कम से कम अपनी पत्नी के सामने तो शर्मसार होते ही रहते हैं । यह तो आपकी चतुरता पर निर्भर है कि आप उन्हें क्या समझाते हैं..मसलन, 1. सबके पा ब्राडबैन्ड थोड़े ही न है, पेज़ ही नहीं खुला होगा 2. हमने एच०टी०एम०एल० कुछ ज़्यादा ही डाल दिया है, सबके बस का नहीं है ( अब अगले को एच०टी०एम०एल० में गोते लगाने को छोड़ आप आगे सरक लीजिये ) 3. पाण्डे जी का दूसरे विभाग में तबादला हो गया (गोया वह अबतक रेलवे ब्लागिंग एंड अपलोडिंग डिपार्टमेंट की शोभा बढ़ा रहे थे ) गैरह.. .. सुनने में तो यह भी आया है कि जल्द ही किताब भी आने वाली है... हाऊ टू एब्सटेन फ़्राम पोस्टिंग कमॆंट्स - 100 रीज़न्स मेड ईज़ी बाई शास्त्री एंड रतलामी बुरा मानो होली है

अपनी अपनी व्याख्यायें हैं, मेरी वाली तो नितांत भोंड़े किसिम की है । यह मेरा नहीं बल्कि मेरे एक महकमे विशेष में होने का दोष है, इसलिये बताने में हर्ज़ नहीं दिखता कि कमेंट देने से परहेज़ एक प्रकार से हिन्दी ब्लारों की इंटरनेटी नसबंदी है, इनकी आबादी तेजी से बढ़ने से रोकना होगा । भला चंद एग्रीगेटर कैसे संभा पायेंगे इनको , शायद सेग्रीगेटर की पोस्ट क्रियेट करने की नौबत आ जाय । 2010 तक विज्ञापनों की सुनामी आने वाली है, हिंदी ब्लागिंग में । सबका पेट कहाँ से भरेंगे, गूगल बाबा ? समय रहते चिंता करना शुरु कर देने में ही भलाई है ।

दिशाप्रदर्शक टार्चों की बैटरी चुक गयी होगी तभी तो प्रकाश डालने में राशनिंग चल रही है । अपना रास्ता टटोल अँदाज़ के स्वयं चुनो भईया, गड्ढा खाई यहाँ कोई बताने नहीं आयेगा । कोई डाक्टर तो बोला नहीं था कि जाओ आँख फोड़ो और अपना जीवन सार्थक कर लेयो । उल्टे डाक्टर खुद्दै इस बीमारी से ग्रस्त दिख रहा है यहाँ, तो तुम काहे को अपने मन में मैला ढो रहे हो। लिक्खो..लिक्खो या मत लिक्खो लेकिन कमेंटियाने की ज़िद न करो । बुढ़ऊ जाग जायेंगे !!























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4 सनद, आपकी नज़रों में:

अनूप शुक्ल said...

चलिये आपकी बात मानते हैं और टिप्पणी की जिद छोड़ देते हैं।

दिनेशराय द्विवेदी said...

गुरू, होलाष्टक शुरू। आप और हम भी शुरू। क्या मजा बांधा है। इन स्वनामित धन्याधन्य डॉक्टर अमर कुमार जी ने। (चित्र से तो कुमार नहीं लगते जैसे हम वाकई चित्र जैसे कुमार नहीं लगते)अपनी पोस्ट के दो चरण बोले तो पैरे होलिया दिए हैं। इन्हे जरा कमेंट विन्डो में शो ओरिजनल पोस्ट में जा कर पढ़ लें वरना असली स्वाद से वंचित रह जाएंगे। खुद कमेंटियाने की जिद पर अड़े हैं और खुद के कमेंटस् पर शब्द प्रमाणन (वर्ड वेरीफिकेशन की तख्ती टांग रक्खी है। जैसे दरवाजे पर कैटल कैचर। होली भी खेलनी है और डर भी रहे हैं। दरवाजे पर ताला और खुद छत पर खड़े पिचकारी मार रहे हैं। कोई इन्हें कमेंटिया न जाए, कोई रंग न जाए इन्हें। डाक्टर साहब हमें ये ताला खोलना आता है। लो रंग ही दिया न आप को। लो अब तो भाभी भी हँसती हुई रंग की बाल्टियां लिए चली आ रही हैं। जरा बचने का जुगाड़ कर बचुआ।

रवीन्द्र प्रभात said...

भाई, आपकी बातों में दम है , मानना पडेगा और टिप्पणी की जिद्द छोड़ना पडेगा ...!

Udan Tashtari said...

हम तो कभी ऐसी जिद्द करते कहाँ हैं? :)


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