जो इन्सानों पर गुज़रती है ज़िन्दगी के इन्तिख़ाबों में / पढ़ पाने की कोशिश जो नहीं लिक्खा चँद किताबों में / दर्ज़ हुआ करें अल्फ़ाज़ इन पन्नों पर खौफ़नाक सही / इन शातिर फ़रेब के रवायतों का  बोलबाला सही / आओ, चले चलो जहाँ तक रोशनी मालूम होती है ! चलो, चले चलो जहाँ तक..

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25 April 2008

ओऎ...ब्लगिया का सब्ब झस लेई गयो रे...

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ब्लागिंग पर तो हमजैसे निट्ठल्लों और ठेलुओं का एकाधिकार समझत जात रहा । जहाँ बड़कन में से एकाध जन भी, कभी भूले भटके नाकौ छिनकै नहिं आवत रहे, उहाँ पेट भर कै अघाय  भये, मनई भी मुँह  उठाय  घुसै चले आरहें हैं  । फ़ुरसतिया फेम के सुकुल महाराज अबतक इलाहाबादी बाहुल्य से पीड़ित रहे, अउर  एक  कउनो  बुढ़वा गंगा किनारेवाला भी फाट पड़ा बिलंगिया में । फाट पड़ा  तो फाट पड़ा, भला हमार काहे का  फटे ?  ईहाँ रोजई दुई तीन टपकत हैं, मुफ़त के चंदन घिस मेरे लल्लू । हमरे घरे से तो कुच्छ जाय नहीं रहा ! लेकिन ई  बुढ़वा गंगा किनारे वाला इहाँ का कर रहा है, यही जानै का हमरे पेट मा दरद उठि  रहा हवे । हमहू लपकेन कि आओ तईं देखि लेई , बिरादरी वाला है । लिक्खै, नाचे गावे का घुन भी मिला भवा है, ई पुराने चावल मा , तौन स्वाद न मिलिहे तो खुसबू थोड़े रूकि जाई । तनि सूँघि-साँघ के लउट आवा  जाई , कुच्छो  नहिं तो एक टिप्पणिये से नेवाज़ देबे, देखिहें तो अपने लड़कई में हमरे हाथ का लप्पड़ तो यादै आजाई । हमसे बड़े रहें, सो अब न बतावें, ई उनका ईमान जाने । हमतो गुमटी नम्बर पाँच पर बसंत सिनेमा में अभिमान के आठ टिकट बिलैक करके बहुत पहले एहिका प्रायश्चित कर लीना ।बताओ भला, जौन हाथे से वोहिका एकु लप्पड़ में सुधार दिया,वहि हाथन सेटिकटो ब्लैक किया रहा !

                                                                                                                                                                                       बिलगिया का सब झस लेई लियो रे-अमर दईया रे दईया, अब फ़ुरसतिया का करिहें-अमर                               

तौन टिप्पणी-विप्पणी करै का हौसला उहाँ जातै जात पंचर हुई गा । नहिं भाई , तनिक सँसिया तो लेय लेई, अबहिन बताइत है । उनकी बिलगिया देखतै हम डेराय गये, नहिं ई बात नहीं है, जौन तुम सोच रह्यो है, हमतो इससे भी ज़्यादा नम्बरी चौंचक अउर  बम्पर फोकसिया बिलाग देखे भये हन । टिप्पणी करै वालेन की भीड़ देख हमका अपना चिरकुट ब्लाग की सुधि आय गई रही । ससुर यहू कौनों बिलागिंग है ? सबै एक दूसरे का लुहाय रहे हैं, आओ आओ तनि टिपियाय तो लेयो, सुआगत है, लिखबे तो हम हिंदिन मा, हिंदी महतारी के सेवा की सुपाड़ी मिली है, ब्रह्मा से ! मुला टिप्पणी बरे अंग्रेज़ी से भी कौनो परहेज़ नहीं है । अंग्रेज़ी टिप्पणी से तो हिंदी महतारी का सम्मानै बाढ़ी । टिप्पणीक्षुधा शांत होय से मतलब है । को बनाइस-को खवाइस, ई सब संकीर्ण मानसिकता वालेन का परहेज़ है।हमरे इहाँ जो आवै,  आवै देयो भाई, सब शुद्ध है !हमरे जइसे कंगले को सूखी रोटी मिल जाय, भले स्वाहिली-काहिली,हिब्रू-डिब्रू ब्रांड सड़े आटे का होय ! आंग्ल-बांग्ल का कौन सवाल,वसुधैव कुटुंबकम !

अगर इहाँ से अबै नहिं भागे हुओ, तौ पूछि तो लेयो, हम डेराय काहे से गये .. चलो हमहिं बताय देइत है । टिप्पणिन देखि कै ! भगवानौ अंधेर मचाये पड़ा है, अरे हमार फिकिर नहिं करैं, लेकिन हमरै गुरुअन का तो बक़्स देंय । लोगन की सक्रियता कउने बिल मा बिला जाई, ई महेशौ न बताय पईहैं । धाक की धोती संभारब मुश्किलै जनाय रहा है, अइसन तमाशे मा, हुँह !

तारीख 24.4.08 पोस्ट समय 1.39 PM , मेरे द्वारा देखी गयी  2.50 PM, तबतक प्राप्त टिप्पणियाँ - मात्र 80, अरे रुको तो भाई तारीख 24.4.08 पोस्ट समय वही 1.39 PM, मेरे द्वारा देखी गयी 10.43 PM, तबतक इसी पोस्ट पर प्राप्त टिप्पणियाँ- 215   अब जरा देखा जाय सक्रियता, तारीख 24.4.08 को लिखे गये पोस्टों का समय-  1.39 PM, 4.51 PM, 5.11 PM रात्रि 10.43 PM तक प्राप्त टिप्पणियाँ - क्रमशः  215, 93,186 ल्ल्ल्ल्ल्ल्ल्ल अब आप ही बताइये कि मैं आख़िर बौखला क्यों रहा हूँ ? क्योंकि ? मेरी हरहा बुद्धि में यह नहीं घुस रहा है कि नवरंग तेल, हाज़मोला वगैरह बेचने का समय इसमें कहाँ छिपा है ?  फिर शूटिंग, जलसे, बयानबाजी ( इंटरव्यू ) इत्यादि अलग से । कहीं यह भी कैडबरीज़ वगैरह सरीखा ही कोई उत्पाद तो नहीं ?

हटाइये मुझको क्या पड़ी है ? बेकार समय बर्बाद किया, इतनी देर में तो शाह हनुमानुद्दीन का साक्षात्कार ही पूरा कर लेता । तो कल कोशिश करूँगा कि इधर न आऊँ,क्योंकि हम पाद भी देते हैं तो हो जाते बदनाम, वह लिसड़े पड़े हैं फिर भी चर्चा नहीं  होता। कुल मिलाकर ऎसा ही लगता है, कि..किस्मत उन्हीं के साथ है । भले ही गाने वाले गाया करें, " ब्लगिया के सब झस्स लई लियो रेऽ ..ऽ ..ऽ, ई इलाहाबादी बुढ़ौना...उड़ उड़ बइठे  पुराणिक दुकनियाऽ ..ऽ ओःहोऽ..उड़ उड़ बइठे फ़ुरसतिया दुकनियाऽ ..ऽ ..ऽ  , धाक्क सक्रीएता सब लई लियो रेऽ ..ऽ, ई इलाहाबादी बुढ़ौना..होऽहः ब्लगिया के सब झस्स..ऊँ उँ उँ ऊँ॓ऽ  ऊँ ऊँ ऎंँआँ आँई  ऊँऔआँ 

1 टिप्पणी:

अनूप शुक्ल का कहना है

काल्हि ते लगातार देखि रहे हैं डाक्साब! आजु पढि़ पायेन। मजा आ गवा। यहौ मजेदार जानकारी मिली कि आप जौन है तौन टिकटौ बिलैक कर चुके हैं, झापडौ मारि चुके हौ। वाह वा! शानदार! लिखत रहैं। हौसला बनाये रहैं! डेराय कि कौनौ जरूरत नहीं। हम हैं न!

लगे हाथ टिप्पणी भी मिल जाती, तो...

आपकी टिप्पणी ?

जरा साथ तो दीजिये । हम सब के लिये ही तो लिखा गया..
मैं एक क़तरा ही सही, मेरा वज़ूद तो है ।
हुआ करे ग़र, समुंदर मेरी तलाश में है ॥

Comment in any Indian Language even in English..
इन पोस्ट को चाक करती धारदार नुक़्तों का भी ख़ैरम कदम !!

Please avoid Roman Hindi, it hurts !
मातृभाषा की वाज़िब पोशाक देवनागरी है

Note: only a member of this blog may post a comment.

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यह अपना हिन्दी ब्लागजगत, जहाँ थोड़ा बहुत आपसी विवाद चलता ही है, बुद्धिजीवियों का वैचारिक मतभेद !

शुक्र है कि, सैद्धान्तिक सहमति अविष्कृत हो जाते हैं, और यह ज़्यादा नहीं टिकता, छोड़िये यह सब, आगे बढ़ते रहिये !

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