जो इन्सानों पर गुज़रती है ज़िन्दगी के इन्तिख़ाबों में / पढ़ पाने की कोशिश जो नहीं लिक्खा चँद किताबों में / दर्ज़ हुआ करें अल्फ़ाज़ इन पन्नों पर खौफ़नाक सही / इन शातिर फ़रेब के रवायतों का  बोलबाला सही / आओ, चले चलो जहाँ तक रोशनी मालूम होती है ! चलो, चले चलो जहाँ तक..

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10 May 2008

दुल्हन वही जो ....

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यहाँ तक तो आगये, अब खीज हो रही होगी । फ़ोकस बहुत बनाये पड़े हैं, और घिसे पिटे शीर्षक देकर लोगों को बेवक़ूफ़ बना रहे हैं ।          सीधी सी बात है, दुनिया मानती है कि दुल्हन वही जो पिया मन भाये

एकदम बरोबर सोच रहे हैं, आप । फिर आपकी इस ज़ायज़ सोच में मेरा असहमत मौन क्यों कुलबुला रहा है ? यह तो मैं भी मानता हूँ कि   बरदे की खुर सींग दाँत देखने की ही तरह, अभी भी कन्या यानि कि भावी दुल्हन के रूप गुण की कई कई बार बड़ी तगड़ी स्क्रूटिनी की जाती है ।  आज लड़के की बुआ देख कर गयीं हैं, तो कल मामीजी पधार रहीं हैं । अगले हफ़्ते सुना है कि लड़के के जीजा अपनी होने वाली सरहज को टटोलने आ रहे हैं, उनकी भी पसंद का ख़्याल रखा जा रहा है । आखिर घर के दामाद हैं । पाहुन रूठ गये तो शादी की किरकिरी हो जायेगी ।

चलो भाई, मान लेते हैं यह चोंचले । आख़िर बेटी जो ब्याहनी है । किंतु इस पूरे परिदृश्य में लड़का आख़िर कहाँ है ? शायद आता ही नहीं है ।    हाँ यदि तगड़ा कमाऊ है, मल्टीनेशनल का नौकर है, घूस वाली पोस्ट पर काबिज़ होनहार सरकारी अफ़सर, बाबू वगैरह है, तो उसे भी आख़िर में एक मौका मिलता है, जाओ भाई तुम भी देख आओ तो बात आगे बढ़े, बल्कि फ़ाइनल ही कर देना । फिर कुछ एडवांस-उडवांस लिया जाये ।     का कहते हैं सुकुल जी, जो जग का रीत है, ऊ तो निबाहना पड़ेगा न ? और छोटे नबाब अपनी कालेज के दिनों की सहपाठिनियों के चेहरे याद करते हुये चल पड़ते हैं, अपने लिये दो टाँग की गईया एप्रूव करने । चोखेरवालियों, आप कुछ कहेंगी, नहीं ? यह शोर क्यों मचा करता है या मान लीजिये कि मच रहा है, दुल्हन वही जो पिया मन भाये Love Struck

साइलेंस !Time out

छोड़िये, जब सुकुल जी मान रहे हैं कि जग की रीत के हिसाब से ई सब कस्टम कोनो बेज़ा नहीं है, तो पांडेय जी भला मुँह खोलेंगे , धुत्त ?   फिर ? फिर मैं यहाँ क्या कर रहा हूँ ? आज ही मेरे बढ़ते वज़न का क्लू मिला है, आज तो चैन से लंबी तानी जाये । पंडिताइन यानि कि मेरे   हर सुख आराम की सौतन, टपक पड़ीं," ये क्या करने जा रहे हो ? इतने लोगों को दुल्हन का टाइटिल दिखा कर न्यौत लिया है, अब भाग रहे हो । अच्छा जाओ, तुम्हारे बेबी का फोन आया है, जल्दी बात करके आओ । आज फिर न चिपक जाना, उसकी आधी बात तो मेरे पल्ले ही नहीं पड़ती है "

बेबी यानि कि डाक्टर देवेन्द्र श्रीवास्तव, ओरई (जालौन) में अपनी स्वयं की क्लिनिक धूम से चला रहे हैं, झाँसी रोड पर नर्सिंग होम भी है । उनका फोन अक्सर आधी रात में ही आता है । मेरे कनपुरिया बैचमेट व अभिन्न सखा । बेबी और बाबी की जोड़ी मेडिकल कालेज़ में हर अच्छे बुरे कामों  के लिये प्रसिद्ध हुआ करती थी । बाबी यानि कि मैं ! बैच में हम दोनों ही सबसे कमसिन थे, अनायास जोड़ी बन गयी, और खूब बनी । अक्सर ही वह रात में गहरे सुरूर में पाये जाते हैं, और तभी शायद बीते दिनों के संदर्भ में मेरी याद आती होगी । आधे घंटे से कम बात नहीं होती ।Kiss

फोन उठाते हुये मेरे मन में चल रहा था,' आज एक पोस्ट लिखने की ठानी थी, और यहाँ दुल्हनिया के चक्रव्यूह में फँसा था, बेड़ागर्क करने अब ये आगये । ' हेल्लो बेबी...मैं उनसे और वह मुझसे उलझ गये । क्या कर रहे थे ? पोस्ट ? इतनी रात में किसको पोस्ट कर रहे हो, बात करूँ भाभी से..?...सँभल जाओ किसी चीजके ! साले सुधरोगे नहीं, खखेड़ करने की आदत नहीं गयी, अब तक ? बेचारा बेबी मेरी मुहब्बत में हर इतवार को मेरे साथ परेड जाया करता था, और मैं उसको छोड़ के रविवार को लगने वाले मार्केट परेड बजार में गुम हो जाता था, पुरानी किताबों की तलाश में । समय का अंदाजा न लग पाता और अक्सर निरमा वाशिंग पाउडर निरमा के वक़्त या उससे भी बाद में हम पिक्चर हाल में घुसते थे । लिहाज़ा वह झींकता झगड़ता हुआ थक कर गहरी नींद में सो जाता था, सिनेमा ख़त्म होने पर फिर वही मुझको, मेरे होने को, मेरे सेल्फ़िशपने को कोसने का सिलसिला चालू हो जाता, जो डिनर के बाद मेरे बिल अदा करने पर ही शांत होता । हम चुपचाप कैप्सटन फूँकते हुये लौटा करते ।

चलो, आज बेबी के सितम झेल ही लूँ, उफ़्फ़ न करूँगा चाहे जितनी भी देर तक बलबलाये । उसने पोस्ट का पोस्टमार्टम फिर शुरू कर दिया, क्या पेल रहा है, पोस्ट में ? क्या कहा, दुल्हन ?  पिया मन भाये ? हा हा हा.. उसके ठहाकों से मेरा खून जल रहा था, लेकिन उसकी उधार देने की उदारता को याद कर, मैं  एक खिसियायी संगत की तर्ज़ पर अँए अँए करता रहा । वह थमा, "अबे ज़मीन पर आजा राजश्री के भँड़वे, किस दुनिय में रहता है ?" और कुछ बताने लगा..... आपको भी बताऊँ कि क्या बताया ? Peace Sign

अपने भारत महान के बृहत्तर प्रदेश, उत्तर प्रदेश में बुंदेलखंड हुआ करता है, कल कौनखंड होगा, इसका नाम क्या होगा , हमें क्या लेना देना ! इस समय पिछले कई वर्षों से, बल्कि दशकों से, पानी की किल्लत से बुरी तरह जूझ रहा है । यह किल्लत इस कदर यहाँ के वासियों की नसों में रच गयी है कि अब रोटी बेटी के संबन्ध पानी की उपलब्धता से संचालित होते हैं । एक गाँव से बेटी का बाप, दूसरे गाँव रिश्ता करने जाता है, तो यह तसल्ली कर लेता है कि बावड़ी, पोखर या नदी जमाई के घर से ज़्यादा दूर तो नहीं है ? दिखा दिखाई पर अब तक तो कोई जोर नहीं रहता था, किंतु अब आंशिक रूप से अनिवार्य हो गया है । अनिवार्य..वह भी आंशिक, जम नहीं रहा ! अनिवार्य बोले तो लड़के वाले बिना लड़की देखे, रिश्ते के लिये हाँ  तो करते ही नहीं, औ..र आंशिक बोले तो वह पूरी लड़की नहीं बल्कि उसकी गठन और ख़ास तौर पर बाँहें देखते हैं । चेहरे का क्या करना ? घर में पानी कोई खूबसूरत चेहरे के जोर से तो आने से रहा, जैसा भी हो ! पानी भर कर लाने के लिये मज़बूत बाँहें और दमदार शरीर की आवश्यकता होती है, वह है तो ठीक वरना अपनी कोमलांगी को बैठाये रहो घर में, इन्ने तौ राज्जा के मैअल जाणा है  के ताने सुना करो । यह तो बड़ा गड़बड़ हो गया मित्रों, मुझे अपनी पोस्ट के क्लाइमेक्स का फ़ज़ीता होता दिख रहा है, किंतु सच को कैसे नकार दूँ ? चलो, ठीक भी है......

दुल्हन वही, जो पानी भर लाये 

                           पनघट-अमर पनघट_अमर

अब आप मग़ज़मारी करो कि भारत सरकार 2010 से 2012 तक महाशक्ति के रूप में दुनिया के तमाम देशों को पानी पिला देने का स्वप्न देख रही है, वह किस मुरव्वत में अपने देशवासियों को पानी नहीं पिला पा रही है ? मेरी पोस्ट का लालित्य जाता रहा वो अलग....चलते हैं, हुक़्म ?

4 टिप्पणी:

Gyandutt Pandey का कहना है

वाह! कोटा से चित्तौड़गढ़ की एक रेल लाइन बनी थी
उसपर एक रेल क्रॉसिन्ग बनाने का रिप्रजेण्टेशन आया था गांववालों का। कहना था कि अगर क्रॉसिन्ग न बना तो महिलाओं को पानी लेने जाने के लिये लम्बा चलना होगा। नतीजा होगा कि उस गांव के लड़कों को रिश्ते मिलने बन्द हो जायेंगे! :)

दिनेशराय द्विवेदी का कहना है

शीर्षक ही गलत लग गया। होना चाहिए था। दुल्हन वही जो पानी भर लाए।

Udan Tashtari का कहना है

दिनेश बाबू से सहमत हूँ, बदलिये शीर्षक. हा हा!!!

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आप हिन्दी में लिखते हैं. अच्छा लगता है. मेरी शुभकामनाऐं आपके साथ हैं, इस निवेदन के साथ कि नये लोगों को जोड़ें, पुरानों को प्रोत्साहित करें-यही हिन्दी चिट्ठाजगत की सच्ची सेवा है.

एक नया हिन्दी चिट्ठा किसी नये व्यक्ति से भी शुरु करवायें और हिन्दी चिट्ठों की संख्या बढ़ाने और विविधता प्रदान करने में योगदान करें.

यह एक अभियान है. इस संदेश को अधिकाधिक प्रसार देकर आप भी इस अभियान का हिस्सा बनें.

शुभकामनाऐं.

समीर लाल
(उड़न तश्तरी)

अनूप शुक्ल का कहना है

इतनी दूर पानी भरने जाना पड़ता होगा। बड़ी लकलीफ़ है। आप इस तकलीफ़ को बयान कर रहे हैं, बहुत अच्छी तरह!

लगे हाथ टिप्पणी भी मिल जाती, तो...

आपकी टिप्पणी ?

जरा साथ तो दीजिये । हम सब के लिये ही तो लिखा गया..
मैं एक क़तरा ही सही, मेरा वज़ूद तो है ।
हुआ करे ग़र, समुंदर मेरी तलाश में है ॥

Comment in any Indian Language even in English..
इन पोस्ट को चाक करती धारदार नुक़्तों का भी ख़ैरम कदम !!

Please avoid Roman Hindi, it hurts !
मातृभाषा की वाज़िब पोशाक देवनागरी है

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शुक्र है कि, सैद्धान्तिक सहमति अविष्कृत हो जाते हैं, और यह ज़्यादा नहीं टिकता, छोड़िये यह सब, आगे बढ़ते रहिये !

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