जो इन्सानों पर गुज़रती है ज़िन्दगी के इन्तिख़ाबों में / पढ़ पाने की कोशिश जो नहीं लिक्खा चँद किताबों में / दर्ज़ हुआ करें अल्फ़ाज़ इन पन्नों पर खौफ़नाक सही / इन शातिर फ़रेब के रवायतों का  बोलबाला सही / आओ, चले चलो जहाँ तक रोशनी मालूम होती है ! चलो, चले चलो जहाँ तक..

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18 August 2008

मुझे इतना ज़लील भी न करो.. बेटों

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अरे यह शीर्षक कैसे चला गया ? यह तो मैंने सहेज़ कर किसी और पोस्ट के लिये रख छोड़ा था । चलिये.. भगवान की मर्ज़ी या मेरे अवचेतन का चोर ! बचपन से घुट्टी पिलायी गयी है.. जो होता है, अच्छे के लिये ही होता है । सो, इसी को चलने देते हैं !

लोगों के मेल आ रहे हैं, सक्रिय नहीं हूँ । तो, भाई क्या करें ? मुलुक की सक्रियता तो दूसरे पाले में बैठी ठेंगा दिखा रही है । तो हम उसके अपने पाले में आने का इंतज़ार ही तो कर सकते हैं ? सो विकास के प्लेटफ़ार्म पर टहलते हुये देख कर भी, यदि मैं आपको निष्क्रिय लगता हूँ, तो लगा करे ! अरे कुछ नहीं तो, इस वेबपेज़ को ही निरख लीजिये, भाई..कितने ईंट रोड़े बटोरे हैं !

                                                                  mail (4)

सोचा कि पन्दरहा अगस्त पर कुछ लिखूँ, अच्छा अवसर है.. देश के लिये, भारत माता की लुटती अस्मिता पर चिन्ता जताने वालों में अपना भी नाम दर्ज़ करा लूँ, लेकिन… ? यही तो मेरी तक़लीफ़ है कि सोचता ही सोचता हूँ, करता कुछ भी नहीं । चाय पी कर चायवाले को पैसे देने में जितना भी समय लगता है, उसका सदुपयोग सोचने में ही करता हूँ ! यह कोई कम है, क्या ? सोच लेता हूँ.. वह भी आलू, टमाटर, बैंगन, करेले के भाव पर नहीं, बल्कि देस-मुलुक के हालत पर.. यही क्या कम है ? वरना यहाँ तो 88 फ़ीसदी पब्लिक तो सोचने लायक भी न रही । अपने को ज़िन्दा रखने की, होः तूऽऽ तू.. चल्हः कबड्डी कबड्डी कबडी कबडी कबडि कबडि बडि बडि बड्डिः बड्डिहः हः हः …में हाँफ कर जैसे तैसे साँझ ढले अपने पाले में लौट गुईंया संग लेट लेते हैं । सो, सोचने का चारज़ आजकल हमईं लोगन के पास है, उनके बिहाफ़ पर सोच लेते हैं, चिन्तित हो लेते हैं । और क्या चाहिये ?

पंडिताइन थोड़ी चिन्तित भाव से पूछती हैं, “ ऎई, कुछ लिखोगे नहीं.. देखना सबलोग पंद्रह अगस्त पर कितना लेख-ऊख लिखेंगे, और तुम रोज़ खटर पटर करते रहते हो.. यह नहीं कि कुछ लिख ही डालो । अब नाटकीय हुये बगैर, मेरी गुज़र नहीं.. सो, जो आज्ञा, चोखेरवाली-सखी ! फिर भी मैं अपना झोला-पिटारी टटोलता हूँ, कि शायद कुछ आफ़-बीट हाथ ही लग जाये ? देखते हैं !

jhar111

वह चीख उठी, “ पवित्र-पावन पर्व पर.. मुर्दाबाद ? हे भगवान, इस आदमी को हो क्या गया है ? “ क्या बवाल है, भाई.. मेहरिया से दोस्ती, समझो जी का ज़ंज़ाल ! ऎ भाई, बोलना मत बीच में, पूरा नहीं हुआ है, दूसर के लुगाई से दोस्ती, समझो आँधी भूचाल ! सोचा, थोड़ा खीझने की होती है, “बोला था न कि, हमरे बिलागींग को न भड़काओ.. अरे मनगढ़ंत फोटू थोड़े ही है, यह ? न ही ‘पाकिस्तान से आयी है’ का डिस्क्लेमर लगाया है । यह तो ख़ालिस अपने देश की छाती चीर कर चलती हुयी भारत की जीवनरेखा जी.टी. रोड पर ली गयी है ।  अरे यार.. वही जी.टी.रोड जो शेरशाह सूरी बनवा कर, हमारी गौरमिन्ट के लिये सिरदर्द छोड़ गया, जो इसके रखरखाव में ही काँख रही है । यह हमारे मुलुक की अर्थव्यवस्था का अनर्थ करने का अंतर्राष्ट्रीय षड़यंत्र करार दिया जाता, अंग्रेज़ इस रास्ते से सोना ढो कर ले गये, वो अलग ! उस ज़माने में सी.आई.ए. या आई.एस.आई. न होने का अफ़सोस भला किस पार्टी को न होगा । ई बिलागींग बड़ी बेलाग चीज़ होती है, यारों.. बेलाग = बेलागिंग = बेलगाम ~~.आगिंग !

सो हम बेलगाम हुई गये थे । तोऽ.. फोटो खींचा गया, मुनमुन  ( मेरी बेटी ) के कोडक हाटशाट से । ना, ना.. हाटशाट की वजह से यह हाट नहीं है, न ही कोडरमा के पास के गाँव के मंदिर की दीवार पर उकेरे जाने से, और ई मुर्दाबाद – ज़िन्दाबाद तो भाई गाँधी-ज़िन्ना की विरासत है, सो हमलोग इसको आगे नहीं बढ़ायेंगे, तो क्या हमारी आईपाड  पीढ़ी इसको संभालेगी ? उसने तो एक आसान रास्ता खोज निकाला है, जो अच्छा न लगे.. असहमत हो.. ज़्यादती हो गयी…  पेरेन्ट आउटडेटेड हैं…  बस, शिटशिटा के विरोध कर दो..ओहः शिट यार ! इतिश्री, और  सुनाओ ! सुनायें क्या, कद्दू ? आज तो जैसे इस कीबोर्ड से शिट ही निकल रहा है !

तो, मित्रों.. मैंने जानबूझ कर इस भित्तिलेख के मज़मून को धुँधला कर दिया है, क्योंकि यह हमारी व्यवस्था के शिट को दिखाय रहा है, सामाजिक न्याय माँग रहा है, माल पेलते नेतृत्व से ज़वाब तलब कर रहा है..काहे भाई, ई तो पन्द्राह अगस्त का 61वाँ है !

ई तो राधिका परसाद मास्साब रटा गये थे कि 14 के बाद 15 ही आता है । अब देखिये, कि 14 को एक देश आज़ाद हुआ, पता नहीं, अंगेज़ से कि हिन्दुस्तान से ? लेकिन ऊहाँ राजगद्दी हुई गयी, सो बाकी बचा भी स्वतंत्र घोषित किया गया.. औ’ विश्व में देखा गया एक अद्भुत व्यायाम.. नायक बोला – प्रसन्नचित्त… जनता झूमी – अहा हा हा हा , प्रसन्नचित्त…  अहा हा हा हा ! तिस पर भी आप सब 15 अगस्त पर ईहाँ अच्छा ख़ासा रो गा गये ! जाओ.. देखो जाके, अगड़म-बगड़म पुराण में लिक्खा भया है.. मौत औ’ मार्केटिंग से कोई सयाना भी नहीं बच सकता, तो हम ही काहे को इससे बचने का कलंक लें ? तब के गद्दीनशी़नी की मार्केटिंग  आज तलक चल रही है, सत्ता  एक ऎसा ही अनोखा ब्रांड है, यारों ! 15 अगस्त.. अहा हा हा हा, स्वतंत्र हो..अहा हा हा हा

दोस्त लोग इस मुबारक मौके पर बिसूर रहे हैं, यह उनकी सोच और किस्मत । मैं तो अपने ‘ अहा हा हा हा ‘ के साथ रात के अँधेरे में, चुपके से सुतंत्र भारत माई के पास पहुँचा कि जन्मदिन की बधाई दे आऊँ । हे राम, यह क्या ? वहाँ सचिवालय पर तो जगमग रोशनी और यहाँ टिमटिमाते ढिबरी का अतिमंद प्रकाश ! माई पड़ी कराह रही थीं.. चौंका..”माई क्या हो गया ? “ माई ने मुँह ढके ढके उत्तर दिया, “ पता नहीं, बेटा.. बहुत दर्द  हो रहा है । “ अरे कहाँ दर्द हो रहा है, यह तो बताओ ? माई तो उल्टे तैश खा गयीं, खीझ कर बोलीं “ कहाँ कहाँ बताऊँ ? सिर से पैर.. कश्मीर से कन्याकुमारी तक की रग रग दुख रही है । “ फिर अचानक उनके अंदर की माँ चैतन्य हो गयीं, संभल कर उठने का प्रयास करते हुये प्रतिप्रश्न किया “ और बता.. लड्डू वड्डू खाये कि नहीं ? अरे पगले मेरी सुध काहे ले रहा है ? जब से बहाल हुयी हूँ, सब मेरा डिमोशन दर डिमोशन ही तो करते आ रहे हैं । चलो, अपने ही बच्चे तो हैं.. मेरा क्या ? मेरी तो बहाली के 61 पूरे हो गये.. बीमार भी चल रही हूँ…  मुझ बीमार को अब और इतना ज़लील भी न करो, बस  62 में मेरी बची खुची इज़्ज़त के साथ मुझे रिटायर करवा दो ,और अब नूतन माई लाने की जुगत करो,मेरे बेटों ! उनको मुझ लाचार को एक्सटेंसन में मत घसीटने देना । जाओ.. मेरी तरफ़ से  सबको बोलना जय हिन्द !

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ladywinks कहीं कुछ गलत तो नहीं लिख गया ? ढेर सारे स्वर उठे हैं कि मैं तंज़ में लिखता हूँ । क्या ऎसा है ? तो, होने दीजिये कौन मैं रोज़ रोज़ लिख ही पाता हूँ ? आज यथार्थ और व्यंग दोनों इस कदर घुलमिल गये हैं कि उनको अलग करके लिख पाने की विद्वता मुझमें तो नहीं है । ज़बरन आप सब के बीच में घुस जाने से ही क्या होता है ? आप सहनशील देश के नागरिक हैं, सो मुझे भी सह लीजिये । रख़्शंदा को इस तंज़ से तंज़ीदगी है.. तो रख़्शंदा, तुम्हें मालूम हो कि मैं तंज़ानिया के पासपोर्ट पर इस मुलुक में रह रहा हूँ । अब मेरा पासपोर्ट तो बदलने से रहा, भले ही किसी दिन एक्सपायर हो जाये.. वह अलग बात है, देखेंगे ! 

8 टिप्पणी:

अनूप शुक्ल का कहना है

बड़ी पीड़ादायक हालत है मां की। लेकिन उसे रिटायर नहीं कर सकते। भाई कहां मिलेगी ऐसी मां जो खुद कराहे और कहे- लड्डू-वड्डू खाये कि नहीं।

मार्मिक बात।

Anil Pusadkar का कहना है

yatharth hi to sabse bada vyanga hai docsaab,aur aapne bimaar maa ka sahi haal bataya.aap hi sahi nabz pakad sakte hai aur umeed hai aap jaise log hi sahi ilaaj bhi karenge,badhai aapko ek sateek,nirbheek aur marmik post ki.pranaam aapko

कुश का कहना है

is lekh ko padhkar kya kaha jaye.. samjah nahi aa raha.. itna zaroor kahunga ki aapki kalam dhaardhar hai.. magar i-pod peedhi ka kya kare.. wo to sudharti si nahi lagti..

डॉ .अनुराग का कहना है

न न करते भी ससुरे १५ अगस्त पर आपने लिख ही डाला ..भले ही आदरणीय गुरुआइन का बहाना लेकर ....क्या जरुरत थी इत्ती रात गए विचरने की ?आराम से कोई देश भक्त मूवी देखते ओर बीच बीच में रंग बिरंगे एड भी......खामखा माई को परेशां किया ?खैर अब माई ने ठोर ठिकाना बदल लिया है.....कहाँ ये नही बतायेगे?

बालकिशन का कहना है

आपसे पूर्ण सहमति दर्ज करता हूँ.
बहुत सही लिखा.
बधाई.

mamta का कहना है

सटीक लेख।

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` का कहना है

आपका अँदाज़ अलग है
पर बातेँ सारी सच्ची लिख गये हैँ !
आपकी धरमपत्नि जी को,
नमस्कार कहियेगा ~
- लावण्या

Arvind Mishra का कहना है

मैंने सुबह एक टिप्पणी की थी कहाँ गयी ?

लगे हाथ टिप्पणी भी मिल जाती, तो...

आपकी टिप्पणी ?

जरा साथ तो दीजिये । हम सब के लिये ही तो लिखा गया..
मैं एक क़तरा ही सही, मेरा वज़ूद तो है ।
हुआ करे ग़र, समुंदर मेरी तलाश में है ॥

Comment in any Indian Language even in English..
इन पोस्ट को चाक करती धारदार नुक़्तों का भी ख़ैरम कदम !!

Please avoid Roman Hindi, it hurts !
मातृभाषा की वाज़िब पोशाक देवनागरी है

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शुक्र है कि, सैद्धान्तिक सहमति अविष्कृत हो जाते हैं, और यह ज़्यादा नहीं टिकता, छोड़िये यह सब, आगे बढ़ते रहिये !

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