जो इन्सानों पर गुज़रती है ज़िन्दगी के इन्तिख़ाबों में / पढ़ पाने की कोशिश जो नहीं लिक्खा चँद किताबों में / दर्ज़ हुआ करें अल्फ़ाज़ इन पन्नों पर खौफ़नाक सही / इन शातिर फ़रेब के रवायतों का  बोलबाला सही / आओ, चले चलो जहाँ तक रोशनी मालूम होती है ! चलो, चले चलो जहाँ तक..

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03 November 2008

हे भगवान, तो यह सब तूने किया !

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अपनी धरती पर ख़बरों का टोटा पड़ रहा, दिक्खै । पूरी दुनिया दुई दिन बाद सदर ए रियासत अमेरिका के इलेक्शन नतीज़ों को लेकर दुबली हुई जा रही है । शायद ठीकै हों सब के सब, अब ‘कोउ नृप होंहिं.. ‘ वाला ज़माना तो रहा नहीं, सब जागरूक हो गये हैं । ठीक से जग नहीं पाये हैं, उनींदे तौर पर सही..  लेकिन गरियाने वरियाने से आचमन-कुल्ला करने की शुरुआत हुई गयी है, चुभ चंकेत है, यह ! ( पढ़ें शुभ संकेत.. फटीचर टाइप के एडीटर द्वारा इतना सताया गया हूँ, कि अब अपने हाथों ही अपना लिखा एडिट करना, अपने पैर पर कुल्हाड़ी मारने जैसा दर्द देता है.. अउर ई तो कुंजीपटल की चूक है, सो आज आप ही भुगत लो ) ठीक ट्रैक पर जा रहा हूँ, न ? पढ़ो या न पढ़ो, पर है ठीक !

जब अक्खा दुनिया का इंडिपेंडेन्ट देश लोग, सदर ए अमरीका को अपना नृप माने बैठा है, तो आप ही क्यों अलग रहो ? आप भी सच्चे देशभक्त की तरह नृपों के नृप की चिन्ता में दुबले होते रहो ! हम्मैं तो अभी अस्पताल जाना है, मेरा एक जोर-ना-लिस्ट मित्र तीन दिन से कोमा में पड़ा है, देखदाख आयें, नहीं तो पता नहीं ऊप्पर पहुँच के क्या जड़ दे  मित्र है,सो मेरे ख़िलाफ़ कुछ उल्टा सीधा करने का उसको नैतिक अधिकार प्राप्त था । देख ही आयें !

भईय्या, वैसे तो हम्मैं इस वक़्त पूरी जर्नालिस्ट बिरादरी ही आतंकवाद-इनकेफ़ेलाइटिस के कोमा में पड़ी मिल रही है,उनकी पीठ में सेंसेक्स-सोर हुई गवा ऊई अलग से ! फोनवा घनघनाय रहा है.. बड़ा डिस्टर्बेन्स है, भाई ! ई ससुरा न होय, तो हमहूँ रोजै एकठईं साग-भाजी.. उच्च विचार पोस्ट ठेले रही । ई सार का कल्है कटवा देबै.. फोन का ! अरे बाप रे, लगता है कुछ गलत तो नहीं लिख गया ? अजित वडनेकर भाई .. आप दो कोस पर बानी बदल जाने पर इतना परेसान रहा करते हो.. हम यहाँ हर दो पैरा पर भाषा बदल जाने से परेशान हैं । “ ऎई ट्रैक पर लो.. जो भी लिख रहे हो, ठीक से लिखो,” बट नेचुरल, इट इज़ माई एनिमी नम्बर वन… पंडिताइन, दूजा न कोई ! खैर,फोन उठाया, ख़बर थी ब्यूरो चीफ़, स्पष्ट-हुँकार.. मेरे तथाकथित मित्र तोड़ूलाल जी, कोमा से वापस आ गये हैं।

यह तो जैसे चौपाटी के काला-खट्टा जैसी ख़बर थी, अस्पताल तो अब देर से पहुँचो या फ़ौरन.. क्या फ़र्क पड़ता है ? होश में आ गया है,इसके मानी यह कि, अब उदास खड़ी घुटी-टंकार भाभी की पीठ तो सहलाने को न मिलेगी!

लेकिन अपनी घुटीटंकारदेवी वार्ड के दरवाज़े पर ही मिल गयीं, शायद ब्रेकिंग न्यूज़ देने का अवसर हाथ से न जाने देना चाहती होंगी । “भाई साहब ( हत्तेरे की जय हो ! ), भगवान ने उन्हें लौटा दिया,” लपक कर ऎसे बताया, जैसे कोई हादसा गुजरते गुजरते फिर लौट आया हो ! यह आपके पुण्य कर्मों का फल है.. मैंने पिठवा तो छू ही लिया । मन ही मन दाँत पीसे, “साला, वहाँ से भी लौटा दिया गया होगा.. जुगाड़ लगा कर दुनिया से रिहा होना चाहता था, मरदूद !” तो शायद यह आतंक-इनसेफ़ेलाइटिस न रहा हो.. ज़रूर यह शेयर-सट्टा शाक में चित्त हुआ होगा, चीलर ! ख़बरनवीस है, तो उसके चीलर होने में वैसे भी कोई संदेह नहीं ! जहाँ चपट जायेगा.. वहीं तब तक चिपटा कुलबुलाता रहेगा , जब तक अगला लंगोटा ही उतार कर फेंक न दे ! अगर लंगोट न उतरवा ली तो समझो पत्रकारिता  असफल हो गयी ! तभी राजनीति करने वाले, ऎसा कोई वस्त्र ही नहीं पहनते कि उतरने का गम रहे ..

अंदर प्रविष्ट हुआ,बेड के पास दो तीन जन खड़े थे। लगा कि तोड़ूलाल जी धीमे स्वर में कोई व्यक्तव्य दे रहें हैं । पास जाने पर, मेरा संदेह विश्वास में बदल गया ! श्री तोड़ूलाल देवलोक का यात्रा वृतांत बयान कर रहे पाये गये ! मेडिकल की भाषा में इसको डेलेरियम कहते हैं, आम बात है ! लेकिन उनका डेलेरियम प्रलाप तो जैसे ‘पंगु गिरि लाँघे‘ जैसा ज्ञान बाँट रहा था ! लगता है, यह पोस्ट फ़ुरसतिया खेमे में जा रही है.. सो, एक नन्हा सा ब्रेक ले लें ?

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.. हाँ तो, तोड़ूलालजी आप मेरे पाठकों को बतायें कि वहाँ क्या क्या देखा आपने और क्या ख़ास ख़बर तोड़ कर लाये आप देवलोक से..

ईश्वर के सृष्टिसंरचना विभाग में संरचना सहयोगियों की नयी भर्ती हुई है
मैंने देखा कि भगवन प्रशिक्षु सहयोगियों को संरचना रहस्य सोदाहरण समझा रहे हैं
" आप लोग ध्यान दें कि जो भी बनाया जाय, उसमें संतुलन बनाये रखना आवश्यक है "
जैसे ? कई कंठों से एक साथ निकला
जैसे कि यह पोस्ट पूरी पढ़ने वाले धैर्यवान पुरुष
और उचटती दृष्टि डाल कर सरक लेने वाले मूर्ख

निमिष मात्र में परिहास की मुद्रा तज, प्रभु सहज होते भये
जैसे कि हर सौ हिरन पर एक शेर बनाया मैंने
वन बनाया तो दावाग्नि भी दे दी
बात पूरी भी न हुई थी कि किसी अधीर ने
किंचित हलचल मचा कर सबका ध्यान खींचना चाहा
जी श्रीमन , पर यह सभी तो सार्वभौमिक हैं

अच्छा तो यह दे्खिये कि मैंने एक देश अमेरिका बनाया
धन सम्पदा वैभव से समृद्ध देश
किंतु संतुलन के लिये असुरक्षा तनाव व बिगड़ी हुई संतानें दीं
यह रहा अफ़्रीका, प्रकृति के बिखरे सौन्दर्य में बेफ़िक्र बिंदास समाज
किंतु उनको चिड़चिड़े मौसम व हिंस्त्र पशुओं से पाट दिया
यह रहा चीन, चींटियों को मात करने की कर्मठता और दूरंदेशी की मिसाल
किंतु आबादी के बोझ व निरंकुश शासक से त्रस्त रखा इनको
इस प्रकार के संतुलन से हम अपने सत्ता के महत्व को बनाये रहते हैं
बीच में टप्प से एक ज्ञानबघारू जीव टपक पड़ा
पर श्रीमन, यह कौन सा देश है

नक्शे को निरख भगवन मगन होते भये
आह्हः इसकी बात करते हो.. यह तो है देवभूमि भारत
समझो कि मेरा ड्रीम प्रोजेक्ट
बुद्धिमान संतोषी परोपकारी वीर किंतु सहिष्णु मनुष्यों से अँटा भूखंड
खूबसूरत पर्वतों , झरनों व स्वर्णिम परंपराओं का देश
अनेकता  में एकता यह एक लघु स्वर्ग

इतने में एक टिप्पणी आयी


किंतु प्रभु, यह तो पक्षपात है
आखिर इनको उलझा कर संतुलित रखने की व्यवस्था क्यों नहीं दी आपने
भगवन विहँस पड़े, इस नादान प्रश्न पर..
ध्यान से देख.. इसके दायें बाँयें के पड़ोसी देश, फिर कोई शंका कर, रे मूढ़ !

मैं वहीं ठिठक गया, हे भगवन, तो… यह सब तूने किया है

नमस्कार, कृपया नोट करें, तीन बजने में अभी दो घंटे बाकी है

पोस्ट सौजन्य – रजनी की सुवास एवं बाबा का ज़र्दत्व

10 टिप्पणी:

कविता वाचक्नवी का कहना है

आज दिन भर आपकी टिप्पणी की प्रतीक्षा थी, अब तक नहीं आई...
सो खोजते यहाँ तक पहुँची। आप अमेरिका की सैर पर निकले पाए गए। बढि़या है,....

Mrs. Asha Joglekar का कहना है

क्या बात है भगवान जी के संतुलन की ।

अनूप शुक्ल का कहना है

क्या बात है। वाह। शानदर पोस्ट। मज्जा आ गया पढ़कर। संतुलन के जलवे दिखे। गुड है जी!

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi का कहना है

बड़े भाई! बीच में ही छोड़ भागे, यह तो बताते जाते कि ये सब करा धरा वाकई भगवान जी का है या फिर तोडूलाल जी का ही है? खैर तीन बजे वाली क्लास का इंतजार रहेगा।

Arvind Mishra का कहना है

इश्वर तो लीला करते भये हैं !

डॉ .अनुराग का कहना है

अपनी समझ में कुछ नही आया गुरुवर!

ताऊ रामपुरिया का कहना है

बड़ा आनंद आया गुरुदेव ! तोडुलाल जी की लीलाएं तो बड़ी अपरम्पार हैं !

नीरज गोस्वामी का कहना है

प्रभु आप को पढ़ना एक अलग लोक की सैर करने जैसा है...कौतुक बना रहता है...बहुत रोचक शैली और कथ्य है...लाजवाब.
नीरज

डा० अमर कुमार का कहना है

सुनियो मेरी अरज भी.. ओ पाठकगण,
@ डा. कविता जी

धन्यवाद कविता जी, आपने मुझे पढ़ा तो सही..
यह एक खूबसूरत संयोग ही कहा जायेगा, कि कल मेरी टिप्पणी पोस्ट करते समय ही नेटवर्क ने साथ छोड़ दिया,
वरना आप आज यहाँ न आयीं होतीं

इस टुटपुंजिया लेखन में सुधार की संभावनायें बताती रहा करें
@ अनूप जी,
क्या मज़्ज़ा आया, क्या गुड ? यह सब तो आपके पिछवाड़े फेंका गाया कचरा है, बोले तो चोरी का माल
@ द्विवेदी जी
बीच अधर में तो भगवन ने लटका रखा है,
रोचकता की माँग पर तो तोड़ूलाल गढ़े गये, आपकी टिप्पणी से लगा ऎसी ख़बरें तोड़ लाने वाला तोड़ूलाल ही हो सकते हैं

@ डा. अनुराग,
मज़ाक मत किया करो, यार
ताऊ समझ गये और तुम कैसे न समझ पाये कि
सत्ता के संतुलन के लिये तिकड़म करना एक शाश्वत गेम है
एक आम आदमी का सरोकार
केवल अपने काम और मौज़ मज़े से आगे नहीं जा पाता
रजनीगंधा और बाबा 120 तो केवल प्रतीक मात्र हैं
रात के तीन बजे का संदर्भ बेचैनी और अंतर में चल रहा कुलबुलाहट हैं
नंगे रहने वालों को लाज की परिभाषा बताने से क्या लाभ..
अतः चीलर और लंगोट का उल्लेख करना पड़ा
मीडिया में किसी ईश्यू को लेकर जो एपिडेमिक ( महामारी ) व्याप्त हुआ करती है, वर्तमान मीडिया महामारी अमेरीकी चुनाव, आतंकवाद का ग्लैमराइज़ेशन और स्टाक-मार्केट फ़्रेंज़ी है
अब यार, जरा सीरियसली बताओ कि तुम्हारे सरीखा साहित्यानुरागी भी वाकई समझ की दुहाई दे रहा है, या गुरुवर-घिसाई कर रहा है ?
जो भी हो, तुम्हारी यह अदा पसंद आयी

@ आशा बेन,डा. अरविन्द जी, नीरज भाई, ताऊश्री
आप पढ़ लेते हैं, तो सबकुछ सार्थक लगने लगता है

अनुपम अग्रवाल का कहना है

तभी राजनीति करने वाले, ऎसा कोई वस्त्र ही नहीं पहनते कि उतरने का गम रहे ..
मैं वहीं ठिठक गया, हे भगवन, तो… यह सब तूने किया
आज समझे और लोग लोगों को गुनाहगार मान रहे थे

लगे हाथ टिप्पणी भी मिल जाती, तो...

आपकी टिप्पणी ?

जरा साथ तो दीजिये । हम सब के लिये ही तो लिखा गया..
मैं एक क़तरा ही सही, मेरा वज़ूद तो है ।
हुआ करे ग़र, समुंदर मेरी तलाश में है ॥

Comment in any Indian Language even in English..
इन पोस्ट को चाक करती धारदार नुक़्तों का भी ख़ैरम कदम !!

Please avoid Roman Hindi, it hurts !
मातृभाषा की वाज़िब पोशाक देवनागरी है

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यह अपना हिन्दी ब्लागजगत, जहाँ थोड़ा बहुत आपसी विवाद चलता ही है, बुद्धिजीवियों का वैचारिक मतभेद !

शुक्र है कि, सैद्धान्तिक सहमति अविष्कृत हो जाते हैं, और यह ज़्यादा नहीं टिकता, छोड़िये यह सब, आगे बढ़ते रहिये !

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