जो इन्सानों पर गुज़रती है ज़िन्दगी के इन्तिख़ाबों में / पढ़ पाने की कोशिश जो नहीं लिक्खा चँद किताबों में / दर्ज़ हुआ करें अल्फ़ाज़ इन पन्नों पर खौफ़नाक सही / इन शातिर फ़रेब के रवायतों का  बोलबाला सही / आओ, चले चलो जहाँ तक रोशनी मालूम होती है ! चलो, चले चलो जहाँ तक..

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05 November 2008

बिग बी अपने कबीले के हैं…. क्या सच्ची में ?

Technorati icon

डिसक्लेमर: बड़े मूड से एक पोस्ट लिखने का मन बनाकर आया था, चंद घंटे पहले ही आज की चिट्ठाचर्चा पर एक लम्बा कमेन्ट ठोक कर आया था । सहसा मन उचट गया,सो मन हुआ कि थोड़ी मस्ती की जाय, पर बिना पुख़्ता किये कुछ भी पोस्ट करने में झिझक होती है, पता नहीं कौन लण्ठ भड़क जाय, या पोस्ट का ही संदर्भ सहित व्याख्या करनी पड़ जाये.. सो अपनी आज की टिप्पणी ही उठा कर यहाँ नकल-चिप्पी तकनीक से जड़ डाला । जो पढ़े उसका भला, और जो न पढ़े उसका कभी न सोचो भला !

श्री अनूप शुक्ल ' फ़ुरसतिया ' अनूप भाई की आज की चिट्ठाचर्चा सदा की तरह अपने आप में मस्त चर्चा रही !

फ़ुरसतिया चर्चा ही इतनी टिप्पणोपरि हुआ करती हैं,haippI birthday to kush
मुद्दई लाख टिप्पणी करे तो क्या होता है
वह तो वही पढ़ायेंगे, जो मंज़ूर ए फ़ुरसतिया होता है,
यह्न न सुधरेंगे, अस्तु.. 

भाई कुश, पीछे छोड़ आये सकुशल दिनों के लिये बधाइयाँ लें
आगे के जीवन के लिये मेरी शुभकामनायें लें लें
मेरी हार्दिक हैवी ड्यूटी गुड्डविशेज़ हैं कि
यह आपके कुँवारेपन का अंतिम जन्मदिन हो,
मित्रों आप सब जनसमर्थन दें, कि.. 
अगले वर्ष उनकी मोमबत्ती जलाने वाली उनके संग हो..

chittha-charcha-logo पर चिट्ठा के नामकरण पर इतना क्यों हंगामा बरपा है,
डाक्टर कविता जी के कल की चर्चा पर इस निट्ठल्ले की मूरख-टिप्पणी पढ़ लें
यकीन करें, वह मेरी खांटी-डाइसी नहीं बल्कि सूडो-डाइसी आब्ज़र्वेशन्स हैं

सतीशजी पंचम स्वर में बिलबिला रहे हैं, क्यों भाई ?
थोड़ा पिटना भी ज़रूरी है, ज़िन्दगी के लुत्फ़ के लिये..
ताऊ पर तो भरोसा करियो मति, यह तो ऎन मौके पर झपकी ले लेवें हैं
सतीश-पंचम जी ने आपने एक बार मुझे टीप मारी कि क्या वाहियात टेम्पलेट है,
ठीक मौके पर हैंग हो जाती है, मैने सुधार लिया ..
PD बोले तिरछे मत रहो.. सीधे हो जा रे, सीधे हो जा रे
तो सीधा हो लिया, विवेक बोले..यह कोई भाषा है,
सो भाषा को कुछ शुद्ध करने की सोच रहा हूँ
अब अच्छी हिन्दी दिखेगी आपको मेरे ब्लाग पर..
बस कविता जी द्वारा उसके रूपांतरण करने की सहमति की प्रतीक्षा है
तो पंचम जी, यहाँ लण्ठ और लठैत ब्लागर भी हैं,
जयकारा लगा लगा कर हमलोगों ने ही उनको बिगाड़ा है...                                                             परसाई सा ज़िगर रखना बड़ा दुरूह है, मित्र !

बिग-बी को अपने कबीले का मानने में मुझे किंचित एतराज़ हैलेना भी आवश्यक नहीं मानता हूँ । यह मानने के उनके अपने कारण होंगे, किन्तु मैं भी अकारण परहेज़ नहीं किया करता । वह अपने स्टार इमेज़ की आभा को ब्लाग से अलग नहीं कर सकते, इसीलिये..
वह अब तक हिन्दी में बोले, हिन्दी ही गाये, और हिन्दी में नाचे व नचाया
सो, हिन्दी में लिख कर वह कोई उपकार नहीं कर रहे
अभी भी वह अंग्रेज़ी की बैसाखी हटाने का साहस नहीं संज़ो पाये हैं
उनकी भाषा-प्रतिभा का मैं भक्त हूँ,
हममें से अधिकांश को शर्मिन्दा करने की हद तक परिमार्जित भाषा है, उनकी

किन्तु वह केवल केवल हिन्दी में ही लिखने की ठान कर,
महज़ दो दर्जन गैरहिन्दी वालों को हिन्दी पढ़ना सीखने पर मज़बूर कर सकें
तो उनका हिन्दी गाया-बजाया सार्थक हो जाये
ब्लागिंग में उनका कलेज़ा इतना मज़बूत है,
दुखते पेट पर लैपटाप रख कर ब्लाग लिखने का एक नया रिकार्ड बनाया है, उन्होंने
अस्पताल से पोस्ट ठेलने का ज्ञानदत्त जी का रिकार्ड तो उन्होंने तोड़ ही दिया

कहीं मेरे भेजे में थोथा चना तो नहीं बज रहा ?
गुरुवर माफ़ करना, वह क्या है कि..
मेरे दिमाग की डाइसी मुर्गी.. निम्न स्तरीय छोटे अंडे ही दिया करती है..
पर कुड़कुड़ाती बहुत है, शायद अपनी आदत से लाचार है, 

चुपचाप हिन्दी चुगते रहने से परहेज़ है, इसको..
लगता है, इसको अब आत्मविकास की छुरी से ज़िबह करना ही पड़ेगा… हे हे हे.. 

8 टिप्पणी:

डॉ .अनुराग का कहना है

पता नही कौन सा एडवांस कबीला है ?हम तो दूरबीन लगा कर खोजते रहे .ओर कान लगा कर किसी झींगा ला ला हुर हुर की उम्मीद करते रहे ........ससुरा कबीला मिलना तो दूर टाइम अलग से खोटी हुआ ... G .P.R.S से भी लोकशन नही मिलती....कहाँ है बाय दी वे ये कबीला ?

विवेक सिंह का कहना है

अजी कोई कबीला नहीं सब S.O.G. का कमाल है .

डा० अमर कुमार का कहना है

.

@ अनूप जी, समीर भाई. सतीश पंचम एवं द्विवेदी जी
क्या ऎसी टालू, उठाईगीर पोस्ट को टिप्पणी की आवश्यक्ता है ?

जो भी हो..सदाशयता का आभार, आप सब की टिप्पणी मेल इनबाक्स में देखी, सादर धन्यवाद ।
अभी वहाँ से इसको इस बक्से तक लाने की कभी सोचा ही नहीं, क्लिनिक से लौट कर प्रयास करूँगा.. यह न सोचें कि मैंने लण्ठों के भय से ताला मार रखा था । बस हो ही गया होगा ऎसा, और क्या ?

@ डा. अनुराग
पर, तुम किस जुगाड़ से इस डिब्बे में घुस आये, गुरु ? जरा सार्वज़निक तो करो !
और.. इतने तल्ख़ क्यों हो ? दुनिया जयकारा लगा रही है, सो.. तुम भी शामिल हो जाओ !
बने के सब होते हैं... दुनिया की रीत है !
कबीले से आगे बढ़ोगे, तो ..
वह हिन्दीभाषी दिखेंगे
फिर, इलाहाबादी दिखेंगे
मैं भी अपने कायस्थ-कुल वंशावली में उनका लिंक निकालूँगा !
जून 2008 में, मैंने उनके कमेन्ट बाक्स में हिन्दी में लिखने का आग्रह किया था । उसका दो लाइनों में दिया गया संक्षिप्त ज़वाब यहाँ प्रकाशित करना प्रासंगिक नहीं है, ख़ैर छोड़ो..
कबीला अथवा नो कबीला.. वह लिखें और हम पढ़ लिया करें..बस, इतना ही रिश्ता रखो !
क्या पूरा देश ही एक वृहत्त कबीला नहीं है ?
लाइट ले यार !

डॉ .अनुराग का कहना है

गुरुवर दो तीन बार की उछलकूद के बाद मुझे इस डब्बे में घुसने का रास्ता मिल गया ....कही से एक द्वार खुला.....दरअसल मै उकता जाता हूँ की भाई अमिताभ बच्चन देश के जरुरी मुद्दों पर क्यों खामोश हो जाते है ?क्या वे अखबार नही पढ़ते ?टी.वी नही देखते जब उन्हें एक माध्यम मिला है ओर वे ऐसी जगह है जहाँ ढेरो लोग उन्हें पढ़ते है तो क्यों नही वे कुछ सार्थक बात करे .क्यूंकि जब आप एक सेलेब्रिटी हो जाते है साथ साथ उम्रदराज भी तो आप पर जिम्मेदारी भी आ जाती है ....आप कोई साधाहरण इन्सान नही हो ..कोई चलते फिरते ब्लोगर नही हो.....कम से कम मनोज वाजपयी कुछ तो सार्थक लिखते है.....फ़िर इतनी चिल्ल पू क्यों ...प्रसून वाजपयी से भले ही मै वैचारिक तौर पर असहमत रहूँ पर फ़िर भी वे विचारो को जगाते तो है....कुछ सार्थक बहस तो करते है.....इसलिए तल्ख़ हूँ गुरुदेव....

Zakir Ali Rajnish (TSALIIM) का कहना है

आपका कहना जायज है। मुझे भी ऐसा लगता है कि अभी भी उनमें सिर्फ हिन्दी में ही लिखने का साहस नहीं आया है। उन्होंने अभी जो कुछ हिन्दी में लिखा है, वह शायद अंग्रेजी में लिखने के कारण उनकी होने वाली आलोचना का ही प्रतिफल है।

सतीश पंचम का कहना है

देश में यह जो आज मार काट मची है कि तुम उत्तर वाले हम फलाने वाले वो ढेकाने वाले....सो सब इसी कबीलई का असर है.....यह बात तब समझ आती है जब हम किसी दूसरे के कबीले मे जाते हैं, उसके इलाके मे जाते हैं और वहाँ जाकर अपने-अपने कबीले का बखान करते है...इस बात से स्थानीय कबीले का चिढना स्वाभाविक है, और जब इस चिढ को राजनीतिक मुलम्मा चढा कर पेश किया जाता है तो समस्या गहरा जाती है....सब को अपने क्षेत्र के लोगों पर गर्व होता है, अपनी बोली प्यारी लगती है, लेकिन जब वही बोली यह कह कर बोली जाती है कि हम उस कबीले वाले, तब मामला भिंडी हो जाता है....इस हम में एक अहम् छुपा होता है जो राजनिति के उस्तरे से छीलकर बाहर दिखाया जाता है कि देखो....यह उस कबीले वाला।

राजनितिक, मुलम्मा होता ही इस तरह का है।

अब जरा अपनी बात कह दूँ अमरजी, आपने कहा कि.. थोड़ा पिटना भी ज़रूरी है, ज़िन्दगी के लुत्फ़ के लिये...सो एकदम वाजिब बात कही आपने....कविताजी ने भी कहा कि इस ब्लॉगजगत में रहना है तो चमडी मोटी कर लो...सो आजकल चमडी मोटी करने की पिरेकटीस कर रहा हूँ :) जाने कब काम पड जाय :) वैसे मोटी चमडी में पिटने का अलग ही मजा है, पीटने वाला समझता है कि कोई गद्दा या तकीया पीट रहा है और पिटने वाला समझता है कि चलो इसी बहाने तकीये-गद्दे की तरह मेरी धूल भी झड रही है :)
टिप्पणी ज्यादा लम्बी हो गई, क्या करें....कबीलई छूटे नहीं राम :)

PD का कहना है

धीरे धीरे सभी कबीले वाले ही रह जायेंगे.. हुगा का बुगा.. बुगा बुगा.. ही गायेंगे.. एक कबीले वाले दुसरे कबीले वाले के खून के प्यासे रहेंगे और हमलों का दौर चलता ही रहेगा.. जो किसी कबीले में शामिल नहीं होगा उसका हाल राबिंशन क्रुसो जैसा ही रहेगा.. एकांत वास में दिन गुजारना होगा.. वैसे हमें अकेले रहने का लुत्फ़ लेने की आदत है.. :)

कुश का कहना है

जिंगा लाला हुर्र हुर्र...

लगे हाथ टिप्पणी भी मिल जाती, तो...

आपकी टिप्पणी ?

जरा साथ तो दीजिये । हम सब के लिये ही तो लिखा गया..
मैं एक क़तरा ही सही, मेरा वज़ूद तो है ।
हुआ करे ग़र, समुंदर मेरी तलाश में है ॥

Comment in any Indian Language even in English..
इन पोस्ट को चाक करती धारदार नुक़्तों का भी ख़ैरम कदम !!

Please avoid Roman Hindi, it hurts !
मातृभाषा की वाज़िब पोशाक देवनागरी है

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