जो इन्सानों पर गुज़रती है ज़िन्दगी के इन्तिख़ाबों में / पढ़ पाने की कोशिश जो नहीं लिक्खा चँद किताबों में / दर्ज़ हुआ करें अल्फ़ाज़ इन पन्नों पर खौफ़नाक सही / इन शातिर फ़रेब के रवायतों का  बोलबाला सही / आओ, चले चलो जहाँ तक रोशनी मालूम होती है ! चलो, चले चलो जहाँ तक..

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18 February 2009

जैसा देश वैसा भेष

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आम तौर पर मैं पहेली-पचड़े में नहीं पड़ता । एक सर्प पहेली जिसका उत्तर मुझे भी नहीं मालूम ! कोई बताएगा ?    इस विचारोत्तेजक पहेली ने मुझे टिप्पणी बक्से में ज़बरन ढकेल ही दिया । उत्तर देने से पहले सतर्क होकर इधर उधर देखा,  सो माहौल के अनुसार मेरा उत्तर था ; भाई, मैं तो पटखनी खा गया,
                                                थोड़ा आयोडेक्स मिल सकता है, क्या ?
                                                उसे मल कर काम पर चला जाय ।

सर्प-पहेली का मेरा उपरोक्त उत्तर ' जैसा देश वैसा भेष ' नीति के अंतर्गत ही लिया जाय । उत्तर देकर मैं संतुष्ट था कि साँभा अगली कड़ी में तो खेल का मज़ा दिखायेगा ही । पर सरदार खुस न हो सका । आज चंद घंटे पहले अपनी वैलेन्टाइन को सँवारने की गरज़ से आया, तो मेल बक्से ने साउंड एलर्ट दिया. खोला तो वहाँ पहेली के उत्तर की कड़ी विराजमान है, चलो देखें !

क्या इडेन के बगीचे में अजगर था ...? का उत्तर प्रकाशित है “ यह पता चला है कि वह अजगर था जिसने बिचारे आदम और हौवा को भवसागर में उतरने और बल बच्चे पैदा करने को उकसा दिया था -इसलिए आज भी कई संस्कृतियों में साँप लिंग का प्रतीक का मन लिया गया है ! “ हालाँकि इसके साथ ही एक प्रश्नचिन्ह नत्थी करके इसे उत्तर का डिस्क्लेमर होने का टैग भी दिया है । सो, एक अच्छा प्रसंग असमय दम तोड़ता दिख रहा है । बात को आगे बढ़ाते हुये..

आपसे असहमत होने की अनुमति चाहूँगा.. मेरे विद्वान मित्र !  दो संभावनायें दी गई हैं.. अज़गर और पुरुष जननाँग ! पर.. संभावनायें अपनी प्रकृति के अनुसार अनंत होती हैं, न दोस्त ? सो.. मैं अपने इस पृष्ठ की असहमति का टैग थोड़ा जी लेना चाहता हूँ, कोई बुराई ?  आपको असहमत होने का पूर्ण अधिकार है, क्योंकि मैं तालिबानी नहीं.. कि जो उनसे सहमत नहीं.. उनका इस दुनिया में स्थान नहीं !

आपका... अज़गर ?   कभी नहीं... कदापि नहीं । कविता जी द्वारा प्रतिपादित ‘ पुरुष जननांग ? ‘ अरे राम भजो भाई ! 
इस पोस्ट के  कारण हैं, क्योंकि मेरे पास पड़े इसके संदर्भ अकारण ही व्यर्थ हो रहे थे ।  देखिये स्वयं की लाइब्रेरी के मेरे संदर्भ :

 
1. " So The Serpent (satan) successfully tempts Eve to "eat the forbidden fruit" and everything changed forever as innocence was lost."  यहाँ वर्जित फल को ही आप पुरुष जननांग से  परिभाषित तो  कर सकते हैं, क्योंकि आगे  दिया है कि.. ..  

 2. And Adam and Eve heard the
Voice of The Lord and they were
ashamed and covered themselves with fig leaves. "
  यह परिणाम मिला उन्हें, यह वर्जित फल चखने का..           जो कि सेब तो कदापि नहीं हो सकता ।

3. The shame of Adam and Eve clearly shows a new "knowledge" and awareness of sexuality and their own nakedness. अपने माइथोलोजी में.. खीर खाने से सन्तानोपत्ति के कई उल्लेख हैं, यह तथाकथित खीर आखिर वीर्य क्यों नहीं ?  सेब या खीर पेट में पहुँच जाने मात्र से क्या गर्भाधान हुआ करता है ?  फिर तो, यह देश में कब का प्रतिबन्धित हो गया होता !क्योंकि इसके परिणामों से चेताते हुये आकाशवाणी  ( इस पर फिर कभी .. )  होती है, कि.. 
4. And the Lord said unto the woman,

"You shall have pain
in childbirth and your desire
shall be towards your husband."

उपरोक्त सभी संदर्भ Ontario Consultant's Book on Religious Tolerance  से लिये गये हैं ! यह सी.डी. पर उपलब्ध है।
बात को और आगे बढ़ाते हुये लीमिंग बन्धुओं को भी गवाह कठघरे में बुलाना चाहूँगा

The Punishment upon Eve (womenhood) was pain in childbirth. This seems directly linked to sexual intercouse and pregnancy. Also her "desire" is to bear her husband's children yet have to endure this great suffering to do so. This "curse" provides more proof that "eating the forbidden fruit" does represent SEX. Soon after their "eating of the fruit", Adam and Eve were banned from the tree of life (that prevents aging leading to death). D. Leeming & M. Leeming, "A Dictionary of Creation Myths", Oxford University Press, New York, NY,

एहि बीच अज़गर महाराज कहाँ दुबक गये, हो ?
उनको सामने लाने का प्रयास करता हुआ, एक मान्य ग्रँथ Urantia Book  कहता है, कि जिसको आदम-हव्वा गँदा कर दिये थे , ऊ वाला ईडेन गार्डेन कोलकाता में नहीं, साईप्रस में पहले से ही था ।

Sarmast_Atlantis_525

Urantia Book :

Revealing the Mysteries of God, the Universe, Jesus  and  Ourselves.

As it has on numerous occasions, current scientific discovery confirms the dates, places, and events originally disclosed in The Urantia Papers more than 70 years ago. One of those recent discoveries shows a connection between the legend of the lost continent of Atlantis and of the first Garden of Eden. The picture at right  is from Robert Sarmast’s newly released book, Discovery of Atlantis (Copyright Robert Sarmast, Origin Press, October 2003). It pinpoints the lost continent of Atlantis in the exact location that The Urantia Book describes as that of the first Garden of Eden.

और किसी अज़गर के साईप्रस में ग्रीनकार्ड लेने का कोई रिकार्ड नहीं है । सो, अज़गर के साईप्रस में देखे जाने के सबूत का कोई अभिलेख लाइयेगा, तो.. मज़ा आयेगा असली खेल का !  आप द्वारा वैज्ञानिक जानकारियों को हिन्दी में दस्तावेज़ीकरण करने के प्रयास का यह टाइमखोटीकार सदैव से प्रशंसक रहा है, इसीलिये अपना मत / पक्ष रख रहा हूँ । आगे आपकी मर्ज़ी !

Keyway.ca_edenपिछले वर्ष दिल्ली से किताब-ए-अक़दस ( Kitab-i-Aqdas ) ले आया था, जिसमें भी इससे सम्बन्धित प्रसंग का उल्लेख है, थोड़ा ही पढ़ा था, कि पंडिताइन महाशय ने गायब कर दिया है, कि " तुम्हारा दिमाग ख़राब हो गया है ! "  यदि आप भी मेरे लिये यही सब  न मान रहे होते तो.. यहाँ संदर्भित किया जा सकता था । सो, चलता हूँ.. अपनी वैलेन्टैनिया को सँवारने, जो निश्चित समय से विलम्ब से चल रही है । यह ज़रूरी नहीं है, कि सभी  भारतीय परंपरा के  विलम्बित रहो नीति  के सभी फ़ालोअर ही हों ?वैलेन्टाइन डे के दिन भेलपूड़ी खाने पर भाई्कुश पहले ही डाँटें जा चुके हैं । कहीं हमारा भी लम्बर लग गया कि, समय-चौकस विदेशी आदत वाले संस्कृति का यह त्यौहार इतना लेट काहे कर रहे हो, भाई  !  तो,  आईएगा आप हमको बचाने ?

19 टिप्पणी:

Neeraj Rohilla का कहना है

कहीं हमारा भी लम्बर लग गया कि, समय-चौकस विदेशी आदत वाले संस्कृति का यह त्यौहार इतना लेट काहे कर रहे हो, भाई ! तो, आईएगा आप हमको बचाने ?

हाँ, जरूर ही आयेंगे आपको बचाने लेकिन चाय नाश्ता भरपेट करके जायेंगे। सोच लीजिये हमको बुलाने से पहले और ये भी याद रखियेगा कि दौडने वाले जमकर खाते हैं क्योंकि मुटापे की चिन्ता नहीं होती :-)

हम अपने कुछ चर्चगामी मित्रों से पूछते हैं कि वो सांप कौन सा था, अगर उनसे कुछ खबर लगी तो जरूर बतायेंगे।

Udan Tashtari का कहना है

जब ऐसन ज्ञान मनन की बात करोगे तो बचाने तो आना ही पड़ेगा.

Tarun का कहना है

लेकिन लगता है पहेली ने मेहनत खूब करवायी, हमको नयी बातें पता भी चली, शुक्रिया है जी

Arvind Mishra का कहना है

चिंतन परक लिखा है आपने ,निश्चय ही कथा प्रतीक और बिम्बों के जरिये ही रूपायित हुयी है ! इसलिए साँप की दैहिक मीमांसा बुद्धिसंगत नहीं है .पर एक साँप को बिम्ब के रूप में लेते हुए भी पुराणकार के मन में कोई साँप तो रहा ही होगा -तो कई सवाल उठ जाते हैं वह विषहीन हो विषैला ? बडा हो या छोटा ? और यह तो निश्चित ही है कि साँप को शैतान के रूप में चित्रित किया गया है .रही बात साँप को पुरुषांग के रूप में दिखाना तो यह सही दावा है -अंतर्जाल पर भी इसकी पुष्टि में पर्याप्त प्रमाण मिल जायेगे -कविता जी की यह बात सच है -साँप का बिल में तुद मुद कर भी घुस जाना ,लंबा बेलना कार होना ,शरीर को बड़ा कर लेना ,पहन उठा लेना .आदि लिंग की ही प्रतीति कराते हैं !
सादर !

ताऊ रामपुरिया का कहना है

गुरुजी यहां मैं तो सर्पाकार टिपणी करने की बजाये टिपणीयों का आनन्द लेने ही आता रहूंगा. वैसे भी अपनी मोटी बुद्धि मे कुछ घुस नही रहा है. आदरणीय मिश्राजी ने पर्याप्त बहस का मसाला दे दिया है.:)

रामराम.

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` का कहना है

कथा तो ऐसी ही है
- लावण्या

Anil Pusadkar का कहना है

आपको जो डांटने की कोशिश भी करेगा वो खुद चिल्लाएगा बचाओ-बचाओ।

कुश का कहना है

भेलपुरी तो बासी हो चुकी है जी.. अब कोई खाएगा थोड़े ही.. ये कोई फाइव स्तर होटल क़ी भेल तो थी नही क़ी स्वाद ना हो फिर भी लोग चाव से खाते.. ये तो नुक्कड़ पर हम जैसे छू ट के ठेले लगाने वालो क़ी भेल थी.. जो अक्सर रात को बासी हो जाती है.. स्वाद खाने क़ी लोगो को शायद अब आदत नही रही जी..

हमे तो लगा कोई आस्तीन के साँप के बात हो रही होगी.. पर यहा तो एडी मोनीज वाला साँप है.. अपुन तो उस वक्त पैदा इच नही हुआ था.. पहीले तो लोग बाग कहे रहे क़ी ब्लॉग का चिट्ठा कहे दो.. फिर कहे रहे ब्लॉगर को चिट्ठा कार कर दो.. अब साँप को जाने क्या क्या कह रहे है..

गुलज़ार बॉस गाना लिखकर गये तो थे.. प्यार को कोई नाम ना दो.. जो, जो है..उस्को वही काहे नही रहने देते जी.. काहे उसकी पहचान क़ी खातिर टाइम खोटी कर रहे है.. ओह माफ़ करना जी हम तो भूले गये थे.. आप तो प्रमाणित टाइम खोटीकार है.. हमारा भी टाइम खोटी कर रहे है.. एक हमारी बुद्धि जितना छोटा सा काम कहा था उसमे भी लेट हो रहे है.. काफ़ी ठंडी हो रही है जी,,

COMMON MAN का कहना है

दाक साब, सांप के बहाने किस किस को लपेट लिया, महाराज, किसी को तो छोड़ दो.

डा. अमर कुमार का कहना है


@ अरविन्द जी एवं अन्य पाठकों से
वैसे तो, शास्त्रार्थ ब्लागिंग के लिये हानिकारक है :)
मैंने केवल अपनी जानकारी विज्ञजनों के सम्मुख रखी है..
इसे मानने की कोई बाध्यता नहीं हैं ।
जलप्रलय, मछली, नौका, सर्प इत्यादि समानांतर प्रतीकों के साथ ,
हर धर्म में सृष्टि के आरंभ में तारणहार इकलौते मनुष्य का प्रकट होना.. अनायास तो नहिंये होगा न ?

ज्ञान बघारने का एक मौका मिला, सो वह यहाँ बघार-परोस दिया,
कृपया अपने हाज़में के अनुसार ग्रहण करें :)

डॉ .अनुराग का कहना है

गुरुवर इतनी ज्ञानात्मक पोस्ट देखकर अपुन तो शीर्षासन करने लगे है .सांप ओर गूगल मेप से आपने जीवन दर्शन दिखाया ...कितने लोग तो हिमालय की यात्रा रद्द कर बैठे ...लालू जी ओर नुक्सान हो गया ...आप महान है गुरुवर कितनी बार चरण पकड़वायेगे...एक ठो चप्पल ही भिजवा दे...(बाटा की हो तो अच्छा है )

अभिषेक ओझा का कहना है

फाइनली अगर कहीं अजगरवा मिला तो बताइयेगा जरूर :-)

Science Bloggers Association का कहना है

गम्‍भीर विवेचन है, समझने के लिए नाको चने चबाने पड गये।

ज्ञानदत्त । GD Pandey का कहना है

बहुत सुन्दर!
हमारे ब्लॉग पर भी आइयेगा।

भीगी पलकें

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi का कहना है

पौराणिक कथाओं का कुछ तो आधार होता ही है। वे मनुष्य की तत्समय विकसित होती हुई अवधारणाएँ प्रस्तुत करने की क्षमता का के स्तर को भी प्रदर्शित करती हैं।

उन्मुक्त का कहना है

चिट्ठे पर देखने से पता चला कि चिट्ठियों का सैकड़ा पूरा हुआ है - बधाई।

कॉपीराइट का नोटिस भी पसन्द आया - कुछ साथी तो बढ़े।

डा. अमर कुमार का कहना है


@ उन्मुक्त जी,
आपका धन्यवाद एवं अतिशय आभार
आप लोगों के संग लम्बी दूरी तय करने की इच्छा है,
केवल इसीलिये सैकड़े के इस माइलस्टोन से कतरा कर निकलने का प्रयास कर रहा था ।
यह लघु-उपलब्धि भी आपकी पैनी निगाहों से बच न सकी ।
चमत्कृत हूँ, साथ ही अभिभूत भी ।
कुछ तो है.. पर कोई तो है.. जिसकी निग़ाह इस पर गयी ।
पुनः आभार आपका ।
अमर

अमित जैन (जोक्पीडिया ) का कहना है

आप मेरी टिपण्णी यहाँ सुन सकते है http://abcamit.blogspot.com/ धन्यवाद

सतीश सक्सेना का कहना है

होली की शुभकामनायें !

लगे हाथ टिप्पणी भी मिल जाती, तो...

आपकी टिप्पणी ?

जरा साथ तो दीजिये । हम सब के लिये ही तो लिखा गया..
मैं एक क़तरा ही सही, मेरा वज़ूद तो है ।
हुआ करे ग़र, समुंदर मेरी तलाश में है ॥

Comment in any Indian Language even in English..
इन पोस्ट को चाक करती धारदार नुक़्तों का भी ख़ैरम कदम !!

Please avoid Roman Hindi, it hurts !
मातृभाषा की वाज़िब पोशाक देवनागरी है

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यह अपना हिन्दी ब्लागजगत, जहाँ थोड़ा बहुत आपसी विवाद चलता ही है, बुद्धिजीवियों का वैचारिक मतभेद !

शुक्र है कि, सैद्धान्तिक सहमति अविष्कृत हो जाते हैं, और यह ज़्यादा नहीं टिकता, छोड़िये यह सब, आगे बढ़ते रहिये !

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