जो इन्सानों पर गुज़रती है ज़िन्दगी के इन्तिख़ाबों में / पढ़ पाने की कोशिश जो नहीं लिक्खा चँद किताबों में / दर्ज़ हुआ करें अल्फ़ाज़ इन पन्नों पर खौफ़नाक सही / इन शातिर फ़रेब के रवायतों का  बोलबाला सही / आओ, चले चलो जहाँ तक रोशनी मालूम होती है ! चलो, चले चलो जहाँ तक..

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04 October 2009

ग़ैरज़रूरी बहसों में अटके हुये

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ऐसे क्या कारण हैं कि हिन्दी कि फॅमिली बेकग्राउंड होते हुआ भी हिन्दी विषय मे कोई डिग्री नहीं हैं बहुतो से ब्लॉगर के पास ??  क्यूँ ??

क्षमा चाहूँगा, रचना…
मेरा  जैसे  आपसे मतभेद योग चल रहा है ।
आपका यह प्रश्न ब्लागर के सँदर्भ में तो क्या, साहित्य के सँदर्भ में भी बेमानी है ।
पृष्ठभूमि होने के मायने यह नहीं है कि, उस क्षेत्र या भाषा विशेष पर एकाधिकार ही माना जाये ।
यदि परिवारवाद को लेकर चलें तो भी बेबुनियाद है । परिवार का जिक्र आया ही है, तो यह बता दूँ कि
स्व० जयशँकर प्रसाद अपने पुश्तैनी धँधे, इत्र, तम्बाकू और सुँघनी के व्यापार से ही जीवनपर्यँत  ही जुड़े रहे,
परँतु जो उन्होंनें रच दिया, वह पी.एच.डी. करने वाले पर भी भारी पड़ता है । मैथिलीशरण गुप्त, श्रीलाल शुक्ल जैसे बीसियों उदाहरण हैं । विमल मित्र एक मामूली स्टेशन मास्टर थे, हज़ारी प्रसाद द्विवेदी जी भी रेलवेकर्मी रहे थे । अँग्रेज़ी तक में उदाहरण लें तो सामरसेट मॉम पेशॆ से डाक्टर थे । जीविकोपार्जन का माध्यम कुछ भी हो, साहित्यिक अभिरुचि इसमें कहाँ आड़े आती है, आपसे जरा तफ़्सील से समझना चाहूँगा । हम सब को ( कम से कम मुझे )आपसे इस विषय को सँदर्भित किये गये पोस्ट की प्रतीक्षा रहेगी । खेद है कि, हम हिन्दी को कुछ देना तो दूर, देने और देते रहने का दम भरते हुये अपनी मातृभाषा को इन्हीं ग़ैरज़रूरी मुद्दों पर जहाँ के तहाँ लटकाये  हुये हैं । क्योंकि हमें अपने अलावा किसी अन्य का सुर्ख़ियों में उभरना ग़वारा नहीं है । किसी डिग्री विशेष का रचनाधर्मिता से क्या वास्ता निकलता है,  यह रिश्ता जरा मुझे भी भी समझायें । हिन्दी को लेकर अँग्रेज़िन च्यूइँग-गम कब तक चबाया और थूका जाता रहेगा ? क्या ऎसे बहस से हिन्दी माता का यह भ्रम बनाये रखा जाता है कि, उसके तीनों राजकाजी, विद्वान और जनमानस बेटे उसकी सेवा में लगे हुये हैं । सो, इन सबका निराकरण करें, आपका कृपाकाँक्षी हूँ ।

Rachna ke bahane

इससे आगे

14 June 2009

विस्मृत बिस्मिल और ब्लागर च तनवीर

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पहले तो यह बता दूँ कि,यह पोस्ट भँग की तरँग में नहीं लिखी जा रही है । मानता हूँ कि शीर्षक बड़ा अटपटा बन पड़ा है, बल्कि यदि मुझे स्वयँ ही टिप्पणी देनी होती, तो उसे फ़कत एक लाईन में समॆट देता, " तेली के सिर पर कोल्हू ! " पर इस शीर्षक के पीछे एक मज़बूरी भी है , कृपया इसे सारथीय टोटका न मानें । मँगलवार 9 जून को सायँ चँद सतरें मरहूम हबीब तनवीर साहब पर पोस्ट करने का इरादा था कि, अचानक एक पारिवारिक आपदा आन पड़ी । मेरे बहनोई देवाशीष नहीं रहे,अब वह स्वर्गीय देवाशीष के नाम से याद किये जाते रहेंगे । अस्तु, यह रह ही गया ।

कल वृहस्पतिवार 11 जून को हुतात्मा बिस्मिल जी की जयँती थी । पूरे दिन उन पर दो शब्द सुमन अर्पित न कर पाने का मलाल बना रहा । रात में कुछ समय चुरा कर ब्लागर पर आया, तो आते ही बहक गया । शिव-भाई की पोस्ट ऎसी न थी कि, देख कर टहल लिया जाय ।
आज लिखते वक़्त यह भान भी न हुआ कि, इनको एक मँच देखना कितना कठिन है ? इस तरह द्राविड़, उत्कल, बँगा-नुमा इस पोस्ट को एक पँक्ति का यह शीर्षक देना पड़ा, मानों जाट और तेली की तकरार हो रही हो.. सो, बन  गया  " तेली के सिर पर कोल्हू ! " इनमें तुक मिलाना आपका काम है, पर लगता है कि, शीर्षक मे वज़न है

اَلہمدُلِّاہ ربدِلآلمین اَلرہمانے رہیم
مالِک یومیتّدین ایدنت پھِراتل مُتّکیم 

अलहमदुल्लिाह रबदिलआलमीन अलरहमाने रहीम
मालिक योमेत्तदीन एदनत फिरातल मुत्तकीम

हबीब तनवीर साहब को यूँ इन लफ़्ज़ों से रुख़सत कर देना मौज़ूँ रहेगा ? नहीं, क्योंकि अब तक उनकी शख़्सियत पर तकरीरें लिख कर कई कालमिस्ट चेक की रकम ज़ेब के हवाले कर चुके होंगे । मेरी उनसे कोई ऎसी मुलाकात भी न थी कि, उसका दम भरा जाय । एक इन्सान के तज़ुबों में दस मिनट कम नहीं होते । बहुत कुछ हासिल किया और खोया जा सकता है, उनसे  मेरी  मुलाकात  दस  मिनटों  की  ही  रही है । पर उन मिनटों ने साफ़गोई के मेरे  ऊसूल में  बेइख़्तियार इज़ाफ़ा किया , बल्कि  समझिये  कुछ  और पुख़्ता  ही हुआ । आमीन !

उन दिनों मुझे मुगालता बना रहता , कि मैं ही एक तन्हा साफ़गो हूँ । यह एक ज़िद थी, जो बढ़ती ही जा रही थी, तभी तनवीर साहब से मुलाकात का एक सबब बन गया । सुना कि, वह लखनऊ में हैं, और हम निकल पड़े

हम यानि कि मेरे बालसखा सँतोष डे और मै । इन्होंने मेरे रुझान को देखते हुये इप्टा में शामिल कर लिया । और मेरी निष्क्रियता से आज़िज़ होकर मुझे स्थानीय यूनिट के सँरक्षक होने का प्रस्ताव भी पारित करा लिया, आजकल वह इप्टा के प्रान्तीय यूनिट के कार्यकारी उपाध्यक्ष हैं, अविवाहित भी हैं, लिहाज़ा  खुल कर सक्रिय हैं ।

तो.. हम पहुँचे लखनऊ । सँतोष आगे चलते और मैं कार्यकर्तानुमा एक चमचे सरीखा उनके पीछे लगा रहता । अल्ला अल्ला ख़ैर सल्लाह, मुलाकात हुई । वह बैठे थे, सोफ़े पर इस कदर पसरे हुये कि आपको एकबारगी यह इहलाम हो कि उस पर देवदार की एक शहतीर टिकी हुई हिल सी रही है । उन्होंने अपने को सीधा किया, और पाइप का धुँआ खिड़की की तरफ़ मुँह करके बाहर को उगला । सलाम के उत्तर में सँतोष डे के लिये होठों पर एक स्मित रेख, और मेरे लिये आँखों में  जैसे " जी कहिये ? " अपनी प्रश्नवाचक भँगिमा और मुस्कुराते होंठों को इस बखूबी बाँट रखा था, कि साफ़ ज़ाहिर होता, कौन किसके लिये है । मेरे मित्र ने मेरा तवार्रुफ़ उनके पेश ए नज़र की, " यह डाक्टर... " ताकि आइँदा मैं परिचय का मोहताज़ न रहूँ । ज़वाब में सिर की एक ज़ुँबिश.. और वह फिर खिड़की से बाहर देखने लग पड़े, पाइप के क़श के साथ । दो सेकेन्ड भी न बीते होंगे कि, मैं बेहाल सा होगया, मेरे चेहरे ने घूम कर सँतोष का चेहरा देखा " यह कुछ बोलते क्यों नहीं ? " शायद रँगमँच को लेकर व्याप्त उदासीनता ने उनको तल्ख़ बना दिया होगा, " तो.. कुमार साहब आपकी हम नौटँकी वालों में दिलचस्पी कैसे हुई ? " मैं भला क्या कहता, बस एक ठहरे हुये इँज़िन की तरह ढेर सा स्टीम बटोर कर कुछ अटक फटक ही कर सका । और  उसी तरह ठिठक कर रुक भी गया ।

  इससे आगे  बढ़ता हूँ, तो आपका पढ़ने का टेम्पो जाता रहेगा । इसलिये यह मुलाका्ती ब्यौरा यहीं पर छोड़ें,  किस्सा कोताह यह कि उस दिन से मैं उनकी साफ़गोई और पारेषण क्षमता का आशिक व शागिर्द  हूँ । 

श्रद्धेय श्री रामप्रसाद ’ बिस्मिल ’ को भला कौन नहीं जानता ? पर यह भी सच है कि, बहुत से जन उन्हें नहीं जानते । क्योंकि उन्हें जानने का मौका ही न दिया गया । अचपन के एक मुख्य पात्र तन्मय जी, जो आजकल रायबरेली आये हुये हैं ।  मैं बिस्मिल जी का जन्मदिन उनसे पूछ बैठा, ऎसे  कठिन  क्षणों  में  भी  मेरे  मन  में उनका  जन्मदिन  घुमड़  रहा  था । वह तो बिस्मिल नाम से ही अनभिज्ञ  थे, लेकिन " सरफ़रोशी की तमन्ना " में निहित रुमानियत के दीवाने हैं । उनका तर्क है, " जब कोर्स में ही नहीं है, तो मेरी चिन्ता नाज़ायज़ है । "

इस कड़ी में, यही प्रश्न मैं कई किशोरों से पूछता रहा, वह सिर खुज़ला कर प्रतिप्रश्न दाग बैठे कि, “ अग़र मह्त्वपूर्ण जयँती होती , तो आज छुट्टी क्यों नहीं है ? “ तभी निरुत्तर हो, मैं यह पोस्ट लिखने को बैचैन हो उठा

हर वर्ष छुट्टीट्यूड से ग्रसित देश के लिये एक नये जयँती की घोषणा हो जाती है । व्यक्तिगत  और  राजनैतिक हितों को जनजागृति से ऊपर रखने की शुरुआत तो बहुत पहले ही हो गयी थी । ओह,यह क्या कह रहा है ?

The three appellants Ram Prasad, Rajendra Nath Lahiri and Raushan Singh, who were sentenced to death and subject to confirmation by this Court, became entitled, under a practice  of the local Government which has been in force for some years, to legal assistance at the expense of the Crown. The appellants, who had not been sentenced to death, were not entitled to legal assistance at the expense of the Crown. But as a special case the Crown had allowed them legal assistance & paid for it. Ram Prasad in his petition of appeal, demanded as of right to select his own counsel. He stated that he would only be satisfied if he was represented by a Gentleman called Mr Gobind Ballabh Panth ….. The Crown approached Mr Gobind Ballabh Pant and offered him the brief. He refused to accept it on the fee that the Crown was ready to pay.”  Gobind Ballabh Pant, who had refused to defend the great freedom fighter only because of less money went on to become the Home Minister of India & the longest serving Chief Minister of Uttar Pradesh.

परसों यानि कि 11 जून को बिस्मिल जयँती थी । कहीं कोई हलचल नहीं, कहीं कोई उल्लास नहीं, उनके गाँव वाले घर ( जो अब बिक गया है ) उत्सव के माहौल में भी आक्रोश का स्वर था । शायद ज़ायज़ भी है, मँचासीन होकर “ भगत सिंह, बिस्मिल, अशफ़ाक जैसे सपूतों की धरती “ की दहाड़ लगाना अलग बात है । मैं नहीं समझता कि झलकारी, लोहिया, या पँत ने इन सिरफ़िरों से अधिक त्याग किया होगा कि स्मारक के हकदार हों

ऎसे सिरफ़िरों को श्रद्धाँजलि देने के लिये, मेरे पास शब्दों का भँडार है । पर, यह मेरी पहुँच से बाहर है । क्योंकि इनके ज़ज़्बों के सम्मुख हर भारतवासी बौना है , मैं उनको बस स्मरण ही कर सकता हूँ ।

मृत्यु पूर्व होशो हवास में लिखे हुये इन ज़ज़्बों को भला कौन छू सकता है, एक्स-वाई-ज़ेड सेक्यूरिटी पाने वाले ?

Pandit_Ram_Prasad_Bismil

19 तारीख को जो कुछ होगा मैं उसके लिए सहर्ष तैयार हूँ।
आत्मा अमर है जो मनुष्य की तरह वस्त्र धारण किया करती है। 

यदि देश के हित मरना पड़े, मुझको सहस्रो बार भी ।
तो भी न मैं इस कष्ट को, निज ध्यान में लाऊं कभी ।।
हे ईश! भारतवर्ष में, शतवार मेरा जन्म हो ।
कारण सदा ही मृत्यु का, देशीय कारक कर्म हो ।।

मरते हैं बिस्मिल, रोशन, लाहिड़ी, अशफाक अत्याचार से ।
होंगे पैदा सैंकड़ों, उनके रूधिर की धार से ।।
उनके प्रबल उद्योग से, उद्धार होगा देश का ।
तब नाश होगा सर्वदा, दुख शोक के लव लेश का ।।

सब से मेरा नमस्कार कहिए,  तुम्हारा- बिस्मिल" ( यह एक पुर्ज़े पर लिखा हुआ पत्राँश है.. )

पर उन्हें यही सँतोष रहा किया कि,
शहीदों की चिता पर लगेंगे, हर बरस मेले । वतन पर मिटने वालों का यही आख़िरी निशाँ होगा..

  AADDEEFFHHHH

यूँ ही निट्ठल्ले के सँग कुछ न कुछ तो है.. कि जाते थे जापान पहुँच गये चीन समझ लेना ! यान्नि यान्नि यानि .. इतने झँझावात के बावज़ूद भी, मैं मौका पाते ही नेटायस्थ होता भया, कि चलों मेला वेला देखि आयें, ऎसे किसी मेले का ब्लागर पर निशाँ तो क्या, नामो-निशाँ भी न था । दिख गया शिवभाई का एक टटका पोस्ट !

समय निकाल आया तो था,  बिस्मिल जी को उनकी जयँती पर याद करने.. लेकिन  शिवभाई की पोस्टिया ने जैसे लपक कर रास्ता छेंक लिया । उसे  पढ़ा, फिर गौर से पढ़ा और  यही  समझा  कि, यहाँ पर भी स्वतँत्रता जैसा  कुछ  कुछ  हो गया  था  और वह  गुज़र  चुका  है  ।  लाओ हम तनिक लकीरै पीटि देंय
तब का बुद्धिजीवी अँग्रेज़ों के भ्रुकुटि का गुलाम था, आज का बुद्धिजीवी अँग्रेज़ी सोच की मानसिकता का ताबेदार है, पिछले छः दशक से भारतीयता और देसी सँदर्भों पर यह कैटरपिलर अवस्था से बाहर आना ही नहीं चाहता ।

सशँकित भी है,  न जाने कौन सी चिड़िया उसे चुग जाये ? उस पर तुर्रा यह कि इस कैटरपिलर केंचुवे को खुल्ले में आने की, चर्चित होने की ललक भी है ।  नोटिस किये जाने व टी.पी.आर. की दुश्चिन्ता को वह छिपाये भी रखना चाहता है, यह बाद की बात है । फ़िलहाल दिखलाता यही है कि,वह रचनाधर्मिता की बग्घी को सँवेदनाओं की सँटी से हाँकने को अभिशप्त है । ऎसी बग्घियाँ आपको हर सर्वहारा टाँगा स्टैन्ड पर सस्ते में मिल जायेंगी ।

देखो अपुन का फ़ँडाइच अलग बैठेगा, शिवभाई ! डर कर लिखना.. दबाव में लिखना.. समझौतों पर लिखना.. पाठकों की पसँद के हिसाब से लिखना.. यानि कि अपने ही विचारों और शब्दों का गला घोंटना, एक तरह की हाराकिरी है । यह अपने अँदर के एक लेखक बटा ब्लागर की आत्महत्या है ।  क्या यह मौलिक कहलायेगा ?
बेहतर है कि,अभिव्यक्ति के स्वतन्त्रता की मानसिक नौटकीं की स्क्रिप्ट राइटिंग करते रहना !  यही पर एक गड़बड़  भी है, कि ब्लागरीय ठुमके हिट और फ़िट हैं, लेकिन वह फिर कभी.. वरना अपुन के हलके के भाई लोग इसे जलेली-कुड़ेली कुँठित पोस्ट कह कर सरक लेंगे ।

इदर ब्लागर का लफ़ड़ाइच डिफ़रेन्ट है, सच्ची  लिकेगा तन कौव्वा काटेगा ! अईसा किस माफ़िक चलेंगा ? जब लिखेला, सच्ची बात लिखेला तण डरने का लोचाइच क्या ? अपुन तो फ़ुल्ल टाइम राइटर बी नईं है, पण अपना लिखा कब्भी से कब्भी भी नहीं हटाया । एडीटर नईं छापता, कोई वाँदा नईं.. अपुन को रोकड़े का चेक नईं मिलेंगा, तो चलेंगा । पण, चित्रगुप्त साहब के खानदानी को कुच लिक के हटाने का प्रेंसिपल बनताइच नईं, जी !

पँडित दिनेशराय द्विवेदी जी मेरे टाप टेन मित्रों में हैं,मैं उन्हें खोना भी नहीं चाहता । वह चाहते तो टिप्पणी बक्से में ही पर्याप्त ऊधम मचा सकते थे, जो उन्होंने नहीं किया । पर मिस्टर डिलीट जी, मित्रवत राय देना एक अलग बात है.. उस पर विचार करके अमल में लाना उससे ज़्यादा अहम बात है ।  आपसे पूछ कर कौन पँगा लेगा कि आप ब्लागर को  महत्व दे रहे हैं, या उसके पेशे को ? अपनी सोच को या मित्रवत राय की पसँद को ?

अपने डाक्टर साहब जब दूभर मचाते हैं, तो सबसे पहले  मैं  उनको  ही खूँटी  पर  टाँग  कर कीबोर्ड  के  सम्मुख   “ प्रथम  वन्दहूँ  बरहा..  लाइवराइटर ,   पुनि ब्लागर  सुमिरैं  गूगलदेव “  गायन के बाद ही ब्लागियाना आरँभ करता हूँ ।  वरना  तो  जीना  ही  मुहाल  हो जाता,  इतनी बार इतनी जगह इतनी पोस्टों पर डाक्टर कि डकैत की गुहार सुन चुका हूँ , कि खिड़की के बाहर देख कर  खुद तस्दीक करनी पड़ती है कि, कहीं  मैं ही तो किसी मन्त्री आवास में नहीं घुस आया ?  पण श्शाब जी, अईसा है ना कि, जब हम बोलेगा तो बोलेंगे कि चोलता है !

वईसे अँदर की बात है कि, एक बार “ बेचारा सफ़ेद एप्रन काले कोट से बहुत डरता है, “ से काला कोट मैंनें भी हटा दिया था, क्योंकि तब हिन्दी ब्लागरीय तहज़ीब ( ? ) से इतना परिचित न था कि तू ये हटा, मै वो हटाता हूँ

वईसे पँडित जी खुद्दै कहिन है,कि, " कोई भी सिरफिरा वकील मीडिया में सुर्खियाँ प्राप्त करने के चक्कर में.. " यानि कि उसकी सँवैधानिक पात्रता और मोटिव दोनों ही उनके इस अदने से ज़ुमले रेखाँकित होते हैं । अगर सिरफ़िरे का साट्टिफ़ीकिट चाही, हमरे लगे पठाओ । हम सबको जब इसी समाज में एक साथ ही जीना है तो, वह भी मुहैय्या करवाया जायेगा । सिरफ़िरेज़ आर द हैपेनिंग थिंग । बँदरबाँट वालों को उनकी ज़रूरत रहती है

एक बार तरकश पर मेरे आलेख को किसी ने भद्दी से भद्दी टिप्पणियों से नवाज़ा था, दो दिन तक उसे माडरेट न होते देख सज्जन कुँठित हो उठे । रोमन में प्रारँभ हुये, इससे पहले कि, वह ग्रीक तक पहुँचते, मैंनें उन्हें ललकार दिया कि, मानहानि का दावा ठोंकि दे यार.. चाहे मैं जीतूँ या तू हारे.. वकील सहित तेरा हिस्सा पक्का ! ज़नाब मुकर गये यानि कि चुप मार गये । तब से मैं उनके पीछे लगा हूँ, बहुत अनुयय भी किया, " भाई साहब, प्लीज़ ... प्लीज़ मान भी जाओ, एक केस डाल दो..। " प्यारे मिरचीलाल जी, आप जहाँ कहीं भी हों, यदि यह पोस्ट पढ़ रहें हों, तो एक बार पुनः निवेदन है कि, कृपया एक मिसाल कायम करने में  मेरी सहायता करें ।

यदि अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता के नाम पर कुछ यथार्थ लिखा है, तो कुठाराघात को तैयार रहिये । अच्छी बुरी खरी खोटी पसँद नापसँद ही सही आपकी पोस्ट आपका मानसपुत्र है (  चलिये, कविताओं  को भी मानसपुत्रियाँ  मान लीजिये ) । थोड़ी आहट क्या हुई, इसे, अपने सृजित को, कुरूप  ही  सही, पर   अपने  ही  हाथों ( एक अदने से चूहे की मदद से ) ज़िबह कर दो । पोस्ट हटा लो, पुनर्लारवाचः भव,   पुनः लारवे के खोल में लौट जाओ,  यह क्या  है ?  फिर तो,  हिन्दी ब्लागिंग पँख पसार चुकी ? कर जोरि हम मिलि बैठि लारवा कैटरपिलर में विचरते रहें

यह परस्पर सौहार्द व आदर का  दोहन है, जो हर एक ईमानदार ब्लागर की मँशा पर प्रश्न उठाता है । अभी तो, यहाँ पर समय और श्रम के व्यर्थ ही दुरुपयोग की बात ही नहीं की जा रही है । नतीज़ा यह कि, हम जहाँ हैं वहीं पर घूमते रह जाते हैं.. मातृभाषा के आगे न बढ़ पाने में यह अस्वस्थता कितनी बाधक है, यह  तो अभी नहीं लिखूँगा । आप तो जानते ही हैं कि, अभी टैम नहीं है, शिवभाई !

ऊड़ी बाबा ! mouse_quiet_shh_sm_nwm

मात्र 8095 शब्दों की पोस्ट ? कुछ पता ही न चला । भँग की तरँग तो गुज़रे ज़माने की यादें हैं, यह ब्लागर की तरँग थी । कोई ज़रूरी नहीं कि, आप नेट पर उपलब्ध हर आम और ख़ास को पढ़ें, मुझे तो यह लिखना ही था । सो,यहाँ दर्ज़ कर दिया । बाकी आप जानो ।  वैसे दर्ज़ तो यह भी  होना  चाहिये   कि  परस्पर यह क्यों  याद  दिलाया  जाय  कि,

हममें  से  कोई  भी  इतना  शक्तिशाली  नहीं  है, जितना  कि  हमसब  एक  होकर  होंगे । हमारे सँसाधनों, सोच, व्यय  किये  गये  समय  एवँ  श्रम  की  पहचान  होनी  अभी  बाकी  है, तभी  आप हम  सुने  और  स्वीकारे  जायेंगे । नमस्ते भले ही आप हम निट्ठल्लों को कुछ नहीं समझते

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18 May 2009

जीवनदास को कड़ी से कड़ी सजा दी जाये

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बड़े दिनों से यह “ चलता रहे.. चलता रहे.. “ देख व सुन रहा हूँ । यूँ तो मैं ’ निट्ठल्ला इफ़ेक्ट ’ से इतना पका हुआ हूँ कि, टेलीविज़न बहुत ही कम देखता हूँ । एक म्यान में दो तलवारें वैसे भी कहाँ रह पाती हैं ? अरे, निगोड़ी ब्लागिंग को शामिल न भी करें, तो भी आप यही समझ लीजिये कि “ बुद्धू को कहाँ बुद्धू बक्सो सों काम ? “ फिर भी.. कुछ तो है,  कि आज  एक बेकार सा मुद्दा पकड़ कर बैठा हूँ, कि  न्याय मिले 
                                                       पहले तो आप इन जीवनदास से मिलिये
         
मिल भये… क्या समझे ? अभी फ़िलवक़्त मुझे प्लाई-व्लाई तो लेनी नहीं है, सो मैं तो यही समझ रहा हूँ, कि भारतीय न्याय-वयवस्था इतनी धीमी और लचर है कि, “ चलता रहे… चलता रहे…. ! “ है कि, नहीं ?

इस मख़ौल की पराकाष्ठा तो यह है कि, ’ बैल से दँगा करवाने के ज़ुर्म में .. ’ जैसा आरोप और बैल को अदालत में तलब किये जाने की माँग, जैसा अदालत का बेहूदा कैरीकेचर खींचा गया है, सो तो अलग !

आदरणीय दिनेशराय द्विवेदी जी से आग्रह है कि, या तो वह जीवनदास को न सही, पर उसके आरोपी बैल को ही कड़ी से कड़ी सज़ा दिलवायें, और इस नाटक का पट्टाक्षेप करवाने का प्रयास तो कर ही लें !

मुआ ग्रीनवुड प्लाई न हो गया, राम-मँदिर का मुद्दा हो गया ! मुझे तो इसमें आख़िरी बार बोले जाने वाला ’ चलता रहे.. चलता रहे ’ में पिटे हुये अडवाणी की आवाज़ सुनायी दे रही है.. या यह  मेरा भ्रम है ?

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12 April 2009

मत मानो मेरा मत, पर यह मत कहना कि मत नहीं दिया था

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विष्णु प्रभाकर जी नहीं रहे । कुछेक शीर्ष अख़बारों के लिये यह ब्रेकिंग न्यूज़ न रही होगी ! अनूप जी ने उचित सम्मान दिया !  विष्णु जी ने आवारा मसीहा के लिये सामग्री जुटाने के लिये जो कल्पनातीत श्रम किया है, मैं तो केवल इसी तथ्य से ही उनका भक्त बन गया । बाद के दिनों में तो उनके अन्य तत्व भी दिखने लगे थे ! अपने साहित्य साधना में वह विवादो की काग़ज़ की रेख से अपने को बचा ले गये, यह उनकी एक बड़ी उपल्ब्धि है !
उन्हें सच्चे मन से श्रद्धाँजलि ! 
चिट्ठा-चर्चा को लेकर अनूप जी की व्यथा बहुत ही स्पष्ट है,  इससे  भी  अधिक इसके प्रति आज उनका दृष्टिकोण भी स्पष्ट और मुखर है । 
     
हालाँकि एक बार उन्होंने ही चिट्ठों के चयन को लेकर चर्चाकार की अबाध्यता को ज़ायज़ ठहराते हुये अपना पल्ला झाड़ लिया था !  एक वरिष्ठ चिट्ठाकार को सलाह देना कितना प्रासंगिक हो सकता है, नहीं जानता .. पर मेरा ’ सचेतक ’ चरित्र अपनी बात ठेलने को प्रेरित कर रहा है !
आगे बढ़ने के लिये परस्पर विमर्श आवश्यक है, क्या वज़ह है कि आज़ तमिल चिट्ठाकारी हिन्दी से कहीं आगे है ? कोई 2005-2006 के मध्य वहाँ चलने वाली बहसों की बानगी लेकर देख सकता है ! आपसी सिर-फ़ुट्टौवल तो नहीं, पर बाँगला ब्लागरों में परस्पर अहंभाव ने उसे भी न पनपने दिया ! बीस पोस्ट के बाद स्वयं का डोमेन लेकर अपना चूल्हा अलग !
बहुचर्चित  एक लाइना को चिट्ठों के शीर्षक के पैरोडी मात्र के रूप में लिया जाना, मुझे कभी से भी अच्छा न लगा । हरि अनन्ता-संता बंता अपवाद भले हो, संभवतः आज तक मैंनें इनकी तारीफ़ न किया होगा !  आनन्द अवश्य लेता रहा ! पोस्ट के लिंक को सपाट रूप से न देकर रोचक बनाने का प्रयास ही माना जाय, एक लाइना !  होता यह है, कि लोग चर्चा के मूल पाठ को भी न पढ़. .. सीधे एक लाइना पर एक टिप्पणी ठोक कर बढ़ लेते हैं ।
और.. इसमें भी वह इतने ईमानदार हैं, कि जिस भी चिट्ठे के शीर्षक और लाइना की जुगलबन्दी पर झूम उठते हैं, शायद ही वहाँ पहुँचते हों !
जी हाँ, मैंने चिट्ठाचर्चा के कई नियमित टिप्पणीकारों का ’ पीछा किया है :), और ताज़्ज़ुब है कि पोस्ट तो छोड़िये.. पूरे के पूरे ब्लाग पर ही उनकी टिप्पणी नदारद है !  मानों वह यहाँ चर्चा पर, केवल छींटाकशी करने के लिये ही आते हों !
फिर तो हो चुका कल्याण ? यदि पाने की अपेक्षा रखते हैं, तो देने की क्यों नहीं ?
किसी भी बहस के निष्कर्ष सभी को एक दिशा देते हैं ।  भले ही पाठक-चिट्ठाकार उस पर न चले, पर दिशा तो मिले ? इसका यहाँ अभाव केवल इसलिये है, कि ऎसी बहस में अंतिम मत मोडरेटर या चर्चाकार का होना ही चाहिये, जो कि बहुधा नहीं होता  ! गोया हनुमान गुरु अपने चेलों का रियाज़ देख रहे हों ।  नतीज़ा.. हर सार्थक  बहस ’ दूर खड़ी ज़मालो के आग़ ’ जैसी बुझ कर राख़ हो जाती है  !  यह अलंकार लगभग हर बहस में खरी उतरती है,  आपके पास अनुभव है,  चिट्ठाकारी का रोमांचक इतिहास है.. सो विषम मोड़ों पर,  कुछ तो.. मोडरेटर का मत होनाइच मँगता, बास !  बुरा मानने का नेंईं..
अपने पोस्ट का लिंक यहाँ सभी देखना चाहते हैं.. पर, दूसरे के लिये ?
मत लीजिये मेरा मत, कि चर्चा के लिये माडरेशन का एक सार्थक उपयोग भी  हो सकता है.. !
वह यह कि हर टिप्पणीकार के लिये अपनी टिप्पणी में एक पढ़े हुये पोस्ट का लिंक और उसके  साथ उस पोस्ट पर अपनी मात्र दो पंक्तियाँ जोड़ कर देना अनिवार्य समझा जाये  .. अन्यथा उनकी टिप्पणी हटा दी जायेगी ! हाँ, मुझ सरीखे लाचार टिप्पणीकार को यह छूट मिल सकती है ! इससे लाभ ?
१. चर्चा का दुरूह का कार्य चर्चाकार के लिये आसान हो पायेगा !
. दूरदराज़ के अलग थलग पड़े चिट्ठों का संचयन स्वतः ही होने लग पड़ेगा !
३. एक लाइना की नयी पौध भी सिंचित हो सकेगी !
४. यदा कदा कुछ चर्चा जो थोपी हुई सी लगती है, न लगेगी !
५.  मेरे सरीखा   घटिया आम पाठक भी चर्चा तक ले जाने को एक बेहतर लिंक तलाशेगा,
६. ज़ाहिर है, कि ऎसा वह अपनी मंडली से बाहर निकल कर ही कर पायेगा !
मानि कि, कउनबाजी तउनबाजी कम हो जायेगी !
७. ’ तू मेरा लिंक भेज-मैं तेरा भेजूँगा ’  जैसी लाबीईंग हो शुरु सकती है, पर ऎसे जोड़े भी काम के साबित होंगे ! क्योंकि  तब भाई भाई में मनमुटाव भी न होगा !
८. क्योंकि इस होड़ में नई और बेहतर पोस्ट आने की रफ़्तार बढ़ेगी.. धड़ाधड़ महाराज़ का हाल आप देख रहे हैं, श्रीमान जी स्वचालित हैं.. वह क्यों देखें कि यूनियन बैंक की शाखा के उद्द्घाटन सरीखी पोस्ट हिन्दी को क्या दे रहीं हैं ?
. मेरे जैसा भदेस टिप्पणीकार अपने साथी से पूछ भी सकता है, चर्चाकार ने तुमको क्या दिया, वह बाद में देखेंगे ! पहले यह दिखाओ कि, टिप्पणी बक्से के ऊपर वाले हिस्से में तुम्हारा योगदान क्या  है ?
१०. लोग कहते हैं, चर्चा है कि तुष्टिकरण मंच.. मैं कहुँगा कि, नो तुष्टिकरण एट आल ! तुष्टिकरण के दुष्परिणामों पर यदि हम पोस्ट लिखते नहीं थकते, तो अपने स्वयं के घर में तुष्टिकरण क्यों ?
११. यहाँ पर मैं श्री अनूप शुक्ल से खुल्लमखुला नाराज़ हूँ.. किसी के ऎतराज़ पर कुछ भी हटाया जाना.. नितांत गलत है !   कीचड़ में गिरने को अभिशप्त या संयोगवश, मैं उस रात धुर बारह बजे पाबला-प्रहसन देख रहा था ! बीच बीच में तकरीबन डेढ़ घंटे तक मेरा F5 सक्रिय रहा, निष्कर्ष यह रहा कि कुश ( बे... चारा ! )  को सोते से जगा कर उनकी अनुमति  से एक चित्र हटाया गया.. अन्य भी प्रसंग हैं ।
कुश देखने में शरीफ़ लगते हैं, तो होंगे भी ! क्योंकि मैं इन दोनों की तीन कप क़ाफ़ी ढकेल गया.. पर यह अरमान रह गया कि वह इस प्रकरण को किस रूप से देखते हैं, कुछ बोलें !
१२. विषय का चयन, निजता का हनन, अभिव्यक्ति का हनन इत्यादि नितांत चर्चाकार के विवेक पर हो, और ऎसा डिस्क्लेमर लगा देनें में मुझे तो कोई बुराई नहीं दिखती !
१३. क्या किसी को लगता है, कि इस प्रकार पोस्ट सुझाये जाते रहते जाने की परंपरा से अच्छे पोस्ट की वोटिंग भी स्वतः होती रहेगी ?
१४. चिट्ठाचर्चा के अंत में के साथ ही आभार प्रदर्शन के एक स्थायी फ़ीचर में अपना नाम कौन नहीं देखना चाहेगा ?
१५. स्वान्तः सुखाय लिखने वालों के लिये, कोई भी व्यक्ति बहुजन-हिताय जैसे चर्चा श्रम में क्यों शेष हो जाये ?  जानता है, वह कि, यह श्रमसाध्य कार्य भी अगले दिन आर्काईव में जाकर लेट जायेगी..  कभी खटखटाओ तो Error 404 - Not Found कह कर मुँह ढाँप लेंगीं !
१६. गुरु, अब ई न बोलिहौ..  लेयो सामने आय कै आपै ई झाम कल्लो, इश्माईली !  यह मेरा मत है.. जिसका शीर्षक  है.. मत मानों मेरा मत ! क्योंकि मेरा तो यह भी मत है, कि एक को ललकारने की अपेक्षा सभी को अपरोक्ष रूप से शामिल किये जाने की आवश्यकता है !
१७. इन सब लटकों से पाठकों की संख्या घट सकती है, तो ?  मेरी भी तो नहीं बढ़ रही है !   लेकिन  कमेन्ट-कोला की माँग पर ’कोई  भी बंदा ’  खईके पान बनारस वाला ’  तो नहीं  गा सकता .. " मेरे अँगनें में तुम्हारा क्या काम है ..
यह रहा कविता जी के कालीदास का १८ सूत्र ... उन्नीसवाँ सूत्र निच्चू टपोरी का टिप्पणा वाला डब्बा में पड़ेला सड़ेला होयेंगा !  बीसवाँ सूत्र तो शायद स्व. इन्दिरा गाँधी का पेटेन्ट रहा है, सो, इस चुनाव में कौन गाये… अबकी बरस भेजऽऽ,  उनको रे  तू वोटर…   गरीबी जो देयँ हटाऽऽय हो
माहौल गड़बड़ाय रहा है.. लोकतंत्र लड़खड़ाय रहा है... चिट्ठाचर्चा खड़बड़ाय रहा है.. ज़िन्दा सभी को रहना है.. ज़िन्दा हैं.. तो ज़िन्दा रहेंगे भी ! चर्चा चलती रहेगी..  मरें चर्चा के दुश्मन ..
कुछ अधिक हो गया क्या ?
मैं चाहता तो न था , कि छोटे मुँह से बड़ी बातें करूँ ! लोग मुँहफट कहेंगे..  पर यदि  चर्चा के मोडरेटरगण ने  किसी को चर्चा के लिये चुना है, तो यह उन्हीं का अपना वरडिक्ट है । अगला चर्चा करने ही  न आये तो दुःखी क्यों ?  मैं भी तो ब्लाग  लिखने तक  ही दुःखी  होता हूँ.. जबकि हमारे वरडिक्ट की भी ऎसी तैसी मचा कर भाई लोग संसद ही नहीं पहुँचते, तो ?
मैं कब आपसे या किसी और से रात के डेढ़ बजे तक बैठ कर चर्चा अगोरने का हर्ज़ाना माँग रहा हूँ smile_regular ?
१७ ही बिन्दु रह गये ?  श्री कालीदास जी १७ को १८ ही गिना करते थे, ऎसा उल्लेख मिला है !
हमका लागत है, निट्ठल्ले की आत्मा यहूँ मँडराय लागि काऽऽ हो,  तौन अब चलि ? 
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18 February 2009

जैसा देश वैसा भेष

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आम तौर पर मैं पहेली-पचड़े में नहीं पड़ता । एक सर्प पहेली जिसका उत्तर मुझे भी नहीं मालूम ! कोई बताएगा ?    इस विचारोत्तेजक पहेली ने मुझे टिप्पणी बक्से में ज़बरन ढकेल ही दिया । उत्तर देने से पहले सतर्क होकर इधर उधर देखा,  सो माहौल के अनुसार मेरा उत्तर था ; भाई, मैं तो पटखनी खा गया,
                                                थोड़ा आयोडेक्स मिल सकता है, क्या ?
                                                उसे मल कर काम पर चला जाय ।

सर्प-पहेली का मेरा उपरोक्त उत्तर ' जैसा देश वैसा भेष ' नीति के अंतर्गत ही लिया जाय । उत्तर देकर मैं संतुष्ट था कि साँभा अगली कड़ी में तो खेल का मज़ा दिखायेगा ही । पर सरदार खुस न हो सका । आज चंद घंटे पहले अपनी वैलेन्टाइन को सँवारने की गरज़ से आया, तो मेल बक्से ने साउंड एलर्ट दिया. खोला तो वहाँ पहेली के उत्तर की कड़ी विराजमान है, चलो देखें !

क्या इडेन के बगीचे में अजगर था ...? का उत्तर प्रकाशित है “ यह पता चला है कि वह अजगर था जिसने बिचारे आदम और हौवा को भवसागर में उतरने और बल बच्चे पैदा करने को उकसा दिया था -इसलिए आज भी कई संस्कृतियों में साँप लिंग का प्रतीक का मन लिया गया है ! “ हालाँकि इसके साथ ही एक प्रश्नचिन्ह नत्थी करके इसे उत्तर का डिस्क्लेमर होने का टैग भी दिया है । सो, एक अच्छा प्रसंग असमय दम तोड़ता दिख रहा है । बात को आगे बढ़ाते हुये..

आपसे असहमत होने की अनुमति चाहूँगा.. मेरे विद्वान मित्र !  दो संभावनायें दी गई हैं.. अज़गर और पुरुष जननाँग ! पर.. संभावनायें अपनी प्रकृति के अनुसार अनंत होती हैं, न दोस्त ? सो.. मैं अपने इस पृष्ठ की असहमति का टैग थोड़ा जी लेना चाहता हूँ, कोई बुराई ?  आपको असहमत होने का पूर्ण अधिकार है, क्योंकि मैं तालिबानी नहीं.. कि जो उनसे सहमत नहीं.. उनका इस दुनिया में स्थान नहीं !

आपका... अज़गर ?   कभी नहीं... कदापि नहीं । कविता जी द्वारा प्रतिपादित ‘ पुरुष जननांग ? ‘ अरे राम भजो भाई ! 
इस पोस्ट के  कारण हैं, क्योंकि मेरे पास पड़े इसके संदर्भ अकारण ही व्यर्थ हो रहे थे ।  देखिये स्वयं की लाइब्रेरी के मेरे संदर्भ :

 
1. " So The Serpent (satan) successfully tempts Eve to "eat the forbidden fruit" and everything changed forever as innocence was lost."  यहाँ वर्जित फल को ही आप पुरुष जननांग से  परिभाषित तो  कर सकते हैं, क्योंकि आगे  दिया है कि.. ..  

 2. And Adam and Eve heard the
Voice of The Lord and they were
ashamed and covered themselves with fig leaves. "
  यह परिणाम मिला उन्हें, यह वर्जित फल चखने का..           जो कि सेब तो कदापि नहीं हो सकता ।

3. The shame of Adam and Eve clearly shows a new "knowledge" and awareness of sexuality and their own nakedness. अपने माइथोलोजी में.. खीर खाने से सन्तानोपत्ति के कई उल्लेख हैं, यह तथाकथित खीर आखिर वीर्य क्यों नहीं ?  सेब या खीर पेट में पहुँच जाने मात्र से क्या गर्भाधान हुआ करता है ?  फिर तो, यह देश में कब का प्रतिबन्धित हो गया होता !क्योंकि इसके परिणामों से चेताते हुये आकाशवाणी  ( इस पर फिर कभी .. )  होती है, कि.. 
4. And the Lord said unto the woman,

"You shall have pain
in childbirth and your desire
shall be towards your husband."

उपरोक्त सभी संदर्भ Ontario Consultant's Book on Religious Tolerance  से लिये गये हैं ! यह सी.डी. पर उपलब्ध है।
बात को और आगे बढ़ाते हुये लीमिंग बन्धुओं को भी गवाह कठघरे में बुलाना चाहूँगा

The Punishment upon Eve (womenhood) was pain in childbirth. This seems directly linked to sexual intercouse and pregnancy. Also her "desire" is to bear her husband's children yet have to endure this great suffering to do so. This "curse" provides more proof that "eating the forbidden fruit" does represent SEX. Soon after their "eating of the fruit", Adam and Eve were banned from the tree of life (that prevents aging leading to death). D. Leeming & M. Leeming, "A Dictionary of Creation Myths", Oxford University Press, New York, NY,

एहि बीच अज़गर महाराज कहाँ दुबक गये, हो ?
उनको सामने लाने का प्रयास करता हुआ, एक मान्य ग्रँथ Urantia Book  कहता है, कि जिसको आदम-हव्वा गँदा कर दिये थे , ऊ वाला ईडेन गार्डेन कोलकाता में नहीं, साईप्रस में पहले से ही था ।

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Urantia Book :

Revealing the Mysteries of God, the Universe, Jesus  and  Ourselves.

As it has on numerous occasions, current scientific discovery confirms the dates, places, and events originally disclosed in The Urantia Papers more than 70 years ago. One of those recent discoveries shows a connection between the legend of the lost continent of Atlantis and of the first Garden of Eden. The picture at right  is from Robert Sarmast’s newly released book, Discovery of Atlantis (Copyright Robert Sarmast, Origin Press, October 2003). It pinpoints the lost continent of Atlantis in the exact location that The Urantia Book describes as that of the first Garden of Eden.

और किसी अज़गर के साईप्रस में ग्रीनकार्ड लेने का कोई रिकार्ड नहीं है । सो, अज़गर के साईप्रस में देखे जाने के सबूत का कोई अभिलेख लाइयेगा, तो.. मज़ा आयेगा असली खेल का !  आप द्वारा वैज्ञानिक जानकारियों को हिन्दी में दस्तावेज़ीकरण करने के प्रयास का यह टाइमखोटीकार सदैव से प्रशंसक रहा है, इसीलिये अपना मत / पक्ष रख रहा हूँ । आगे आपकी मर्ज़ी !

Keyway.ca_edenपिछले वर्ष दिल्ली से किताब-ए-अक़दस ( Kitab-i-Aqdas ) ले आया था, जिसमें भी इससे सम्बन्धित प्रसंग का उल्लेख है, थोड़ा ही पढ़ा था, कि पंडिताइन महाशय ने गायब कर दिया है, कि " तुम्हारा दिमाग ख़राब हो गया है ! "  यदि आप भी मेरे लिये यही सब  न मान रहे होते तो.. यहाँ संदर्भित किया जा सकता था । सो, चलता हूँ.. अपनी वैलेन्टैनिया को सँवारने, जो निश्चित समय से विलम्ब से चल रही है । यह ज़रूरी नहीं है, कि सभी  भारतीय परंपरा के  विलम्बित रहो नीति  के सभी फ़ालोअर ही हों ?वैलेन्टाइन डे के दिन भेलपूड़ी खाने पर भाई्कुश पहले ही डाँटें जा चुके हैं । कहीं हमारा भी लम्बर लग गया कि, समय-चौकस विदेशी आदत वाले संस्कृति का यह त्यौहार इतना लेट काहे कर रहे हो, भाई  !  तो,  आईएगा आप हमको बचाने ?

इससे आगे

03 February 2009

क्षमा करें डा. मान्धाता

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ब्लाग में आख़िर क्या लिखा जाना चाहिये..  पढ़ कर मेरी प्रतिक्रिया रोके ना रूक सकी ।
बड़ा अनुकूल विषय है,सो टिप्पणी के रूप में यह पोस्ट यहीं चेंप देता हूँ ।

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डा. मान्धाता जी, आपने मेरा मनोनुकूल विषय उठाया है, अतएव..
सहमत हूँ, कि हिन्दी ब्लागिंग स्तरहीनता से ग्रसित है ।
पर किसी भी घटक को स्तरहीन मानने के सभी के अपने अपने मापदंड हैं, और सभी ज़ायज़ हैं ।

हिन्दी किताबों के स्टाल पर, यदि भीष्म साहनी और कृष्णा सोबती शोभायमान हैं..
तो उनको काम्बोज, शर्मा और भी न जाने कौन कौन अँगूठा दिखाते धड़ाधड़ माल बटोर रहे हैं ।
यह अपनी अपनी रूचि है.. और व्यवसायिकता की माँग है ।

पर, डा. मान्धाता, इसे बहस का मुद्दा न बनाते हुये मैं केवल यह बताना चाहूँगा,
कि यह तथाकथित स्तरहीनता हर भाषा के ब्लागिंग में समानांतर चलती रही, फलती फूलती और फिर दम भी तोड़ती रही है ।
यहाँ भी यह स्तरहीनता आर्कुटीय हैंग-ओवर के चलते उपस्थित है ।
साथ ही, साहित्यतिक स्तर बनाये रखने को कृतसंकल्पित ब्लाग भी यहाँ उपस्थित हैं ।
सो, दोनों ही समानांतर रूप से चलने चाहियें, हम अपना स्वरचित अंतर्जाल पर देते रहें.. नाहक क्यों परेशान हों ?

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अंग्रेज़ी ब्लागिंग को मापदंड का आदर्श मानना तर्कसंगत नहीं है,
फिर तो, अपनी पहचान ही तिरोहित होने का खतरा सामने आ खड़ा होता है ।
अंतर्जाल पर हिन्दी-लेखन को बढ़ावा देने की मुहिम के पीछे बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के
अपने निहित अदृश्य स्वार्थ हो सकते हैं... पर यह बाज़ार आधारित एक अलग ही मुद्दा है ।

कुछ भी लिखते वक़्त, कम से कम मैं तो यह ध्यान रखता हूँ,
कि यदि इसे आगामी 25-30 वर्षों के बाद की पीढ़ी पढ़ती है,
क्योंकि लगभग हर सर्च-इंज़न के डाटाबेस में हिन्दी का अपना स्थान होगा.. ..
तो इस सदी और दशक के हिन्दी ब्लागिंग के किशोरावस्था को किस रूप में स्वीकार करेगी ?

यदि टिप्पणी के अभाव में कुछेक ब्लाग दम तोड़ते हैं,
तो उस ब्लागर की हिन्दी के प्रति निष्ठा पर संदेह होने लगता है ।
पर, यह भी यकीन मानें कि वह आपके ऎसे किसी संदेह की परवाह भी नहीं करते ।
ट्रैफ़िक-टैन्ट्रम और टिप्पणी प्रेम पर मेरा कटाक्ष, आप लगभग मेरे हर पोस्ट में देख सकते हैं ।

हाँ, एक गड़बड़ और भी है, जब हम अनायास किसी न किसी स्थापित (?) ब्लागर को
उसकी पाठक संख्या से ही अँदाज़ कर अपना आदर्श बना बैठते हैं या जब अपने किसी समकक्ष पर नज़र डालते हैं,
और पाते हैं कि 'सस्ती वाली साबुन की बट्टी के बावज़ूद भी उसकी कमीज़ मेरे से सफ़ेद क्यों ?'
पर, यह भी तो संभव है, कि आपको सस्ता लगने वाला माल उसकी औकात से अधिक मँहगा हो !

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स्तरहीन और स्तरीय के मध्य के बीच की खाई जब पाट नहीं सकते,
तो उसमें झाँकने और उसकी गहराई आँकने से लाभ ही क्या है ?

इससे आगे

12 January 2009

अथ क़ाफ़िर कथा

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शिवभाई की पोस्ट पर कल देखने को मिला कि, हड़ताली ब्लागरों में मैं भी शहीद हो गया हूँ ! नहीं भाई, मेरा हड़ताल उड़ताल नहीं चल रहा है..तेल वाले हड़ताल पर थे.. या हड़ताल वाले गये तेल लेने ! आप तो दिन तक गिन ले गये…  कि, 16 दिन से गायब हूँ । ‘ काना देखे जिऊ जराये.. काना बिना रहा न जायBatting Eyelashes.. ’ , मैं तो यहीं हूँ, भाई ! हाल में एनिमेटेड इमेज़ बनाने का व्यूह तोड़ा है, सो उसी के संग प्रयोग चल रहा है ! आख़िर कहीं तो टाइम खोटी करना है, न ?  पोस्ट तो दूर,  शुद्ध मन से की टिप्पणी पर ही,  न जाने कौन उखड़ जाये ?  सो, वह भी नाप-तौल कर ही होती है !  स्व. मेज़र उन्नीकृष्णन के एक बहुचर्चित मुद्दे पर मेरा अनुसंधान चल रहा है, पढ़ लेना ! अब इतनी ज़ल्दी नई पोस्ट कहाँ से टीपूँ ? लो एक पुरानी रिसाइकिल की हुई पोस्ट देखो, शायद ठीक लगे ? दरअसल आज कविता जी की चिट्ठाचर्चा पर भाषाओं के बहुआयामी प्रयोग ने मुझसे मलेच्छों की भाषा में टिप्पणी करवा दी ! लाहौल बिला कूवत.. तौबा तौबा जैसी प्रतिटिप्पणी अब तक तो नहीं आयी, पर कुछेक अहं-सहलाऊ प्रशंसकों ने लसंसे भेज कर अपनी जुगुप्सा ज़ाहिर की.. लिहाज़ा आज यही पोस्ट मौज़ूँ लग रही है ! क्यों लसंसे नहीं समझे ?  अरे हिन्दी वालों, अपुन राबचिक हिन्दी  तईय्यार कर रैले हैं  ! लसंसे बोले तो लघु संदेश सेवा यानि एस.एम.एस... अब तो खुश ?  लो पोस्ट बाँचों..
अथ क़ाफ़िर कथा
अपने एम०बी०बी०एस के दौरान हास्टल में मैंने पाया कि बाँग्लादेश की मुक्ति के बाद हमारे चंद मुस्लमीन भाईयों का मिज़ाज़ ही कुछ बदला हुआ है । ज़ल्द ब ज़ल्द नज़रें मिला कर बात तक न करते थे । बड़ी क़ोफ़्त होती थी, क्यों भाई ? समर्पण तो ज़नरल नियाज़ी ने किया है, पाकिस्तान की फ़ौज़ें हारी हैं । भला आपकी नज़रें नीची क्यों ?  मेरे मित्र व रूम पार्टनर अशोक चौहान मुझपर खीझा करते थे, " यार, तुम बलवा करवाओगे ", बेनाझाबर, चुन्नीगंज़ वगैरह ज़्यादा दूर भी नहीं था । फिर अचानक यह दिखने लगा कि उनमें से चंद शख़्शियत दाढ़ी रखने लगी, हैलेट की ड्यूटी से फ़ारिग हो, हास्टल आते ही ऎप्रन वगैरह फेंक फाँक अलीगढ़ी पोशाक पहन कर टहला करते थे, और सिर पर गोल टोपी ! एक-ब-एक कौमी निशानियाँ याद आने का सबब आप  बाद में  समझते रहें, फिर मुझे  भी बतलाइयेगा !  अभी तो मैं आगे बढ़ता हूँ …
मेरे मित्रों में इक़बाल अहमद जैसे भी थे, जो हर मंगलवार को मेरे संग एच०बी०टी०आई के पीछे वाले  नवाबगंज़ हनुमान मंदिर भी जाया करते थे । बाकायदा माथा टेकते थे, हँस कर कहते कि , यार अपने पुरखों ने जो ब्लंडर मिस्टेक किया उसकी माफ़ी माँग लेता हूँ । मेरे व्रत तोड़ते ही एक सिगरेट सुलगा मेरे संग शेयर करते थे, तब 60 पैसे डिब्बी वाली कैप्सटन अकेले अफ़ोर्ड कर पाना कठिन होता था । उसके आधे दाम में चारमीनार आया करती थी, हम लोगों के अध्ययन के घंटों की अनिवार्यता थी, वह तो ! एक एक कश के लिये छीन-झपट का मज़ा ही और है, यह लक्ज़री में शुमार नहीं की जा सकती ।
दूसरी तरफ़ इमरान मोईन जैसे शख़्स भी थे, जो इक़बाल अहमद सरीखों पर लानतें भेजा करते । इमरान मोईनुल यानि कि एक कृशकाय ढाँचें पर टँगा हुआ छिला अंडा, जिससे लटकती हुई एक अदद बिखरे हुये तिनकों सी कूँचीनुमा दाढ़ी , पंखे की हवा में दाँयें बाँयें डोला करती । बातें करते हुये वह बड़े नाज़ से उसे सहलाते रहते । एक दफ़ा किसी बात पर उनकी रज़ामंदी वास्ते मैंने लाड़ से उनकी दाढ़ी सहला दी । ऊई अल्लाह, यह तो लेने के देने पड़ गये । मियाँजी पाज़ामें से बाहर थे, गुस्से से थरथर काँपते हुये बोले, ' अमर , हमसे दोस्ती करो, हमारी दाढ़ी से नहीं । आइंदा यह हरकत की तो निहायत बुरा होगा ।'  एकाएक मैं कुछ समझा ही नहीं, बस इतना समझ में आ रहा था कि इनको पटक दूँ फिर पूछूँ , ' बोल, कहाँ  से निहायत और कहाँ  से बुरा कर लेगा ?  चल, दोनों अलग अलग करके बता कि क्या कर लेगा ? '  लेकिन जैसा कि शरीफ़ आदमी करते हैं, यह सब मैं मन ही मन बोल रहा था । उनसे तो ज़ाहिराना इतना ही पूछा, यार तेरी दाढ़ी की क़लफ़ क्रीज़ तक डिस्टर्ब नहीं हुई, फिर तू क्यों इतना डिस्टर्ब हो रहा है ? ज़नाब चश्मे नूर फिर बिदक गये, 'तुम साले क्या जानो , दाढ़ी का ताल्लुक़ हमारे  ईमान से है ! इस पर हाथ मत लगाया करो, समझे कि नहीं ? अब मुझे भी 100% असली वाला गुस्सा आ गया, " चलो घुस्सो ! अग़र दाढ़ी में ही तेरा ईमान है तो बैठ कर अपना xx सहलाते रहो । " और उनके इनसे-उनसे भविष्य में संभोग कर लेने की कस्में खाता हुआ , मैं वहाँ से पलट लिया । वह पीछे से चिल्ला रहे थे, " सालों तुम भी तो चुटइया रखते हो और अपने धरम को उसमें बाँधे बाँधे तुम्हारे पंडे घूमा करते हैं, जाकर उसको सहलाओ, फिर मेरी सहलाना । "  हमारे इक़बाल भाई , जो  स्वयं ही सफ़ाचट्ट महाराज थे, मेरे इस डायलाग के पब्लिसिटी मॆं जी जान से जुट गये और लगभग सफ़ल रहे । ख़ुदा उनको उम्रदराज़ करे… 
पोस्ट लंबी हो रही है, चलते चलते इसी संदर्भ की एक अन्य घटना का ज़िक्र करने की हाज़त हो रही है । तो, वह भी कर ही लेने दीजिये, कल हो ना हो ! दसेक वर्ष पहले शाम को मेरे क्लिनिक में एक सज्जन आये । लहीम-शहीम कद्दावर शख़्सियत के मालिक , वह बेचैनी से बाहर टहल रहे थे यह तो काँच के पार दिख रहा था, लेकिन बरबस मेरा ध्यान खींच रहे थे । उनसे ज़्यादा मैं उतावला होने लगा कि इनकी बारी ज़ल्द आये, देखूँ तो यह कौन है ? खैर, वह दाख़िल हुये, बड़े अदब से सलाम किया, फिर अपना तआर्रूफ़ दिया कि मुझे नक़वी साहब ने भेजा है और मुझे यह-वह तक़लीफ़ है । मेरे मुआइने के बाद, वह फिर मुख़ातिब हुये , " डाक्टर साहिब, दवाइयाँ कैसे लेनी हैं, यह निशान बना दीजियेगा । "  मैं हिंदी में ही अपने निर्देश लिखता हूँ, इसलिये थोड़े ग़ुमान से बोला अंग्रेज़ी-हिंदी जिसमें चाहें लिख दूँगा । वह फ़ौरन चौंक पड़े, प्रतिवाद में बोले कि उनको हिंदी अंग्रेज़ी नहीं आती लिहाज़ा निशान के ज़रिये ही समझ लेंगे । अब मैं चौंका, क्या चक्कर है ? अच्छा भला पढ़ा लिखा लगता है, सन्निपात के लक्षण भी नहीं दिखते फिर भी कहता है कि पढ़ना नहीं जानता ! अलबत्ता वह मेरे चेहरे को पढ़ ले गये । थोड़ी माफ़ी माँगने के अंदाज़ में बोले, "मैं दरअसल बिब्बो की शादी में कराची से आया हूँ, और सिंधी ( मुल्तानी-पश्तो लिपि का मिश्रण) व उर्दू के अलावा कुछ और नहीं पढ़ पाते । उनकी परेशानी समझ मैंने बड़ी सहज़ता से लिखना शुरु किया ....
 ايک ايک دن ٔم تين بار ک کپسول روذ رات  यानि एक एक दिन में तीन बार, एक कैप्सूल रोज़ रात
लो,जी ! वह फिर चौंके, थोड़े अविश्वास से कुछ पल मुझे देखते रहे । मेरे माथे पर एक छोटा सा लाल टीका, बगल में माँ दुर्गा कि मूर्ति...कुछ संकोच से पूछा, ' आप तो हिन्दू हैं ? ' हाँ भाई, बेशक ! बेचारे हकला पड़े, " तो..तो, फिर यह उर्दू आपके ख़ुशख़त में कैसे ? " अच्छा मौका है, चलो एक सिक्सर ठोक दिया जाये । मैंने कहा , ' मैं क्यों नहीं लिख सकता ? क्या उर्दू आपकी ही मिल्कियत है ? उर्दू भी तो आप इसी मुल्क़ से ले गये हैं ! '  एकदम से खड़बड़ा गये श्रीमान जी," नहीं नहीं हम लोगों को वहाँ कुछ और ही बताया जाता है । "  मैदान फ़ेवर कर रही है, सिक्सर ठोंक दो,  अमर कुमार ! अतः मैंने हँस कर कहा, ' यही न कि क़ाफ़ (    ک  )  से क़ाफ़िर ( کافر     ) , जिसमें धोती कुर्ता में एक आदमी दिखाया गया है, और हे ( ح   ) से हिंदू (    حندو   ) जिसमें एक सिर घुटे चुटियाधारी पंडितजी तिलक लगाये हुये अलिफ़ अव्वल की क़िताबों में बिसूर रहे हैं । ' एकदम से खिसिया गये, चंद मिनट पहले उनका फटता हुआ माथा जैसे फ़िस्स हो गया , " यह तो अब सारी दुनिया जानती है कि हमारे हुक़्मरानों ने पाकिस्तान को क्या दिया और दे रहे हैं । वापस जाने से पहले एक बार आपसे फिर मिलूँगा, अल्लाह हाफ़िज़ ! "  वह मिलने तो नहीं आये, लेकिन कुछ वर्षों तक ख़तों का आना जारी रहा जिसके ज़रिये उन्होंने इत्तिल्ला दी कि मेरा पर्चा उन्होंने फ़्रेम करवा कर अपने होटेल में लगवा रखा है और वह उनके लिये कितना बेशकीमती है । एक पल को हर आने वाला उसके सामने ठिठक कर एक नज़र देखता ज़रूर है । यह किस्सा मैंने कोई आत्मप्रशस्ति में नहीं लिखा है यह तो , केवल एक झलक  देता है कि लोचा कहाँ पर है !  क्या हम यह नहीं जानते कि भाषा का प्रयोग इंसानों को बाँटने का प्राचीनतम ज़रिया  है ?
अब जरा मेरा टाइमखोटी करने का परिणाम भी बताते जाइये
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02 December 2008

कौन है यह, जाकिर-उर-रहमान उर्फ चाचा ?

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अगर आप मुंबई पर हुए आतंकी हमले की तह में जाएं तो सरकारी एजंसियों द्वारा की गयी अंतहीन मनमानियां और लापरवाही सामने दिखाई देगी. मसलन, मार्च २००६ में अमेरिकी राष्ट्रपति जार्ज बुश की यात्रा के बाद अल-कायदा के प्रमुख ओसामा बिन लादेन का एक आडियो संदेश जारी हुआ था जिसमें लादेन ने यहूदियों, ईसाईयों और हिन्दुओं को निशाना बनाने की बात कही थी.   amar-ekamar-twoamar-three  निर्देश दे रहे थे. उन्हें बार-बार फर्जी सौदेबाजी की भी सलाह दी जा रही थी.
अब देखें कि आतंकी हमला हुआ कैसे और उसका टार्गेट क्या था? हमले की रात हमलावरों ने १३ स्थानों पर अंधाधुंध गोलीबारी की थी. पहला हमला रात के ९.२१ पर सीएसटी स्टेशन पर हुआ. पहले हमले के लिए सीएसटी को ही क्यों चुना गया? क्योंकि वे हमले की शुरूआत किसी ऐसे प्रतीक से करना चाहते थे जो उनके मंसूबों का संदेश दे सके. इसके बाद हमलावरों ने कुल सात जगह विस्फोट किये. एक होटल ताज के बाहर, एक मझगांव में, तीन ओबेराय होटल के बाहर और एक विलेपार्ले टैक्सी में. कामा अस्पताल सहित कई जगहों पर हैण्डग्रेनेड फेंके गये. होटल ताज, ओबेamar-fouramar-fiveअमर 
सौजन्य: आतंकी हमला हुआ कैसे ? मूल आलेख: प्रेम शुक्ल<premshukla@rediffmail.com>मूल असंपादित चित्र: Boston.com
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21 November 2008

ज़वाब कोई ज़रूरी तो नहीं, फिर भी ?

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RECAP: बिग-बी अपने कबीले में होने की खोजबीन से उपजे एक प्रतिक्रियात्मक पोस्ट के आगे...

अपने चहेते मंच चिट्ठाचर्चा से सूतनिट्ठल्ले की कपास को लेकर एक बेवज़ह लट्ठम-लट्ठा हो चली । नतीज़तन जुलाहे की लट्ठम-लट्ठा की प्रामाणिकता पर चंद सवाल उठे व ख़ारिज़ भी कर दिये गये । यह एक अप्रिय प्रसंग है, जो टाला जा सकता था, किन्तु... ? बहुत सारे किन्तु, जब एक प्रश्न बन कर खड़े होते हैं, तो ज़वाब माँगने लग पड़ते हैं, लिहाज़ा.. मन में यह चल रहा था कि क्या ज़वाब से मुँह मोड़ लिया जाय या अपने ब्लागिया-सिकंदर को पोरस की सीख याद दिलायी जाय, जो भी हो यह तो पूछा ही जा सकता है कि, ज़वाब देना क्या ज़रूरी है ?
पर यह ज़नाब क्या कह रहे हैं “ जब संविधान बना, तो सबसे ज्यादा अहमियत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को दी गयी। अगर आप किसी की आलोचना (गलत आलोचना नहीं, बल्कि सही) को सहन नहीं कर पाते हैं, तो आपको दूसरे की आलोचना करने का भी हक नहीं है। विचारों की दुनिया में आप तभी तक जिंदा रह सकते हैं,जब तक आप दूसरे लोगों के विचारों का सम्मान करते हैं।”
सो, मेरे साहज्य को निरूत्तर करता हुआ वर्तमान स्थियों का अपना ही अलग थलग उत्तर है.. क्योंकि,
अमर टू स्वामी हाँ और नहीं... इस तराजू के दो पलड़े हैं….
पहले हाँ से शुरु करते हैं
वह इसलिये कि मुझे ही क्या शायद किसीको भी दंभ नहीं सुहाता
वह इसलिये कि यहाँ साँस रोके रोके दम घुटने को हैं
वह इसलिये कि हम विवादप्रिय ब्लागिंग के रहनुमा नहीं हैं
वह इसलिये कि यह स्वतंत्र ब्लागिंग है, पराधीन लेखन नहीं
वह इसलिये कि अन्य बहुत से कारण हैं,                                     जो अकारण बताये नहीं जाते और..

वह इसलिये भी कि गुबार अभी थमता दिख नहीं रहा है

“इधर इंटरनेट पर बिखरे ज्ञान के डबरों में हर-हर गंगे करते लोग उधर  इन्टरनेट की गटर-गंगा मे मनचाहा उत्सर्जित करने की स्वछंदता का मजा लेते लोग. ये जो पूछ जाएं कम, वो जो लिख जाएं कम!
मामला खतरनाक होता है जब बंदर के हाथ तलवार लग जाए या आदमी के हाथ की-बोर्ड! कॉमेडी ऑफ़ एरर्स - त्रुटियों का हास्य - गलतियों पर गलतियां और उस पर गलतियां.. पढने-सुनने वाला हंसते हंसते जब कुढ जाए तो ब्लाग लिख मारे.”
स्वतंत्र ब्लागिंग बनाम तमाम असहमतियाँ
बयान नम्बर एक बकौल स्वामी “मालूम है यार! मगर "." पूर्ण-विराम का काम भी करता है और दशमलव का भी, कम कोड मे काम हो रहा है. हम <Edi tor> नही बना रहे यार, हम जनता को सार्वजनिक शौचालय बना के दे रहे हैं ताकी वो <Internet> पे जब चहे फटा फट हग सकें ... " आपको <Internet> पे कुछ हगना है? <HUG> का प्रयोग कीजिये और खुश हो जाईये!" टिन्ग-टिडि न्ग. आप हिन्दि अन्ग्रेज़ी कि खिचडी ऐसे "<" ">" मे लिख के कर सकते हो - वो ज्यदा महत्वपूर्ण है.”
तो स्वामी जी मैं आया भले देर से किन्तु हगने की प्रेरणा तो 2005 में ही आपसे प्राप्त कर ली थी, सो आज तलक  हग रहा हूँ !
अब किसीको बदबू आये तो भी कोई चारा नहीं है, इस 'लिखेला ठेलेला' के पास ! 
साथ ही एक आशंकित मन जो यह बयान करता या कहता है कि
“जो हो सो हो - गेन्द अब पराये पाले मे है, जिसको जमे उपयोग करो ! हिंदी ब्लॅग वालो से निवेदन है - हिन्दी मे जवाब देने के इस टूल को ब्लॅग मे भी घुसेडने की प्रक्रिया पे विचार हो सके तो वाह - अपन इस गेम मे नये हैं मदद करो यार लोग - ये कट-पेस्ट कि झन्झट खतम हो!”
और आपने उदारतापूर्वक माँ बहन करने की छूट देदी वह अलग “एक तरफ़ तुरन्त हिन्दी की सेवा का दौरा ... दूसरी तरफ़ अपने बनाए हुए टूल के इस्तेमाल की खुशी. मध्यम-मार्ग - अपन ने भी एक ठीक-ठाक सा टूल उतारा इन्टर्नेट से और बदले में अपना टूल दुरुस्त कर के हरम ... मतलब फ़ोरम वालों को कोड देने की प्लानिंग - पूराने अड्डे है अपने आना-जाना लगा रहता है उधर जनता देवनागरी में मां-बहन करती रहे और क्या चाहिये जिस फ़ोरम वाले को हिन्दी लिखने कि सुविधा देना है अपने कोड कि लिन्क हाज़िर है. हिन्दी पेलने का दौरा कितना घातक हो सकता है इसका सटीक प्रमाण - पेलो और पेलने के टूल बना के दो - आखिर मेरे अन्दर का लेखक, कलाकार और शिल्पी अपना सही सन्तुलन पा ही गया - ढिंग - टिडिंग! “
साथ ही एक क्षोभ भी दिख रहा है  “ Nahee yaar .... tune try kiya kya software -
भइ, मैंने ट्राई कर लिया इस को. युनिकोड नही देता! मैंने दूसरी युनिकोड फोन्ट के साथ टेस्ट किया - अपने काम की चीज़ नही है! हम को इन्टर्नेट पे लिखना है सीधे-सीधे ... मेरि गान्ड क्यों जलेगी? वो १५ दिन का एव ेल्युएशन दे रहा है फिर पैसे मांग रहा है - तु पैसे दे और खरीद ले यार! हर बात लिख ले क्यों समझनी पदती है तेरे को ... उपरवाले ने अच्छा-भला दिमाग दिया तेरे को, कितनी बार बोला, गन्डमस्ती करने मे जितना दिमा ग लगाता है उतना काम कि चीज़ मे लगा - लाईप बन्न जयेगी तेरी!”
लेकिन अंतिम बाजी आलोक व श्रीष जी के हाथ लगी, खैर.. छोड़िये यह बीते वक़्त की बाते हैं
किसी ज़माने में भदेस को लेकर आपकी ज़द्दोज़हद से मैं भी द्रवित हुआ था, इस आलेख पर..
ई-स्वामी से ई-पेलवान हो जाऊं ?
“आजकल हिंदी ब्लाग्स पढते हुए मेरे ज्ञानचक्षुओं में नए नए ब्रांड का गुलाबजल पडता जा रहा है. मुझे तो लगता था संस्कृत रामायण की तुलना में तुलसी की रामायण भदेस है क्योंकी वे सर्वसुलभ भाषा में हैं, कबीर और रहीम के दोहे उच्चकोटी का भदेस हैं क्योंकी वे जितने जटिल विषय पर हैं समझने-समझाने और बोलने में उतने ही आसान. श्लोकों और ऋचाओं की तुलना में भक्तिगीत भदेस है.. हीरें-काफ़ीयां-कव्वालियां भदेस हैं.
मुझे नही पता था की भाषा तब तक भदेस नही होती जब तक वो बुजुर्गों के सामने बोलने लायक ही ना बचे. बच्चों महिलाओं के सामने सम्मान खोने लायक ही बचे. क्या हम पर अपने पाठकों को ये फ़ील गुड देने का जिम्मा नही है की मै आपकी रिस्पेक्ट कन्ना चा रिया हूं! अपना ना सही अपने भदेस का तो सम्मान करो यार!
टेंशन मे नींद नही आ रही बाबा!
हिंदी के ब्लाग पढने के बाद हाल ही में मुझे एहसास तो हुआ है की  मेरा ब्लाग भी सांप्रदायिक है चूंकी इसके नाम ई-स्वामी में ’स्वामी’ शब्द आता है जो जनरली हिंदू स्वामियों के लिये प्रयोग मे आता है. अब हर एक के पास नाम का मतलब निकालने की ना तो अक्ल है ना समय है. जाहिर तौर पर  इस बात से कोई सरोकार नही होना चाहिये की मेरी सोच क्या है - नाम के आधार पर ही पूर्वाग्रह बनाए जाने चाहिए.....
वैसे तो अपने ब्लाग का नाम ‘ई-बुद्धा’ ‘ई-ज्ञानी’ या ’ई-उस्ताद’ भी हो सकता था लेकिन हुआ नहीं - इतने समझदार होते हम तो हिंदी ब्लागिंग करते? फ़िर सिख संप्रदाय में ज्ञानी शब्द धर्म के ज्ञान रखने वाले के लिये भी प्रयोग होता है इसलिये भी मामला थोडा लोचे वाला है.  स्वयं-भू स्वामी होने के लिये ज्ञानी होने की कोई कंडिशन नही ना थी तो रख लिये नाम!
चूंकी नाम से अगर मेरे सांप्रदायिक होने का प्रमाण बन सकता है तो देसी शैली में उस प्रमाण को मिटाना जरूरी है.  डर के मारे कभी कभी लगता है कोई रेडिकल स्टेप ले लूं .. लेकिन अब अचानक “ई-मौलवी” हो जाऊं, तो भी, नया लफ़डा तब भी हो सकता है!  (क्या करूं यार कुछ समझ नही आ रिया!) “

खैर,इन मुर्दे आलेखों को कुरेदने से क्या लाभ ?

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लेखक हो या ब्लागर, उसके शब्द ही उसकी सोच के प्रतिबिंब बन कर, यहाँ उसका प्रतिनिधित्व करते हैं.. जैसे कि यह प्रतिक्रिया, जो हमारे विज्ञान में भी साइड इफ़ेक्ट ही कहलाती है !
” डॉ. अमर को बिग बी उनके अपने कबीले के नहीं लगते, यानी मैं भी उन्हें अपने कबीले का नहीं लगता (बिग बी और मैं एक ही कबीले के हैं).वैसे बिग बी और मैं, डॉ. अमर को अपने कबीले के लग भी नहीं सकते.. हम अपनी उदारता और ओढी हुई इन्क्लूसिवनेस के चलते आम आदमी के करीब होना चाहें ना, तो भी नहीं!
देखिये, डॉ अमर एक आम आदमी हैं, हम जैसे कोई सेलिब्रिटी तो हैं नहीं… यही वजह है!....
मेरी पिछली पोस्ट में मैंने बिग बी को अपने कबीले का कहा! अगर कोई भी ७०+ आई.क्यू. वाला, लेख को पढेगा तो समझ लेगा की लेख में ‘कबीला’ एक प्रोवर्बियल/एब्स्ट्रैक्ट टर्म की तरह प्रयोग किया गया है. डॉ. अमरजी चिढ गए.. मुझे उनसे सहानुभूति नहीं हो पा रही है है क्योंकि मुझे तो बस अपने कबीले की सेलेब्रिटीज़ से ही सहानुभूती होती है! सोचा डॉ. अमर जैसे आम लोगों कों उन हालातों का अंदाज़ा होगा - जो की स्पष्ट तौर पे उन्हें नहीं था! दन्न से कम्यूनिस्टों की माफ़िक विरोध दर्ज कर दिया …असंतुष्टों की माफ़िक अमिताभजी द्वारा मात्र हिंदी में ही लिखने की मांग भी अपने ब्लाग पर धर दी! आपकी टैग है “अपन तो बस लिखेला और ठेलेला” ये कैसे चलेला?  अमिताभ बच्चन जब अपना ब्लाग हिन्दी में लिखते हैं तो वे ईस्वामी को अपने कबीले के आदमी लगते हैं”

क्या सच्ची में... एक सोच का पुनःनिरीक्षण है ( मैंने मूल लेख को पढ़ने की ज़हमत भी नहीं की ) मुझे भान था कि साढ़े चार साल से हिन्दिनी चलाने वाले से मुझे बहुत कुछ सीखना है, सो यह मेरा अपना मत है, यह किसी स्वामी का विरोध नहीं था बल्कि इससे मिलता जुलता कोई नाम तक उस आलेख के आसपास भी फटकने नहीं दिया गया है, बहुतों ने पढ़ा होगा इसे !
पर साइड-इफ़ेक्ट में इसके उलट किन्हीं डा. अमर को परिलक्षित करके ही उन्होंने अपने शब्दों को नाहक ही जाया किया है, अरे बंधु 50 माइनस आई क्यू ही सही, पर चासर की अंग्रेज़ी इतिहास में भी कबीले के संदर्भ को लेकर CLAN का प्रयोग है, जो बिरादरी के रूप में परिभाषित हुआ है.. यह ज्ञान क्या केवल आपको ही प्राप्त है ? ARIN व मोडरेशन की सुरक्षा में यदि आप अपने निजी शौचालय में यह दोहराते पाये जाते हैं कि..हम को इन्टर्नेट पे लिखना है सीधे-सीधे ... मेरि गान्ड क्यों जलेगी ? अभिनव का सोना हो, या अमिताभ का ब्लाग यदि आपको सहसा अपने लगने लगते हैं, तो मैं क्यों आपको याद दिलाऊँ कि.. उपरवाले ने अच्छा-भला दिमाग दिया तेरे को, कितनी बार बोला, गन्डमस्ती करने मे जितना दिमा ग लगाता है उतना काम कि चीज़ मे लगा - लाईप बन्न जयेगी तेरी!  

दन्न से कम्यूनिस्ट होने का अर्थ जानते हैं, आप ? अब मैं किस पर तरस खाऊँ, अपने आप पर ? पर तरस खाने के संदर्भ में अपने के साथ हमेशा आप को भी क्यों लपेटा जाता है, इस पर गौर करियेगा ! रही बात आम आदमी की.. तो मैं सहर्ष स्वीकार करता हूँ कि मैं आम आदमी हूँ, और आम आदमी के रूप में ही पहचान बनाये रखना चाहता हूँ, मैं आम आदमी इसलिये भी हूँ, क्योंकि झाबुआ के हाटों में घूम कर आम आदमियों को जंगल से बीन कर लायी चिरौंजी के बदले तौल में नमक दाल लेते देखा है, इसी वर्ष अप्रैल में 0.3 डालर ( Rs.15) के एवज़ में  12 घंटे की मज़दूरी करती झारखंड की औरतों से रूबरू हुआ हूँ, और अभी हालिया मिज़ोरम यात्रा में कलकता के साहूकारों को मात्र 2 रूपये किलो के भाव से शिमला मिर्च ( Capsicum-for your reference) ख़रीद कर ट्रक लोड करवाते देखा है । सो आपका गाली के रूप में आम आदमी का प्रयोग किये जाना तो बेकार गया कि नहीं ? यदि नहीं, तो बात ख़तम ! फिर भी याद दिलाना चाहूँगा कि..  वह आम ही हैं, जो अपने टाँगों के बीच से किसी ख़ास को निकालते हैं । यदि दो पीढ़ी पीछे जा सको, तो पूर्वजों को लोटे से चाय सुड़क सुड़क कर पीते देख पाओगे ! जब यही बिग-बी साइकिल पर कटरा से सब्ज़ियाँ लाते देखे जाते थे, या जब वह  अपनी आवाज़ के चलते रेडियो एनाउंसर के तौर पर भी अस्वीकार कर दिये गये थे, तब आप किस कबीले में शुमार होते थे ? तब भी आप कबीला ढ़ूँढ़ ही लेंगे, नान सेलेब्रिटी होने का !

यह तिवारी जी तो बड़े सुलझे माने जाते हैं,फिर भला क्यों ऎसी बेतुकी हाँकने की ज़ुर्रत कर बैठे
जरा बानगी लेंगे ? चलो, यह लेख इतना बड़ा हो रहा है, तो यह भी आज यहीं समेट दिया जाय
“.....अब ये ईस्वामी क्या हैं.. मैं नहीं जानता.. वे सनक, सनन्दन, सनातन हैं या सनत्कुमार.. हो सकता है कुछ लोग जानते हों.. मैं नहीं जानता.. हाँ उनके हाल के एक डर के बारें में ज़रूर जान गया हूँ.. उन्हे डर है कि साम्प्रदायिकता के इस (ऑफ़ कोर्स आर्टीफ़ीशिएल) हल्ले में उन्हें साम्प्रदायिक समझ लिया जायेगा.. इस पर मेरा जवाब उन्हे यह है..
साम्प्रदायिकता के मसले पर आप न ही बोलते तो कम से कम हमें आप के बारे में भम बना रहता.. पर बोल के आप ने खुद ही अपना कचरा कर लिया.. अब तो पोल खुल गई कि आप की समझ भी उतनी ही संवेदनहीन है जितनी एक बहुसंख्यक समुदाय के किसी खाते पीते व्यक्ति की होती है.. क्या समस्या है.. क्यों गला फाड़ रहे हो? थोड़ी शांति रहने दो.. हर चीज़ में साम्प्रदायिकता साम्प्रदायिकता.. हद कर रखी है तुम लोगों ने.. छी.. कब तक इस तरह का ज़हर फैलाओगे..आदि आदि.. इस प्रकार के विचार आप के नारद समुदाय में कूट कूट के भरे हैं.. “
लगता है, अभय जी को कुछ और गहरे उतरते हुये भी देखना पड़ेगा, आख़िर वह क्यों बाध्य हुये यह लिखने को, कि...
“ समझ रहे हैं..? नहीं.. आप को ये नहीं समझ में आएगा.. क्योंकि आप बहुसंख्यक संवेदनहीनता के शिकार है.. और फिर देश से बाहर भी हैं..आप अपने सपने को भयानक कह रहे हैं.. माफ़ करें आप नहीं जानते कि भय क्या होता है और भयानक क्या होता है..
आप लोगों ने एक समय में देश से बाहर रह कर अपनी ज़मीन से अपनी भाषा से जुड़े रहने के लिए एक सचेत कोशिश के तहत एक सार्थक मंच बनाया.. हम आप के उस योगदान को समझते हैं.. उसकी एक वक्त तक एक भूमिका थी.. पर हर चीज़ की तरह उस भूमिका की भी एक सीमा है.. पिछले कुछ महीनों में आप के इस मंच से जो लोग जुड़े वे अलग ज़मीन और पृष्ठभूमि से आते हैं.. आप उनकी ज़रूरत और जज़्बे को नहीं समझते.. वे विदेशी ज़मीन पर अपनी भाषा को जिलाये रखने की चिंता से ग्रस्त नहीं है.. उनका आकाश दूसरा है.. आप की खिड़कियों से वो नज़र नहीं आयेगा..
आप अभी भी नारद को एक किटी पार्टी समझ रहे हैं..जबकि इस में आजकल बहुत सारे भूखे नंगे अवर्ण अछूत आप की पार्टी स्पॉयल करने घुस आए हैं.. आप के पास दो ही रास्ते हैं या तो अपनी समझ को परिमार्जित कीजिये और इस मंच को शुद्ध व्यावसायिक स्तर पर दुबारा खड़ा कीजिये.. या अछूतों अवर्णों को बाहर कर के अपने घर के दरवाजे और कस के बंद कीजिये.. और चालू रखिये अपनी किटी पार्टी को..”
जो भी हो, मुझे क्या ? बड़े उदार हैं आप, आपने तो कृपापूर्वक उनको टिप्पणी भी दे दी…
“.......व्यक्ति, उसकी छवि, उसके व्यक्तिगत सरोकार, उसके ब्लाग, ब्लाग की एक पोस्ट और उसके अन्य इन्टरनेट सरोकारों को ऐसे मनघडंत सुविधाजनक कनेक्शन्स में जोड कर देखा जाना और फ़िर तुरत-फ़ुरत राय प्रकाशित किया जाना कितना सही है? ऐसे जजमेंटल लेखन का क्या मूल्य हो उस पर प्रतिक्रिया ही क्यों करूं? प्रतिक्रिया इसलिये की अब तक मैं आपका प्रतिक्रिया करने जितना पूरा सम्मान करता हूं भई ! नज़र-अंदाज़ नही करता ! “
अब स्वामी जी लाख टके का सवाल ... Sorry Sorry Sorry, लेट मी बी मोर क्लीयर,  So, pondering over a million dollar question कि आपकी यह नीति अभी  की हालिया साइड-इफ़ेक्ट लिखते समय, आखिर  किस अंतरिक्ष में बिला गयी थी ? इन्फ्लेटेड अहं को ठेस पहुँच गयी क्या.. वह भी इंडिया से सीधे अमरीका ?  अरे धत्त, ऎछा नेंईं करते  !
मैं तो आपकी आज्ञा शिरोधार्य करके सुधरने के प्रयास में लगा ही हूँ, अब सार्वजनिक शौचालय की छोड़िये, जो बीत गया वह लौटेगा नहीं..आप चाहें तो भी नहीं लौटा सकते, सबजन मिलि के अब आगे की सुधि लेय…. सो, कृपया यह तो बता दें कि आपको किस  नाकामयाब सुधारगृह ने शरण दी थी ?  स्वामी लोग तो वैसे भी राग-द्वेष से दूर रहते हैं, सो यह सब तज हम अकिंचनों का पथप्रदर्शन करते रहें, बट इन अ हेल्दी वे ! सबको दर्द होता है ! हम तो जपने को तैयार हैं.. अहं ई-स्वामी शरणम गच्छामि, और यदि आप चाहेंगे तो, जयकारा भी लगाया जायेगा, जय हो ई-स्वामी !colorbar_e0

यह पोस्ट लिखने की मज़बूरी आप समझते हैं, न ? आप तो साढ़े चार वर्षीय ब्लागर ठहरे, नहीं ? सो अहंवाद, महंतवाद या मठाधीशी वगैरह से एक आम ब्लागर को कितनी तक़लीफ़ होती है, अब आपसे बेहतर कौन समझता है ? वह कहते हैं न कि, पसंद अपनी अपनी..  ख़्याल अपना अपना.. शायद इसी ज़द्दोज़हद में नारद भी आक्सीजन माँग गये । सो, बचा खुचा हिन्दी ब्लागिंग साबूत रहने दीजिये । लिखेला-ठेलेला वाले आम मनुष्यों के लिये आपके पास क्लिक करने को एक माउस तो होगा ही ? ऎसे में उसे प्रयोग कर लिया करें, बात खत्म ! आपके आदेशानुसार आपका पुराना लिखा ही तो पढ़ रहा हूँ, वही यहाँ दिखाया भी है,पाठक यदि इसमें स्वादानुसार नमक मिर्च डाल कर पढ़ें,तो भला कोई बताये कि मेरा क्या दोष ? चरित्र-विच्छेदन या व्यक्तित्व-संधान मेरा शगल नहीं है ! इसको हनन भी न कहें, क्योंकि एक एक शब्द आपका ही  है !

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31 October 2008

फ़ौरी तौर पर….

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यह या कोई अन्य पोस्ट लिखना तो नहीं चाह रहा था । Aaj ka background श्री परसाई  जी,  ज़नाब कन्फ़्यूसियस साहब, महादेवी जी इत्यादि के उत्तराधिकारियों के मध्य मुझ  जैसे लावारिस बेलौस ब्लागर का क्या काम ? प्रतिक्रियाहीन असम्पृक्त समाज का यह सदस्य कुछ भी लिखेगा, तो..  ख़ैर जाने दीजिये ! वैसे ही यहाँ साहित्यिक हिन्दी, आंचलिक हिन्दी, प्रचलित हिन्दी, खड़ी हिन्दी, पड़ी हिन्दी etc. को उठाने वाले बहुजनों की बहुतायत है | ब्लागिंग के  पेशेवर, गैरपेशेवर, तक्नीकी, भड़ासी, फ़ँतासी इत्यादि किसी वर्ग में फ़िट हूँ ? शायद नहीं,  तो ?
आज सुबह उठने के बाद गैलरी में ज़मीन पर पड़े अख़बार से आँखें चुराता हुआ, मैं टायलेट की ओर बढ़ लेता हूँ । इससे तो आप भी सहमत होंगे कि मुद्दों से ज़्यादा संडास ज़रूरी है, बड़े बुज़ुर्ग यह कहते पाये गये थे कि, “ पेट भारी तो सिर भारी !“ अब उनके ज़माने में यह ब्लागिंग नामक पंछी तो सोचा भी न गया होगा, वरना  वह  ब्लागिंग को अपवाद स्वरूप अवश्य ही शामिल कर लेते ! शायद कहते “ पेट भारी तो सिर खाली “, यह शिव का यह ज्ञान मुझ पर भी लागू होता होगा ! हाँ तो, मैं अख़बार से नज़रें चुराता गया, जाने क्या संदेशा लाया हो, मुख्यपृष्ठ पर अच्छी ख़बरों का टोटा तो बना ही रहता है, वैसे भी । अक्खा इंडिया में कुझबी तो मस्त नहीं दिखेला है, भिड्डू !
अब गिरे हुये को तो उठाना ही पड़ता है न, भाई ? देहरी पर पड़े की कब तक अवहेलना करोगे, जब इनका बहुमत हो जायेगा, तब ? सो, मैंने अख़बार उठा ही तो लिया.. और जिसका डर था बेदर्दी … वही बात हो गयी ! सामने शिवम सुंदरम से अटा पन्ना !
  असहमत मौन
किंचित अफ़सोस है, यह पहले ही देख लेता तो संडास के लिये काँखना तक न पड़ता ! सरकारें आती हैं.. खुद को बचाती हैं, संभल तो जाओगे.. कभी तो संभल ही जाओगे… खुद को बेखुदी से बचाओगे… संभल तो जाओगे.. . कि तुम बिन सूना सूना है ! छोड़िये जी, आपको कोई इसी लिये पसंद नहीं करता, सदा कंधे पर सवार पंडिताइन लानत मलानत करती हैं,” क्या ज़रूरत है, सब काम छोड़कर यह कार्टून गढ़ने की… और यह पैरोडी बनाने की ? आराम से चाय पियो, ठंडी हो जायेगी तो क्या मज़ा देगी ?”
हिन्दी मत बोलो, मारे जाओगे
सत्यवचन पंडिताइन, मैं ख़्वामख़ाह ही अली-रज़ा पर लानतें भेजता रहता हूँ, मज़ा तो यहीं रखा है.. बिल्कुल सामने ही, इस गरम चाय की प्याली में ! वह तो हमारे लोकतंत्र की संप्रभुता सार्थक कर रहे हैं.. पंज़ाब सिंधु गुजरात मराठा.. अब द्राविड़ उत्कल बंगा !
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“ फिर भी तुम यह पोस्ट ठेले जा रहे हो, बेशर्म कहीं के ! जाओ, क्लिनिक जाओ.. बारह यहीं बजा रहे हो !” बट नेचुरल, इट इज़ माई एनिमी नंबर वन, पंडिताइन ! सो, मैं चलता हूँ मित्रों ( कहने में क्या जाता है ? ), यदि आपमें से कोई टिप्पणी बक्से की ओर जाये, तो जरा यह ज़रूर बताये कि बारह किसके बज रहें हैं ?  बाकी लिखा सुना माफ़ करना.. आप सब को मेरा सुप्रभात !


इससे आगे

07 October 2008

नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः मीमांसा

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डिस्क्लेमर:  यदि आप लम्बी पोस्ट पढ़ने का धैर्य रखते हों, तभी यह पोस्ट पढ़ें   !  अधूरी पोस्ट पढ़कर इसमें दी जारही महत्वपूर्ण जानकारियों की अवहेलना करके, देवी का कोपभाजन न बनें। इसे तत्वबोधीय पोस्ट समझने का यह मित्रवत आग्रह है ! कृपया अपनी टिप्पणी यहाँ रखे टिप्पणी बक्से में ही डालें । ई-मेल या अन्य इलेक्ट्रानिक माध्यम से प्रेषित टिप्पणियाँ स्वीकार नहीं की जायेंगी। अपने दिमाग की सुरक्षा स्वयं करें ।

वस्तुतः मेरी पिछली पोस्ट पर श्री अनूप जी की टिप्पणी आयी, कि महाराज इस पोस्ट में वर्णित श्लोकों का अर्थ तो दे देते । सतीश बोले कि गागर में सागर.. ! इस प्रकार अपने ही हाथों यह धर्मसंकट उत्पन्न किया, सो प्रायश्चित स्वरूप यह पोस्ट ठेलने का साहस किया गया है । गवारा तो नहीं था, पर जैसा कि होता आया है… इस पोस्ट को ठेलने के सुझाव के पीछे पंडिताइन का हाथ है.. सो यह जन्म जन्मांतर के पाप की कड़ी मात्र है । मेरे ख़्याल से तो हर गृहस्थी में एक अदद सोनिया गाँधी अवश्य होती होंगी ! मूल रूप में 7 अक्टूबर 2007 को लिखे गये पोस्ट का यह संशोधित एवं संवर्धित स्वरूप है । मैं इसको रिठेल कहने को बाध्य भी नहीं हूँ, क्योंकि रिठेलने का मेरा कद नहीं है । बल्कि कोई कद ही नहीं है,…. चिट्ठाकारी का कद से क्या संबन्ध ?  वरिष्ठता का सदैव आदर किया जायेगा और टिप्पणियों की बाढ़ को प्रत्यक्षतः तो सराहा जायेगा  किन्तु परोक्षतः ईर्ष्या की जायेगी, ऎसा मेरा निश्चय है । इसको टिप्पणी की प्रतिटिप्पणी के रूप में भी कृपया न लें, यह मेरी विधा नहीं है । इतनी लम्बी पोस्ट के मायने ? कुछ तो यह लम्बी ही  पैदा हुई थी… बाकी रहा सहा मैंने और खींच दिया । वज़ह ?  वर्तमान हालात व मेरी समझ के समीकरण से, निकट भविष्य में मेरा हृदयपरिवर्तन हुआ ही चाहता है, बस घोषणा ही बाकी है । सो, इस पोस्ट को फ़ुरसतिया घराने में शुमार किये जाने की संभावनायें टटोलना  आरंभ किया जायें । प्रशंसक टिक जायेंगे   और  मुँहदेखी  वाले भग जायेंगे ।


अथ आरंभः या देवि सर्वभूतेषु ब्लागररूपेण संस्थिता lgupdated_e0

यह शीर्षक, क्यों ? आज षष्ठी है....' सप्तमं कालरात्री च महागौरीति अष्टकम', और इस दुर्लभ संधिबेला में , ऎसे पोस्ट  से कहीं अनर्थ तो न हो जाये , कुछ तो माँ से डरो, यह कोई और नहीं, पंडिताइन की भयातुर शंका है…. वाह री अनारकली, कबूतर कैसे उड़ा ?  तो,  ऎसे… नित्यप्रति अनर्थ देख रही हो । इस पावन नवरात्रि की महिमा, आजकल तो घर घर गायी जा रही है, और तुम ? तुम ऎसा करोगे, मैं सोच भी नहीं सकती, छिःह !!  ई जो है न, अपना लेडीज़ लोग !  ऊ काहे मौका-बेमौका अपना टिप्पणी  देता रहता  है ?  अउर.. लिजिऎ न, साथ में मीमांसा.. .. फ़्री  !  कहिन कि रिठेल आज़माओ,  और अब अनर्थ को डेराय रहीं हैं !  उकसा के पिटवाओ.. फिर फूँक फूँक मरहम लगाओ । मेरी पोस्ट तो वैसे  भी पिटती रहती हैं, सो हम काहे डेरायँ ? 
सोच तो मैं भी रहा हूँ ! जो बंदा सन 1968-69 के दौर से ही माँ का आँचल पकड़े हुये हो, श्री दुर्गा सप्तशती पर सन 1980-81  तक अधिकार प्राप्त कर चुका हो (  लोग ऎसा मानते हैं ) , वह अनायास ऎसी पोस्ट क्यों लिखने बैठ गया ? मन को दो दिन समझाने में लगे, ' मत लिखो, भाईलोग  इसको किंवा पब्लिसिटी हथकंडा ही मान लें तो ?  पर ज्ञानू गुरु का हलचलजड़ित पोस्ट देखकर बल मिलता है  कि अपने को व्यक्त कर ही देना चाहिये ।  हरज़ नहीं, जो सामने दिखे.. तड़ाक फोटो खींचो फड़ाक ठेल दो ! पीछे से सुकुल महाराज ( चिट्ठाचर्चा फ़ेम वाले ) भी कान में गूँज रहे थे , लिखो यार , तुम्हार कोऊ का करिहे ! संशय से उबरा तो फिर, यह डर सताने लगा कि कहीं मैं ही माँ की चोखेर बाली ( চোখের বালি - means - आँख की किरकिरी ) ही न बन जाऊँ ?

                                                          

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इतने वर्षों की सेवा साधना के बाद , पिछले दो वर्ष से व्रत-पाठ इत्यादि छोड़े बैठा हूँ । यहाँ तक तो ठीक था, क्योंकि मेरे आस्था-विश्वास में लेशमात्र भी कमी नहीं आयी है, बस केवल कलश स्थापन, भाँति भाँति के नियम विधानों से उपवास एवं ' हों-हों ' करते हुये सप्तशतीपाठ करना छोड़ रखा है । जबकि यही सब नवरात्रि के दिनों का स्टेटस सिम्बल है ! कई वर्षों तक दशमी को तड़के उठ अपने घर की पूजा से तृप्त हो, पूर्णाहुति के लिये 120 कि०मी० कार भगाता हुआ, गोविन्दपुरी, इलाहाबाद पहुँचा करता था । अकेले मैं ही नहीं, बल्कि राजा नहीं फ़कीर के बेटे अजयप्रताप सिंह, तरुण तेजपाल इत्यादि का तहलका भी वहाँ नियमपूर्वक उपस्थित रहा करता था, तिवारी जी के विशेष हवन में । तो, अब क्या मैं असंतुष्ट धड़े में चला गया.. ?  नहीं, कदापि नहीं ! फिर,यह प्रश्नचिह्न क्यों ?
यह प्रश्नचिह्न तो  मैं अपने सम्मुख रख रहा हूँ । वस्तुतः ' देवि के सर्वभूतेषू ' होने पर संशय करने की विद्यता, मेरे पास है ही नहीं, और न तो मैं चार्वाक का चेला ही हूँ । मार्कण्डेय महाराज भी उवाचते रहे हैं, ' भविष्यति न संशय : '   बल्कि इसी सम्पुट के साथ वह ऊँघते श्रोता को जगाते भी रहे हैं, जैसे इस युग में राहत कोष  जैसी घोषणा करके उखड़ती हुई पब्लिक को जगाया जा रहा हो… ऎई उठो, जागो और सुनो… सर्वाबाधाविनिर्मुक्तो धनधान्यसुतान्वितः । मनुष्यो मत्प्रसादेन भविष्यति न संशयः ॥

फिर ?  लफ़ड़ा कहाँ है, संशय क्या है ?  मेरी आहत आत्मा जैसे कचोट रही हो… आस्था में तर्क का स्थान तो निर्दिष्ट भी नहीं है, फिर बवाल क्यों काट रहे हो ?  बिल्कुल वाज़िब बात  बोले हैं, आप ! तो, सुनिये ... जितना अध्याय सुन सकते हों, उतना ही सुनिये, , फिर बोलियेगा !  पूरे नवरात्रि में ऎसा अफ़रातफ़री लोग मचाये रहते हैं कि मेरी भैंस बुद्धि जहाँ भी पानी देखती है, वहीं गोते खाने लगती है, भले ही वह कितना गंदा हो ।

यह एक ख़ास सीज़न है, जब कलंकित माथों पर भी लाल टीके चमचमाने लग पड़ते हैं, इतना लाल.. कि एकबारगी तय कर पाना कठिन होता है कि यह कोई सिद्ध पुरुष है या कोई 11000 वोल्टीय डैंज़र आदमी, जो सीधे माँ के पास से ही महिषासुर का रक्त  उड़ा कर चला आरहा हो । आप इस सकते से उबर गये हों और ख़ुदा न ख़्वास्ता वह महापुरुष आपके परिचित हुये तो वह सार्वभौमिक श्वानपरिचय ( कूकुर पिछाड़ा सुँघायी )  के अंदाज़ में आपको सूँघते हैं, ' सर, आप तो व्रत होंगे ? ' अब यह तो सीधे आपके ठसके पर प्रहार है, या तो आप खिसिया लीज़िये, ' नहीं, थोड़ी तबियत खराब थी, शरबत वरबत पीना पड़ता सो मिसेज़ ने मना कर दिया । ' अब यहाँ एक दूसरे किस्म का सामंजस्य दृष्टिगोचर होता है । आपका मातहत है,या आपके पास कोई फँसी गोट नवरात्रि में ही सुलटा लेने के संकल्प से टीकायमान हो घर से कूच किया है, तो वह चेहरे से कनस्तर भर सहानुभूति ढरकाता हुआ दोनों हाथ आसमान की तरफ़ उठा देता है, ' सब माँ की इच्छा, भला करें माई ' , यदि आपके चेहरे पर फूँक न मार दे तो आप अपने को हतभागी  समझें । वह पैंतरा बदल कर आपका मूड टटोलता है, “चलो साहब प्रोग्राम बनाओ, विंध्यांचल घूम आवा जाय… मयडमों का लेयि लियें” ।

स्थिति एक :

अब आप तय करो कि क्या माना जाय ? अच्छा चलो, मान लेते हैं कि आपमें कुछ VIP  होने का ठसका ठुँसा पड़ा है, यानि की आप अपने आप में तो वेरी इम्पार्टेन्ट परसन हैं, पर अन्य भक्तजनों  के लिये वेरी इन्कन्विनियेन्ट परसन,  फिर भला क्या कहना ? अष्टमी भले नवमी में बदल जाये, VIP जी देवी के गोड़ पकड़े निहोरा कर रहे हैं । अभयदान दो माँ, यह लात मेरे ऊपर न रख देना, कभी ! हर नवरात्र के नवरात्र आपका हिसाब कर दिया करेंगे, मेरा ध्यान रखना माई…

स्थिति दो :


आप फ़ौरन तमक कर, मत चूके चौहान, अपुन को जमा ही लो, आन बिहाफ़ आफ़ होल फ़ेमिली के, अंदाज में कहते हैं, ' नहीं यार, व्रत है । '  , ' हमारे यहाँ पूरा परिवार, बल्कि बच्चे भी व्रत रखते हैं, दसियों साल से ! ' थोड़ा ज़्यादा हो गया, दो कदम पीछे हट लो, गुरु । आप संशोधन पेश करते हैं, ' बशर्ते बच्चा घुटनों के बल न चल रहा हो, हमारी तो कुलदेवी ठहरीं, दद्दू ! ' कह कर माँ की परमानेंन्ट पोस्टिंग अपने यहाँ होने की तस्दीक़ कर ही दीजिये । अगला भगत यदि बगुला भगत हुआ तो स्वयं ही चुप हो जायेगा ।
लेकिन क्यों चुप हो जाये ? भगवान ने जब फाड़ने को मुँह दिया है, तो क्यों चुप हो जाये ? गाल बजाना हमारी राष्ट्रीय अस्मिता है । केन्द्र से आरंभ हो कर, यह महामारी राज्य तक ही नहीं थमती बल्कि अपुन के घर-परिवार तक को संक्रमित किये हुये है

यह विषय, फिर कभी !  क्योंकि मैं भी तो यहाँ गाल ही बजा हूँ । तो ज़नाब, डिफ़ेंस को तैयार रहें । उनकी भेदभरी निग़ाह अभी भी आप पर ही टिकी हुई है, " पूरा कि सिर्फ़ अगला-पिछला ? "  पूरा नवरात्रि स्पेशल बुक करवाये हो कि सिर्फ़ इंज़न औ' गार्ड के डिब्बे से काम चलाय रहे हो ? खैर छोड़ो, अब शुरु होता है... पाँचवी पास वाला सवाल, " एक टाइम खाते होंगे, फलाहारी नमक वाला ? " कलश भी बैठाते हैं कि केवल रात में छान-फूँक कर  इतिश्री कर लेते हैं ? " आप तन जाते हैं,' नहीं भाई, स्साला पंडित आता है हमारे ईहाँ, दुबे..छज़लापुर वाला !' यह आपका बड़प्पन हैं कि आपने स्वीकार तो किया कि ' माताजी ' को रिझाने में आप स्वावलंबी नहीं अपितु छज़लापुर वाली पार्टी को ठेका दिये पड़े हैं । पार्टी  इसलिये कह रहा हूँ,क्योंकि पंडित महाराज की एक पूरी टीम है, सीज़नल मस्टर रोल वाले से लेकर मेट-सुपरवाइज़र लेवल तक के बाम्हन ! बाकी मैनेज़ वह स्वयं ही करते हैं, यजमान के स्टेटस के हिसाब से किसको कहाँ फ़िट करना है, यही उनकी विद्यता है, यानि कि यजमान मैनेजमेन्ट ! फ़कत 700 श्लोक तो यजमानरूपी कोई भी ग्राहक बाँच लेगा।

या देवि सर्वभूतेषू  वृत्तिरूपेण संस्थिता । नमस्तस्यै । नमस्तस्यै । नमस्तस्यै नमो नमः ॥                    
तो पंडित महाराज वृत्तिनुसार ही आचरण कर रहें हैं। चलिये कोई बात नहीं, इसमें कोई त्रुटि नहीं है, जग की रीत है , लेकिन सरजी, जरा ख़ुद से, स्वयं, परसनली देख लीजियेगा कि कलश सही दिशा में स्थापित करवाया है कि नहीं ? हम भी कुछ तो जानते ही हैं, माताजी की दया से..,एक संक्षिप्त चुप्पी ( रहस्य का आवरण उत्पन्न करने के लिये वार्तालाप का अनिवार्य तत्व ! )  इसीलिये अपना समझ कर कह रहे हैं। अउर झेलौ, ई लेयो एकठईं स्लो पेस बाल ! अब आपका भविष्यति न संशयः तिरोहित हो जाता है, आफ़िस में  झूठा बहाना मार कर, या नज़रें बचा कर आप फूट लेते हैं । स्वगृहम गच्छामि, मन दोहराता है, ..कि हे वत्स धर्म के किया गया अधर्म निन्दनीय नहीं होता ! 

और एक नयी दुविधा के साथ आप घर में प्रविष्ट होते हैं, पहले दिसा कन्फ़र्म कर लो यार, सब साले प्रुफ़ेसनल होय गये हैं,  वर मरे या कन्या इनको द्क्षिना से मतलब, यही घोर कलयुग है । इससे पहले कि, अपना संशय आप श्रीमती जी को पकड़ायें, वह स्वयं ही लपक पड़ती हैं । पल भर आपको निरख कर बिलख पड़ती हैं," अब कुछ करो, गुड्डी के पापा, हमरी तो तपिस्या भंग हुई जा रही है । अबकी बार एकठईं बेटवा का माने हुये हैं, अउर देखो ई परेसानी खड़ी होय गई । सोनम की मम्मी आयीं रहीं,  बताइन कि अबकी मोहल्ले में पाँचें-छेः कन्या रह गयीं हैं। एक्कै दिन बचा है, अउर उई दुष्टा अब जाके बताइन, बताओ हम्म का करें ? हमतो नौ कन्या खिलावे का माने बइठे हैं, जनात है, मईया हमार परिच्छा लेय रहीं हैं। कुछौ करो नाहिं तो वंश नाश हुई जायी !


या देवि सर्वभूतेषू क्षुधारूपेण संस्थिता । नमस्तस्यै । नमस्तस्यै । नमस्तस्यै नमो नमः ॥                   
आप क्या करेंगे, भला ? एक दिन में बच्चा तो बना नहीं सकते, वह भी बिटिया ?  सो खीझ जाते हैं, दोस्तों को फोन वोन करके देखते हैं, कुछ व्यवस्था बनानी पड़ेगी । लेकिन साले मज़ाक उड़ायेंगे, किसको दोस्त समझें इस कलयुग में । साले मौज़ लेंगे कि दुई बिटिया तो तुम अपनी निजी मेहरिया की गिरवा चुके हो, अउर अब बाहर बिटिया हेर रहे हो ?   ससुरी में कुछ देवित्व बचा है, शायद… तभी तो गुड्डी की मम्मी ने मन पढ़ लिया, रास्ता दिखाया, "उपाध्याय से बात करो, ऊ तो नया आया है और अभी ई सब नहीं जानता होगा । उसके तो दुई बिटिया हैं, चलो मईय्या रस्ता निकाल दिहिन ।" अपार संतोष से ठुमक कर वह पलट पड़ती हैं । आप इस बेला एकदम कनफ़्यूज़ियाये हैं, " अरे, दो कहाँ है ? एक ही तो है, दो-तीन साल की लड़की,और दूसरी?" गुड्डी की मम्मी तो अब पूरे मौज़ में हैं, समिस्या हल होती जान मस्त हुई जाती हैं । "भूल गये, वह बड़ी वाली भी तो है, छैः कि सात वाली, अरे जिसका डांस जेसी मेले में हुआ था ।" और वह लहकते हुये घूम कर, अपनी स्थूल कमर को मटकाने का प्रयास कर, याद दिलाने की चेष्टा करती हैं,"छोटी सी उमर में लग गया रोग.., लग गया रोऽग..म्मईं मर जाऊँगी...ओऽ ओऽ म्मईं मर जाऊँगी, …..  ले आओ उसी को, हलुआ पूरी खिलायेंगे तो लगे हाथ एक्ठो नाच वाच भी देख लेंगे । एक एक कटोरी भी तो देय रहें हैं, सबको "


या देवि सर्वभूतेषू भ्रान्तिरूपेण संस्थिता । नमस्तस्यै । नमस्तस्यै । नमस्तस्यै नमो नमः ॥                  
अरे नहीं, फोन वोन करना ठीक नहीं, इस समय सीज़न है, साला लड़कियों की शार्टेज़ चल रही है, फोन पर टरका न दे। आमने सामने बात करना ठीक रहेगा, अभी आता हूँ " कह कर आप कलशा-वलशा भूल फ़ौरन पलट पड़ते हैं ।  " इत्ती धूप में ? कल चले जाना। या छोड़ो आज रात में चले जाना, आफ़िस से निकल आये हो, तो थोड़ा आराम कर लो…. व्रत किया है " ससुरी अपनी चलायेगी ज़रूर,.. .. कुलक्षनी ! पर आप ज़ब़्त करके बोलने हैं, ' ठीक है, पक्खफेना जी के यहाँ भी हो लेंगे, रास्ते में ही पड़ेंगे.. आज देवी जागरण रक्खा है ।' ," देवी जागरण… कियूँ  ?"  उनसे  स्कूप आफ़ द नौरात्रों छूटा जा रहा है, गुड्डी की मम्मी के स्वर से अधीरता चिंघाड़े मार रही है । यह कमबख़्त टोकेगी ज़रूर, लौट कर तो इसी घर में आना है, पंगा टाल जाओ,  देवीचरन !  पिछली नवरात्रि में ही तो छोटी सी बात का इतना बतंगड़ हो गया था, कि इनको पीटना पड़ गया, तब जाकर इनकी तरफ़ से सीज़फ़ायर हुआ था । हे माँ, इस बार ऎसा न हो, यह हिडिम्बा पिटने का कोई मौका न खड़ा कर दे ।

हमरी पोस्ट वाटर आफ़ इंडिया हुई रही है, का ? चलो चलो, आगे पढ़ो, बस खतमै समझॊ


या देवि सर्वभूतेषू बुद्धिरूपेण संस्थिता । नमस्तस्यै । नमस्तस्यै । नमस्तस्यै नमो नमः ॥                      
बुद्धि से काम लो, देवीचरन । काल बताये सो आज बताय, आज बताय सो अब्ब, नहीं तो बहुरिया पल में प्रलय  दिखाय देहै ! आप दरवाजे पर ही ठिठक कर खुलासा करते हैं, 'अरे, वो माया वाला केस नहीं था, उनकी मँझली बहू ?  मारत पीटत रहें सो केस करवा दिहिस था, अपने मयके में ? बाप पेशकार हैं सो पइसा कउड़ी तो खरच नहीं होना था । पक्खफेनवा जमानत तो पाय गये लेकिन तीन साल से बँधें बँधें घूमत रहे, वही मईय्या से माने रहें सो माँ की कृपा होय गयी, अचानक आउट आफ़ कोर्ट सेटल हुई गया, मामला ।  बेचारे सोफ़ै अल्मारी लौटा के संतोष कई ले गये । बिन्धाचल-उचल माने रहें, बदले में जागरण करवाय रहे हैं । मईय्या ने नहीं बुलाया होगा ।


या देवि सर्वभूतेषू विष्णुमायेति शब्दिता । नमस्तस्यै । नमस्तस्यै । नमस्तस्यै नमो नमः ॥                             
उपाध्याय के मकान से चार मकान पहले ही पक्खफेनाजी विराजते हैं, पहले वहीं चलें । उपाध्ययवा तो जूनियर है, उसका बाप भी दरवाज़ा खोलेगा या फिर माँ ने चाहा तो यहीं मिल जायेगा, पहले यहीं चलें । जागरण पूरे शबाब पर है, कानपुर की पार्टी है,  लेकिन सस्ते में पाय गये । लौंडे मस्त हो कर हाथ पैर फेंकते हुये, पसीने पसीने हुये जा रहे हैं । स्टेज़ से उनको लगातार ललकारा जा रहा है, 'ऊँ ऊँ ऊँ..दरँस दिख्ला जा दरँस दिख्ला जा, एक्क बार आज्जा आज्जा.. आज्जा आज्जा ऽ माताऽ ..ऽ ..ऽ , ओ मात्ता मात्ता मात्ता मात्ता.. मात्ताऽ ..ऽ ..ऽ मात्ता मात्ता मात्ता मात्ता.. मात्ताऽ ..ऽ ..ऽ कूल्हे टकराये जा रहे हैं, वह अपने भक्ति  को उछालने की प्रतियोगिता में  हारना नहीं चाहते !

या देवि सर्वभूतेषू  भी मगन हैं, क्या ? जरा देखूँ । देखा तो, हमारी माँ  हैलोज़न से आकर्षित हुये भुनगे पतंगों से आच्छादित हैं, कोई भी हाथ खाली नहीं कि वह कुछ प्रतिरोध भी  कर सकें ।  मैं उन पर टकटकी लगाये स्तुति कर रहा था , श्रीदुर्गेस्मृताहरषि  भीतिमशेषजन्तोः स्वस्थैः स्मृता मतिमतीव शुभांददासि .. सहसा लगा कि इस माँ भी इसी आर्केस्ट्रा के साथ विलाप कर उठेंगी,  इन्हीं लोगों ने..इन्हीं लोगों ने ले लीना सर्वभूतेषु मेराऽ
यदि आप मेरी बकवास पर अब तक टिके हुयें हैं ,तो धन्यवाद ! यह थी मेरे कर्मकांडी आडंबर से विमुख होने की कथा  देवि की महत्ता का बखान या इस महत्ता का आदर, दोनों में आप किसको कितना महत्व देते हैं, यह मेरा विषय नहीं है

लगे रहें, जमाये रहें... माँ भला करेंगी । पर घर में जरा अपनी बूढ़ी अम्मा का भी ख़्याल रखा करें ! क्यों वह अपनी वेटिंग सीट कन्फ़र्म करने की गुहार रामजी से लगाया करतीं हैं ? यह केवल मेरे निट्ठल्ले क्षणों के असहमत मौन का स्वर था, सो मूँहवा फाड़ दिया.. नारायण नारायण ! तो चलें ? नमस्कार.... 
या देवि सर्वभूतेषू ब्लागररूपेण संस्थिता ।  नमस्तस्यै । नमस्तस्यै । नमस्तस्यै नमो नमः ॥ 

इससे आगे
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यह अपना हिन्दी ब्लागजगत, जहाँ थोड़ा बहुत आपसी विवाद चलता ही है, बुद्धिजीवियों का वैचारिक मतभेद !

शुक्र है कि, सैद्धान्तिक सहमति अविष्कृत हो जाते हैं, और यह ज़्यादा नहीं टिकता, छोड़िये यह सब, आगे बढ़ते रहिये !

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