जो इन्सानों पर गुज़रती है ज़िन्दगी के इन्तिख़ाबों में / पढ़ पाने की कोशिश जो नहीं लिक्खा चँद किताबों में / दर्ज़ हुआ करें अल्फ़ाज़ इन पन्नों पर खौफ़नाक सही / इन शातिर फ़रेब के रवायतों का  बोलबाला सही / आओ, चले चलो जहाँ तक रोशनी मालूम होती है ! चलो, चले चलो जहाँ तक..

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04 October 2009

ग़ैरज़रूरी बहसों में अटके हुये

Technorati icon

ऐसे क्या कारण हैं कि हिन्दी कि फॅमिली बेकग्राउंड होते हुआ भी हिन्दी विषय मे कोई डिग्री नहीं हैं बहुतो से ब्लॉगर के पास ??  क्यूँ ??

क्षमा चाहूँगा, रचना…
मेरा  जैसे  आपसे मतभेद योग चल रहा है ।
आपका यह प्रश्न ब्लागर के सँदर्भ में तो क्या, साहित्य के सँदर्भ में भी बेमानी है ।
पृष्ठभूमि होने के मायने यह नहीं है कि, उस क्षेत्र या भाषा विशेष पर एकाधिकार ही माना जाये ।
यदि परिवारवाद को लेकर चलें तो भी बेबुनियाद है । परिवार का जिक्र आया ही है, तो यह बता दूँ कि
स्व० जयशँकर प्रसाद अपने पुश्तैनी धँधे, इत्र, तम्बाकू और सुँघनी के व्यापार से ही जीवनपर्यँत  ही जुड़े रहे,
परँतु जो उन्होंनें रच दिया, वह पी.एच.डी. करने वाले पर भी भारी पड़ता है । मैथिलीशरण गुप्त, श्रीलाल शुक्ल जैसे बीसियों उदाहरण हैं । विमल मित्र एक मामूली स्टेशन मास्टर थे, हज़ारी प्रसाद द्विवेदी जी भी रेलवेकर्मी रहे थे । अँग्रेज़ी तक में उदाहरण लें तो सामरसेट मॉम पेशॆ से डाक्टर थे । जीविकोपार्जन का माध्यम कुछ भी हो, साहित्यिक अभिरुचि इसमें कहाँ आड़े आती है, आपसे जरा तफ़्सील से समझना चाहूँगा । हम सब को ( कम से कम मुझे )आपसे इस विषय को सँदर्भित किये गये पोस्ट की प्रतीक्षा रहेगी । खेद है कि, हम हिन्दी को कुछ देना तो दूर, देने और देते रहने का दम भरते हुये अपनी मातृभाषा को इन्हीं ग़ैरज़रूरी मुद्दों पर जहाँ के तहाँ लटकाये  हुये हैं । क्योंकि हमें अपने अलावा किसी अन्य का सुर्ख़ियों में उभरना ग़वारा नहीं है । किसी डिग्री विशेष का रचनाधर्मिता से क्या वास्ता निकलता है,  यह रिश्ता जरा मुझे भी भी समझायें । हिन्दी को लेकर अँग्रेज़िन च्यूइँग-गम कब तक चबाया और थूका जाता रहेगा ? क्या ऎसे बहस से हिन्दी माता का यह भ्रम बनाये रखा जाता है कि, उसके तीनों राजकाजी, विद्वान और जनमानस बेटे उसकी सेवा में लगे हुये हैं । सो, इन सबका निराकरण करें, आपका कृपाकाँक्षी हूँ ।

Rachna ke bahane

32 टिप्पणी:

cmpershad का कहना है

भाषा और डिग्री में अंतर है। डिग्री वाला केवल किताबी भाषा जानता है जब कि कोई डिग्री न रखने वाला भी अच्छी भाषा बोलता है। यही बात साहित्य में भी है। आज जितने पीएच.डी. कर रहे हैं वे उन पर हैं जिनको शायद ही कोई बड़ी डिग्री हासिल है। पढाई अलग है और समझ अलग:)

अर्कजेश का कहना है

भाष प्रेम ही उस भाषा में काम करने का प्रेरक तत्व है न कि कोई डिग्री । डिग्री योग्यता का प्रमाण पत्र भी नहीं है । सृजन कर्म के लिए तो बिल्कुल नहीं । डिग्री तो घोटा परिणाम पत्र है । उदाहरण भरे पड़े हैं । भाषा को हमेशा गैर डिग्री धारियोँ ने जीवन्त रखा और बचाया है ।

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi का कहना है

पहला नंबर ओकील साहब का ही। बड़े भाई, डिग्री तो हमारे पास भी नहीं है हिन्दी की। सच कहूँ तो फकत एक जीवविज्ञान और एक कानून की स्नातक डिग्रियाँ हैं इस बंदे के पास। मेरे नाटककार, समालोचक मित्र शिवराम केवल एक डिप्लोमा इंजिनियर थे। उन के नाटक धूम मचा रहे थे। आलोचना में जो भी आता पीएचडी होता उन के अलावा। खैर उन्हें भी डाक्टर बनने की धुन लगी तो बीए किया फिर एमए किया। पीएचडी के लिए सिनोप्सिस तैयार ही हो रहा था कि उन के नाटकों पर किए शोध पर एक विद्यार्थी को विश्वविद्यालय ने डिग्री भी दे दी है। दरअसल यह प्रश्न ही बेतुका है।

दर्पण साह "दर्शन" का कहना है

दक्सा'अब विचारनीय पोस्ट !!
:)

विवेक सिंह का कहना है

यूँ तो हम भी इतिहास में पोस्ट ग्रेजुएट हैं , पर हिन्दी हमने बी ए तक पढ़ी है.

Udan Tashtari का कहना है

चिन्तनपरक आलेख.

हमारी तो क्या कहें मगर पत्नी जरुर हिन्दी में पोस्ट ग्रेजुएट करके फ्रेन्च में कॉपी जाँच रही हैं.

निशांत मिश्र - Nishant Mishra का कहना है

मैंने अंग्रेजी में स्नातकोत्तर किया था. मेरे साहित्यकार-आलोचक पिता ने भी अंग्रेजी में स्नातकोत्तर किया. अशोक वाजपेयी और रमेशचंद्र शाह जी से मेरा कुछ परिचय है, उन्होंने भी अंग्रेजी में स्नातकोत्तर किया हुआ है. अशोक के छोटे भाई उदयन समकालीन हिंदी साहित्य में बड़ा नाम हैं , वे मेडिकल कॉलेज में पढ़ाते हैं. सत्येन कुमार फार्मेसी पढ़ाते थे और एक फर्निचर शोरूम भी चलाते थे.

मैंने हिंदी साहित्य में समकालीन लेखकों को खूब पढ़ा. ग़ालिब और बेदिल को मूल फ़ारसी में पढ़के देखा. जाक प्रिवेर की कवितायेँ मूल फ्रेंच में पढीं.

हिंदी में डिग्री? माफ़ करें, आठवीं के बाद मैंने हिंदी में कोर्स की किताब नहीं पढी.

एक बार मेरी हिंदी सुनकर एक महिला ने अपनी बेटी से कहा - "देखो, अंकल कितनी अच्छी हिंदी बोलते हैं". मैंने कहा - "माफ़ करें, मेरी हिंदी बहुत कमज़ोर है, शायद आप इसे नहीं भांप प् रही हैं क्योंकि आपकी हिंदी कुछ ख़ास न हो. मैं बहुत अच्छी हिंदी बोलता भी हूँ तो इसमें अचरज कैसा? कम-से-कम भारत में हिंदी तो सबकी अच्छी होनी ही चाहिए!"

लवली कुमारी / Lovely kumari का कहना है

हिंदी में कोई डिग्री मेरे पास भी नही है ..हाँ स्नातक तक हिंदी पढ़ी है मैंने ..पर उसके बाद सिर्फ शौकिया कथा -कहानियाँ ..पर इस कारन मैं हिंदी में लिखने के लिए अयोग्य तो नही साबित होती ..सब बेकार की बाते हैं.

प्रेमलता पांडे का कहना है

हिंदी साहित्य-सृजन और हिंदी-माध्यम दो अलग विचार हैं। विज्ञान में स्नातकोत्तर हिंदी माध्यम से क्यों नहीं? सरकारी द्फ़्तर का काम हिंदी में क्यों नहीं?

खुशदीप सहगल का कहना है

डॉक्टर साहब...मैंने फिजिक्स, कैमिस्ट्री, जूलोजी और बॉटनी की पढ़ाई की, लेकिन इनमें रोजगार का ज़रिया कुछ भी नहीं बन सका...नौकरी अखबारें पढ़ने के शौक ने ही दिलाई...इसी तरह धीरू भाई अंबानी ने कौन सी प्रबंधन की पढ़ाई की थी...लेकिन रिलायंस जैसा बड़ा अम्पायर खड़ा कर दिया...जरूरत बस आसपास को समझने के लिए बारीक नज़र रखने की है...यही बात हिंदी पर लागू होती है...
जय हिंद...

रचना का कहना है

This is the email i sent you yesterday but it seems as usual it was "a spam" like you say इन्हीं ग़ैरज़रूरी मुद्दों because a issue was raised by me and not others . blogging is all about इन्हीं ग़ैरज़रूरी मुद्दों for me
The carry forward of "irrelevant issues blog to blog " really makes me think do i really raise irrelevent issues . I am not objecting to it sir but do think over it ,whether you really understood what was written on my post
_________________________________________
quote

----- Original Message -----
From: Rachna Singh
To: डा० अमर कुमार
Sent: Sunday, October 04, 2009 8:14 PM
Subject: Re: [हिन्दी ब्लोगिंग की देन] New comment on हिन्दी ब्लॉगर जो हिन्दी को नेट पर आगे ले जा रहे उन....


Dear Dr Amar
My post simply is asking a question why our parents never sent us to study hindi and make it a lively hood . How so ever we may love hindi yet we dont want to make it a area where we can earn lively hood thru it
My post has nothing to do with the zones you wanted me to clarify .
It has nothing to do with creative wiriting
It has nothing do with the reason of getting a degree to write in hindi
I think somewhere you are relating this post with the question that i put to anup about his qualifications to "judge others claibre in comaprison to viveks creative writing "

Even today most of us like our guardians dont want our kids to learn hindi to earn .

I hope this clarifies the issue
I have not published this comment because the comment prior to your comment have got the essence of the post
if you want i can publish your comment and my answer along with it

Regds to you
Rachna
----- Original Message -----
From: डा० अमर कुमार
To: rachnagmail.com
Sent: Sunday, October 04, 2009 8:04 PM
Subject: [हिन्दी ब्लोगिंग की देन] New comment on हिन्दी ब्लॉगर जो हिन्दी को नेट पर आगे ले जा रहे उन....


डा० अमर कुमार has left a new comment on your post "हिन्दी ब्लॉगर जो हिन्दी को नेट पर आगे ले जा रहे उन...":


क्षमा चाहूँगा, रचना..
मेरा जैसे आपसे मतभेद योग चल रहा है ।
आपका यह प्रश्न ब्लागर के सँदर्भ में तो क्या, साहित्य के सँदर्भ में भी बेमानी है ।
पृष्ठभूमि होने के मायने यह नहीं है कि, उस क्षेत्र या भाषा विशेष पर एकाधिकार ही माना जाये ।
यदि परिवारवाद को लेकर चलें तो भी बेबुनियाद है । परिवार का जिक्र आया ही है, तो यह बता दूँ कि
स्व० जयशँकर प्रसाद अपने पुश्तैनी धँधे, इत्र, तम्बाकू और सुँघनी के व्यापार से ही जीवनपर्यँत ही जुड़े रहे,
परँतु जो उन्होंनें रच दिया, वह पी.एच.डी. करने वाले पर भी भारी पड़ता है । मैथिलीशरण गुप्त, श्रीलाल शुक्ल जैसे
बीसियों उदाहरण हैं । विमल मित्र एक मामूली स्टेशन मास्टर थे, हज़ारी प्रसाद द्विवेदी जी भी रेलवेकर्मी रहे थे । अँग्रेज़ी
तक में उदाहरण लें तो सामरसेट मॉम पेशॆ से डाक्टर थे । जीविकोपार्जन का माध्यम कुछ भी हो, साहित्यिक अभिरुचि इसमें कहाँ आड़े आती है,
आपसे जरा तफ़्सील से समझना चाहूँगा । हम सब को ( कम से कम मुझे ) आपसे इस विषय को सँदर्भित किये गये पोस्ट की प्रतीक्षा रहेगी । खेद है कि,
हम हिन्दी को कुछ देना तो दूर, देने और देते रहने का दम भरते हुये अपनी मातृभाषा को इन्हीं ग़ैरज़रूरी मुद्दों पर जहाँ के तहाँ लटकाये हुये हैं । क्योंकि हमें
अपने अलावा किसी अन्य का सुर्ख़ियों में उभरना ग़वारा नहीं है । किसी डिग्री विशेष का रचनाधर्मिता से क्या वास्ता निकलता है, यह रिश्ता जरा मुझे भी समझायें । आपका कृपाकाँक्षी हूँ ।


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Posted by डा० अमर कुमार to हिन्दी ब्लोगिंग की देन at October 4, 2009 8:04 PM
unquote

रचना का कहना है

क्युकी डॉ अमर इंग्लिश मे भी ब्लोगिंग करते हैं सो शायद मेरे इंग्लिश मे लिखे कमेन्ट को सहृदय स्वीकार कर लेगे । लेकिन जिन मे ये सहृदयता नहीं हैं और जो सारा काम इंग्लिश मे करते हैं पर नेट पर आते ही इंग्लिश विरोधी हो जाते हैं उनके लिये मेरी इस टिप्पणी का अर्थ बहुत सीधा हैं
" ऐसे क्या कारण हैं कि हिन्दी कि फॅमिली बेकग्राउंड होते हुआ भी हिन्दी विषय मे कोई डिग्री नहीं हैं बहुतो से ब्लॉगर के पास ?? क्यूँ ??"

हम सब जब अपनी पढाई करते हैं तो कहीं ना कहीं हमारे माता -पिता अभिभावक एक "गाइडिंग फैक्टर " होते हैं जीविका के लिये आगे क्या पढा जाए । तो जिनके अभिभावक ख़ुद हिन्दी बेक ग्राउंड से हैं वो भी अपने बच्चो को हिन्दी मे शिक्षित नहीं करते " । हमारे ज़माने यानि डॉ अमर जब पढाई कर रहे थे या मै जब पढाई कर रही थी तब और आज जब हमारे बच्चे पढ़ रहे हैं क्या हम मै से कोई भी अपने बच्चे को सहर्ष हिन्दी मै सनाक्तोतर पढाई के लिये प्ररित करता हैं । नहीं तो क्यूँ ।

आशा हैं ये मुद्दा जो इतना गैर जरुरी नहीं रह गया हैं अब क्युकी प्रबुद्ध लोग इस को डिस्कस कर रहे हैं उस पर कुछ और बाते कमेन्ट मे यहाँ मिलेगी जो मेरे गैर जरुरी ब्लॉग पर नहीं आयी

ताऊ रामपुरिया का कहना है

गुरुजी, हम तो बिना हिंदी पढे और बिना किसी डिग्री के बस आपका नाम लेलेके ही धुनके जा रहे हैं. :)

हमारे हिसाब से डिग्री उग्री कोई जरुरी नही है बस जज्बा होना चाहिये.

रामराम.

डॉ .अनुराग का कहना है

हम तो जी हिंदी अंग्रेजी सब बांच ...देख सुन लेते है .आपकी दुआ से ...

डा० अमर कुमार का कहना है


@ रचना का कहना है ₪ क्युकी डॉ अमर ...

क्या मैंने कोई शिकायत की थी, रचना ?
इसे माडरेशन में पड़ा रहने देकर, आपको अपने पोस्ट के मँतव्य की रक्षा करनी चाहिये थी ।
मैंने अपने घर ( इस ब्लॉग पर ) लौट कर अपना मत ही तो दिया है, फिर इतने स्पष्टीकरण का कारण ?


from Rachna Singh
to डा० अमर कुमार
date 4 October 2009 20:14
subject Re: [हिन्दी ब्लोगिंग की देन] New comment on हिन्दी ब्लॉगर जो हिन्दी को नेट पर आगे ले जा रहे उन....
mailed-by gmail.com
Signed by gmail.com

hide details 20:14 (16 hours ago)

Dear Dr Amar
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I hope this clarifies the issue
I have not published this comment because the comment prior to your comment have got the essence of the post
if you want i can publish your comment and my answer along with it

Regds to you and love to bhabhi
Rachna

मुझे इसकी प्रत्याशा पहले से ही थी । क्या तुम भी सुविधाजनक टिप्पणियों में विश्वास रखती हो ?
यदि रखती भी हों, तो भी मैंने कोई शिकायत तो नहीं की थी, रचना ?

रचना का कहना है

क्या मैंने कोई शिकायत की थी, रचना ?
इसे माडरेशन में पड़ा रहने देकर, आपको अपने पोस्ट के मँतव्य की रक्षा करनी चाहिये थी ।
मैंने अपने घर ( इस ब्लॉग पर ) लौट कर अपना मत ही तो दिया है, फिर इतने स्पष्टीकरण का कारण ?

dear dr amar
i went by the last line of the comment
सो, इन सबका निराकरण करें, आपका कृपाकाँक्षी हूँ ।

so sent a mail and thought you would reply but then got a comment on my post to see your post

i never had the intention of not publishing your comment but since i was out of town and returned late night thought of sending the mail with my clarification and then
lo and behold i got to read this post and assumed you did not get my mail

qed

डा० अमर कुमार का कहना है



Oh my ! again a clarification of The Clarification ? Who did asked it, me ?
Albeit at contrary, it added one more lesson to my ignorance on traditions of healthy blogging, but I have no reservations about anyone, Rachna Jee !
Let it be closed for now, with a blind thanks of mine.

विवेक सिंह का कहना है

ब्लॉग-मालिक को बहुत बहुत बधाई कि जहाँ अन्य ब्लॉगर अपनी बात को लिखकर या कार्टून आदि दिखाकर समझाते हैं, वहीं आपने इसे करके दिखाया है.

एक वाकया याद आता है:

एक ठाकुर का लड़का शहर से पढ़कर छुट्टियों में घर आया तो खेतों पर घूमने गया, वहाँ उसने एक घास खोदने वाली को खेत की मेंड़ पर घास खोदते देखा, और लगा उसे पीटने.

घसियारिन चिल्लाती जाती कि भैया छोड़ दे अब कभी तेरे खेतों में घास न खोदूँगी. लेकिन वह न माना,
अंत में घसियारिन के मुख से निकला ,"बाबू जी छोड़ दो!" तो लड़के ने मारना बंद करके कहा, " साली पहले ही बाबू जी कह देती तो इतनी क्यों पिटती ?"

राज भाटिय़ा का कहना है

अरे बाबा क्यो टांग खिचाई करते है लोग ? मेरे ओर मेरे बच्चो के पास हिन्दी की कोई डिगरी नही, लेकिन हम सब शान से हिन्दी बोलते है अपनो से, अगर कोई भारतीया अग्रेजी बोले तो जबाब ही नही देते, क्योकि हमारी पहचान है हिन्दी, ओर यह बात हम सीखे है इन युरोपियन लोगो से... यहां स्कुलो मै बहुत सी भाषाये सीखाई जाती है, लेकिन यह लोग अपनी अपनी मात्रा भाषा से इतना प्यार करते है कि यह जानते हुये भी अग्रेजी या अन्य भाषा नही बोलते, ओर हम ना जानते हुये भी अग्रेजी बोलते है शान से:) बस यही फ़र्क है,
राम राम

अभिषेक ओझा का कहना है

आपने भरपूर उदहारण दिए ही हैं... कबीर तो अनपढे थे. वैसे हमारी माँ ने तो कहा था बेटा संस्कृत पढ़ ले. हमीं गणित के पीछे भाग गए नहीं तो हम भी आज... जो हैं उ भी ठीके हैं हिंदी तो बुझ ही लेते हैं.

कुलवंत हैप्पी का कहना है

आपने उदाहरणें देकर सिद्ध तो कर दिया कि अच्छी भाषा के लिए डिग्री होना जरूरी नहीं है। आज गूगल पर सर्च मार रहा था तो मैं हैरान रह गया जब मुझे पता चला कि संपूर्ण सिंह कालरा हिन्दी जगत में गुलजार बनकर राज कर रहा है। ये भी मेरी तरह पंजाब से आए हैं।

डा० अमर कुमार का कहना है



@ कुलवंत हैप्पी

ग़ुलज़ार को लेकर
यह तथ्य मैं अपनी एक पोस्ट में दे चुका हूँ !
यही तो मैं रेखाँकित करना चाहना था, और भी उदाहरण हैं, भीष्म साहनी हिन्दी के उपन्यास गुरुमुखी में लिखा करते थे । मुँशी प्रेमचँद का लेखन उर्दू लिपि में है, और प्रकाशित भी उर्दू में हुआ करता था । मैंने रचना से यही तर्क किया था कि, लेखना का व्यवसाय और मातॄभाषा से कुछ लेना देना नहीं है ।

सर्वत एम० का कहना है

मैं कामर्स का स्टुडेंट था और इसी कारण इंटर (१२ वीं) के बाद हिंदी की डिग्री लेने का अवसर नहीं मिल सका. छात्र जीवन में ही स्थितियों ने रोज़गार से जोड़ दिया और फिर हालात ऐसे बने कि अलग से किसी विषय में डिग्री न ले सका. एम्. कॉम. या एम्.एस.सी. वालों के साथ यह त्रासदी है.
लेकिन मैं ने पढा और मेरी हिंदी बहुत से डिग्रीधारकों से बेहतर है, यह मैं दम्भ नहीं कर रहा, लोगों का कहना है. हिंदी राष्ट्रभाषा है, हमारी मातृभाषा है, इसमें लिखने, बोलने समझने के लिए मेरी समझ से किसी डिग्री की आवश्यकता नहीं.
आप मेरे ब्लॉग पर आये, कमेन्ट दिया, बहुत अपनाइयत भरे शब्दों में मेरा उत्साहवर्धन किया, अच्छा लगा, धन्यवाद.

वन्दना अवस्थी दुबे का कहना है

अमर जी, हमने भी केवल हायर सैकेण्डरी तक ही हिन्दी पढी है, लेकिन हमें नहीं लगता कि हिन्दी को जब विषय के रूप में पढा जायेगा तब ही उसमें महारथ हासिल होगी. मुझे अपने लेखन के दौरान या किसी सम्बोधन के दौरान कभी शब्दों की कमी नहीं पडी. बचपन से ही घर में साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओं और पुस्तकों का अम्बार देखती-पढती आई हूं. पहले विज्ञान और फिर पुरातत्व की छात्रा रही, लेकिन हिन्दी पर बराबर अधिकार रहा.दुख तो मुझे इस बात का है, कि जिन्होंने हिन्दी का मुद्दा उठाया है उनका खुद का मेल अंग्रेज़ी में लिखा हुआ है.

RAJ SINH का कहना है

डाक्टर बाबु हिंदी की कोई डिग्री तो मेरे पास भी नहीं है.हाई स्कूल और इंटर तक परीक्षित जरूर हुआ और पूरे बोर्ड में दोनों बार सिर्फ हिन्दी में ही सर्वोच्च अंक मिले. पितामह चाहते थे इंजिनियर बनाना बन भी गया.लेकिन उनकी इक्क्षा थी की मैं संस्कृत भी जानू.तो शास्त्री जी से संस्कृत अलग से पढी .उसका आनंद अब तक उठा रहा हूँ. वैसे degreeyon के बारे में ( हिंदी की) कुछ असम्मान भी है. हिन्दी के कुछ ऐसे पी यच डी भी मिले की उन विश्वविद्यालयों की मान्यता समाप्ति की प्रार्थना ही करूंगा इश्वर से.
बहरहाल एक चुटकुला सुनाये बिना नहीं मानूंगा.

एक बन्दे को अंगरेजी की पी एच डी चाहिए थी नौकरी के लिए . किसी ने सुझाव दिया नकली ले लो .भावः पता किया तो पता चला की पंजाब की उनिवेर्सिटी की पचास हजार में है. सस्ते में काम चलाना है तो केम्ब्रिज की ले ले , सिर्फ पांच हजार में है.बन्दा चौंका .ऐसे कैसे ? जबाब मिला अबे वेरीफाई करना कौन सा मुश्किल है ? केम्ब्रिज की पंजाब ?
अब जरा एक वाकया भी बतादूँ . सम्मान करना अमरीकी हमसे काफी ज्यादा जानते हैं , ज्ञान का .( इस कथन को आप सुविधाजनक भी समझ सकते हैं ) तो अंधे के हाथ बटेर लगी . सार ये है की किन्हीं कारणों से , एक छोटी मोटी यूनिवर्सिटी ने मुझे एक होनोरारी दक्तोरते दी है . अमेरिकी दोस्त मुझे तब से डाक्टर ही कहते हैं. भारत में पीके एक दोस्त को बताया . वह बोला की साले किसी से कहना नहीं. यहाँ एक जोक चलता है .की अगर कोई बन्दा अमेरिका की किसी उनिवार्सिटी में सिर्फ मूत आये और उनकी टूशन फीस पकडा दे तो डाक्टरेट मिल जाती है .

तबसे मन करता है की सिर्फ शरीर का इलाज करनेवाला ही डाक्टर कहलाये.(जानवरों समेत ) कोई दूसरा नहीं .

कारण डा. राम कुमार वर्मा जी की फजीहत अपनी आँखों से देख चूका हूँ.( वह कहानी फिर कभी)
और डा. साहेब चाहे तो इसे कोई मस्का मारना कहे " मैं तो गोलियां ही खा के जिंदा हूँ " (डाक्टरों की ).
आप भी तगडी गोली देते हो .खुदा न करे आपकी भी खानी पड़े . क्योंकि मेरा सिर्फ हाजमा ही दुरुस्त रहता है.
समझे daktarva बाबू ? :)

श्याम सखा 'श्याम' का कहना है

भाई हम भी हिन्दी आठवी पास है> फिर अंग्रेजी में पढ़ सामरसेट साहिब की तरह डॉ० होते हुए[ छाती रोग विशे्षज्ञ]भी खुद को सुंघनी साहू के अनुयायी मानते हैं। वैसे आर्थर कानन डायल भी चिकित्सा से साहित्य में कूदे थे-हमारे देश के अनेक वैद्य भी साहित्यकार रहे हैं हैं ज्ञान चतुर्वेदी प्रसिद्ध व्यंग्य कार सर्जन हैं ।मै भी एक अदना साहित्यकार हूं जिसके साहित्य पर २ पी एच डी व ३ एम फिल होचुकी है।



दीप सी जगमगाती जिन्दगी रहे
सुख-सरिता घर-मन्दिर में बहे
श्याम सखा श्याम

http://gazalkbahane.blogspot.com/

Avtar Meher Baba का कहना है

अम्रर जी,
आप्के ब्लॉग का विन्यास बहुत ही सुन्दर है. कृप्या बताने का कष्ट करें कि इस तटेम्प्लेत को कैसे प्राप्त किया जा सकता है...
सादर
चन्दर मेहेर

हमारा ईमेल है: chandar30@gmail.com
kvkrewa.blogspot.com
kvkrewamp.blogspot.com
lifemazedar.blogspt.com

Suman का कहना है

nice

निर्मला कपिला का कहना है

प्रभात जी देर बाद देखा ये आलेख मैने केवल दस्वीं जमात तक हिन्दी पढी 20067 तक उसके बाद फार्मेसी मे डिपलोमा किया और पंजाब मे नौकरी करने के कारण कभी हिन्दी लिखने का समय ही नहीं मिला बस साहित्य पढ्ना जरूर मेरा शौक रहा। मेरे पास न तो भाषा का सम्पूरण ग्यान है और न डिग्री है मगर फिर भी हिन्दी के प्रति लगाव है मुझे लगता है्राष्ट्र भाषा देश को एक सूत्र मे पिरो सकती है आप यकीन माने हमारे शहर मे हिन्दी लेखिका मैं ही हूँ बाकी सब पंजाबी मे लिखते हैं। अभी मैने एक साहित्य प्रचार मंच बनाया था तो एक दो लेखकों को हिन्दी के लिये प्रेरित किया और एक ब्लागर भी तयार कियाजो अभी नियमित रूप से नहीं लिख रहा। मुझे लगता है संवेदनायें और साहित्य के प्रति लगाव , लिखने के लिये मुख्य दो पहलू हैं हिन्दी की डिग्री न होने से मुझे कई बार हानि भी उठानी पडी। मेरी तीन पुस्तकें छपी।दो छपने के लोये तैयार हैं। और सब से बडी बात कि लेखन 2004 से विधिवत रूप से शुरू किया अब 2007 मे रिटायर होने के बाद लेखन को समर्पित हूँ। हाँ अगर कोई बडी डिग्री होती पत्र पत्रिकायों मे आसानी से एन्ट्री मिलती फिर भी सरिता जैसी पत्रिकायों मे कहानियाँ प्रकाशित हुयी हैं। आपका आलेख विचार्णीय ह। धन्यवाद्

श्रद्धा जैन का कहना है

Professional qalification or language knowledge dono hi alag hai
ham sabhi ko aage chal kar job karni hai career chunna hai to degree to usi mein hougi jismein hame job mil sake agar sabhi ne hindi mein degree le li hoti to dusri job ka kya hota

haan magar bhaasha ka gyaan zaruri hai
jitni zyada bhasha aa sake utna hi achcha

rakhshanda का कहना है
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rakhshanda का कहना है

Hello papa
how r u?
remember me?i m ur daughter rakhshanda..
i missed u..always...u were in my heart but some serious problems took me away from bloging world..did u miss me papa?
missing u n hope that u;ll be fine n fit.Amin
please take care of urself n try to reply me...urs rakhshanda

लगे हाथ टिप्पणी भी मिल जाती, तो...

आपकी टिप्पणी ?

जरा साथ तो दीजिये । हम सब के लिये ही तो लिखा गया..
मैं एक क़तरा ही सही, मेरा वज़ूद तो है ।
हुआ करे ग़र, समुंदर मेरी तलाश में है ॥

Comment in any Indian Language even in English..
इन पोस्ट को चाक करती धारदार नुक़्तों का भी ख़ैरम कदम !!

Please avoid Roman Hindi, it hurts !
मातृभाषा की वाज़िब पोशाक देवनागरी है

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यह अपना हिन्दी ब्लागजगत, जहाँ थोड़ा बहुत आपसी विवाद चलता ही है, बुद्धिजीवियों का वैचारिक मतभेद !

शुक्र है कि, सैद्धान्तिक सहमति अविष्कृत हो जाते हैं, और यह ज़्यादा नहीं टिकता, छोड़िये यह सब, आगे बढ़ते रहिये !

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