मित्रों, मैं यानि कि अमर कुमार आपकी ज़रूरत और मज़बूरी समझता हूँ । पापी पेट के लिये, बाल-बच्चों के लिये, प्रमोशन के लिये और सच पूछो तो अपने अस्तित्व एवं अस्मिता के लिये मस्का अनिवार्य है । पता नहीं क्यों, मस्केबाजों को एक अलग नज़रिये से देखा जाता है ? आपसे ईर्ष्या करने वाले अपनी खीझ एवं नाकामी के लिये मस्का न मारने का दम भले भर लें, वस्तुस्थिति इससे भिन्न है ! लीजिये ..
गया ज़माना पोल्सन का ! अपना अमूल है ना, पूर्ण स्वदेशी एवं निहायत से निहायत देशी जनों के लिये !
देखा आपने मनमोहिनी की इज़ी-च्वायस प्रतिभा ! माया मेम साब की पार्टी प्राथमिकता, और क्या चाहिये ?
इतनी रच बस गयी है हमारे बीच फिर क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड की चयन नीति पर ही शर्म क्यों ?
कोई वांदा नहीं, अमूल के लिये परेशान न हों ! अपना लोकल ब्रांड भी चलेगा, मस्का तो मस्का ही है ।
मीडिया नाहक बच्चन के पीछे पड़ी थी, उनके यहाँ कोई कोटा भी नहीं था । सरकार की तो.. छोड़िये भी !
तो भइय्या, लाज शरम तजि के मस्का के शरणागत होय लेयो, इसी में भलाई है ! ज़माने का पानी मर गया है तो क्या ? मस्का तो अब अपने भारत महान को चलाय रहा है ! फिर क्या ग़म ? शुरु हो जाओ !












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2 टिप्पणी:
बहुत ही बढ़िया ।
घुघूती बासूती
Namaste Sir,
Maine aap ka ye article padha accha laga aour sorry main bina batai aapko chala aaya lekin meri job lag gayee thi aour aap gaon chale gaye the so i really sorry for my guilt. i hope u forgive me.
kaif
लगे हाथ टिप्पणी भी मिल जाती, तो...
जरा साथ तो दीजिये । हम सब के लिये ही तो लिखा गया..
मैं एक क़तरा ही सही, मेरा वज़ूद तो है ।
हुआ करे ग़र, समुंदर मेरी तलाश में है ॥
Comment in any Indian Language even in English..
इन पोस्ट को चाक करती धारदार नुक़्तों का भी ख़ैरम कदम !!
Please avoid Roman Hindi, it hurts !
मातृभाषा की वाज़िब पोशाक देवनागरी है
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