जो इन्सानों पर गुज़रती है ज़िन्दगी के इन्तिख़ाबों में / पढ़ पाने की कोशिश जो नहीं लिक्खा चँद किताबों में / दर्ज़ हुआ करें अल्फ़ाज़ इन पन्नों पर खौफ़नाक सही / इन शातिर फ़रेब के रवायतों का  बोलबाला सही / आओ, चले चलो जहाँ तक रोशनी मालूम होती है ! चलो, चले चलो जहाँ तक..

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31 March 2008

अमर मूँछ संग्रहालय

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पब्लिक इंटरनेट एक्सप्लोरर से एक नामालूम परहेज़ करती है, डा०द्विवेदी ने मित्रवत सलाह दी है, कि लोगों को फ़ायरफ़ाक्स ज़्यादा रास आता है और वहाँ फ़ोन्ट्स ठीक से न पढ़ पाने की वज़ह से लोग मेरे पोस्ट के टुकड़े टुकड़े करके... मुँह बिचकाये और चल दिये 

मैंने तत्काल यानि फ़ौरन से पेश्तर फ़ायरफ़ाक्स ज़ी का आवाह्नन किया और स्थापित कर दिया, वाकई ज़नाब फ़ोन्ट्स में खड़बड़ाये घबड़ाये से लग रहे थे , IE 7 में आपकी दुआ से सब ठीकठाक है

मोज़िल्ला से मदद की गुहार की तो उन्होंने विस्ता अल्टिमेट में इसके बौरा जाने की पुष्टि की एवं फ़ायरफ़ाक्स बीटा 3.0? प्रयोग करके देखें, ऎसी पेशकश की एवं लाइवराइटर से बचने की सलाह दी । क्या सही है, यह तो मेरे को मालूम नहीं किंतु बीटा 3.0? महोदय मेरे सिस्टम में लैंड करते ही क्रैश कर गये सो, फिर छिड़ी यार...बात ऽ ऽ मूँछों की..ऽ  ..ऽ  की अगली कड़ी यहाँ एक फोटोब्लाग के रूप में दे रहा हूँ

 बड़े आये मूँ वाले-अमरअमर मूँछ संग्रहालय-अमरअज़ब ये ग़ज़्ज़ब - अमर साला पागल-अमर

क्या मूँछ है-अमरतेरी मूँछों के सिवा दुनिया में रखा क्या है-अमर  हाय हाय यह मूँछें-अमर

लेकिन आप अज़ूबे लग रहे हैं-अमरहलब्बी मूँछें जो तेरी देखी-अमर मूँछ वाले तेरा जवाब नही-अमर

यह सभी चित्र अंतर्राष्ट्रीय मुँच्छड़ सम्मेलन 2006, म्युनिख़ से लिये गये हैं । प्रतापगढ़, उ०प्र० एवं सांगानेर, राज० के दो जन भी इसमें सांत्वना पुरस्कार एवं प्रशस्तिपत्र से नवाज़े गये थे । उनके चित्र प्राप्त करने का प्रयास जारी है । आख़िर भारत महान के मूँछों की भी कोई प्रतिष्ठा तो है ही । इतनी हल्की पोस्ट में ये भारी भरकम मूँछें.... है न अज़ीब बात !

5 टिप्पणी:

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi का कहना है

अरे! एक भी देसी मूँछ नहीं?

अनूप शुक्ल का कहना है

मूंछे हों तो डा.अमर कुमार जैसी।

Udan Tashtari का कहना है

सही है...एक भी अपना बंदा नहीं. जरुर ओलंपिक से लिये होंगे. :)

mamta का कहना है

:)

shama का कहना है

AMARJI,
MERE BLOGPAR AAKE PYARISI TIPPANI DEE USKA TAHE DILSE SHUKRIYA!
AAPKE BLOGPARSE TO NIKALNEKA JEEHI NAHI KARTA...RAATKE 2 BAJ CHUKE HAIN,AUR MAI PADHTI JAA RAHI HUN!!
SHAMA

लगे हाथ टिप्पणी भी मिल जाती, तो...

आपकी टिप्पणी ?

जरा साथ तो दीजिये । हम सब के लिये ही तो लिखा गया..
मैं एक क़तरा ही सही, मेरा वज़ूद तो है ।
हुआ करे ग़र, समुंदर मेरी तलाश में है ॥

Comment in any Indian Language even in English..
इन पोस्ट को चाक करती धारदार नुक़्तों का भी ख़ैरम कदम !!

Please avoid Roman Hindi, it hurts !
मातृभाषा की वाज़िब पोशाक देवनागरी है

Note: only a member of this blog may post a comment.

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शुक्र है कि, सैद्धान्तिक सहमति अविष्कृत हो जाते हैं, और यह ज़्यादा नहीं टिकता, छोड़िये यह सब, आगे बढ़ते रहिये !

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