जो इन्सानों पर गुज़रती है ज़िन्दगी के इन्तिख़ाबों में / पढ़ पाने की कोशिश जो नहीं लिक्खा चँद किताबों में / दर्ज़ हुआ करें अल्फ़ाज़ इन पन्नों पर खौफ़नाक सही / इन शातिर फ़रेब के रवायतों का  बोलबाला सही / आओ, चले चलो जहाँ तक रोशनी मालूम होती है ! चलो, चले चलो जहाँ तक..

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30 March 2008

फिर छिड़ी यार...बात ऽ ऽ मूँछों की ..ऽ ...ऽ

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इनको क्या हो गया है, डाक्टर हैं कि जोकर ? लगता है, चुक गये ।इनकी दिखावे की संवेदनायें संत्रास,जैसे संडास में घुसी पड़ी है, बाहर की दुनिया से बेख़बर । हाज़त ठीक नहीं तो फुरसतिया चूरन आज़माओ । पंडित शिवकुमार से एक बार मिल तो लो, अच्छों अच्छों की निकाल कर धो देते हैं । ऊपर नारा असहमत मौन को स्वर देने का, और अब अपनी औकात पर आख़िर आ ही गये ।
हुआ यह कि आज एक मेडिकल रिप्रेज़ेन्टेटिव महोदय तशरीफ़ लाये, मैं कुछ चटा हुआ बैठा था । प्रोफ़ेशनल काल यानि इस नामुराद पेशे की एक थैंकलेस कर्ट्सी ! अपराह्न के चार बज़े इनका समय होता है । पहला बालर दाख़िल हुआ, आर बी सिंह, घुटा घाघ ! उन्होंने मुझे आँखों में तौला, फिर मूड भाँप कर मुझे थोड़ा बहटियाने की ज़द्दोज़हत में मशगूल होते हुये बोले, 'क्या बात है, आज़ अपने बास बदले बदले से नज़र आ रहें हैं ? ' मैं थोड़ा सहज़ होने का प्रयत्न करते हुये सतर्क हुआ, ' क्या बदला है, बाहर से अंदर तक सबकुछ वही है और यथास्थान है, हाँ बोलो ? ' सेल्समैन इतनी आसानी से नो बाल स्वीकार कर ले, असंभव ! उन्होंने एक्सन रिप्ले के भाव से मुझे निरखना शुरु किया । 1मिनट..2मिनट,अब असह्य होने लगा, मतलब की बात पर आओ और यहाँ से टल भी लो,यार ! अचानक ज़नाब उछल ही तो पड़े, ' अरे सर , आपकी मूँछें ! यही मिस कर रहा था । अच्छा लग रहा है, स्मार्ट लग रहे हैं । ' तो ? पहले बेवकूफ़ लगता था, क्या ? ( स्वगतः-अब टल भी लो, चारण ! विरुदावली रचने की ट्रेनिंग ली है, क्या ? ) अरे नहीं , हमारे सर के कहने का मतलब है कि अब आप कुछ ज़्यादा , मतलब पहले से स्मार्ट लग रहे हैं । यह रितु शुक्ला थीं,उनकी सहायिका, बोले तो शहनाई की पों ! आर० बी० ठहरे इटावा के ठाकुर, चतुर सुजान ! सांत्वना की एक बर्फ़ी मेरी ओर फेंकी, बिरादरी में शामिल होने के प्रस्ताव के साथ, ' सोचता हूँ कि मैं भी क्लीन शेव कर लूँ । ’ येल्लो, हमारे सुख दुख में साझी होने का नया शग़ूफ़ा ! मैं जला भुना तो था ही, बोलना ही पड़ा, 'तो सफ़ाचट कर लो, क्या दिक्कत है ? 'जी आज़ मिसेज़ से पूछूँगा, परमिसन मिली तो अगली बार इनको आप नहीं देखेंगे । उन्होंने मूछों को सहलाया, गोया उनके मौज़ूद होने की तस्दीक कर रहे हों ( मैं मन मसोस रहा था कि इसको आख़िर एक घूँसा क्यों नहीं मार सकता ।) किंतु प्रत्यक्ष कथन - ' बहुत शुक्रिया आर०बी०, लेकिन मूँछें तो तेरी अपनी हैं, फिर अणिमा ( श्रीमान जी की पत्नी ) के NOC का क्या काम, कोई उसके पास मोर्टेज़ ( गिरवी ) थोड़े ही है ? 'अरे सर, मूँछ तो क्या, आदमी की पसंद-नापसंद भी , उसकी अपनी कहाँ रह जाती है, अब भाभी जी की बात और है ( मौका अच्छा है,सर की जोरू को भी सान लेयो ,कमसे कम इनके उखड़े मूड पर वाल-पुट्टी तो लगा ही दो ) !
मुझे जैसे ज्ञानोदय हो गया हो, उसके प्रकाशपुंज से कुछ पल तो चौंधियाया रहा । फिर चेतनावस्था में आते ही कराह गया, ' हे भगवान, पुरुष क्यों बनाया रे..ऽ ऽ , बिगाड़ा रे..ऽ नसीबाँ ? जब हमारा स्व, हमारी पहचान सब इन अबलाओं के पास ही गिरवी है । तो पुरुष होने का मतलब ही क्या रह गया ? इस भरी दुनिया में यह मूँछ भी हमारा न हुआ.. इस भरी दुनिया में ऽ ऽ ! घर पहुँचा, पंडिताइन से अपनी व्यथा शेयर कर हल्का होना चाहा, तो उल्टे वह इतरा कर बोलीं , " और क्या ? जब तुम मेरे हो, मेरे लिये बन कर आये हो, तो मूँछ उससे अलग थोड़े ही है ? " अपनी किस्मत ही ऎसी है, मित्रो ! हमने तो जब जब गुड़ चाहा, मिर्चों का अचार मिला ! लो भई, अपने ही घर में सेंध लगी पड़ी है, अब किसको रोने जायें। शायद, आई एम टेकिंग द मैटर सीरियसली , दे मे बी राइट ! नारी के पास नर के मूँछ व पूँछ का रिमोट कंट्रोल सनातन से है । नारी के अस्मिता की बात करें तो... .. जब जब होइ अस्मिता की हानि , बूझो, मरदा केर मोंछ मुरझानी । घूम फिर कर पूँछ मर्दों की ही मरोड़ी जानी है । चित भी इनकी और पट्ट ? ..वह तो हमेशा से इनके ही कब्ज़े में रहा है, वरना पुरुष आज़ इतना असहाय न होता !
साला...लल्लू ! नयी बीबी ने प्यार से कहा, छोड़ो ना.. ..मूँछ गड़ रही है । नऊव्वे के उस्तरे के नीचे आगयी आपकी मूँछ ! और.. पुरानी बीबी ने झम्मक कर कहा, हमारे साथ बाहर निकलने लायक बनो, फिर चलना, खिचड़ी मूँछ क्या अच्छी लगती है ? छिः ! मेरी सहेलियाँ क्या सोचेंगी..देखो बुढ़उना! और, मैडम की जिन सहलियों को नज़र भर कर आप देख भी ना सकें, उनसे कनखियायें जाने के लोभ में, अपनी स्थूल घरैतिन की स्टेटस वल्यू की ख़ातिर आप मूँछ वियोग झेलने को तत्पर ! ग़र कभी आपने प्रेम करने की लक्ज़री की हो, तब तो आपसे बात ही क्या करना । भला कोई क्यों कबूलेगा कि उन्होंने हौले से आपके नाक के नीचे की खेती पर हाथ फिरा कर कहा, धत्त्त ! और उस एक धत्त्त पर मूँछवा की धत्त्तेरे की हुई गयी । मूँछ की ख़ातिर ज़ान देने वाले कोई और नस्ल के पुरुष रहे होंगे । समझदार नस्ल के व्यक्ति, ज़ान की ख़ातिर मूँछ दे दिया करते हैं ! कवि घाघ , आख़िर कितने घाघ रहे होंगे कि बोल ही तो पड़े, " बिन मूँछ का मरदा, औ' बिन पूँछ का बरदा.. " *सत्य वचन महाराज़, हरहा जोते का होय तो पूँछ अँइठ देयो, और मनई लुहावे का होय तो मूँछन पर वार करो। धन्य है..धन्य है, तू भगवान ! पशु योनि के पूँछ का ट्रांसफ़ार्मेशन मनुष्य योनि के मूँछ में ! तेरी लीला अपरम्पार है । नारी रची, अपनी सत्ता बचाने को.. और हमें ? बस एक अदद मूँछ पकड़ा दिया, नारी से नुचवाने को ! हुँह...इछपे मेरा अद्धिकार है । चलो, यह असहमत मौन, यहाँ मुखर करूँगा । यहाँ कोई तो समझेगा, यह दर्द ... कुछ तो है.... !

इन्हीं विचारों में उलझा, मैं उबल रहा था कि मोहतरमा पंडिताइन फिर से प्रकट होती भयीं । मेरा उतरा चेहरा देख, उनकी धवल बत्तीसी खिल पड़ी ( शायद, आंतरिक ख़ुशी ? देवो न जानति, किं मनुष्यम ! ), आँखें मटका कर जैसे मेरे मन को सहलाया, ऎई..ऽ, बुरा मान गये क्या ? ( माया महाठगिनी हम जानि, बुरा मान गये क्या ? अरे,बुरा मान कर भी मैं किसी का क्या उखाड़ लूँगा, उखड़वाने वाली वस्तुयें भी तो, ईश्वरप्रदत्त हमारे ही पास रक्खी है ! ) उई रामाः, मेरे को इन मटकती आँखें से तो, अंतर्मन में एक दूसरी किसिम का ज्ञानोदय अंकुरित होता दिक्खै । मेरी लुगाई ऎसी तो न थी , कहीं चोखेरवालियों की कोई पोस्ट तो पढ़ने को पागयी, पट्ठी ? तभी बदले बदले से सरकार नज़र आते हैं...औ' तभी उनको यह बेसुरे अधिकार नज़र आते हैं । क्यों भड़कती हो भाई ? उनकी बात कुछ और है, तुमतो कुटुंब के प्रति समर्पित गृहस्थन हो । उनके सुर में सुर ना मिलाओ । चलो, मानते हैं या कहो कि मान ही लेते हैं, कि मैं भी तेरा और यह मूँछ भी तेरी ! लेकिन......अब क्या कहूँ ? कम से कम Amphibological शब्दावली में तो मत जियो, यार ! व्यवस्था से लड़ो, कौन मना करता है ? यह तो इस शताब्दी की मोस्ट हैपेनिंग थिंग है, सब किसी न किसी मुद्दे की टाँग पकड़ कर इस भवसागर में डूब-उतरा रहे हैं । कोई कोई तो इमर्ज़ेंन्सी लैंडिंग मानिंन्द इन बेपर मुद्दों की पैराशूट बना अधर में लटके शनैः शनैः लैन्ड कर रहे हैं, एक छटपटाहट है, एक संशय, पता नहीं ताड़ में अटकेंगे कि ख़ज़ूर में ? किंतु दुनिया की निगाह तो उन पर टिकी ही है ! सम्प्रति इतना बहुत है, किसी के फ़ानी ज़िन्दगानी में, सबकी निगाह खींच लेना आसान थोड़े ही है ? सिर की टोपी, ज़रा पैर में पहन कर तो देखो । दुनिया, चैनल व मीडिया फोटू उतारने दौड़ी आती है कि नहीं ? सो, प्रियतमा ! व्यवस्था से लड़ने में कोई बुराई नहीं है, लेकिन ? फिर, वही लेकिन !

लेकिन, एंथ्रोपोलोज़िकल फ़ैक्ट्स को नकार कर, बायलाज़िकल संरचना एवं आवश्यकताओं पर लानत मत भेजो, प्रिये ! तुम तुम हो, मैं तो ख़ैर.. मैं हूँ ही । अब अपने शोषण और अधिकार की सीमारेखा निर्धारित कर लो, और चैन से जियो- हमें भी जीने दो ! ग़र महज़ चिल्लाने के लिये ही यह बवाल है ? ते छड्डयार , हुण देणा तैणूँ इन्ने सारे मुद्दे ! असीं मरदा दियाँ मुच्छाँ नूँ बक्स देओ, भैण ! भौत गल्लाँ हो गयीं, इब साड्डे मुच्छाँ पै हक्क ना जतायीं । ऎनूँ  अमर मूँछ संग्रहालय विच जावेगा !

जनानियों की इस सोच के लिये संज्ञाओं की कमी नहीं हैं, इतनी संगीन धारायें कि द्विवेदी जी अपना तीसरा खंबा भी नोच लें, मसलन.. मूँछ अतिक्रमण, गैरकानूनी अधिग्रहण इत्यादि इत्यादि

पोस्ट कुछ ज़्यादा ही लंबी होती जा रही है, अब कैसे समेटूँ ? मूँछ की महिमा मूँछ वाले ही जानें । जिनको मूँछ माहात्म्य की थोड़ी भी जानकारी है, वह तो कृतसंकल्पित हैं कि अइसे मुँहजरे जमाने मा कइसहू बिपति आये एक रेख मूँछ की राखिबे तो राखिबे....

इन मूँछों ने कई बार इन मोहतरमाओं की ऎसी पोल खोली कि अब तलक बयान-ए-लफ़्ज़ों की मोहताज़ी झेल रही है । फिर भी कोशिश करता हूँ..

भाईजान बातों बातों में कहीं इन्हीं नामुराद मुद्दों पर शर्त लगा बैठे, बेचारे हार गये और मूँछ गँवा बैठे ! बड़ी शोहरत थी ज़माने में उनकी हलब्बी मूँछों की, बड़ी मुश्किल आन पड़ी, घर जाऊँ कैसे ? अपनी निज़ी ज़नानी को मुँह दिखाऊँ कैसे ? चुनाँचे अपने सफ़ाचट मैदान को हाथों से ढाँपे, छुपते छुपाते, रात के अंधेरे में, पिछले दरवाज़े से किसी तरह घर में दाखिल हुये । चोरों की तरह आहिस्ते आहिस्ते अपने बिस्तर में सरक लिये , बगल में लेटी बेग़म उनके ग़म से बेख़बर खर्राटे भर रही थीं । भाईजान को तसल्ली हुयी, चलो शोर न हुआ, इनको सोने दो, सुबह संभाल लेंगे । बेग़म ने खर्राटों को टापगियर में डालने की ग़रज़ से करवट बदली । कुनमुनाते हुये पूरे बिस्तर पर हाथ फिरा कर ज़ायज़ा लिया । हाथ जा पड़ा, भाईजान के ऎन सफ़ाचट मैदान पर ! यह क्या हो सकता है, इसकी उनींदे मिज़ाज़ से तस्दीक़ करनी चाही । भाईजान ने घबड़ा कर उनका हाथ झटक दिया , लाहौल बिला कूव्वत, यहीं ग़लती हो गयी । मोहतरमा एक ब एक हड़बड़ा कर उठ बैठीं, चिल्लाने लग पड़ीं, अब तक मुये यहीं पड़ा है ? चल फूट ले यहाँ से, फ़ौरन दफ़ा हो जा, वह मुच्छड़ बस आता ही होगा ...

तो मैं भी फूटता हूँ...क्योंकि यहाँ भी कोई मुच्छड़ आता ही होगा !

2 टिप्पणी:

दिनेशराय द्विवेदी का कहना है

डॉ. साहब। मूंछ का मजा हम ने हमेशा ही औरों का लिया अपन ने तो उसे बढ़ने ही नहीं दिया,उगते ही साफ।
आप पोस्ट में एक ही साइज का फोंट इस्तेमाल करें तो अच्छा। अधिकतर पाठक फायरफाक्स प्रयोग करते हैं। उस पर बड़ी साइज के फोंट मिक्स होजाते हैं और मात्राओं के गोले दिखाई देते हैं। पोस्ट पढ़ने में नहीं आती। पाठक छोड़ कर चल देता है।
यह वर्ड वेरीफिकेशन आप की पोस्ट पर टिपियाने में परेशानी करता है। सीधे इनस्क्रिप्ट से टाइप करने वालों को अंग्रेजी मोड में आने में परेशानी होती है। इसे हटा ही दें। समय भी लगता है। और समय तो आप जानते हैं लोगों के पास है ही कितना?
यह पोस्ट भी मैने इंटरनेट एक्सप्लोरर में जा कर पढ़ी है।

डा० अमर कुमार का कहना है

सुझाव शिरोधार्य, मित्रवर,

इतनी बेबाक टिप्पणियों की ही आवश्यकता है मुझे ।
यह तो पता चले कि लोचा कहाँ है ?
मैं तो बारंबार आग्रह कर रहा हूँ कि कोई कुछ बताये तो सही !
प्रिंट मीडिया से यहाँ बहुत अंतर है, प्रभु ।
यहाँ तो आप स्वयं ही लेखक,संपादक, डिज़ाइनर,प्रूफ़रीडर और प्रकाशक हैं ।
और सीमित संसाधनों में अच्छे परिणाम निकाल पाना कितना दुरूह है, बस पूछो मेरे दिल से !

यह वाह-वाह , बहुत ख़ूब जैसी टिप्पणियाँ बटोरने में तो भली लगती हैं
किंतु वस्तुतः यह टाफ़ी की तरह दीर्घकालीन उपयोग में हानि पहुँचाती हैं ।
वैसे भी इंटरनेट एक्सप्लोरर से मेरा मोहभंग होही रहा था क्योंकि कल की ही बात है,
बार बार प्रयास करने पर भी अनवरत दिखाने से मना कर रहा है ।

आपकी आज़ की टिप्पणी मेरेलिये अनमोल है ।
दक्षिणा फिर कभी ।
अभी तो इतना ही कह सकता हूँ कि
ख़ूब जमेंगा रंग, जब मिल बैठेंगे तीन यार..आप, मैं और ब्लागर ।
लाइवराइटर से प्रकाशित करता हूँ तो यह परिणाम दृष्टिगोचर होता है, क्यों ?
यह तो कोई पुरोधा ही बता सकेगा ।
आज़ ही फ़ायरफ़ाक्स महोदय को स्नेह निमंत्रण भेजता हूँ ।
मेरा अभिवादन स्वीकार हो, बंधु !

लगे हाथ टिप्पणी भी मिल जाती, तो...

आपकी टिप्पणी ?

जरा साथ तो दीजिये । हम सब के लिये ही तो लिखा गया..
मैं एक क़तरा ही सही, मेरा वज़ूद तो है ।
हुआ करे ग़र, समुंदर मेरी तलाश में है ॥

Comment in any Indian Language even in English..
इन पोस्ट को चाक करती धारदार नुक़्तों का भी ख़ैरम कदम !!

Please avoid Roman Hindi, it hurts !
मातृभाषा की वाज़िब पोशाक देवनागरी है

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शुक्र है कि, सैद्धान्तिक सहमति अविष्कृत हो जाते हैं, और यह ज़्यादा नहीं टिकता, छोड़िये यह सब, आगे बढ़ते रहिये !

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