जो इन्सानों पर गुज़रती है ज़िन्दगी के इन्तिख़ाबों में / पढ़ पाने की कोशिश जो नहीं लिक्खा चँद किताबों में / दर्ज़ हुआ करें अल्फ़ाज़ इन पन्नों पर खौफ़नाक सही / इन शातिर फ़रेब के रवायतों का  बोलबाला सही / आओ, चले चलो जहाँ तक रोशनी मालूम होती है ! चलो, चले चलो जहाँ तक..

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24 November 2008

घी के लड्डू, टेढ़े ही सही ...

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आज की चिट्ठाचर्चा में मसिजीवी ने एक माकूल सवाल उठाया, जाने कहाँ गये वो ब्लाग..जो, " तुम तो छा गये गुरु !" जैसी टिप्पणियों से लदे रहते थे ! कुछेक तो मेरे पसंदीदा हुआ करते थे, जिन्हें मैं पढ़ तो लेता था, किन्तु  किसी हिन्दी टूल की जानकारी न होने से अचंभित बस पढ़ता ही था, टिप्पणी कैसे की जाती है..न जानता था । रिसियाये गुरु ने बहुत बाद में मेरा अधकचरा प्रयास देख बरहा का लिंक दिया, वही अब तक काम आ रही है । उन दिनों जितेन्द्र चौधरी की एक पोस्ट मुझे बहुत पसंद आयी थी, जो मैंने कहीं नोट कर लिया ! विन्डोज़ 98 गये,  XP आये, कई संस्करण के बाद अब विस्टा पर काम कर रहा हूँ, पर उन पढ़े हुये पोस्ट की यादें नहीं भूलीं । यह साबित करता है,कि हमारा आपका लिखा इन्टरनेट पर सदैव जीवित रहेगा ! मसिजीवी ने वह ब्लागर.. वह ब्लाग्स.. वह पोस्ट का ख़ज़ाना याद दिलाया, धन्यवाद मित्र ! किसी माकूल टिप्पणी के लिये कच्चे माल की तलाश में भटका.. सो भटक कर ही रह गया । लीजिये पढ़िये जितेन्द्र चौधरी की एक पोस्ट, जिसका लिंक मैंने नोट कर रखा था । पुनःप्रकाशित करने की अनुमति की तक़ल्लुफ़ पूरी न कर पाने की मुआफ़ी बाद में

   Sunset    यह छवि  श्री संजय व्यास जी के ब्लाग ' हृदयगाथा ' से उठायी गयी है 

यह रहा मूल आलेख, किन्तु शीर्षक मेरा दिया हुआ है, क्योंकि मेरे ख़्याल से NRI होना भी घी के टेढ़े लड्डू हैं, संभलते नहीं

राजेश प्रियदर्शी का यह लेख मुझे बहुत पसन्द आयाः यह लेख वैसे तो यूरोप मे रह रहे अप्रवासी भारतीयो के लिये लिखा गया है, लेकिन सभी पर लागू होता है.

सपने
अच्छी नौकरी, पाउंड को रूपए में बदलें तो डेढ़ लाख रूपए के क़रीब तनख़्वाह. लंदन शहर की ख़ूबसूरती,यूरोप घूमनेके मज़े.                                                                                                                              धूल नहीं, मच्छर नहीं, सभ्य-सुसंस्कृत लोग. चौकस पुलिस, आसान ट्रैफ़िक, हफ़्ते में दो दिन पक्की छुट्टी, आठ घंटे काम, बेहतर माहौल.
चार साल रहने के बाद ब्रिटेन में रहने का पक्का इंतज़ाम, अपनी गाड़ी, अपना घर और एनआरआई स्टेटस.
देश में इज़्ज़त बढ़ेगी,भाई-बंधुओं को भी धीरे-धीरे लाया जा सकता है,अगर कभी लौटे बेहतर नौकरी मिलना तय पानी, बिजली, फ़ोन का बिल भरने के लिए लाइन में लगने की ज़रूरत नहीं, भ्रष्टाचार और संकीर्ण दिमाग़ वाले लोगों से मुक्ति.

संताप
आज तक किसी अँगरेज़ ने दोस्त नहीं माना, किसी ने घर नहीं बुलाया, हैलो, हाउ आर यू, सी यू के आगे बात न कोई करता है, न सुनता है. मुसीबत पड़ने पर पड़ोसी भी काम नहीं आता.
हर साल भारत जाना मुश्किल है,प्लेन का किराया कितना ज़्यादा है, माँ बीमार है.फ़ोन का बिल भी बहुत आता है लोग चमड़ी का रंग देखकर बर्ताव करते हैं, शरणार्थी समझते हैं, बीमार पड़ने पर डॉक्टर बीस दिन बाद का अप्वाइंटमेंट देता है और मरने पर फ्यूनरल दो हफ्ते बाद होता है.
रोज़ बर्तन धोना पड़ता है, हर संडे को वैक्युम क्लीनर चलाना पड़ता है, नौकर और ड्राइवर तो भूल ही जाओ.
मँहगाई कितनी है, कुछ बचता ही नहीं है, कोई चीज़ ख़राब हो जाए तो मरम्मत भी नहीं होती, सीधे फेंकना पड़ता है, प्लंबर पत्रकार से ज़्यादा कमाता है. आधी कमाई टैक्स में जाती है.
बच्चों के बिगड़ने का भारी ख़तरा, ड्रग्स, पोर्नोगार्फ़ी. बच्चे अपनी भाषा नहीं बोलते, ख़ुद को अँगरेज़ समझते हैं. चार अक्षर वाली गाली देते हैं जो 'एफ़' से शुरू होकर 'के' पर ख़त्म होती है.
ऐसा क्या है जो भारत में नहीं मिलता, गोलगप्पे और रसगुल्ले खाए बरसों बीत गए. धनिया पत्ता और हरी मिर्ची के लिए भटकना पड़ता है.
त्यौहार आते हैं और चले जाते हैं, पता तक नहीं चलता, पूजा कराने के लिए पंडित नहीं मिलता. गोबर, केले और आम के पत्ते के बिना भी कहीं पूजा होती, फ्लैट में हवन करो तो फायर अलार्म बज जाए.

सवाल

क्या कभी भारत लौट पाएँगे, क्या बच्चे वहाँ एडजस्ट करेंगे,हमें कहीं बहुत सुख सुविधा की आदत तो नहीं पड़ गई?मैं तो चला जाऊँगा, घर के बाक़ी लोगों को कैसे मनाऊँगा, बसा-बसाया घर उजाड़ना कहीं ग़लत फैसला तो नहीं? जीवन सुरक्षित नहीं, भ्रष्टाचार बहुत है, दंगे भड़कते रहते हैं, आदत छूट गई है, कैसे झेलेंगे यह सब ?             लोग पहले बहुत मदद करते थे, दिल्ली, मुंबई का जीवन अब कुछ कम व्यस्त तो नहीं, लोग पहले जैसे कहाँ रहे? दिक्क़तें यहाँ भी हैं, वहाँ भी, चलो जहाँ हैं वहीं ठीक हैं, फिर कभी सोचेंगे

Posted by Jitendra Chaudhary at Thursday, September 23, 2004 

7 टिप्पणी:

राज भाटिय़ा का कहना है

डा साहब आप ने तो मेरी आधी कहानी ही लिख डाली है भाई, लेकिन यह सब होता है हम सब भारतीयो के संग, भगवान की दया से अभी तक तो बच्चे कहना मानते है,खुद को भारतीया समझते है, आप से मिलेगे तो हिन्दी मै ही बात करेगे, ड्राईवर मै ही हुं, घर का काम बीबी के जिम्मे, बाकी सब बाते सही लिखी है आप ने.
धन्यवाद

विवेक सिंह का कहना है

वैसे मेरी मानें तो भारतीय परंपराएं भारत के बाहर ही ज्यादा सुरक्षित हैं . यहाँ लोग अब बच्चों के नाम टिंकू, पिंटू, सन्नी जैसे रखने लगे हैं विदेशों में लीलाधर , रामनारायन जैसे नाम भी रखे जाते हैं .

अनूप शुक्ल का कहना है

गुड मार्निंग टी के बाद यह देखा गया। अब टिपियाया जा रहा है। जीतेंन्द्र चौधरी कभी सबसे सक्रिय ब्लागर हुआ करते थे। अब न जाने कहां बिजी हो गये हैं।

Udan Tashtari का कहना है

तब भी लगा था और अब भी लगा-मेरी अपनी सी कहानी..आपका आभार.

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi का कहना है

सब कहीं सच एक जैसा है। घर पर सुविधाएँ कम हैं पर घर तो है।

Pt.डी.के.शर्मा"वत्स" का कहना है

सच हि कहा है कि "जो सुख झ्ज्जू के चोबारे, वो बल्ख ना बुखारे"
अच्छी पोस्ट.

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` का कहना है

हमने जीतेन्द्र चौधरी जी के ब्लोग पर ही,
पहली बार ब्लोग पे लगा गीत सुना था
और आस्चर्यचकित रह गये थे !
खैर अब परदेस मेँ भारतीयता
की सुविधा कई गुना बढ गईँ हैँ --
- लावण्या

लगे हाथ टिप्पणी भी मिल जाती, तो...

आपकी टिप्पणी ?

जरा साथ तो दीजिये । हम सब के लिये ही तो लिखा गया..
मैं एक क़तरा ही सही, मेरा वज़ूद तो है ।
हुआ करे ग़र, समुंदर मेरी तलाश में है ॥

Comment in any Indian Language even in English..
इन पोस्ट को चाक करती धारदार नुक़्तों का भी ख़ैरम कदम !!

Please avoid Roman Hindi, it hurts !
मातृभाषा की वाज़िब पोशाक देवनागरी है

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शुक्र है कि, सैद्धान्तिक सहमति अविष्कृत हो जाते हैं, और यह ज़्यादा नहीं टिकता, छोड़िये यह सब, आगे बढ़ते रहिये !

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