जो इन्सानों पर गुज़रती है ज़िन्दगी के इन्तिख़ाबों में / पढ़ पाने की कोशिश जो नहीं लिक्खा चँद किताबों में / दर्ज़ हुआ करें अल्फ़ाज़ इन पन्नों पर खौफ़नाक सही / इन शातिर फ़रेब के रवायतों का  बोलबाला सही / आओ, चले चलो जहाँ तक रोशनी मालूम होती है ! चलो, चले चलो जहाँ तक..

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18 May 2009

जीवनदास को कड़ी से कड़ी सजा दी जाये

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बड़े दिनों से यह “ चलता रहे.. चलता रहे.. “ देख व सुन रहा हूँ । यूँ तो मैं ’ निट्ठल्ला इफ़ेक्ट ’ से इतना पका हुआ हूँ कि, टेलीविज़न बहुत ही कम देखता हूँ । एक म्यान में दो तलवारें वैसे भी कहाँ रह पाती हैं ? अरे, निगोड़ी ब्लागिंग को शामिल न भी करें, तो भी आप यही समझ लीजिये कि “ बुद्धू को कहाँ बुद्धू बक्सो सों काम ? “ फिर भी.. कुछ तो है,  कि आज  एक बेकार सा मुद्दा पकड़ कर बैठा हूँ, कि  न्याय मिले 
                                                       पहले तो आप इन जीवनदास से मिलिये
         
मिल भये… क्या समझे ? अभी फ़िलवक़्त मुझे प्लाई-व्लाई तो लेनी नहीं है, सो मैं तो यही समझ रहा हूँ, कि भारतीय न्याय-वयवस्था इतनी धीमी और लचर है कि, “ चलता रहे… चलता रहे…. ! “ है कि, नहीं ?

इस मख़ौल की पराकाष्ठा तो यह है कि, ’ बैल से दँगा करवाने के ज़ुर्म में .. ’ जैसा आरोप और बैल को अदालत में तलब किये जाने की माँग, जैसा अदालत का बेहूदा कैरीकेचर खींचा गया है, सो तो अलग !

आदरणीय दिनेशराय द्विवेदी जी से आग्रह है कि, या तो वह जीवनदास को न सही, पर उसके आरोपी बैल को ही कड़ी से कड़ी सज़ा दिलवायें, और इस नाटक का पट्टाक्षेप करवाने का प्रयास तो कर ही लें !

मुआ ग्रीनवुड प्लाई न हो गया, राम-मँदिर का मुद्दा हो गया ! मुझे तो इसमें आख़िरी बार बोले जाने वाला ’ चलता रहे.. चलता रहे ’ में पिटे हुये अडवाणी की आवाज़ सुनायी दे रही है.. या यह  मेरा भ्रम है ?

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19 January 2009

तुम पार नेट परमेश्वर तुम ही नेट पिता

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google-animated-holoween-logo 

ॐ जय गूगल हरे, स्वामी जय गूगल हरे
फ़्रस्ट (एटेड ) जनों के संकट, त्रस्त जनों के संकट
एक क्लिक में दूर करे
ॐ जय गूगल हरे…

जो ध्यावै सो पावै
दूर होवै शंका, स्वामी दूर होवै शंका
सब इन्फ़ो घर आवै, सब इन्फ़ो घर आवै
कष्ट मिटै मन का
ॐ जय गूगल हरे…

नेट पिता तुम मेरे
शरण गहूं किसकी, स्वामी शरण गहूं किसकी
तुम बिन और न दूजा, तेरे बिन और न दूजा
होप करूं किसकी
ॐ जय गूगल हरे…

तुम पूरन हो खोजक
तुम वेबसाइटयामी, स्वामी तुम वेबसाइटयामी
पार नेट परमेश्वर, पार नेट परमेश्वर
तुम सबके स्वामी
ॐ जय गूगल हरे…

तुम ब्लागर. के फ़ादर
तुम ही इक सर्चा, स्वामी तुम ही इक सर्चा
मैं मूरख हूं सर्चर, मैं मूरख हूं सर्चर
कृपा करो भरता
ॐ जय गूगल हरे…

तुम सर्वर के सर्वर
सबके डाटापति, स्वामी सबके डाटापति
किस विधि एन्टर मारूं, किस विधि एन्टर मारूं
तुममें मैं कुमति
ॐ जय गूगल हरे…

दीनबंधु दु:खहर्ता
खोजक तुम मेरे, स्वामी शोधक तुम मेरे
अपने फ़ण्डे दिखाओ, कुछ तो टिप्पणी दिलाओ
साइट खड़ा तेरे
ॐ जय गूगल हरे…

बोरियत तुम मिटाओ
टेंशन हरो देवा, स्वामी टेंशन हरो देवा
गूगल अकाउण्ट बनाया गूगल अकाउण्ट बनाया
पाया ब्लागिंग मेवा स्वामी पाया ब्लागिंग मेवा
जो नर ब्लागिंग धावैं करैं निजभाखा सेवा
ॐ जय गूगल हरे

go

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15 January 2009

चला बाघ मंत्री बनने !

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सुबह सुबह पंडिताइन ने झकझोर मारा, " एई उट्ठो.. एई उठो न, देखो बाघ लखनऊ तक आगया  !
अरे, मैं तो अपना ही किस्सा लेकर बैठ गया, एक आवश्यक औपचारिकता तो पहले पूरी कर लूँ  !

आपसब ब्लागर भाई व भौजाईयों को  समस्त उत्तरायण पर्वों की हार्दिक शुभकामनायें !
जिनको भौजाई कहलाने में आपत्ति हो, कृपया नोट करें.. वह मेरी पोस्ट भले न पढ़ें, पर, उनका एतराज़ किसी भी दशा में दर्ज़ नहीं किया जायेगा !

tiger एई उट्ठो.. एई उठो न, देखो बाघ लखनऊ तक आगया  ! “  क्या यार, धत्तेरे की जय हो !  तुम भी क्या बच्चों की तरह किलकारी मार रही हो ? बाघ-साँप मंगल-जुपिटर के अलावा तुम्हें कुछ और नहीं सूझता ?” दरअसल यह सब इनको बड़ा रोमांचित करता रहा है । सो, मैं गिड़गिड़ाया, “ बाघ अभी 80 किलोमीटर दूर है, अभी सोने दो.. बेकार शोर मत मचाओ !  बाघ है तो मैं क्या करूँ ? “  और,  मैं दुबारा से रज़ाई में कुनमुनाने लग पड़ा  !
प्रसंगवश बता दूँ, कि इन मैडम जी ने शादी करने के लिये तो मुझ गदहे को चुना, पर मोहतरमा की दिलचस्पी हमेशा से बाघ, शेर, हाथी, साँप, ग्रह.. नक्षत्र और भी न जाने क्या क्या में रहती है ? कुल ज़मा किस्सा यह कि आजकल मुझपर रोब गाँठने के सिवा मुझसे शायद ही इनका कोई नाता हो ? तिस पर भी दिसम्बर माह में मेरा कीबोर्ड आतंक और आतंकवादियों से ही जूझने में खरच होता रहा !  वह नाराज़ी अलग से है.. “ एई सुनो, अब आजकल तुम अपने, क्या कहते हैं कि पोस्ट में.. मेरा ज़िक्र तक नहीं करते हो ! अरी भागवान, तू नादान क्या जाने कि तेरा आतंक उन आतंकियों का पसंगा भी नहीं है !  जो भी हो,  तेरा आतंक तो मैं अकेले झेल ही रहा हूँ, डियर ! उधर सारा देश दाँव पर लगा है !
मैंने तो अब तक एक गुनाह तुमसे ब्याह करने का ही किया है और अब मैं उतना मासूम भी न रहा । पर.. पहले इन आतंकियों पर अपना गुस्सा निकाल लेने दे, जो मासूम, बीमार.. बेगुनाहों में फ़र्क़ करने की तमीज़ भी नहीं रखते.. पता नहीं, किन नामाकूल आकाओं ने इनको ट्रेनिंग देकर भेजा है ?  संसद वसंद पर एक बार और हो आते, एक दो खद्दर-कुर्ता टोपी-अचकन टपका भी देते तो,  देश न सही  मैं तो कृत्तज्ञ  होता ही  और, आप लोग भी अगर बाई-चाँस पकड़ में आ भी जाते, तो कसाब जैसा हाल तो न बनता, और  अफ़ज़लवा की तरह दोनों मुल्क की सरकारों को लटकाये रखते, वो अलग से ? tdots5tdots5tdots5tdots5
ईश्श्श, पोस्टिया तो लगता है, फिर आतंकियों की तरफ़ रेंग चली है ! पीछे मुड़.. कीबोर्ड चला.. सामने देख.. नज़र सामने रख, निगाह बाघ पर.. 80 किलोमीटर दूर है, तो क्या हुआ ?  तेरा कीबोर्ड अटलांटा ज़र्मनी तक का रेंज़ रखता है ! बाघ तो मात्र 80 कि.मी. पर  है !
पूरे दिसम्बर माह बड़ा शोर रहा.. दुधवा का एक बाघ नखलऊ की तरफ़ बढ़ रहा है ! जी हाँ, जगप्रसिद्ध लखनऊ अपने घर में नखलऊ ही कहलाता है ! हाँ तो, बाघ नखलऊ की तरफ़ बढ़ रहा है.. रोज सुबह पंडिताइन अख़बार आते ही, चट से उसकी लोकेशन देखतीं, और मुझे झकझोर देतीं । मैं खीझ जाता, " तो मैं क्या करूँ ? " उनका तुर्रम ज़वाब होता, " मैं क्या करूँ.. अरे भाई बाघ है, कोई मामूली चीज नहीं, कुछ लिखो. !." तुम्हें क्या बताऊँ ऎ अनारकली, कि बाघ की टी०आर०पी० इन दहशतगर्दों के सामने दुई कौड़ी की भी नहीं ! एक मौज़ आयी कि समीर भाई इंडिया पधारे हैं.. इनको ही एन-रूट दुधवा तैनात कर दूँ, यहाँ भी बाघ दुबक जाता । अब छोड़िये.. उनकी पावर तो बांधवगढ़ में ही शेष हो गयी.. बाकी जो बचा था वह शायद कमसन समधन ले गयी ! चुँनाचें, आज फिर बाघ महोदय हेडलाइनों में प्रकट होते भये हैं । यह साला दुधवा से सीधे लखनऊ को ही क्यों चल पड़ता है  ?  पर, सोना क्या था ?  इस प्रयास में, बाघ को लेकर मन में किसिम किसिम की धमाचौकड़ी  मचती रही.. वह निट्ठल्लई  भी बताऊँ क्या ?
अरे, बाघ  तो ज़ंगल का राजा है, भला लखनऊ आकर क्या कर लेगा ? भूखा है.. तो उसे वहीं आस पास के गाँवों में हाड़-मांस के पुतले मिल ही जाते ! पर, उन बेचारे पुतलों में सिर्फ़ हाड़ ही हाड़ बचा हो ?  सो,  किबला मांस की तलाश में राजधानी की तरफ़ चल पड़े  हैं ?  लेकिन, यहाँ के रसीले, गठीले, स्वस्थ, दमकते मांसल पुतले तो सरकारी ख़र्चे  के सुरक्षा-कवच से घिरे रहते हैं.. क्या बाघ महाशय  का  इंटेलीज़ेन्स-डिपार्ट भारतीय सुरक्षा-तंत्र से भी गया बीता है, जो उन तक इतनी मामूली सूचना भी न पहुँचायी होगी ? ज़रूर  मामला  कुछ और ही है.. झपकी आ गई.. सामने अभय की मुद्रा में साक्षात बाघ महाशय दिखते भये । नहीं, डर मत, तू मुझे ब्लागर पर कवरेज़ देता रह, मैं अपनी सरकार  में सूचना सलाहकार बना दूँगा ! आईला, बाघ ज्जिज्जी जी, क्षमा करें.. माननीय बाघ जी, सरकार बनायेंगे ? पर.. दिल की बात रही मेरे मन में, कुछ कह न सका कच्छे की सीलन में
lion3 सरकार, आप तो खुदै ज़ंगल के राजा हो, फिर ? माननीय बाघ जी दहाड़ते दहाड़ते एकदमै संभल गये, लहज़ा बदल कर बोले.. “ भई देख डाक्टर, वहाँ भी सभी मौज़ है, लेकिन यह ज़गमगाती बिज़ली बत्ती, ठंडक देने वाली ए,सी. वगैरह वगैरह कहाँ ? अगर हम्मैं ज़ंगल ही पर  राज करना है, तो  तेरे इस बेहतरीन ज़ंगलराज में करेंगे । भला बता तो,  तेरे नखलऊ से अच्छा ज़ंगलराज और कहाँ मिलेगा, रे ? तू वहाँ घूमने जाता है,हमारे लोग यहाँ घूमने आयेंगे !
पर, माननीय महामहिम दुधवा से सीधे.. हा हा हा, अरे मूर्ख दुधवा क्या उल्टा-प्रदेश से अलग है, क्या ? यहाँ अलीगढ़ के वकील, इटावा के मास्टर, मांडा के राजा, बिज़नौर की बहनजी आ सकती हैं, तो मैं क्यों नहीं ? कड़क्ड़कड़ मेरे दिमाग में जैसे हज़ार पावर की बत्ती जल उठी.. अब्भी अबी माननीय ने मांडा के राजा का नाम उचारा था, पकड़ लो  इनको । “ हुज़ूर, आप तो पैदायशी राजा हैं, सत्ता पर आपका  जन्मजात अधिकार होता है… नहीं मेरा मतबल है, आप तो  आलरेडी डिक्लेयर्ड राजा होते हैं, फिर यहाँ हम इंसानों के बीच…मतबल ? ज़ब्त करते हुये भी बाघ जी गुर्रा पड़े,  और अपनी तो..?
निकल पड़ी ? निकल पड़ी न, तुम्हारी गंदी ज़ुबान से चालबाजी की बातें ? बताओ तुम्हारे कने परिवारवाद.. वंशवाद नहीं है, क्या ? ज़ाल तू ज़लाल तू, आई बला को टाल तू.. सो तो है, सरकार ! फिर, मेरे को क्या समझाता है ?  मुझे तुम इंसानों की पोल पट्टी पता है !
पर, हज़ूर वहाँ...  आपके मतबल राजा के जूठन पर सैकड़ो गीदड़-सियार लोमड़ी पलते हैं । उसकी चिन्ता मत कर, यहाँ भी पहले से बहुत पल रहे हैं, हमारे भी उन्हीं में खप जायेंगे.. बोल आगे बोल ?  डर मत, तेरे बहाने  मेरा प्रेस-कांफ़्रेन्स का प्रैक्टिस हो रैया है ।
यार, इनको यहीं से दफ़ा करो, नहीं तो राजनीति के नाम पर तो, यह हमारे दाद बन जायेंगे ! सो, मैं मानवता की रक्षा के लिये सनद्ध होता भया.। यदा यदा हि लोकतंत्रस्य… पर, सरकार यहाँ तो लोकतांत्रिक बवाल चलता है.. भला आप ? अपने लिये सरकार सुनकर वह नरम पड़े । रहने दे, रहने दे.. वह मीठे स्वर में गुर्राये, " मुँह न खुलवा.. लेकिन सिर्फ़ तेरे को बताता हूँ, लोकतांत्रिक-वांत्रिक के लिये मेरे कने  बंदरों की बहुत बड़ी फ़ौज़ है, सभी बूथ कवर कर लेंगे ।"  तो, यह जनशक्ति की धौंस दे रहें हैं  ?
अब तक मेरी घिघ्घी बँध चुकी थी.. बंदरों की फ़ौज़ से घिरे होने की कल्पना मात्र से, आगे के सैकड़ों प्रश्न उड़न-छू हो चुके थे । ज़्यादा बोलना, अब ऎसे भी उचित न था, इनका महामहिम बनना तय था । क्या पता, यह सूचना सलाहकार के भावी पद से अभी से सस्पेन्ड करके कोई जाँच-वाँच बैठा दें ! पर, भईय्यू वह ठहरे ज़ंगल के राजा सो, फ़ौरन मेरा असमंजस भाँप गये, "लोकतंत्र-पोकतंत्र कि चिन्ता मत किया कर ! नखलऊ में सभी लोकतंत्र की दहाड़ मारते हुये आते हैं । फिर, कोई फ़कीर बन जाता है, कोई मुलायम हो जाता है, कोई माया बन जाती है । मैं बाघ बन कर आऊँगा.. तो आख़िर तक बाघ ही रहूँगा .. राज करने के लिये हाथी नहीं बन जाऊँगा, समझे कि नहीं ? मैं मिनमिनाया, " समझ गया सरकार, हमारी क्रांति का प्रभाव हमसे ज़्यादा ज़ानवरों पर है । लो, चलते चलाते महामहिम का मूड बिगड़ गया.. " फिर तुमने ज़ानवरों को इंसानों की बराबरी में रखा ? छिः, तौबा कर ! "
आभार: डा. अनुराग का, जिन्होंने मुझे यह पोस्ट लिखने को टँगे पर चढ़ा दिया था । आफ़कोर्स पंडिताइन का, जिन्होंने आतंकवाद पर अरण्य-रूदन पर झाड़ पिलायी..और सामने रखी घड़ी का, जिसमें तीन नहीं बजे हैं,एवं सोचताइच नहीं, लिखेला ठेलेला के टैग का Nerd
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05 January 2009

भाई साहब, हैप्पी नियू ईयर टू यू !

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पुरानी पोस्ट है, तो क्या हुआ… 3 जनवरी 2008

हैप्पी न्यू ईयर, सर्र. . . . मैं पलटता हूँ, एक किंचित परिचित चेहरा मेरी तरफ़ मुखातिब मुस्कुराता हुआ दृष्टिगोचर होता है । इनको कहाँ देखा है , दिमाग में चल रहा होता है किंतु ज़ुबान से फिसल पड़ता है, " थैंक यू , सेम टू यू ! "
यहाँ ठहरें कि आगे बढ़ जायें ( न जाने किस वेष में आने वाले कल का कोई  महामहिम ही हो ), मेरे इस असमंजस से उबरने के पहले ही उनका हाथ मेरी तरफ़ को उठता दिखता है । अब रूकना तो लाज़िमी है । ठिठक कर सोच रहा हूँ, किस तरह पेश आया जाये । उन सज्जन की दृष्टि तो सामने के फुटपाथ पर जाती हुई किसी महिला को आँखों ही आँखों मे तौलती हुई सी ' वकोध्यानम एकाग्र ' थी, बाँया हाथ कान से सटे मोबाइल को थामे और दाहिना हाथ जैसे कुछ टटोलती हुई मेरी ओर हवा में लहरा रही थी । अच्छा, लगता तो यह हैंड शेक का न्यौता है ? अशिष्टता न झलके, इस मज़बूरी में ' चलो मिलाय लेते हैं ', मैंने भी हाथ बढ़ा ही दिया ।

सिगरेट दबे होने के कारण वह फ़क़त चार ऊँगलियों से मेरी हथेली को उपर नीचे हिलाते हुए मोबाइल अपने मुँह के सामने ' माइक्रोफोन टेस्टिंग 'के अंदाज़ में ला दहाड़ से रहे हैं, "जल्दि आओ भाई, ईंहाँ डिग्री कलैजिया के सामने दुई घंटे से तुम्हरे इंतजरिया में खड़े हँय । " खट्टाक्क, मोबइलिया बंद, हमारी तरफ़ घूमे, " अउर, बाल बच्चे ठीक ? भाभी जी मज़े में ? आप लोग दिखबै नाँहीं करते हैं । इहाँ एक पार्टी का इंतजार कर रहे थे कि आपै दिखायी दइ गये , नया साल मुबारक़ हो ।"  मुझे भी बोलना ही पड़ता है, " आपको भी "।

सहसा दिमाग में बिज़ली सी कौंधती है, " आप बाजपेयी ठेकेदार हैं न ? " आहाहा हा, हाँ, हाँ । चलो धन्न-भाग हमको, जो आप पहचानै लिये सेवक को । लो, इतने में उनका मोबाइल फिर बीच में कूद पड़ा, पैन्ट की बाँयीं ज़ेब से चीखने लग पड़ा, ' हो रे .. राम, होरे राम, हो रे क्रिश्ना, हो रे राऽऽआम...होऽऽऽ ', और वह मेरी तरफ़ पीठ करके बेचारे मोबाइल का टेंटुआ दबाते हुए फौरन कान से चिपका लेते हैं, ' हलऊ हल्लऊ, हाँ..... ' भाग लो अमर कुमार यही मौका है । एक खिसियाहट से बाहर आने की कोशिश करते हुये, मैं आगे बढ़ लेता हूँ, मन में थोड़ा रंज़ भी है, ' भाभी जी, मज़्ज़े में ? स्साला भाभी के मज़े का ठेकेदार …  ..  हरामी कहीं का ? '

और मेरी वह भी तो ,जिसको देखेंगी मीठी-मीठी मुस्की मार निहाल ही कर देंगी, जैसे एसेम्बली इलेक्सन की उम्मीदवारी मिली हो, बेहया ! हूँह, भाभी जी के मज़े की औलाद कहीं का, स्साला हरामी । ' अब अपनी पूरी बिलागर बिरादरी की पंचायत से दरख़्वास्त है कि, मेरे स्वगत कथन को माइनस करके ज़रा ग़ौर करें कि यह कैसा ' हैप्पी नियू ईयर ' है, और ऎसे रस्मी ' थ्रो अवे गुडविशेज़ ' की कितनी अहमियत है ? चलिये इन बीहड़ बाजपेयी जी को फिलहाल अलग बैठाय देते हैं, लेकिन यह ' नववर्ष की बधाईंयाँ, शुभकामनायें वगैरह वगैरह ' तो जिधर नज़र दौड़ाओ, उधर ही हावी है । यह सब काहे को भाई ?

पच्चीस बवालों के बावज़ूद भी लुटते पिटते 2008 निकाल लाये, इसीलिये 2009 की मुबारक़बाद मिल रही है । मानों तिहाड़ से बाहर आ , अब यरवदा में जारहे हों , सुख शान्ति की ओर...बधाई हो । यह सब मेरी संकुचित समझदानी में नहीं आरहा है तो कैसे खीसें निपोर दूँ ? कोई भाव नहीं, कोई सरोकार नहीं, बस हैप्पी नियू इयर उछाले रहो । यह बधाई तो मुझे की बकरे माँ के ख़ैर मनाने जैसा लगता है, कब तक ? भगवान जाने, शायद जब तक ज़िन्दा रहोगे तब तक । यही सब देते दिलाते दम निकल जाये तो भी यह संतोष तो है कि फलाँ साहब हमारे शुभकामनाओं के चलते ही इतने दिन सकुशल काट लाये । वैसे तो इस रिवाज़ में ज़ाहिराना तौर पर कोई खोट नहीं लउकता । वाज़िब बात, दुनिया की रीत है यह सब ।

सभी हमारे जैसे लंठई सोच के पैदा हो जायें , तो हो गया कल्याण ? लेकिन अगर अब्भी भी हमारा पाइंट नहीं पकड़ पाये हों तो बात खुलासा हो ही जाये । इतना लम्बा चौड़ा ख़ाका सिरिफ़ इस लिये खींचा है, कि शायद कोई लाल बुझ्झकड़ सिरे तक पहुँच ही जाये हम अपनी असभ्य लंठई सोच को गठरिया के बगल रख देते हैं, तो आप पंच लोग यह बतायें कि हम भले अंग्रेज़ी में फिस्सड्डी  होंय, लेकिन परंपरा की कसम खाने को अंग्रेज़ियत का बासी गाउन कब तक सूँघते रहेंगे ? क्या गाँधी का स्वदेशी केवल कपड़ों की होली जलाने भर को ही था, या कि हम कभी अपनी भी कोई सुदेशी सोच कायम कर पायेंगे ? यह भारतदेश है मेरा......। अनेकता में एकता की अद्भुत मिसाल ( भरी सभा में सिगार पीते और  भाषा के गठन पर प्रलाप करते राजेन्द्र याद आरहे हैं ) वाह क्या थ्योरेटिकल बात है ? अब जरा देशी नववर्ष की तिथियों की झलक भी देखें ....
उत्तर भारतीय राज्य - चैत्र शुक्लपक्ष प्रथम
गुजरात - दीपावली के दूसरे दिन, ( जिसे हम परेवा कहते हैं, यानि कामधंधा बंद ) पर वहाँ हर्षोल्लास का दिवस !
पंजाब - बैसाखी के पर्व से
बंगाल - पोइला बोईशाख ( वैशाख शुक्लपक्ष प्रथम )
भारतीय मुस्लिम - मोहर्रम की पहली चाँद के दिन से
दक्षिण भारत – पोंगल

 नववर्ष 2009
यदि मेरे अवलोकन में कोई त्रुटि हो, तो नाचीज़ की इल्मअफ़ज़ाई करने की ज़हमत ग़वारा करें एवं यदि कुछ अतिरिक्त जानकारियाँ साझी करने को है, तो क़िबला मेरे सिर आँखों पर नोश फ़रमायें । ग़र मेरी ख़ुज़ली ख़ारिज़ कर भी दें, पर किससे ग़िला ? यह तो आप देख ही रहे हैं कि अंग्रेज़ियत के नकली शिष्टाचार हमारे महान भारतदेश को एक सूत्र में बाँधे हुये हैं तो फिर मैं ही इसको मुद्दा बनाने पर क्यों आमदा हूँ ? ज़वाब तो भाई मेरे पास भी नहीं है, वरना यहाँ क्यों चिचिया रहा होता ?  फिर भी, मेरे प्रलाप के पीछे कुछ तो है ही ...


चलो भाई, मैं दकियानूस खूसट सही.. पर, आदरणीय शास्त्री जी का सूत्रवाक्य ' हिन्दी ही हिन्दुस्तान को एक सूत्र में पिरो सकती है ' यहाँ पर मुझे कन्फ़्युजिया देती है ! इसका समाधान कैसे हो ? यह भी माना कि, आधुनिकता के संदर्भ में इतनी अंग्रेज़ियत तो ज़ायज़ है .. सहमत हूँ श्रीमान ! पर.. यह पर, किन्तु, परन्तु जैसे मेरे पीछे पीछे डोला करते हैं ! अंग्रेजी में बोले तो.. चलेंगा, लेकिन 'लेडीज़ फ़र्स्ट' की परंपरा वाली अंग्रेज़ियत की पैरवी करने वाले आख़िर बुकिंग विन्डो पर महिलाओं को धकियाते हुये देखे जाते हैं.. ताज़्ज़ुब नहीं कि, वहीं से पलट कर हाँक लगा दें.. 'मैंने कहा हैप्पी न्यू ईयर, डाक्टर साहब !' तो... तो, मेरे ऊपर क्या बीतती होगी ? यही कि, ऎसी बकवास लिख मारो... और क्या ? जो मेरे मन आया, यहाँ उड़ेंल दिया, ज़रूरी नहीं कि आप सहमत ही हों ! नमस्कार !

इससे आगे

23 December 2008

वो अन्डरस्टैंडिंग थी और ये सियासत है !

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स्थान: सीमा चौकी, इस बार उत्तर-पश्चिम क्षेत्र
बात बात पर उबल पड़ने और भारत माँ की सौगंध लेने की आदत के चलते रामनिहारी जाटव अपने बटालियन में रामबवाली भारती पुकारे जाते थे ! हमारे चरित्रनायक रामबवाली जी अब लांसनायक भारती के नाम से पुकारे जाने लगे हैं । दीपावली मनाने दो वर्ष बाद छुट्टियों में घर आये हैं । सब ठीक ठाक गुज़र रहा था, मात्र चार दिन ही रह गये थे, कि बेस से वारंट आगया.. ... रिपोर्ट इमिडीयेटली ! बीबी ने उनका सामान बाँधा, उन्होंनें कुलदेवी के सम्मुख सिर पर क़फ़न बाँधा और चल पड़े लाम पर ! रिपोर्टिंग की औपचारिकतायें पूरी हुईं, एक संक्षिप्त मीटिंग... और यह तय पाया गया कि जिसको जिस क्षेत्र की अधिक जानकारी है,उन्हें वहीं भेजा जाय !   
आज लगभग दस दिनों बाद कुछ लिखने बैठा हूँ |ये अन्डरस्टैंडिंग है...का दूसरा भाग पूरा करना शेष था । ब्लागर की सीमित दुनिया में सुरक्षा संचेतना सुनामी या कहिये कापी-पेस्ट काँव-काँव के थमने की प्रतीक्षा में स्वामी का यह आम आदमी पाँच दिनों के लिये टीकमगढ़ के बंज़र की खाक छान आया ! बस ऎंवेंई ही... वहाँ की दुरावस्था पर बहुत कुछ सुना था, सो देख भी आया ! वहीं पाकिस्तान के विषय में गाम की एक औरत बमुश्किल बता पाती है, " किस्तान -उस्तान तै हम्मैं नाहीं पतौ ! लड़कन बतावत जे अपँयैं भारत माता  ते जरन वारे लोग गुंडन के भेज के बम्बई मां दंगो धमाकौ कराय रहै अउर जे सरकार हाथै पै हाथ धरै आगि तापि रही !" किंचित हिचकिचाहट के बाद साहस बटोर कर एक झटके में पूछ भी लेती है, " तू कोनि सरकारी जसूस तै नाहीं ? " एक पोस्ट का मैटर है, सो छोड़िये यहीं ! कल शाम साबिहा समर की पाकिस्तानी पंज़ाबी फ़िल्म खामोश पानी देखी जिसमें ज़िया-उल हक़ के ज़माने की किरन खेर अपने लड़के सलीम मलिक को रफ़्ता रफ़्ता इस्लामी कट्टरवाद में डूबते जाते देखती है, असहाय बेबस ! निःसंदेह एक सशक्त फ़िल्म है, यह ! आज की विहंगम चिट्ठाचर्चा पर श्री सत्यनारायण ' कमल ' से परिचय हुआ.. उनकी वयोवृद्ध लेखनी से निकली जोशीली पोस्ट ने जैसे मुझे जगा दिया .. काल करै सो आज कर...  लिख ले जो लिखना है, तुझे ! आपको मेरा सादर धन्यवाद शर्मा जी, Island with a palm tree यह रहा…      वो अन्डरस्टैंडिंग थी और ये सियासत है ! 

  अन्डर्स्टैंडिंग और.....सियासत

अब शुरु हुआ कठोर श्रम और चुहलबाजी का दौर.. ख़तरों के इतने नज़दीक रह कर.. बारूद की गंध में भी यह ज़वान हँसने के मौके तलाश लेते हैं ! जीवट के जीवंत मिसाल हैं हमारे ज़वान ! यम भी इनसे पनाह माँगें, ऎसे हैं

पर, इस बार चुहल में वह बात नहीं थी.. चौकी पर लगे लाउडस्पीकर अपना अलग मक़सद रखते हैं ! पर, इसी के ज़रिये सीमा पार के सैनिकों से नोंक-झोंक भी कर ली जाती थी.. जस्ट फ़ार चेन्ज़ ! टैंक अदल बदल के किस्से तो अब चुटकुलों में भी शामिल हो गये हैं ! एक दूसरे की आवाज़ों के इतने अभ्यस्त..कि नाम भी पहचान लिये जाते हैं..  मसलन पिछली बार मोहायम.. परवेज़ वगैरह की ज़िन्दादिल पर रस्मी ललकार कभी कभी इनको भी मोह लेती थी ! एक बार मैंने पूछा भी था कि, " यह सब कैसे बर्दाश्त करते हैं ?" उन्होंने तन कर कहा फ़ौज़ी की कोई धर्म- जाति नहीं होती.. बस हमारे को एक चीज मालूम होता है, कि हमारा मुल्क सबसे ऊपर .. पीछू को चाहे मज़हब बोलो तो.. चाहे पालिटिक्स बोलो और चाहे.. और चाहे तो क्या और क्या .. करते हुये वह अपनी किसी लक्ष्मणरेखा पर ही  अटक  जाया करते ! मोर्चेपरमैं कायल था उनकी सतर्कता का..चींईं ईंईं ब्रेक लगा लेने का गुण !

हाँ तो, इस बार चुहल में वह बात नहीं थी । उस पार के लाउडस्पीकरों से पाक़ीज़ा, उमरावज़ान सरीखी उर्दू फ़िल्मों के गाने बजते, जो रेगिस्तान में दूर तक गूँजते हुये अज़ब का दिशाभ्रम पैदा करते । स्साले.. हमारा गाना सुने बिना ख़ाना हज़म नहीं होता.. अबे दुपट्टा ओढ़ता ही काहे है.. जो इन्हीं लोगों ने..इन्हीं लोगों ने ले लीना का रट लगाये है.. फिर हा हा हा उहू उहूः हू से बैरक गूँज जाता ! देखीए यूयन्नो में भि इ सार मुसरफ़वा ईहै दोपाट्टा गा गाके बुसवा को खसम बनाय लिहिस है .. सुमेर बलियाटिक ठुसकी मारते.. वह हमेशा यू.एन.ओ. को यूयन्नो ही कहते,   और फिर वही अहाहाहा हा ह्हा ह्हायगे माई.. भाई लोग अगले पल से बेख़बर हँसते हँसते खुद ही दोहरे हो जाते, वाह जीना इसीका नाम है!

पर नहीं, इस बार चुहल में वह बात नहीं थी ! एक ख़ामोशी छायी हुई थी.. उस पार से " यूँ दी हमें आज़ादी कि दुनिया हुई हैरान.. कैयदेअज़म तेरा एहसान तेरा एहसान " जैसा कुछ लगातार सुनाई पड़ रहा था ! लांसनायक अपने ज़वानों से आँखें चुराने लगते.. काहेकि उनके ज़वान ऎसे लम्हों में अपनी प्रश्नवाचक निगाह उनके ऊपर लगातार साधे रहते,“बोलो,हमें क्या बोलते हो नायक ? ” 

क्या करते लांसनायक भारती ? अभी तक ऊपर से एक्शन का कोई आर्डर नहीं आया है.. एक भद्दी गाली मन में दे लेते.. हमारे ज़वानों का मोरल डाउन हो रहा है.. एक बार आर्डर मिल जाये तो इनका रोज का किस्सै ख़ैत्तम कै दें। चबा कर बोलने के चलते उनका ख़तम हमेशा से ख़ैत्तम ही रहा है ! गौरमिन्ट सट्ट साधे है... कुछेक क्षण अपने को संयत कर दायें हाथ से छुक छुक गाड़ी जैसा एक्सन करते हुये बोलते, " पब्लिकिया  भी ये नहीं करती और दुनिया का नाटकबाजी.. हाँय नहीं तो ? " उनकी हताश मुद्रा पर उनके ज़वान भी द्रवित हो उठते, पर.. क्या ?

ख़ैर, अब जल्दी से आगे बढ़ते हैं.. क्योंकि मेरा कुप्रसिद्ध तीन बजने को ही है ! इस रोज रोज की चिक चिक से ऊब कर आपस में यह तय पाया गया कि इस बार गश्त पर हम भी आमने सामने थोड़ा बहुत ज़ुबानी ज़माख़र्च हो लेंगे ! ताकि यह कुछ दिन तो शांत रहें !  अगली गश्त पर देखा तो सामने बाड़ के उस पार परवेज़ मियाँ गश्त पर हैं.. ' चलो, इनसे थोड़ा शिकवा शिकायत हो जाये । मियाँ नम्बरी चीज हैं.. टैंक अदल बदल करने का आइडिया इनका ही था..स्साला फ़रेबी ! बातचीत में इतने सधे और मीठे कि लगेगा अपनी बिटिया का रिश्ता देने आये हैं ! चलो अपना क्या है.. हाल चाल ले लें इनका भी मन बहल जायेगा और इस बदले मिज़ाज़ का रंग भी मिल जायेगा ।' यही सब मन में सोचते आगे बढ़े.. ऒईलो, ये तो स्साला गाली दिये जा रहा है ! एकदम से खौल गये, " ज़नानियों की तरह गाली क्यों देता है, बे ? " ससुरा वह आधी घुटी हुई दाढ़ी और जोर-शोर से गरियाने लग पड़ा.. क्या कहा वह आप न ही पढ़ें तो अच्छा है । भारती दहाड़े, "अबे गाली क्यों देता है.. सिर्फ़ दो हाथ लड़ ले तो जानें !" परवेज़वा जैसे गाँज़ा लगाये था, "किसने क्या कहा बे , सबूत है तेरे पास ?" भारती ऎसी स्थिति के लिये कतई तैयार न थे.. "ऒईलो, खुल्लम-खुल्ला गरिया भी रहा है और उल्टे मुझीसे सबूत भी माँग रहा है, धूर्त ?"

क्या करते लांसनायक भारती ? उन्होंने हनहना कर एक लात उसके पिछवाड़े जड़ दिया । बस, इतना ही था कि, सहसा तड़ तड़.. तड़ तड़ गोलियों की बौछार शुरु कर दिया मरदूद ने ! छिटक कर एक गोली हमारे लांसनायक के बाँयें टखने पर लगी, उन्होंने झटपट आड़ में पोज़िशन ले ली । तनिक झाँक कर चिल्लाये, "दिमाग ख़राब हो गया है... कल तक तो हमारे दम पर ऎश कर रहा था, 15-15 दिनों की दो छुट्टी दिलायी .. सो भूल गया ? " वह मेरी तरफ़ से अन्डरस्टैंडिंग थी.. यह था परवेज़ का ढीठ ज़वाब ! " तो फिर गाली क्यों देता है और कहता है कि सबूत दो, मक्कार ? "  परवेज़ की मशीनगन थमने का नाम ही नहीं ले रही है ! फिर चिल्लाये हमारे नायक, "अबे, वार डिक्लेयर तो होने दे..!!" परवेज़ सचमुच मक्कारी से हँसने लग पड़ा, " किसी गाली वाली का कोई सबूत तो दिया नहीं.. उल्टे हमारे पिछवाड़े लात ठोंक दिया... हमलावर तो तू है, पाज़ी ! वार तो तूने ही डिक्लेयर कर दिया है !"

“ऒईलो, यह क्या कह रहा है, तू ? “ भोले भारती चकराये ! ” मैं कुछ नहीं कह सुन रहा... यह तो दुनिया ने देखा कि पहला वार तूने ही किया है ! जाकर किसी से पूछ..  यह सियासत है !” परवेज़ अबतक हँस रहा है 

अकारण स्पष्टीकरण: जूताखोर भुश्श पर नपुसंक क्रोध के प्रतीक ज़ैदी के जूते पर हमारा ब्लागजगत आह्लादित है, चुहल में व्यस्त है । जहाँ संवेदनाओं के विलाप का बाज़ार नित्य नये तराने ला रहा हो, ऎसे में फिर वही मुंबई धमाके को संदर्भित पोस्ट ? आपके ऎतराज़ की कद्र करते हुये भी न्यू मैरीन लाइन्स के बिटिया के हास्टल की छत से मोबाइल पर आती धमाकों की अस्फुट आवाज़ें, लड़कियों का डर और घबड़ाहट के मारे गश खाकर गिरना, उन सबको एक कमरे में बंद करके रखे जाना फिलहाल मैं भूल नहीं पाया , क्योंकि यह सब एक अलग किसिम की सिहरन देती आ रही है ! क्या करें ?
एक बात और :पोस्ट का ऎसा अंत सामयिक संदर्भों के चलते अपरिहार्य सा प्रतीत होता लगता है.. साथ ही अनिवार्य सा भी लग रहा है ! फिर भी, मुझे इस पोस्ट का ऎसा अंत प्रस्तुत करने का सदैव पश्चाताप रहेगा । पर, यह पश्चाताप अब तक के लाखों उ्जड़े परिवारों के हाहाकार एवं वतन की आज़ादी के राह पर कुर्बान हुये हुतात्माओं के ठगे जाने के शोक से लाख दर्ज़े हल्का बैठ रहा है ! खैर, कूटनीति, सियासत व मज़हब की आड़ में पल रही सत्ता-लिप्सा का कहीं तो अंत होगा ? प्रतीक्षा है, ऎसे स्वर्णिम आशा के फलीभूत होने की... बस, आप भी इस प्रतीक्षारत कतार में लग जायें, और क्या ?
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13 December 2008

ये अन्डरस्टैंडिंग है और वो सियासत थी

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स्थान : सीमा चौकसी चौकी, देश में कहीं भी..
खट्ट्क्क खट्ट्क्क खट्ट्क्क .. हवलदार रामबवाली भारती मेज़र फ़ेरन सिंह के सामने जा खड़े हुये, पंज़ों पर उचक कर एक सैल्यूट मारा, " शौह्हः , मेरा 10 दिन का लीव एप्लिकेशन रिकेमेन्ड एन्ड फ़ारवर्ड कर दीजिये ।" मेज़र उनसे भन्नाये अंदाज़ में पूछते हैं, "क्यों, क्या है ?" हवलदार बगलें झाँकते हुये बोले, "शौह्हः, मेरा ताऊ इलेक्शन में पिल पड़ा है... सो, थोड़ा परचार-उरचार कर आयें, फ़ेमिली की नाक ख़तरे में है, प्लीज़ शौह्हः !"
मेज़र किचकिचा पड़े, "अरे ज़वान, पहले यहाँ तुम अपने देश की नाक की सोचो. " बीस हफ़्ते की कैम्पिंग में सत्तरह हफ़्ते तुमने ऎंवेंई बिता दिये । दस दिन के छुट्टी और चार दिन की मूवमेन्ट के बाद तुम्हारे पास बचा ही क्या ? " हवलदार रामबवाली भारती उतावले हो उठे, " शौह्हः मेरी रेगुलर पेट्रोलिंग चल रही है, आज भी नाइट पेट्रोलिंग पर रिपोर्ट करना है ।" मेज़र भभक पड़े, " तो ? तो, अब तक की ड्यूटी में तुमको एक भी इन्ट्रूडर या घुसपैठ की रिपोर्टिंग का चांस ही नहीं मिला ? जाओ, अपनी ड्यूटी पर.. कोई कारनामा दिखाओ, तभी रिकेमेन्डेशन की सोचेंगे.. मूव नाऔ !" दहाड़ सुन कर, बेचारे भारती हवलदार उल्टे पाँव वापस हो लिये, गिनती परेड होनी  थी ।
अगली सुबह रामबवाल हवलदार फिर मेज़र साहब के सामने हाज़िर, " शौह्हः रामबवाल रिपोर्टिंग सर !" पर, मेज़र जैसे कुछ सुनना ही नहीं चाहते थे, "नो नो, आई सेड नो वेऽऽ.. गो बैक टू योर पोस्ट !" अबकी हवलदार एकदम तड़क कर बोले, " शौह्हः हमने कल रात दुश्मन का एक टैंक अपनी सीमा के अंदर घुसते पकड़ लिया ।  सर, पूरा का पूरा  क्रू तो एस्केप कर गया लेकिन टैंक हमारे क़ब्ज़े में आगया है ! आप गैरिसन में देख लीजिये, सर !"

   nitthalla  binavajah

अब मेज़र फ़ेरन सिंह हैरान.. यह कैसे ? बाहर निकल कर देखा तो सचमुच एक पाकिस्तानी टैंक खड़ा है ! ख़ुशगवार माहौल में अपने कुछ ज़वान उस पर टँगे हुये मग्गों में चाय पी रहे हैं और दो जन एक रज़िस्टर में कुछ औपचारिकतायें दर्ज़ कर रहे हैं । मानना ही पड़ा मेज़र को, उन्होंने आगे बढ़ कर रामबवाल को अपनी बाँहों में दबोच लिया, " वेलडन ज़वान, तुमने अपना वादा पूरा किया, तुम्हारी छुट्टी मंज़ूर हुई समझो.. मैं वायरलेस पर बेस को पूरी इन्फ़ार्मेशन दे देता हूँ, जाओ.. आराम करो !"
शाम को अनौपचारिक गपशप में मेज़र ने हुलस कर कहा, " बधाई हो, ज़वान छुट्टी मंज़ूर हो गयी । पर, यह सब तुमने अकेले कैसे कर लिया ?" रामबवाली ने सिर झुका लिया, "मैं आपका मातहत हूँ, सर.. झूठ नहीं बोल पाऊँगा ! सिपाही का दर्द सिपाही ही जानता है, अन्डरस्टैंडिंग है, सर ! उधर का सिपाही भी जब छुट्टी चाहता है, हमसे टैंक माँग कर ले जाता है ! यही अदला-बदली इसबार भी किया है, सर !"
"यह चीटिंग और जुगाड़ है, यू फ़्राड ?" मेज़र गुस्से जितना गुस्से से काँप रहे थे,                                          उतनी ही शांति से हवलदार ने कहा.. क्या कहा ? वह बाद में .. .. ..

F

चाहे तो इसे आप ..सनक के समावेश पर शिवभाई की व्याख्या की पुष्टि ही समझें, या कुछ और.. 
1995 से 2000 के दौरान अपने वार्षिक अवकाश का गंतव्य मैं सीमा को छूते हुये देश के हर उस भाग को बनाता रहा, जो सड़क मार्ग और कुछेक ट्रैकिंग से नापा जा सकता था । इसी कड़ी में 1996 के शीतावकाश में मेरा जैसलमेर के निकट  लगभग 27 किलोमीटर पर स्थित, सीमावर्ती गाँव सम तक जाना हुआ ! एक यादगार यात्रा, क्योंकि कई औपचारिकताओं से मुक्ति मिल गयी थी !


एक दूरी के बाद फोटो लेना मना है, इसलिये अंतिमबिन्दुके चित्र ही आप देख पा रहे हैं ! सच में बड़ा रोमांचक रहता है, नो मेन्स लैंड पर खड़े होकर विश्व का सर्वथा स्वतंत्र स्वछंद नागरिक होने का अनुभव करना ! कुछेक सुरक्षा नियमों का उल्लंघन करते हुये..( जिसका मुझे खेद है ) और अपने एक नितांत अंधभक्त की सहायता से हम सीमावर्ती बाड़ तक जा सके ! दस कदम आगे और बढ़िये, और.. आपकी नागरिकता बदल गयी ! उधर से भाग कर आती हुयी पाकिस्तानी भेड़, दो छलांग में हिन्दुस्तानी कहलायेगी ! है न, अज़ीब बात ? खैर छोड़िये.. वहाँ रेत पर एक माचिस की खाली डिब्बी पड़ी देखी.. पिंज़रे में बंद बंदर छाप, उसपर कुल क़ैफ़ियत उर्दू में ही थी ! अंकों को छोड़ कर कुछ भी अंगेज़ी में नहीं था ।  मैंने यादव जी ( काल्पनिक नाम ) से पूछा, " पाकिस्तानी माचिस हिन्दुस्तान की ज़मीन पर कैसे ? " उसने बेपरवाही से उत्तर दिया, "हमारे किसी ज़वान ने सिगरेट वगैरह सुलगाने के वास्ते लिया होगा ।" मेरा 12 वर्षीय बेटा अपने जिज्ञासाओं का अनंत कोष यादव के सम्मुख खोल बैठा ! कुल ज़मा निष्कर्ष यह था, कि अपनी अपनी सीमाओं में हम अपनी ड्यूटी कर रहे हैं.. उसमें कोई ढील नहीं.. पर किसी चरवाहे या ज़वान से कुछ माँग लेना या कुछ दे देना एक सामान्य बात थी वहाँ ! लाउडस्पीकर से एक दूसरे के हाल चाल तक पूछ लिये जाते थे ! मुझे अटपटा लगा और मैं सत्ताधारियों के झगड़ों और इन सुरक्षा प्रहरियों में इन झगड़ों के प्रति कोफ़्त को नज़दीक से देख पाया ! कोलकाता से निकलने वाले देश ( দেশ ) के  पूज़ा विशेषांक 2002 में यह प्रकाशित भी हुआ है ! पोस्ट उसी को आधार बना कर थोड़े अलग ढंग से लिखी गयी है, क्योंकि.. हवलदार भारती ने क्या कहा, इसका समावेश तो अभी बाकी है !

हवलदार ने फ़ीकी हँसी के साथ कहा, " अब आप जो भी कह लो साहब पर, जुगाड़ से ही तो दोनों मुल्कें बनी हैं, जुगाड़ से ही उनकी सरकारें चल रही हैं, और उनके इस जुगाड़ को ज़िन्दा रखने और चलाते रहने के लिये हमलोग नाहक आमने सामने खड़े ड्यूटी के नाम पर अपनी ज़िन्दगी खराब कर रहे हैं.." 
यह तो उसने मुझसे कहा था, जिसको मैंने इस पोस्ट में मेज़र के मत्थे मढ़ दिया है, पर आलेख पूर्णरूप से आपबीती पर आधारित है

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09 December 2008

चैट्क्क.. डोन्ट वरी फ़ॅऽर इट, अंकल !

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यह विषय पड़ा तो बहुत दिनों से था... पर वही सनातन रोना, कुछ असलियत का और कुछ फ़ैशन में, बोले तो.. समय का टोटा, वह तो आपके पास भी होगा ! ब्लागिंग और लिखने का विषय ?  अरे, राम भजो... . जिस दिशा में  भी नज़र डालो, विषय  ललकार  रहे हैं ! ब्लागर वही, जो बात  पकड़ बतंगड़ बनाये ! टैग जो मन आये, वही घुसेड़ दो... संस्मरण, संवेदना, हलचल, विविध, व्यंग्य या कुछ भी ? अपुन के समीर भाई जी ने कहीं लिखेला है, " ब्लागिंग की  लत लग भर जाये, फिर तो सोते में, जागते हुये , रास्ते में, श्मशान में, लड़की में, कड़की में.. जित देखो ब्लाग सब्जेक्ट , जैसे मीरा के कान्हा ! उन्होंने तो अपना पक्का इंतज़ाम कर ही लिया है..लोकल ट्रेन के डिब्बों में भी अपना माल ताड़ लेते हैं, और मसाला लाइब्रेरी में मिल जाता है, सेफ़ हैं.. लकी हैं ! पर,  मुझे तो पहले का सोचा हुआ हर एक नुक्ता..  जैसे अब कुरेद रहा हो !

हुआ यह कि चिट्ठाचर्चा  के जिसका जितना आँचल था, उतनी ही सौग़ात मिली  पर मेरी एक टिप्पणी दर्ज़ होगी,
".....  लट्ठ ताऊ का पेटेन्ट है, राज भाटिया छुट्टियों पर निकले हैं, और यहाँ..
बिटिया को उड़ान भरने की लेट हो रही है,
जब तक हमारे सारथी जी, फ़्लाइट का कोई अतिशुद्ध हिन्दी विकल्प नहीं निकालते ,
तब तक आप अपनी बेटियों को उड़ने से कैसे रोक सकते हैं ?
सो, अभी चलता हूँ ! ....."
इसमें यह जिक्र करना आवश्यक न समझा कि मेरी बेटी की एक सहेली भी आयी थी, शिवानी लोढा ! कभी महाराष्ट्र से बाहर न निकली थी, सो वह आई थी यू.पी. का ज़लाल देखने ! जो भी देखा हो, पर  उसका रोज सुबह घूम घूम कर पेड़ पर लटके शरीफ़े, पकते अमरूद और बचे खुचे करौंदों को देख देख रोमांचित होना, मुझे आह्लादित करता था.. " आईला, दीज़ ग्वाआज़.. ओह ईषी, इट इज़ अ लाइफ़टाइम एक्सपेरियेन्स ! सच्ची अंकल, मैंने इत्ती बड़ी ज़िन्दगी में फ़र्स्ट टाइम देखा है.." इत्ती बड़ी पर उसका खास जोर रहता ! तो अपने स्टेट गेस्ट.. शास्त्री जी नाराज़ न हों, भूलसुधार किये लेता हूँ... तो, अपने राजकीय मेहमान को सकुशल विदा करना भी एक उत्तरदायित्व था ! मेरी बेटी ईषिता तो बाय बाय कर गयीं, फ़्लाइट समय पर थी । शिवानी चूँकि बाद में, लालू तत्काल पर आयी थी, सो उसे ट्रेन से ही जाना था, और.. उसे सी आफ़ करने तक लादे-लादे लखनऊ में विचरते रहना और  नान-स्टाप बकर बकर सुनते रहना था ! शाम को पुष्पक है, स्टेशन सात बजे पहुँचना है... तब तक ?

तब तक..' ये खाओगी, अच्छा यह ट्राई करके देखो, जरा शुक्ला के दहीबड़े भी चख कर देखो । ' यही सब चलता रहा । बेचारी पंडिताइन कुढ़ कुढ़ कर मरी जा रहीं थीं.. छिपा कर आँख तरेरा, "मैं कभी इन चीजों के लिये कहती हूँ, तो तुम उन्नीस का पहाड़ा बताने लगते हो, और इसपर बिछे जा रहे हो ? " हाय रब्बा, तूने अपनी रचना में इतना सारा कुड़कुड़त्व क्यों भर रखा है ? बच्ची है, कुछ घंटो के लिये अपनी मेहमान है, शर्म करो ! " अच्छा तो मुझे शेखर के यहाँ छोड़ दो, ट्रेन के बाद आ जाना.."  उनकी ओर से शह दी गयी और मैंने मात स्वीकार कर ली !

लगता है, विषयांतर हो रहा है.. कीबोर्ड हाथ आ जाये तो कंट्रोल ही नहीं होता ! स्वामी-संयम अभी मुझसे दूर है ! कुलज़मा किस्सा यह कि शाम को स्टेशन पहुँचा, जब तक कार पार्किंग में अपना जगह बना पाती, तब तक मिस लोढा दो बैग लेकर नीचे कूद चुकीं थीं, एक बड़ा सूटकेस डिक्की में था ! " इट्स मिनिमम,  अंकल ! आफ़्टर आल यू विल हैव टू कैरी अटलीस्ट फ़ोर सेट्स फ़र सेवेन डेज़, ना ? " यह बेवज़ह सफ़ाई मैं तब तक एक दर्ज़न बार सुन चुका था। खैर.कार से उतरा तो देखा शिवानी बगल में ही खड़ी है, डिकी के पास, सूटकेस निकालने को तत्पर.शिवानी लोढा-ईषिता अमर-बिनावजह निट्ठल्ला उसके बैग कहीं आसपास नहीं दिख रहे थे । " बैग्ज़ ? " मेरी प्रश्नवाचक मुद्रा भाँप, वह तपाक से बोली, "ओह, यू मीन बैग्ज़ ? दे आर एट प्लेटफ़ार्म एन्ट्री गेट !" मैं मन ही मन दहल गया, ' अरे लड़की, यह यूपी है.. बैग तो अब ना मिलता ।' इन लड़कियों की छठी इन्द्रिय बड़ी तेज होती है, भई ! बिना कुछ पूछे ही खट से ज़वाब भी आ गया.. तेज तेज कदमों से सूटकेस घसीटती हुई, उसने दोनों कंधे उछाले, "  चैट्क्क.. डोन्ट वरी फ़ॅऽर इट, अंकल !" तालू से जीभ चटकाते हुये वह बोली, " डोन्ट वरी, नो वन विल टच इट.. दे मस्ट बी सेफ़ देयर । " वह किंचित ढीठायी से हँसती है.. " यू नो, पीपुल आर सो स्केयर्ड, दे वोन्ट इवेन टच द बैग्ज़ !" उसके इस तरह के मुँहजोरपन पर मैं मन मसोस रहा था, पर उसने अपना बकबक जारी रखा, " यू नो, अंकल.. इन दिस एट्मास्फेयर.. नो सेंसिबल परसन डेयर टच एनीवंस लगेज़.. एट नरीमन वी लीव आअर पर्स एंड लव टू वाच द फ़नी  पैनिकी फ़ेसेज़ !

इस लड़की पर क्रोध तो बहुत आ रहा था, लगातार अंग्रेज़ी गिटरपिटर, ऊपर से ऎसी गैरज़िम्मेदार ग़ुस्ताख़ी.. पर ? पर.. वही स्टेट गेस्ट का मसला और यूपी की इमेज़ ! जाओ रे लड़की, बहुत होगया..पंडिताइन भी प्रतीक्षा में होंगी! पोस्ट लम्बी होते जाने के आसार बन रहे हैं, वह अलग से ?  क्या करें, यह लड़की अब ज़ल्दी  जाती  भी तो नहीं !

पुष्पक एक्सप्रेस यार्ड से आकर प्लेटफ़ार्म पर लग चुकी थी, कोच B-2, बीटू.. बीटूबीटू... बीटू हाँ यह रहा बीटू ! बर्थ इसी में है, चाल्ह छे्त्ती टुर लै गड्डी विच्च ! वह ज़ल्दी से अपना बड़ा सा बटुआ खोला, दाँतों से ओंठ भींच कर अपना हाथ उसके अंदर डाल जादूगर कुंडू के गिल्लि-गिली बुब्ब्लाबू स्टाइल में हिलाती है..   खरगोश तो नहीं, हाँ एक अज़ीब सा डिब्बा निकाल कर उसमे जड़े आईने में चेहरा दायें बाँयें घुमा कर ज़ायज़ा लेती है, और तपाक से एक गोल डिब्बी निकाल काम्पेक्ट अपने चेहरे पर फेरने लगती है.. अचानक वह काम्पेक्ट की डिब्बी कब लिपस्टिक में तब्दील हो जाती है, पता ही नहीं चलता और वह तमाम तरह के मुँह बना हौले हौले लिपस्टिक अपने गंतव्य पर इधर उधर दौड़ा रही है । ई लेडीस लोग का यह तामझाम मुझे हमेशा से ही बड़ा रहस्यमय लगता रहा है.. सो आज भी खड़ा खड़ा उसे हैरत से  देखता रहा.. खाना खाकर सोने के लिये इसकी क्या ज़रूरत ?  उसके किसी अदृश्य एंटेना ने सहसा मेरी यह वेव-लेंग्थ पकड़ ली हो जैसे, ऎसे उसने चौंक कर देखा । " ओह सारी, जस्ट अ लाइट टच-अप !" अपनी खिसियाहट छिपाने का प्रयास करते हुये, वह बोली ! फिर बेसाख़्ता हँसने लग पड़ी, " जस्ट अ मेक-ओवर टू टैली माई फ़ेस विद माई आई.डी.कार्ड फोटो.. इन केस द ट्रेन ब्लास्ट्स एंड यू आर काल्ड टू आईडेन्टीफ़ाई मी !" मैंने अपने दाँत पीसे, लगता है आज पिट कर ही जायेगी यह परकाला ?

ख़ैर, एक एक करके दोनों गयीं ! लौटते समय बड़ा सूना लग रहा था. और मैं डा. बशीर की कहीं पढ़ी हुई नज़्म याद करने का प्रयत्न कर रहा था.. ' गुल नहीं, गुलज़ार हैं.. बेटियाँ ख़ुदा का उपहार हैं.. बेटियाँ तो ख़ुशबू का झोंका हैं.. ये खेलती-कूदती, मचलती-महकती ख़ुशबू की बयार हैं.. ' जैसा ही कुछ ! " कहाँ ध्यान है, तुम्हारा.. नींद आरही है, क्या ? " लो, पंडितइनिया ने चौंका दिया । इनका यही है, एक झपकी मार लेंगी.. फिर पुकार पड़ेंगी,जागते रहो..

_________________________________9 दिसम्बर, मंगलवार ____________________________

यह विभाजन रेखा क्यों ? क्योंकि यह घटना 17 नवम्बर की है.. पोस्ट लिखी गई 25 नवम्बर, मंगलवार को.. सोचा कि, फ़ाइनली कोई इमेज़-ऊमेज़ लगाकर शनिवार को पोस्ट करेंगे ! इसीलिये कहा है, " काल करे सो आज कर " क्योंकि 26/27 नवम्बर की रात में जो हुआ, उसके आगे यह पोस्ट अप्रासंगिक हो गया था ! आपही बताइये. कहाँ वह मौत का तांडव, और कहाँ असुरक्षित माहौल को  भी एन्ज़्वाय करती इस मुंबईया लड़की का ये अफ़साना !

विचारों की कड़की का बयार लगता है, पछुआ हो गई है..  कल छुट्टी है, आज कुछ पोस्ट करना है.. कल तो पंचम जी को हलाल कर दिया आज कुछ लिखने को ज़ंग लग गया है । सो इसी को झाड़-पोंछ कर पब्लिश किये देता हूँओह, मुंबई-अमरकेवल कुछ सेकेन्ड और लूँगा : यह ऊपर वाला इमेज़ लेकर एडिट करते समय यह फ़र्क़ कर पाना कठिन हो रहा था, कि यह चारबाग, लखनऊ का प्लेटफ़ार्म है या सी.एस.टी. का ? यह तो आपके शहर का भी हो सकता था ?  पर, ईश्वर न करे (क्योंकि, सरकार तो बेबस है) कि ऎसा हो.. मैं मन को भरोसा देने को ' राम की शक्ति-पूजा ' की लाइनें दिमाग में बरबस लाने का प्रयास करता रहा.. ठीक से याद न आयीं ! मुझे ही क्या, पूरे देश को ही भूल गया होगा...

ईश जानें, देश का लज्जा विषय
तत्व है कोई कि केवल आवरण
उस हलाहल-सी कुटिल द्रोहाग्नि का;
जो कि जलती आ रही चिरकाल से
स्वार्थ-लोलुप सभ्यता के अग्रणी
नायकों के पेट में जठराग्नि-सी !

नहीं.. नहीं, यह तो शायद दिनकर के कुरुक्षेत्र में है.. अब इतनी रात में किताब कहाँ मिले ?                       आप ही देख लीजियेगा ! निराला की लाइनें तो शायद यह हैं :

है अमानिशा, उगलता गगन घन-अंधकार;
खो रहा है दिशा का ज्ञान, स्तब्ध है पवन चार;

या यह ............................................................................ ? 

शत-शुद्धि-बोध-सूक्ष्मतिसूक्ष्म मन का विवेक,
जिनमें है क्षात्र-धर्म का घृत पूर्णाभिषेक,
जो हुये प्रजापतियों से संयम से रक्षित,
वे शर हो गये आज रण में श्रीहत, खण्डित !

मात्र 15 दिनों में एक पोस्ट का पूरा संदर्भ ही बदल गया.. , सिंहासन का सेमीफ़ाइनल चल रहा है, लोग झूम रहे हैं, बम फ़ुटा रहे हैं.. नाच रहे हैं, और हम कह रहे हैं कि विषय का टोटा है..यह भी भला कोई बात हुई,वाह !

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07 December 2008

सनद रहे कि यह नकल है..

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अब ढूँढ़िये, इसका मूल लेखक ?
यदि आप जागरूक पाठक हैं, तो पहचान ही जायेंगे..
इस पोस्ट के मूल लेखक को... नहीं पहचाना ?  कोई बात नहीं., फिर तो..
यह रचना मेरा हिन्दी के प्रसार में योगदान माना जाये                                                            और इस नक्काल के पोस्ट-मर्म को अनदेखा कर दें
art-thief_e0मैं नक्काल - अमर
ओ पैणचो मंत्री लोकी की करदे ने, हुण पता लगिया ।
ओ पता तां पैलां ही सी, पर अद्दे जाके दिसदा पिया वे।
ये वो संवाद थे जो मुंबई के किंग्स सर्कल से सटे पंजाबी कॉलोनी में एक दुकान पर चल रहे थे। तीन लोगों के ये हिंदी-पंजाबी मिश्रित संवाद इतने रोचक थे कि मैने इनकी कुछ बातें अपने अदने नोकिया 2626 पर रिकॉर्ड कर लिया लेकिन अगल बगल उठ रहे ट्रकों और काली-पीली टैक्सियों के उठते शोर के बीच सब कुछ दब गया। अपने एक मित्र के साथ एक दुकान पर कुछ काम से गया था, वहीं पर ये रोचक संवाद सुनने मिले। ये रोचक संवाद जरा आप Text में देखें ।
पहला - ओ साले मंत्री अपणी मां ** रहे सी, पैण चो कर (घर) विच् टांगा विच टांगा डाल के पये होणगे मां दे लौ*
दूसरा - उन्ना नु लोकां नाल की मतलब, माचो खुद ते ऐश-उश करांगे पांवै ( भले) इधर पबलिक दे लो* लग जाण।
तीसरा - ओ पैंचो मिडिया वाले वी अपणी मां *** पै ने । एक नू हत्थ नाल खून रिसदा पिया वे ते माचो मु विच्च माइक पा के दस्सदे पये ने - ये देखो कितना खून निकल रहा है - ओ मांचो कून (खून) नहीं निकलेगा ते के चाशनी निकलेगी....... मां दे दीने।
पहला- ओ लौंडा( पकडा गया एक आतंकी) टुटण लगिया वे, ओन्नु चंगी तरह कुटणा चहीदा, पैणचो हुणे टंग नाल बाल नहीं निकलिया, माचो अटैक करन चलिया सी, मां दे दीने नु पुन्न के रखणा चहिदा ए ऐसे लोकां नुं।
दूसरा - ओ बीबीसी वाले आतंकवादीयां नुं टेररिस्ट नहीं बोलदे.....उन्ना नुं गनमैन बोलदे ने ......इन्ना दे तराह ( भारतीय मीडिया की तरह) ढाम-ढूम मूजिक-व्यूजिक ला के चिल्ला के नई बोलदे - आतंकवादी यहाँ अपनी मां चु* रहा है।
( तीनों ने जोरदार ठहाका लगाया)
पहला - ओ तैनु पता ऐ I B वालियां ने उन्नी तरीक नु ( उन्नीस तारीख को) एन्ना नु बोलिया सी कि तुहाडे ताजमहल होटल विच खतरा हैगा। पर ऐ मंत्रीयां नु मां *** नाल फुरसत मिले तां ना।
तीसरा - इस देश दा हुण की होउगा, पता नी यार।
दूसरा - ओ विलासराव, लैके गिया सी रामगोपाल वरमा नुं ......ऐ के तमाशा विखाण वास्ते लै गिया सी के.......नाल अपणे मुंडे नुं वी लै के गिया सी के नां है उसदा.....?
पहला - रीतेश देशमुख....।
दूसरा - हां....रितेश.....के लौड ( जरूरत) पै गई सी ओन्नु लै के जाण दी। हुण के अपणें मुंडे वास्ते लोकेशन वेखण गिया सी कि देख लै बेटा - तैनु इधरे शुटिंग करनी है।
तीसरा - देश दा तमाशा बना के रख दित्ता है होर कुछ नहीं।
अभी ये बातें चल रही थीं कि उन लोगों का ही कोई परिचित एक मोना पंजाबी अपने साथ एक बैग लेकर वहीं से गुजर रहा था। उसे आवाज देकर बुलाते हुए एक ने कहा -
ओए.....बैग वैग लै के कित्थे कोई अटैक उटैक करने जा रिहा है के।
सत श्री अकाल जी।
सत श्री अकाल ( तीनों ने सम्मिलित जवाब दिया)
पास आ जाने पर उस युवक से उन लोगों की बातचीत चल पडी।
कित्थे जा रिहा है।
ओ कल मनजीते दी बर्थडे पार्टी है, उस लई कुछ सामान-सुमून खरीदीया है।
पहला - ओ इधर अटैक-शूटैक हो रिया वे .....ते तुस्सी पार्टी शार्टी कर रहे हो।
( एक हल्की हंसी इन चारों में फैल गई)
उदरों ही आ रिहा वां ( उधर से ही आ रहा हूँ) , लोकी सडकां ते आ गये ने बैनर-शुनर लै के ( लोग सडक पर आ गये हैं, बैनर वैनर लेके )।
सडक ते आणा ही है यार, बंबे दी पब्लिक चूतिया थोडे है.....सैण दी वी लीमट हुंदी ए ( सहने की भी लिमीट होती है)।
यह बातचीत और लंबी चली होगी। लेकिन इधर मैं अपने मित्र के काम निपट जाने पर दुकान से निकल आया....... जब कि इच्छा थी की अभी और इन लोगों की बातचीत सुनूं।
_____________________________________________________________पहचान तो नहीं लिया ? मैं क्यॊ बताऊँ कि यह सतीश पंचम की पोस्ट है, या मेरी ? अब कुछेक पल को कल्पना करें, कि यह पोस्ट मई 2007 में लिखी गयी होती तो ? क्या पता, लेखक अपना पोस्ट मैटर कहाँ से खोद कर लाया है ? आप तो पब्लिक की शार्ट-मेमोरी के मुरीद हैं, न ? शर्मा-शर्मी में भी, कोई शर्मदार एक टिप्पणी तो डाल ही जायेगा, नीचे वाले चौकोर कमेन्ट-कटोरे में ! चलिये मान लेते हैं कि यह सतीश पंचम जी की ही पोस्ट है, तो मैं उनकी लोकप्रियता में श्री-वृद्धि ही तो कर रहा हूँ ?  यह बौद्धिक संपदा पर अतिक्रमण कैसे माना जाये, आप ही बोलिये ?
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24 November 2008

घी के लड्डू, टेढ़े ही सही ...

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आज की चिट्ठाचर्चा में मसिजीवी ने एक माकूल सवाल उठाया, जाने कहाँ गये वो ब्लाग..जो, " तुम तो छा गये गुरु !" जैसी टिप्पणियों से लदे रहते थे ! कुछेक तो मेरे पसंदीदा हुआ करते थे, जिन्हें मैं पढ़ तो लेता था, किन्तु  किसी हिन्दी टूल की जानकारी न होने से अचंभित बस पढ़ता ही था, टिप्पणी कैसे की जाती है..न जानता था । रिसियाये गुरु ने बहुत बाद में मेरा अधकचरा प्रयास देख बरहा का लिंक दिया, वही अब तक काम आ रही है । उन दिनों जितेन्द्र चौधरी की एक पोस्ट मुझे बहुत पसंद आयी थी, जो मैंने कहीं नोट कर लिया ! विन्डोज़ 98 गये,  XP आये, कई संस्करण के बाद अब विस्टा पर काम कर रहा हूँ, पर उन पढ़े हुये पोस्ट की यादें नहीं भूलीं । यह साबित करता है,कि हमारा आपका लिखा इन्टरनेट पर सदैव जीवित रहेगा ! मसिजीवी ने वह ब्लागर.. वह ब्लाग्स.. वह पोस्ट का ख़ज़ाना याद दिलाया, धन्यवाद मित्र ! किसी माकूल टिप्पणी के लिये कच्चे माल की तलाश में भटका.. सो भटक कर ही रह गया । लीजिये पढ़िये जितेन्द्र चौधरी की एक पोस्ट, जिसका लिंक मैंने नोट कर रखा था । पुनःप्रकाशित करने की अनुमति की तक़ल्लुफ़ पूरी न कर पाने की मुआफ़ी बाद में

   Sunset    यह छवि  श्री संजय व्यास जी के ब्लाग ' हृदयगाथा ' से उठायी गयी है 

यह रहा मूल आलेख, किन्तु शीर्षक मेरा दिया हुआ है, क्योंकि मेरे ख़्याल से NRI होना भी घी के टेढ़े लड्डू हैं, संभलते नहीं

राजेश प्रियदर्शी का यह लेख मुझे बहुत पसन्द आयाः यह लेख वैसे तो यूरोप मे रह रहे अप्रवासी भारतीयो के लिये लिखा गया है, लेकिन सभी पर लागू होता है.

सपने
अच्छी नौकरी, पाउंड को रूपए में बदलें तो डेढ़ लाख रूपए के क़रीब तनख़्वाह. लंदन शहर की ख़ूबसूरती,यूरोप घूमनेके मज़े.                                                                                                                              धूल नहीं, मच्छर नहीं, सभ्य-सुसंस्कृत लोग. चौकस पुलिस, आसान ट्रैफ़िक, हफ़्ते में दो दिन पक्की छुट्टी, आठ घंटे काम, बेहतर माहौल.
चार साल रहने के बाद ब्रिटेन में रहने का पक्का इंतज़ाम, अपनी गाड़ी, अपना घर और एनआरआई स्टेटस.
देश में इज़्ज़त बढ़ेगी,भाई-बंधुओं को भी धीरे-धीरे लाया जा सकता है,अगर कभी लौटे बेहतर नौकरी मिलना तय पानी, बिजली, फ़ोन का बिल भरने के लिए लाइन में लगने की ज़रूरत नहीं, भ्रष्टाचार और संकीर्ण दिमाग़ वाले लोगों से मुक्ति.

संताप
आज तक किसी अँगरेज़ ने दोस्त नहीं माना, किसी ने घर नहीं बुलाया, हैलो, हाउ आर यू, सी यू के आगे बात न कोई करता है, न सुनता है. मुसीबत पड़ने पर पड़ोसी भी काम नहीं आता.
हर साल भारत जाना मुश्किल है,प्लेन का किराया कितना ज़्यादा है, माँ बीमार है.फ़ोन का बिल भी बहुत आता है लोग चमड़ी का रंग देखकर बर्ताव करते हैं, शरणार्थी समझते हैं, बीमार पड़ने पर डॉक्टर बीस दिन बाद का अप्वाइंटमेंट देता है और मरने पर फ्यूनरल दो हफ्ते बाद होता है.
रोज़ बर्तन धोना पड़ता है, हर संडे को वैक्युम क्लीनर चलाना पड़ता है, नौकर और ड्राइवर तो भूल ही जाओ.
मँहगाई कितनी है, कुछ बचता ही नहीं है, कोई चीज़ ख़राब हो जाए तो मरम्मत भी नहीं होती, सीधे फेंकना पड़ता है, प्लंबर पत्रकार से ज़्यादा कमाता है. आधी कमाई टैक्स में जाती है.
बच्चों के बिगड़ने का भारी ख़तरा, ड्रग्स, पोर्नोगार्फ़ी. बच्चे अपनी भाषा नहीं बोलते, ख़ुद को अँगरेज़ समझते हैं. चार अक्षर वाली गाली देते हैं जो 'एफ़' से शुरू होकर 'के' पर ख़त्म होती है.
ऐसा क्या है जो भारत में नहीं मिलता, गोलगप्पे और रसगुल्ले खाए बरसों बीत गए. धनिया पत्ता और हरी मिर्ची के लिए भटकना पड़ता है.
त्यौहार आते हैं और चले जाते हैं, पता तक नहीं चलता, पूजा कराने के लिए पंडित नहीं मिलता. गोबर, केले और आम के पत्ते के बिना भी कहीं पूजा होती, फ्लैट में हवन करो तो फायर अलार्म बज जाए.

सवाल

क्या कभी भारत लौट पाएँगे, क्या बच्चे वहाँ एडजस्ट करेंगे,हमें कहीं बहुत सुख सुविधा की आदत तो नहीं पड़ गई?मैं तो चला जाऊँगा, घर के बाक़ी लोगों को कैसे मनाऊँगा, बसा-बसाया घर उजाड़ना कहीं ग़लत फैसला तो नहीं? जीवन सुरक्षित नहीं, भ्रष्टाचार बहुत है, दंगे भड़कते रहते हैं, आदत छूट गई है, कैसे झेलेंगे यह सब ?             लोग पहले बहुत मदद करते थे, दिल्ली, मुंबई का जीवन अब कुछ कम व्यस्त तो नहीं, लोग पहले जैसे कहाँ रहे? दिक्क़तें यहाँ भी हैं, वहाँ भी, चलो जहाँ हैं वहीं ठीक हैं, फिर कभी सोचेंगे

Posted by Jitendra Chaudhary at Thursday, September 23, 2004 

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16 November 2008

अमर कुमार का ई-कचरा

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eswami  आज शनिवार है या समझिये कि था...
वैसे तो इतने दिनों गायब रहा ही, पर आज है मेरी साप्ताहिक छुट्टी, और यही दिन तो असल छुट्टी में शुमार है, सो अपने मेल इनबाक्स का थोड़ा बहुत ज़ायज़ा वगैरह लिया ही था, कि एक हितैषी का मेल देखा.. वैसे तो इनका लगाई-बुझाई करने जैसा व्यक्तित्व नहीं है,  पर इन्होंने श्री ई-स्वामी जी के किसी साइड एफ़ेक्ट पोस्ट का जिक्र कर, इशारा दिया कि मैं  अपना  भी पक्ष रखूँ ! अब मैं अपना भेजा तो अंबाला में छोड़ आया हूँ, गुड़ाई-निराई व सिंचाई के लिये, क्या करूँ ? पक्ष धरी धरी.. या न धरी !

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लेकिन अपना पक्षवा काहे रखूँ, भाई.. ई कोनो ज़िल्ले-इलाही हैं ? अगर हैं भी, तो होंगे... ईहाँ सैकड़न के भाव से स्वामी भरे पड़े हैं.. सभी समझते अपने को तारणहार
आजौकाल एक फँसा पड़ा है, दर्ज़नन के भाव से बेभाव की पड़ रही है, स्वा्मी अमृतानंद को.. बोलिये
गली गली में फलाहारी, वृथाकारी, ब्रह्मचारी, दुराचारी, व्यभिचारी इत्यादि जनता बेचारी को चर रहे हैं
धत्त-स्वामी, हट्ट-स्वामी, ऊ-स्वामी, ई-स्वामी.. अब किस किस को क्या क्या साइड-इफ़ेक्ट होता है, हम्मैं क्या करना ? लै दस्स, भगवान का इफ़ेक्ट भले न दिखे.. स्वामियों का इफ़ेक्ट औ' साइड-इफ़ेक्ट तो जग को गंधा रहा है इंटरनेट को भी नहीं बख़्सा, आसमान से गिरे.. नेट पर अटके, भला यह कोई बात हुई ? हे राम.. नेट पर साँस भी न ले पाये थे, कि यहाँ भी ई-स्वामी ! क्या पता, रामचन्द्र क्या कह गये रहें अपने सिया से.. त्राहिमाम त्राहिमाम, हम तो ईहाँ देख रहें हैं, एक अउर स्वामी ?     

बहुत गुलामी हुई गयी भगवन, अब क्या ई-ग़ुलामी भी करवाओगे ?

अमर कुमार का ई-कचरा 

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मन में बहुत कुछ चलता है.. यानि कि यही सब ! मन है तो मैं हूँ, मेरे होने का दस्तावेजी प्रमाण बन रहा है.यह  विचार, पाकिट में पड़ा गुरु ज्ञानदत्त जी का यह सूत्र चिढ़ा रहा है.. चल रहा है, तो ठेलो ! सो, किंचित विचलित हुआ, पर यह स्वमिया शुरु से ही बड़ा खुरखुंदी है... स्थितप्रज्ञ तो नहीं ही लगता, शायद मुझे विचलित करना ही उसका मन्तव्य रहा हो, ज़बरन दिमाग को झटका देकर, बाहर आकर अपने एक प्रिय आँवलें के पेड़ के नीचे बैठ गया, शांति की आस में.. एक बाग के बीचोबीच मेरा आवास है, आबादी से कुछ दूर एक अलिखित  से डोन्ट डिस्टर्ब डिस्टेन्स पर..इस सुख से वंचित बंधु इससे मिलने वाले मनोरम एहसास को महसूस करने को आमंत्रित हैं , इंडिया के रोम..  यानि कि अपुन सोनिया के रायबरेली में 

सामने निर्माणाधीन चहारदीवारी चार-पाँच ईंट तक उठ कर रुकी हुई है,
वैभव और रिशी के बीच की बहन पल्लवी उस पर उछल-कूद मचाये है
( यह पल्लवियाँ ऎसी ही खुराफ़ाती होतीं हैं क्या ? एक पल्लवी जोशी अभिनेत्री को जानता था, बड़ी भूचाली कन्या थी..एक ताँगे वाली पल्लवी है, हमारे कबीले में भी,...खैर ! ) हमारे पोस्ट की इस पल्लवी बिटिया के संग आज एक कोई नया लड़का भी है । मात्र 4 या 4½ वर्ष का यह बच्चा दोनों हाथ व पैरों का सहारा लेकर लगभग काँखते हुये इन ईटों पर चढ़ता है.. इतनी ऊँचाई तक जा फ़ुरसतिया ब्रांड पुलकित च किलकित होते हुये, सबको शेरपा-तेन्ज़िंगनुमा  एक स्माइल देता है, आवाज़ भरसक मोटी बना कर,सबको पुकार पुकार अपना करतब मिस न करने की हिदायत भी दोहराये जा रहा है. फिर धम्म से कूद पड़ता,  यही क्रम चल रहा है । कूदते हुये स्वयं ही मुँह से आवाज़ भी निकालता है, अंकल देखो, देखिये.. हैय्यऽहः धर्रड़ाम्म, अब देखना.. देखो देखो, ओऽओय्यः धऽड़ाम्म.
अपनी इतनी बड़ी उपलब्धि से पुलकित होता जाता उसका चेहरा  देखते ही बनता था,आनन्दम..वह विजय आभा ! 

arrows जैसे कि कोड बदल बदल कर साफ़्टवेयर बनाने वाले मिस्त्री एक दूसरे से अपनी उपलब्धि बघारते हैं               व उसपर ध्यान न देने वालों को देख लेने की धमकी देने के अंदाज़ का अनोखापन,अति आनन्दम
धमकी भी क्या.. कि जाओ तुमसे नहीं बोलेंगे ! भला किस पाषाणहृदय के मन में रस नहीं घुलेगा ?
आनन्दम च आनन्दम, ज़रूर इसपर कभी पोस्ट लिखूँगा, कैसे लिखा जाय.. इसी पर सप्रयास मनन कर रहा था.. लिखने-ऊखने में मेरा दिमाग दर-असल एक सुस्त किसिम के बाबू-किरानी की तरह टालू व्यवहार किया करता है, शनैः शनैः.... धीरे धीरे..किसी भी घटनाक्रम की फ़ाइल तो खोल लेगा.. फिर उसपर, सुस्त रफ़्तार बैलगाड़ी सा.. और से भी और धीरे धीरे मनन करते करते जैसे ऊँघ जाता है । फिर थके होने का बेवज़ह बहाना बना, मनन हो गया, अब बाद में इसपर खनन करेंगे कह कर पूरी की पूरी फैइलिया खोपड़ी के पिछले कोने में कहीं दबा-सरका देता है, श्री आलोक पुराणिक कृपया ध्यान दें,सुखराम से सीख लेकर मैंने डायरी में कुछ भी दर्ज़ करने की आदत से तौबा कर ली है, आप भी कल्लो !  सो मेरा दस्तावेज़ी मन दिल को बहलाने को ग़ालिब के अच्छे ख़्यालों की गवाही में, आगामी किसी मनन सत्र में फ़रदर खनन करने का भरोसा दिला, इस मनन को दफ़न कर देता है,  इसीलिये रह गया.. यूँ ही निट्ठल्ला !  अलबत्ता मुझको यह इत्मिनान दिलाता है, कि..आगामी किसी संभावित खनन में इसी में से एक नायाब हीरा सा पोस्ट निकाल कर दिखलाऊँगा,  इन टिप्पणीचूसों को..arrows

eswami

अपनी सोच का यह लड्डू मन ही मन टूँग रहा था,कि.. ... कि,  क्या ?
अरे, थोड़ा दम धरने दो.. कोई भूचाल नहीं आया, यह तो मेरी वाली ' ..कि ' हैं ! तो यह तथाकथित कि,साइड-डोर से एक अमरूद कचरती हुई पंडिताइन के रूप में अवतरित हुईं.. कचर कचर कचर..ऎई, कचर.. तुमसे ही कह रहीं हूँ, कचर कचर... नहाओगे नहीं ? कच्च कच्च, भईय्या तुम्हारी...कचर..कचर कचर,      ये छुट्टी क्या होती है.. मेरा तो सारा.. कचर कचर सेड्यूल ( सोने का ) बिगड़ जाता है, कच्चक कच्च....चलो उट्ठो.. कचर कचर कचर.. निट्ठल्ले बैठे कैसे समय काट लेते हो..कचर कचर ! अब इनको बीबी के परमानेन्ट पोस्ट पर बहाल किहौ है.. तो सुनो, कुछ तो बीबी कहेगी.. बीबियों का काम है कैनाऽ ऽ..छोड़ोऽ बेकार की इस कचर-कचर में छिन न जायेऽ चैना ♫♪ मैंने उचटती हुई एक थेथ्थर दृष्टि उन पर डाली, एक पर्याप्त उत्तर, "चलता हूँ यार, दम न करो " फिर सामने वाले बच्चे की शौर्य-क्रीड़ा देखने लगा,  मेरी दृष्टि का पीछा कर, वह भी बच्चे पर केन्द्रित होती भयीं, आंटी को दिखा कर वह फिर कूद पड़ा, धर्रड़ाम्मः, इस बार दो गुलाटी खा स्पाइडरमैन सा खड़ा भया पुल्लिंग चाहे जिस आयु का भी हो, स्त्रीलिंग को देखकर क्यों करतबी हो जाता है ? सो, मोहतरमा कचर कच्च के कंठ से फूटा, “ बच्चे को देखो तो, इतनी कम उम्र में भी किस तरह  बेचारा कूद कूद कर अपने को शाबासी दे रहा है… “ अमरूद पर हुआ एक और लास्ट-ओवर दंतप्रहार, ख़च्चाक कच्चक कच्चक कच्च...   कौन है यह , .. कचर कचर कचर... कचर, तुम इसको, बच्चे को जानते हो ?   यह बच्चा कौन है ? मैं उसको देख देख, अब तक इतना मुदित हो गया था.. कि हठात मेरे मुँह से निकल पड़ा…. ये बच्चाऽ ?  नाम तो यार मैं भी नहीं जानता, यह बच्चा शायद … ठीक से तो पता नहीं,पर  समझो तो लगता  है  अपना ई-स्वामी !" श्री विशु उर्फ़ ई-स्वामी   

हो सकता है,कि मेरे प्रमुदित मन के अवचेतन में भी स्वामी जी कचर कचर मचाये रहें हों, तभी तो.. वरना इस तरह, ऎसा ज़ुलुम बात हमरा मुँह से निकलता ही कइसे, भाई ? एथिक्स भी तो अथिया कुच्छौ  है न जी ?

“ई-स्वामी ? यह स्वामी कौन है, क्या यहाँ भी स्वामी होते हैं, कौन है.. ई-स्वामी ?”  अब उनके ज़ुल्मी संग लड़ी भयी अनुभवी  आँखों में बार्नविटा क्विज़ कांटेस्ट के रैपिड राउंड प्रश्नावली की ये इनबिल्ट अधीरता मुझको ऎसे ही परेशान करती है ! “क्या यार,तुम भी ? अरे, ई-स्वामी बोले तो ई-स्वामी, इतनी भी समझ नहीं है ?” अब धनिये की चटनी चाटी जा रही है, “तो चिल्ला क्यों रहे हो ? मैं तो यह पूछ रही हूँ, कि जैसे अरुण-पंगेबाज़ हैं तरुण- निट्ठल्ला चिंतन हैं, लिंकित मन-नीलिमा हैं, अपने अनूप जी-फ़ुरसतिया हैं.. वैसे ही इसका  भी  तो  कोई  नाम होगा ?” ब्लागीवुड की इतनी गहन जानकारी देख, मैं अचंभित होगया..‘कैसी चलायी ये हवा भाभी रीता पांडे ने’

“हाँ हाँ हाँ, याद आया.. वही तो नहीं, जो तुम्हारी टिप्पणी माडरेट-वाडरेट करके लौटा दी थी, कि तुम चार महीने से लिख रहे हो, मैं चार साल पुराना ब्लागर हूँ. जाकर पहले मेरा लिखा पढ़ो, फिर टिप्पणी करने लौट कर आओ।”

अमर, आपकी टिप्पणी मिली. ज़रा ड्राफ़्डिया मोड में लिखी हुई है! यह समझ में नहीं आया की आप किसे गरिया रहे हैं? किसके लेखन को कचरा कह रहे हैं? कौन दबाव में लिख रहा है और कौन वेश्यावृत्ती कर रहा है? आपकी यह टिप्पणी प्रकाशित नहीं कर रहा, आपका संदेश मुझ तक पहुंचना था पहुंच गया, ठीक! मेरा एक निवेदन है, प्रवचन देने में जल्दबाज़ी ना करें, आप चार माह से ब्लागिंग कर रहे होंगे हम साढे चार साल से हिंदिनी चला रहे हैं! जरा समय लें और हमारा पुराना लिखा ही पढ लें! शेष कुशल, ई-स्वामी 2008/8/18 WordPress A new comment on the post #182 "प्रतिक्रियाएं जो टिप्पणियों में नहीं मिलतीं! " is waiting for your approval http://hindini.com/eswami/?p=182 Author : डा.अमर कुमार (IP: 59.94.129.81 , 59.94.129.81) E-mail : c4Blog@gmail.com URL : http://c2amar.blogspot.com Whois : http://ws.arin.net/cgi-bin/whois.pl?queryinput=59.94.129.81

“हाँ यार, वही !” मैं आज़िज़ हो गया, इस वाचाल नारी से !“क्या फिर कुछ लिखा-ऊखा है, क्या नाम है, इसका ?” फिर वही ढाक के तीन पात..मैं खीझ गया, “ अरे, तुम उसके नाम के पीछे काहे पड़ी हो, जब वह अपने माँ-बाप का दिया नाम ज़ाहिर नहीं करना चाहता, तो मुझे क्या पड़ी है.. होगी कोई बात ?” हार कैसे मान जाय, सो एक छोटा सा ज़ुमला उछाल दिया, “फिर भी..?” हे राम, अब इसका क्या करूँ.. सो, मैं चिल्लाने लग पड़ा, “ जाकर ताली ठोकूँ, शौनक की अम्मा, ज़रा ये तो बता, तेरे शौनक के बप्पा का नाम क्या है ? वैसे भी इस सब का उसकी सोच, लेखन और भाषा से क्या ताल्लुक है ?” उन्होंने मुँह फेर लिया, पर बन्द न किया,” मुझे क्या करना, लेकिन कहाँ का है,यह तो बता दो ?” यह थी अगली  बाल! अज़ीब परेशानी है, पता नहीं क्यों इस सनीचर को आज ही सवार होना था, “अमें यार खोपड़ी ख़लास मत करो, सभी उड़न-तश्तरी नहीं हुआ करते, कि जबलपुर से कनाडा सर्रर्रर्र हो जाने को स्वीकार करें.. यह शायद अंबाला से लांच हुये थे, अब ग्लोबल आरबिट में मँडरा रहे हैं, नीचे उतर आयें..फिर काहे के ई अउर काहे के स्वामी ? वैसे CA से कंट्रोल किये जाते हैं ।” अब आगे कुछ न पूछना, पाप लगेगा ! पर पंडिताइन आज भिड़ाने के मूड में है,” फिर भी जाकर देख तो लो, कि क्या उल्टा-सीधा लिखा है, वहाँ ?“ अरे राम, ई शनिचरवा के हम का करी ? “ तुम तो जानती हो कि मैं कई ज़गहों पर मूतने भी नहीं जाता, फिर क्यों भेज रही हो ? जाऊँगा तो कुछ लिखूँगा ज़रूर, कुछ टिप्पणी बक्से ऎसे हैं, जो सब हज़म कर जाते हैं, इट्स शीयर वेस्टेज़ आफ़ टाइम ! ज़नानियाँ ऎसा करें तो ठीक भी लगता है, पर,” इससे आगे मैं बोल नहीं पाया

क्योंकि बीच में ही टपक पड़ीं,” पर ज्ञानदत्त जी को लेकर..” छड्डयार, उनकी बात अलग है, मुझको हमेशा लगता है कि टिप्पणी-लोलुपता के चलते अपनी विद्वता व क्षमता का सदुपयोग न करके वह ज़मीनी हक़ीक़त को इग्नोर कर जाते हैं ! इशारों में ही तो बताया,और क्या ? अपना बिना परिचय दिये मिल भी आया, और क्या ? अब बस्स!

वैसे मेरे शनिवार अवकाश का तो कचरा हो ही गया, यह कचरा पोस्ट लिख कर ! इस माहौल में सृजनशीलता..   ना बाबा, ना !

cvcbttn आदरणीय दिनेशराय द्विवेदी जी, आपकी रात्रि/प्रातः 3 बजे वाली पोस्ट की फ़रमाइश पूरी की गयी, ख़ुश ! लवली बिटिया, तू अपनी ज़ान की ख़ैर मना, हमारे तंत्र द्वारा रख़्शंदा नेट पर सक्रिय पायी गयी है, औ’ तू फँस गयी ! निजता की बात करने वालों से बाद में बात होगी । ई-कचरा जारी रहेगा, असहमत, कुछ तो है..पर

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04 May 2008

ज़िन्दगी की ' चंगुल ' में कैद या कुछ और ?

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भाई माफ़  करना, अच्छा भला सोने का मूड बन रहा था, कि मति मारी गयी । एक नादान हरकत  और नींद की लक्ज़री से फ़ुरसत ! जाते जाते सोचा कि लाओ चिट्ठाजगत एक बार खंगाल लिया जाय, मेरे चिट्ठा खिंचायी में क्या घालमेल चल रहा है, देखूँ तो ? प्रवेश करते ही डिबिया से टकरा गया, और जैसे उसमें से कोई ज़िन्न निकल आया हो । यह सरबजीत का मामला क्या है भाई, कोई बतायेगा ? सरबजीत की फाँसी फिर टली । समझ नहीं आता कि यह मुश्शर्रफ़ की दरियादिली है, या लोमड़ीगिरी है । इस तरह का टुकड़े टुकड़े एक्सटेंशन, सरबजीत, उसके परिवारजन और हम भारतीयों के लिये  कितना यंत्रणादायक है । क्या सरबजीत को अपनी एक एक साँस ज़िन्दगी की चंगुल में कैद न लगती होगी ?  देश के लिये ज़ाँनिसार करने का ज़ज़्बा लिये एक चलता फिरता मनुष्य, अपने पूरे होशोहवास में यदि पल पल अनिश्चय का जीवन जी रहा हो, तो इसे क्या कहेंगे ? मैं तो इन पलों को, अपना आज का शीर्षक ही कहूँगा ।
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सदर-ए-ज़म्हूरियत ज़नाब मुश्शर्रफ़ मियाँ एक ब्लैकमेलर सरीखे हरकतें करके क्या साबित कर रहे हैं ? शु़क्र है उनके ईमान का कि वह " हुण इत्थों राजीखुसी हाँ, चिन्ता दी कोई लोड़ नईं,छेत्ती आँवंगे, तुस्सी फिकिर ना करीं " जैसा  फोनालाप सरबजीत के घर वालों से नहीं करवा रहे हैं । किंतु यह तय है कि किसी किसिम का फोनालाप दोनों सरकारों के बीच चल तो रहा है । इंडिया बोले तो भारत जब सोचने का समय माँगता है, तो पाकी ज़ल्लाद फाँसी की रस्सी ढीली कर सुस्ताने लग पड़ते हैं । ज़ाहिर है कि राजनयिक स्तर की सौदेबाजी चल रही है । पर सारा हिन्दोस्ताँ क्यों चुप है ?
यही नाटक कश्मीर सिंह के साथ भी चला था । उनको रात दो बज़े उठा कर रस्सी की मज़बूती परखने वास्ते बोरे में बराबर वज़न का मिट्टी भर कर तौल लिया गया । डाक्टरों ने फाँसी से पहले की औपचारिकता के तहत मुयायना करके उनके ज़िन्दा होने की तस्दीक भी कर दी । चार बजने के इंतज़ार  में सब टहल रहे थे कि ढाई बजे रिहायी के हुक्म का तामील करवाया गया, निश्चय ही आधी रात में पैगंबर के फ़रिश्ते तो न आयें होंगे, रहम की दरख़्वास्त करने, तो ? मुझे आडियो क्लिप अभी  लगानी नहीं आती, बीबीसी हिंदी पर दिये गये  इस इंटरव्यू की क्लिपिंग अवश्य पेश करता ।
प्रणव दादा रहम की भीख माँग कर पहले ही देश को शर्मिन्दा कर चुके हैं, " मैं पाकिस्तान से अपील करता हूँ कि मामले की कानूनी पहलुओं को अलग रखते हुये इंसानियत के आधार पर ही इस बदकिस्मत इंसान के साथ दया दिखायी जाये । " 18 अप्रैल का बयान क्यों ऎसी ज़रूरत आन पड़ी दादा ? क्या महाशक्ति बनने से पहले ही देश को फ़ुस्स कर दोगे । उनकी ज़मीन, उनका कानून ! यदि वह यह कहें कि अफ़ज़ल कुकुर को छोड़ दो, तब ? और यही चल रहा है । इंसानियत का आधार उसको दिखाओ, जो यह फ़ारसी जानता हो । उन्हें हिंदी में याद दिलाओ कि तुमने कभी उनके साथ इंसानियत दिखाने की नादानी की थी । घुटने टेक चुके 93,000 पाकियों को लौटाने की नादानी, अंडमान में एक बंदिस्तान क्यों नहीं बन सकता था ? ये बुज़दिल सही किंतु इतने फ़ौज़ियों से हाथ धोने के बाद उनकी यह ताकत आज न होती कि आप दया की भीख माँगते दिखते । जो जीता वही सिकंदर, फिर भी आप हारे को हरिनाम गा रहे हैं ।
                                                   
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मैं तो अपने गुरु पूर्णेन्द्र मिसिर का शठे शाठ्यम समाचरेत से ज़्यादा जानना भी नहीं चाहता । जाइये, आज आपको छोड़ता हूँ, मेरी पंडिताइन के जगने का समय हो रहा है, वरना कल को आप उससे भी दया की भीख माँगते दिखोगे । भाई, आप भी लोग भी जाइये, अपना अपना काम करिये, कोई ख़ास बात नहीं है । और...यह कुछ भी तो नहीं है । नमःस्कार ! अपने तिरंगे पर टूलटिप फिरायें, धन्यवाद
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यह अपना हिन्दी ब्लागजगत, जहाँ थोड़ा बहुत आपसी विवाद चलता ही है, बुद्धिजीवियों का वैचारिक मतभेद !

शुक्र है कि, सैद्धान्तिक सहमति अविष्कृत हो जाते हैं, और यह ज़्यादा नहीं टिकता, छोड़िये यह सब, आगे बढ़ते रहिये !

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